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Sunday, September 06, 2009

चालीस रुपए की चीनी क्या मीठी लगेगी 'सरकार' ?


सरकार चीनी के भाव बढ़ा रही है। जी हां, यह सुनने में यह विचित्र लगता है लेकिन सच है। इस समय चीनी के भाव में जो तेजी आ रही है वह सरकार की शह पर है। यह बात आज वह हर व्यक्ति कह रहा है जो चीनी के गणित को जानता है।
चीनी के भाव में तेजी के बीज तो गत वर्ष ही बो दिए गए थे जब देश में गन्ने का उत्पादन कम होने के कारण चीनी के उत्पादन में कमी की आशंका पैदा हो गई थी। बहरहाल, सरकार ने उस समय कहा कि उत्पादन 220 लाख टन
होगा। बाद में इसे घटा कर 200 लाख, फिर 180 लाख टन और अंत में 160 लाख टन पर आकर रुक गई। लेकिन आज वास्तविक उत्पादन 150 लाख टन से नीचे पर सिमट गया है।
सरकार चाहती तो अब भी तेजी को रोक सकती थी जिस प्रकार मई में मिलों पर साप्ताहिक बिक्री सम्बंधी आदेश लगाकर किया था। न मालूम किस कारण से सरकार ने इस नियम को बाद में निरस्त कर दिया। यह सब जानते हैं कि इस वर्ष भी देश में गन्ने की बिजाई गत वर्ष की तुलना में कम हुई और इसका उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। पहले यह अनुमान था कि एक अक्टूबर से आरंभ होने वाले सीजन 2009-10 के दौरान चीनी का उत्पादन 200 लाख टन तक पहुंच जाएगा लेकिन अब अनुमान है कि यह 170 लाख टन से ऊपर नहीं पहुंच पाएगा।
हालांकि यह बात चीनी उद्योग जानता है लेकिन जब सरकार यह कहे कि उत्पादन कम होगा और भारत को फिर चीनी का आयात करना पड़ेगा तो इसका संदेश विश्व बाजार में अलग ही जाता है। जिस दिन भारत सरकार की ओर से कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने यह बयान दिया कि विश्व बाजार में चीनी के भाव बढ़ गए, इसका अर्थ है कि चीनी का आयात और महंगा होगा।

40 रुपए के संकेत

सरकार की ओर से बयानबाजी की बात यहीं पर समाप्त नहीं होती है। गत सप्ताह चीनी पर आयोजित एक सम्मेलन में शरद पवार ने फिर एक सुर्रा छोड़ दिया कि विश्व बाजार में चीनी के भाव बढ़ रहे हैं, इससे अक्टूबर में जो चीनी आयात होगी वह 40रुपए प्रति किलो के आसपास पड़ेगी। अर्थात वह संकेत दे रहे हैं कि मिलों को आयातित चीनी के भाव 40 रुपए प्रति किलो पड़ेंगे और उपभोक्ता अधिक भाव चुकाने के लिए तैयार रहें। साथ ही मिलों को शह भी दे दी कि वे 40 रुपए तक चीनी बेच सकती हैं। उनके इस बयान के बाद ही दिल्ली सहित देश के लगभग सभी भागों में थोक बाजार में चीनी के भाव 3350 रुपए रुपए प्रति क्विंटल के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि खुदरा बाजार में चीनी के भाव 36 रुपए प्रति
किलो के पार चले गए हैं। ब्रांडेड चीनी तो अब भी 40 रुपए प्रति किलो के आसपास चल रहे हैं।

खो जाएगी मिठास
ऐसा नहीं लगता कि उपभोक्ता के लिए चीनी में अब मिठास रह पाएगा। गत वर्ष की तुलना में भाव लगभग डबल हो चुके हैं और आगामी सीजन में भी भाव में किसी भारी कमी का अनुमान नहीं है। देश में उत्पादन तो कम होगा ही विश्व बाजार में भी उत्पादन कम होने से आयात महंगा होगा और इसका असर देश में उपभोक्ता मूल्यों पर पड़ेगा। दूसरी ओर, चीनी मिलों के मजे हैं। मुनाफा अधिक होने के संभावनाओं के कारण लगभग सभी मिलों के शेयरों में निवेशों की खरीद हैं और भाव बढ़ रहे हैं।
हालांकि सरकार ने चीनी के भाव पर अंकुश लगाने के लिए कुछ कदम उठाएं हैं, लेकिन वे नाकाफी हैं। थोक उपभोक्ताओं पर स्टाक सम्बंधी पाबंदी का कोई असर होने वाला नहीं है। थोक व खुदरा व्यापारियों पर स्टाक व बिक्री की समय की सीमा पहले से ही लागू है। हां, यदि सरकार मिलों पर अंकुश लगाए और उन्हें एक तय भाव पर चीनी बेचने के लिए कहे तो बाजार
में भाव पर कुछ काबू पाया जा सकता है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि वास्तव में सरकार को चीनी के भाव
में तेजी रोकने में कोई दिलचस्पी है ही नहीं, ऐसा उसके द्वारा उत्पादन व भाव सम्बंधी बयानों से स्पष्ट है।

राजेश शर्मा

Thursday, August 27, 2009

दाल-सब्जी के दर्शन दुर्लभ हैं यमराज !

