Tuesday, September 01, 2009

मेरी बहन लता का बिना नाम वाला प्रेमी सपने में दिखा ...

ब्लू फिल्म भाग-8

पिताजी किसी का उधार चुकाने के लिए बैंक से बीस हज़ार रुपए निकलवाकर लाए थे। शायद किसी बाहर के आदमी को भनक लग गई होगी। उस दोपहर मैं अकेला घर में था, जब दो लड़के घर में घुस आए। बाहर का दरवाज़ा खुला छूट गया था। एक के हाथ में देसी कट्टा था। उसने मेरी कनपटी पर उसे रख दिया और बीस हज़ार रुपए माँगे। मैं डर गया। मैंने अन्दर जाकर बक्से में से रुपए लाकर उसे दे दिए। वे चले गए। मैं उनके जाने के बाद चिल्लाया। गली में उस वक़्त कोई नहीं था, इसलिए किसी ने उन्हें देखा भी नहीं होगा। यह कहानी मैंने माँ और पिताजी के आने पर सुनाई। उनके चेहरे, आँखों और शरीर की जो प्रतिक्रिया थी, उसे विशेषणों का इस्तेमाल करके नहीं समझाया जा सकता। उसे वह व्यक्ति कुछ कुछ समझ सकता है, जिसने आठ सौ रुपए महीना कमाने वाले स्कूल मास्टर के बच्चों को तनख़्वाह वाली शाम घर की छत पर खड़े होकर पिता की बाट जोहते देखा हो। वह कुछ और अधिक समझ सकता है जिसने उनकी लकड़ी जैसी टाँगों और खुरदरे हाथों पर भी ग़ौर किया हो। वे भी कुछ कुछ समझ सकते हैं जिन्होंने जीवविज्ञान के प्रेक्टिकल में बेहोश मेंढ़क काटते हुए ग़लती से उसकी आँखों में देख लिया हो या जो जेठ की गर्मी में घर्र-घर्र करते टेबल फैन के आगे चौथे नम्बर की खाट पर सोए हों और उमस भरी काली रात हो, जिसमें तारे न दिखाई देते हों।
मुझे महसूस होता था कि मैं जंगल के किसी छोटे पेड़ पर बने घोंसले में बैठा नीला कबूतर हूं और पेड़ के तने के पास बहुत सारी जंगली बिल्लियाँ बैठी हैं। मैं उनसे प्रेम करता हूं और उन्हें भूखा मरते नहीं देख सकता, इसलिए उन्हें दूसरे कबूतरों का पता बता देता हूं। दूसरे कबूतर सफेद हैं, जिन्हें शाँति की झूठी तलाश में उड़ाया गया है। बिल्लियाँ लड़कियों जैसी थी।
कुछ दिनों तक रागिनी मुझसे ज़्यादा बातें करने लगी थी। उन दिनों हमने बर्फ़ से ढके ऊँचे सफेद पहाड़ों पर तिकोनी छत वाली
झोंपड़ियों में हनीमून के सपने देखे। उन सपनों में हमने एक दूसरे की कसमें खाई और चिकोटियाँ काटीं। हमने आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर एक दूसरे को ढूंढ़ने छूने का खेल खेला, जिसमें मैं बार-बार हारा। मैंने उससे कहा कि मेरी आँखें ठीक हो जाएँगी तो मैं जीतूंगा। उसने सुना और वह भूल गई। उसने मुझसे यह भी कहा कि मैंने पहले उसे आँखों की तकलीफ़ के बारे में क्यों नहीं बताया? मैंने कहा कि मैंने बताया था। उसने कहा, नहीं। मुझे भी ऐसा याद आ गया कि मैंने नहीं बताया था। हम हँसे, मुस्कुराए।
हम साइकिल पर बैठकर निकलते और वह किसी ढलान वाली सड़क पर से मुझे गहराई तक ले जाती। हम अकेले पवित्र पेड़ों पर लाल चूनरें बाँधते और उनके नीचे सो जाते। सपने में सो जाना, सोते हुए सपने देखने का उल्टा था। जागने के सपनों में सो जाना दुविधा में डाल देता था कि सो रहे हैं या जाग रहे हैं? नींद के सपनों में सोना दो बार सोना था। इस तरह दो बार जागना नहीं हो सकता था। जागना एक ही बार होता। फिर भी जागना सोने से लम्बा खिंच जाता था।
