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Sunday, November 29, 2009

एक डिस्टर्ब्ड जिन्न

रात के दस बज चुके तो मैंने चैन की सांस ली कि चलो भगवान की दया से आज कोई पड़ोसी कुछ लेने नहीं आया। भगवान का धन्यवाद कम्प्लीट करने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई, एक बार, दो बार, तीन बार। लो भाई साहब, अपने गांव की कहावत है कि पड़ोसी को याद करो और पड़ोसी हाजिर। खुद को खुद ही गालियां देते हुए दरवाजा खोलने उठा कि यार ! ये किस मुहल्ले में आकर बस गया तू? जहां के आदर्श जनों को ये भी शऊर नहीं कि कम से कम मांगने तो टाइम से आ जाना चाहिए। दरवाजा खोला तो पहचानते देर न लगी। सामने जिन्न! हवा निकल गई। बड़ा चौड़ा होकर उठा था कि पड़ोसी को वो झाड़ूंगा! वो झाड़ूंगा कि सात जन्मों तक मांगना भूल जाएगा । पर सामने जिन्न देखा तो बरसों से याद हनुमान चालीसा एकदम भूल गया।
‘नमस्कार सर!’ उसने ऐसे दोनों हाथ जोड़े जैसे चुनाव के दिनों में वोट मांगने वाले जोड़ते हैं।
‘कौन?? अलादीन का जिन्न? मैं मन ही मन खुश हुआ कि चलो अब अपने दिन भी फिरे।’
‘नहीं सर!’
‘तो कौन सा जिन्न? आलू-प्याज जिन्न?’
‘नहीं सर!’ उसने चेहरे पर ऐसी मुस्कराहट बिखेरी जैसी कभी विवाह से पूर्व अपने चेहरे पर हुआ करती थी।
‘तो चीनी-पत्ती जिन्न?’
‘सर नहीं! वह तो आपके पड़ोस वालों के घर डेरा जमाए बैठा है।’
‘सब्जी-भाजी जिन्न?’
‘नहीं सर!’
‘आटा-दाल जिन्न?’
‘नहीं, साहब नहीं!’ कह उसने अपना सिर पीटा। बडी दया आई मुझे यह करते उस पर। जिस देश में जिन्न की यह दशा हो वहां आम आदमी की क्या दशा होगी? पर यहां है ही कौन जो इस बात का अंदाजा लगाए।
‘तो यार अब ये नया जिन्न कहां से आ गया? अच्छा तो मुर्गीदाना जिन्न?’ मैंने जिन्नों के भार तले दबे दिमाग पर थोड़ा और भार डाल करंट जिन्न याद कर पूछा।
‘नहीं।’ अबके वह मुस्कुराया। मेरी हालत पर ही मुस्कराया होगा। अपनी हालत पर तो यहां कोई नहीं मुस्कराता। और वह तो ठहरा जिन्न।
‘तो जिन्ना का जिन्न?’
‘उसे तो सोए हुए फिर बड़े दिन हो गए। वाह! क्या कमाल का जिन्न था! जागा। पार्टी के कई कभी न सोने वाले बंदों को गहरी नींद सुला फिर सो गया।’
‘तो बाबरी मस्जिद का जिन्न?’
‘नहीं।’
‘तो मेरे बाप हो आखिर कौन से जिन्न? क्या ये देश अब जिन्नों के अधीन ही होगा? क्या इस देश पर क्या अब जिन्न ही राज करेंगे?’
‘नहीं भाई साहब! भीतर आने को नहीं कहोगे? ठंड लग रही है। बुरा न मानों तो भीतर चाय का कप भी हो जाए और बात भी। मैं परेशान करने वाला जिन्न नहीं, परेशान हुआ जिन्न हूँ।’ कह वह भीतर झांकने लगा।
‘देखो जिन्न साहब ! आप मेरे यहां गलती से आ गए हैं शायद! ये कब्रिस्तान नहीं। वार्ड नंबर 14 का हाउस नंबर 125 है।’ कह मैंने दरवाजा बंद करना चाहा तो उसने दोनों हाथ एकबार फिर जोड़े। बड़े दिनों बाद अपने सामने किसी को हाथ जोड़े देखा तो अपना मन लबालब दया से भर आया घोर सूखे के बावजूद भी। और मैं न चाहते हुए भी उसे भीतर ले गया। जितने को मैं चाय बना कर लाया तब तक वह हीटर सेक काफी चुस्त हो चुका था। जिन्नों के बारे में जो अब तक मेरी राय थी बदलते देर न लगी। मैंने चाय की चुस्की ले चुटकी लेते पूछा,‘अच्छा तो एक बात बताओ.....’
‘पर ये मत पूछना कि लूटमार कब खत्म होगी। और जो चाहो पूछो।’ कह उसने गहरी सांस ली। लगा बंदा लूटमार का शिकार हो ही ज्यों जिन्न बना हो।
‘ये जिन्न बोतल से बाहर आते कैसे हैं? जबकि बोतल के ढक्कन पर देश के अति जिम्मेदार लोग जमे होते हैं।’
‘अपराधी जेल से बाहर बिना ताला खुले कैसे आते हैं? और ये तो जिन्न हैं जिन्न! आका ने हुक्म दिया तो आ गए। किसीको मरवा गए तो किसीको संजीवनी पिलवा गए। सरकारी फाइलों और सरकारी पाइपों की लीकेज आजतक कोई रोक सका? असल में ये हमारी फाइलों और पाइपों का वंशानुगत मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट है। कुछ समझे?’ हालांकि मैं कुछ न समझा था पर अपने को बुद्धिजीवी घोषित करने के लिए मैंने उसके आगे सहज मुंडी हिला दी,‘ तो तुम किस किस्म के जिन्न हो?’
‘मैं तो आपजिओं का सताया जिन्न हूं।’
‘मतलब!!!’
‘ आपजिओं ने अब तो कब्रिस्तान को भी हथियाना शुरू कर दिया है। अब वहां रहें तो कहां? तुम्हारे मुहल्ले में कोई कमरा किराए के लिए खाली हो तो... किराए की चिंता नहीं। बस कोई परेशान करने वाला न हो। कम से कम मरने के बाद कौन चैन से रहना नहीं चाहता?’ मित्रो! पहली बार एक परेशान जिन्न देखा, वरना आजतक संसद और फुटपाथ वालों दोनों को ये जिन्न परेशान करते रहे।


-अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Friday, August 28, 2009

बीजेपी : कॉट संघ बोल्ड जिन्ना

जसवंत सिंह से लेकर तमाम भाजपा नेताओं ने खुद या पार्टी के लिए ही नहीं तमाम न्यूज़ चैनल्स के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है...रोज़ बीजेपी का एक विकेट गिरता है और बीजेपी पर नया और पिछले बुलेटिन से ज़्यादा असरदार शीर्षक ढूंढने की मगजमारी शुरू हो जाती है....जसवंत सिंह की किताब कितने 'मीडियाकरों' ने पढ़ी होगी, इसमें संदेह है मगर ऐसा लगता है कि आधे घंटे के लिए टीवी में हर कोई विद्वान हो जाता है...हल्के में मत लीजिए टीवी के भद्रजनों को...सबको सब पता है...जिन्ना का नज़रिया, जसवंत का नज़रिया, (कौन जाने श्रीरामजी का नज़रिया भी)...बहरहाल, नाज़िम नक़वी क्या राय रखते है, गौर करने लायक हैं...
संपादक

ऐसा नहीं हो सकता कि जसवंत सिंह को इसका अंदाज़ा ही न हो कि उनकी किताब “जिन्ना-इंडिया-पार्टीशन-इंडिपेन्डेंस” जब बाज़ार में आयेगी तो क्या प्रतिक्रियाएं होंगी। आख़िर वो शख़्स इस बात को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता है जो देख चुका हो कि जिन्ना के इस जिन ने 2005 में लौह-पुरुष अडवाणी जी की कैसी फ़ज़ीहत की थी। सवाल है कि क्या उन्हें इस बात का अंदेशा था...? जी हां था। उन्होंने किताब के विमोचन समारोह में पहुंचे एक पत्रकार से अंग्रेज़ी में कहा भी था कि “आई हैव रिटेन द बुक एंड नाउ आई एम रेडी फार द नूज़” यानी अब मैं फांसी के फंदे के लिये तैयार हूं। साफ़ है कि ख़ुद जसवंत सिंह भी नकारात्मक प्रतिक्रियाओं के लिये दिमाग़ी तौर पर तैयार थे।

