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Monday, January 24, 2011

इजिप्त की सैर- पिरामिडों के देश में

पंडित सुरेश नीरव


विश्वप्रसिद्ध पिरामिडों,ममियों और विश्व सुंदरी नेफरीतीती और क्लियोपेट्रा के देश इजिप्त के लिए 11जनवरी2011 को गल्फ एअर लाइंस की फ्लाइट से हम लोग बेहरीन के लिए दिल्ली से सुबह 5.30 बजे की फ्लाइट से रवाना हुए। इजिप्त की राजधानी केरों पहुंचने के लिए बेहरीन से दूसरी फ्लाइट लेनी होती है। जोकि पूरे चार घंटे बाद मिलती है। यहां का समय भारत के समय से पूरे तीन घंटे पीछे चलता है। बेहरीन के हवाई अड्डे पर उतरे तो वहां भारतीय चेहरों की बहुतायत देखने को मिली। यूं तो फ्लाइट में ही हमारे साथ जो लोग सफर कर रहे थे उससे हमें कुछ-कुछ अंदाजा लग गया था कि बेहरीन के निर्माण में मजदूर और इंजीनियर भारत के ही हैं। और फिर वहां जब ड्यूटी फ्री शॉप्स में जाकर खरीदारी की तो वहां के सेल्समैन ये जानकर कि हम भारत से आए हैं हम से हिंदी में ही बात करने लगे। एअरपोर्ट पर उड़ानों की सूचना अरबी,इंगलिश और हिंदी भाषा में दी जा रही थी इससे सिद्ध हो गया कि शेखों के पास भले ही पेट्रोल के कुएं हों मगर बेहरीन की ज़िंदगी के धागों का संचालन हिंदुस्तानियों के ही हाथ में है। और हिंदुस्तान के दफ्तरों में भले ही हिंदी को हिंदुस्तानी अधिकारी दोयम दर्जे का मानकर अपनी टिप्पणी अंग्रेजी में देते हों मगर बेहरीन में हिंदी की ठसक पूरी है। बेहरीन में वनस्पति बहुत कम है। हरियाली के मामले में बेहरीन का दिल्ली से कोई मुकाबला नहीं। यहां के बाशिंदे भारतीयों-जैसे ही नाक-नक्श और कद-काठी के ही हैं। जब तक बोलते नहीं पता नहीं चलता कि कि ये भारतीय हैं या बेहरीनी। दो घंटे बेहरीन में गुजारकर हम लोग दूसरी उड़ान से इजिप्त की राजधानी केरो के लिए रवाना हुए। और तीन घंटे की उड़ान के बाद केरो एअरपोर्ट पर उतरे। यहां का मौसम खुशगवार था और तापक्रम 13 डिग्री सेल्सियस था। दिल्ली की ठिठुरती सर्दी से घबड़ाए लोग जितनें ऊनी कपड़े लेकर आए थे वे कुछ जरूरत से ज्यादा साबित हुए। एअरपोर्ट से 11 किमी दूर गीजा शहर की होटल होराइजन में हमें ठहराया गया। यह इजिप्त की बेहतरीन होटलों में एक है। रास्तेभर उड़ती धूल और सड़कों पर फैली पोलीथिन थैलियों और बीड़ी-सिगरेट के ठोंठों को देखकर यकीन हो गया कि मिश्र की सभ्यता पर भारतीय सभ्यता की बड़ी गहरी छाप है। और नील नदी तथा गंगा नदी के बीच पोलीथिन का कूड़ा एक सांस्कृतिक सेतु है। नेहरू और नासिर की निकटता शायद इन्हीं समानताओं के कारण उपजी होगी। और निर्गुट देशों के संगठन का विचार इसी रमणीक माहौल को देखकर ही इन महापुरुषों के दिलों में अंकुरित हुआ होगा।
दिल्ली के सरकारी क्वाटरों के उखड़े प्लास्टर और काई खाई पुताई से सबक लेकर इजिप्तवासियों ने मकान पर प्लास्टर न कराने का समझदारीपूर्ण संकल्प ले लिया है। यहां मकान के बाहर सिर्फ ईंटें होती हैं।प्लास्टर नहीं होता। पुताई नहीं होती। दिल्ली की तरह मेट्रो यहां भी चलती है।लाइट और सड़कों के मामले में इजिप्त दिल्ली से आगे है। पिरामिड और ममियोंवाले इस देश की राजधानी केरों में एक अदद ग्रेवसिटी भी है। यानी कि कब्रों का शहर। जहां सिर्फ मुर्दे आराम फरमाते हैं। इनकी कब्रें मकान की शक्ल में हैं। जिसमें खिड़की और दरवाजे तक हैं। छत पर पानी की टंकी भी रखी हुईं हैं। और इन कब्रीले मकानों पर प्लास्टर ही नहीं पुताई भी की हुई है। मुर्दों के रखरखाव का ऐसा जलवा किसी दूसरे देश को नसीब नहीं। कब्रों की ऐसी शान-शौकत देखकर हर शरीफ आदमी का मरने को मन ललचा जाता होगा। ऐसा मेरा मानना है। यहां का म्यूजियम भी ममीप्रधान संग्राहलय है। हजारों साल से सुरक्षित रखी ममियां दर्शकों को हतप्रभ करती हैं। मन में प्रश्न उछलता है, इन निर्जीव शरीरों को देखकर कि अपना सामान छोड़ कर कहां चले गए हैं ये लोग। क्या ये वापस आंएंगे अपना सामान लेनें। हमारे यहां के सरकारी खजाने में किसी की अगर एक लुटिया भी जमा हो जाए तो उसे छुड़ाने में उसकी लुटिया ही डूब जाए। मगर इस मामले में इजिप्त के लोग बेहद शरीफ हैं। वो बिना शिनाख्त किए ही तड़ से किसी भी रूह को उसका सामान वापस लौटा देंगे। शायद इसी डर के कारण इनके मालिक अभी तक आए भी नहीं हैं। आंएंगे भी नहीं। मगर इंतजार भी एक इम्तहान होता है। और बार-बार इस इम्तहान में फेल होने के बाद भी इस मुल्क के लोग फिर-फिर इस इम्तहान में बैठ जाते हैं। और फिर हारकर खुद उनके मालिकों के पास पहुंच जाते हैं तकाज़ा करने। कि भैया अपना माल तो उठा लाओ। सब आस्था का सवाल है। गीजा में कुछ पिरामिड हैं मगर असली पिरामिड जो दुनिया के सात आश्चर्यों में शुमार हैं वे गीजा से 19 कि.मी. दूर सकारा में बने हैं। इन पिरामिडों की तलहटी में भी शाही ताबूतों में जन्नत नशीन बादशाहों के जिस्म आराम फरमा रहे हैं। इजिप्त के सर्वाधिक चर्चित 19 वर्षीय सम्राट तूतन खातून भी शुमार हैं। तमाम खोजों के बाद पता चला कि इतना बहादुर सम्राट सिर्फ 19 साल में मलेरिया के कारण जिंदगी से हार गया। एक साला मच्छर कब से आदमी के पीछे पड़ा है। उसे ममी बनाने के लिए। ममीकरण की केमिस्ट्री भी बड़ी अजीब है। हमारे गाइड ने हमें बताया कि ममीकरण के लिए पहले मृतक शरीर को बायीं तरफ से काटकर उसके गुर्दे,जिगर और दिल को निकालकर बाहर फेंक दिया जाता है।। फिर नाक में कील घुसेड़कर खोपड़ी की हड्डी में छेद कर के दिमाग को भी खरोंचकर बाहर फेंक दिया जाता है। फिर पूरे शरीर में सुइयां घुसेड़ कर शरीर का सारा खून भी निकाल दिया जाता है। इस प्रकार सड़नेवाली सारी चीजों को शरीर से निकाल दिया जाता है। इसके बाद मृतक शरीर को नमक के घोल में 40 दिन के लिए रख दिया जाता है। चालीस दिन बाद इस शरीर को नमक के घोल से बाहर निकालकर 30 दिन के लिए धूप में रखा जाता है। तीस दिन बाद फिर इस शरीर पर लहसुन,प्याज के रस और मसालों का लेप कर के तेज इत्र से भिगो दिया जाता है ताकि सारी दुर्गंध दूर हो जाए। ममियों के बाद बात करते हैं-पिरामिडों की। पिरामिडों में सबसे पहला पिरामिड सम्राट जोसर ने बनवाया। जिसे बनाने में पूरे बीस साल लगे। इजिप्त का हर किसान साल के पांच महीने इसके बनाने में लगाता था। सम्राट जोसर की कल्पना को अंजाम दिया उनके इंजीनियर मुस्तबा ने। इस पिरामिड में छह पट्टियां हैं। कहते हैं कि खोजकर्ताओं को इसकी तलहटी में 14000 खाली जार मिले थे। जो पड़ोस के किसी राजा ने फैरो को बतौर तोहफे भेंट किए थे। इससे लगा ही एक दूसरा पिरामिड है जो सम्राट जोसर के बेटे ने बनवाया था। पिता की इज्त के कारण उसने इस पिरामिड का आकार पिताजी के पिरामिड से जानबूझकर छोटा रखा था। इसके साथ ही एक और सबसे छोटा पिरामिड बना हुआ है। यहीं कुछ दूरी पर बना है-टूंब ऑफ लवर..यानीकि प्रेमी का मकबरा। जोकि साढ़े बासठ मीटर ऊंचा और अठ्ठाइस मीटर गहरा है। फैरो यहां के सम्राट की पदवी हुआ करती थी। इन्हीं मे एक फैरो था-एकीनातो। विश्वसुंदरी नेफरीतीती इसी फैरो की पत्नी थी। नेफरीतीती का इजिप्तियन में भाषा में मतलब होता है-सुंदर स्त्री आ रही है। सुराहीदार लंबी गर्दनवाली नेफरीतीती इजिप्त की पहचान और शान है। तमाम ऐतकिहासिक धरोहरों को संजोए केरो में दिल्ली की तरह मेट्रो भी चलती है। गीजा से एलेक्जेंड्रीया जाते हुए बीच में एक इंडियन लेडी पैलेस भी बना है। कौन थी वह भारतीय महिला इसका पता किसी को नहीं है। पर महल पूरी आन-बान शान के साथ आज भी मौजूद है।
ईसा से 300 साल पहले इजिप्त में ग्रीक आए। अलेक्जेंडर ने आकर फैरों की सल्तनत खत्म कर दी। और बसाया एलेक्जेंड्रिया। एक नया राज्य। लुक्सर को बनाया अपनी राजधानी। गीजा से एलेक्जेंड्रिया 290 किमी दूर है। बस से यहां तक आने में हमें पूरे चार घंटे लगे। रास्तेभर केले,अंगूर,आम,खजूर,आलू,बेंगन और ब्रोकली के खेत मन को लुभाते रहे। भूमध्यसागर की बांहों में तैरता एलेक्जेंड्रिया ग्रीक शिल्प से बना खूबसूरत शहर है। समुद्रतल इतना ऊंचा है लगता है अभी अभी किनारों को तोड़करप समुद्र सारे शहर को अपनी जद में ले लेगा। सन 1414 मे एलेक्जेंडर ने यहां अपना किला बनवाया था। और समुद्र किनारे ही बनाए थे अपने लाइट हाउस। इस शहर की खासियत यह है कि यहां जब चाहे बारिश हो जाती है। इसलिए यहां की सड़कें हमेशा पानी में में डूबी रहती हैं। गीली तो हमेशा ही रहती हैं। यह शहर मछली के आकृति का है। इसलिए इसे राबूदा भी कहा जाता रहा है। राबूदा का अर्थ है-मछलीनुमा स्थान। इस शहर के भीतर होरीजेंटल और वर्टिकल गलियां हैं। जो शहर के जिस्म में नाड़ियों की तरह फैली हुई हैं। इस शहर में बना है एक मकबरा-कैटैकौब मकबरा। इस टूंब में 92 सीढ़ियां हैं। दिलचस्प बात ये कि इस मकबरे की खोज सन 1900 में एक बंदर ने की थी। होता क्या था कि वहां जो भी बंदर जाकर उछलता उसकी टांग जमीन में फंस जाती। लोगों को ताज्जुब हुआ। वहां खुदाई की गई और उसका नतीजा रहा ये मकबरा। इतना विशाल मकबरा जमीन के दामन में छिपा मिला। इस मकबरे में भी सौंकड़ों जारों का जखीरा मिला था। कहा जाता है कि ग्रीक लोग जार में ही खाना खाते थे और एक बार जिस जार में वो खाना खा लेते थे उसे दुबारा उपयोग में नहीं लाते थे। इसलिए इतने जार यहां इकट्ठा हो गए। ग्रीक लोग इस मकबरे में रहते भी थे। इन ग्रीक लोगों ने इस भूमिगत मकबरे की दीवारों में सुरंगें बना रखी थीं, जिसमें कि वे शव दफनाया करते थे। इस तरह यह एक किस्म का सामुदायिक मकबरा है। एक बात बहुत महत्वपूर्ण है कि ग्रीक और रोमन में कभी युद्ध नहीं हुए क्योंकि ग्रीकों ने इजिप्शियन भगवानों का कभी अपमान नहीं किया। उस वक्त इजिप्त में 300 भगवान थे। रोमनों ने जब यहां कब्जा किया तो उन्होंने इन भगवानों को अस्वीकृत कर दिया और क्रिश्चियन धर्म का प्रचार करने लगे। इस कारण लोगों में असंतोष व्याप्त हो गया जिसके परिणामस्वरूप यहां इस्लाम धर्म अस्तित्त्व में आ गया। जो अभी तक है। वैसे रोमन राज्य की निशानी के बतौर यहां आज भी विशाल रोमन थिएटर मौजूद है। इस प्रेक्षाग्रह में एक साथ पांच हजार दर्शक बैठ सकते थे। और खासियत यह कि ईको सिस्सटम ऐसा कि बिना माइक के सारे लोग भाषण सुन सकें। आगे चलकर एक और स्मारक है-मौंबनी स्तंभ। अब वक्त बदलता है। जिसकी ताकीद करती है-मुहम्मद फरीद की प्रतिमा। इस बहादुर आदमी ने तुर्क और रोमनों से इजिप्त को आजाद कराया था। थोड़ा और आगे चलकर है- सम्राट इब्राहिम की मूर्ति। जो इजिप्तवासियों के शौर्य का प्रतीक हैं। दिल्ली के इंडिया गेट की ही तरह यहां भी इजराय़ल-इजिप्त युद्ध के दौरान शहीद सैनिकों की स्मृति में एक स्मारक बना हुआ है। नालंदा और तक्षशिला की टक्कर पर यहां भी है -एलक्जैंड्रिया लाइब्रेरी। जहां रखीं हैं लाखों दुर्लभ पुस्तकें। आगे है रेड सी। इस लाल सागर और भूमध्यसागर को जोड़ने का बीड़ा उठाया था-फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट नें। जो बाद में स्वेज नहर के रूप में आज भी हमारे सामने है। एलेक्जेंड्रिया में ट्रामें भी चलती हैं। एक उल्लेखनीय बात और...पूरे इजिप्ट में ट्रैफिक भारत से उलट दांयीं और चलता है।