कल एक बार फिर महंगाई का सताया खाली झोला थके कांधे पर डाले मुंह लटकाए बाजार से घर न चाहते हुए भी आ रहा था कि सामने वाले मोड़ पर पौराणिक भैंसे पर से उतर गिरते मकान के छज्जे के नीचे खड़े हो यमराज इधर-उधर कुछ देख रहे थे। उनका भैंसा वहीं पास खड़ा चर रहा था या कि विचर रहा था। उसके गले में मेड इन चाइना का सीडी प्लेयर जोश के साथ हनुमान चालीसा उगल रहा था....सब सुख लहे तुम्हारी सरना, तुम रच्छक काहू को डरना। आपन तेज सम्हारो आपै, तीनो लोक हांक ते कांपे। भूत पिसाच निकट नहीं आवै, महावीर जब नाम सुनावै... पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप....
पता नहीं क्यों मैं एकाएक उनकी ओर खिचा चला गया। मुझे उस वक्त न कोई डर न कोई विडर। महंगाई से बड़ा कोई और यमराज होता है क्या! भूख से भी बड़ा कोई और यमराज होता है भाई साहब... क्या भ्रष्टाचार से भी बढ़कर और कोई यमराज होता होगा भाई साहब... क्या बेरोजगारी से बढ़कर भी कोई यमराज होता है क्या! मुस्कराता उनके निकट पहुंचा तो वे डरे-डरे से, सहमे से। मुंह पर कपड़ा बांधे हुए। हद है महाराज! जिनकी वजह से यमराज के पद पर सुशोभित हो उन्हीं की सड़ांध से मुंह पर कपड़ा! देखो यमराज! अगर हम न हों तो आपको भी पूछने वाला यहां कोई न हो। फिर घूमते रहो जितना मन करे भैंसे पर बैठ कर, जहां मन करे। हम हैं, तो आप हैं। आपकी रोजी-रोटी का आधार हम ही तो हैं ,चाहे जैसे भी हों। अब ये शरीर है ही जब सड़ांध का तो क्या करें! जितना हो सकता है पचासियों अभावों के बीच भी इसे बनाकर रखते हैं। मुझे बहुत गुस्सा आ गया। वैसे भी आजकल हम जैसों के पास मंदी के दौर में आसमान छूते गुस्से के सिवाय और कुछ है भी नहीं।

` ये मुंह पर कपड़ा क्यों बांध रखा है हजूर, क्या मौत से आपको भी डर लगने लगा है´ मैंने कहा तो उन्होंने मुंह पर बंधे कपड़े के बीच में से ही बुदबुदाते कहा,` स्वाइन फ्लू यार, प्रीकाशन ले रहा हूं।´

` आपने लाल किले से प्रधान मंत्री को नहीं सुना क्या´

` क्या कहा उन्होंने´

`कहा कि स्वाइन फ्लू से डरने की जरूरत नहीं। पर हम भी अब डरते भी कहां है महाराज! अब आप ही कहो, जिस देश में चारों ओर डर ही डर हो, उस देश में आकर किस किससे डरें अगर ऐसे ही डरते रहे फिर तो जी लिए महाराज! और एक आप हो कि अजर अमर होने के बाद भी स्वाइन फ्लू से इतना डर! जो होना है वह तो होकर ही रहेगा। इसलिए छोड़ो ये प्रीकाशन- प्रूकुशन। यहां तो जितने प्रीकाशन लिए उतने ही फंसे।
´ मैंने परिवार के पालन-पोषण की मार से टूटी कमर पर जरा हाथ रख तनिक सीधा हो कहा।

`तो´

`तो क्या! चलो सामने वाले ढाबे पर चाय पिलाता हूं। मंदी के दौर में अतिथि की इतनी ही सेवा कर सकता हूं। कहां जा रहे हो'

` तुम्हारे मुहल्ले के उस आखिरी ईमानदार को ले जाने आया था। बेचारा अब परेशान बहुत हो रहा है न! पर यार यहां तो...´

`डॉन्ट बी पैनिक महाराज! टेक इट इजी। ये इंडिया है। यहां तो कुछ न कुछ रोज ही चलता रहता है, कभी स्वाइन फ्लू तो कभी वाइन फ्लू तो कभी राइम फ्लू।´


