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Thursday, June 03, 2010

क्या इस देश में कोई वकील बनना चाहता है?

देश में करियर बनाने के विकल्पों पर बात हो तो शायद ही कोई युवा होगा जो ये कहेगा कि हमें तो वकील बनना है। ऐसी हालत तब है जब देश में कम से कम 900 विधि (यानी लॉ) कॉलेज हैं और 14 उच्चस्तरीय केंद्रीय विधि संस्थान हैं। अगर कुछ साल पहले (दस साल) तक की बात करें तो लॉ कॉलेजों का ये आंकड़ा देश में मौजूद कुल इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों की संख्या पर भी बीस पड़ता था...(इन दो विभागों से तुलना इसीलिए क्योंकि देश में कैरियर के तौर पर इन्हीं दो विकल्पों को रामबाण माना जाता रहा है)। विडंबना ये है कि आज इंजीनियरिंग के पेशे में उम्र में बित्ते भर के छोकरे लाखों-करोड़ों में खेल रहे हैं और वकीलों की हालत ऐसी है कि ज़्यादातर दोधारी पतलून पहनकर दस-बीस रुपये की दिहाड़ी का जुगाड़ ढूंढते उम्र गुज़ार देते हैं ! ऐसा नहीं है कि देश में लॉ कॉलेज से निकलने वाले छात्रों को चमचमाता भविष्य नसीब ही नहीं होता, मगर उनकी संख्या बेहद कम है। ज़रा सोचिए, जिस देश में करोड़ों मामले तारीख के इंतज़ार में बरसों फाइलों में दबे रहते हैं, वहां इतने लॉ कॉलेज होने के बावजूद ऐसी दुर्दशा क्यों है ? अमूमन हर छोटे-बडे विश्वविद्यालय में विधिशास्त्र का अलग विभाग होता ही है। मगर, उन विभागों की दुर्दशा प्राइमरी स्कूलों से भी बदतर होती है। ऐसे में कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उन संस्थानों से वकालत की डिग्री लेकर निकले विधि विशेषज्ञ ऐसी समझ रखते हों कि देश की सबसे विश्वसनीय संस्था न्यायपालिका को दुरुस्त बनाए रखने में अहम योगदान दे सकें।
दरअसल, हाल ही में विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में इन्हीं सब मुद्दों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि विधि की शिक्षा में हर इलाके के लोगों को समान अवसर नहीं मिले तो सिर्फ वरिष्ठ जजों या अधिकारियों के बेटे ही जज की कुर्सी तक पहुंच पाएंगे। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उपस्थित थे और उन्होंने भी माना कि देश में विधि शिक्षा दोहरे तरीके से चल रही है और छोटे शहर-बड़े शहर, छोटे-संस्थानों-बड़े संस्थानों का फर्क वकीलों के स्तर पर साफ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि 50 साल पहले पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि हमारे देश में विधि शिक्षा का स्तर दुनिया के मंच पर कहीं भी नहीं ठहरता और इसमें सुधार की ज़रूरत है। पचास साल बाद भी हालात और बदतर ही हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री या संबंधित मंत्री सिर्फ चिंता ज़ाहिर कर क्या बदलाव ला देंगे। आपके पास शक्तियां हैं, सोच है, लोग हैं, फिर आपको विधि शिक्षा की अहमियत क्यों नहीं समझ आती ? बहुतायत में पाए जाने वाले फटीचर वकीलों के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकारें ज़िम्मेदार रही हैं।
मोइली कहते हैं कि देश भर में लॉ की पढ़ाई एक जैसी करने की कोशिश की जाएगी। एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार किया जाएगा जिसमें देश भर के वकीलों और विधि से जुड़े छात्रों का ब्योरा होगा।
फिर, इसमें से प्रतिभावान लोगों की पहचान की जाएगी। क्या ऐसा संभव है ? और पहचान हो भी गई तो क्या करेंगे। देश में न्यायपालिका की जो वर्तमान स्थिति है उस पर गौर करें तो शायद ही कोई बड़ी अदालत हो जहां मामलों की सुनवाई क्षेत्रीय भाषाओं या फिर हिंदी में की जाती है। सुनवाई हो भी जाए तो पेचीदा कानूनी धाराएं और मामलों से जुड़ी कागज़ी कार्रवाई शत-प्रतिशत अंग्रेज़ी में होती है। अब देश की हालत देखें तो ठीक से अंग्रेज़ी बोलने-समझने वाले कितने लोग हैं ? जिन धाराओं में मुजरिम को सज़ा मिलती है, जिन अनुच्छेदों के तहत सुनवाई पूरी होती है, वो इतनी पेचीदा होती हैं कि गुनाह की सज़ा भुगतने वाले तक को पता नहीं होता कि न्यायपालिका की कार्रवाई किस दिशा में गई और उसे सज़ा किस-किस आधार पर मिली। हमारी न्यायिक शब्दावली किसी भी देशी भाषा से मेल नहीं खाती मगर देश के कई लॉ संस्थानों में पढ़ाई का माध्यम अब भी अंग्रेज़ी से अलग भाषाएं ही हैं। अब ऐसी पढाई कर निकलने वाला वकील न्यायिक पेंचों को कंठस्थ करने के बावजूद पहले ही ‘’हीन भावना’’ से ग्रसित हो जाता है क्योंकि उसे अंग्रेज़ी नहीं आती ! ऐसे में उसका जज बनने का सपना सपना ही रह जाता है और बहुतेरे वकीलों की जमात में चंद ‘’ साफ-सुथरे’’ वकील ही जज बनने का सपना देख पाते हैं।(और उनमें से गिनती भर ही, जो या तो वकालत की आबोहवा में पले-बढ़े हैं या फिर किसी न्यायिक पदधारी की संतान हैं, इस कुर्सी तक पहुंच पाते हैं।)
