नींव से लेकर छत तक, कटोरे से लेकर ओवन तक लोन का नकली सुख भोगते हुए आजकल कुछ ज्यादा ही तंगी में चल रहा हूं। क्या है न कि महंगाई कुछ अधिक ही हो गई है। मंदी का दौर आसमान से भू तक पसरा है। हवा में मंदी, पानी में मंदी, रिश्वत देकर काम करवाने वालों की रवानी में मंदी। रिश्वत देने के लिए जेब में हाथ बाद में डालते हैं मंदी का रोना पहले शुरू कर देते हैं जैसे महाशोक में डूबे हों।
अपने देश की सरकार की वैसे तो बहुत सी खासियतें हैं पर उसकी सबसे बड़ी खासियत है कि वह जिंदों को रोटी देने में भले ही कोताही बरते पर उनके हताहत होने पर उन्हें बड़ी धूमधाम से श्रद्धांजलि देना कभी नहीं भूलती।
रात के दस बज चुके तो मैंने चैन की सांस ली कि चलो भगवान की दया से आज कोई पड़ोसी कुछ लेने नहीं आया। भगवान का धन्यवाद कम्प्लीट करने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई, एक बार, दो बार, तीन बार। लो भाई साहब, अपने गांव की कहावत है कि पड़ोसी को याद करो और पड़ोसी हाजिर। खुद को खुद ही गालियां देते हुए दरवाजा खोलने उठा कि यार ! ये किस मुहल्ले में आकर बस गया तू? जहां के आदर्श जनों को ये भी शऊर नहीं कि कम से कम मांगने तो टाइम से आ जाना चाहिए। दरवाजा खोला तो पहचानते देर न लगी। सामने जिन्न! हवा निकल गई। बड़ा चौड़ा होकर उठा था कि पड़ोसी को वो झाड़ूंगा! वो झाड़ूंगा कि सात जन्मों तक मांगना भूल जाएगा । पर सामने जिन्न देखा तो बरसों से याद हनुमान चालीसा एकदम भूल गया।
मेषः- आपने जो कुछ पिछले कई महीनों से पेट काट कर जमा किया है अब उसे मन मसोस कर आटे दाल पर खर्च करना ही होगा। आपको भीतर ही भीतर किसी मेहमान के आने की चिंता हर पल सताएगी। इस चिंता के कारण न तो आप दिन में जागे रह सकेंगे और न ही रात को घर वालों को चैन से सोने देंगे। गणेश जी का कहना है कि घर में खर्च को देखते हुए संयम बरतें नही तो घर में हंगामा हो सकता है। उपाय- पीपल को रोज सुबह पानी चढ़ाएं।

शनिवार को बाल-दिवस था। बाल-दिवस! चलो एक दिन के दिवस के बहाने बच्चों की सुध ली जाती है। शायद स्कूलों में कार्यक्रम होते होंगे। हमारे समय में तो होते थे। अब का पता नहीं। वैसे अब ज्यादा ध्यान दिया जाता है बच्चों पर। ज्यादा भाग्यशाली हैं आज के बच्चे। जैसे पाठ्यक्रम में बदलाव, परीक्षा समाप्त करना जैसे अनेक कदम उठाये जा रहे हैं।
अब आप को अपणे बारे में क्या क्या बताऊं? बस इतणा जाण लेओ कि मैं अपणी जिंदगी में जो कुछ भी आज तक बणा दुर्घटणावस ही बणा। मैं पति नहीं होणा चाता था। पर हो गया ! मैं चोर होणा चाता था पर मास्टर होणा नहीं चाता था। वो तो चुणाव में अपणे नेता जी के पोस्टर लगाए, और बो बदकिस्मती से चुणाव जीत गए और उण्होंणे मास्टरी की नौकरी का पेपर लीक करवा मेरे हाथ सौंप मुझे अपणे कर्ज से मुक्त किया। उस वक्त मैंणे उणसे कहा भी था,‘ नेता जी! मुझे पटवारी बणा दीजिए, मुझे पुलिस में भर्ती करवा दीजिए पर मास्टर तो मत बणाइए। मुझे पढ़णे पढ़ाणे से बहुत डर लगता है।’ तो वे मंद मंद मुस्कराते कहे थे,‘बचुआ आज हर नौकरी में रिस्क है। कुछ खाओ भी णहीं तो भी जणता शक की नजर से देखे है। और मास्टर हो के जो मण कहे करो, कोई कुछ नहीं कहणे वाला। देश निर्माता का फट्टा माथे पे लगाओ और मौज मणाओ।