हां ये ज़रूर हो सकता है कि शायद उन्होंने ये नहीं सोचा होगा कि जिस पार्टी की उन्होंने तीस साल तक सेवा की वो इतनी बेरुखी से, बगैर उनका पक्ष जाने, महज़ एक फोन काल पर रिश्तों के सारे तार काट देगी। किताब के विमोचन (जिसमें भाजपा का कोई नेता शामिल नहीं था) के बाद से ही भाजपा और कांग्रेस की नाराज़गी किसी से छुपी नहीं है। उत्तर प्रदेश के एक कांग्रेसी नेता ने तो जल्दी से एक किताब खरीद कर टीवी कैमरे के सामने उसे जला कर अपनी पार्टी के आग-बबूला होने का मंचन कर दिया था।

कुल मिलाकर एक पक्ष रह गया है और वो है देश का मुसलमान। पता नहीं आम मुसलमान इसे कैसे देख रहा है लेकिन बरेली के एक पढ़े लिखे निवासी महमूद भाई ने विचारों को कहीं दूसरी तरफ़ ही मोड़ दिया। कहने लगे “जसवंत सिंह के साथ वही हुआ जो जिन्ना के साथ हुआ था... भई जिन्ना को भी उस वक्त पार्टी से तकरीबन बेदख़ल कर दिया गया था... जिन्ना लिबरल आदमी थे और नाराज होकर कम्यूनल पार्टी में चले गये। ये कम्यूनल पार्टी के आदमी हैं... ये सेक्यूलरिज्म में आ जायेंगे...।”

हालांकि आदमी विचारों से कभी बूढ़ा नहीं होता शायद इसीलिये जसवंत सिंह भी कह रहे हैं कि उनका राजनैतिक जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन सत्तर पार कर लेने के बाद उनमें कितनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा बची है ये अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है, और इसी बुनियाद पर कहा जा सकता है कि उनका पार्टी से निष्कासन कोई ख़ास मायने नहीं रखता। जो चीज़ मायने रखती है वो ये कि क्या पार्टी से जुड़ने के बाद व्यक्ति की सोच भी गुलाम हो जाती है? पार्टी अनुशासन और सेना अनुशासन में क्या कोई फ़र्क़ नहीं है? जसवंत जी के अफ़ीम प्रदर्शन को क़ानून की आंखों से बचा लिया जाता है लेकिन तथ्य प्रदर्शन की ये सज़ा दी जाती है।
बहरहाल जो भी हो इस किताब के आ जाने से सबसे ज्यादा हालत खराब है उन मौलवी हज़रात की जो कांग्रेस की चाटुकारिता में भाजपा को खरी खोटी सुनाते हैं और भाजपा के निवाले तोड़ते हुए कांग्रेस को मुसलमानों का दुश्मन बताते हैं, और इस बीच अपनी दुकान चलाते हैं। आज़ाद भारत में मुसलमानों की राजनैतिक समझ की शुरूआत ही विभाजन की सियासत से शुरू होती है और अब इस किताब के बाद उन्हें दिखाई दे रहा है कि दोनों पार्टियां तो इस विषय पर एक हो गई हैं, अब क्या किया जाए? रमजान के महीने में सियासी इफ़्तार पार्टियों में बातचीत का रुख क्या होगा इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

सच पूछिये तो जिन्ना किसी के हीरो नहीं हो सकते, न जमाते-इस्लामी के, न संघ के, न कांग्रेस के। पाकिस्तान के अंदर एक बहुत बड़ा तबक़ा उन्हें विलेन के रूप में देखता है। विदेशी सूट पहनने वाले जिन्ना, अंग्रेजी औरतों के साथ सैर-सपाटे करते जिन्ना, सिगार के कश लगाते जिन्ना, व्हिसकी से परहेज़ न करने वाले जिन्ना, सिर्फ ख़ुद को और अपने टाइप राइटर को “पाकिस्तान” बनाने का श्रेय देने वाले जिन्ना पाकिस्तान बनने के बाद पाकिस्तानियों से ये कहते हैं कि - अब पाकिस्तान बन गया अब आप गाइये बजाइये, खाइये पकाइये, मस्जिद जाइये, मंदिर जाइये, गिरजा जाइये तो कई दाढ़ियां नाराज होकर उनसे कहती हैं कि वाह! ये अच्छी कही आपने... इस्लाम के नाम पर मुल्क बनाया और अब ये कह रहे हैं कि मंदिर जाइये गिरजा जाइये...। असल बात तो ये है कि जिन्ना के सेक्यूलर बनते ही कई चेहरों का मुखौटा खुद-ब-खुद पिघलने लगता है।

