Showing posts with label Abyaz Khan. Show all posts
Showing posts with label Abyaz Khan. Show all posts

Friday, August 14, 2009

मुंह में रखकर घास कहिए देश क्या आज़ाद है !!

आज़ादी की सालगिरह पर हम आपको चंद अलग-अलग अनुभव पेश कर रहे हैं.....हमें ये लेख चार अलग-अलग जगहों से मिले हैं..कहानियां अलग हैं, मगर सवाल वही...आज़ादी के 62 साल बाद का सच क्या सिर्फ वही है जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लालकिले से बयां कर गए.....क्या इन बेआवाज़ लेखों को सुनना ज़रूरी नहीं है....

घास खाए देसवा हमार....


दो-चार जानलेवा दुर्घटनाओं को छोड़ दीजिए तो रोज़ मेट्रो का एक और नया पिलर तैयार हो रहा है....देश तरक्की की राह पर है....राजधानी की रफ्तार दुगुनी-चौगुनी होने को है....राजधानी ही क्यों, उसके आसपास का एनसीआर भी कृतार्थ होगा.....दिल्ली में इतने फ्लाइओवर हैं कि मीलों की दूरी मिनटों में तय होती है.....एफएम पर बैक टू बैक तीन गाने सुनने में कट जाता है रास्ता.....और क्या चाहिए तरक्की के लिए....ये तस्वीरें विकास की परिभाषा गढ़ रही हैं....शहरों के विकास की परिभाषा....गांव आते-आते ये परिभाषाएं बदलने लगती हैं....न कोई मेट्रो, न फ्लाईओवर...न एफएम.....गांवों के नाम बदल दीजिए तक़दीर नहीं बदलती..तस्वीर भी नहीं......
पूर्वी उत्तर प्रदेश का नामी ज़िला चंदौली.....उत्तर प्रदेश में नक्सली आंदोलन की चर्चा हो तो सबसे पहले चंदौली का नाम आता है.....अभी कुछ दिन पहले सिपाही भर्ती के दौरान मची भगदड़ में कई जानें गईं...कई नौजवान मारे गए....पूरा शहर कर्फ्यूग्रस्त हो गया....उपद्रव मचाने वालों ने सारे सरकारी भवन आग के हवाले कर दिए....कोर्ट-कचहरी, पोस्ट-ऑफिस सब कुछ.....प्रशासन ने वहां के स्कूलों में ही कचहरी लगा दी....बड़ा सा स्कूल सिमट कर रह गया....छह कमरों में हज़ारों बच्चों का स्कूल और कई कमरों में पुलिस छावनी......पूरे स्कूल में एक ही शौचालय है.....बच्चियां शौचालय भी जाने से कतराती हैं...वहां अक्सर ख़ाकी के जवानों की भीड़ होती....ख़ैर.....
चंदौली से ही सटा है नौगढ़....नौगढ़ के पास का ही गांव है मझगवां....आदिवासियों की अच्छी-खासी तादाद बसती है यहां....कभी अपने हक़ की लड़ाई में बासमती कोल जैसी चूल्हा-चौका करने वाली महिलाओं ने बंदूक थाम ली थी......उत्तर प्रदेश का नक्सली इतिहास यहीं से शुरू होता है.....यहां पहुंचने के लिए आज भी कच्ची सड़क है....शाम होते-होते लोगों की आवाजाही एकदम बंद हो जाती है.....विकास योजनाओं की आवाजाही तो बरसों से बंद है......नरेगा जैसी योजनाएं यहां पहुची तो थी, मगर सिर्फ कागज़ पर.......मझगवां की कई औरतों के पास जॉब कार्ड है, मगर जॉब किसी के पास नहीं....सूखे का असर देखना हो तो इस गांव का रुख कभी भी किया जा सकता है....दूर-दूर तक खेत पसरे है.....मगर, खेती बिल्कुल नहीं हुई.....खेतों में चकबड़ और चकोड़ घास उगती है....जानवरों के खाने के काम आती है ये घास.....इस बार फसल नहीं हुई तो अनाज हुआ नहीं.....घरों में एकाध किलो चावल बचा है....पूरे सीज़न चलाना है यही चावल....तो, यहां के लोग एक टाइम खाते हैं.....थोड़े चावल में यही घास उबाल कर सानते हैं और खाते हैं....जानवरों का चारा आदमी खा रहे हैं....हर रोज़.....बच्चे भी यही घास खाकर बड़े हो रहे हैं.....पता नहीं कितना बड़े हो पाएंगे.....उनकी मांओं को टीबी हो गया है....बाप गांव के ही किसी कोने में ताश खेल रहे होते हैं......गांव के कोने में एक स्कूल भी है....स्कूल क्या है, एक खंडहर है.....दीवारों की झुर्रियां साफ दिखाई पड़ती हैं....बड़ा सा ताला लटका रहता है वहां पर......स्कूल के कोने में ही लोग ताश खेलते रहते हैं दिन भर....बच्चे कभी बस्ता लेकर जाते भी हैं तो ताश खेलना शुरू कर देते हैं....अच्छा लगता है उन्हें....फिर भूख लगती है तो घर लौट जाते हैं...मां कटोरी में घास सान कर दे देती है....बच्चे खा लेते हैं.....बासमती कोल को पता है इस गांव में सरकारी योजनाओं के नाम पर पांच लाख रुपया आता है....मगर, जाता कहां है, ये कोई नहीं जानता....पांच लाख रुपए में तो कायापलट हो जानी चाहिए थी....कुछ भी नहीं बदल रहा यहां पर.....बासमती अगली पीढ़ी के कंधे पर बंदूक के बजाय बस्ते थमाना चाहती है.....मगर, लटके ताले उसका मुंह भी लटका देते हैं.....ये आज़ादी के 62 साल बाद का सच है.....