क्या भारत देश में कई होनहार जज सिर्फ इसी आधार पर नहीं बन पाएं कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती, कहीं से भी उचित है ?
देश में विधि शिक्षा में एक जैसी प्रणाली लागू करने की बात कहना आसान है, कर पाना लगभग नामुमकिन। लॉ की पढ़ाई की स्थिति देश में एक ही ट्रेन के अलग-अलग श्रेणी के डिब्बों जैसी है। पहली श्रेणी के डिब्बों में बैंगगलोर, पुणे के बेहतरीन लॉ स्कूल आते हैं जिनके उत्पाद संस्थान से बाहर निकलते ही अक्सर देश से बाहर निकल जाते हैं और फिर किसी लॉ फर्म या विदेशी कंपनी के विधि विशेषज्ञ बन डॉलर कमाते हैं। दूसरी श्रेणी और तीसरी श्रेणी के स्कूलों से निकले वकील अलग-अलग अदीलतों में जज बनने की दौड़ में घिसते रहते हैं और देश में हर रोज़ मामलों का अंबार बढ़ता जाता है। मतलब, देश के सबसे अच्छे वकील देश की हालत सुधारने के काम बिल्कुल भी नहीं आ सके और व्यवस्था पंगु ही रह गई। दोयम दर्जे के लॉ स्कूलों में बड़ी तादाद उन छात्रों की होती है, जो या तो 60 साल की नौकरी के बाद रिटायर हो चुके होते हैं या फिर जिनके पास युवा उम्र में ही बेरोज़गारी के मुहाने पर पहुंचकर वकालत करने के सिवा कोई चारा नहीं बचता !
क्या विधि यानी लॉ के कैरियर को बाक़ी चमकदार विकल्पों के साथ खड़ा नहीं किया जा सकता ? किया जा सकता है, अगर सरकारें चाहें तो। कानून की समझ की ज़रूरत किसे नहीं पड़ती। लगभग हर किसी को। मगर, कानून की बेहतर समझ रखते कितने लोग हैं। शायद न के बराबर लोग । सबसे पहले तो ज़रूरी ये होगा कि विधि की पढ़ाई को ‘आयातित (इंपोर्टेड) शैली’ से निकालकर देशी अंदाज़ में सरलीकृत किया जाए ताकि पढ़ाई रुचिकर बने और ज़्यादा से ज़्यादा लोग (युवा छात्र) विकल्पहीन होने से पहले भी इस विकल्प के बारे में सोच सकें। ऐसा करने में वक्त तो लगेगा मगर करना ज़रूरी है। देश में अच्छे वकीलों और जजों की सख्त दरकार है जो मामलों की समझ रखते हों और पेंडिंग मामलों को निपटाने में अहम भूमिका निभा सकते हों। हमारे देश में कई बदनसीब ऐसे भी हैं जो मामले की सुनवाई के चक्कर में आधी ज़िंदगी जेल में गुज़ार देते हैं और जब मामले की सुनवाई हो पाती है, तो उनको मुकर्रर सज़ा उनकी कैद में गुज़ारी गई ज़िंदगी से बेहद कम होती है।
इसके अलावा देश में अच्छे विधि शिक्षकों की बेहद कमी है। जब अच्छे शिक्षक ही नहीं होंगे, तो विधि की समझ रखने वाले अच्छे छात्र कहां से आएंगे। ये ज़िम्मेदारी वर्तमान जजों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को उठानी होगी ताकि न्यायपालिका का हिस्सा बनने वाली अगली पीढ़ी बेहतर समझ रखने वाली हो और वो भी बेहतर शिक्षक बन सके।
वीरप्पा मोइली, कपिल सिब्बल जैसे मंत्री अपने पूरे कार्यकाल में कई घोषणाएं करते दिखे हैं, मगर इन पर कितना अमल हो सका है, किसी से छिपा नहीं है। उनके बयान मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह आते हैं और गायब हो जाते हैं। मगर, विधि की पढ़ाई को लेकर सरकार का गंभीर होना ज़रूरी है क्योंकि न्यायपालिका बिना लाठी-डंडे के, सिर्फ विश्वास के ज़ोर पर चलने वाली संस्था है। इस संस्था से आम आदमी का विश्वास जुड़ा है। और, दयनीय शिक्षा प्रणाली से पास होकर वकील और जज बनने वालों पर कब तक हम विश्वास करेंगे, कहना मुश्किल है। पूरा लेख लिखने के बाद भी मेरा मन तो नहीं हुआ कि मैं वकील बन जाऊं। शायद इसीलिए कि वकालत की पढ़ाई से लेकर जज और न्यायपालिका का बाहरी-भीतरी ढांचा तक देशी नहीं लगता, समझ और पहुंच के लिहाज से बाहर की चीज़ लगता है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?