लेकिन सवाल न जिन्ना का है, न जसवंत सिंह का है, सवाल है किताब लिखने की आज़ादी का। 1989 में सेनेटिक वर्सेस ने जो आग लगाई थी उसकी आंच में तपते हुए एक मौलाना साहब के पास मैं बेठा था। मौलाना अपने अनुयाइयों के बीच रश्दी पर लगे मौत के फ़रमान पर अपनी सहमति दर्ज कर रहे थे। मैं जानता था कि मौलाना ने किताब नहीं पढ़ी है, उनकी अंग्रेजी कमज़ोर है और अनुवाद बाजार में अभी आया नहीं है। मैंने सबके बीच उनसे सीधा सवाल कर डाला- मौलाना आपने किताब पढ़ी…? वो सकपकाये फिर संभलते हुए बोले ऐसी गंदी किताब मैं पढ़ भी कैसे सकता हूं...। मौलाना का दर्द मैं समझ सकता था, ईमान की रस्सी पर आस्था का बैलेंस रॉड लिये दूसरे किनारे तक पहुंचने को मजबूर लोग इधर-उधर देखने का ख़तरा मोल नहीं लेते क्योंकि हल्की सी डगमगाहट आसमान से जमीन पर ले आती है, चोट अलग लगती है। हां जो विचारों की स्वत्रंता की अहमियत को समझते हैं वो खिलाफ विचारधाराओं का स्वागत भी तहे दिल से करते हैं।
1990 में पाकिस्तान में एक फिल्म बनी “इंटरनैशनल गुरिल्ले” जान मुहम्मद निर्देशित इस फिल्म में रूसी फौजों के खिलाफ, इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए कुछ तालिबानी किरदार लड़ाई के लिये निकल पड़ते हैं। लेकिन तब तक रश्दी इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में उभारे जा चुके थे, इसलिये फ़िल्म की कहानी का विलेन उन्हें बना दिया गया। फिल्म में ये रोल अफजाल अहमद ने निभाया। फिल्म पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में जबरदस्त हिट रही लेकिन इत्तेफाक़ से यही पहली पाकिस्तानी फिल्म थी जिसके वीडियो ब्रिटेन में बैन कर दिये गये थे। और हुस्ने-इत्तेफ़ाक़ देखिये कि खुद सलमान रश्दी ने ब्रिटिश सेंसर बोर्ड से अनुरोध करके उसपर लगी रोक को हटवाया था।
सलमान रश्दी अपने खिलाफ उपजे रोष का स्वागत करने के लिये ज़िंदा थे सो ऐसा हो गया। मगर सरदार पटेल और नेहरू अब हमारे बीच नहीं हैं तो कौन है जो कहे कि सहमति और असहमति से परे, जसवंत जी ने जो लिखा वो स्वागत योग्य है। इतिहास के विद्यार्थी जब किसी काल-खंड में पीछे जाकर वापिस लौटते हैं तो हर बार हर कोई उनसे एक अनुरोध ज़रूर करता है कि “पुन: आगमन प्रार्थनीय है...।”

नाज़िम नक़वी

Thursday, March 05, 2009

खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद ....

हिन्द-युग्म के प्रेमचंद्र सहजवाला पिछले ६ महीने से भगत सिंह की जीवनी और उनसे जुड़े दस्तावेजों पर पुनर्विचार कर रहे हैं तथा इंटरनेट के पाठकों के लिए हिन्दी में छोटे-छोटे आलेखों के रूप में जानकारियाँ दे रहे हैं। अब तक इस शृंखला क १० कड़िया प्रकाशित हो चुकी हैं। आज पढ़िए ११वीं कड़ी॰॰॰


पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

  8. रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...