दफ्तर में आज भी बैठने को मन नहीं किया सो दोपहर को बिन छुट्टी दिए घर आ गया। दफ्तर में रहता तो भी कौन से पहाड़ उल्ट देता! दफ्तर में मुझे देखते ही बंदे तो बंदे, अब तो फाइलें भी थर्र-थर्र कांपने लगती हैं। मुझे देखते ही काम करवाने आए वालों की तरह इन्हें भी छुपने को जगह नहीं मिलती और लाख कोशिश करने के बाद भी महीनों-महीनों चपरासी को नहीं मिलतीं। दफ्तर में अब सीनियर बंदा हो गया हूं। इसलिए अवकाश देने से ऊपर उठ चुका हूं। दफ्तर से आकर अभी जूते भी नहीं खोले थे कि मुहल्ले में हलचल कुछ अधिक ही होती लगी। सभी थे कि वर्मा के घर की ओर दौड़े जा रहे थे। घरवाली भी बदहवास सी लगी।
वे हाव भाव से पूरे के पूरे सरकारी बंदे ही लग रहे थे। उन पांच में से एक ने कंधे पर एक टूटी कुदाल ली थी तो दूसरे ने बिना हथ्थी का बेलचा उठाया हुआ था। तीन जनों ने पैंट में हाथ डाले हुए थे। उन्होंने गुनगुनाते हुए, कमर मटकाते हुए मुहल्ले में एंट्री मारी तो हम मुहल्ले वालों की खुशी का ठिकाना न रहा। लगा सरकार के कान पर जूं रेंग गई है। हम तो मान बैठे थे कि कि सरकार के पास और तो सबकुछ होता है पर कान नहीं होते। छः महीने से मुहल्ले की इकलौती स्ट्रीट लाइट खराब है। पचास बार शिकायत दर्ज करवा चुके थे। कुछ नहीं हुआ। चार महीने से मेन सिवरेज पाइप टूटी हुई है। जो भी कोई मुहल्ले से बाजार जाता कमेटी के दफ्तर जा शिकायत कर आता। कुछ न हुआ। वैसे तो मुहल्ले के हर घर में ही सरकार ने नल लगवाया हुआ था पर पानी सार्वजनिक नल में ही आता था। पंद्रह दिन से वह नल भी बच्चे की शू शू की धार पर उतर आया था। बारीनुसार कमेटी में शिकायत करने गया तो वहां पर कुर्सी तोड़ते बंदे ने डांटते कहा,‘ यार! तुम लोगों को कोई और काम भी है या नहीं!’
.........रात के ग्यारह बज चुके थे। पत्नी द्वारा बार बार पड़ोसियों के द्वार दौड़ाए जाने के बाद अब मैं पूरी तरह थक चुका था। जब भी पत्नी को लगता कि बगल के फलां पड़ोसी के घर से कोई आवाज नहीं आ रही है तो वह झट से चार लड्डुओं के डिब्बे को मेरे हाथ में पकड़ा उस पड़ोसी के घर यह जासूसी करने यह आदेश दे भेज देती कि हे रा के एजेंट! जाकर पता लगाओ कि उनके घर लक्ष्मी तो नहीं आ गई! मैं सहमा हुआ सा दबे पांव पड़ोसी के घर बहाने से घुसता वहां, सूंघता और उस घर में लक्ष्मी की खुशबू न पा मुस्कुराता लौट आता। जब तक मैं अपने घर न आता पत्नी की जान उसके गले में अटकी रहती और ज्यों ही वह मेरे मुस्कुराते चेहरे को देखती तो खुशी के मारे उछल पड़ती।