--निखिल आनंद गिरि
********************************************************
मनीष वंदेमातरम हिंदयुग्म के पुराने साथी हैं....उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से उनकी भी चिट्ठी आई है.....लिखते हैं,
बेशक अब हम आज़ाद हैं। और जगहों का तो पता नही पर मेरे गाँव में ये आज़ादी ज़रूर दिखने लगी है। ६३ साल की आज़ादी अब धीरे-धीरे जवां हो रही है। मेरा गाँव गंगा किनारे है, वहाँ लगभग हर साल बाढ़ आती है। बचपन में इन दिनों मां-बाबूजी हमलोगो को नानी के घर भेज देते थे क्योकि सारा गाँव बाढ़ के दिनों में छोटा सा द्वीप बन जाता था। हमारे नज़दीकी कस्बे या मुख्य सड़क तक जाने के लिए एक ही विकल्प था नाव, वो भी एक थी। फिर बाढ़ के बाद संक्रमण और बीमारियां। अब 7-8 सालों से बाढ़ नहीं आती, मेरा गाँव चारों तरफ से सड़क से जुड़ गया है। सड़कों पर चलाने के लिए लोगों के पास महँगी गाड़िया हैं, बिजली है वो भी इतनी कि लोग अब दहेज में फ्रिज और टीवी मागंने लगे हैं।
सूचना क्रातिं ने भी गाँव में खूब पैर पसार लिया है। गाँव मे औसतन हर घर में मोबाइल है, डी टी एच, सेटेलाइट टीवी, एटीएम हैं। मेरे जिले मे हाल ही मे ३ जी सेवा शुरू की गयी है। लोग धीरे धीरे कंप्यूटर के उपयोग से परिचित हो रहे हैं। इंटरनेट का प्रसार बढ़ रहा है। कुछ युवा तो जमकर ब्लागिंग भी कर रहे हैं। ग्लैमर की चकाचौध भी गाँव मे घुस गयी है। अब आप सबके भदन पर फैशनेबल कपड़े और एस्सरीज देख सकते है। बच्चे गजनी कट और लड़कियां सानिया कट नथूनी से अंजान नहीं रहे। गाँव का भोलापन अब सयाना हो गया है।
शिक्षा का प्रसार तेजी से हो रहा है। महँगे महँगे कान्वेंट स्कूलों की बसें गाँव की सड़कों पर दौड़ रही है। गाँव वाले अब बच्चों को स्कूल भेजते समय बाय-बाय कहते है। लड़कियां घंटों साईकिल चलाकर स्कूल जाती हैं।
किसान अब पहले से संपन्न हो रहे हैं। उन्होंने हाइब्रिड बीजों का उपयोग सीख लिया है, और आधुनिक कृषि अभियांत्रिकी के लाभ भी समझ गये हैं। बाज़ार तक उनकी पहुंच आसान हो गयी है। प्रेमचंद अगर अब होते तो उन्हें होरी जैसा पात्र रचने में खासी मुश्किल होती।
गाँव अब बदल गया है। पर हम इस बदलाव की कीमत भी चुका रहे हैं। पहले गाँव के बारे में एक प्रसिद्ध कहावत थी कि गाँव में एक ही चूल्हे से सारे गाँव का चूल्हा जलता है। पर अब ऐसी बात नहीं रही। अब सबको अपने चूल्हे की ही पड़ी रहती है। पहले तीन चार पीढ़ियों तक एक ही घर के लोग प्रधान हुआ करते थे.... अब चुनाव होता है तो गाँव में अच्छे और सस्ते शार्पशूटर मिल जाते हैं
मुझे रंग दे बसंती का एक डायलाग याद आता है.....कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है।
*****************************************************

गरीब आदिवासियों के लिए लड़ रही एक जाबांज और दिलेर साथी हैं शमीम मोदी... मध्य प्रदेश में काम कर रहे सगंठन श्रमिक आदिवासिक संगठन के माध्यम से लगातार कई वर्षो से अपने को खपा चुकी शमीम को जान से मरने की धमकी कई बार दी जा चुकी है, क्योकि उनका संघर्ष उन चंद लोगो के काम और रोजगार के रास्तों में रूकावटें पैदा करता रहता है. तमाम परेशानियों के बाद भी शमीम का संघर्ष जारी है....इधर शमीम पर पिछली २३ जुलाई को एक जानलेवा हमला हुआ और वो जिन्दगी और मौत की कश्मकश में घिर गयी.... पर, खुदा का शुक्र है कि अब वो खतरे से बाहर हैं. पर सबसे चौंकाने वाली भूमिका मीडिया की रही, आम लोगो की लडाई को अपना बनाने वाली
इस जाबांज साथी को किसी अख़बार के दो पन्ने भी नसीब नहीं हुए. कुछेक को छोड़कर आखिर हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं, पड़ताल जरुरी है
(ये चिट्ठी टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई से छात्र नवीन दामले ने भेजी है)
*********************************************************
आज़ादी आजकल : तीन तस्वीरें

