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Thursday, June 25, 2009

रिटायरमेंट, कुत्ता और मॉर्निंग वाक

मित्रो! जब से रिटायर हुआ हूं, कुछ दिन तक अकेला भरी-पूरी फैमिली होने के बाद भी लावारिस गाय की तरह सुबह-सुबह मार्निंग वाक पर निकलता रहा। ये जो आप आजकल सुबह-सुबह घूमते हुए मुझे कुत्ते के साथ देखते हो न! यह मुझे दो महीने पहले मेरे बच्चों ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी पर गिफ्ट में दिया था कि मैं इस उम्र में कम से कम अकेला सैर करने न निकलूं ।
अब कुत्ता और मैं अरली इन द मार्निंग घूमने निकल जाते हैं। घर की किच-किच से भी बचा रहता हूं। स्वास्थ्य लाभ इस उम्र में मुझे तो क्या होगा, पर चलो कुत्ते को अगर हो रहा है तो ये भी क्या कम है।
तो कुत्ते के स्वास्थ्य लाभ के लिए पसीना-पसीना हुए अपने अनवांटिड पड़ोसी के घर के सामने से दुबकता हुआ गुजर रहा था कि भीतर से उसके भौंकने की आवाजें सुनीं । मैं तो चुप रहा पर कुत्ता भौंक पड़ा। उसे रोका भी, पर जो कहने पर मान जाए उसे कुत्ता कहेंगे आप? आप कहें तो कह लें, पर मैं नहीं कह सकता। कारण सारी उम्र मास्टरी की है।
कुत्ते के भौंकने की आवाज सुन भीतर भौंकता हुआ पड़ोसी भी बाहर आ गया । रिटायरमेंट के बाद एक भौंकने वाला भी परेशान कर देता है और वे भौंकने वाले दो-दो। कुत्ता अभी भी कुछ अपना था, सो उसे जैसे-कैसे चुप कराया, पर पड़ोसी भला चुप होने वाला कहां था। उसने चार-चार सीढ़ियां एक साथ उतरीं और मेरे आगे चीन की दीवार बन खड़ा हो गया,‘यार’ शर्मा जी हद हो गई! ये भी कोई बात बनती है कि सरकार के मन में जो आए करती रहे और हम उल्लू बनकर सहन करते रहें। सरकार के नौकर हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं कि...है??’ पर मैं चुप रहा । सारी उम्र तो उल्लू ही बनकर जीता रहा। पड़ोसी बड़ा भाग्यशाली लगा जो अब उल्लू बना। दोस्तो! आदमी जिंदगी में कुछ बने या न, पर कभी न कभी उल्लू जरूर बनता है। वास्तव में आदमी पूरा आदमी बनता ही तभी है, जब वह उल्लू बनता है।
‘आखिर ऐसी बात क्या हो गई जो आज सुबह-सुबह ही...क्या कल खाली जेब तो घर नहीं लौट आए थे और पत्नी से झाड़ पड़ी हो?’ मैंने पूरी सहृदयता से पूछा।
‘नहीं, ऐसी बात नहीं , कल तो भगवान ने छप्पर फाड़ कर दिया।’
‘ तो किसी ’शरीफ आदमी से पाला पड़ गया होगा?’
‘ शरीफ आदमी अब समाज में बचे ही कहां हैं ’शर्मा जी! वे तो अब मोम के बुतों में ढल संग्रहालयों में मौन खड़े हैं।’
‘तो????’ मैं परेशान, पर भगवान की दया से हैरान नहीं हुआ। असल में क्या है न कि इतनी दुनिया देखने के बाद अब कुछ भी हैरान नहीं करता । हां! थोड़ी देर के लिए परेशान जरूर कर देता है।
‘पहले आप घर चलो। आपको सब बताता हूं।’ कह बंधु ने जबरदस्ती अपने घर की बीस सीढ़ियां एक सांस में चढ़ा दीं। घर में ले जा बंधु ने बड़े आदर से बिठाया। लगा ही नहीं कि मैं किसी पुलिसवाले के घर आया हूं।
मेरे आगे बड़े आदर से चाय का कप रख बंधु उसी तरह भौंके,‘ शर्मा जी! ये भी कोई बात बनती है कि सरकार जो कहे हम सिर झुकाए मानते रहें।’
‘आखिर बात क्या है?’ बड़े दिनों बाद औरों के घर की चाय पी थी ,इसलिए हर घूंट किसी फाइवस्टार की टी से कम नहीं लग रही थी।
‘सरकार कभी कहती है रिश्वत न लो, तो कभी कहती है ’शरीफ को न पकड़ो। अब इस अखराजात के दौर में कोरे वेतन में कौन यहां गुजारा कर लेगा? इस वेतन में तो बच्चों की फीस भी नहीं हो पाती। सरकारी नौकरी में भी अगर मौज के लाले पड़ें तो लानत है ऐसी सरकारी नौकरी को। रिश्वत के बिना इस देश में किसी का गुजारा हुआ है क्या? चोर-उचक्के आज तक पकड़ में आए हैं क्या! बदनामी से बचने के लिए शरीफ ही पकड़ने पड़ते हैं। अब एक और आदेश कि हम मानवता का पाठ पढ़ें। मानव हों तो मानवता का पाठ पढ़ें। हम तो साले अभी आदमी भी नहीं हो पाए। ये उम्र है अपनी क्या पढ़ने की? बच्चे तक तो आवारा हो चुके हैं। डंडा चलाते-चलाते बाल सफेद हो गए। अब जाएं मानवता का पाठ पढ़ने! अपने आप दिन पर दिन .....’ कहते -कहते वे कुछ ज्यादा ही सुलग गए तो मैंने उन पर थोड़ा पानी डाला,‘ तो क्या हो गया यार! सरकारी आदेश पालन के लिए थोड़े ही होते हैं। दूसरे, सरकार आदेश न करे तो और क्या करे? उसे भी तो लगना चाहिए कि वो देशहित में कुछ तो कर रही है। पर चिकने घड़ों में कभी बिल लगे हैं क्या?’ इसे कहते हैं समझदारी! उन्होंने पूरी श्रद्धा से मेरे कुत्ते के पांव छुए, तो मैं धन्य हुआ। लगा मैं अभी भी इन सर्विस हूं।
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अशोक गौतम
गौतम निवास, अपर सेरी रोड,
नजदीक वाटर टैंक सोलन-१७३२१२ हि.प्र.