`पर सरकार ने तो कहा है कि किसी सार्वजनिक स्थान पर... घर ले चलते तो वहीं बैठकर.´

` सॉरी! घर तो मैं आपको किसी भी कीमत पर नहीं ले जा सकता। महीनों से घर में चीनी खत्म है और अब कोई पड़ोसी ऐसा नहीं बचा है जिससे चीनी उधार न ले चुके हों। अब तो मैं सबकुछ छोड़ कई दिनों से आपकी बाट जोह रहा था, आपकी कसम! सच कहूं महाराज, अब तो महंगाई सिर से ऊपर हो गई है। लाला बाजार में दाल को दखने के भी दाम लेने लगा है। बिन पैसे वह दाल को हाथ भी नहीं लगाने देता। सब्जियों के दर्शन किए बिना महीनो हो गए हैं। सच कहूं भगवन! आप के दर्शन करना अब आसान हो गया है पर दाल सब्जियों के दर्शन अब बड़े भाग्यशाली को ही इस देश में नसीब हो रहे हैं। जिसके घर में शाम को दाल सब्जी पक जाए वह अपने को देश का सबसे खुशनसीब मान रहा है। मैं तो जैसे कैसे रोज, बाजार जाकर ही सही दाल सब्जियों के दर्शन कर आता हूं पर पत्नी को घर में बैठे महीनों हो गए दाल सब्जियों के दर्शन किए बिना। कल तो वह सारी लोक-लाज त्याग बिगड़ ही पड़ी,` देखो अगर तुम घर में दाल सब्जी नहीं ला सकते तो कम से कम बाजार ले जाकर मुझे उनके दर्शन ही करा दो तो मैं कुशल गृहणी होने का गर्व तो अनुभव कर सकूं। अगर तुम ये भी नहीं कर सकते तो मैं चली मायके।´ पर महाराज मैंने उसे बाजार ले जाने का वचन नहीं दिया तो नहीं दिया। सोचा, मायके ही चली जाए तो भला। इस बहाने इसके पीछे पीछे ससुराल जा वहां पर दाल सब्जी तो खा आऊंगा। मुझे पता है उनकी भी इतनी हिम्मत नहीं , पर घर में आए दामाद को वे अपनी झूठी हैसियत बताने की कोशिश करेंगे और मैं दाल सब्जी खा अमरत्व को प्राप्त हो जाऊंगा।´

`डॉन्ट बी पैनिक! टेक इट इजी।´
कह उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई, भैंसे के गले में बंधे इंपोर्टेड सीडी प्लेयर का वाल्यूम और भी ऊंचा कर मुहल्ले की ओर हो लिए।

डॉ. अशोक गौतम


गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक
सोलन-173212 हि.प्र.