सीन 1
तारीख 12 अगस्त.... ऑफिस से निकलने की आपा-धापी थी... बाहर बहुत तेज़ धूप थी, लेकिन हड़बड़ाहट में गर्मी को कोई फिक्र ही नहीं थी। शाम 4.40 का शो था... फिल्म थी लव आजकल... मंदी के इस दौर में एक दोस्त ने फिल्म दिखाने का ऑफ़र किया था, इसलिए दिल्ली के लंबे जाम से जूझते हुए लक्ष्मीनगर के वी-3एस पहुचने की आपाधापी मची थी। सिनेमा पहुंचकर फटाफट टिकट लिया, और घुस गये हॉल में... लेकिन ये क्या... पूरा हॉल खाली पड़ा था...हमें लगा कि शायद हम गलत हॉल में आ गये... लेकिन थोड़ी देर में कुछ और लोगों ने भी एंट्री की... हॉल में सीट पर हम दोनों दोस्त लंबे पसर गये। थकावट बहुत ज्यादा थी और फिल्म शुरु होने में भी अभी दस मिनट का वक्त था... धीरे-धीरे लोग हॉल में आ रहे थे। बड़े परदे पर बोरिंड एड चल रहे थे, लेकिन मुझे थकावट की वजह से हल्की सी झपकी आ रही थी.. ऐसे वक्त में घड़ी भी शायद रुक-रुककर चलती है... लव आजकल का इंतज़ार और लंबा होता जा रहा था... मैंने फोन स्विच ऑफ़ किया.. दोस्त को बोला कि फिल्म शुरु हो जाए, तो जगा देना.. वैसे भी हॉल में तब तक तीस-चालीस लोग ही पहुंचे होंगे... अचानक ऐसा लगा जैसे जिस्म के रोंगटे खड़े हो गये... कानों में जो आवाज़ सुनाई पड़ी, उसने मन को झकझोर कर रख दिया... जन-गण-मन की मधुर आवाज़ सुनाई पड़ते ही पूरा हॉल एक साथ खड़ा हो गया... 52 सेकेंड के एक छोटे से लम्हें में ऐसा लगा जैसे सारी दुनिया सिमट आई हो। आंखो के सामने एक उभरता हुआ हिंदुस्तान था.. पंजाब-सिंधु-गुजरात मराठा से लेकर अखंड हिंदुस्तान आंखों के सामने नाच रहा था.. दिल जोश से भर उठा... खून रगों में और भी तेज़ी के साथ दौड़ने लगा। एक बार को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि मैं सिनेमाहाल में हूं.. ऐसा लगा, जैसे लालकिले की प्राचीर से सारा मुल्क एक आवाज़ में पुकार रहा है, जन गण मन अधिनायक जय है...


अब ज़रा दूसरी तस्वीर देखिए...

तारीख 13 अगस्त... राजधानी दिल्ली की सड़कों पर बच्चे पंद्रह अगस्त की ड्रेस में सजे-धजे नज़र आ रहे है... इस बार 14 अगस्त को जन्माष्टमी है, इसलिए स्कूलों ने दो दिन पहले ही पंद्रह अगस्त मना ली... ये उस राजधानी में होता है, जहां लालकिले की प्राचीर से सारे हिंदुस्तान को आज़ाद होने का एहसास कराया जाता है... लेकिन यहां के बच्चे इतने खुशनसीब कहां, जो पंद्रह अगस्त को ही अपने मुल्क में आज़ादी की सांस ले सकें। लेकिन ये बात आज तक समझ से परे है, कि दिल्ली के स्कूलों में पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी वक्त से पहले ही क्यों मना ली जाती है.. शायद ऐसा नेताजी की सुरक्षा के लिहाज़ से किया जाता होगा... लालकिले तक जाने वाले तमाम रास्ते बंद कर दिये जाते हैं... जिसको जाना है, वो पैदल जाओ... वरना आज़ादी के दिन पिकनिक मनाओ... नेताओं की हिफाज़त के लिए बच्चों से उनके एहसास छीन लिये जाते हैं। वो एक दिन पहले ही अपने मुल्क में पाकिस्तान की आज़ादी का जश्न मनाते हैं... सब जानते हैं कि पाकिस्तान हमसे एक दिन पहले ही 14 अगस्त को आज़ाद हुआ था।

आखिरी तस्वीर

14 अगस्त की सुबह.. दिल्ली में हल्की बारिश हो रही थी... सड़कें भीगी हुई थीं... घर से दफ्तर तक कम से कम पांच रेडलाइट पड़ती है... गाज़ीपुर पर लालबत्ती होती है... गाड़ियां ठहर जाती हैं.. आजकल इस साइट पर ओवरब्रिज बनने का काम चल रहा है.. लालबत्ती भी दस मिनट से कम नहीं होती... अचानक कुछ बच्चे जिनके जिस्म पर कपड़े भी ढंग से नहीं थे.. झंडे बेच रहे थे.. एक बच्चा मेरे पास आता है... भईया.. ले लो न... एक ले..लो.. पांच रुपये का है... उसकी आंखो में बेचने की बेकरारी थी.. उसे देखते ही दूसरे बच्चों ने भी मुझे घेर लिया... हर कोई कह रहा था.. भईया एक ले.. लो न.. कल पंद्रह अगस्त है... मुझे बड़ा गर्व हुआ ये जानकर.. कि अरे इन छोटे बच्चों को भी पता है.. कि कल पंद्रह अगस्त है... मैंने झट से दस रुपये निकाले.. और दो झंडे खरीद लिये.. एक बाइक पर लगाया और एक घर में लगाने के लिए रख लिया... तभी ग्रीन लाइट हो जाती है... मैंने भी गाड़ी स्टार्ट की.. और दफ्तर को चल दिया... अगली रेडलाइट यूपी बाईपास पर होती है... इस बार भी तिरंगे दिख रहे थे... लेकिन वो तिरंगे पैरों तले रौंदे जा रहे थे.. और गाड़ियां फुर्र से उनके ऊपर से निकल रही थीं...