कल दफ्तर में सारा दिन मूड ऑफ रहा । इसलिए नहीं कि सुबह उठते ही पत्नी का थोबड़ा देखा था । इसलिए भी नहीं कि दफ्तर आते-आते रोज की तरह पड़ोसन की प्रेम भरी चितवन ने विदा नहीं किया था। इसलिए भी नहीं कि दफ्तर जाते ही दफ्तर में साहब के चरण चाटने पड़े । साहबों का तो हमारा खानदान जन्मजात भक्त रहा है। जब तक मैं साहब के चरण न चाटूं पिछले दिन का कम्बख्त खाना ही हजम नहीं होता। मैं ज्यों ही बिल काटने बैठा बिल देने वालों की लाइन में एक गधा न जाने कहां से आकर खड़ा हो गया था। गधा होने के लिए चार टांगें होना जरूरी नहीं ! बड़े-बड़े कान होना जरूरी नहीं!! पूंछ होना जरूरी नहीं !!! गधे आजकल कई रूपों में यहां-वहां सर्वत्र उपलब्ध हैं, सुगमता से । और असली गधे बेचारे दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर, गुप्ता की तरह ।
रोज की तरह बिल काटने शुरू ही किए थे कि... उसूलन मैं ही क्या, आज के दौर में कोई भी बकाया के दो-चार रूपये वापस नहीं करता। वैसे भी महंगाई के दौर में दो-चार रूपये का आता क्या है भैया ! इसीलिए कई समझदार तो बकाया मांगते भी नहीं । इन जैसों की दया से शाम तक दो चार सौ बन जाते हैं ।
उस गधे का बिल था 145 का और उसने दिए 150 । बिल काट मैंने उसे रसीद दी तो वह धन्यवाद करने की बजाय भी वहीं अड़ा रहा । दूसरे को दिक्कत हो रही थी । आखिर मुझे ही कहना पड़ा,` यार , पिछले को आने दो । अब क्यों अड़े हो ? ´
` 5 रूपये वापस दीजिए ।´ यों बोला मानो कुबेर का खजाना रख लिया हो ।
`छुट्टे नहीं हैं । ´ गुस्सा आ गया । सारा दिन इनके लिए कुर्सी से चिपके रहो ,और ये हैं कि ....वरना अपना क्या? पगार तो मिलनी ही मिलनी है । 5 न हुए .....(ख़ैर, जाने दीजिये)
` अच्छा , पांच रूपये दे दीजिए । ´ उसने फिर साधिकार कहा । लगा गधा पहली बार बिल देने आया है , सो पूछा ` भैया, पहली बार बिल दे रहे हो क्या ? ´
` क्यों ? ´
` हर महीने देते होते तो अपना टाइम बरबाद न करते । ´
` पर पांच रूपये ?´ `टुट्टे होंगे तो ले जाना । ´ मैंने कहा तो वह किनारे खड़ा हो गया ।
अगले का बिल भी 145 , पर उसने 150 में से पांच नहीं मांगे । समझदार लोग ऐसे ही होते हैं ।
उसने फिर कहा ,` तो अब 10 दे दीजिए । ´
` किस बात के ?´
` 5 इनके , 5 मेरे । ´
` क्यों ? ´
` हम पांच -पांच बांट लेंगे । ´
` मुझे विश्वास नहीं तुम पर । देश में बांट कर खाने का रिवाज खत्म हो गया है । हद है यार , पांच रूपये के लिए पचास रूपये का समय बरबाद कर दिया । ´ बस , उसके बाद मन ही नहीं किया बैठने का । घर आते ही पत्नी ने बताया कि पण्डित जी को कुछ हो गया है। आनन-फानन में उनके यहां पहुंचा तो उनके मुंह से झाग निकल रहा था । लोग-बाग उन्हें घेरे हुए थे ।
` क्या हो गया ? ´
` इन्हें काट लिया। ´
` किसने ? ´
` सांप ने। ´
` सांप ने तो इन्हें पहले भी काटा था तो सांप मर गया था। ´ गुप्ता ने हंसते हुये कहा।
`तो सांप से ज्यादा जहरीला तो कुछ नहीं? ´
` होता होगा ! तभी इनकी यह दशा हुई है । ´ उनकी पत्नी परेशान । पेंशन सीधे हाथ में आने का मौका कौन हाथ से जाने दे ?