Sunday, August 09, 2009

खदेरन की दाल-रोटी का सवाल है माई-बाप


खदेरन के हाथ में 100 रूपया था ...घर पर बच्चे थे ..पत्नी थी..बीमार मां-बाप थे...खाने पीने का सामान लेते हुए जब वह घर पहुंचा तो सारे पैसे ख़त्म हो गये..कल के लिए कुछ बचा ही नहीं..दवा के लिए भी पैसे नहीं बचे ..क्या लेके आया ..लिस्ट बता दूं...दाल थोड़ी सी..चावल थोड़ा सा...तेल थोड़ा सा..और थोड़ी-सी सब्ज़ी..भूख तो बड़ी बीमारी है..सो बाक़ी बीमारियों के लिए कल दवा ले लेगा..भूख की दवा आज..यही सोचा था खदेरन ने...रात बीत गई..सुबह हो गई...दिन निकल गया..शाम को फिर खदेरन वापस घर की ओर..सवाल वही..क्या-क्या लेना है..रोज़ की तरह खाने-पीने का सामान..और दवा....दुकान पर पहुंचा...लेकिन नई मुसीबत सामने...दाल और चावल में उसे किसी एक को चुनना था..दोनों की क़ीमते बड़ी हो गई थीं, उसकी सौ टकिया छोटी पड़ गई..सो आज घर आया ..लेकिन दो सामान कम..दाल नहीं लाया...लेकिन प्रणब मुखर्जी और शरद पवार को नहीं पता कि खदेरन की फिक्स्ड कमाई..और अनफिक्स्ड महंगाई में क्या संबंध है..संसद में दोनों ने इस बात को ऐसे कहा मानो कोई बड़ी बात नहीं..और थोड़ी बहुत है भी तो अदृश्य अंतरराष्ट्रीय शक्तियां इसके लिए जिम्मेदार है...वो बेचारे क्या कर सकते हैं...खदेरन पहले से ही दाल-रोटी खा रहा था...सब अडजस्ट कर रहे हैं..वो भी अब केवल भात ही खायेगा और अपने परिवार को खिलायेगा...बाक़ी बीमार लोगों के लिए ..एक ही रास्ता है..सीधे उपर का ..भगवान भरोसे अगर ठीक हो गये तो अच्छी बात होगी...बिल्कुल सरकार के जैसा..मानसून बरस गया तो अच्छा नहीं तो ....देश भगवान भरोसे...जब ये दोनों सम्मानीय लोग संसद में प्रवचन दे रहे थे..तब ज़हिर है इनका पेट भरा होगा..पेट में क्या होगा नहीं बता सकते..लेकिन चुनाव के दौरान दोनों की संपत्ति का हिसाब देख कर अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है...कौन इनके घर में दवा-दारू की दिक्कत है...सब तो पब्लिक की कृपा से उपलब्ध है...और ये ग़रीबी तो आम लोगों की बीमारी है..फ्लू जैसी..डरावनी ..पर रोक नहीं सकते..दोनो पर सरकार चिंता जता सकती है..योजनायें बना सकती है..पर इलाज नहीं कर सकती ...सरकारी काग़जों में ही लिखा था कहीं कि इस देश में 24-25 फ़ीसदी लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं..और कमाल की बात है....इस रेखा की रिसर्च पर सरकार काफ़ी होमवर्क कर चुकी है..लकड़वाला कमेटी आई गई..पर रेखा ज्यों की त्यों बनी हुई है..और सारा खेल रेखा के इस पार और उस पार का है..इस पार खदेरन है ..उस पार सरकार...सूखा आया..तो कईयों के चेहरों पर हरियाली छा गई..बुंदेलखंड की समस्या को सुलझाने के लिए राहुल बुंदेलखंड प्राधिकरण का चालीसा पढ़ने लगे..कांग्रेसी वानरसेना सेना की तरह माया के जाल को तोड़ने के नारे लगाने लगे...मैदान में एक ही नारा है ..आम आदमी..आम आदमी..पर दोगलापना कब दिखता है..जब वित्तमंत्री और कृषि मंत्री सदन के अंदर होते हैं..ऐसे बोल रहे है मानो कोई बड़ी बात नहीं..शरम नहीं आती इनको ..लोगों का विश्वास पाया है..और नतीजा ये दे रहे है कि ..दाल रोटी नही..दाल या रोटी खाये खदेरन...बंद कीजिये ये दोगलापना...नहीं कर सकते तो गद्दी छोड़िये ..कोई मंत्री कैसे कह सकता है ..कि हिंदुस्तान के ग़रीब को वो दाल-रोटी नहीं मुहैया करवा सकता..बंद कीजिये अपना ऐशो-आराम....खदेरन एसी में बैठे, पेट में फाईवस्टार होटलों का खाना ठूसे और महंगी गाड़ियों में बैठकर संसद में आने वाले नेताओं के मुंह से अपनी बेहाली पर ऐसी अकर्मण्यता वाली भाषा नहीं सुनना चाहता..दिल्ली में क्यूं 45 डिग्री का ताप सह कर, डीटीसी में बैठ कोई भी नेता ..संसद नहीं पहुंचता..नहीं है भाई साहब वो आदत नहीं है..ये जनता के नुमाइंदे है..बात सुरक्षा की करते हैं..ये बहाना है...एक और दोगलापना...इनको चुनने वाली जनता तो दिन रात अपने चीथड़े उड़ते देख रही है..कहीं सड़कों पर..कहीं बसों में..फिर किस मुंह से ये लोग अपनी सुरक्षा का हवाला देते है..एक नागरिक के तौर पर किस मायने में इनकी जान खदेरन से ज्यादा महंगी है... नेताओं की हिम्मत क्यों नहीं कि वो तमाम फ़िजूलखर्च बंद कर त्याग का परिचय दिखाये..उस खदेरन के लिए जिसके लिए आज दाल या रोटी ही विकल्प बच गये हैं.....क्या सच में कृषिप्रधान देश इतना लाचार है कि खदेरन और उसके जैसे लाखों करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी नहीं मुहैया करवा सकता....क्या हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में इतनी रक़म नहीं जमा कि हम अपने लोगों का पेट भरने के लिए कुछ ज्यादा खर्च कर सकें..क्या सरकारी पंजा इतना कमज़ोर है कि जमाखोरो की गरदन पकड़ सके..क्या सच में इतनी तरक्की का दंभ भरने वाला देश ये गवारा करेगा कि खदेरन दिन ब दिन अपना पेट काटे..अपने बूढ़े मां बाप को इलाज के अभाव में मरने के लिए छोड़ दे...दिल्ली में दौड़ती मेट्रो ट्रेन शोषण की शोभायत्रा लगती है...ऊंची-ऊंची अट्टालिकायें..भूख और बेबसी से मरे लोगों की क़ब्रे लगती हैं..गांधी को मानने वाले नेताओं को याद नहीं शायद . बापू ने भी कहा था...किसी भी काम को लेकर जब तुम्हारे मन में कोई शंका हो तो मेरा मंत्र इस्तेमाल करो..सबसे कमजोर आदमी को याद करो..और देखो कि तुम जो करने जा रहे हो..उससे उस आदमी के जीवन में क्या फर्क पड़ेगा....
हमारी क़िताबों के पिछले पन्ने पर ये लिखी बात हम तो पढ़ गये ..पर बापू का नाम रटने वाले लोगों ने शायद ये नहीं पढ़ा...मेरे हिसाब से संसद के अंदर अब उन लोगों की तस्वीरे चारों ओर लगा देनी चाहिए..जो भूख़ और ग़रीबी के ग्रास बन गये..फिर चाहे वो बुंदेलखंड का ग़रीब किसान हो..या विदर्भ में आत्महत्या करने वाला किसान. ..इन मरे हुए लोगों की तस्वीर देख शायद हमारे वित्तमंत्री और कृषि मंत्री को ये याद आ जाये ..कि ये जगह किस लिए है..वो किस लिए हैं..सारे नेता किस लिए हैं...साथ में खदेरन की भी एक फोटो हो....ताकि उसकी भी याद रहे उनको कि आज फिर वो दुकान पर जयेगा..लेकिन इसबार हमें उसे ये विकल्प नहीं देना है कि वो दाल या रोटी की सोचे...सोचे तो दोनो एक साथ..यानि जब शाम हो तो उसके घर की थाली में दाल रोटी दोनों हों....