  9. लज्ज़ते सहरा-नवर्दी दूरिये - मंजिल में है

  10. अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

इस लेख माला में यह पहले ही कहा गया है कि तत्कालीन कानून के अनुसार यदि कोई अभियुक्त अदालत में प्रस्तुत ही न हो, तो अदालत मुक़दमे को आगे नहीं बढ़ा सकती, जब तक कि अअभियुक्त का कोई वकील न हो. इन नौजवानों की भूख हड़ताल ने और इस कारण उनके अदालत में सर्वथा अनुपस्थित रहने ने ब्रिटिश को सचमुच एक धर्म-संकट में डाल दिया था. भूख हड़ताली अदालत में आते नहीं थे और न ही अपना कोई वकील करने को तैयार थे. इस धर्मसंकट से उबरने के लिए ब्रिटिश महारानी की तरफ़ से उच्च न्यायालय में एक अर्ज़ी रखी गई, कि अभियुक्तों की मर्ज़ी के खिलाफ सही, अदालत को उनकी तरफ़ से एक बचाव-पक्ष वकील नियुक्त करने की अनुमति दी जाए. पर उच्च न्यायालय ने अदालत को और भी मुश्किल में डाल दिया, उस अर्ज़ी को खारिज कर के. अब सरकार खिसियानी बिल्ली सी बन चुकी थी. सब से बड़ा अफ़सोस यह था कि सरकार न तो इन क्रांतिकारी नौजवानों को राजनैतिक कैदी का दर्जा देना को तैयार थी, और न ही उनकी किसी भी मांग को स्वीकार करने को तैयार थी. इस पर भी तुर्रा यह कि हम यहाँ अपनी अदालतों में न्याय करने ही तो बैठे हैं, यह दुनिया को दिखा दें. इस खिसियानी बिल्ली के पास अब एक और पंजा बचा था. वह था कि क़ानून में ही कोई संशोधन कर दो. और सितम्बर 1929 में एक दिन सदन की हालत विचित्र थी. ब्रिटिश की तरफ़ से गृह-सदस्य सर जेम्स क्रेरार एक निर्लज्ज से संशोधन का बिल प्रस्तुत करने को खड़े थे. उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि जब बिल पर चर्चा होगी और मतदान होगा, तब सदन के विभिन्न सदस्य उनकी क्या गत करने वाले हैं. सर क्रेरार ने Code of Criminal Procedure (संशोधन) बिल सदन में रखा, जिस में प्रचलित कानून में एक नई संहिता S-540 B जुड़नी थी. इस के अनुसार:

'यदि किसी भी अभियुक्त ने स्वेच्छा से स्वयं को अदालत में प्रस्तुत होने के अयोग्य बना दिया है, तो जज या मजिस्ट्रेट उस अभियुक्त की अनुपस्थिति को दरगुज़र कर के अपनी जांच व अभियुक्त पर मुकदमा जारी रख सकता है, चाहे उस अभियुक्त का प्रतिनिधित्व कोई वकील कर रहा हो या नहीं...'

जबकि क़ानून के पास तो S-540-A के रूप में पहले से यह प्रावधान था कि:

यदि किसी अभियुक्त का प्रतिनिधित्व कोई वकील कर रहा है, और अभियुक्त ने स्वयं को अदालत में प्रस्तुत करने में अक्षम कर दिया है, तब अदालत उस की अनुपस्थिति को दरगुज़र कर सकती है, बशर्ते कि अभियुक्त ने कोई वकील कर रखा हो. और यदि उस का प्रतिनिधित्व कोई नहीं कर रहा तो अदालत मुक़दमे को फिलहाल मुल्तवी रखे. अदालत किसी भी हालत में अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकदमा नहीं चला सकती.

सदन में क्रेरार महोदय निर्लज्जता से ही कहे जा रहे हैं कि 'सदन के गणमान्य सदस्यों के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है, कि क्या सचमुच सरकार के पास इस विकट परिस्थिति से उबरने का कोई इलाज नहीं था? क्या सरकार इन सभी अभियुक्तों को राजनैतिक कैदी मान कर उन की मांगों को पूरा नहीं कर सकती थी? मैं यह ईमानदारी से बता देना चाहता हूँ कि सरकार ने परिस्थिति की विकटता से मुक्ति पाने की भरपूर कोशिश की थी, परन्तु पंजाब सरकार ने न केवल इन अभियुक्तों को राजनैतिक कैदी मानने से इनकार कर दिया, वरन इन की एक भी मांग को मानने से भी पंजाब सरकार मुकर गई' (pp 77-78 The Trial of Bhagat Singh - Politics of Justice by AG Noorani). अपने संशोधन बिल का बिगुल बजाते हुए गृह सचिव एमरसन ने एक ऐसी बात कह दी कि सदन आक्रोश से भर उठा और सदस्य आक्रोश के मारे शोर मचाने लगे. एमरसन ने कहा कि कानून कैदियों की नस्ल भी देखता है. कि कैदी योरपीय है कि भारतीय. उस का रहन-सहन यदि योरापियों जैसा है तो भी उसे योरापियों के बराबर रखा जा सकता है. एमरसन ने यह भी कहा कि यदि भारतीय और योरपीय कैदियों को एक साथ रखा जाए तो प्रतिवर्ष सरकार का खर्चा 40 लाख के करीब अधिक हो जाएगा. जिस कौम के गवर्नर प्रारम्भ में अपनी ही सरकार को ख़त लिखते रहे कि यह बहुत विचित्र देश है, जातिवाद से पीड़ित है, अपढ़ सा है, उसी कौम के एक गृह-सचिव आज सदन को नस्लवाद का मन्त्र बता रहे थे, शायद इस से अधिक शर्मनाक बात भारत के ब्रिटिश-कालीन इतिहास में कोई और हो ही नहीं सकती थी.