हमारी संस्कृति में भोजपत्र बहुत महत्वपूर्ण है। इजिप्ट में वैसे ही महत्वपूर्ण है- पपाइरस। इसमें सुंदर कलात्मक कृतियां उकेरकर यहां पर्यटकों को रिझाया जाता है। पपाइरस केले के तने-जैसा रेशेदार-गूदेदार स्तंभ होता है। जिसमेंकि पिरामनिड की आकृति कुदरतन बनी होती है। इसलिए इजिप्शयन इसे भोजपत्र की तरह पवित्र मानते हैं। ये इसके रेशों को पीट-पीटकर कमरे की दीवार तक बड़ा कर लेते हैं और उस पर कलाकृतियां बनाते हैं। कुछ कलाकृतियां मैं भी खरीद कर लाया हूं। तन्नूरा और वेली नृत्य पर थिरकता इजिप्ट सूती कपड़ों और मलमल के लिए मशहूर है। खलीली स्ट्रीट और मुबेको मॉल यहां खरीदारी के मशहूर ठिकानें हैं। भारत की हिंदी फिल्में यहां खूब लगाव से देखी जाती हैं। इसलिए यहां के व्यापारी भारतीयों को देखकर..इंडिया...इंडिया.. अमिताभ बच्चन...शाहरुख खान और करिश्माकपूर के जुमले उछालने लगते हैं। इजिप्त में भारत के राजदूत के. स्वामीनाथन ने हमें अपनी मुलाकात में बताया कि यहां 4000 हिंदुस्तानी वैद्य रूप से रह रहे हैं। और भारत का यहां की अर्थव्यवस्था में 2.5 मिलियन डॉलर का निवेश है। पेट्रोकेमिकल,,डाबर, एशिया पेंट्स, और आदित्य बिड़ला ग्रुप ने यहां के बाजार पर अपने दस्तखत कर दिये हैं। भारतीय भोजनों से लैस यहां तमाम शाकाहारी होटलें भी हैं। शाकाहारी खाने को यहां जैन-मील्स कहा जाता है। इजिप्ट मे बिना प्याज-लहसुन के भी शाकाहारी भोजन मिल सकता है यह विचित्र किंतु सत्य किस्म की एक सुखद हकीकत है। इन सारे अदभुत अनुभवों को दिल में समेटे जब भी कोई भारतीय इजिप्ट से भारत लौटता है तो उसकी यादों की किताब में एक पन्ने का इजाफा और हो जाता है जिस पर लिखा होता है-इजिप्ट। पिरामिडों की तरह स्थाई यादों का प्रतीक- इजिप्ट।


*आई-204,गोविंदपुरम,ग़ज़ियाबाद-201001

Thursday, April 15, 2010

हिंदी में क्यों नहीं होते बेस्टसेलर

हिन्दीबाजी-4
~अभिषेक कश्यप*


भाग-3 से आगे॰॰॰॰

इधर मैंने अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित कई बेस्टसेलर पढ़े। इनमें से ज्यादातर सेल्फ-हेल्प पुस्तकें थीं, जिन्हें भोपाल के मंजूल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है। पहली बार साल २००३ में मैंने नेपोलियन हिल की ‘थिंक एंड ग्रो रिच’ (हिंदी अनुवाद: सोचिए और अमीर बनिए) पढ़ी और तभी से मुझे ऐसी किताबों का चस्का लग गया। कुछ वैचारिक असहमतियों के बावजूद इनमें से ज्यादातर किताबों ने आइडिया, सहज भाषा-शैली और पाठकों को मुरीद बनाने के अपने कौशल की वजह से मुझे बार-बार अपनी ओर आकर्र्षित किया। पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में अपने विलक्षण योगदान के लिए जाने जानेवाले अरविंद कुमार ने भी कुछ साल पहले अपना प्रकाशन शुरू किया है-‘अरविंद कुमार पब्लिशर्स।’ इस प्रकाशन के जरिए वे नए-नए विषयों की बेहद सुंदर, उपयोगी और पठनीय पुस्तकें किफायती दाम पर पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। मगर अफसोस कि मंजूल, अरविंद कुमार पब्लिशर्स और ऐसे ऊंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद प्रकाशक पेशेगत विश्वसनीयता को बरकरार रखते हुए हिंदी में लीक से हटकर जो किताबें छाप रहे हैं, वह सब अंग्रेजी भाषा की बेस्टसेलर हैं। हिंदी में आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित इन किताबों के आवरण पर खासतौर से यह सूचना दर्ज होती है कि दुनिया भर में इस खास पुस्तक की कई लाख प्रतियां बिक चुकी हैं और यूरोप व अमेरिका के अखबारों ने इसकी प्रशंसा में ये शब्द कहे हैं। कवर पर दी गई ऐसी सूचनाएं किताब के प्रति पाठकों में उत्सूकता जगाती हैं और किताब की बिक्री का सकारात्मक माहौल तैयार करती हैं।
सवाल यह उठता है कि ऐसी किताबें हिंदी में क्यों नहीं लिखी जातीं जबकि इन किताबों का हिंदी में एक बड़ा पाठक वर्ग मौजूद है। यकीन न हो तो अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स के हिंदी संस्करण छापने वाले प्रकाशकों के आंकड़ों पर गौर करें। मंजूल पब्लिशिंग हाउस किसी भी पुस्तक के १० हजार से कम के संस्करण नहीं छापता। और इनमें से कई पुस्तकों के वह साल भर में कई संस्करण छाप कर बेच लेता है। कुछ साल पहले मंजूल ने जे.के. राउलिंग की हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तक ‘हैरी पॉटर : एन आर्डर ऑफ फीनिक्स’ की हिंदी में एक लाख प्रतियां छापी जो महीने भर में बिक गई। इसके बरक्स कहानियां-कविताएं छापनेवाले हिंदी के परंपरागत प्रकाशकों के प्रकाशन के आंकड़ों पर गौर करें तो मन खिन्न हो जाएगा। हिंदी साहित्य के परंपरागत प्रकाशकों का सरकारी खरीद और पुस्तकालयों के प्रति प्रेम जगजाहिर है। और हमारे लेखकों-बुद्धिजीवियों का तो कहना ही क्या! वे तो जैसे-तैसे किताब छप जाए उसी में खुद को धन्य मानते हैं। प्रकाशक पर पेशेगत विश्वसनीयता के लिए दबाव बनाना तो दूर, ज्यादातर लेखक तो अपनी रॉयल्टी मांगने में भी संकोच करते हैं। शायद इसलिए हिंदी साहित्य का बड़ा-से-बड़ा प्रकाशक पहला संस्करण 500 प्रतियों का छापता है और अधिकांश किताबों का तो पहला संस्करण ही नहीं बिक पाता कि दूसरे की नौबत आए।
खैर, मैं फिर अपने बुनियादी सवाल पर आता हूँ- हिंदी में बेस्टसेलर की परंपरा क्यों नहीं है? इसकी कई वजहें खोजी जा सकती हैं मगर एक सीधी और साफ वजह यह समझ आती है कि हमारे लेखकों के पास नए विचारों का अभाव है या फिर सृजन से ऊपर वे प्रक्रिया के महत्व पर गौर नहीं करते। शायद इसलिए श्रमसाध्य लेखन की संस्कृति विकसित नहीं हो पायी, जहां नए विचार हों और जो पाठकों को लुभाए भी।