रवि मिश्रा

Sunday, August 02, 2009

चीनी के भाव रोकना सरकार के बस का नहीं...



पिछले कुछ महीनों से चीनी के भाव में तेजी आ रही है। सरकार भाव को काबू
में रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। सरकारी प्रयासों से चीनी के
भाव कुछ नीचे आते हैं लेकिन तुरंत ही पूर्व स्तर से भी ऊपर चले जाते हैं।
हाल ही में सरकार ने चीनी के भाव को काबू में करने के लिए कुछ उपाय किए
हैं। सरकार ने ड्यूटी मुक्त रिफाईंड चीनी के आयात की अवधि को बढ़ा कर 30
नवम्बर, 2009 कर दिया है। इसी प्रकार कच्ची चीनी के ड्यूटी मुक्त आयात की
अवधि 31 मार्च, 2009 कर दी है। इसके साथ ही मिलों के साथ व्यापारियों को
भी इसके आयात की अनुमति प्रदान कर दी है।

सरकार आश्वस्त लेकिन ?
सरकार अब आश्वस्त है कि आगामी त्यौहारी सीजन में चीनी के भाव काबू में
रहेंगे और उपभोक्ताओं के लिए कड़ुवाहट पैदा नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा लगता
नहीं है कि सरकार चीनी के बढ़ते भाव को रोक पाएगी।
उत्पादन, बकाया स्टाक, आयात को मिलाकर कुल उपलब्ध्ता और खपत का गणित साफ
संकेत दे रहा है कि चीनी के भाव कम होने की बात ही दूर वर्तमान स्तर पर
रुकने भी संभव नहीं हैं। यही नहीं आगामी सीजन में भी चीनी के भाव नीचे
आने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं।

चीनी का गणित
चालू चीनी वर्ष 2008-09 (अक्टूबर 2008-सितम्बर 2009) में चीनी का उत्पादन
147 लाख टन पर ही सिमट जाने के अनुमान हैं जबकि गत वर्ष यह 264 लाख टन
था।
चालू चीनी वर्ष के आरंभ में चीनी का बकाया स्टाक लगभग 100 लाख टन का था
(हालांकि सरकार और उद्योग में इस पर एक मत नहीं हैं।)। आयात आदि को मिला
कर चीनी की कुल उपलब्धता लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है। भाव बढ़ने के
कारण चीनी की खपत में कमी आई है और सरकार ने निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा
दिया है। इससे अब आलोच्य वर्ष में खपत का अनुमान 230 लाख टन का है।
उपलब्धता में खपत को घटाने के बाद देश में चीनी का स्टाक लगभग 30 लाख टन
बचने का अनुमान है। जबकि सरकारी व व्यापारिक अनुमानों के अनुसार किसी भी
समय देश में चीनी का स्टाक कम से कम तीन माह ही अवधि के बराबर होना
चाहिए। ये आंकड़े ही तेजी के संकेत दे रहे हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि आगामी महीनों में रिफाईंड चीनी का आयात भी
होगा और कुछ कच्ची चीनी पाईप लाईन में भी होगी लेकिन घरेलू चीनी के स्टाक
की कमी ही चीनी की तेजी को हवा देने के लिए पर्याप्त है।
इसके अलावा भारत में चीनी का उत्पादन कम होने और इसके द्वारा आयात किए
जाने से विश्व बाजार मे भाव लगातार बढ़ रहे हैं और चोटी पर पहुंच गए हैं।
इससे आयात भी महंगा होगा। व्यापारियों का कहना है कि वास्तव में आयातित
चीनी की लागत स्वदेशी चीनी की तुलना में अधिक होगी। इससे नहीं लगता कि
त्यौहारों के दौरान चीनी के भाव में कोई कमी आएगी।

