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Tuesday, September 01, 2009

मेरी बहन लता का बिना नाम वाला प्रेमी सपने में दिखा ...

ब्लू फिल्म भाग-8

पिताजी किसी का उधार चुकाने के लिए बैंक से बीस हज़ार रुपए निकलवाकर लाए थे। शायद किसी बाहर के आदमी को भनक लग गई होगी। उस दोपहर मैं अकेला घर में था, जब दो लड़के घर में घुस आए। बाहर का दरवाज़ा खुला छूट गया था। एक के हाथ में देसी कट्टा था। उसने मेरी कनपटी पर उसे रख दिया और बीस हज़ार रुपए माँगे। मैं डर गया। मैंने अन्दर जाकर बक्से में से रुपए लाकर उसे दे दिए। वे चले गए। मैं उनके जाने के बाद चिल्लाया। गली में उस वक़्त कोई नहीं था, इसलिए किसी ने उन्हें देखा भी नहीं होगा। यह कहानी मैंने माँ और पिताजी के आने पर सुनाई। उनके चेहरे, आँखों और शरीर की जो प्रतिक्रिया थी, उसे विशेषणों का इस्तेमाल करके नहीं समझाया जा सकता। उसे वह व्यक्ति कुछ कुछ समझ सकता है, जिसने आठ सौ रुपए महीना कमाने वाले स्कूल मास्टर के बच्चों को तनख़्वाह वाली शाम घर की छत पर खड़े होकर पिता की बाट जोहते देखा हो। वह कुछ और अधिक समझ सकता है जिसने उनकी लकड़ी जैसी टाँगों और खुरदरे हाथों पर भी ग़ौर किया हो। वे भी कुछ कुछ समझ सकते हैं जिन्होंने जीवविज्ञान के प्रेक्टिकल में बेहोश मेंढ़क काटते हुए ग़लती से उसकी आँखों में देख लिया हो या जो जेठ की गर्मी में घर्र-घर्र करते टेबल फैन के आगे चौथे नम्बर की खाट पर सोए हों और उमस भरी काली रात हो, जिसमें तारे न दिखाई देते हों।
मुझे महसूस होता था कि मैं जंगल के किसी छोटे पेड़ पर बने घोंसले में बैठा नीला कबूतर हूं और पेड़ के तने के पास बहुत सारी जंगली बिल्लियाँ बैठी हैं। मैं उनसे प्रेम करता हूं और उन्हें भूखा मरते नहीं देख सकता, इसलिए उन्हें दूसरे कबूतरों का पता बता देता हूं। दूसरे कबूतर सफेद हैं, जिन्हें शाँति की झूठी तलाश में उड़ाया गया है। बिल्लियाँ लड़कियों जैसी थी।
कुछ दिनों तक रागिनी मुझसे ज़्यादा बातें करने लगी थी। उन दिनों हमने बर्फ़ से ढके ऊँचे सफेद पहाड़ों पर तिकोनी छत वाली
झोंपड़ियों में हनीमून के सपने देखे। उन सपनों में हमने एक दूसरे की कसमें खाई और चिकोटियाँ काटीं। हमने आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर एक दूसरे को ढूंढ़ने छूने का खेल खेला, जिसमें मैं बार-बार हारा। मैंने उससे कहा कि मेरी आँखें ठीक हो जाएँगी तो मैं जीतूंगा। उसने सुना और वह भूल गई। उसने मुझसे यह भी कहा कि मैंने पहले उसे आँखों की तकलीफ़ के बारे में क्यों नहीं बताया? मैंने कहा कि मैंने बताया था। उसने कहा, नहीं। मुझे भी ऐसा याद आ गया कि मैंने नहीं बताया था। हम हँसे, मुस्कुराए।
हम साइकिल पर बैठकर निकलते और वह किसी ढलान वाली सड़क पर से मुझे गहराई तक ले जाती। हम अकेले पवित्र पेड़ों पर लाल चूनरें बाँधते और उनके नीचे सो जाते। सपने में सो जाना, सोते हुए सपने देखने का उल्टा था। जागने के सपनों में सो जाना दुविधा में डाल देता था कि सो रहे हैं या जाग रहे हैं? नींद के सपनों में सोना दो बार सोना था। इस तरह दो बार जागना नहीं हो सकता था। जागना एक ही बार होता। फिर भी जागना सोने से लम्बा खिंच जाता था।
मैंने एक रात सोते हुए सपने में लता को उस लड़के के साथ देखा जो उसके पीछे आता था और जिससे वह प्रेम करने लगी थी। मैं लता से उसका नाम भी पूछना भूल गया था, इसलिए वह सपने में बिना नाम के ही दिखा। मैंने लता को लगभग निर्वस्त्र देखा और चौकंकर जग गया। दुनिया का वह हिस्सा, जिसे हम अक्सर फास्ट फॉरवर्ड करके अपनी आँखों के आगे से हटा देना चाहते हैं, वही केकड़े की तरह हमारी पुतलियों पर चिपककर बैठ जाता है और हर समय दिखाई देता है। आँखें बन्द कर लेने पर भी। मैं न चाहते हुए भी उसके रिश्ते के प्रति असहज था। अपना ध्यान बाँटने के लिए मैंने कुछ और चीजों के बारे में सोचना शुरु कर दिया, जैसे कश्मीर समस्या का क्या हल निकल सकता है या गोल्फ़ सच में कोई खेल है या नहीं? मैंने अख़बार में गोल्फ़ खेलने वाले लोगों के बारे में पढ़ा ज़रूर था, लेकिन मैं एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता था जिसे गोल्फ़ खेलना आता हो। यादव के पिता अमीर थे और उनके घर में फ़्रिज़ भी था, लेकिन वह भी किसी ऐसे आदमी को नहीं जानता था। कुछ साल पहले तक मैं समझता था कि यह किसी जानवर का नाम है। मैंने एक दोपहर लता से पूछा,” तुम्हारा लौंग और इलायचियों के बारे में क्या ख़याल है?” घर में हम दोनों ही थे। वह अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी।
- ख़याल मतलब क्या? -
मतलब तुम क्या सोचती हो?
वह हँस पड़ी- कोई लौंग इलायची के बारे में क्या सोचेगा भला? -
हम अपने शब्दों को खाते जा रहे हैं। मुझे लगता है कि बीस साल बाद मैं तुमसे लौंग और इलायची के बारे में पूछूंगा तो शायद तुम इनका नाम भी सालों के बाद सुन रही होगी...तुम चौंक जाओगी। यह और बात थी कि मैं बीस साल नहीं जिया। वह कुछ सेकंड रुककर मुझे देखती रही और फिर लिखने लगी। -
क्या लिख रही हो? -
कम्प्यूटर के नोट्स हैं... -
मुझे चिढ़ सी है कम्प्यूटर से। -
क्यों?
उसने हैरानी से मेरी ओर देखा। -
यूं ही। बहुत सी चीजों से है...बिना वज़ह...
- तुम्हें थोड़ा आध्यात्मिक हो जाना चाहिए। -
और बादाम के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है? - हम उसे भी खाते जा रहे हैं। है ना?
-तुम कुछ नया नहीं सोच सकती। मुझे याद नहीं कि मैंने बादाम कब खाए थे? - मैंने तो कभी नहीं खाए। मुझे याद है। - अगर हम अपने दरवाज़े के बाहर...दहलीज़ पर खड़े होकर या बेहतर होगा कि किसी ऊँचे पत्थर पर खड़े होकर चिल्लाकर यही बात कहें तो क्या लोग हमारा यक़ीन करेंगे? - मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा चिल्लाऊँगी। चिल्लाने का मौका मिले तो मेरे पास इससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी बातें हैं कहने के लिए...
- मैं चिल्लाना चाहता हूं लता।
- मैं सही कह रही हूं कि तुम्हें थोड़ा धार्मिक हो जाना चाहिए।
- पहले तुमने आध्यात्मिक कहा था।
- मुझे तो दोनों एक से ही लगते हैं।
- कौन दोनों?
- तुम और बादाम।

ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसी। मैं मुस्कुरा उठा।
- नाम क्या था उस लड़के का?
- किस... (‘किस’ पर उसका और उसकी हँसी का अचानक रुकना मुझे अच्छा नहीं लगा। मुझे उस वक़्त यह नहीं पूछना चाहिए था।)
लड़के का? - जिसने पिताजी को गाली दी थी।
वह चुप हो गई और चुप ही रही। मैं हमेशा बातों को गलत ढंग से शुरु करता था। मैं अक्सर वह सिरा पकड़ता था, जिसके बाद संवाद की संभावनाएँ ही समाप्त हो जाती थीं। मैंने कहा- माँ बूढ़ी हो रही है। माँ के घुटनों में दर्द रहता है। - माँ ने कहा तुमसे?
- नहीं, वह कहेगी नहीं। - देखो तुम उन्हें बताना मत प्लीज़। - तुम भाग तो नहीं जाओगी?
- मुझे नहीं पता...
- हमारे पास कैमरा होता तो मैं तुम्हारी फ़ोटो खींचकर रख लेता। मैं चाहता था कि वह कह दे कि इसकी क्या ज़रूरत है? मैं कहीं भागी नहीं जा रही। लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा। मैं बोला- मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे।
- यह सब मत सोचा करो। यह डर सबको लगता है।
- बड़ी बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम ख़ुद उन्हें जलाएँगे लता। मुझे जलाना होगा...
- अच्छा अब चुप हो जाओ बस...
- माँ की आँखें भी जल जाएँगी लता...माँ के बाल...माँ की हथेलियाँ। जाने क्या हो रहा था! मैं बेचैन हो उठा। यदि वह फ़िल्म का दृश्य होता तो लता मेरे लिए पानी लेकर आती। पानी पीकर मैं कुछ बेहतर महसूस करता।
- उसका नाम वीरेन्द्र है।
........
...............
(हम बहुत सी चीजों के बारे में कभी बात नहीं करते ना लता? जैसे हम मुर्गों और माँसाहारियों के बारे में बात नहीं करते, हम मरने और जन्म की बातों से भी कतराते हैं। हमने स्त्री और पुरुष के रिश्ते पर भी कभी बात नहीं की। मैं तुम्हें सारे सपने भी नहीं सुना सकता। मैं वे सब बातें भी नहीं बता सकता, जो मुझे दिन रात कचोटती हैं। हम सब ट्रेन में अचानक मिल गए अजनबियों या दो सभ्य साथी कर्मचारियों की तरह ही उम्र भर बात करते हैं। हम कभी शरीर की बात नहीं कर पाते, न ही आत्मा की। दार्शनिक होने का बहुत मन होता है तो भगवान की बात करने लगते हैं। मैं तुम्हारे लिए जो सोचता हूं और जो अपरिभाषित सा स्नेह मेरे पास है, वह मैं नहीं बता सकता। वीरेन्द्र या कोई और तुम्हारे जीवन के बड़े अंश पर अधिकार कर लेगा, यह सोचकर ही मैं काँप जाता हूं। यह पाप या पागलपन नहीं है। यह गंगा या सती सीता जितना पवित्र है, लेकिन तुम्हें कहूंगा तो पाप जैसा बन जाएगा। अहं अस्पष्ट और असहज है लता, जिसे कहना और सुनना ही हमें नहीं सिखाया गया। सबका ज़ोर हमें मुहावरे, लोकोक्तियाँ व्याकरण और कविताओं की सप्रसंग व्याख्याएँ सिखाने पर रहा है। एक समझदार साज़िश के तहत हमें यह विकल्प बताया ही नहीं गया कि कविताएँ गढ़ी भी जा सकती हैं। तुम नहीं जानती लता...इस सदी के सबसे महान कवियों की कविताएँ उनकी आँखों से खून बनकर टपकी हैं और तुम विश्वास नहीं करोगी, जब उन्हें पागलखानों में ले जाया जा रहा थ तो उनका गर्म ख़ून सड़कों पर कविताएँ लिखता हुआ चला। बाद में इन्होंने उन सड़कों को तोड़कर चिकने राजमार्ग बना दिए लता, जिन पर हम फर्राटे से गाड़ियाँ दौड़ाते हुए बड़े-बड़े शहरों से और बड़े-बड़े शहरों की ओर जाते हैं। स्कूल की किताबों में मैंने और तुमने उन कविताओं को कभी नहीं पढ़ा। हमने साखियाँ पढ़ी और उनके ऊपर आधी छुट्टी में परांठे रखकर खाए। हम सब एक गहरे अँधेरे में हैं लता और यह पहला या आखिरी अंधकार नहीं है। हमने बड़ी-बड़ी लाइटें जला ली हैं और हम अपनी अपनी रोशनी के लिए खुश हैं। हम इतने डरपोक हैं कि आँखें बन्द करते हैं तो डर जाते हैं। मैं ये लैम्प, ट्यूबलाइटें, बल्ब, दिए और मोमबत्तियाँ तोड़कर उस लम्बे गहन अँधेरे में आँखें खोलकर सीधा तनकर खड़ा हो जाना चाहता हूं, जैसे हम स्कूल में प्रार्थना में हुआ करते थे और उसके बाद जन-गण-मन गाते थे। मुझमें प्रेम ख़त्म होता जा रहा है लता और मैं सच में तुम पर कोई आरोप नहीं लगाना चाहता, लेकिन इसकी दोषी तुम भी हो। मैं नहीं समझा सकता कि मेरा जीना कितना भयानक है? हम धर्मशालाओं में शादियाँ करेंगे लता, हमें रातों में किसी अकेले कमरे में छिपकर बच्चे पैदा करने होंगे और हम अपने पिताओं को जलाते जाएँगे। यह दुनिया मेरी नहीं है लता। मैं यहाँ नहीं रहना चाहता...मैं थूकता हूं इसके अस्तित्व पर।)

गौरव सोलंकी

Saturday, August 08, 2009

एक दर्द-ए-मोहब्बत है जो पहले की तरह है...

हर अहद में हर चीज़ बदलती रही लेकिन

एक दर्द-ए-मोहब्बत है जो पहले की तरह है।


प्यार का कोई इतिहास तो नहीं है, लेकिन इसका दर्द हमेशा एक जैसा ही है। अगर माना जाए, तो प्यार की शुरुआत दुनिया में आदम और हव्वा के ज़माने से हुई थी। लेकिन प्यार की मिसाल में किसी का नाम आता है, तो विदेश में रोमियो और जूलियट, तो हिंदुस्तान में लैला-मजनू और शीरी-फ़रहाद को प्यार की बेमिसाल मूरत माना जाता है। अपने प्यार के लिए इन्होंने दुनिया की तमाम बंदिशों को हंसते-हंसते पार कर लिया। अपने महबूब के लिए ज़माने के तानों से लेकर गोलियां तक खाईं, लेकिन प्यार का एहसास और दर्द कभी कम नहीं हुआ। तमाम मौसम बदले, रुत बदलीं, वक्त बदला, लोग बदले, लेकिन वो मीठा सा प्यार कभी नहीं बदला।

जब कोई आपसे प्यार का एहसास करता है, तो दिल में एक अजीब से हलचल होती है। कभी-कभी सपनों में किसी की छुअन महसूस सी होती है। कभी-कभी लगता है कि दुनिया में इसके सिवा कुछ भी नहीं है, दुनिया में सबसे हसीन अगर कुछ है, तो सिर्फ़ आपका महबूब और आपका प्यार है। फिर ज़माने की परवाह किसे होती है। आपका प्यार आपसे जितना दूर जाता है, उससे अपनेपन का एहसास और भी बढ़ जाता है। बदलते मौसम के साथ पल-पल प्यार के रंग भी बदलते हैं.. दुनिया और सपनीली हो जाती है... मन में कुछ-कुछ होता है, कई बार लगता है कि ये ज़मीन और आसमान एक क्यों नहीं हो जाते, कई बार दिल चाहता है कि सारा जहान झुककर आपके कदमों में आ गिरे।