Thursday, April 08, 2010

अकादमियों का भाईचारावाद

हिन्दीबाजी-3
~अभिषेक कश्यप*


भाग-2 से आगे॰॰॰॰

हिंदी साहित्य के संवर्द्धन और विकास के लिए बनी संस्थाओं और अकादमियों के भाईचारा और संपर्क कौशल की मिशाल कहीं ढूंढ़े नहीं मिलेगी। इसमें भी अगर संस्था या अकादमी सरकारी हुई तो माशाअल्ला! सरकारी होने की वजह से इन संस्थाओं और अकादमियों के कुर्ताछाप रघुपतिये सचिवों-उपसचिवों की आस्था साहित्य, विचार और सृजनात्मक गतिविधियों में कम लोकतंत्र में ज्यादा होती है। और भइया, लोकतंत्र का तकाजा है कि आप भाईचारा को बढ़ावा दें और अपने संपर्क-कौशल को धार देते रहें। और इस पवित्र-पावन भाईचारावाद की वजह से अगर साहित्य जाता है तो जाए तेल लेने! अपने को क्या?
सचिव-उपसचिव के पद को सुशोभित करने वाले इन कुर्ताछाप रघुपतियों का लोकतांत्रिक भाईचारावाद मित्रों, लाभ पहुंचाने वाले परिचितों और सुंदर स्त्रियों (कंवारी हो तो क्या कहने!) से शुरू होता है। औरत हो, युवा और सुंदर हो तो इस भाईचारावाद में वह पहले नंबर पर आएगी। ‘वो कहते हैं ना, लेडिज फ्रस्ट! हो-हो-हो।’
‘अरे काहे का साहित्य और काहे की प्रतिभा! आप तो इतनी सुंदर हो कि कुछ भी लिख दो तो कविता हो जाएगी।....... फिर हम जनता के पैसों से चल रही अपनी अकादमी में आपको कविता-पाठ(?) के लिए आमंत्रित कर लेंगे। आप कवयित्री होने का गौरव भी पा जाएंगी और कविता-पाठ के बाद हम आपको मानदेय के तौर पर रुपयों वाला लिफाफा भी पकड़ाएंगे! हो-हो-हो!’
बीते ३० नवंबर को साहित्य अकादमी की वार्षिक पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान आयोजित साहित्य-उत्सव के दूसरी गोष्ठी इसी भाईचारावाद का नमूना थी। आमंत्रित रचनाकारों में एक नवोदित कवयित्री भी थी, जिसके साहित्य में अभी दूध के दांत भी नहीं टूट्रे। उसकी कविताएं अभी इक्का-दुक्का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और हिंदी कविता के परिदृश्य में अभी उसकी कोई उल्लेखनीय पहचान नहीं। मगर शायद यहां इसी लोकतांत्रिक भाईचारावाद का असर था कि उसे कविता-पाठ के लिए आमंत्रित कर लिया गया। जबकि हिंदी पट्टी से रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आए प्रतिभाशाली नवोदित कवियों-कथाकारों की कोई कमी नहीं, जिन्हें कविता और कहानी-पाठ के लिए आमंत्रित कर साहित्य अकादमी भी धन्य होती। इनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्हें आर्थिक सहयोग की भी दरकार है। मगर इन पर कुर्ताछाप रघुपतियों की नजर तब पड़ती है जब वे अपना भाईचारावाद निपटा चुक होते हैं।
ऐसे में अब समय आ गया है कि जनता के पैसे से चलने वाले इन संस्थाओं और अकादमियों को लेखकों, पाठकों और श्रोताओं के प्रति जवाबदेह बनाने की मुहिम शुरू की जाए। यह भी तय होना चाहिए कि इन अकादमियों का कामकाज, इनके आयोजन पारदर्शी हों और इनके फैसलों में युवा और नवोदित लेखकों-कवियों की भागीदारी सुनिश्चित हो। वरना हम इन अकादमियों और संस्थाओं के इसी तरह के भाईचारावाद को देखने और भोगने को अभिशप्त होंगे।
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*लेखक कहानीकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं

Wednesday, November 11, 2009

नो हींदी नो हींदी नो हींदी!!

अब आप को अपणे बारे में क्या क्या बताऊं? बस इतणा जाण लेओ कि मैं अपणी जिंदगी में जो कुछ भी आज तक बणा दुर्घटणावस ही बणा। मैं पति नहीं होणा चाता था। पर हो गया ! मैं चोर होणा चाता था पर मास्टर होणा नहीं चाता था। वो तो चुणाव में अपणे नेता जी के पोस्टर लगाए, और बो बदकिस्मती से चुणाव जीत गए और उण्होंणे मास्टरी की नौकरी का पेपर लीक करवा मेरे हाथ सौंप मुझे अपणे कर्ज से मुक्त किया। उस वक्त मैंणे उणसे कहा भी था,‘ नेता जी! मुझे पटवारी बणा दीजिए, मुझे पुलिस में भर्ती करवा दीजिए पर मास्टर तो मत बणाइए। मुझे पढ़णे पढ़ाणे से बहुत डर लगता है।’ तो वे मंद मंद मुस्कराते कहे थे,‘बचुआ आज हर नौकरी में रिस्क है। कुछ खाओ भी णहीं तो भी जणता शक की नजर से देखे है। और मास्टर हो के जो मण कहे करो, कोई कुछ नहीं कहणे वाला। देश निर्माता का फट्टा माथे पे लगाओ और मौज मणाओ।

और उणके आशीर्वाद से प्राइमरी स्कूल का मास्टर हो गिया। सच्ची को मास्टर होणे के आज की डेट में बहुत फादे हैं। गांव वाले सबकुछ फ्री में दे जाते हैं और हम भी मास्टरी का प्रसाद समझ मजे से खा लेते हैं। भगवाण उण नेता जी को स्वर्ग दे जो मेरी पुकार सुण रहा हो। ण वे चुणाव लड़ते, ण मैं उणके पोस्टर लगाणे के लिए दिण रात एक करता और ण वे मेरी भक्ति पर प्रसण्ण हो मास्टरी का पेपर लीक करवा मुझ तक पहुंचाते और ण मैं आज मास्टर शब्द अंग्रेजी तो अंग्रेजी हींदी में भी गलत लिखणे वाला मास्टर हो पाता।

आज तो साहब हम बड़ों बड़ों को पटखणी देते हैं और सीणा चैड़ा कर कते हैं कि है कोई पूरे विभाग में अपणे जैसा मास्टर कि जो स्कूल टाइम में ही स्कूल के पीछे जुए वालों को जमाए, बच्चों को सारा साल कुछ ण पढ़ाए पर परीक्षा में अपणे हर बच्चे को फस्र्ट क्लास में पास कराए!

जबसे स्कूल में सरकार की खिचड़ी चली है अपणे तो साब चांदी है। सारा दिण बच्चों का पूरी लग्ण से खिचड़ी पकाते हैं , पहले खुद खाते हैं फिर बच्चों को खिलाते हैं और जो बच जाती है उसे घर में शाम को बीवी बच्चों को ले जाते हैं। अब अकेला मास्टर स्कूल में क्या क्या करे? खिचड़ी का हिसाब, बच्चों का हिसाब, ऊपर से हिसाब का हिसाब!

बच्चों के मा बाप मुझसे बहुत खुश है। कहते हैं,‘क्या हुआ जो कुछ णहीं पढ़ा रहा है, बच्चे तो कते हैं कि स्कूल मास्टर खिचड़ी उणकी माओं से कई गुणा स्वाद बणा रहा है। बिणा पढ़ाए ही बच्चों को पूरे इलाके में फ्रस्ट ला रहा है। ऐसे में ये पढ़ाए तो इसके पढ़ाए बच्चे पता णहीं क्या तबाही मचाए। हमारे स्कूल में मास्टर जी णहीं, मास्टर जी के वेश में कोई जादूगर हैं आए। भगवाण करे ये मरणे के बाद भी यहां से ण जाए। ’ खिचड़ी बणाणे में पूरे विभाग में कोई मेरा साणी णहीं। मैं बच्चों को सारा दिण डटकर खिचड़ी खिलाता हूं और कभी कभार जो खिचड़ी का माच ण लगा होवे तो उण्हें अंग्रेजी उण्हीकी जबाण में पढ़ाता हूं।

कल सुणार का लड़का रोता हुआ आया तो मैंणे उससे पूछा,‘ रो कयों रा है? कल क्या खिचड़ी में मिर्च ज्यादा थी?’
‘णाहीं।’
‘तो क्या नमक ज्यादा थिया?’
‘णाहीं।’
‘तो क्या खिचड़ा खा खा के कब्ज हो गया?’
‘णाही!’
‘तो क्या आज खिचड़ी वाली थाली किताबों के साथ घर भुल आया?’
‘णाहीं। गुरू जी! मारोगे तो णाहीं?’
‘ णाही! खुल के बोल,अरे पगले जब हमणे कूछ करवाए ही णाहीं तो मारेंगे काहे।’
‘मैं हींदी बोलणा चाहे हूं।’
‘का करेगा हींदी बोलके? अपणी बोली बोल अपणी। हुणा जिणा है जो! हींदी तेरे बाप ने बोली?’
‘णाही!’
‘तेरे मास्टर णे बोली?’
‘णाही।’
‘तो तेरे को हींदी बोलने का दौरा कहां से आ पड़ा रे? पिटेगा हींदी बोलेगा तो, सड़क में भी और संसद में भी। टांग बाजू तुड़वाणे का जादा सौक है तो जा कबड्डी खेल आ, दंगा कर आ पर हींदी मत बोल। हींदी के दिण आजकाल बुरे चले हो रे बिटुआ। मास्टर का कहणा माण और जा अपणी थाली धो कर ला, खिचड़ी तैयार है। ’
‘पर हींदी हमार रास्टर भासा है ण?’
‘कौण कहे है रे देसभक्त?? जा णहीं तो तेरे बाप से कहे दूंगा कि तेरा बेटा आजकाल बिगड़ रहा है। ऐसी उटपटांग भासा सीखेगा कहेगा ण तो कहीं का ण रहेगा। तू बड़ा होकर बड़ा बणणा चाहे हो ण?’
‘हा।’
‘ तो सबकुछ सीख पर हींदी ण सीख। हिंदुस्थान में सबकुछ बोलते हैं पर हींदी हुींदू णहीं कहते। समझा!’
‘ णा। समझा हो माटर समझा।’

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Wednesday, November 04, 2009

यह केवल उत्सवधर्मी विश्विविद्यालय नहीं रहेगा- विभूति नारायण राय

पिछले दिनों हिन्द-युग्म के रामजी यादव और शैलेश भारतवासी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय से बात की। विभूति नारायण राय हिन्दी के चर्चित लेखक और साहित्यकार हैं जिनकी दंगों के दौरान पुलिस के सांप्रदायिक रवैये पर लिखी पुस्तक 'शहर में कर्फ़्यू' बहुत प्रसिद्ध रही। विभूति उ॰ प्र॰ में पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्य कर चुके हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय हिन्दी भाषा को समर्पित दुनिया का एक मात्र विश्वविद्यालय है। तो हमने जानने की कोशिश की कि हिन्दी भाषा-साहित्य की गाड़ी में गति लाने के लिए इनका विश्वविद्यालय क्या कुछ करने जा रहा है॰॰॰॰॰


(इंटरव्यू को उपर्युक्त प्लेयर से सुन भी सकते हैं)

रामजी यादव- महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 10-12 वर्ष पहले हुई थी। पूरी दुनिया में फैला हुआ जो हिन्दी समाज है, उसके प्रति हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यह उत्तरदायी है। लेकिन यह एक उत्सवधर्मी विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। और लगभग इसकी उत्सवधर्मिता इसके कुलपति की महात्वकांक्षाओं तक सीमित करके देखी जाती है। इस पूरी छवि को आप कैसे बदलेंगे?

वी एन राय- विश्वविद्यालय केवल उत्सवधर्मिता का केन्द्र न रहे, बल्कि गंभीर अध्ययन और शोध का क्षेत्र भी बने, और इसके साथ-साथ इस विश्वविद्यालय की हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में ज़रूरी उपकरण प्रदान करने की जो इसकी खास भूमिका है, उसे पूरा करने में भी इसका सक्रिय योगदान हो, इस समय दिशा में यह विश्वविद्यालय काम कर रहा है। इस वर्ष नये विभाग खुले हैं। मानवशास्त्र और फिल्म-थिएटर दो विभाग शुरू किये गये हैं। इसके अलावा डायस्पोरा स्ट्डीज का नया विभाग शुरू होने वाला है। ये तीनों नये विभाग महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की उस भूमिका को निभाने में भी मदद करेंगे, जिसकी कल्पना इस विश्ववविद्यालय के एक्ट में की गई है और प्रथम अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में इसकी निर्मिती के पीछे जो एक परिकल्पना रही है। इसे अंतरर्राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए, शायद आप अवगत हों, विश्वविद्यालय एक बहुत महात्वपकांक्षी योजना पर काम कर रहा है वो है कि हिन्दी में जो कुछ भी बहुत महत्वपूर्ण है, उसे ऑनलाइन किया जाये ताकि दुनिया के कोने-कोने में बैठे हिन्दी के पठक उन्हें पढ़ सके। हमारी कोशिश है कि दिसम्बर 2009 तक लगभग 100000 पृष्ठ ऑनलाइन कर दिये जायें। इसके अलावा हम इन सभी महत्वपूर्ण कृतियों को दुनिया की तमाम भाषाओं में जैसे चीनी, जापानी, अरबी, फ्रेंच इत्यादि में अनुवाद करके ऑनलाइन करना चाहते हैं।

रामजी यादव- एक चीज़ मानी जाती है कि हिन्दी एक बड़ी भाषा है जो तमाम तरह के संघर्षों से निकली है। लेकिन हिन्दी में विचारों की स्थिति बहुत दयनीय है। एक विश्वविद्यालय के रूप में आपका विश्वविद्यालय किस तरह का प्रयास कर रहा है कि हिन्दी में विचार मौलिक पैदा हों और दुनिया के दूसरे अनुशासनों से इनका संबंध बने?