आगामी सीजन

वास्तव में आगामी सीजन में भी उपभोक्ताओं के चीनी के अधिक दाम चुकाने
पड़ेंगे क्योंकि मानसून की देरी और कमी ने गन्ने की बिजाई को गड़बड़ा दिया
है।
इस वर्ष अब तक 42.50 लाख हैक्टेयर पर गन्ने की बिजाई की जा चुकी है जो गत
वर्ष की इसी अवधि की बिजाई की तुलना में 1.29 लाख हैक्टेयर कम है। राज्य
के अधिकांश जिले सूखे की चपेट में आ चुके हैं। देश के अन्य गन्ना उत्पादक
राज्यों में भी वर्षा की कमी अनुभव की जा रही है। इससे निसंदेह गन्ने के
कुल उत्पादन और उसमें रस की मात्रा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हालांकि
अभी से आगामी सीजन में चीनी के कुल उत्पादन के बारे में कुछ नहीं कहा जा
सकता है लेकिन यह तय है कि वह चीनी की घरेलू मांग को पूरा नहीं कर पाएगा।
आगामी वर्ष भी मांग को पूरा करने के लिए आयात का सहारा लेना ही
पड़ेगा।

राजेश शर्मा

Saturday, July 25, 2009

चश्मे का रोटी से गहरा रिश्ता है !

अड़ोसने-पड़ोसने कई महीनों से दबी जु़बान में कहने लगी थीं,` भाई साहब! सुधर जाओ, आपकी नज़रें ठीक नहीं लग रहीं।´, कि दूसरे अर्थों में मेरी नज़रें खराब हो रही हैं। वैसे कई दिनों से मुझे भी लग रहा था कि मेरी नज़रें खराब हो रही हैं। पर मैं यह सोच कर चुप रहा कि इस देश में नज़रें किसकी खराब नहीं? ठीक नजर वालों को इस देश से कभी का देश निकाला हो गया है।

पर मेरी पत्नी ठहरी ठेठ देशभक्त! कई बार मैंने उससे कहा भी कि हे भागवान! देशभक्त होकर अपना तो अपना, क्यों पूरे परिवार का जीना दुश्वार कर रही हो? मानुश देह चौरासी लाख योनियों के बाद मिलती है, इस देश में शेष सबकुछ होकर मजे से जिया जा सकता है पर देशभक्त होकर नहीं। पर स्त्री हठ के आगे मेरी क्यों चलती? आज तक किसी की चली है क्या!

और कल पत्नी जबरदस्ती मुझे सरकारी अस्पताल मेरे न चाहते हुए भी मेरी खराब नज़रें चेक करवाने घर के सारे काम छोड़ ले ही गई।

अब भाई साहब प्राइवेट अस्पताल में अपना इलाज करवाने जाने की अपनी तो हिम्मत है नहीं। अपना तो मरना भी सरकारी डॉक्टर की गोली से है तो जीना भी सरकारी डॉक्टर की गोली से। पर आज के माहौल को देख कर जीने के आसार कम ही दीख रहे हैं।

मैं बीसियों औरों के साथ चार घंटे तक डॉक्टर साहब का इंतजार करता रहा। वे थे कि आने का नाम ही नहीं ले रहे थे। दफ्तर वालों से पता किया तो उन्होंने बताया कि प्राइवेट हास्पिटल में एक वी वी आई पी आप्रेशन करने गए हैं,बस आते ही होंगे।

` तो हम किस लिए आए हैं यहां?´ मुझे गुस्सा सा आ गया।

`ये तो आप ही जानो! ´ वहां पर झाड़ू लगाना छोड़ एक ने डॉक्टर का कोट पहनते कहा, हंसते हुए।

` ये धंधा क्या है भाई साहब!सरकारी डयूटी के वक्त भी प्राइवेट काम! सरकारी डयूटी खत्म हाने के बाद तो चलो मान लेते हैं कि.....´

` तो क्या हो गया! इत्ते गर्म हाने की बात क्या है इसमें? वहां भी तो खराब नजर वालों का ही इलाज हो रहा है। किसीकी आंखें तो नहीं फोड़ी जा रही हैं। कहो, आपको क्या करवाना है! बीस साल से यहीं काम कर रहा हूं। मेरे सामने यहां बीसियों डॉक्टर आए और चले गए।´