बसंत के हसीन मौसम में प्यार को पंख लग जाते हैं। अपने महबूब के साथ सपनों की दुनिया बसाई जाती है... लेकिन वक्त बदला तो प्यार का अंदाज भी बदल गया। बाग-बगीचों और प्रेम पत्रों से निकलकर प्यार रेसत्रां और पार्क में पहुंच गया। लव-लेटर की जगह ई-मेल और एसएमएस ने ले ली... मोबाइल पर बतियाने का जो दौर शुरु होता है, वो घंटो तक चलता है....लंबी बातचीत के बाद भी लगता है, कि अभी तो बात ही क्या हुई है। ऐसे में मोबाइल कंपनियां भी धड़ल्ले से फायदा उठा रही हैं। प्यार के इस एहसास को हर कोई कैश कराने में लगा है। जेब हल्की हो रही है... गर्लफ्रेंड को रिझाने के लिए बाज़ार भी नये-नये नुस्खे ला रहा है।

प्यार का एहसास कराने के लिए वेलेंटाइन डे नाम का एक त्योहार ही चल निकला है। प्यार मॉर्डन हो गया है, लेकिन प्यार करने वाले अब भी ज़माने से नहीं डरते, प्यार पर पहरा लगाने वाले हर दौर में थे और आज भी हैं। आदिम युग में प्यार करने वालों को पत्थर मार-मार कर कुचल दिया जाता था, सलीम और अनारकली को भला कौन भूल सकता है। एक कनीज को अपना प्यार अमर करने के लिए दीवार में चुन जाना कबूल था।... वक्त बदला, सदियां बदली, लेकिन न तो प्यार के दुश्मन बदले, न प्यार का अंदाज़ बदला और न ही प्यार के एहसास में कोई कमी आई। लेकिन अब प्यार पर पहरा लगाने वाले ज़ालिम ही नहीं जल्लाद भी हो गये।

चाहें पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो, या हरियाणा, प्यार की ख़ता सिर्फ़ मौत होती है। वहशियाना मौत, ऐसी मौत जिसमें मां-बाप और भाई-बहन ही अपने जिगर के टुकड़ों का क़त्ले-आम कर देते हैं। बात-बात में पश्चिम की नकल कर मॉडर्न होने का दम भरने वाले हम लोग इस मामले में मॉर्डन बनने की कोशिश कतई नहीं करते। मां-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की छूट खुलेआम देते हैं, समाज के ठेकेदार फ्लेक्सीबिलिटी की बात करते हैं, लेकिन जब कोई ज़माने के सामने अपने प्यार का इज़हार करता है, तो यही ज़माना दीवार बनकर खड़ा हो जाता है।

फिर मज़हब और जात-बिरादरी का रोना रोया जाता है। हिंदू और मुसलमान पर बहस होती है, मांगलिक और गैर मांगलिक पर बहस होती है। हरियाणा की खाप पंचायत के फैसलों को कौन भूला होगा, प्यार कर अपनी नई दुनिया बसाने वाले एक युवक को सिर्फ़ इसलिये मार डाला गया, कि उसने एक ही गोत्र में शादी की थी, लेकिन हुआ क्या? खूब हो-हल्ला मचा, लेकिन वोट के ठेकेदारों के मुंह से उफ़्फ़ तक नहीं निकली... लेकिन सलाम है...प्यार के परिंदों को जिन्होंने हर अहद में अपने प्यार को अमर रखा, और ज़माने की हर दीवार को गिरा दिया।