निखिल आनंद गिरि

Wednesday, May 19, 2010

ले डूबा भ्रष्टाचार

और फिर एक और संस्था मलबे में तब्दील हो गई...संस्था से मतलब इंस्टीट्यूट से नहीं बल्कि इंस्टीट्यूशन से...इंस्टीट्यूशन, जिसे बनने और बनाने में लंबा ऐतिहासिक सफर तय करना पड़ता है...और फिर उसका यूं बिखर जाना...बेहद दुखद.
हम बात कर रहे हैं एमसीआई, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की...जो अब सिर्फ इतिहास बन चुका है...क्योंकि एमसीआई के चेयरमैन केतन देसाई को भ्रष्टाचार के एक मामले में गिरफ्तार होने के बाद उसे भंग कर दिया गया...जिस पर बाद में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अपनी मुहर लगा दी...और अब पूरे गाजे-बाजे के साथ एमसीआई जमींदोज हो गई...इस नए संकल्प के साथ कि अगले साल से केंद्र द्वार बनाए गए नए क़ानून के तहत एमसीआई की जगह एक नई संस्था का गठन होगा...यानी एक संस्था इतिहास के पन्नों में और दूसरी इतिहास के पहले पन्ने पर...

क्या थी एमसीआई?
एमसीआई का गठन इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1933 के तहत, 1934 में किया गया.
उद्देश्य था...देश के सभी मेडिकल कॉलेजों का नियमन...आजादी तक तो सब ठीक था...लोकिन आजादी के बाद मेडिकल कॉलेजों की संख्या धड़ल्ले से बढ़ने लगी...तो समस्याएं भी बढ़ने लगीं...फिर धीरे-धीरे यह महसूस किया जाने लगा कि 1934 में बनाए गए...नियम कानूनों में कुछ सुधारों की ज़रूरत है...जिसके चलते 1956 में इसकी जगह एक काफी हद तक नया...एक्ट लाया गया...जिसमें बाद में फिर 1964, 1993 और 2001 में तीन संशोधन किए गए...इसके उद्देश्य बहुत स्पष्ट थे...सभी संस्थानों में पढ़ाई का स्तर समान रखते हुए...भारतीय और अन्य विदेशी संस्थाओं के मान्यता संबंधी फैसले लेना....उचित डिग्री और योग्यता वाले डॉक्टरों का पंजीकरण और उनकी स्थाई और अस्थाई मान्यता...और विदेशी संस्थाओं से आपसी सामंजस्य के साथ मान्यता संबंधी मसले पर काम करना.

ले डूबा भ्रष्टाचार
एमसीआई कौन है, क्या है...इसके बारे में विरले लोगों को ही पता था...यूं कहें किंचित ही लोगों ने इसका नाम भी सुना हो...लेकिन मीडिया की देन कहें या फिर एमसीआई के तात्कालिक चेयरमैन के सुकृत्यों की अनुकंपा, कि अब काफी लोग जान गए हैं कि एमसीआई क्या थी...दरअसल, एमसीआई चेयरमैन केतन देसाई को इसी साल 22 अप्रैल को सीबीआई ने रिश्वत लेते हुए गिरफ़्तार किया था...वजह थी पंजाब मेडिकल कॉलेज को बिना सुविधा के अतिरिक्त छात्रों को भर्ती करने की अनुमति देने के लिए रिश्वत की मांग...रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने के बाद उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ गया...और इस तरह 22 अप्रैल को ही आजादी पूर्व के इस संस्थान की विदाई का ब्लूप्रिंट तैयार हो गया...जो जल्द ही जमीनी हक़ीक़ीत में तब्दील हो गई...

नहीं पता कब तक, ऐसे भ्रष्टाचार देश के छोटे से लेकर बड़े संस्थानों को अपनी जद में लेते रहेंगे...लेकिन एक बात तो तय है संस्था चाहे छोटी हो या बड़ी...हर संस्था के खात्मे के साथ... आस्था के स्तंभ भी ध्वस्त होते हैं...परंपरा है, परंपराओं का क्या...ये तो शास्वत प्रक्रिया है...चलती रहेगी...कल को फिर कोई देसाई आएगा और अपने कारनामों के साथ आस्था के हज़ारों-हज़ार स्तंभों को ध्वस्त कर जाएगा...