Tuesday, June 23, 2009

जूतमपैजार से प्रेमिका के द्वार तक....

ऐसा मेरे साथ पता नहीं भाई साहब क्यों होता है कि दो बच्चों को भरा पूरा बाप होने के बाद भी सुबह सैर को जाते-जाते पांव अनायास ही जूतमपैजार हुई प्रेमिका के द्वार की ओर यकायक मुड़ जाते हैं। क्या आप के साथ भी ऐसा होता है ?

अब पता नहीं बंदे की किस्मत ही खराब है या आदमी सच्ची को गलती का पुतला है। आदमी भी क्या कुत्ती(यहां आप बीप की आवाज़ के साथ पढ़ें) चीज है भाई जी, सेहरा बांध कर बाजे गाजे, पियक्कड़ दोस्तों की टोली के साथ दारू-शारू पीकर, बूढ़ी घोड़ी को रूलाता, अग्नि को साक्षी मानकर ब्याह कर किसी और को लाता है और प्रेम किसी और से कर बैठता है। आह री जिंदगी!

जिस प्रेमिका के चक्कर में पड़ लोक-लाज को लात मार सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेंगे पर रख धर्म बदल, कर्म बदल दो बच्चों को एक्स बाप की यादों के सहारे छोड़ अपनी पत्नी के सिंदूर में से चुटकी भर सिंदूर अपनी प्रेमिका को दे शान से सबकी थू थू को थू थू करता हनीमून पर निकल पड़ा था वैवाहिक जीवन में एक नया इतिहास रचने तो समाज ने पता नहीं तब क्या क्या नहीं कहा था। समाज का क्या? इसे तो कुछ न कुछ कहना ही होता है। उम्र भर एक ही पत्नी के पल्लू के साथ बंध कर रहो तो भी कुछ न कुछ कहता ही है। मेरा तो मानना है कि आम आदमी को भी जिंदगी में कम से कम एक बार सच्चा प्यार जरूर करना चाहिए। विवाहेतर प्रेम कोई बड़े लोगों की बपौती नहीं। विवाहेतर प्रेम पर सबका हक है। इसलिए जब दाव लगे तब सही।