(ये लेख अबयज़ खान ने भेजा है. इस लेख की तस्वीर मंजू गुप्ता जी ने मुंबई से भेजी है...)

(आज़ादी पर आप भी अपने विचारों के साथ शरीक हो सकते हैं....)

Saturday, August 08, 2009

एक दर्द-ए-मोहब्बत है जो पहले की तरह है...

हर अहद में हर चीज़ बदलती रही लेकिन

एक दर्द-ए-मोहब्बत है जो पहले की तरह है।


प्यार का कोई इतिहास तो नहीं है, लेकिन इसका दर्द हमेशा एक जैसा ही है। अगर माना जाए, तो प्यार की शुरुआत दुनिया में आदम और हव्वा के ज़माने से हुई थी। लेकिन प्यार की मिसाल में किसी का नाम आता है, तो विदेश में रोमियो और जूलियट, तो हिंदुस्तान में लैला-मजनू और शीरी-फ़रहाद को प्यार की बेमिसाल मूरत माना जाता है। अपने प्यार के लिए इन्होंने दुनिया की तमाम बंदिशों को हंसते-हंसते पार कर लिया। अपने महबूब के लिए ज़माने के तानों से लेकर गोलियां तक खाईं, लेकिन प्यार का एहसास और दर्द कभी कम नहीं हुआ। तमाम मौसम बदले, रुत बदलीं, वक्त बदला, लोग बदले, लेकिन वो मीठा सा प्यार कभी नहीं बदला।

जब कोई आपसे प्यार का एहसास करता है, तो दिल में एक अजीब से हलचल होती है। कभी-कभी सपनों में किसी की छुअन महसूस सी होती है। कभी-कभी लगता है कि दुनिया में इसके सिवा कुछ भी नहीं है, दुनिया में सबसे हसीन अगर कुछ है, तो सिर्फ़ आपका महबूब और आपका प्यार है। फिर ज़माने की परवाह किसे होती है। आपका प्यार आपसे जितना दूर जाता है, उससे अपनेपन का एहसास और भी बढ़ जाता है। बदलते मौसम के साथ पल-पल प्यार के रंग भी बदलते हैं.. दुनिया और सपनीली हो जाती है... मन में कुछ-कुछ होता है, कई बार लगता है कि ये ज़मीन और आसमान एक क्यों नहीं हो जाते, कई बार दिल चाहता है कि सारा जहान झुककर आपके कदमों में आ गिरे।

बसंत के हसीन मौसम में प्यार को पंख लग जाते हैं। अपने महबूब के साथ सपनों की दुनिया बसाई जाती है... लेकिन वक्त बदला तो प्यार का अंदाज भी बदल गया। बाग-बगीचों और प्रेम पत्रों से निकलकर प्यार रेसत्रां और पार्क में पहुंच गया। लव-लेटर की जगह ई-मेल और एसएमएस ने ले ली... मोबाइल पर बतियाने का जो दौर शुरु होता है, वो घंटो तक चलता है....लंबी बातचीत के बाद भी लगता है, कि अभी तो बात ही क्या हुई है। ऐसे में मोबाइल कंपनियां भी धड़ल्ले से फायदा उठा रही हैं। प्यार के इस एहसास को हर कोई कैश कराने में लगा है। जेब हल्की हो रही है... गर्लफ्रेंड को रिझाने के लिए बाज़ार भी नये-नये नुस्खे ला रहा है।

प्यार का एहसास कराने के लिए वेलेंटाइन डे नाम का एक त्योहार ही चल निकला है। प्यार मॉर्डन हो गया है, लेकिन प्यार करने वाले अब भी ज़माने से नहीं डरते, प्यार पर पहरा लगाने वाले हर दौर में थे और आज भी हैं। आदिम युग में प्यार करने वालों को पत्थर मार-मार कर कुचल दिया जाता था, सलीम और अनारकली को भला कौन भूल सकता है। एक कनीज को अपना प्यार अमर करने के लिए दीवार में चुन जाना कबूल था।... वक्त बदला, सदियां बदली, लेकिन न तो प्यार के दुश्मन बदले, न प्यार का अंदाज़ बदला और न ही प्यार के एहसास में कोई कमी आई। लेकिन अब प्यार पर पहरा लगाने वाले ज़ालिम ही नहीं जल्लाद भी हो गये।

चाहें पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो, या हरियाणा, प्यार की ख़ता सिर्फ़ मौत होती है। वहशियाना मौत, ऐसी मौत जिसमें मां-बाप और भाई-बहन ही अपने जिगर के टुकड़ों का क़त्ले-आम कर देते हैं। बात-बात में पश्चिम की नकल कर मॉडर्न होने का दम भरने वाले हम लोग इस मामले में मॉर्डन बनने की कोशिश कतई नहीं करते। मां-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की छूट खुलेआम देते हैं, समाज के ठेकेदार फ्लेक्सीबिलिटी की बात करते हैं, लेकिन जब कोई ज़माने के सामने अपने प्यार का इज़हार करता है, तो यही ज़माना दीवार बनकर खड़ा हो जाता है।