वी एन राय- इसके लिए भी हमने कुछ महात्वकांक्षी योजनाएँ बनाई है। हमारे विश्वविद्यालय का जो पाठ्यक्रम है वो गैरपारम्परिक पाठ्यक्रम हैं। जो विषय हमारे यहाँ पढ़ाये जा रहे हैं वह भारत के बहुत कम विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं। जैसे स्त्री-अध्ययन है, शांति और अहिंसा है, हिन्दी माध्यम में मानव-शास्त्र है, फिल्म और थिएटर या डायस्पोरा स्ट्डीज की पढ़ाई है। अनुवाद भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें हमारे यहाँ पढ़ाई हो रही है। लेकिन ज्ञान के इन अनुशासनों में मौलिक पुस्तकों की कमी है, मौलिक तो छोड़ दीजिए जो एक आधार बन सकती हों, ऐसे पाठ्यपुस्तकों की कमी है। इसलिए हमने योजना बनाई है कि हम ज्ञान के इन सारे अनुशासनों में जो कुछ भी महत्वपूर्ण अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में उपलब्ध है, उसके कुछ चुनिंदा अंशों का अनुवाद हो और उसे छापें। और यह योजना शुरू भी हो गई है, हमने स्त्री-अध्ययन के लिए 10 पुस्तकों को चुना है जिसका साल भर में हम अनुवाद करा लेंगे। इसके बाद अन्य अनुशासनों में जायेंगे।

शैलेश भारतवासी- सवाल हमारा यह था कि जो हिन्दी का साहित्यिक या वैचारिक परिदृश्य हैं, वो पूर्णतया मौलिक नहीं है। विश्वविद्यालय की तरफ से ऐस कोई प्रयास है जिससे मौलिक विचार निकलकर आये?

उत्तर- मौलिक लेखन को भी हम प्रोत्साहन देंगे, लेकिन सवाल यह है कि मौलिक लेखन के लिए भी आधारभूत सामग्री उपलब्ध हो, जिन्हें पढ़कर आप अपनी बेसिक तैयारी कर सकें। दुर्भाग्य से गंभीर समाज शास्त्रीय विषयों पर हिन्दी में मौलिक सामग्री या तो बहुत कम है या ज्यादातर अनुवाद के माध्यम से मिल रही है। पर हमारा प्रयास यह होगा कि जब हम महत्वपूर्ण चीज़ों का अनुवाद करायेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें पढ़कर जो मौलिक सोचने वाले हैं, वे मौलिक लेखन करेंगे और उन्हें भी हम प्रकाशित करेंगे।

रामजी यादव- क्या दुनिया के अन्य देशों के विश्ववद्यालयों में जहाँ प्राच्य विद्या किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, उनके साथ विश्वविद्यालय का कोई अंतर्संबंध बन रहा है?

वी एन राय- जी, हम यह कोशिश कर रहे हैं कि बाहर के 100 विश्वविद्यालयों में जहाँ हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, भाषा के तौर पर, प्राच्य विद्या का एक अंग होकर या साउथ-एशिया पर विभाग हैं, उनमें हिन्दी का इनपुट है, इन सभी विश्वविद्यालयों के बीच में हम एक समन्वय सेतु का काम करें, उनमें जो अध्यापक हिन्दी पढ़ा रहे हैं, उनके लिए रिफ्रेशर कोर्सेस यहाँ पर हम संचालित करें, उनके लिए ज़रूरी पाठ्य-सामग्री का निर्माण करायें और सबसे बड़ी चीज़ है कि विदेशों से बहुत सारे लोग जो हिन्दी सीखने के लिए भारत आना चाहते हैं, उनके लिए हमारा विश्ववद्यालय एक बड़े केन्द्र की तरह काम करें, इस दिशा में भी काम चल रहा है।

शैलेश भारतवासी- जहाँ एक ओर आप विदेशी विश्वविद्यालयों से अंतर्संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं अपने ही देश के बहुत से लोग जो हिन्दी भाषा या साहित्य में ही अपनी पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं, उन्हें भी आपके विश्वविद्यालय के बारे में पता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए भी इस विश्वविद्यालय का नाम एक नई चीज़ है। तो क्या आप चाहते ही नहीं कि सभी लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचेया कोई और बात है?

वी एन राय- नहीं-नहीं, आपकी बात सही है। विश्वविद्यालय को बने 11 साल से ज्यादा हो गये, लेकिन दुर्भाग्य से बहुत बड़ा हिन्दी समाज इससे परिचित नहीं है, या उसका बहुत रागात्मक संबंध नहीं बन पाया या कोई फ्रुटफुल इंटरेक्शन नहीं हो पाया। ऐसा नहीं है कि हम नहीं चाहते, और हम इसके लिए हम प्रयास भी कर रहे हैं। मसलन हमारी वेबसाइट ही देखिए। हालाँकि हिन्दी-समाज बहुत तकनीकी समाज नहीं है, बहुत कम लोग हिन्दी वेबसाइट देखते हैं। लेकिन मुझे देखकर बहुत खुशी होती है कि हमारी वेबसाइट को रोज़ाना 150-200 लोग आते हैं और वो भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। तो ऐसा नहीं है, धीरे-धीरे लोगों ने इसे जानना शुरू किया है।

शैलेश भारतवासी- लेकिन यहीं पर मैं रोकूँगा, आपने कहाँ कि आप 150-200 लोगों से संतुष्ट हैं (कुलपति ने यहीं रोककर इंकार किया), मेरा कहना है कि आपको 150 विजिटरों से आशा की एक किरण नज़र आती है। मैं एक साहित्यिक-सांस्कृतिक वेबसाइट चलाता हूँ, जिसे रोज़ाना 10,000 हिट्स मिलते हैं (यह दुनिया भर की वेबसाइटों के एस्टीमेटेड हिट्स निकालने वाली वेबसाइट का आँकड़ा है), फिर भी मैं संतुष्ट नहीं हूँ और इसे एक बहुत छोटी संख्या मानता हूँ। आपकी वेबसाइट पर मैं 2-3 बार गया भी हूँ। मेरा जो अनुभव है वह कहता है कि इसमें जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है वह बहुत प्रयोक्ता-मित्र नहीं है, वह समय के साथ नहीं चल रही है। क्या इस दिशा में कोई परिवर्तन हो रहा है?

वी एन राय- पिछले 5-6 महीनों में जो परिवर्तन हुए हैं, उसमें दो महत्वपूर्ण योजनाओं को शामिल किया जा रहा है। एक तो मैंने पहले भी बताया कि हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखन के 1 लाख पृष्ठ ऑनलाइन किये जायेंगे और हिन्दी के जो समकालीन रचनाकार हैं, लेखक है, उनकी प्रोफाइल, इनके पते वेबसाइट पर डाल रहे हैं ताकि दुनिया भर में फैले इनके प्रसंशक, इनके पाठक, प्रकाशक इनसे संपर्क कर सकें। तकनीक के स्तर पर भी हम परिवर्तन करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा विश्वविद्यालय कोई तकनीकी विश्वविद्यालय तो है नहीं, फिर भी हम सीख करके, दूसरों की सहायता लेकर अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।

रामजी यादव- भारत में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जिसमें गैर हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी का विकास हो रहा है, जिससे नये तरह के डायलेक्ट्स बन रहे हैं, भाषा जिस तरह से बन रही है, बाज़ार दूसरी तरह से इन चीज़ों को विकसित कर रहा है। इस पूरी पद्धति में भाषा का विश्वविद्यालय होने की वजह से, विश्वविद्यालय किस रूप से देशज और भदेस को मुख्यधारा का विषय बना सकता है?

वी एन राय- इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद हैं। आज हम जिसे हिन्दी भाषा कह रहे हैं, वह भी एक समय बोली थी। खड़ी बोली। जब आप 'हिन्दी' शब्द का उच्चारण करते हैं तो 'खड़ी बोली' दिमाग में आती है। आज से 130 साल पहले भारतेन्दु तक यह नहीं मानते थे कि 'खड़ी बोली' में कविता भी लिखी जा सकती है। गद्य की भाषा तो 'खड़ी बोली' थी, लेकिन पद्य की भाषा ब्रजभाषा रखते थे भारतेन्दु। छायावाद आते-आते लगभग यह स्पष्ट हुआ कि 'खड़ी बोली' ही 'हिन्दी' होगी। और एक मानकीकरण शुरू हुआ। 30-40 साल बहुत संघर्ष चला। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी होगी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी के शब्दों के साथ हम कैसा व्यवहार करेंगे, कैसे हम इस भाषा को पूरे देश के लिए एक मानक और एक स्वीकार्य भाषा बना पायेंगे, यह सारे संघर्ष चलते-चलते कमोबेश यह तय हो गया है कि 'खड़ी बोली' ही हिन्दी होगी और सभी बोलियाँ इसे मदद करेंगी, खाद का काम करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य से एक दूसरी प्रवृत्ति दिखलाई दे रही है, जो मेरे हिसाब से खतरनाक है। बहुत सारी बोलियाँ इस छटपटाहट में हैं कि वो हिन्दी को रिप्लेस करके एक स्वतंत्र भाषा जैसी स्थिति हासिल करें। विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भाग लेने अभी मैं मॉरिशस गया था,, वहाँ भी बहुत सारे लोग अतिरिक्त उत्साह में यह कह रहे थे कि हिन्दी क्या है, हमारी राष्ट्रभाषा तो भोजपुरी है, मातृभाषा भोजपुरी है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हुआ कि वहाँ के एक बड़े कार्यक्रम में जब एक राजनेता हिन्दी में बोलने लगे तो जनता में से कुछ लोग कहने लगे ये कौन सी भाषा इस्तेमाल कर रहे हो, छत्तीसगढ़ी हमारी राजभाषा है। यह एक डिवाइसिव, फूट डालने वाली स्थिति है, जिससे हमें बचना होगा। मतलब हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद भी बनें और हिन्दी का नुकसान भी न करें। हमारा विश्वविद्यालय चूँकि हिन्दी का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है, इसलिए इस दिशा में निश्चित ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। हमलोग फरवरी-मार्च में बोलियों को लेकर एक सम्मेलन करने जा रहे हैं। हिन्दी का लोक बहुत समृद्ध है, कई अर्थों में बहुत प्रगतिशील है। अगर आप देखें तो पूरी दुनिया में इतनी विविधता लिए हुए लोक दिखलाई नहीं देगा। हमें इस प्रवृत्ति पर नज़र रखनी पड़ेगी कि वो लोक आगे जाकर नुकसान न करे, यह खाद का काम करे न कि विषबेन बन जाय।

शैलेश भारतवासी- यह तो हमारी बोलियों की बात है। दक्षिण भारतीय जो गैर हिन्दी भाषी हैं, हालाँकि हिन्दी को वे सम्पूर्ण भारत की भाषा के तौर पर देखते हैं, लेकिन उनकी शिकायत रहती है कि हिन्दी हमारी राजभाषा है, चलो हम इसे सीख लेते हैं, लेकिन हिन्दीभाषी हमारी भाषा को नहीं सीखते। क्या विश्वविद्यालय कोई इस तरह का कार्यक्रम चलाया रहा है जिससे गैरहिन्दी भाषा को सीखने पर प्रोत्साहन मिले?