अबयज़ खान

Tuesday, August 04, 2009

वह बार-बार बुदबुदाती कि मैं बहुत बुरा हूं

ब्लू फिल्म-भाग 5

लता कम्प्यूटर सीखने लगी थी। उसकी नई चीजों को सीखने की ललक देखकर मुझे अचरज होता था। मुझ पर तो पुरानी बातों और यादों का बोझ ही इतना बढ़ता जाता था कि मैं ठीक से जीता रहूं, यही मुझे काफ़ी लगने लगा था। वह अब शाम को एक घंटा और देर से आती थी। तब तक अँधेरा होने लगता था। माँ-पिताजी मुझे उसे लेने जाने के लिए कहते थे, लेकिन मेरा मन नहीं करता था। मैं चुप अँधेरे में पड़ा रहता। माँ पिताजी बूढ़े होते जा रहे थे। मैं उनके लिए भी चिंतित होता था, लेकिन कुछ नहीं कर पाता था। नई सरकार आने में अभी वक़्त था।
लता पड़ोस के चार पाँच बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी। कभी कभी मुझे लगता था कि वह मुझे अपमानित करने के लिए ऐसा कर रही है। उस पर वह दिनभर झूठा लाड़ भी दिखाती थी तो मुझे गुस्सा आता था। वह रात को सोने से पहले मेरे लिए दूध लेकर आती तो मैं उसे डाँट देता था। वह रूआँसी हो जाती और दूध रखकर चुपचाप चली जाती। हमारे घर में दो कमरे थे। एक में मैं सोता था और एक में माँ, पिताजी और लता। मुझे अक्सर बहुत देर में नींद आती थी।
एक दिन रागिनी का फ़ोन आया। फ़ोन माँ ने उठाया। अमूमन मेरे लिए कोई फ़ोन नहीं आता था, इसलिए मैं फ़ोन के बिल्कुल पास भी बैठा होता तो भी फ़ोन नहीं उठाता था। हमारी कई माँएं थीं, इसलिए एक माँ बाहर आँगन धो रही होती थी तो दूसरी दौड़कर फ़ोन उठाने आती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। माँ बहुत अच्छे स्वभाव की थी लेकिन शक्की थी। कोई लड़की मुझे फ़ोन करेगी, यह सोचकर ही वह काँप जाती होगी। रागिनी ने मुझे बुलाने के लिए कहा तो माँ ने ढेर सारे सवालों की झड़ी लगा दी। .....कौन हो, कहाँ से हो, किसकी बेटी हो, क्या काम है..... उसने नाम बताया और अगले सवाल पर फ़ोन काट दिया। वैसे उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। फ़ोन काटना ही था तो बिना नाम बताए काटती। माँ ने मुझसे पूछा कि रागिनी कौन है? मैंने कहा कि मैं किसी रागिनी को नहीं जानता। ऐसा कहते हुए मैंने विशेष ध्यान रखा कि मेरी नज़रें माँ की नज़रों से मिली रहें। उसके बाद दिनभर माँ चुप-चुप खोई खोई सी रही। मैं जानता हूं कि माँ के ख़यालों में एक चित्र बना होगा जिसमें मैं एक सुन्दर लड़की के होठ चूम रहा हूंगा। बैकग्राउंड में हरियाली होगी या दस बाई दस का छोटा सा कमरा। बहुत संभावना है कि माँ ने बैकग्राउंड पर या मुझ पर ध्यान ही नहीं दिया होगा। माँ ने लड़की की आँखें-नाक-कान जाँचे होंगे। कल्पना के चित्र में अच्छे नैन-नक्श वाली लड़की ही आई होगी, इसलिए माँ को हल्की सी संतुष्टि मिली होगी। माँ ने सोचा होगा कि चित्र में कहीं कोने में लड़की की जाति भी लिखी रहती तो अच्छा रहता। फिर शाम को मैंने यादव के घर से रागिनी को फ़ोन किया। उन दिनों दिनभर मेरी आँखें दुखती थीं। मेरी दृष्टि धुंधली होती जा रही थी। मुझे डर लगने लगा था कि कहीं मैं जल्दी ही अंधा न हो जाऊँ। यह डर दुनिया के सबसे बड़े डर की तरह लगता था। रागिनी फ़ोन पर देर तक रोती रही। उसने मुझे बताया कि वह विजय से प्यार नहीं करती और उसके साथ बहुत दुखी है। उसने कहा कि उसे मेरी बहुत याद आती है। उसका रोना और ख़ासकर रोने का कारण मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं खुशी से चिल्लाना चाहता था। मैंने उसे बताया कि मैं उसे कितना प्यार करता हूँ। यह मैंने इतना बताया कि सुनते सुनते वह चुप हो गई और फिर खिलखिलाकर हँसने भी लगी। उसने कहा कि मेरी माँ की बातें सुनकर लगता है कि वह मुझसे बहुत प्यार करती है। मैंने कहा कि हाँ। उसने कहा कि वह मुझसे मिलना चाहती है। मैंने उसे याद दिलाया कि हमने उस दिन सुनार की दुकान के बाहर एक दूसरे को देखा था। उसने कहा कि उस दिन विजय उसके साथ था। मैंने कहा कि हाँ। उसने कहा कि वह शकरकंद खा रही है। मैंने उसे कहा कि मुझे भी खिलाए। उसने पूछा, “फ़ोन में से कैसे खिलाऊँ?”
यह हम पहले भी बहुत बार एक-दूसरे से पूछते थे और हँसते थे। फिर मैंने उसे अपनी आँखें बताई। उसने मुझे जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाने की हिदायत दी। वे बरसात के दिन थे, जब मैंने चलना सीखा था। जब मैंने संसार को ठीक से देखना सीखा था, वे भी बरसात के ही दिन थे। बरसात की ही एक शाम में मैंने रागिनी को पहली बार देखा था। उस फ़ोन के बाद हम बारिश के ही एक दिन मिले। उसने बताया कि वह उसकी एक सहेली शिल्पा का घर था। शिल्पा अकेली रहती थी। सामान से भरे उसके घर को देखकर ऐसा लगता नहीं था, लेकिन रागिनी ने मुझे यही बताया। उस दिन शिल्पा अपने घर की चाबी रागिनी को देकर चली गई थी। हर शहर में इस तरह की आपसी सहयोग की बहुत व्यवस्थाएँ होती थी।
मैं जब पहुँचा तो वह मेरा ही इंतज़ार कर रही थी। उसने हल्की नीली जींस और किसी गहरे रंग का टॉप पहन रखा था। उसके बाल खुले थे। दरवाज़ा खोलते ही वह मुस्कुराई। ड्रॉइंग रूम में टीवी चल रहा था, जिसके चित्र लहरों की तरह नहीं बहते थे। ड्रॉइंग रूम की छत पीली और दीवारें हरी थीं। एक फ़ानूस भी लटक रहा था। मुझे लगा कि मैंने उसे गले लगा लिया है, लेकिन जब उसने सोफे पर बैठने को कहा तो मेरी तन्द्रा टूटी। मैं बैठ गया। वह ख़ुश थी। मैं भी। वह मेरे पास आकर बैठ गई। उसकी जींस मेरी जींस को छू रही थी।
हमारी जान-पहचान के शुरु के दिनों में हम एक साइबर कैफ़े में मिला करते थे। वह पहले जाती थी। मैं क़रीब दस मिनट बाद घुसता था। हम एक ही केबिन में बैठते थे। मैं जब भी जाता, साइबर कैफे वाला मुझे देखकर मुस्कुराता था। मुझे अच्छा लगता था। गर्वीला अच्छा। मुझे कम्प्यूटर के बारे में उतना ही मालूम था, जितना अंटार्कटिका के बारे में था। अंटार्कटिका में बर्फ़ ही बर्फ़ थी, जो वायुमण्डल का तापमान बढ़ते जाने से साल दर साल पिघल रही थी। ओज़ोन परत में एक छेद था जो इसके लिए उत्तरदायी था। फ़्रिज़ से कोई हानिकारक गैस निकलती थी। समुद्रों में पानी का स्तर बढ़ता ही जा रहा था। अंटार्कटिका में लोग नहीं रहते थे। बस इतना ही।
वह केबिन इतना छोटा होता था कि हम न भी चाहते तो भी सटकर बैठना पड़ता और हम चाहते थे, इसलिए और भी सटकर बैठते थे। उसके घर में भी कम्प्यूटर था, इसलिए वह काफ़ी कुछ जानती थी। वह एक दो वेबसाइट भी खोलती थी। वह अपना ईमेल मुझे दिखाती। उसे हमेशा कई लड़कों के प्यार के प्रस्ताव वाले मेल आते थे। वह मुझे पढ़वाती थी। मैं उसकी हथेली और कसकर पकड़ लेता था। हमारी हथेलियाँ पसीज जाती थीं। हम मेल पढ़ते पढ़ते हँसते थे। फिर वह मेरे घुटने पर अपना हाथ रखती थी, अक्सर घुटने से कुछ ऊपर। उसका अर्थ जाने क्या होता था! लेकिन जो भी होता हो, मुझे उत्तेजना होती थी। वह बाल खोल लेती थी। वह बताती थी कि उसने बाल आज ही धोए हैं। मुझे लगता था कि वह रोज़ बाल धोती होगी। मैं यह उससे पूछता था तो वह मेरी नादानी पर हँसती थी। वह मुझे अपने बाल छूकर उनका गीलापन देखने के लिए कहती थी। मैं उसके बालों में उंगलियाँ फिराने लगता था। वह जैसे सर्दी में थरथराती थी और उसकी आँखें बन्द होने लगती थी। उसका चेहरा मेरे चेहरे के क़रीब आता जाता था। मैं दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़कर उसे बेतहाशा चूमने लगता था। उसके होठ, उसकी नाक, माथा, बन्द आँखें, उसके बड़े बड़े कान, गर्दन की नीली नसें, उसकी ब्यूटी बोन और ब्यूटी बोन का गड्ढ़ा। वह मेरे हाथ पकड़कर अपनी छातियों तक ले जाती थी। मैं पागल हो जाता था। वह बार बार बुदबुदाती थी कि मैं बहुत बुरा हूं। मैं उसे इतना देखना चाहता था कि मेरी आँखें कभी बन्द नहीं होती थीं।
वह उन दिनों बहुत सारे वादे करती थी मसलन मेरे बिना वह मर जाएगी और मर भी गई तो भी मुझे भूल नहीं पाएगी। उसके हर वादे पर मुझे लगने लगता था कि अब वह ज़ल्दी ही मुझे छोड़ने वाली है। मैं उसके होठों पर हाथ रख देता था। हम बस में साथ साथ बैठकर पास के शहर तक जाया करते थे और चाय पीकर लौट आते थे। उसे मूँगफलियाँ बहुत पसन्द थीं और मुझे वह।
उस दिन, जब उसकी जींस मेरी जींस को छू रही थी, वह मेरे कंधे पर सिर रखकर सुबकने लगी। उसके बाल मेरे गालों को छू रहे थे। मैंने उससे पूछा कि यह कौनसा हेयर स्टाइल है? उसने भर्राए गले से कहा- लेयर स्टेप। उसने कहा कि उसे अपने पापा की बहुत याद आती है और मेरी भी। उसने बताया कि उसके पापा तीन महीने पहले एक कार दुर्घटना में चल बसे थे। मुझे दुख हुआ। मेरा मन हुआ कि मैं कुछ भी करके उसका दुख मिटा दूं। मैंने उससे कहा कि मैं अभी ज़िन्दा हूं, इसलिए कम से कम मुझे याद करके तो उसे रोना नहीं चाहिए। मैंने कहा कि उसके पापा यदि उसे कहीं से देख रहे होंगे तो उसे रोते हुए तो नहीं देखना चाहेंगे ना!
यह दिलासा देने का बहुत पुराना तरीका था। इस समझाइश ने काम नहीं किया। वह बदस्तूर रोती रही। मैंने कुछ मनगढंत बातें यह कहकर कही कि ऐसा गीता में लिखा है। वे बातें सुनकर वह कुछ शांत होने लगी। मैंने उससे कहा कि मैं उससे बहुत प्यार करता हूं और उसे हमेशा खुश देखना चाहता हूं और उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं। मुझे अपनी बातें कुछ बाज़ारू सी भी लगीं लेकिन मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर, उसकी आँखों में आँखें डालकर ऐसा कहा। वह चुप हो गई और उसने अपने आँसू पोंछ लिए।
मेरे लौटने से पहले हमने मूंगफलियाँ खाईं, चाय पी और एक दूसरे को चूमा। उसने कहा कि वह मुझमें समा जाना चाहती है, लेकिन उसके लिए पहले विजय को अपनी ज़िन्दगी से दूर करना चाहती है। मैंने कहा कि मैं इंतज़ार करूंगा। उसने कहा कि इंतज़ार के अलावा कुछ और भी है, जो मैं उसके लिए कर सकता हूँ। मैंने पूछा, क्या? उसने कहा कि क्या मैं उसे पच्चीस हज़ार रुपए दे सकता हूं? उसे तलाक़ की कार्रवाई के लिए इन रुपयों की ज़रूरत थी। ऐसा उसने मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर, मेरी आँखों में आँखें डालकर पूछा। मैंने कहा कि हाँ। जबकि मैं बेरोज़गार था और मेरे पिता की तनख़्वाह सात हज़ार रुपए महीना थी, माँ की डेढ़ हज़ार और लता ट्यूशन से बारह सौ रुपए कमाने लगी थी, मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर यह वचन दिया।

गौरव सोलंकी

Tuesday, July 28, 2009

ब्लू फिल्म

ब्लू फिल्में हमारे लिए भगवान थीं...