फिर मज़हब और जात-बिरादरी का रोना रोया जाता है। हिंदू और मुसलमान पर बहस होती है, मांगलिक और गैर मांगलिक पर बहस होती है। हरियाणा की खाप पंचायत के फैसलों को कौन भूला होगा, प्यार कर अपनी नई दुनिया बसाने वाले एक युवक को सिर्फ़ इसलिये मार डाला गया, कि उसने एक ही गोत्र में शादी की थी, लेकिन हुआ क्या? खूब हो-हल्ला मचा, लेकिन वोट के ठेकेदारों के मुंह से उफ़्फ़ तक नहीं निकली... लेकिन सलाम है...प्यार के परिंदों को जिन्होंने हर अहद में अपने प्यार को अमर रखा, और ज़माने की हर दीवार को गिरा दिया।

अबयज़ खान

Wednesday, July 22, 2009

बेडरूम का सच और एक करोड़ रुपए



क्या आपने कभी अपनी बेटी की उम्र की किसी लड़की के साथ सेक्स किया है?

जवाब मिलता हैं.. हां।

क्या आप कभी अपने पति के अलावा किसी और के साथ गैर मर्द के साथ नाजायज़ रिश्ता बनाने की कोशिश करेंगीं?

जवाब मिलता है.. नहीं।

लेकिन ये जवाब गलत था। ये एक बानगी भर है उस प्रोग्राम की, जो आजकल स्टार प्लस पर आता है। अमेरिकी शो 'मोमेंट ऑफ ट्रूथ'की नकल पर शुरु हुए इस प्रोग्राम के ज़रिए हिंदुस्तान में सच की गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र के इस मुल्क में जहां हज़ारों गुरु पंडितों और मुल्ला मौललवियों ने इस मुल्क की बुनियाद रखी, वहां आज लोगों को सच सिखाने की ज़रूरत पड़ रही है। जहां लाखों पीर-फकीर गंगा-जमुनी तहजीब की सीख देकर चले गये। वहां टीवी पर सच सिखाया जा रहा है। सच भी कैसा। बेडरूम का सच। नाजायज़ रिश्तों का सच। साजिशों का सच। मर्डर और दोस्ती में दरारों का सच। सेक्स और बेवफ़ाई के अजीबो-गरीब रिश्तों का सच। प्यार-मौहब्बत में नाकाम रहने का सच। फलर्ट करने का सच। सच भी ऐसा जिसमें सिर्फ़ मसाला हो, तड़का हो। वो भी किसलिए सिर्फ़ एक करोड़ रुपयों के लिए। और एक करोड़ भी तब मिलेंगे जब आप सभी 21 सवालों का सही जवाब देंगे। मुझे आचार्य धर्मेद्र की एक बात बहुत अच्छी लगी, कि आप पैसा देना बंद कर दो, लोग टीवी पर सच बोलना बंद कर देंगे। लोग टीवी पर पैसे के लिए सच बोल रहे हैं। प्रोग्राम के पीछे तर्क दिया जा रहा है, कि इसके आने के बाद लोग सच बोलने लगे हैं। मेरा उनसे यही सवाल है कि क्या इससे पहले समाज में लोग सच नहीं बोलते थे? क्या अब तक मुल्क और समाज की बुनियाद झूठ के ढर्रे पर चल रही थी? एक सच ये है कि मैं कभी झूठ नहीं बोलता। आप भले ही यकीन न करें, लेकिन मुझे झूठ बोलना बिल्कुल पसंद नहीं है। आप सोच रहे होंगे कि मैं शायद स्टार प्लस पर आने वाले प्रोग्राम सच का सामना के बाद कुछ बदल गया हूं। आप सोच रहे होंगे कि इस प्रोग्राम के आने के बाद हिंदुस्तान में राजा हरिशचन्द्र कहां से पैदा हो गये। लेकिन जनाब ऐसा नहीं हैं। यहां सदियों से लोग सच का सामना करते हैं। अब अगर कोई राखी सावंत से सच बोलता है कि वो पहले से शादी-शुदा है, तो क्या ये सच का सामना का असर है। दरअसल ये भी एक ड्रामा था। जिसके पीछे भी था पैसे का बड़ा खेल। मतलब फुल ड्रामा। और फिर यहां जो भी शख्स सच बोलता है, उसकी पूरी फैमिली उसके सामने बैठती है। झूठ और सच के साथ ही उनके एक्सप्रेशन भी बदलते जाते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि कोई पति या पत्नी अपनी बीस साल की शादी-शुदा ज़िंदगी में डर की वजह से अपने राज़ एक-दूसरे से शेयर ही न करे। और जब बात एक करोड़ मिलने की आती है, तो उसके राज़ परत दर परत सारी दुनिया के सामने खुल जाते हैं। मुझे याद है कि कई साल पहले राजेन्द्र यादव जी ने अपनी पत्रिका हंस में ऐसी ही एक सीरीज़ चलाई थी। जिसमें अपनी ज़िंदगी का कच्चा चिट्ठा लिखना था। मैगज़ीन बाज़ार में आई, लेकिन लेख छपते ही हल्ला मच गया। कुछ लोगों ने बड़े उतावले पन के साथ अपनी ज़िंदगी को तार-तार करने की कोशिश की थी। लेकिन नतीजा क्या निकला। हंगामा मचा, तो हंस को सीरीज़ ही बंद करना पड़ी। अफ़सोस ये है कि इस प्रोग्राम का भी वहीं हश्र न हो। सच का सामना करने के चक्कर में कहीं रिश्ते दरक न जाएं, और भरोसे पर टिका जिंदगी का घंरौंदा एक हल्के से झोके में ही ज़र्रा-ज़र्रा करके बिखर जाए। सच के ठेकेदारों समाज पर कुछ तो रहम करो। क्योंकि कुछ झूठ ख़ूबसूरती के लिबास में ही अच्छे लगते हैं।