वी एन राय- देखिए यह तो सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। यह बात आपने बिल्कुल सही कही कि त्रिभाषा कार्यक्रम को लेकर सबसे अधिक बेईमानी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही हुई। हम यह तो चाहते थे कि जो अहिन्दी भाषी क्षेत्र हैं, वहाँ तो शुरू से बच्चे हिन्दी पढ़े, लेकिन जब हमारे यहाँ तीसरी भाषा की बात आई तो हमने संस्कृत को डाल दिया जो किसी भी जनसमूह की भाषा नहीं थी। हमें कोई जीवित भाषा सीखनी चाहिए थी। लेकिन विश्वविद्यालय का तो बहुत सीमित दायरा होता है। हम तो सरकार से बस अपील कर सकते हैं।

Wednesday, June 03, 2009

हिंदी का भूत और रवीश कुमार

रवीश कुमार हिंदी ब्लॉगिंग का सदुपयोग करने वाले गिने-चुने लेखकों में से हैं....ये लेख उनके ब्लॉग पर दिखा तो मन हुआ इन्हें बैठक पर न्योता दूं....जब तक उनपर उनके व्यस्त कामों का भार है तब तक बैठक पर उनके लेख साभार ही सही....

हिंदी से डर लगता है। डरावनी हो गई है। सीबीएसई अब हिंदी के सवालों को हल्का करने जा रही है। प्राइवेट स्कूल इंग्लिश मीडियम होते हैं। गांव गांव में टाट की झोंपड़ी में इंग्लिश मीडियम स्कूल के बोर्ड लगे मिल जायेंगे। सुबह सबुह बच्चे सरकती हुई पैंट और लटकती हुई टाई लगाकर जाते मिल जायेंगे। सरकारी स्कूलों के बच्चे पैदल दौड़ लगाकार स्कूल पहुंच जाते हैं। लेकिन अब गांवों में भी स्कूली बच्चों के लिए जालीनुमा रिक्शा आ गया। इनमें बच्चे किसी कैदी की तरह ठूंस कर ले जाये जाते हैं। इंग्लिश मीडियम स्कूलों की तरफ।मां बाप ने कहा कि इंग्लिश सीखो। हिंदी तो जानते ही है। घर की भाषा है। अब हिंदी से ही डर लगने लगा है। इसलिए सीबीएसई ने तय किया है कि अति लघु उत्तरीय प्रश्नों की संख्या बढ़ा देगी। अब हिंदी के भी सवालों के जवाब हां नां में दिये जायेंगे। गैर हिंदी भाषी बच्चों के लिए हिंदी का डर समझ भी आता है। घर से बाहर निकलते ही इंग्लिश सीखने वाले हिंदी से डरने लगे सुनकर हैरानी तो नहीं हुई लेकिन मन उदास हो गया। अपनी हिंदी डराती भी है ये अभी तक नहीं मालूम था। बहुत पहले विश्वात्मा फिल्म देखी थी। गुलशन ग्रोवर अजब गजब की हिंदी बोलता था। खलनायक के मुंह से शुद्ध या क्लिष्ट हिंदी के नाम पर निकले हर शब्द हंसी के फव्वारे पैदा करते थे। इस हिंदी को तो हिंदी वालों ने ही कब का काट छांट कर अलग कर दिया। मान कर चला जा रहा था कि सरल हिंदी का कब्ज़ा हो चुका है। व्याकरणाचार्यों के जाते ही हमारी हिंदी झंडी की तरह इधर उधर होने लगी। वाक्य विन्यास का विनाश होने लगा। वैसे मेरी हिंदी बहुत अच्छी नहीं है लेकिन मुश्किल भी नहीं है। ठीक है कि हम व्याकरण मुक्त हो चुके हैं लेकिन हिंदी बोलने वाले घरों के बच्चे क्या इस वजह से साहित्य नहीं समझ पाते क्योंकि भाषा का इतना अतिसरलीकरण कर दिया गया है कि अब मतलब ही समझ नहीं आता। इस पर बहस होनी चाहिए।हिंदी से डर की वजह क्या हो सकती है? यह खबर हिंदुस्तान में ही पढ़ी। हिंदी का अखबार लिख रहा है कि कोई हिंदी का भूत है जिससे प्राइवेट स्कूल के बच्चे डर रहे हैं। उन्हें हिंदी के लिए ट्यूशन करना पड़ रहा है। ट्यूशन वैसे ही खराब है लेकिन अंग्रेज़ी के लिए ट्यूशन करने में कोई बुराई नहीं तो फिर अकेले हिंदी का भूत क्यों पैदा किया जा रहा है। मैं हिंदी राष्ट्रवादी की तरह नहीं लगना चाहता लेकिन मेरी ज़ुबान से उतरती हुई भाषा डरावनी कहलाने लगे चिंता हो रही है। वैसे हम भी अंग्रेज़ी से तो डरते ही हैं। कई लोग हैं जो कभी न कभी डरे। अंग्रेज़ी के भूत को काबू में करने के लिए नेसफिल्ड से लेकर रेन एंड मार्टिन और बच गए तो रैपिडेक्स इंग्लिश स्पिकिंग कोर्स का रट्टा मार गए। मेरे एक लेख की प्रतिक्रिया में शंभू कुमार ने ठीक ही कहा है कि बिहार यूपी के लड़के क्लर्क बनने की इच्छा में अंग्रेज़ी तो सीख ही जाते हैं। हम भी अंग्रेज़ी का मज़ाक उड़ाया करते थे। अंग्रेज़ी व्याकरण के कई किस्से बिहार यूपी में आबाद हैं। वह गया गया तो गया ही रह गया। घो़ड़ा अड़क कर सड़क पर भड़क गया टाइप के मुहावरे खूब चलते थे। चुनौतियां दी जाती थीं कि इसका ट्रांसलेशन करके दिखा दो। लेकिन हम कभी स्कूल से मांग करने नहीं गए कि बोर्ड को बोलो कि अंग्रेज़ी का भूत परेशान कर रहा है। इसका सिलेबस बदलो।दरअसल प्राइवेट स्कूलों के रसूख इतने बढ़ गए हैं कि वो ढंग के हिंदी टीचर रखने की बजाय बोर्ड पर दबाव डाल कर सिलेबस बदलवा देते हैं। सब आसान ही करना है तो फिर इम्तहान क्यों रहे। विद्वान तो कह ही रहे हैं कि इम्तहान की व्यवस्था खत्म कर दी जाए। ग्रेड न रहे। इसके लिए तो स्कूल वाले दबाव नहीं डालते। पश्चिम बंगाल की सरकार ने अपने बोर्ड की परीक्षाओं में ग्रेड सिस्टम लागू कर दिये हैं। बिना किसी दबाव के। सीबीएसई कब से ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने पर बहस कर रही है। क्यों नब्बे फीसदी का एलान किया जाता है। इतने नंबर वाले बच्चे क्या हिंदी में नंबर नहीं ला सकते। जब रटना ही है तो हिंदी भी रट लो। मुझे लगता है कि हिंदी का भूत पैदा किया जा रहा है। ताकि हिंदी गायब हो जाए। इंग्लिश मीडियम का हाल ये है कि अच्छी इंग्लिश लिखने वाले कम हो गए हैं। इंग्लिश के लोग ही शिकायत करते हैं कि प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को ए एन द जैसे आर्टिकलों का प्रयोग ही नहीं मालूम। प्रिपोज़िशन का पोज़िशन गड़बड़ कर देते हैं। भाषा का भूत नया है। देखते हैं कि प्राइवेट स्कूल वाले इस भूत को कितना नचाते हैं।

रवीश कुमार

Thursday, May 14, 2009

कालिया ने पाला बदल लिया है- उद्भ्रांत

दूरदर्शन में वरिष्ठ निदेशक और हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि उद्भ्रांत ने बुधवार को भारतीय ज्ञानपीठ से 25 लाख रुपए हर्जाने की मांग की है। उन्होंने इस संबंध में भारतीय ज्ञानपीठ के कार्यकारी निदेशक रवीन्द्र कालिया को नोटिस भेजा है। नोटिस में कहा गया है कि आश्वासन के बावजूद दो पांडुलिपियाँ प्रकाशित नहीं होने और वापस करने में दो वर्ष से अधिक का समय लेने के कारण उनको न केवल रायल्टी का नुकसान हुआ व वादाखिलाफी के कारण मानसिक आघात पहुंचा है, बल्कि लेखक की प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुंची है। इस नोटिस में अभी तक नहीं लौटाई गई दो पेंटिग को तत्काल वापस करने की मांग की गई है। इस केस की मीडिया और साहित्य जगत मैं पिछले ‍‍1 महीने से चर्चा है। हिन्दी साहित्य में अपने-आप में यह पहला मामला है जब भारतीय ज्ञानपीठ के खिलाफ किसी लेखक ने खड़े होने की हिम्मत की है। उद्‍भ्रांत अपना वास्तविक कष्ट अपनी कलम से बाँट रहे हैं॰॰॰॰॰


साहित्यकार उद्भ्रांत का परिचय

महत्तवूपर्ण वरिष्ठ कवि,
जन्म : 4 सितंबर, 1948 ई.,नवलगढ़(राजस्थान)- सर्टिफिकेट के अनुसार: 6 मई, 1950 ई.,
कानपुर में शिक्षा-दीक्षा;
वर्ष 1959 से रचनारम्भ;
50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित;
अनेक पुरस्कारों से सम्मानित;
कानपुर प्रेस के सचिव रहे;
रचनाएं अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित;
सम्प्रति- दूरदर्शन महानिदेशालय में वरिष्ठ निदेशक (कार्यक्रम)।
प्रमुख पुस्तकें: त्रेता एवं प्रज्ञावेणु (महाकाव्य), स्वयंप्रभा एवं वक्रतुण्ड (प्रबंध काव्य), ब्लैकहोल (काव्य नाटक); शब्दकमल खिला है, नाटकतंत्र तथा अन्य कविताएं, काली मीनार को ढहाते हुए एवं हंसो बतर्ज रघुवीर सहाय (समकालीन कविता); लेकिन यह गीत नहीं, हिरना कस्तूरी एवं देह चांदनी (गीत-नवगीत); मैंने यह सोचा न था (ग़जलें), कहानी का सातवां दशक (संस्मरणात्मक समीक्षा)।
संपादन: लघु पत्रिका आंदोलन और युवा की भूमिका, पत्र ही नहीं बच्चन मित्र हैं, युवा, युगप्रतिमान (पाक्षिक), पोइट्री टुडे एवं त्रिताल।
कवि-मूल्यांकन: त्रेता : एक अंतर्यात्रा (डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित), रुद्रावतार विमर्श (डॉ. नित्यानंद तिवारी), उद्भ्रांत की ग़ज़लों का यथार्थवादी दर्शन (अनिरुद्ध सिन्हा), उद्भ्रांत का बाल-साहित्य : सृजन और मूल्यांकन (डॉ. राष्ट्रबंधु एवं जयप्रकाश भारती), कवि उद्भ्रांत : कुछ मूल्यांकन बिंदु (उषा शर्मा)।
शीघ्र प्रकाश्य: अभिनव पांडव (महाकाव्य), राधामाधव (प्रबंधकाव्य), अनाद्यसूक्त (आर्ष काव्य) एवं कई कविता संग्रह।