घर के बाहर भीड़ लगी थी। तीन लड़के लता का पीछा करते हुए घर तक आए थे। लता ने तेज़ी से अन्दर घुसकर माँ को बाहर बुला लिया था और बताया था कि कई दिन से ये लड़के ब्यूटीपार्लर से घर तक उसके पीछे आते हैं। माँ उन लड़कों को रोककर गालियाँ देने लगी थी। वे लड़के भी हँस-हँसकर जवाब दे रहे थे। आस-पड़ोस के और राह चलते लोग आ जुटे थे। अच्छा-खासा तमाशा बन गया था।
पिताजी कुछ देर से बाहर आए। तब तक माँ अकेली बोलती रही। उसने लता को अन्दर भेज दिया। मैं घर में नहीं था। मैं यादव के घर में पड़ा रागिनी को याद कर रहा था। कोई पड़ोसी कुछ बोल नहीं रहा था। माँ चिल्लाती-चिल्लाती रोने को हो गई थी। लड़के खड़े बेशर्मी से हँसते रहे थे।
पिताजी चश्मा लगाते हुए बाहर निकले। उन्होंने सफेद कुरता-पायजामा पहन रखा था। उनके चेहरे पर कुछ था कि उनका अध्यापक होना पहली नज़र में ही पता चल जाता था। ऐसा लगता था कि उन्हें मारो तो वे सिर्फ़ धमकाएँगे, मार नहीं सकेंगे। उन तीन लड़कों में जो लड़का ‘मुख्य’ लड़का था, वह गली की एक बूढ़ी औरत को बुला लाया। वह उसके उस दोस्त की माँ थी, जिससे मिलने वे तीनों रोज़ शाम को आते थे। उस बूढ़ी औरत ने चिल्ला-चिल्लाकर इस बात को सत्यापित किया। पिताजी चुप रहे। हो सकता है कि पिताजी कुछ बोले भी हों मगर वह किसी को सुना नहीं। भीड़ और बढ़ गई थी जैसे शाहरुख़ ख़ान की कोई फ़िल्म चल रही हो। फ़िल्म होती तो उस दृश्य में मेरे पिताजी को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया जाता। सब ‘मुख्य’ लड़के की मुस्कुराहट पर तालियाँ बजाते। मैं और लता भी हॉल में बैठकर ऐसी कोई फ़िल्म देख रहे होते तो पिताजी को खलनायक ही समझते। वैसे वे पूरी फ़िल्म के खलनायक या नायक कभी नहीं बन सकते थे क्योंकि वे अध्यापक थे। उनका एक ही सीन होता।
पिताजी ने थोड़ी तेज आवाज़ में उन्हें चले जाने को कहा तो भीड़ को सुना। भीड अब पहले से धीरे फुसफुसाने लगी। यह उन लड़कों को अपमानजनक लगा। मुख्य लड़के ने हँसना बन्द कर दिया। उसके पीछे-पीछे बाकी दोनों लड़के भी गंभीर हो गए। सब वहीं खड़े रहे। फिर अचानक मुख्य लड़का तैश में आ गया और उसने पिताजी को गाली दी।
वह एक लम्बी गली थी, जिसमें हमारा घर था। उस गली के दोनों कोनों पर खड़े आदमियों ने वह गाली सुनी। हमारे घर के पचास मीटर के दायरे में ही साठ-सत्तर लोग होंगे। घरों में बैठे लोगों और छत से देख रहे लोगों के साथ गाय, भैंसों, कुत्तों, चिड़ियों, कबूतरों, मेंढ़कों और चूहों के कानों को जोड़कर ठीक ठीक हिसाब लगाया जाए तो करीब दो हज़ार कानों ने वह गाली सुनी। मेरी जानकारी में पिताजी को ऊँचा तो नहीं सुनता था, लेकिन और कौन सी वज़ह हो सकती है कि पिताजी ने पूछा, “क्या?”

यह ‘क्या’ उन लड़कों को किसी चुटकुले सा लगा और वे हँस दिए। भीड़ चुप, जैसे भीड़ को अजगर सूंघते हों। दो क्षण के लिए भीड़ का सिर झुका और फिर उठ गया। आँखें तीर की तरह हमारी देहरी पर। माँ, जिसे कभी-कभी ऊँचा सुनता था, उसने अपनी बाटा की चप्पल उतारी और लड़के के मुँह पर दे मारी। माँ का निशाना इतना अच्छा नहीं था लेकिन लड़का बचने के प्रयास में नीचे झुक गया तो चप्पल सीधे उसकी नाक पर लगी। भीड़ हँसी, भीड़ फुसफुसाई, अजगर सूंघता हुआ लड़कों के पास आ खड़ा हुआ। लड़के स्तब्ध से कुछ क्षण खड़े रहे और फिर चले गए। पिताजी भीड़ के पार से गली के दूसरे मोड़ को देखते रहे। माँ ने नाली के पास पड़ी अपनी चप्पल उठाई और एक चप्पल पैर में पहने, एक हाथ में लिए भीतर चली गई। भीड़ भी छँट गई।
उस रात माँ ने राजमा की सब्जी बनाई। मैं उसी के साथ रोटियाँ खा रहा था, जब माँ ने मुझे शाम की पूरी घटना सुनाई। मुझे लगा कि उस घटना को सुनकर मुझे ज़ोरों से गुस्सा आना चाहिए था, जो नहीं आया। मैंने और दिनों की अपेक्षा आधी रोटी ज़्यादा ही खाई होगी। माँ बीच-बीच में रोने लगती थी। मुझे दुख होता था। लता अन्दर बैठी किसी पत्रिका का बुनाई विशेषांक पढ़ रही थी। उस रात पिताजी मुझे नहीं दिखे, हालांकि वे घर में ही थे।
शाम को मैं यादव के घर में पड़ा रहा था। मैं रागिनी के गीत गाता रहा था और वह उकताकर अपना ब्लू फ़िल्मों का कलेक्शन उठा लाया था। उसके पिता का ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस था। उनके घर वी.सी.आर. था।

- इसके कितने सही हैं ना यार! बस ऐसे मिल जाएँ एक बार...

- फिर क्या करेगा?

- फिर तो वही बताएगी कि क्या किया?

उसने ऐसा चेहरा बनाया कि उसके दिमाग में बना चित्र मुझे साफ साफ दिख गया। मुझे हँसी आ गई। मैं उठकर बैठ गया और यादव की तरह टकटकी बाँधकर टीवी देखने लगा।

वह ख़ुशी नहीं थी, जो हमें उन फ़िल्मों को देखकर मिलती थी। या तो वह उम्र ऐसी थी या वह समय, या वह शहर, कि हमारा रोने का मन करता था तो भी हम ब्लू फ़िल्में देखते थे, गुस्सा आता था तो भी, प्यार के बिना जीना असंभव लगने लगता, तो भी...

हमारी आँखों की कोरों में इतनी बेचैनी भरी पड़ी थी कि उन दिनों वे फ़िल्में न होती तो हम आत्महत्या कर लेते। उन देशी विदेशी नीली फ़िल्मों ने हमें जिलाए रखा। वे फ़िल्में हमारी भगवान थीं।

गौरव सोलंकी

Tuesday, July 21, 2009

ब्लू फिल्म

यानी हमारी चार माँ हैं?