` झाड़-फूंक वाला नहीं बुलाया क्या ? ´
`आया था , कह रह था इस पर मन्त्र नहीं चल रहा । किसी भयानक कीड़े ने काटा है।´
` तो ? ´
` अस्पताल ले जाना पड़ेगा। ´
` तो? ´
और पड़ोसी धर्म के नाते न चाहते हुए भी उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा । सब धर्म तो मर गए साले , ये धर्म क्यों बचा है भैया ? जेब में लगाने लायक आज कुछ पड़ा न था। फिर भी सौ-पचास लगा दिए, शायद परलोक सुधर जाए ।
झल्लाए डॉक्टर ने पूछा,` कहां से लाए हो ? ´
`वार्ड 10 से । ´
`क्या हो गया मरे को ? ´
` काट दिया है। ´ मैंने मरी आवाज में कहा।
` किसने ? बिच्छू ने ? ´
` नहीं । ´
` सांप ने ? ´
`नहीं।´
` कुत्ते ने ? ´
` नहीं । ´
` पत्नी ने ? ´
` नहीं ! दफ्तर गया था जमाबन्दी की कापी लाने ।´ अचानक पण्डित जी की बेहोशी टूटी ।
`तो ? ´
` पैसे घर भूल गया था । ´ वे बेहोशी में ही बड़बड़ाए।
`उसने जेब पर डंक मारा ।' और वे फिर बेहोश हो गए ।
डॉक्टर ने गम्भीर हो कहा ,` इसका जहर नहीं कट सकता । ´
`क्यों ? ´
` इसे व्यवस्था के भरोसे छोड़ दीजिए । व्यवस्था ने चाहा तो ..... ´
` वर्ना ? ´
` व्यवस्था का डसा वैसे तो आजतक बचा नहीं । समाज गवाह है । ´ कह वह एमआर से वहीं गिफ्ट लेने जुट गया । और मैं मरते हुए पंडित जी का सिर धुनते हुए मृतात्म मंथन करने लगा, हालांकि उनके सिर में धुनने के लिए बालों के नाम पर कुछ भी शेष न बचा था।
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डॉ.अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन -173212 हि. प्र.
मित्रो! जब से रिटायर हुआ हूं, कुछ दिन तक अकेला भरी-पूरी फैमिली होने के बाद भी लावारिस गाय की तरह सुबह-सुबह मार्निंग वाक पर निकलता रहा। ये जो आप आजकल सुबह-सुबह घूमते हुए मुझे कुत्ते के साथ देखते हो न! यह मुझे दो महीने पहले मेरे बच्चों ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी पर गिफ्ट में दिया था कि मैं इस उम्र में कम से कम अकेला सैर करने न निकलूं ।
अब कुत्ता और मैं अरली इन द मार्निंग घूमने निकल जाते हैं। घर की किच-किच से भी बचा रहता हूं। स्वास्थ्य लाभ इस उम्र में मुझे तो क्या होगा, पर चलो कुत्ते को अगर हो रहा है तो ये भी क्या कम है।
तो कुत्ते के स्वास्थ्य लाभ के लिए पसीना-पसीना हुए अपने अनवांटिड पड़ोसी के घर के सामने से दुबकता हुआ गुजर रहा था कि भीतर से उसके भौंकने की आवाजें सुनीं । मैं तो चुप रहा पर कुत्ता भौंक पड़ा। उसे रोका भी, पर जो कहने पर मान जाए उसे कुत्ता कहेंगे आप? आप कहें तो कह लें, पर मैं नहीं कह सकता। कारण सारी उम्र मास्टरी की है।
कुत्ते के भौंकने की आवाज सुन भीतर भौंकता हुआ पड़ोसी भी बाहर आ गया । रिटायरमेंट के बाद एक भौंकने वाला भी परेशान कर देता है और वे भौंकने वाले दो-दो। कुत्ता अभी भी कुछ अपना था, सो उसे जैसे-कैसे चुप कराया, पर पड़ोसी भला चुप होने वाला कहां था। उसने चार-चार सीढ़ियां एक साथ उतरीं और मेरे आगे चीन की दीवार बन खड़ा हो गया,‘यार’ शर्मा जी हद हो गई! ये भी कोई बात बनती है कि सरकार के मन में जो आए करती रहे और हम उल्लू बनकर सहन करते रहें। सरकार के नौकर हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं कि...है??’ पर मैं चुप रहा । सारी उम्र तो उल्लू ही बनकर जीता रहा। पड़ोसी बड़ा भाग्यशाली लगा जो अब उल्लू बना। दोस्तो! आदमी जिंदगी में कुछ बने या न, पर कभी न कभी उल्लू जरूर बनता है। वास्तव में आदमी पूरा आदमी बनता ही तभी है, जब वह उल्लू बनता है।
‘आखिर ऐसी बात क्या हो गई जो आज सुबह-सुबह ही...क्या कल खाली जेब तो घर नहीं लौट आए थे और पत्नी से झाड़ पड़ी हो?’ मैंने पूरी सहृदयता से पूछा।
‘नहीं, ऐसी बात नहीं , कल तो भगवान ने छप्पर फाड़ कर दिया।’
‘ तो किसी ’शरीफ आदमी से पाला पड़ गया होगा?’