आलोक सिंह साहिल

Wednesday, May 12, 2010

भ्रष्टाचार- रिस रहा है मवाद

हिमानी दीवान

आस पास से शुरू करे तो सब कुछ खूबसूरत लगता है। रोटी और सुकून के लिए जद्दोजहद करते चेहरों के बीच यह कहना बेहद मुश्किल हैं की कौन भ्रष्ट है। एक-एक चेहरे को परखने लगे तो सभी और सबके भीतर झाँके तो कोई भी नही। फिर भी क्यों हमारी छवि भ्रष्ट होती जा रही है। क्या हम अकेलेपन में बेहद इमानदार और समूह में बहुत लालची है। या फिर सारा कसूर इस व्यवस्था का है ...वही हमें भ्रष्ट बना रही है....दरअसल

किसी व्यक्ति का व्यवहार कब भ्रष्ट होता है। ये सवाल आज की परिस्थितियों में बिलकुल बचकाना लगता है। वास्तविक सवाल यह है कि हम कब भ्रष्ट नहीं होते? रिश्वत देना तो खुद पापा ने सिखाया...यह महज एक मनोरंजन प्रधान फिल्म के गीत के बोल नहीं बल्कि समाज की हक़ीक़त है। अगर तुम क्लास में प्रथम आओगे तो हम तुम्हें साइकिल दिलायेंगे, बचपन में मिलने वाले इस प्रलोभन के साथ बड़प्पन आने तक कई दूसरे आयाम जुड़ जाते है। शोहरत और बुलंदियों तक पहुंचने का सपना, इस जैसा..उस जैसा बनने की तमन्ना में नैतिकता के नारों का शोर स्वहित को साधने वाले सन्नाटे में तब्दील हो जाता है। इससे स्वार्थ सिद्धी का ऐसा मकड़जाल तैयार होता है कि कोई अपनी मर्जी से और कोई न चाहते हुये भी उसमें फँसता ही जाता है। भ्रष्ट आचरण की शुरुआत घर से होती है और बाहर आकर बीज रूप में पनपा यह भ्रष्ट आचरण ऐसा पेड़ बन जाता है जिसकी सिंचाई के लिये रिश्वत, धोखा, धांधली और घोटालों की खाद तैयार की जाने लगती है। इस खाद का साइड एफ्फेक्ट गरीब और कमजोर भुगतते हैं। इससे एक तरफ गरीबी उनमूलन की योजनाओं का बंटाधार होता है, दूसरी तरफ कानून और न्याय की नींव हिलती है।

फलती फूलती फसल

लेखिका- हिमानी दीवान

अपनी मन की करते हुए दिल्ली विश्विधायालय से मीडिया की पढ़ाई और अब उस पढ़ाई को आजमाने की कोशिश में हैं। लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से और अब ये शौक ही जिंदगी बन गया लगता है।
बीज से पेड़ बनने के बाद भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का माहोल देती है हमारी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था। इस व्यवस्था में निजी पूंजी को फैलने की बेलगाम आजादी दी जाती है। इस के लिये तमाम नियम-कानूनों को तोड़ कर, जिम्मेदार अफसरों को साझीदार बनाकर जरुरतमंद जनसंखया को किनारे कर दिया जाता है। मामूली से दफ्तर से लेकर बड़े प्रशासनिक कार्यलयों तक ऐसे कई बाबू है जो आप को इन शब्दों की बानगी दिखाने के लिये हमेशा तत्पर दिखाई देंगे। इसी लिए ही शायद कहा जाता है की भ्रष्टाचार का सबसे ताकतवर त्रिगुट राजनीटिक नौकरशाह और व्यापारी का है। तीनों अपनी पूंजी की बाल्टियां भरने के लिये पूंजीपतियों से लेकर आम इंसान का इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं करते। अब अगर भ्रष्टाचार को ‘पूंजी का पूंजी के लिये पूंजी के पुजारियों द्वारा किया गया गलत इस्तेमाल कहें’ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आलम यह है कि भ्रष्टाचार की फसल को अनुकूलीत करने वाले ही आयोग बना कर जांच का आदेश देते है। यह आयोग महज खानापूर्ति भर होते है वर्षों तक जांच चलती रहती है और भ्रष्टाचार का मवाद नासूर बनकर गरीब, लाचार जनता का शोषण करता रहता है।

फसल को गिजा-पानी देती जनता

जिस व्यवस्था के अंदर ये फसल फल-फूल रही है उस का अहम अंग है हम यानी जनता। नौकरशाह बेशक कितने ही तानाशाह क्यों न हो जाये लेकिन इस फसल को पानी देने में जनता के योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता । इस पहलू की खास बात ये है की जनता भ्रष्टाचार को मुद्दा ही नहीं मानती। उनके बीच ये सोच विकसित होती जा रही है की ऐसा तो होता ही है। यह उदासीन आदत ही सबसे खतरनाक साबित हो रहा है। इसी का नतीजा है कि इस फसल से हर साल नए-नए फल मिल रहे है।

फिर चाहे वह बरसो पुराने कुछ घोटाले हों या कुछ एक साल पहले वाला सत्यम घोटाला या फिर ताजा ट्रेन खेल में खेला गया खेल यानी आई पी एल।

Thursday, September 24, 2009

भारत और चीनी कंपनियाँ सबसे भ्रष्ट

दुनियाभर में भ्रष्टाचार की नब्ज़ पर नज़र रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने कहा है कि भारत और चीन दुनिया के बड़े बाज़ार तो हैं लेकिन विदेशों में कारोबार के मामले में इन देशों की कंपनियों को बहुत भ्रष्ट समझा जाता है. भारत में जिन लोगों ने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वे में भाग लिया उनमें से 30 प्रतिशत का कहना था कि भारतीय कंपनियाँ अपना काम जल्दी करवाने के लिए निचले स्तर के अधिकारियों को रिश्वत देना पसंद करती हैं.एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार की वजह से बहुत बड़ा नुक़सान हो रहा है.