भाग-3

लता ने कहा - वहाँ देखो, कितने जाले लगे हैं।
और माँ दौड़कर मेज उठा लाई और उस पर चढ़कर फूलझाड़ू से जाले उतारने लगी। मैंने कहा- मुझे और भूख लगी है। माँ दौड़कर रसोई में गई और आटा छानकर गूंथने लगी।
पिताजी ने कहा- मैं आज खाना नहीं खाऊँगा। माँ ने उनकी रोटियों पर थोड़ा ज़्यादा घी चुपड़ दिया। वैसे घी पश्चिमी चिकित्साशास्त्र का दुश्मन था, जो किसी भी रोग में सबसे पहले बन्द करवा दिया जाता था। मैंने देखा कि मेरी तीन माँएं हैं, एक रोशनदान पर टँगी हुई, एक आटा छानती हुई, एक घी चुपड़ती हुई। मैंने लता को दिखाया- देख लता। तीन तीन माँ। - हाँ। उसने भी देखा। मैं दौड़कर बरामदे में बैठे पिताजी के पास गया। - देखो पिताजी, तीन तीन माँएं। - हाँ। उन्होंने भी देखा।
मैंने लता से पूछा- क्या टाइम हुआ है? - साढ़े दस। - फिर तो एक माँ स्कूल में भी गई होगी। - यानी हमारी चार माँ हैं?
- और एक को सुबह मैंने कपड़े धोते हुए भी देखा था। - मतलब पाँच हैं? - हाँ। - यानी घर में हम आठ लोग हैं? पिताजी ने बीच में कहा- नहीं, चार ही हैं।
- पिताजी आपका पेट दर्द कैसा है? पिताजी बीच में बोले तो मुझे याद आया। - खाना खाने के बाद हल्का हल्का होता है। आजकल जी कुछ ठीक नहीं रहता। पिताजी अपना पेट पकड़कर सहलाने लगे। लता उनके लिए पानी लाने चली गई। मैंने कहा कि मेरे भी सीने में बहुत दर्द रहता है। उन्होंने सुना नहीं। लता ने रसोई में से ही सुन लिया था। वह दो गिलास पानी लेकर आई। स्टेनलेस स्टील के गिलास थे जिनपर लता का नाम खुदा हुआ था।
मैंने उससे पूछा, “पानी पीने से दर्द ठीक हो जाता है?”
पिताजी ने कहा, “नहीं, दवा खाने से भी नहीं होता।”
मैंने कहा, “आजकल नकली दवाइयाँ बहुत बनने लगी हैं।” मेरी इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। हम दोनों ने पानी पी लिया।
तकलीफ़ के बदले तकलीफ़ देना प्यार के बदले प्यार देने से ज़्यादा ज़रूरी लगता था। रागिनी एक लड़की का नाम था जिसके दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो कान, दो वक्ष, एक नाक, एक माथा, एक सिर था। रागिनी पहली लड़की नहीं थी, जिससे मुझे प्यार हुआ, और न ही आखिरी थी। वह सब लड़कियों जैसी थी। अब मुझे लगता था कि वह बुरी थी। जिन जिन लड़कियों से मैंने प्यार किया था वे बेहद स्वार्थी लड़कियाँ थीं। उनमें और लड़कियों से अलग कुछ भी नहीं था इसलिए मुझे सब लड़कियाँ बुरी लगने लगी थीं। लेकिन ऐसा सबको नहीं लगता था। ऐसा सबको नहीं लगता था इसलिए इसे खुलकर कहना फ्रस्ट्रेशन कहा जाता।
लेकिन ऐसा था। ऐसा था तो लता भी बुरी लड़की होगी। मेरी अच्छी बहन बुरी लड़की लता गिलास लेकर चली गई।
लता जाते जाते बोली- आज यस बॉस आएगी।
हम सबने अनसुना कर दिया। पिताजी अख़बार उठाकर पढ़ने लगे। मैं उठकर अपने जूते पॉलिश करने चल दिया। लता एक पुराना और एक कम पुराना गाना गुनगुनाने लगी। ऐसे जैसे कि गीत की किसी पंक्ति को गलत सुनकर ‘आज यस बॉस आएगी’ समझ लिया गया हो।
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर...
और नया गाना चालू सा था। वह उसने कुछ मन्द आवाज़ में गाया। आज अभी इसी वक़्त ही मुझको पता चला है...कि मुझे प्यार प्यार प्यार हो गया है...
हमारे घर में बुश कंपनी का एक पुराना टीवी था जिसमें चित्र कभी स्थिर नहीं रहते थे। वे ऊपर से नीचे नदी की तरह लगातार बहते रहते थे। टीवी पर आगे लगी चार घुंडियों में से एक पर वी. होल्ड लिखा हुआ था जिसका अर्थ हममें से किसी को नहीं पता था। उसको घुमाने से नदी का प्रवाह धीमा और तेज होता था और एक सीमा के बाद प्रवाह की दिशा भी उलट जाती थी। हम उसको झटके से लगातार दोनों तरफ ऐसे घुमाते थे जिससे पर्दे पर दृश्य लगभग स्थिर दिखता रहे। यह बहुत मेहनत और धैर्य का काम था। इसके लिए एक व्यक्ति को टीवी के बराबर में बैठे रहना पड़ता था। सब टीवी देख रहे होते थे तो मैं और लता बारी बारी से यह ज़िम्मेदारी संभालते थे। अकेले टीवी देखना बहुत मुश्किल काम लगता था। हम बड़े होते गए तो हमारा टीवी देखना कम होता गया। हमें टीवी न देखने का शौक हो गया था। ‘यस बॉस’ लता की फ़ेवरेट फ़िल्म थी जो उसने कभी नहीं देखी।
मैं और पिताजी शाम को घूमने गए। ऐसा कई सालों बाद हुआ था कि हम बिना काम के एक साथ घर से बाहर निकले हों। मैं लाल दरवाजा, रामनाथ पुल, श्रीकृष्ण मन्दिर, गोल बाज़ार, शहद की छतरी और शहर की और भी बहुत सारी जगहों से बचता था। जिन जिन जगहों पर रागिनी की यादें चिपकी हुई थीं, उन जगहों के पास जाते ही आत्महत्या के ख़याल आते थे। मूंगफली खाना भी मर जाने जैसा लगने लगा था। मुझे लगने लगा था कि मैंने एक बार और प्यार किया तो इस छोटे से शहर में मेरे जाने को कोई जगह नहीं बचेगी। मुझे लगता था कि इसीलिए ज़्यादातर लोग नौकरियों के बहाने से अपने बचपन और जवानी का शहर छोड़ देते होंगे। नए शहरों में नए प्रेम होते होंगे। फिर कुछ साल बाद पैसे देकर तबादला करवाना पड़ता होगा। जिनके पास तबादले के पैसे नहीं होते होंगे, उन्हें खुदकुशी के ख़याल के साथ जीना पड़ता होगा। मैंने अपने पिता की ओर देखा। वे बीस साल से इसी शहर में थे। उनके चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ रही थीं। वे और दुबले होते जा रहे थे। - पिताजी आपने कभी कछुआ देखा है? - नहीं। - आप पढ़ाते तो थे कि बहुत धीरे धीरे चलता है कछुआ। - रोज़गार समाचार देखता रहता है ना? - हाँ पिताजी। हरियाणा में वेकेंसी निकली हैं। - वहाँ तो पैसा चलता है बस। - पैसा कैसे चलता होगा? कछुए की तरह धीरे धीरे तो नहीं ना? उन्हें नहीं सुना।
आधी बातें बिना सुने भी जीवन उसी तरह जिया जा सकता था। वैसे भी हमारे शहर में सुनने को ज़्यादा बड़ी बातें नहीं होती थीं। दो पड़ोसी एक कीकर के पेड़ को लेकर सालों तक झगड़ते रहते थे और फिर अगली पीढ़ी जवान होकर लड़ने लगती थी। लड़के अनजान लड़कियों के लिए झगड़ बैठते थे और हॉकी स्टिक और लाठियाँ लेकर आ जाते थे। अनजान ‘बुरी’ लड़कियों को अक्सर ख़बर भी नहीं होती थी और ख़बर हो जाती थी तो यह गर्व का विषय होता था। लड़के बसों की यात्रा मुफ़्त करवाने के लिए कभी कभार स्कूल कॉलेजों में दस बीस दिन की हड़ताल भी कर देते थे। किसी दिन सरकारी स्कूल का कोई शिक्षक अपने ही छात्रों के हाथों पिट भी जाता था। बसें और सिनेमाहॉल जी भर के तोड़े जाते थे। कोल्ड ड्रिंक की बोतलें उठाकर भाग जाना होता था। पुलिस आँसू गैस छोड़ती थी। आँसू गैस नाइट्रस ऑक्साइड नहीं थी। नाइट्रस ऑक्साइड हँसाने वाली गैस थी लेकिन कुछ भी करवाने वाली गैस का नाम पूछा जाए तो नाइट्रस ऑक्साइड का नाम ही दिमाग में सबसे पहले आता था। नाइट्रस ऑक्साइड की दुनिया में भारी कमी हो गई लगती थी। पुलिस हँसाने वाली गैस छोड़ती तो शायद दुनिया ज़्यादा बेहतर बन सकती थी।