अबयज़ खान

Saturday, July 18, 2009

राखी के स्वयंवर में नामर्द


टीवी पर बीएसएनएल का एक एड आता था, जिसमें प्रीति जिंटा कहती थीं, कि अगर इनके पास बीएसएनएल का कनेक्शन नहीं है, तो वो इनके बेटे से शादी नहीं करेंगी। आजकल टीवी पर एक एड आता है अमूल माचो का.. जिसमें एक लड़के को देखने लड़की और उसके घरवाले आते है और बेचारा लजाता, शर्माता हुआ उनके लिए चाय लाता है। उसके बाद दूसरी तस्वीर में दिखाया जाता है कि कैसे लड़की उसे बाइक पर बैठाकर घुमाने ले जाता है, लड़की स्पीड ब्रेक लगाती है। झटका खाकर बेचारा लड़की से टकराता है। तो एक और तस्वीर में बस में खड़े होकर सफ़र कर रहे एक लड़के को एक लड़की छेड़कर निकल जाती है और बेचारा शर्म से लाल हो जाता है। आखिर क्या ज़माना आ गया है। इतने तक तो ठीक था। लेकिन अब तो सबकुछ उल्टा हो रहा है। राखी सांवत के स्वंयवर के बारे में तो आप सभी जानते होंगे। इस स्वंयवर में नाटक है, रोमांस है, और एक्शन भी। लेकिन राखी के चाहने वालों को न तो इसमें धनुष तोड़ना है और न ही मछली की आंख पर निशाना लगाना है। पूरे फिल्मी ड्रामे से भरी इस कहानी में राखी को किसी हूर से कम नहीं पेश किया है। और लड़के, वो तो बेचारे ऐसे लगते हैं, जैसे किसी रानी के गुलाम। राखी की हर अदा पर झुककर सलाम करने वाले, राखी के झूठ को सच साबित करने वाले, राखी जी बल खाकर चलती हैं, तो बेचारे मुंडे उनके कदमों में बिछे चले जाते हैं। और अगर राखी साहिबा उनसे खुश हो गईं, तो खाने को मिलेंगे लड्डू। शादी के लड्डू के बारे में तो सभी जानते हैं, जो खाए वो पछताए और जो न खाए वो पछताए। लेकिन राखी के साथ सपने बुनकर सभी 16 राजकुमार लड्डू खाना चाहते हैं। और राखी उनके सामने ऐसे पेश आती हैं, जैसे मल्लिका-ए-हिंदुस्तान। हद तो तब हो गई, जब राखी को पाने के लिए वो आग के शोलों पर भी नंगे पांव गुज़र गये। और तो और स्वंयवंर में आई ईवेंट मैनेजर ने दूल्हों को चुनौती दी, कि एक-दूसरे की गर्दन में सरिया फंसाकर जो इसे मोड़ देगा, राखी जी उससे बेहद खुश होंगी। और बेचारे दूल्हों ने ऐसा भी किया। मरता क्या न करता आखिर राखी को जो पाना है। और राखी इतनी बोल्ड हैं कि शो में खुलेआम कह रही हैं कि मुझे इनके छूने से कोई फीलिंग नहीं हो रही है, इनके छूने से मुझे कुछ एहसास ही नहीं हुआ। ये सब जानते हुए भी कि इस शो को सारी दुनिया देख रही है। लेकिन ये तो राखी हैं, राखी को क्या, कुछ भी बोल सकती हैं। बेचारे कुंआरे अब खुद को भरी पब्लिक के सामने नामर्द समझें, या राखी को संतुष्ट करने के लिए किसी नीम-हकीम से मर्दानगी की दवा खरींदे। आखिर राखी को जो पटाना है। लेकिन राखी हैं, कि आराम से पटना ही नहीं चाहतीं। लड़के लाख मिन्नतें कर रहे हैं, इतना ही नहीं, राखी को पटाने के लिए बेचारे एक-दूसरे को भगाने के लिए उसी तरह की ख़तरनाक साज़िशें रच रहे हैं, जैसे किसी रियलिटी शो में लड़कियां एक-दूसरे के खिलाफ़ जाल बुनती हैं। लड़के राखी के सामने हाथ बांधे खड़े हैं, कब मैडम की मेहरबानी हो जाए और उनको मिठाई का डिब्बा मिल जाए। लेकिन मिठाई मिलना सबकी इच्छा नहीं है, हर कोई चाहता है कि राखी उसे वरमाला पहना दें। वाकई ज़माना बदल गया है, अब मां का लाडला अपने लिए बहू नहीं ढूंढ रहा है, बल्कि एक बहू अपने लिए पति ढूंढ रही है। अब पति परमेश्वर होगा, या पत्नी पतिव्रता, ये तो भगवान ही जाने। लेकिन ज़माना सचमुच बदल गया है।

अबयज़ खान

Wednesday, July 08, 2009

हम ख़बर हैं, बाक़ी सारा भ्रम है...