भारत और चीन के बारे में कहा गया है कि दोनों ही देश बड़े-बड़े बाज़ार उपलब्ध कराते हैं और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन इन दोनों देशोंकी कंपनियों को ख़ासतौर से अंतरराष्ट्रीय कारोबार करते हुए बहुत भ्रष्ट समझा जाता है. पाकिस्तान में इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले साठ प्रतिशत कंपनी अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों को रिश्वत दी थी. रिपोर्ट में भारत की यह कहते हुए प्रशंसा भी की गई है कि प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार से निबटने के लिए ठोस क़दम उठा रहा है, कंपनियों को वित्तीय अपराधों के लिए जुर्माना अदा करने का विकल्प दिया जा रहा है.

अरबों का नुकसान
वर्ष 2009 की वैश्विक भ्रष्टाचार रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में फैले भ्रष्टाचार, घूसखोरी, फिक्सिंग और सार्वजनिक नीतियों को निजी स्वार्थों के लिए प्रभावित करने की वजह से अरबों का नुक़सान हो रहा है और इससे टिकाऊ आर्थिक प्रगति का रास्ता भी बाधित हो रहा है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि भ्रष्ट चाल-चलन से ऐसा माहौल बनता है जिसमें साफ़-सुथरी प्रतिस्पर्धा के लिए जगह नहीं बचती है, आर्थिक प्रगति अवरुद्ध होती है और अंततः भारी नुक़सान होता है.

पिछले सिर्फ़ दो वर्षों में ही बहुत की कंपनियों को भ्रष्ट चाल-चलन की वजह से अरबों का जुर्माना भी अदा करना पड़ा है. इतना ही नहीं, इस तरह की सज़ाएं मिलने से कर्मचारियों के मनोबल पर असर पड़ता है और ऐसी कंपनियों का विश्वास ग्राहकों में भी कम होता है और संभावित भागीदारों में भी उसकी साख गिरती है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशलन के अध्यक्ष ह्यूगेट लाबेले का कहना है, "निवेश की सुरक्षा बढ़ाने, व्यावसायिक सफलता सुनिश्चित करने और ग़रीब और धनी देशों द्वारा वांछित स्थायित्व लाने के लिए यह ज़रूरी है कि एक ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें व्यावसायिक साख को बढ़ावा दिया जाए. आर्थिक संकट से उबरने के लिए यह ख़ासतौर से बहुत आवश्यक है."
इस रिपोर्ट में बड़ी कंपनियों में बहुत से ऐसे प्रबंधकों, शेयरधारकों और अन्य महत्वपूर्ण अधिकारियों के मामलों का ज़िक्र किया गया है जिन्होंने अपने निजी फ़ायदों के लिए अपने पदों और अधिकारों का दुरुपयोग किया. इससे न सिर्फ़ कंपनी, ग्राहकों और शेयरधारकों को ही नुक़सान हुआ बल्कि व्यापक तौर पर पूरे समाज को नुक़सान हुआ.
रिपोर्ट कहती है कि विकासशील देशों में बहुत सी कंपनियों ने भ्रष्ट राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से एक वर्ष में लगभग 40 अरब डॉलर की घूसखोरी की है.

रिपोर्ट के लिए किए गए शोध में बताया गया है कि भ्रष्ट नीतियों की वजह से लागत में भी लगभग दस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जाती है और इसका ख़ामियाजा अंततः आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है क्योंकि बढ़ी हुई लागत उन्हीं से तो वसूल की जाती है. रिपोर्ट में एक ख़ास बिंदू की तरफ़ ध्यान दिलाते हुए कहा गया है कि दुनिया भर में कुछ गिनी-चुनी कंपनियाँ हैं जिनकी ताक़त बहुत बढ़ चुकी है और वो इस ताक़त के ज़रिए विभिन्न देशों की सरकारों को अपने हित साधने के लिए प्रभावित करती हैं. इनमें अपने क़ानूनों को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करवाना भी शामिल है.

बीबीसी

Wednesday, July 01, 2009

व्यवस्था का डंक और दो टांग के गधे !