इस बिल पर जो बहस हुई, उस में मोतीलाल नेहरू व मदन मोहन मालवीय ने तो ब्रिटिश सरकार को खूब लताड़ा फटकारा ही, पर आश्चर्य कि जिस नेता ने इस बिल को ले कर एक प्रकार से गृह-सदस्य व गृह-सचिव की चमड़ी उधेड़ कर रख दी, वे थे मोहम्मद अली जिन्ना. जिन्ना बहुत ऊंचे स्तर के बैरिस्टर थे. संविधान का अक्षरशः अनुसरण करना ही उनका उस समय मज़हब था. संविधान को क्षति पहुँचते समय शेर की तरह गरजना उन की शख्सियत का एक अहम् हिस्सा था. संवैधानिक तरीके से काम करना उन की दुखती रग थी. इस पर शुक्र कि उस समय तक उन के सर पर पाकिस्तान बनाने का भूत सवार नहीं हुआ था. पाकिस्तान का सपना उन्होंने सन 1937 के चुनावों में बुरी तरह हारने के बाद ही देखना शुरू किया था. तब तक वे कांग्रेस छोड़ कर पूर्णतः मुस्लिम लीग के हो कर रह गए थे और मुस्लिम समुदाय के एकमात्र प्रतिनिधि होने की गलतफहमी में जीते थे, जब कि सन् '37 के प्रादेशिक चुनाव में उन की पार्टी को केवल 4.5 % वोट मिले थे. इस सदमे की प्रतिक्रिया अस्वस्थ रूप से सामने आयी थी और देश ने विभाजन जैसी दर्दनाक चोट सही थी.

इस समय सदन में अध्यक्ष पद पर आसीन थे विट्ठल भाई पटेल और जिन्ना गरज रहे थे:

'जो व्यक्ति भूख हड़ताल पर जाता है, उसके पास एक आत्मा होती है. वह उस आत्मा द्वारा संचालित होता है और वह अपने मक्सद के प्रति न्याय में विश्वास करता है... सरकार न्याय के मूल अधिकारों का बलिदान करना चाहती है और धोखे का सृजन करने के लिए चाहती है कि सदन इस सरज़मीन का क़ानून ही बदल दे (p 76 The Trial of Bhagat Singh - Politics of Justice by AG Noorani).