सूचना- 30 मई 2009 को रात 10:30 बजे डीडी भारती चैनल, इंदौर पर कवि उद्‍भ्रांत से बातचीत प्रसारित होगी। देखें और आनंद लें।
दैनिक भास्कर (नई दिल्ली) के 4 अप्रैल, 2009 के अंक में ‘साहित्य-संस्कृति’ के पृष्ठ पर नूर अली की ‘तल्ख़ियाँ’ ने साहित्य जगत में चल रही माफियागीरी की अच्छी ख़बर ली है, विशेषकर दिल्ली के दंगल में दो बरस पहले उतरे नये पहलवान रवीन्द्र कालिया द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के माध्यम से ‘युवा लेखकों का अपना उपनिवेश क़ायम करने में क़ामयाबी हासिल करने की दिलचस्प दास्तान भी बयान की है। इसमें कुछ युवा लेखकों की कमज़ोर किताबों को ज्ञानपीठ से प्रकाशित कराने के प्रयासों का ब्यौरा भी जोड़ना चाहिये था। युवा लेखकों के सर्वमान्य नेता बनने के प्रयास में उन्होंने कई वरिष्ठ लेखकों की प्रकाशन के लिए आमंत्रित श्रेष्ठ कृतियों को भी अपमानजनक ढंग से वापस कर दिया। ज्ञानपीठ और ‘नया ज्ञानोदय’ को अपने रणनीतिक स्वार्थ के अन्तर्गत इस्तेमाल करने की उनकी कुत्सित प्रवृति को लेकर उनके बारे में अन्य राष्ट्रीय दैनिकों और साप्ताहिकों में अनेक महत्तवपूर्ण वरिष्ठ लेखकों ने तो अपनी आपत्तियां दर्ज़ की ही हैं, कर्मेन्दु शिशिर द्वारा ऐसी सौ पृष्ठों की एक पुस्तिका भी गत वर्ष जारी की गई थी, जिससे हिन्दी संसार भलीभाँति अवगत है।

मेरा मानना है कि ‘ज्ञानोदय’ में ‘नया’ विशेषण तो, चालीस वर्ष पूर्व उसके बंद होने के अन्तराल को और समय की नवता को देखते हुए, लगाना ठीक ही था, मगर कालिया ने इस ‘नये’ को उत्तरआधुनिक रंग दे दिया। यह विगत दो वर्षों में ‘ज्ञानोदय’ के पन्नों पर उनके सम्पादकीयों और युवा लेखक-लेखिकाओं के परिचयों की बानगी से पता लगा चुका है, कालिया को शायद इसीलिए लाया भी गया था। मगर बाद में उन्हें जैसे ही कार्यकारी निदेशक की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी दी गई उन्होंने समूची ज्ञानपीठ संस्था को भी ‘नया’ विशेषण देने की ठान ली। इस प्रक्रिया में उन्होंने ज्ञानपीठ की इतनी दुर्गति करा दी है कि अब संस्था का और उनका मालिक एक ही दिखाई दे रहा है। जैनेन्द्र रचनावली की अक्षम्य भूलों के लिए वे ही ज़िम्मेदार हैं। उन्होंने कम से कम आधा दर्जन समझदार विश्वसनीय सहयोगियों को इतना तंग किया कि उन्होंने संस्था ही छोड़ दी। किशन कालजयी के इस्तीफे का प्रारंभिक अंश इंस सम्बंध में दृष्टव्य है। ”भारतीय ज्ञानपीठ के कार्यकारी निदेशक श्री रवीन्द्र कालिया की पक्षपातपूर्ण प्रशासनिक अराजकता के कारण भारतीय ज्ञानपीठ का आन्तरिक परिवेश बुरी तरह नष्ट हो गया है। चुगली और चापलूसी करने वाले चन्द लोगों को निजी स्वार्थवश कालिया जी बुरी तरह बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे असहज माहौल में अधिकांश कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कई लोग ज्ञानपीठ को छोड़ रहे हैं और कइयों ने छोड़ने का मन बना लिया है। ‘नया ज्ञानोदय’ में भी अपने सम्पादकीय दुराचार से कालिया जी ने कई लेखकों का अपमान किया है। निस्संदेह इन कुकृत्यों की वजह से भारतीय ज्ञानपीठ की गरिमा घटी है। इस पतनोन्मुख भारतीय ज्ञानपीठ में मेरे लिए काम करना न तो नैतिक है और न ही मर्यादित।”

ज़रा ज्ञानरंजन को भी स्मरण करें। ”हिन्दी समाज पिछलग्गुओं का समाज नहीं है। तुमने एक खराब, बेबात की बहस छेड़ी है। तुम नयों को बाजारू बना रहे हो, यह खिलवाड़ है। तुमसे यह उम्मीद नहीं थी। मैं भविष्य में कोई काम ‘नया ज्ञानोदय’ या ‘ज्ञानपीठ’ के लिए नहीं कर सकूँगा।”

ये दो उद्धहरण कालिया की इधर की शैली को उजागर करते हैं। एक सम्पादक के रूप में और एक अधिकारी के रूप में भी। मगर कालिया में पिछले चालीस सालों में कोई बड़ा फ़र्क नहीं आया है। मित्रगण उसे बारबार क्षमा करते हैं और वह इसे अपनी शक्ति समझकर बारम्बार वैसी ही या उससे बढ़कर धृष्ठताएँ करता है। वह अपने पीछे चलने वाले युवा लेखकों की कमज़ोर किताबें भी विचारार्थ जमा करने के तीन महीने के भीतर छाप देता है और स्वाभिमानी लेखकों की प्रकाशन के लिए आमंत्रित कृतियों को बरसों अधर में रखकर वापस कर देता है। इस सम्बंध में अपने कटु अनुभव को सामने रखना चाहूँगा। तीन पत्रों के माध्यम से।

भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी श्री आलोक प्रकाश जैन का दिनांक 05 जून, 2006 का पत्र है। ”प्रिय भाई उद्भ्रांत जी, इधर आपके अप्रकाशित खण्ड काव्यों पर चर्चा सुनी। श्री कमलेश्वर जी ने भी उस पर लिखा है, और हमारे प्रकाशन अधिकारी श्री किशन कालजयी ने भी तारीफ की है, भारतीय ज्ञानपीठ को आपकी किसी कृति को प्रकाशित करने का गौरव नहीं मिला। आपसे अनुरोध है कि उन दोनों खण्ड काव्यों को या उनमें से एक भारतीय ज्ञानपीठ को प्रकाशनार्थ भेजें। हमारे प्रकाशन अधिकारी श्री किशन कालजयी के माध्यम से आपसे शीघ्र वार्तालाप और मुलाकात होगी।”
पत्र में जिन खण्ड-काव्यों की बात की गई है उनके नाम ‘राधामाधव’ और ‘अभिनव पांडव’ हैं। ‘राधामाधव’ के कुछ अंश इंदौर में राजेश जोशी के साथ जब प्रभु जोशी ने सुने तो मुझे कहा कि इसके आवरण की संकल्पना मैं ही करूँगा। आलोक जैन का पत्र आने के बाद मैं पुन: इन्दौर गया और प्रभु ने मध्य प्रदेश की एक वरिष्ठ चित्रकार मीरा गुप्ता और शांति निकेतन से आये चित्रकार निताईदास की दो पेन्टिंग्स इस हेतु मुझे सौंप दीं। दोनों पाण्डुलिपियों के साथ मैंने ये दो पेन्टिंग्स भी स्पीड पोस्ट से आलोक जैन के नाम ज्ञानपीठ के पते पर भेजीं। कालिया तब कोलकाता में थे और आलोक जैन प्राय: मुझसे फोन पर पूछते थे कि हम रवीन्द्र कालिया को ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक के रूप में लाना चाहते हैं, वे कैसे रहेंगे? अब मुझे अफ़सोस होता है कि कालिया के नाम पर मैंने भी अपनी संस्तुति दी और कालिया से इसकी सूचना देते हुए कहा कि आशा है मेरी संदर्भित पांडुलिपियाँ तुम्हारे आने के बाद शीघ्र प्रकाशित हो सकेंगी। ज़ाहिर है कि कालिया ने मुझे चिन्ता नहीं करने के लिए कहा। बाद में उन्होंने मेरे एक अन्य खण्डकाव्य ‘वक्रतुण्ड’ की पाडुंलिपि भी जानकारी होने पर ले ली। पिछली दोनों कृतियों के लम्बे समय से लम्बित रहने के कारण उत्पन्न मेरी प्रकट अनिच्छा के बावजूद दोस्ती का हवाला देते हुए। एक तरह से जबरन। कालिया के दिल्ली में आने के बाद मेरे ही एक कार्यक्रम द्वारा प्रकारान्तर से उनके यहाँ आने की सार्वजनिक घोषणा हुई थी। इस सबके और विगत चालीस वर्षों के सम्बंध के बावजूद कालिया ने जो सचमुच का आपराधिक कृत्य किया वह उनके इन दो पत्रों से प्रकट है।