कल दफ्तर में सारा दिन मूड ऑफ रहा । इसलिए नहीं कि सुबह उठते ही पत्नी का थोबड़ा देखा था । इसलिए भी नहीं कि दफ्तर आते-आते रोज की तरह पड़ोसन की प्रेम भरी चितवन ने विदा नहीं किया था। इसलिए भी नहीं कि दफ्तर जाते ही दफ्तर में साहब के चरण चाटने पड़े । साहबों का तो हमारा खानदान जन्मजात भक्त रहा है। जब तक मैं साहब के चरण न चाटूं पिछले दिन का कम्बख्त खाना ही हजम नहीं होता। मैं ज्यों ही बिल काटने बैठा बिल देने वालों की लाइन में एक गधा न जाने कहां से आकर खड़ा हो गया था। गधा होने के लिए चार टांगें होना जरूरी नहीं ! बड़े-बड़े कान होना जरूरी नहीं!! पूंछ होना जरूरी नहीं !!! गधे आजकल कई रूपों में यहां-वहां सर्वत्र उपलब्ध हैं, सुगमता से । और असली गधे बेचारे दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर, गुप्ता की तरह ।
रोज की तरह बिल काटने शुरू ही किए थे कि... उसूलन मैं ही क्या, आज के दौर में कोई भी बकाया के दो-चार रूपये वापस नहीं करता। वैसे भी महंगाई के दौर में दो-चार रूपये का आता क्या है भैया ! इसीलिए कई समझदार तो बकाया मांगते भी नहीं । इन जैसों की दया से शाम तक दो चार सौ बन जाते हैं ।
उस गधे का बिल था 145 का और उसने दिए 150 । बिल काट मैंने उसे रसीद दी तो वह धन्यवाद करने की बजाय भी वहीं अड़ा रहा । दूसरे को दिक्कत हो रही थी । आखिर मुझे ही कहना पड़ा,` यार , पिछले को आने दो । अब क्यों अड़े हो ? ´
` 5 रूपये वापस दीजिए ।´
यों बोला मानो कुबेर का खजाना रख लिया हो ।
`छुट्टे नहीं हैं । ´ गुस्सा आ गया । सारा दिन इनके लिए कुर्सी से चिपके रहो ,और ये हैं कि ....वरना अपना क्या? पगार तो मिलनी ही मिलनी है । 5 न हुए .....(ख़ैर, जाने दीजिये)
` अच्छा , पांच रूपये दे दीजिए । ´ उसने फिर साधिकार कहा । लगा गधा पहली बार बिल देने आया है , सो पूछा ` भैया, पहली बार बिल दे रहे हो क्या ? ´
` क्यों ? ´

` हर महीने देते होते तो अपना टाइम बरबाद न करते । ´
` पर पांच रूपये ?´ `टुट्टे होंगे तो ले जाना । ´
मैंने कहा तो वह किनारे खड़ा हो गया ।
अगले का बिल भी 145 , पर उसने 150 में से पांच नहीं मांगे । समझदार लोग ऐसे ही होते हैं ।
उसने फिर कहा ,` तो अब 10 दे दीजिए । ´
` किस बात के ?´

` 5 इनके , 5 मेरे । ´
` क्यों ? ´
` हम पांच -पांच बांट लेंगे । ´
` मुझे विश्वास नहीं तुम पर । देश में बांट कर खाने का रिवाज खत्म हो गया है । हद है यार , पांच रूपये के लिए पचास रूपये का समय बरबाद कर दिया । ´
बस , उसके बाद मन ही नहीं किया बैठने का । घर आते ही पत्नी ने बताया कि पण्डित जी को कुछ हो गया है। आनन-फानन में उनके यहां पहुंचा तो उनके मुंह से झाग निकल रहा था । लोग-बाग उन्हें घेरे हुए थे ।
` क्या हो गया ? ´
` इन्हें काट लिया। ´
` किसने ? ´
` सांप ने। ´
` सांप ने तो इन्हें पहले भी काटा था तो सांप मर गया था। ´
गुप्ता ने हंसते हुये कहा।
`तो सांप से ज्यादा जहरीला तो कुछ नहीं? ´
` होता होगा ! तभी इनकी यह दशा हुई है । ´ उनकी पत्नी परेशान । पेंशन सीधे हाथ में आने का मौका कौन हाथ से जाने दे ?
` झाड़-फूंक वाला नहीं बुलाया क्या ? ´
`आया था , कह रह था इस पर मन्त्र नहीं चल रहा । किसी भयानक कीड़े ने काटा है।´

` तो ? ´
` अस्पताल ले जाना पड़ेगा। ´
` तो? ´

और पड़ोसी धर्म के नाते न चाहते हुए भी उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा । सब धर्म तो मर गए साले , ये धर्म क्यों बचा है भैया ? जेब में लगाने लायक आज कुछ पड़ा न था। फिर भी सौ-पचास लगा दिए, शायद परलोक सुधर जाए ।
झल्लाए डॉक्टर ने पूछा,` कहां से लाए हो ? ´
`वार्ड 10 से । ´
`क्या हो गया मरे को ? ´
` काट दिया है। ´
मैंने मरी आवाज में कहा।
` किसने ? बिच्छू ने ? ´
` नहीं । ´
` सांप ने ? ´
`नहीं।´
` कुत्ते ने ? ´
` नहीं । ´
` पत्नी ने ? ´
` नहीं ! दफ्तर गया था जमाबन्दी की कापी लाने ।´
अचानक पण्डित जी की बेहोशी टूटी ।
`तो ? ´
` पैसे घर भूल गया था । ´
वे बेहोशी में ही बड़बड़ाए।
`उसने जेब पर डंक मारा ।' और वे फिर बेहोश हो गए ।