मैंने एक रात सोते हुए सपने में लता को उस लड़के के साथ देखा जो उसके पीछे आता था और जिससे वह प्रेम करने लगी थी। मैं लता से उसका नाम भी पूछना भूल गया था, इसलिए वह सपने में बिना नाम के ही दिखा। मैंने लता को लगभग निर्वस्त्र देखा और चौकंकर जग गया। दुनिया का वह हिस्सा, जिसे हम अक्सर फास्ट फॉरवर्ड करके अपनी आँखों के आगे से हटा देना चाहते हैं, वही केकड़े की तरह हमारी पुतलियों पर चिपककर बैठ जाता है और हर समय दिखाई देता है। आँखें बन्द कर लेने पर भी। मैं न चाहते हुए भी उसके रिश्ते के प्रति असहज था। अपना ध्यान बाँटने के लिए मैंने कुछ और चीजों के बारे में सोचना शुरु कर दिया, जैसे कश्मीर समस्या का क्या हल निकल सकता है या गोल्फ़ सच में कोई खेल है या नहीं? मैंने अख़बार में गोल्फ़ खेलने वाले लोगों के बारे में पढ़ा ज़रूर था, लेकिन मैं एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता था जिसे गोल्फ़ खेलना आता हो। यादव के पिता अमीर थे और उनके घर में फ़्रिज़ भी था, लेकिन वह भी किसी ऐसे आदमी को नहीं जानता था। कुछ साल पहले तक मैं समझता था कि यह किसी जानवर का नाम है। मैंने एक दोपहर लता से पूछा,” तुम्हारा लौंग और इलायचियों के बारे में क्या ख़याल है?” घर में हम दोनों ही थे। वह अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी।
- ख़याल मतलब क्या? -
मतलब तुम क्या सोचती हो?
वह हँस पड़ी- कोई लौंग इलायची के बारे में क्या सोचेगा भला? -
हम अपने शब्दों को खाते जा रहे हैं। मुझे लगता है कि बीस साल बाद मैं तुमसे लौंग और इलायची के बारे में पूछूंगा तो शायद तुम इनका नाम भी सालों के बाद सुन रही होगी...तुम चौंक जाओगी। यह और बात थी कि मैं बीस साल नहीं जिया। वह कुछ सेकंड रुककर मुझे देखती रही और फिर लिखने लगी। -
क्या लिख रही हो? -
कम्प्यूटर के नोट्स हैं... -
मुझे चिढ़ सी है कम्प्यूटर से। -
क्यों?
उसने हैरानी से मेरी ओर देखा। -
यूं ही। बहुत सी चीजों से है...बिना वज़ह...
- तुम्हें थोड़ा आध्यात्मिक हो जाना चाहिए। -
और बादाम के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है? - हम उसे भी खाते जा रहे हैं। है ना?
-तुम कुछ नया नहीं सोच सकती। मुझे याद नहीं कि मैंने बादाम कब खाए थे? - मैंने तो कभी नहीं खाए। मुझे याद है। - अगर हम अपने दरवाज़े के बाहर...दहलीज़ पर खड़े होकर या बेहतर होगा कि किसी ऊँचे पत्थर पर खड़े होकर चिल्लाकर यही बात कहें तो क्या लोग हमारा यक़ीन करेंगे? - मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा चिल्लाऊँगी। चिल्लाने का मौका मिले तो मेरे पास इससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी बातें हैं कहने के लिए...
- मैं चिल्लाना चाहता हूं लता।
- मैं सही कह रही हूं कि तुम्हें थोड़ा धार्मिक हो जाना चाहिए।
- पहले तुमने आध्यात्मिक कहा था।
- मुझे तो दोनों एक से ही लगते हैं।
- कौन दोनों?
- तुम और बादाम।

ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसी। मैं मुस्कुरा उठा।
- नाम क्या था उस लड़के का?
- किस... (‘किस’ पर उसका और उसकी हँसी का अचानक रुकना मुझे अच्छा नहीं लगा। मुझे उस वक़्त यह नहीं पूछना चाहिए था।)
लड़के का? - जिसने पिताजी को गाली दी थी।
वह चुप हो गई और चुप ही रही। मैं हमेशा बातों को गलत ढंग से शुरु करता था। मैं अक्सर वह सिरा पकड़ता था, जिसके बाद संवाद की संभावनाएँ ही समाप्त हो जाती थीं। मैंने कहा- माँ बूढ़ी हो रही है। माँ के घुटनों में दर्द रहता है। - माँ ने कहा तुमसे?
- नहीं, वह कहेगी नहीं। - देखो तुम उन्हें बताना मत प्लीज़। - तुम भाग तो नहीं जाओगी?
- मुझे नहीं पता...
- हमारे पास कैमरा होता तो मैं तुम्हारी फ़ोटो खींचकर रख लेता। मैं चाहता था कि वह कह दे कि इसकी क्या ज़रूरत है? मैं कहीं भागी नहीं जा रही। लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा। मैं बोला- मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे।
- यह सब मत सोचा करो। यह डर सबको लगता है।
- बड़ी बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम ख़ुद उन्हें जलाएँगे लता। मुझे जलाना होगा...
- अच्छा अब चुप हो जाओ बस...
- माँ की आँखें भी जल जाएँगी लता...माँ के बाल...माँ की हथेलियाँ। जाने क्या हो रहा था! मैं बेचैन हो उठा। यदि वह फ़िल्म का दृश्य होता तो लता मेरे लिए पानी लेकर आती। पानी पीकर मैं कुछ बेहतर महसूस करता।
- उसका नाम वीरेन्द्र है।
........
...............
(हम बहुत सी चीजों के बारे में कभी बात नहीं करते ना लता? जैसे हम मुर्गों और माँसाहारियों के बारे में बात नहीं करते, हम मरने और जन्म की बातों से भी कतराते हैं। हमने स्त्री और पुरुष के रिश्ते पर भी कभी बात नहीं की। मैं तुम्हें सारे सपने भी नहीं सुना सकता। मैं वे सब बातें भी नहीं बता सकता, जो मुझे दिन रात कचोटती हैं। हम सब ट्रेन में अचानक मिल गए अजनबियों या दो सभ्य साथी कर्मचारियों की तरह ही उम्र भर बात करते हैं। हम कभी शरीर की बात नहीं कर पाते, न ही आत्मा की। दार्शनिक होने का बहुत मन होता है तो भगवान की बात करने लगते हैं। मैं तुम्हारे लिए जो सोचता हूं और जो अपरिभाषित सा स्नेह मेरे पास है, वह मैं नहीं बता सकता। वीरेन्द्र या कोई और तुम्हारे जीवन के बड़े अंश पर अधिकार कर लेगा, यह सोचकर ही मैं काँप जाता हूं। यह पाप या पागलपन नहीं है। यह गंगा या सती सीता जितना पवित्र है, लेकिन तुम्हें कहूंगा तो पाप जैसा बन जाएगा। अहं अस्पष्ट और असहज है लता, जिसे कहना और सुनना ही हमें नहीं सिखाया गया। सबका ज़ोर हमें मुहावरे, लोकोक्तियाँ व्याकरण और कविताओं की सप्रसंग व्याख्याएँ सिखाने पर रहा है। एक समझदार साज़िश के तहत हमें यह विकल्प बताया ही नहीं गया कि कविताएँ गढ़ी भी जा सकती हैं। तुम नहीं जानती लता...इस सदी के सबसे महान कवियों की कविताएँ उनकी आँखों से खून बनकर टपकी हैं और तुम विश्वास नहीं करोगी, जब उन्हें पागलखानों में ले जाया जा रहा थ तो उनका गर्म ख़ून सड़कों पर कविताएँ लिखता हुआ चला। बाद में इन्होंने उन सड़कों को तोड़कर चिकने राजमार्ग बना दिए लता, जिन पर हम फर्राटे से गाड़ियाँ दौड़ाते हुए बड़े-बड़े शहरों से और बड़े-बड़े शहरों की ओर जाते हैं। स्कूल की किताबों में मैंने और तुमने उन कविताओं को कभी नहीं पढ़ा। हमने साखियाँ पढ़ी और उनके ऊपर आधी छुट्टी में परांठे रखकर खाए। हम सब एक गहरे अँधेरे में हैं लता और यह पहला या आखिरी अंधकार नहीं है। हमने बड़ी-बड़ी लाइटें जला ली हैं और हम अपनी अपनी रोशनी के लिए खुश हैं। हम इतने डरपोक हैं कि आँखें बन्द करते हैं तो डर जाते हैं। मैं ये लैम्प, ट्यूबलाइटें, बल्ब, दिए और मोमबत्तियाँ तोड़कर उस लम्बे गहन अँधेरे में आँखें खोलकर सीधा तनकर खड़ा हो जाना चाहता हूं, जैसे हम स्कूल में प्रार्थना में हुआ करते थे और उसके बाद जन-गण-मन गाते थे। मुझमें प्रेम ख़त्म होता जा रहा है लता और मैं सच में तुम पर कोई आरोप नहीं लगाना चाहता, लेकिन इसकी दोषी तुम भी हो। मैं नहीं समझा सकता कि मेरा जीना कितना भयानक है? हम धर्मशालाओं में शादियाँ करेंगे लता, हमें रातों में किसी अकेले कमरे में छिपकर बच्चे पैदा करने होंगे और हम अपने पिताओं को जलाते जाएँगे। यह दुनिया मेरी नहीं है लता। मैं यहाँ नहीं रहना चाहता...मैं थूकता हूं इसके अस्तित्व पर।)

गौरव सोलंकी

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8 बैठकबाजों का कहना है :

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

बहुत खूब....अच्छा लिखा
धन्यवाद!!!

निर्मला कपिला का कहना है कि -

दिल को छू गयी ये भावनात्मक अभिव्यक्ति। इतनी संवेदना आँख नम कर गयी शुभकामनायें

कुश का कहना है कि -

Jabardast...!

श्रीमती अमर भारती का कहना है कि -

सुन्दर अभिव्यक्ति।
धन्यवाद!

Manju Gupta का कहना है कि -

मानव के स्वभाव की यथार्थ , लाजवाब अभिव्यक्ति है .बधाई .

Nitish Raj का कहना है कि -

अच्छी पेशकश।

Anonymous का कहना है कि -

bluddy .....,, who is interested in this nonsense article....,,,, there is nothing in it except garbage of gaurav solanki's thoughts......,,,,,,,Hindyiyugm is going mad,,,,,,,....for publishing this....,,,, must be paid,,,,...

Shamikh Faraz का कहना है कि -

मुझे लगता है की अब कुछ ज्यादा लम्बी हो रही है. कुछ बातें बेज़रूरत लग रही हैं.

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