गौरव सोलंकी

Tuesday, July 07, 2009

ब्लू फिल्म

गौरव सोलंकी हिंदयुग्म का एक बड़ा नाम है....लगभग दो साल के हमारे रिश्ते में वो मुझसे उम्र की कई सीढियां आगे चढ़ गए हैं....हिंदयुग्म के कई सुख-दुख हमने साझा किए....आजकल उन्हें महान बनने की ज़िद है....सो, ब्लॉगिंग में वक्त ज़ाया नहीं करते...सिर्फ कहानियां लिखते हैं.....कहानियां ऐसी जैसे किसी कविता को हर सिरे से खींचकर लंबा कर दें और कहानी बन जाए....चूंकि, उनसे ज़रा पर्सनल ताल्लुक भी है, तो कह सकता हूं कि ज़िंदगी के दिनों को भी फिलहाल किसी नज़्म की तरह पढ़ रहे हैं जो उनकी समझ से बाहर हो...बैठक पर अब इस लंबी कहानी के ज़रिए कुछ हफ्तों तक नज़र आते रहेंगे...क्या पता, तब तक महान ही बन जाएं.... इत्तेफाक से आज गौरव का जन्मदिन भी है.....

भाग-1

भूखी गाली, भूखा घूंसा, भूखा सपना.....

जिस तरह ज़रूरी नहीं कि चाट पकौड़ियों की सब कहानियाँ करण-जौहरीय अंदाज़ में चाँदनी चौक की गलियों से ही शुरु की जाएँ या बच्चों की सब कहानियाँ ‘एक बार की बात है’ से ही शुरु की जाएँ या गरीबी की सब कहानियाँ किसानों से ही शुरु की जाएँ या कबूतरों की सब कहानियाँ प्रेम-पत्रों से ही शुरु की जाएँ, उसी तरह ज़रूरी नहीं कि सच्चे प्रेम की सब कहानियाँ सच से ही शुरु की जाएँ। इसीलिए मैंने रागिनी से झूठ बोला कि वही पहली लड़की है, जिससे मुझे प्यार हुआ है। ऐसा कहने से तुरंत पहले वह अपने विश्वासघाती प्रेमी की कहानी सुनाते सुनाते रो पड़ी थी। “तुम रोते हुए बहुत सुन्दर लगती हो”, यह कहने से मैंने अपने आपको किसी तरह रोक लिया था। फिर मैंने उसके लिए एक लैमन टी मँगवाई थी। मैंने सुन रखा था कि लड़कियों को खटाई पसन्द होती है, खाने में भी और रिश्तों में भी।
उसे कोई मिनर्वा टाकीज पसन्द था। मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह इमारत दुनिया के किस कोने में है। वह देर तक उसके साथ वहाँ बिताए हुए ख़ूबसूरत लम्हे मुझे सुनाती रही। बीच में और एकाध बार मैंने दोहराया कि वही पहली लड़की है, जिससे मुझे प्यार हुआ है। मेरी आँखें उसकी गर्दन के आसपास कहीं रहीं, उसकी आँखें हवा में कहीं थीं। मैंने सुन रखा था कि लड़कियों के दिल का रास्ता उनकी गर्दन के थोड़ा नीचे से शुरु होता है। मैं उसी रास्ते पर चलना चाहता था। वैसे शायद सबके दिल का रास्ता एक ही जगह से शुरु होता होगा। सबका दिल भी एक ही जगह पर होता होगा। मैंने कभी किसी का दिल नहीं देखा था, लेकिन मैं फिर भी इस बात पर सौ प्रतिशत विश्वास करता था कि दिल सीने के अन्दर ही है। हम सब को इसी तरह आँखें मूँद कर विश्वास करना सिखाया गया था। हम सब मानते थे कि जो टीवी में दिखता है, अमेरिका सच में वैसा ही एक देश है। यह भी हो सकता है कि अमेरिका कहीं हो ही न और किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए कोई बड़ा सैट तैयार किया गया हो, जिसे अलग अलग एंगल से बार बार हमें दिखाया जाता रहा हो। जो लोग अमेरिका का कहकर यहाँ से जाते हों, उन्हें और कहीं ले जाकर कह दिया जाता हो कि यही अमेरिका है और फिर इस तरह एमिरलैंड अमेरिका बन गया हो। क्या ऐसा कोई वीडियो या तस्वीर दुनिया में है, जिसमें किसी देश के बाहर ‘अमेरिका’ का बोर्ड लगा दिखा हो? लेकिन टीवी में देखकर विश्वास कर लेना हमारी नसों में इतने गहरे तक पैठ गया था कि कुछ लोग अमेरिका न जा पाने के सदमे पर आत्महत्या भी कर लेते थे। ऐसे ही कुछ लोग प्रेम न मिलने पर भी मर जाते थे, चाहे प्रेम सिर्फ़ एक झूठी अवधारणा ही हो।
लेकिन डॉक्टर समझदार थे। कभी किसी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में नहीं लिखा गया कि अमुक व्यक्ति प्यार की कमी से मर गया। यदि दुनिया भर की आज तक की सब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी जाएँ तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि दुनिया में हमेशा प्यार बहुतायत में रहा। लोग सिर्फ़ कैंसर, पीलिया, हृदयाघात और प्लेग से मरे।
वह एक पुराना शहर था जिसे अपने पुराने होने से उतना ही लगाव था जितना वहाँ की लड़कियों को अपने पुराने प्रेमियों से। रागिनी ने मुझे समझाया कि लड़के कभी प्यार को नहीं समझ सकते। मैंने सहमति में गर्दन हिलाई। गर्दन के थोड़ा नीचे मेरे दिल तक जाने वाला रास्ता भी उसके साथ हिला। फिर हम एक मन्दिर में गए, जिसके दरवाजे पर कुछ भूखे बच्चे बैठे हुए थे। अन्दर एक आलीशान हॉल में सजी सँवरी श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने वह सिर झुकाए कुछ बुदबुदाती रही। मैं इधर उधर देखता रहा। जब हम लौटे तो भूखे बच्चे भूखे ही बैठे थे। उनमें से एक ने दूसरे को एक भूखी गाली दी, जिस पर भड़ककर दूसरे ने पहले के पेट पर एक भूखा घूंसा मारा। और बच्चे भी लड़ाई में आ मिले। वहाँ भूखा झगड़ा होता रहा। अपने में खोई रागिनी ने यह सब नहीं देखा। मैंने जब उसे यह बताया तो उसने कहा कि भूख बहुत घिनौना सा शब्द है और कम से कम मन्दिर के सामने तो मुझे मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। यह सुनकर मेरा एक भूखा सपना रोया। मैं हँस दिया।
वहीं पास में एक सफेद पानी की नदी थी जो दूध की नदी जैसी लगती थी। सर्दियों की रातों में जब उसका पानी जमने के नज़दीक पहुँचता होगा तो वह दही की नदी जैसी बन जाती होगी। उस नदी के ऊपर एक लकड़ी का पुल था जिस पर खड़े होकर लोग रिश्ते तोड़ते थे और दो अलग-अलग दिशाओं में मुड़ जाते थे। उस पुल का नाम रामनाथ पुल था। मुझे लगता था कि रामनाथ बहुत टूटा हुआ आदमी रहा होगा।
हम उस पुल के बिल्कुल बीच में थे कि एकाएक रागिनी रुककर खड़ी हो गई। रिश्ते टूटने वाला डर मुझे चीरता हुआ निकल गया। वह पुल के किनारे की रेलिंग पर झुकी हुई थी। फिर उसने कुछ पानी में फेंका, जो मुझे दिखा नहीं।
मैंने कहा- रागिनी, तुम ही दुनिया की एकमात्र ऐसी लड़की हो, जिससे प्यार किया जा सकता है।
वह गर्व से मुस्कुराई। वह मुस्कुराई तो मुझे अपने कहने के तरीके पर गर्व हुआ।
वह एक ख़ूबसूरत शाम थी, जिसमें एक अधनंगी पागल बुढ़िया पुल पर बैठकर ढोलक बजा रही थी और विवाह के गीत गा रही थी। कॉलेज में पढ़ने वाले कुछ लड़के वहाँ तस्वीरें खिंचवा रहे थे। रागिनी ने अपना दुपट्टा हवा में उड़ा दिया जो सफेद पानी में जाकर गिरा। उसका ऐसा करना उन लड़कों ने अपने कैमरे में कैद कर लिया। चार लड़कों वाली फ़ोटो के बैकग्राउंड में दुपट्टा उड़ाती रागिनी।
उन चारों लड़कों को उससे प्यार हो गया था। वे जीवन भर वह तस्वीर देखकर उसे याद करते रहे। उन्होंने एक दूसरे को यह कभी नहीं बताया।
फिर रागिनी ने अपना मुँह मेरे कान के पास लाकर धीरे से कहा कि वह मुझे कुछ बताना चाहती है। उसके कहने से पहले ही मैंने आँखें बन्द कर लीं। उसने हाथ हवा में उठाकर कोई जादू किया और उसके हाथ में शादी का एक कार्ड आ गिरा। वह जादू जामुनी रंग का था जिस पर लिखा था, ‘रागिनी संग विजय’।
यह बहुत पहले ही किसी ने तय कर दिया था कि सब शादियों के निमंत्रण पत्र गणेश जी के चित्र से ही शुरु किए जाएँ। कहानी यहीं से आरंभ हुई....