पहला 19 जून, 2008 का है। आपकी पांडुलिपि ‘राधामाधव’ यथासमय प्राप्त हुई थी। पांडुलिपि के बारे में विशेषज्ञों द्वारा गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया। हमें खेद है कि उसे अपरिहार्य कारणों से फिलहाल भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशन के लिए स्वीकार नहीं किया जा सका। पांडुलिपि आपको भिजवाई जा रही है।” अर्थात् दो वर्ष बीत जाने के बाद भी, ‘फिलहाल!’
आप देखें कि उक्त पत्र में ‘विचार किया गया’ कहा गया है जबकि श्री आलोक जैन ने ‘एक या दोनों’ काव्यों की पांडुलिपियाँ ‘प्रकाशनार्थ’ मांगी थीं। विचारार्थ नहीं। इसमें उन ‘अपरिहार्य कारणों’ का भी कोई हवाला नहीं है। विशेषज्ञ अगर कोई हैं तो कौन हैं, उन्हें पांडुलिपियाँ क्यों भेजीं गईं और उनका क्या मत था इसकी कोई जानकारी नहीं। जबकि ‘राधामाधव’ की पांडुलिपि में सत्यप्रकाश मिश्र, जानकी वल्लभ शास्त्री, रमाकांत रथ और डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी की टिप्पणियां पहले से मौजूद थीं। उसी के साथ भेजे गए ‘अभिनव पाण्डव’ में डॉ. शिव कुमार मिश्र और डॉ. कमला प्रसाद की टिप्पणियाँ थीं। उसका और इनके बाद आग्रहपूर्वह कालिया द्वारा ही मांगे गये तीसरे काव्य ‘वक्रतुण्ड’ का उक्त पत्र में कोई उल्लेख नहीं था। इस पर जब मैंने पुन: पत्र लिखा तो कालिया ने 8 जुलाई, 2008 को लिखे इस दिलचस्प पत्र के साथ उन्हें वापस किया। ”खेद है कि हम आपकी पांडुलिपियों ‘अभिनव पाण्डव’ और ‘वक्रतुण्ड’ का उपयोग न कर पाएंगे। प्राय: हम पाडुंलिपियाँ वी.पी.पी. से लौटाते हैं। आपको अपने व्यय से कोरियर द्वारा लौटा रहे हैं।” आशा है भारतीय ज्ञानपीठ को अपनी पांडुलिपियाँ भेजने वाले लेखकों ने इस बात को नोट कर लिया होगा। वैसे मुझे तो अब तक यही ज्ञात था कि छोटे से छोटे या अत्यंत मामूली प्रकाशक भी पांडुलिपियाँ रजिस्टर्ड डाक से ही लौटाते हैं। यहाँ तो पांडुलिपियाँ ‘प्रकाशनार्थ’ मंगाई गई थीं। लेखक स्वयं प्रकाशक के पास नहीं गया था। कालिया ने यह नयी परम्परा शुरू की है जिससे ज्ञानपीठ के गौरव में निश्चय ही पर्याप्त वृद्धि हुई होगी।
कालिया के इस दुष्कृत्य के अभद्र चेहरे पर पंचमुखी छाप जड़ते हुए ‘वक्रतुण्ड’ जयपुर के एक प्रमुख प्रकाशन ‘पंचशील’ से तीन महीने की अल्पावधि में ही छप कर दुष्टों को भी वक्री मुस्कुराहट का उपहार देते हुए कृतार्थ कर चुके हैं और साहित्य जगत में उनकी चर्चा शुरू हो गई है। अन्य दोनों काव्य भी इस वर्ष प्रमुख प्रकाशन संस्थाओं से आएंगे। मगर, उक्त कृतियों को दो वर्ष से अधिक समय तक न छापकर और रोके रखकर कवि की मानहानि और मानसिक उत्पीड़न के अतिरिक्त जो आर्थिक क्षति पहुँचाई गई, उस सम्बंध में किये जा रहे विधिक विचार-विमर्श का उचित परिणाम शीघ्र ही सामने आएगा। लेकिन, पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि जो व्यक्ति अपने सम्पादकीयों में ‘मीडियाकर’ जैसे शब्दों को अपने विरोधी के लिए गाली की तरह इस्तेमाल करता है, उसका बिना नाम लिये; वह होने के बावजूद स्वयं के लिए वैसे शब्द सुनना पसंद नहीं करता। यह तो हुई प्रिंट की बात। आपसी बातचीत में वह किस सीमा तक जाता है?
18 जनवरी, 2009 दिन रविवार को इलाहाबाद संग्रहालय में साहित्य अकादमी और संग्रहालय के संयुक्त तत्वावधान में हरिवंशराय बच्चन जन्म शताब्दी समारोह में सुबह की गोष्ठी समाप्त होने के बाद लंच करते हुए मैंने पास खड़े दूधनाथ को किसी से कहते सुना। ”हां, ‘जनसत्ता’ को तो सुबह से खोज रहा हूँ। मेरे दोस्त के बारे में उसमें कुछ निकला है।” पूछताछ करने पर पता लगा कि 11 जनवरी के अंक में प्रकाशित राजकिशोर की टिप्पणी के क्रम में गगन गिल की टिप्पणी आई है। दूधनाथ कह रहे थे। ”वो कह रहा था कि मुझे देखना है कि उसके कौन-कौन से कुत्ते मेरे ऊपर हमला करते हैं?” अब यह ‘उसके’ किसके लिए था, इसे मैं नहीं जानता। चूँकि बात किसी और तरफ मुड़ गई इसलिए इस सम्बंध में आगे पूछताछ भी नहीं हो सकी। मैंने कहा कि ”फिलहाल इतना तो जान ही लो कि बहुत जल्द मैं कालिया पर मुक़दमा दायर करने जा रहा हूँ।” दूधनाथ चमक कर बोले, ”लेकिन तुम्हारी तो कविताएं कालिया ने छापी थीं।” दूधनाथ को पता नहीं था कि वर्ष 1960 में ही मेरी एक कविता ‘आज वाराणसी’ के साप्ताहिक परिशिष्ट में उसके साहित्य सम्पादक स्व. भैयाजी बनारसी ने छापी थी और तब कालिया का साहित्य जगत में जन्म तक नहीं हुआ था। दूधनाथ अभी दूधपीते बच्चे ही थे। पैदा हुए दो-चार दिन ही हुए होंगे। तबसे शुरू हुई मेरी काव्य-यात्रा के प्रारंभिक दशक में ही हिन्दी की तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाएँ साप्ताहिक हिन्दुस्तान, ज्ञानोदय, नवनीत, कादंबिनी आदि मुझे लगातार छापती रही थीं, यह तो दूधनाथ को अवश्य पता होगा। पर लगता है कि भयंकर दुश्मनी से अभी-अभी बदली दोस्ती को निभाने में इतने गाफ़िल हो गये कि उन्हें इस सबका स्मरण नहीं आया। मगर, मेरे सामने तो ऐसी कोई मज़बूरी न होकर हाल-हाल में किये गए कालिया के विश्वासघात की बानगी ही थी। इसलिए मैंने कहा, ”वह कोई अहसान नहीं किया था, मगर प्रकाशन के लिए आमंत्रित मेरी दो किताबों को दो साल बाद लौटाने का जघन्य अपराध तो उसने किया ही है, जिसके लिए कानून उसे दण्ड अवश्य देगा।”
मज़े की बात है कि दूसरों को ‘दारूकुट्टा’, ‘दढ़ियल’ या ‘मीडियाकर’ जैसे अपशब्दों से नवाज़ने वाला व्यक्ति ‘कालिया’ के लिए टाइपिंग त्रुटि से ‘कैला’ (के.ए.आई.एल.ए.) जैसे निरर्थक और ‘कॉवर्ड’ जैसे शब्दों को बर्दाश्त नहीं कर पाता जोकि एक प्रवृतियाँ है, गाली नहीं, और उसका वकील 14 जुलाई, 2008 के पत्रा में ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे’ वाले अंदाज़ में मानहानि का केस करने की धमकी देता है। प्रभु जोशी से जो पेंटिंग्स लाकर मैंने ज्ञानपीठ को भेजी थीं, वे वापस नहीं की गईं। ऐसे व्यक्ति को निदेशक और सम्पादक बनाने की संस्तुति के लिए मैं सार्वजनिक रूप से शर्मिन्दा हूँ।
मेरे सम्पादन में ‘युवा’ का प्रवेशांक कानपुर से अक्तूबर, 1974 में छपा था। उसमें ‘लेखक और व्यवस्था’ विषय पर जिनके विचार थे उनमें भैरव, मार्कण्डेय, सर्वेश्वर, शील, मटियानी, दूधनाथ, काशीनाथ के साथ कालिया भी थे, जिनका कहना था। ”व्यवस्था के लिए लेखक सिर्फ चीज़ है। एक छोटी-सी चीज़। व्यवस्था के सामने लेखक की स्थिति एक दलाल की स्थिति से बेहतर नहीं है। जो लेखक व्यवस्था को रास नहीं आता, व्यवस्था उसके साथ कैसा सलूक करती है आप जानते होंगे। मगर इससे लेखक छोटा नहीं हो जाता।”

अब कालिया के इन वचनों का अर्थ लोगों की समझ में आ जायेगा क्योंकि उसने अपनी सुविधानुसार न केवल पाला बदल लिया है, वरन् वह लेखक से दलाल की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा भी कर रहा है। जो ऐसा करते हैं उन्हें कालिया अपना रणनीतिक स्तंभकार मानते हैं। जो नहीं करते उनके साथ वही करते हैं जिनकी चर्चा ‘जनसत्ता’, ‘भास्कर’ और अभी हाल में ‘आकार’ के पन्नों पर आ चुकी है। अब कालिया के शब्द उसी के ऊपर वार कर रहे हैं। ”मगर इससे लेखक छोटा नहीं हो जाता।”
कालिया ने उस परिचर्चा में राजनीति-सम्बंधी सवाल पर तिलमिलाते हुए कहा था। ”राजनीति की चर्चा आप भी तो कर रहे हैं। शायद राजनीति को भ्रष्टाचार का पर्याय मानकर सुविधा के लिए। या आपके हेड ऑफिस से ऐसा निर्देश मिला है।” पता नहीं वे किसे हेड ऑफिस कह रहे थे? मार्कण्डेय को, जिनके घर पर मैं ठहरता था, या सी.पी.एम. के दिल्ली ऑफिस को? कालिया की सिफ़त है उल्टे सीधे काम करने की, मित्रों के साथ दग़ा करने की। अब इस जन्म में तो उसमें किसी तरह का बदलाव आना संभव नहीं!

Thursday, January 08, 2009

सिर्फ अँग्रेज़ी से ही काम नहीं चलने वाला, इंटरनेट का भविष्य एशिया में लिखा जायेगा

अमेरिका का नामी खबरिया तंत्र न्यूयॉर्क टाइम्स मातृभाषा प्रेमियों के लिए नये साल का सौगात लेकर आया। अब यह मीडिया है तो सौगात भी रिपोर्ट के रूप में होगी। इस रिपोर्ट को अगले ही दिन 'दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया', 'मीड-डे', 'ट्रिब्यून' आदि अंग्रेजी अखबारों ने छापा था। दैनिक जागरण ने भी इस रिपोर्ट को थोड़ी सी जगह दी थी। यह रिपोर्ट हिन्दी प्रेमियों में उत्साह भरने का काम करेगी- ऐसा बताते हैं वरिष्ठ ब्लॉगर और हिन्दी सेवी अनुनाद सिंह। तो हमने सोचा कि क्यों न पूरी रिपोर्ट को हिन्दी में उपलब्ध कराया जाय। यह काम तब और आसान हो गया जब ब्लॉगर राजीव तनेजा ने यह जिम्मा उठा लिया। हालाँकि अनुवाद में यह उनका पहला प्रयास है। इसे पढ़कर आप भी अपनी-अपनी भाषा के लिए इंटरनेट पर सक्रिय हो जाइए।


इंटरनेट का अगला अध्याय सिर्फ अँग्रेज़ी में ही नहीं लिखा जाएगा। सिर्फ एशिया में ही इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या इस समय उत्तरी अमेरिकियों से दुगनी है और 2012 तक ये संख्या बढ़कर तिगुनी हो जाएगी। अभी भी गूगल पर सर्च करने वालों की संख्या में आधे से ज़्यादा व्यक्ति अमेरिका से बाहर के होते हैं। इंटरनेट के वैश्वीकरण ने ही बंगलूरू के एक इंजीनियर राम प्रकाश हनुमानथप्पा को कुछ नया कर गुजरने के लिए प्रेरित किया। वैसे तो वे बचपन से ही अँग्रेज़ी जानते हैं, लेकिन फिर भी अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों से उन्हें अपनी मातृ भाषा 'कन्नड़ में ही बात करना पसन्द है। लेकिन इंटरनेट पर कीबोर्ड द्वारा 'कन्नड़' लिपि में इस समय लिखना उन्हें काफी कठिन प्रतीत हुआ।

वो दिन अब लद चुके, जब आप सोचें कि आप अँग्रेज़ी में किसी वैबसाईट का निर्माण करते हैं और उम्मीद करते हैं कि पूरी दुनिया से लोग उस पर खिंचे चले आएँगे क्योंकि आप उन्हें कुछ ज़रूरी सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं

स्रोत- ज्यूपिटर रिसर्च
इसलिए 2006 में उन्होंने 'क्वैलपैड' नामक ऑनलाइन सर्विस का निर्माण किया। जिसके द्वारा 10 एशियाई भाषाओं में आसानी से टाइप किया जा सकता है। इसमें इस्तेमालकर्ता जिस भाषा में बोलता है, उसी ध्वनि को कीबोर्ड द्वारा रोमन शब्दों में उतार देता है और उसके बाद 'क्वैलपैड' का अपने आप अन्दाज़ा लगा लेने वाला इंजन उसे उसी ऐच्छिक लिपि में बदल देता है जिस भाषा का वो शब्द है। क्वैलपैड की इस खूबी के चलते बहुत से ब्लॉगर और लेखक इसकी तरफ आकर्षित हुए। इसी कारण मोबाइल फोन बनाने वाली कम्पनी नोकिया और गूगल का ध्यान भी इस तरफ गया। इसके बाद गूगल ने अपना ट्रांसलिट्रेशन टूल (लिप्यंतरण टूल) निकाला।

राम प्रकाश के बताते हैं कि बाहर की तकनीकी कम्पनियों ने भारत की बहुभाषीक संस्कृति को समझने में भूल की है। यहाँ अँग्रेज़ी केवल 10% आबादी द्वारा ही बोली और समझी जाती है। यहाँ तक कि कॉलेज के पढ़े-लिखे लोग भी अपने दैनिक जीवन में अपनी मातृ भाषा में ही बात करना पसन्द करते हैं। आपको उनपर जबरन अँग्रेज़ी थोपने के बजाए उन्हें...उनकी ही भाषा में विचारों को व्यक्त करने का मौका देना होगा।

अभी इंटरनेट पर सॉफ्टवेयर और अन्य चीज़ें अंग्रेज़ी के अलावा किसी दूसरी भाषा में ज़्यादा उपलब्ध नहीं है। इसलिए अमेरिका की बड़ी-बड़ी तकनीकी कम्पनियाँ सालाना लाखों डॉलर खर्च कर दूसरी भाषाओं में वेबसाइटें वगैरा बनवा रही हैं ताकि क्वैलपैड जैसी स्थानीय कम्पनियाँ उनके मुनाफे में सेंध न लगा सकें।

2012 तक दुनिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या में भारत, अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर होने जा रहा है। भारतवासियों की खासियत है कि वो अपने मालिक से एक भाषा में बात करते हैं, अपनी पत्नि से दूसरी भाषा में और अपने माता-पिता से किसी तीसरी भाषा में।
ज्यूपिटर रिसर्च (एक अमेरिकी ऑनलाईन शोध कम्पनी) के एक वरिष्ठ ऐनालिस्ट ज़िया डैनियल विगडर के अनुसार "वो दिन अब लद चुके, जब आप सोचें कि आप अँग्रेज़ी में किसी वैबसाईट का निर्माण करते हैं और उम्मीद करते हैं कि पूरी दुनिया से लोग उस पर खिंचे चले आएँगे क्योंकि आप उन्हें कुछ ज़रूरी सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं"