मुर्गी ने आदमी के बच्चे को जन्म दिया है। सुनने में आपको थोड़ा अटपटा ज़रूर लगेगा, लेकिन ये ख़बर आई है मध्य-प्रदेश के रायसेन शहर से। एक टीवी चैनल पर ये ख़बर चलने के बाद दूसरे चैनलों के पत्रकार भी इसे कवर करने दौड़ पड़े। बिना ये जांच-पड़ताल किये, कि क्या एक मुर्गी भी इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। मज़े की बात ये है कि इस पर किसी ने अपना दिमाग लगाने की ज़रूरत भी नहीं समझी। मामला मध्य प्रदेश में रायसेन के एक गांव बाड़ीकला का है। जहां से ख़बर आई कि यहां रहने वाले पतिराम नाम के शख्स के घर मुर्गी ने एक इंसान के बच्चे को जन्म दिया है। इस ख़बर के आने के बाद मीडिया वाले दौड़ पड़े। लेकिन डॉक्टरों के साथ ही आम लोगों का दिमाग भी चकरा गया। हर कोई ये सोच रहा था कि ऐसा भला कैसे हो सकता है। मेरे चैनल में भी ये ख़बर आई, तो मैं भी इसे सुनकर चौंक गया। पहले तो ख़बर की आपा-धापी में यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन जब इसकी तस्वीरें देखीं, तो माजरा समझते देर नहीं लगी। मुर्गी के साथ एक इंसान का चार इंच का भ्रूण दिख रहा था। जिसको लेकर ये दावा किया जा रहा था कि इंसान के इस बच्चे को मुर्गी ने ही जन्म दिया है। लेकिन मुर्गी को देखकर तरस आ रहा था, बेचारी अपने हाल पर बेबस थी, कैमरे की निगाहों के साथ ही उसे ज़माने की नज़रों का सामना भी करना पड़ रहा था। बेज़ुबान परेशान थी, अपनी सफ़ाई में क्या कहे, किससे कहे और कैसे कहे। कैसे लोगों को बताए कि इसमें उसका कोई कसूर नहीं है, बल्कि इसका पापी तो कोई और है, जो अपने गुनाहों पर पर्दा ढकने के लिए मेरे दड़बे में इस भ्रूण को रखकर चला गया है। लेकिन जैसे लोग नासमझ थे, वैसे ही मुर्गी भी लाचार थी। उसका मासूम चेहरा देखकर उस बेचारी पर तरस आ रहा था। जो ख़ता उसने की ही नहीं उसका इल्ज़ाम उसके मत्थे मढ़ दिया गया था। और तो और उसका मालिक भी इस ख़बर को कैश कराने में लगा था। मुर्गी बेचारी के हर एंगल से शॉट्स बनाए जा रहे थे। वो तो बस नहीं चला, अगर मुर्गी बोल पाती, तो शायद उससे तमाम तरह के बेतुके सवाल भी पूछ लिए होते। हो सकता है कोई ये भी पूछ लेता, कि इस बच्चे का बाप कौन है? डॉक्टर भी बेचारे बोल-बोलकर परेशान थे, कि कुदरत के नियम में इस तरह का कोई खिलवाड़ नहीं हो सकता। भला मुर्गी भी कहीं इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। लेकिन सुनने को कोई तैयार ही नहीं था। ये किस्सा बिल्कुल ऐसा ही था, जैसे हमने जर्नलिज्म में पढ़ा था कि अगर कुत्ता आदमी को काटे तो ख़बर नहीं है, लेकिन अगर आदमी कुत्ते को काटे तो ख़बर बन जाती है।

अबयज़ खान

Tuesday, April 28, 2009

15वीं लोकसभा चुनाव को याद रखने के कई कारण

अबयज़ ख़ान टीआरपी बटोर रहे मीडिया चैनलों में से एक का अदना-सा हिस्सा हैं.....'हम ख़बर हैं' का भ्रम फैला रहे वॉयस ऑफ इंडिया न्यूज़ चैनल में इनके साथ काम करने का मेरा अनुभव महज़ तीन महीनों का है, मगर जब सोच एक-सी हो तो रिश्तों की मियाद बढ़ते देर नहीं लगती....हमने जब इनसे बैठक पर आने का न्योता दिया तो इन्होंने हिंदयुग्म को अच्छी-तरह देखभाल कर हामी भरी.....अब ये बैठक पर अक्सर नज़र आयेंगे.....ये भी बता दें कि ब्लॉगिंग की दुनिया में भी ये नये नहीं हैं.....