जिन्ना ने स्पष्ट किया कि गृह सचिव महोदय ने यह फरमाया है कि मुमकिन है कि माननीय सांसदों को अभियुक्तों से सहानुभूति हो. मैं यह कहना चाहूंगा कि मुझे अभियुक्तों से केवल इस सीमा तक सहानुभूति है कि वे सरकारी तंत्र के शिकार हो गए हैं, जिस का अर्थ यह नहीं कि मैं उन के अपराध का समर्थन करता हूँ. जिन्ना ने गृह सचिव की खिल्ली से उड़ाते कहा कि सचिव महोदय ने योरपीय होने की परिभाषा देते हुए कहा है कि यदि कोई टोपी पहनता है, तो कम से कम जेल के शब्दकोष में वह योरपीय ही है. पर भगत सिंह की जीवन शैली से तो यही दिखता है कि वे योरपीय हैं, क्यों कि वे तो हैट भी पहनते हैं और बरमूडा भी. बटुकेश्वर दत्त भी टोपी पहनते हैं. जिन्ना ने पंजाब सरकार को लताड़ते हुए कहा कि यदि सरकार के पास मस्तिष्क होता, तो इस समस्या का समाधान कब का कर चुकी होती. पर सरकार की मनःस्थिति कुछ इस प्रकार की रही होगी कि हम तुम अभियुक्तों पर मुकदमा भी चलाएंगे, और देखेंगे कि या तो तुम फांसी के तख्ते पर झूल जाओ या फ़िर उम्र भर के लिए देश निकला दे दिया जाए, पर जब तक तुम हमारी जेल में हो, हम तुम्हारे साथ सभ्य व्यहवार कतई नहीं करेंगे. जिन्ना ने अपनी सशक्त वकीलाना भाषा के शस्त्र से सरकार की आँखों में घूरता सा एक सवाल भी दागा : ' Do you wish to prosecute them, or persecute them (क्या आप इन पर अभियोग चलाना चाहते हैं, या अत्याचार करना चाहते हैं?). जिन्ना ने चेतावनी दी कि यह बिल पारित करने के बाद मैजिस्ट्रेट के सामने सारा मुकदमा एक तरफा हो जाएगा, क्यो कि अभियुक्त अपनी सफाई में कुछ कह ही नहीं पाएंगे. क्या यह एक बहुत बड़ा धोखा नहीं होगा?...मैं माननीय सदस्य से कहना चाहूँगा कि इस प्रकार भूख हड़ताल द्वारा मृत्यु की तरफ़ जाना हर किसी के बस का रोग नहीं है. यदि विश्वास नहीं तो थोड़ी सी कोशिश ही कर के देख लीजिये.. 'जो व्यक्ति भूख हड़ताल पर जाता है, उसके पास एक आत्मा होती है...' जिन्ना ने भाषण में जो सब से महत्वपूर्ण बात कही, वह यह कि कोई भी जज या मैजिस्ट्रेट जिसे ज़रा सी न्याय बुद्धि हो, वह अपने विवेक में ज़रा भी झटका महसूस किए बिना इस प्रकार का मुकदमा नहीं चला सकता या मुकदमा चला कर मृत्यु दंड नहीं दे सकता... जिन्ना ने तो सरकार के मुक़दमे की भी खिल्ली उड़ा कर कहा कि क्या कोई ऐसा भी मुकदमा है, जिस के लिए सरकारों को छः सौ गवाह प्रस्तुत करने पड़ रहे हैं. यह तो सचमुच एक बहुत बड़ा चुटकुला सा हुआ न... ((pp 81-82 वही पुस्तक). पंडित मोती लाल नेहरू ने अपने भाषण में एक महत्वपूर्ण बात कही कि उन के मन में उस व्यक्ति के लिए ज़रा भी सम्मान नहीं हो सकता, जिस पर चोरी या गबन का इल्ज़ाम साबित हो चुका है, परन्तु उन के मन में उस व्यक्ति के लिए पूरा सम्मान है, जिस ने जो किया, मन में यह पूर्ण विश्वास रख कर किया कि वह यह सब देश के लिए कर रहा है, भले ही उस ने जो किया, वह दिग्भ्रमित हो कर किया हो, भले ही जो उस ने किया वह वे स्वयं कभी न करें...' (p 93 वही पुस्तक). एक सदस्य जयाकर ने भी सभी क्रांतिकारियों की शान में प्रशंसा करते हुए कहा कि सदन में कुछ सदस्यों ने तो यह प्रामाणित करने की भी कोशिश की कि ये नौजवान, जिन में से कुछ तो बहुत ऊंचे हौसले वाले हैं, जो कुछ कर रहे हैं, वह अपने निजी स्वार्थ के लिए कर रहे हैं. पर क्या मुझे यह कहने की इजाज़त मिलेगी कि यदि भारत एक आज़ाद देश होता, तो इन में से ही कई नौजवान देश के जहाज़ों में कप्तान बनते, या सेना के कमांडर!' (pp 93-94 वही पुस्तक).

इस बिल को औधे मुंह गिरना था, सो गिरा. पर क्या सरकार ने अपना दृष्टिकोण बदला? क्या इन सभी बहादुर नौजवानों को राजनैतिक कैदी का दर्जा मिला? नहीं. जबकि ये तो अपनी मातृभूमि के वे सपूत थे, जिन के बारे में बिस्मिल की गज़ल कहती है:

खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल कातिल में है


पर सरकार का अगला कदम क्या था, और कैसे इन देश-भक्त जाँबाजों के मुकदमों के फैसले कर दिए गए, यह भी ब्रिटिश की निर्लज्ज तानाशाही की एक और ज़िंदा मिसाल थी, है, जिस के बारे में अगली बार.