`पर तुम हो कौन?´
`आम खाने आए हो या पेड़ गिनने?´
`खाने तो आम ही आया हूं पर नीम के पेड़ पर लगे आम हमें नहीं खाने।´ मैंने कहा तो जो वह एक बार हंसने लगा तो बड़ी देर तक हंसता रहा। लगा इसे अवश्य वेतन हंसने का ही मिलता होगा। जब सब उसे घूरने लगे तो वह हंसने से रूका और गंभीर हो बोला,` बहुत पिछड़े हो यार! बहुत पिछड़े हो!! भारत ने चांद तक सफर तय कर लिया और एक तुम हो कि अभी भी आम के पेड़ वाले आम ही ढूंढ रहे हो। अब तो आम चने के झाड़ पर खाने के दिन आ गए। चलो अंदर तुम्हारी खराब नजरें मैं चेक करता हूं। बड़ों बड़ों की नजरें चैक की हैं मैंने। वैसे भी अगर डॉक्टर यहां हो तो भी वे ये काम मेरे से ही करवाते।´

और साहब, कम से कम समय की बचत करते हुए मैंने उसीसे अपनी खराब नजरें चेक करवा लीं। एक आंख का नंबर नजदीक का प्लस तीन निकला तो दूसरी का प्लस चार!

उस पर विश्वास न हुआ। मन ने कहा,´ कहीं और भी नजरें चेक करवा ले। तेरी नजरें इतनी ही खराब होती तो आज को जूते पड़ चुके होते। कहीं कुछ गड़बड़ है।´

जेब को मार मैंने मन की सुनी और सच्ची को जब दूसरी जगह नजरें चेक करवाईं तो वहां एक आंख का नंबर प्लस एक निकला तो दूसरी का प्लस आधा। मुझे गुस्सा आया, बहुत गुस्सा आया। यार! क्या ऐसे अस्पताल जनता के लिए ही रह गए! वह तब भी डॉक्टर का कोट पहने वहीं बैठा था। तय था कि डाक्टर साहब अभी भी नहीं आए थे।

`यार ! तुमने ये क्या नंबर दे दिए?´ मैंने प्राइवेट हास्पिटल के और उसके द्वारा आंखें चेक करने के बाद के दोनों नंबर उसके आगे रख दिए। उसने दोनों को गौर से देखा और फिर डॉक्टर से भी अधिक गंभीर होते बोला,` क्या हो गया इसमें?´

`तुमने दोनों आखों का दो और साढ़े तीन नंबर ज्यादा दे दिया और कहते हो कि क्या गलत हो गया।´

`कौन से वर्ग से हो?´

`मध्यम वर्ग से, क्यों? उच्च वर्ग से होता तो क्या सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने आता क्या!´

` मैंने पहचान लिया था।तभी तो तुम्हें नंबर ज्यादा दिया है सोच समझ कर। इसका एक लाभ तो यह है कि जल्दी चश्मा नहीं बदलना पड़ेगा और दूसरा उससे भी बड़ा फायदा यह है कि कहूंगा तो चक्कर खाकर गिर पड़ोगे।´
मैंने पत्नी को मुझे थामने को कहा और फिर उससे बोला,` लो अब बोलो बड़ा फायदा।´

`बहुत भोले हो यार। छोटे नंबर के चश्में से चीजें छोटी दिखती हैं और बड़े नंबर वाले से बड़ी।´
`मतलब!!!´ मुझे थामे हुए पत्नी ने पूछा।

`देखिए मैम! महंगाई के इस दौर में मध्यम वर्ग के लिए यही ठीक है कि जितने नंबर का चश्मा उसे डॉक्टर कहे वह उससे दो तीन नंबर ज्यादा का चश्मा लगाए। इससे पता है क्या होगा?´

`क्या होगा??´
`छोटी रोटी बड़ी दिखेगी, ये देख लीजिए।´ उसने अपने लंच बाक्स में बची छोटी सी चपाती उस नंबर का चश्मा मेरी आंखों पर लगा दिखाई तो मुझे सच्ची को चक्कर आ गया। उसने मुझे सहारा दे बेंच पर लिटाते कहा,` दो किलो आटे का बैग पांच किलो के आटे का लगेगा। लिफाफे में लाए किलो भर चावल तीन किलो जितने लगेंगे। ये वो नंबर है भाई साहब जो तुम्हें लगते ही सतीयुग में ले जाएगा। सही नंबर का चश्मा लगाकर क्यों अपना मानसिक संतुलन खराब करना चाहते हो? है न फायदे की बात। अब बोलो, कौन तुम्हारे हित वाला है?´

मैंने उसके पांव छुए और उसके नंबर वाला चश्मा लगाए घर आ गया । अब मजे में हूं। थाली में दो चपातियां ही इतनी हो जाती हैं कि... अब फुला महंगाई जितना मन करे सीना।

डॉ. अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,
सोलन 173212 हि.प्र.

Thursday, July 23, 2009

दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ, लेकिन कैसे खाएं दाल?