डॉक्टर ने गम्भीर हो कहा ,` इसका जहर नहीं कट सकता । ´
`क्यों ? ´

` इसे व्यवस्था के भरोसे छोड़ दीजिए । व्यवस्था ने चाहा तो ..... ´
` वर्ना ? ´
` व्यवस्था का डसा वैसे तो आजतक बचा नहीं । समाज गवाह है । ´
कह वह एमआर से वहीं गिफ्ट लेने जुट गया । और मैं मरते हुए पंडित जी का सिर धुनते हुए मृतात्म मंथन करने लगा, हालांकि उनके सिर में धुनने के लिए बालों के नाम पर कुछ भी शेष न बचा था।
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डॉ.अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन -173212 हि. प्र.

Sunday, January 04, 2009

यक़ीन पर कैसे यक़ीन करें...

मेरे पास रिश्वत खिलाने के लिये पैसे नहीं हैं और इस पर से अब मेरा यक़ीन उठ चुका है कि बग़ैर रिश्वत खिलाये मेरा काम हो पायेगा। दिल्ली में नेताओं के चक्कर काट रहे मेरे गांव से आये एक क़रीबी मिलने वाले ने जब मुझसे ये कहा तो मैं सोच में पड़ गया। वो देश की राजधानी में खड़ा था। एक ऐसे ज़िले से आया हुआ था जिसे फ़िलहाल बहुत असरदार ज़िला माना जा सकता है, रायबरेली। फिर भी उसका भरोसा हिला हुआ था।

अमरीकी वित्तीय संकट पर प्रेज़ीडेंट इन वेटिंग ओबामा ने पिछले दिनों एनबीसी के कार्यक्रम – मीट द प्रेस – में बोलते हुए कहा कि “अमरीकियों को एक बेहतर कल से पहले अभी और मुश्किलों से गुज़रना होगा और हमें यक़ीन है कि हम ऐसा ज़रूर कर पाएंगे क्योंकि इतिहास गवाह है कि मुश्किलों से उबरना हमारा राष्ट्रीय चरित्र रहा है, वो राष्ट्रीय चरित्र जो हमेशा आशावादी जज़्बे से भरा रहता है, जो हमेशा आगे देखना चाहता है इस यक़ीन के साथ कि बेहतर दिन ज़रूर आयेंगे।”

दरअसल कोई देश हो या व्यक्ति विशेष, भविष्य का आधार वो किसी न किसी यक़ीन पर ही रखता है और उसी के सहारे वर्तमान को भोगता है। ये एहसास तब और ज़रूरी हो जाता है जब किसी मुश्किल के दौर से गुज़रना हो। लेकिन जब हम ख़ुद यही सवाल करते हैं कि क्या भरोसा है? तो जवाब में एक न ख़त्म होने वाली ख़ामोशी से सामना करना पड़ता है और जब अपने चारों तरफ़ देखते हैं तो ये ख़ामोशी सन्नाटे में बदल जाती है। शायद हमारी सबसे बड़ी मुश्किल ही ये है कि हमारे यक़ीन की मौत हो गई है। हमें अब किसी चीज़ पर यक़ीन नहीं आता। कभी यक़ीन था, अब नहीं है। नौकरी रह पायेगी? मालूम नहीं। नौकरी मिल जायेगी? कौन जाने। वक़्त बदलेगा? किसे ख़बर। दर्द कम होगा? क्या पता।

टूट चुके भरोसे की ये मिसालें तो आम-आदमी से जुड़ी हुई हैं। अब आइये देश के दीवाने ख़ास में शिकस्ता यक़ीन का चेहरा कैसा है, ये देखते हैं। 26/11 को ताज में आतंकवादियों के घुस जाने के बाद जिस तेज़ी से कार्यवाही होनी चाहिये थी वो नहीं हो पाई जिसकी वजह से सुरक्षा व्यवस्था पर से समूह के प्रमुख रातन टाटा का भरोसा उठ चुका है और उन्होंने घोषणा कर दी है कि अब वो बाहरी विशेषज्ञों की मदद से अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ख़ुद उठायेंगे। रतन टाटा की मजबूरियों को समझा जा सकता है क्योंकि सेवा उद्योग तो भरोसे पर ही फलता फूलता है।

दूर क्यों जाते हैं ख़ुद से पूछिये, आपको अपनी पुलिस पर भरोसा है? रिश्वत लेते बाबुओं पर भरोसा है? दुकान बन चुके अस्पतालों और दवाओं पर भरोसा है? खाने-पीने के सामानों पर भरोसा है? अपने नेताओं पर भरोसा है? धर्म के ठेकेदारों पर भरोसा है? आपको क्या जवाब मिला? अब ये हमारी आदत का हिस्सा बन चुका है कि जो कुछ हमारे सामने है उसके पीछे देखने की कोशिश हम पहले करते हैं क्योंकि हमें भरोसा नहीं है कि हम जो कुछ देख रहे हैं वो वही है जो हम देख रहे हैं। हो सकता है कि सामने जो कुछ है वो सच हो लेकिन यक़ीन के साथ ये कह पाना नामुमकिन सा हो गया है।