यारो! ये तो अपनी हिम्मत थी कि टांगों तक बाल सफेद हो जाने के बाद भी हमने इश्क को जिंदा रखने के लिए एक बार फिर सिर ओखली में दे डाला। सबने कहा, "हमारा धर्म केवल एक बार ही ओखली में सिर देने की इजाजत देता है।´ कोई बात नहीं , मुझे तो बस ओखली में सिर देने को जुनून था सो ऐसे भी तो वैसे भी कर दे दिया।

समाज को और तो सब कुछ पसंद आता है पर विवाहित का किसी और से प्यार करना रास क्यों नहीं आता? मैं समाज से पूछता हूं कि विवाह होने के बाद क्या आदमी के भीतर का प्रेमी मर जाना चाहिए? एक ही खूंटे से पुरूष को क्यों बांध कर रखना चाहते हो....हे समाज सुधारकों! पुरूष प्रधान समाज में भी पुरूष के साथ ऐसी ज्यादती! जहां पहले और केवल पहले प्यार के विशुद्ध प्रेमी भी रहते हैं खटपट तो वहां भी होती है। और अपना प्यार तो ....

मुझे पता नहीं लाख बदनाम होने के बाद भी किस आकर्षण ने खींचा कि मैं कल सुबह निकला तो था सेहत सुधार के लिए और जा पहुंचा फिर प्रेमिका के घर। जो प्रेमिका मेरे वियोग में पहले बीसियों नींद की गोलियां खाने के बाद भी न सो पाती थी तब ठाठ से सोई थी।

मुझे ट्रैक सूट में हांफते देख मेरी प्रेमिका की मां ने मुस्कारते हुए पूछा,` और कैसे हो मेरी बेटी को हीरोइन बनाने वाले?´

`जहाज का पंछी अब जहाज पर लौट आना चाहता है।´

`पुराने जहाज का क्या होगा?´ कुछ कहने के बदले मैं चुप रहा।

`हमारी किश्ती में छेद डालकर इतने दिन कहां रहे?´

` विदेश चला गया था।´

` वहां फिर कोई धर्म तो नहीं बदल आए?´

` बदलता तो अखबार में पढ़ नहीं लेतीं आप। खुदा कसम खाकर कहता हूं कि अब जीना छोड़ दूंगा पर ये साथ न छोड़ूंगा। ´

` भौंरें और पतियों पर विश्वास करना है तो कठिन है, पर चलो दिल लुभाने के लिए कर लेती हूं। बेटी! देख तेरा भौंरा लौट आया है।´

`तुम कहां थे इतने दिन हे मेरे प्राणनाथ?´

`प्राणनाथ रास्ता भटक गया था हे मेरी प्रिय!´

` अब तो छोड़कर कहीं नहीं जाओगे न? तुम अगर अबके मुझे छोड़कर गए तो मैं सच्ची को आत्महत्या कर लूंगी। देखो तो समाज ने हमारा हुक्का पानी बंद कर दिया।´

` करने दो। दो प्यार करने वालों के साथ ये और कर ही क्या सकता है।´

`देखो सेकिंड हैंड पति, समाज ने हमारे पुतले जलाने शुरू कर दिए।´

` इससे तो हमारे प्रेम की उम्र ही बढ़ेगी। बट, आलरेडी विवाहित पुरूष पर इतना विश्वास ठीक नहीं प्रिय!´

मैंने अपनी ओर से फ्री होते हुए उसे वैधानिक चेतावनी दी ताकि कल को मुझे और ग्लानि न हो।

`अब विश्वास करने के सिवाय और मेरे पास बचा भी क्या है मेरे भी प्राणनाथ!´
हाय रे प्रेमिका की विवशता!

` चलो, चलो, प्रेस वाले भी आए हैं। एक फैमिली फोटो हो जाए।´ सास ने दनदनाते हुए कहा। ऐसे दामाद किसी-किसी सास को ही नसीब होते हैं न भाई साहब!

`स्माइल प्लीज!´ प्रेस फोटोग्राफर ने कहा तो मुझे लगा जैसे मैं पहली पत्नी के साथ होऊं।

डॉ. अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.