2009 का आम चुनाव कई मायनों में ख़ास रहेगा। मुद्दों से दूर इस बार का लोकसभा चुनाव बेमतलब की फूहड़ बयानबाज़ी के लिये याद रखा जाएगा। वरुण गांधी के ज़हर बुझे तीरों से शुरू हुआ चुनावी सफ़र अब तक के सबसे घटिया दौर से गुज़र रहा है। जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए नेता मुद्दों के बजाए एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। वरुण ने हाथ काटने की बात की, तो बिहार में राबड़ी देवी नीतीश कुमार के बारे में ऐसे-ऐसे बोल बोल गईं जो न सिर्फ़ तहज़ीब के खिलाफ़ थे, बल्कि देश की इमेज पर भी बट्टा लगा रहे थे। राबड़ी ने शुरूआत की तो लालू कहाँ पीछे रहने वाले थे। वरुण ने ज़हर उगला तो लालू वरुण पर रोड-रोलर चलवाने की धमकी दे गये। मतलब हर नेता तू सेर तो मैं सवा सेर साबित होने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मज़े की बात ये है कि इस बार के चुनाव को नेताओं ने गंभीरता की बजाए प्रैक्टिकल ग्राउंड बना दिया। समाजवादी पार्टी ने ये जानते हुए भी कि संजय दत्त मुंबई मामले में दोषी हैं, उन्हें लखनऊ से लड़ाने का ऐलान कर दिया, लेकिन जब बाद में परमिशन नहीं मिली, तो संजय की जगह नफ़ीसा अली को मैदान में उतार दिया। इसका मतलब ये है कि यूपी की इस बड़ी पार्टी को लगता है कि लखनऊ के सिर्फ़ वही ठेकेदार हैं, और लखनऊ की आवाम को इसका फैसला करने का कोई अधिकार नहीं है। संजय दत्त को नेता बनाने पर तुली पार्टी ने उन्हें महासचिव बना दिया, तो मुन्ना बहनजी के खिलाफ़ ऐसी घटिया ज़ुबान का इस्तेमाल कर गये कि उन्हें लेने के देने पड़ गये। वैसे भी ले-देकर उन्हें एक ही डायलॉग आता है, 'मैं मुन्ना और आप मेरे सर्किट' वैसे उनके सर्वहारा भाई (जो अमूमन सभी फिल्मी सितारों के भाई बन जाते हैं) अमर सिंह ने तो रामपुर से जया प्रदा के चुनाव को अहम की लड़ाई बना लिया और अपनी ही पार्टी के आज़म खान को खरी खोटी सुना डाली। बयान बहादुर बनते-बनते अमर इतने भारी हो गये कि मंच भी उनका वज़न नहीं संभाल पाए।

चलिए अब यूपी से आगे बढ़ते हैं। नेशनल लेवल पर नज़र डालें तो मौजूदा पीएम और पीएम इन वेटिंग ने एक दूसरे के खिलाफ़ तलवारें निकाल रखी हैं। अभी तक दोनों एक-दूसरे को कमज़ोर साबित करने पर तुले हैं, लेकिन शायद दोनों को ही सियासत का कॉम्पलान पीने की ज़रूरत है। तो उधर बिहार में लालू और पासवान अपनी ही सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोले खड़े हैं। तलवारें तन गईं हैं और सभी की नज़र देश को एक मज़बूत सरकार देने के बजाए पीएम की कुर्सी पर लगी हैं। तो बिहार में प्रणव मुखर्जी, लालू को उन्हीं के अंदाज़ में जवाब दे गये। ये अलग बात है कि बाद में वो कमज़ोर हिंदी का हवाला देकर बयान से किनारा कर गये। तो यूपी में दिग्विजय सिंह मायावती को सीबीआई की धमकी दे गये। और तो और बीजेपी में जेटली और राजनाथ सिंह में ही तलवारें खिंच गई, वो भी सिर्फ़ इसलिये कि जेटली को लगने लगा कि राजनाथ, सुधांशु मित्तल को आगे कर उनके पर कतर रहे हैं। हालात ये हो गई कि बयान बहादुर नेताओं के आगे चुनाव आयोग भी बेबस नज़र आ रहा है। चुनाव कराने से ज्यादा बड़ा काम तो उसके सामने नेताओं को नोटिस जारी करने का है। हालात ये हो गई है कि चुनाव आयोग को भी शायद याद नहीं होगा कि इस बार उसने कितने नोटिस बांटे हैं। लेकिन इस बार के चुनाव को बिना जूते के कैसे भूल सकते हैं। चिदंबरम पर जूता पड़ा तो टाइटलर और सज्जन कुमार चुनावी आंधी में उड़ गये। जिंदल पर जूता पड़ा को कांग्रेस की और भी फ़ज़ीहत हो गई। जूते पर कांग्रेस को घेरने वाली बीजेपी भी इस वार से नहीं बची, भले ही पीएम इन वेटिंग चप्पल का निशाना बने हों, लेकिन ये तो साफ़ हो गया कि भगवा पार्टी में भी सब कुछ ठीक नहीं है। यानि अब तक जनता से जुड़े मुद्दे कहीं भी नहीं। मंदिर पर फेल हुई बीजेपी इस बार काले धन का रोना रो रही है, जिसका न तो आम आदमी से कोई मतलब और न ही पैसा आने से रहा। लेकिन सबसे दिलचस्प रहा समाजवादी पार्टी का मेनीफेस्टो। मुद्दों की बात तो दूर, जनाब तो अंग्रेजी और कंप्यूटर के सफ़ाये की बात ही कर गये। इस बार के चुनाव में क्या-क्या नहीं हुआ जो बताया जाए, जब नेताजी को कुछ नहीं सूझा तो उन्होने नोट बांटना ही शुरु कर दिये। मतलब लिखने को इतना कुछ कि किताब छप जाए, और शायद अगर इस पर किताब आ जाए तो बेस्ट सेलर भी बन जाए। ये उस देश के महासंग्राम का हाल है जहां दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कायम है। जहां सत्ता की कुंजी आम आदमी के हाथ में मानी जाती है, लेकिन चुनाव के बाद नेताजी की झोली भरती है और आम आदमी रह जाता है खाली हाथ। वैसे भी इस बार का ड्रामा देखकर तो यही लग रहा है कि ये नेता मंडली के कलाकार हैं और सब तमाशाई हैं, जिसका नाटक ज्यादा पसंद आयेगा उस पर वोट लुटा देंगे, और फिर उनके हाथ में सौंप देंगे अपनी किस्मत पांच साल के लिए। शायद इसीलिए ये चुनाव 'अमर' रहेगा। धन्य हो...मेरा भारत महान