जवाबदारी लोग भूल चुके हैं। लगाव की ज़बान उन्हें बेतुक की लगती है। चकर-मकर इस दुनिया में लोग जानते ही नहीं कि किसी चीज़ में पूरी तरह डूब जाने का अर्थ क्या होता है। और जब ऐसे हालत में किसी संकट से दो-चार होना पड़ता है तो बस जो कुछ सामने पड़ता है उसी पर इल्ज़ामों का ठीकरा फोड़ डालना ही एक अदद चारा नज़र आता है। दुनिया की बातें छोड़िये आपको अपने किये पर यक़ीन है? बड़ी संभावनाएं हैं कि आप “नहीं” कह दें। और इस नहीं पर आपको शर्मिंदा होने की भी कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि आप जो कुछ करते हैं उसमें आपका वो परिवेश भी हिस्सेदार है जिसके बीच आप रहते हैं, चारों तरफ़ से आपके भरोसे का अपहरण हो रहा है, ऐसे में ख़ुद पर यक़ीन कर पाना आपके बस में भी तो नहीं है।

जो कुछ दिख रहा है उसे ख़ारिज करते चलो। ख़ारिज करने के इस दौर में जब हम नेताओं को, नौकरशाही को और देश की सुरक्षा व्यवस्था को सिरे से ख़ारिज कर रहे हैं हमें ये भी देखना चाहिये कि हमारे पास विकल्प क्या है। इसलिये की ख़ारिज करना तो हमेशा बहुत आसान होता है लेकिन ख़ारिज कर देने के बाद बचे हुए शून्य में ख़ुद को खड़ा करना और भी ख़तरनाक है अगर ये महज़ लफ़्फ़ाज़ी नहीं है तो। “द सेवन हैबिट्स ऑफ़ हायली इफ़ेक्टिव पीपुल” के लेखक स्टीफ़न कवी का कहना है कि जब भरोसा ज़्यादा होता है तो रफ़्तार और उत्पादकता बढ़ जाती है। जब भरोसा कम हो तो उन्हीं चीज़ों में ख़तरनाक गिरावट आ जाती है। आपके सामने एक दान पात्र रखा है। उसपे लिखी इबारत आपसे अंशदान का अनुरोध कर रही है। इस दान से यतीम बच्चों का या रोगियों का भला होगा। आपके पास दल रुपये का नोट भी है जिसके न होने से आपका कोई नुक़सान नहीं होने वाला। लेकिन हज़ारों रुपये फूंककर शापिंग का मज़ा लेने वालों को यक़ीन ही नहीं है कि उनके मात्र दस रुपये सही काम में लगेंगे। और इस बेयक़ीनी की वजह से दानपात्र भीड़ में अकेला पड़ा रहता है। अगर यक़ीन आ जाय तो फिर एसे अनुरोधों को कहीं और भटकने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। यक़ीन इस अंशदान को अरबों खरबों में बदल सकता है लेकिन क्या करें कमबख़्त यक़ीन नहीं है।
समय की अक्कासी करते हुए बिहार के शहंशाह आलम की कविता ‘डराता है ये समय’ कितनी तर्कसंगत लगती है - आग का दरिया है मेरे यार, अपना यह समय, सपने में आते हैं भयानक डायनासोर , नहीं पढ़ा हमने कोई ऐसा विज्ञापन न देखा, जिसमें गारंटी दी गई हो पुरसुकून समय की… कुछ समय पहले महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रेनुका चौधरी ने ये कहकर कि भारतीय पुरुष भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं एक नये अविश्वास का उदधाटन कर दिया था। ज़ाहिर है कि रेनुका जी औरतों के हक़ में ये बात कह रही थीं और विषय था एचआईवी संक्रमण की रोकथाम। लेकिन बात तो उसी बे-यक़ीनी की है जिसपर हम आंसू बहा रहे हैं।
लेकिन यही बे-यक़ीनी ही एक नये यक़ीन की शुरूआत भी हुआ करती है। हमारे हरदिल अज़ीज़ ज़मीर भाई ने हमारे इन आसुओं को पोछते हुए कहा। कहने लगे राजस्थान के बलवंतपुरा चेलासी के लोगों की चरफ़ देखो। उन्हें जब ये यक़ीन हो गया कि उनकी कोई सुध नही लेगा तो गांववालों ने ख़ुद ही रेलवे स्टेशन बना लिया। बे-यक़ीनी ने सामुहिकता का जो जज़्बा एक गांव को दिया वो अपने देश में आ जाय तो क्या बात है।
लेकिन फ़िलहाल हालात ये हैं कि चारों तरफ़ माहौल बेयक़ीनी का है। और इंतेहा तो ये है कि आतंकवाद के इस दौर में मौत पर से भी लोगों का यक़ीन उठता जा रहा है। और अगर कभी ज़िदा दिखने वाले इंसान से पूछ बैठिये कि भाई साहब जीना तो बस इसे ही कहते हैं तो जवाब मिलता है ये भी कोई जीना है लल्लू।

---नाज़िम नक़वी