(क्रमश:)

गौरव सोलंकी

Tuesday, June 23, 2009

जूतमपैजार से प्रेमिका के द्वार तक....

ऐसा मेरे साथ पता नहीं भाई साहब क्यों होता है कि दो बच्चों को भरा पूरा बाप होने के बाद भी सुबह सैर को जाते-जाते पांव अनायास ही जूतमपैजार हुई प्रेमिका के द्वार की ओर यकायक मुड़ जाते हैं। क्या आप के साथ भी ऐसा होता है ?

अब पता नहीं बंदे की किस्मत ही खराब है या आदमी सच्ची को गलती का पुतला है। आदमी भी क्या कुत्ती(यहां आप बीप की आवाज़ के साथ पढ़ें) चीज है भाई जी, सेहरा बांध कर बाजे गाजे, पियक्कड़ दोस्तों की टोली के साथ दारू-शारू पीकर, बूढ़ी घोड़ी को रूलाता, अग्नि को साक्षी मानकर ब्याह कर किसी और को लाता है और प्रेम किसी और से कर बैठता है। आह री जिंदगी!

जिस प्रेमिका के चक्कर में पड़ लोक-लाज को लात मार सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेंगे पर रख धर्म बदल, कर्म बदल दो बच्चों को एक्स बाप की यादों के सहारे छोड़ अपनी पत्नी के सिंदूर में से चुटकी भर सिंदूर अपनी प्रेमिका को दे शान से सबकी थू थू को थू थू करता हनीमून पर निकल पड़ा था वैवाहिक जीवन में एक नया इतिहास रचने तो समाज ने पता नहीं तब क्या क्या नहीं कहा था। समाज का क्या? इसे तो कुछ न कुछ कहना ही होता है। उम्र भर एक ही पत्नी के पल्लू के साथ बंध कर रहो तो भी कुछ न कुछ कहता ही है। मेरा तो मानना है कि आम आदमी को भी जिंदगी में कम से कम एक बार सच्चा प्यार जरूर करना चाहिए। विवाहेतर प्रेम कोई बड़े लोगों की बपौती नहीं। विवाहेतर प्रेम पर सबका हक है। इसलिए जब दाव लगे तब सही।

यारो! ये तो अपनी हिम्मत थी कि टांगों तक बाल सफेद हो जाने के बाद भी हमने इश्क को जिंदा रखने के लिए एक बार फिर सिर ओखली में दे डाला। सबने कहा, "हमारा धर्म केवल एक बार ही ओखली में सिर देने की इजाजत देता है।´ कोई बात नहीं , मुझे तो बस ओखली में सिर देने को जुनून था सो ऐसे भी तो वैसे भी कर दे दिया।

समाज को और तो सब कुछ पसंद आता है पर विवाहित का किसी और से प्यार करना रास क्यों नहीं आता? मैं समाज से पूछता हूं कि विवाह होने के बाद क्या आदमी के भीतर का प्रेमी मर जाना चाहिए? एक ही खूंटे से पुरूष को क्यों बांध कर रखना चाहते हो....हे समाज सुधारकों! पुरूष प्रधान समाज में भी पुरूष के साथ ऐसी ज्यादती! जहां पहले और केवल पहले प्यार के विशुद्ध प्रेमी भी रहते हैं खटपट तो वहां भी होती है। और अपना प्यार तो ....

मुझे पता नहीं लाख बदनाम होने के बाद भी किस आकर्षण ने खींचा कि मैं कल सुबह निकला तो था सेहत सुधार के लिए और जा पहुंचा फिर प्रेमिका के घर। जो प्रेमिका मेरे वियोग में पहले बीसियों नींद की गोलियां खाने के बाद भी न सो पाती थी तब ठाठ से सोई थी।

मुझे ट्रैक सूट में हांफते देख मेरी प्रेमिका की मां ने मुस्कारते हुए पूछा,` और कैसे हो मेरी बेटी को हीरोइन बनाने वाले?´

`जहाज का पंछी अब जहाज पर लौट आना चाहता है।´

`पुराने जहाज का क्या होगा?´ कुछ कहने के बदले मैं चुप रहा।

`हमारी किश्ती में छेद डालकर इतने दिन कहां रहे?´

` विदेश चला गया था।´

` वहां फिर कोई धर्म तो नहीं बदल आए?´

` बदलता तो अखबार में पढ़ नहीं लेतीं आप। खुदा कसम खाकर कहता हूं कि अब जीना छोड़ दूंगा पर ये साथ न छोड़ूंगा। ´

` भौंरें और पतियों पर विश्वास करना है तो कठिन है, पर चलो दिल लुभाने के लिए कर लेती हूं। बेटी! देख तेरा भौंरा लौट आया है।´

`तुम कहां थे इतने दिन हे मेरे प्राणनाथ?´

`प्राणनाथ रास्ता भटक गया था हे मेरी प्रिय!´

` अब तो छोड़कर कहीं नहीं जाओगे न? तुम अगर अबके मुझे छोड़कर गए तो मैं सच्ची को आत्महत्या कर लूंगी। देखो तो समाज ने हमारा हुक्का पानी बंद कर दिया।´

` करने दो। दो प्यार करने वालों के साथ ये और कर ही क्या सकता है।´

`देखो सेकिंड हैंड पति, समाज ने हमारे पुतले जलाने शुरू कर दिए।´

` इससे तो हमारे प्रेम की उम्र ही बढ़ेगी। बट, आलरेडी विवाहित पुरूष पर इतना विश्वास ठीक नहीं प्रिय!´

मैंने अपनी ओर से फ्री होते हुए उसे वैधानिक चेतावनी दी ताकि कल को मुझे और ग्लानि न हो।

`अब विश्वास करने के सिवाय और मेरे पास बचा भी क्या है मेरे भी प्राणनाथ!´
हाय रे प्रेमिका की विवशता!

` चलो, चलो, प्रेस वाले भी आए हैं। एक फैमिली फोटो हो जाए।´ सास ने दनदनाते हुए कहा। ऐसे दामाद किसी-किसी सास को ही नसीब होते हैं न भाई साहब!

`स्माइल प्लीज!´ प्रेस फोटोग्राफर ने कहा तो मुझे लगा जैसे मैं पहली पत्नी के साथ होऊं।

डॉ. अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.