यहाँ मुश्किलें कहीं नहीं हैं और मेहनत का फल मिलना तय है। ज्यूपिटर रिसर्च के अनुसार 2012 तक दुनिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या में भारत, अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर होने जा रहा है। भारतवासियों की खासियत है कि वो अपने मालिक से एक भाषा में बात करते हैं, अपनी पत्नि से दूसरी भाषा में और अपने माता-पिता से किसी तीसरी भाषा में।

भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों के लिए याहू और गूगल ने पिछले दो सालों में एक दर्जन से अधिक नई सुविधाओं को शुरू किया है, जिनके द्वारा वे सर्च से लेकर ब्लॉगिंग तक और चैट से लेकर भाषा सीखने तक के हर काम को अपनी मातृ भाषा में कर सकें। माईक्रोसॉफ्ट ने अपने विण्डोज़ लाइव ऑनलाइन बण्डल को सात भारतीय भाषाओं में बनाया है। फेसबुक ने सैंकड़ों स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की मदद से अपनी सोशल नैटवर्किंग की साइट का हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं में अनुवाद शुरू किया है, और विकिपीडिया पर आज की तारीख में भारतीय भाषाओं के पृष्ठों की संख्या कोरियन भाषा के पृष्ठों से अधिक है।

गूगल की सर्च करने की सुविधा को चीन में स्पर्धा के चलते पिछड़ना पड़ा। इस कारण भारत में स्थानीय भाषा में सुविधाओं को उपलब्ध कराना ही उसकी प्राथमिकता बन गई। भारत में गूगल का मुख्य उद्देश्य है यहाँ के सुस्त चाल से बढ़ते हुए कम्प्यूटर बाज़ार को तेज़ गति प्रदान करना।

"यहाँ 22 भाषाओं का होना अपने आप में जटिलता पैदा करता है। यहाँ आप सभी भाषाओं के एक ही लाठी या एक ही भाषा से नहीं हांक सकते अर्थात् आप एक भाषा में बोल के सभी को खुश नहीं कर सकते।"
भरत राम प्रसाद, प्रमुख, शोध एवं विकास, गूगल
भारत में गूगल के शोध एवं विकास प्रमुख भरत राम प्रसाद के अनुसार भारत एक सूक्ष्म ब्रह्माण्ड की तरह है। यहाँ 22 भाषाओं का होना अपने आप में जटिलता पैदा करता है। यहाँ आप सभी भाषाओं के एक ही लाठी या एक ही भाषा से नहीं हांक सकते अर्थात् आप एक भाषा में बोल के सभी को खुश नहीं कर सकते।

वेबसाइटों को क्षेत्रीय रंगों में रंगने वाली लॉवेल, मैसेच्चुसेट्स की एक परामर्शी कारोबारी कम्पनी कॉमन सेंस एडवाइजरी के मुख्य शोधकर्ता सडोनाल्ड ए॰ डीपाल्मा के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ हर वर्ष हज़ारों लाखों डॉलर इस बात पर खर्च कर रही हैं कि वे अपनी वेबसाइट का किस-किस भाषा में अनुवाद करें ताकि उनकी पहुँच ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक हो सके।

उनके अनुसार ई-कॉमर्स और ऑनलाइन विज्ञापन बाज़ार के क्षेत्र में भारत, रूस, ब्राज़ील और दक्षिणी कोरिया के मुकाबले पिछड़ा हुआ है।

गूगल के राम मानते हैं कि कम्पनी द्वारा भारत में दी गई स्थानीय भाषाओं की सुविधा के जरिए अभी वो अर्थपूर्ण आमदनी नहीं कर पा रहे हैं।

डी पाल्मा के अनुसार "लेकिन ये समझदारी से किया गया निवेश है। संभवत: वो भारत के विज्ञापन बाज़ार का निर्माण कर रहे हैं।"

बहुत चर्चित पुस्तक "विनिंग इन द इंडियन मार्केट" ("Winning In The Indian Market") की लेखिका और मार्किटिंग परामर्शदाता रमा बीजापुरकर के अनुसार भारत के बढ़ते ऑनलाईन बाज़ार से जुड़ने के लिए सिर्फ अँग्रेज़ी ही प्रयाप्त नहीं है, ये सबक पश्चिमी देशों के टीवी कार्यक्रम बनाने वाले तथा उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माता पहले ही जान चुके हैं।

वो आगे बताती हैं-"अगर आप करोड़ों लोगों या लाखों लोगों तक पहुँचना चाहते हैं और उनसे जुड़ना चाहते हैं तो आपके पास अलग-अलग भाषाओं के इस्तेमाल के अलावा और कोई चारा नहीं है"।

भारतीय बाज़ारों पर शोध करने वाली एक कम्पनी जक्स्ट कंसल्ट (JuxtConsult) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के लगभग पाँच करोड़ इंटरनेट इस्तेमाल कर्ताओं का करीब तीन चौथाई हिस्सा स्थानीय भाषाओं में ही पढ़ना पसन्द करता है। JuxtConsult के मुख्य प्रबन्धक संजय तिवारी के अनुसार बहुत से लोगों को जो चाहिए होता है, नहीं मिल पाता है। स्थानीय भाषाओं में सामग्री की यहाँ बहुत कमी है"

कम्प्यूटर को स्थानीय भाषाओं के अनुकूल बनाने के लिए भारतीय शैक्षिक संस्थानों, स्थानीय व्यपारियों और एकल सॉफ़्टवेयर डेवलपरों द्वारा किए जा रहे प्रयासों को माईक्रोसॉफ़्ट की पहल पर बनाया गया 'भाषा' नामक प्रोजैक्ट एक साथ संयोजित करता है। 'भाषा' की वैबसाइट (जिसके हज़ारों पंजीकृत सदस्य हैं) के अनुसार भारतीय संस्कृति को जटिल करने में वहाँ की अलग-अलग भाषाओं का बड़ा योगदान है।

माईक्रोसॉफ्ट के प्रोग्राम मैनेजर प्रदीप परिप्पल के अनुसार माइक्रोसॉफ्ट के पास भारतीय भाषाओं में अपनी सेवाएँ देने के लिए सरकारी संस्थाओं और कम्पनियों की माँग लगातार बढ़ रही है। क्योंकि इनमें से बहुत सी कम्पनियाँ अपनी सेवाओं को भारत के ग्रामीण हिस्सों और छोटे-छोटे शहरों तथा कस्बों तक पहुँचाना चाहती हैं।

भाषा प्रोजैक्ट की वैबसाइट Bhashaindia.com प्रयोगकर्ताओं को तकनीकी शब्दों के लिए उन्हीं के द्वारा संपादित स्थानीय भाषा के शब्दों तथा सोशल नैटवर्किंग साइटों के लिए अजीबोगरीब शब्दों जैसे "nudge" और "wink" के इस्तेमाल की सुविधा प्रदान करती है।

पिछली दिसम्बर को याहू और जागरण (भारत का एक बड़ा दैनिक हिन्दी अखबार) ने मिलकर jagran.com के नाम से हिन्दी (42 करोड़ भारतवासियों की भाषा) में एक पोर्टल बनाया।

याहू (जो अपनी ई-मेल और अन्य सुविधाएँ कई भारतीय भाषाओं में प्रदान करती है) के अनुसार jagran.com ने उनकी उम्मीदों से बढ़कर अपनी तरफ ट्रैफिक को खींचा है।

भारत में याहू के मुख्य प्रबन्धक गोपाल कृष्ण सलाह देते हैं "भारत जैसे देशों में स्थानीय भाषाओं के रंग में खुद को ढाल लेना ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है"

अभी हाल ही में गूगल ने अपनी एग्रीगेशन साइटस को हिन्दी तथा तीन मुख्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में पेश किया है और साथ ही उसने अपने ट्राँसलिट्रेशन टूल (लिप्यंतरण टूल) को पाँच भारतीय भाषाओं में शुरू किया है। उसका सर्च इंजन नौ भारतीय भाषाओं में काम करता है और खोज के नतीजों को अँग्रेज़ी से हिन्दी और हिन्दी से वापिस अँग्रेज़ी में बदल सकता है।

गूगल के इंजीनियर आवाज़ को पहचान सकने, अनुवाद कर सकने, एक लिपि को दूसरी लिपि में बदलने और लिखे हुए को पढ़ सकने योग्य औज़ार के निर्माण में लगे हैं ताकि अन्य विकासशील देशों में भी उनका प्रयोग हो सके।

क्वैलपैड के राम प्रकाश के अनुसार जब उन्हें गूगल में कार्यरत अपने मित्रों के द्वारा पता चला कि उन्होंने क्वैलपैड की तुलना अपने ट्राँसलिट्रेशन वाले टूल से की है तो वो बहुत प्रेरित हुए। उनका विश्वास है कि जैसे-जैसे भारतीयों में अँग्रेज़ी से मुकाबला करने की होड़ जगेगी, वैसे-वैसे इंटरनेट पर स्थानीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ता चला जाएगा"

राम प्रकाश कहते हैं कि सिर्फ अँग्रेज़ी से ही काम नहीं चलने वाला। वो 'क्वैलपैड' का नारा (English is not enough) दोहराते हुए कहते हैं कि "ये ठीक है कि लोग आगे बढ़ना चाहते हैं और इसी कारण अँग्रेज़ी सीखना चाहते हैं लेकिन सिर्फ अँग्रेज़ी ही उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती"।

--राजीव तनेजा

Saturday, January 03, 2009

....उठता है धुंआ

ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी खासियत यही है कि आपकी नाराज़गी या खुशी जगजाहिर होने में चंद मिनट लगते हैं...हिंदयुग्म का वार्षिकोत्सव खत्म होते ही मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव की कार्यक्रम में कही बातों पर तरह-तरह के मूड बनने लगे थे.... हिंदयुग्म की शोभा महेंद्रू ने सबसे पहले अपने ब्लॉग पर "शर्मिंदा हुई हिंदी" शीर्षक से नाराजगी ज़ाहिर की....फिर, हिंदयुग्म के कुछ और साथी भी अलग-अलग राय लेकर आये....
शोभा जी का गुस्सा आप यहां पढ सकते हैं....
http://ritbansal.blogspot.com/2008/12/blog-post.html
इस लेख को पढकर हिंदयुग्म की नीलम मिश्रा ने भी अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजी..आप भी पढें.....
संपादक


"राजेंद्र यादव जी के बारे में बहुत सारे पूर्वाग्रह तो पहले से ही घुले हुए थे... उन्हें खतरनाक और शर्मनाक में अन्तर नही पता है...उन्होंने कहा कि अब वो खतरनाक बातें कहने जा रहे हैं, वो सारी शर्मनाक बातें थी....
आप तो अतिथि के तौर पर शैलेश जी द्वारा बुलाए गए थे... हम भी मजबूर थे.."अतिथि देवो भव" भाव को मन में लिए बर्दाश्त करते गए...माननीय यादव जी, हमारा हिन्दयुग्म आपकी राजनीति का मंच नही था, यह काफ़ी आगे निकल गया है, हम विश्व बंधुत्व की बात करते हैं, मानवता की बात करते है, पर आप ............दो पंक्तियाँ कहनी है जो शायद आप जैसे लोगों के लिए ही कही गई हैं-बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर.. पंथी को छाया नही, फल लागे अति दूर मनु जी, आपकी टिप्पणी भी पढी...सही में कुछ बड़े नामों को हम भागदौड़ के चक्कर में मंच से आदर सहित पुकार नहीं पाये...मगर, बड़े आयोजन की छोटी गलतियां अगली बार न हों, इसका पूरा ध्यान रखेंगे...."
साभार
नीलम मिश्रा,
हिंदयुग्म