‘ शरीफ आदमी अब समाज में बचे ही कहां हैं ’शर्मा जी! वे तो अब मोम के बुतों में ढल संग्रहालयों में मौन खड़े हैं।’
‘तो????’ मैं परेशान, पर भगवान की दया से हैरान नहीं हुआ। असल में क्या है न कि इतनी दुनिया देखने के बाद अब कुछ भी हैरान नहीं करता । हां! थोड़ी देर के लिए परेशान जरूर कर देता है।
‘पहले आप घर चलो। आपको सब बताता हूं।’ कह बंधु ने जबरदस्ती अपने घर की बीस सीढ़ियां एक सांस में चढ़ा दीं। घर में ले जा बंधु ने बड़े आदर से बिठाया। लगा ही नहीं कि मैं किसी पुलिसवाले के घर आया हूं।
मेरे आगे बड़े आदर से चाय का कप रख बंधु उसी तरह भौंके,‘ शर्मा जी! ये भी कोई बात बनती है कि सरकार जो कहे हम सिर झुकाए मानते रहें।’
‘आखिर बात क्या है?’ बड़े दिनों बाद औरों के घर की चाय पी थी ,इसलिए हर घूंट किसी फाइवस्टार की टी से कम नहीं लग रही थी।
‘सरकार कभी कहती है रिश्वत न लो, तो कभी कहती है ’शरीफ को न पकड़ो। अब इस अखराजात के दौर में कोरे वेतन में कौन यहां गुजारा कर लेगा? इस वेतन में तो बच्चों की फीस भी नहीं हो पाती। सरकारी नौकरी में भी अगर मौज के लाले पड़ें तो लानत है ऐसी सरकारी नौकरी को। रिश्वत के बिना इस देश में किसी का गुजारा हुआ है क्या? चोर-उचक्के आज तक पकड़ में आए हैं क्या! बदनामी से बचने के लिए शरीफ ही पकड़ने पड़ते हैं। अब एक और आदेश कि हम मानवता का पाठ पढ़ें। मानव हों तो मानवता का पाठ पढ़ें। हम तो साले अभी आदमी भी नहीं हो पाए। ये उम्र है अपनी क्या पढ़ने की? बच्चे तक तो आवारा हो चुके हैं। डंडा चलाते-चलाते बाल सफेद हो गए। अब जाएं मानवता का पाठ पढ़ने! अपने आप दिन पर दिन .....’ कहते -कहते वे कुछ ज्यादा ही सुलग गए तो मैंने उन पर थोड़ा पानी डाला,‘ तो क्या हो गया यार! सरकारी आदेश पालन के लिए थोड़े ही होते हैं। दूसरे, सरकार आदेश न करे तो और क्या करे? उसे भी तो लगना चाहिए कि वो देशहित में कुछ तो कर रही है। पर चिकने घड़ों में कभी बिल लगे हैं क्या?’ इसे कहते हैं समझदारी! उन्होंने पूरी श्रद्धा से मेरे कुत्ते के पांव छुए, तो मैं धन्य हुआ। लगा मैं अभी भी इन सर्विस हूं।
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अशोक गौतम
गौतम निवास, अपर सेरी रोड,
नजदीक वाटर टैंक सोलन-१७३२१२ हि.प्र.