बचपन में एक गाना सुना था- दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। शायद उस समय दाल सस्ती होती होगी जो यह कहा जाता था।
इसी प्रकार एक अन्य मुहावरा दालों पर होता था-यह मुहं और मसूर की दाल।
यानि मसूर की दाल महंगी होती होगी जो यह कहा जाता था। (अगर गलत हो तो पाठक सुधार कर दें।)
लेकिन आज के समय में यह दोनों की पुरानी कहावतें या मुहावरे पुराने पड़ चुके हैं।
दालों के भाव आसमान छू रहे हैं और दाल-रोटी पाकर संतोष कर पाना एक कठिन कार्य हो चुका है।
नया मुहावरा है यह मुहं और अरहर की दाल क्योंकि अरहर की दाल अब 88 रुपए प्रति किलो हो गई है।

महंगाई मार गई

जहां अरहर की दाल 88 रुपए प्रति किलो है वहीं साबुत मसूर का भाव 66 रुपए, साबुत उड़द 60 रुपए और दाल उड़द 66 रुपए, मूंग साबुत और दाल मूंग दोनो ही 66 रुपए प्रति किलो हैं। चना 40 रुपए और चना दाल 56 रुपए प्रति बिक रही हैं।
दालें हमारे दैनिक आहार की प्रमुख खाद्य वस्तु है और मानव शरीर के लिए आवश्यक भी है क्योंकि इनमें प्रोटीन की मात्रा सबसे अधिक होती है। प्रोटीन प्राप्ति का दूसरा स्त्रोत मांस है जिसे शाकाहारी खा नहीं सकते हैं।
देश में दालों की कमी कोई नई बात नहीं है क्योंकि उत्पादन की तुलना में खपत अधिक होती है। एक अनुमान के अनुसार देश में दालों की वार्षिक खपत लगभग 180 लाख टन है जबकि उत्पादन 130 से 148 लाख टन के बीच घूम रहा है। अपनी खपत को पूरा करने के लिए दालों का आयात करना पड़ता है। हर वर्ष दलहनों का आयात किया जा रहा है जो 25 से 30 लाख टन के बीच होता है।
गत वर्ष भी देश में दालों के भाव में बढ़ोतरी हुई थी लेकिन आयात के कारण भाव अधिक नहीं बढ़ पाए। सरकार ने दालों के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

बेकाबू अरहर

बहरहाल, इस वर्ष अरहर के बारे में हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं। इसका कारण इस वर्ष वर्षा की कमी या सूखे जैसी स्थिति है। अरहर खरीफ की प्रमुख दलहन है। देश में 2005-06 के दौरान अरहर का उत्पादन 27.38 लाख टन हुआ था जो 2006-07 में गिर कर 23.14 लाख टन होने के बाद अगले ही वर्ष सुधर कर 30.75 लाख टन हो गया था। गत वर्ष उत्पादन 25 लाख टन ही होने का अनुमान है। और चालू वर्ष यानि 2009-10 का मानसून ही मालिक है।
जहां तक विदेशों का प्रश्न है वहां पर भी अरहर के भाव में तेजी आ रही है। गत माह तक अरहर का आयात लगभग 800 डालर प्रति टन की दर पर किया जा रहा था लेकिन अब आयात 1100 डालर से ऊपर के भाव पर किया जा रहा है।

घटती उपलब्धता
देश में दालों का उत्पादन मांग की तुलना में नहीं बढ़ रहा है। इससे बढ़ती जनसंख्या के कारण दलहनों की प्रति व्यक्ति खपत कम होती जा रही है।
वर्ष 2005-06 के दौरान देश में दलहनों का कुल उत्पादन 134 लाख टन था जो 2006-07 में बढ़ कर 142 लाख टन और 2007-08 में बढ़कर 148 लाख टन हो गया। बहरहाल, गत वर्ष यह गिर कर लगभग 142 लाख टन पर आ गया है। इससे सारा संतुलन बिगड़ गया।

खपत
देश में दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी कम होती जा रही है। वर्ष 1990 में देश में प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता 41 ग्राम थी जो अब गिर कर 30 ग्राम के आसपास आ गई जबकि अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए।

उत्पादन कम क्यों?
देश में दलहनों का अधिकांश उत्पादन सिंचित क्षेत्र में होता है और वर्षा की जरा सी भी कमी उत्पादन का सारा गणित बिगाड़ देती है। दूसरा कारण अन्य देशों की तुलना में प्रति हैक्टेयर उत्पादन कम होना है क्योंकि बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध नहीं है।
यदि सरकार बेहतर किस्म व रोग तथा कीट रोधक कम समय में पक कर तैयार होने वाले बीज किसानों को उपलब्ध कराए तो किसी सीमा तक देश में दालों की कमी को पूरा किया जा सकता है।

राजेश शर्मा