Showing posts with label i love hindi. Show all posts
Showing posts with label i love hindi. Show all posts

Tuesday, July 07, 2009

ब्लू फिल्म

गौरव सोलंकी हिंदयुग्म का एक बड़ा नाम है....लगभग दो साल के हमारे रिश्ते में वो मुझसे उम्र की कई सीढियां आगे चढ़ गए हैं....हिंदयुग्म के कई सुख-दुख हमने साझा किए....आजकल उन्हें महान बनने की ज़िद है....सो, ब्लॉगिंग में वक्त ज़ाया नहीं करते...सिर्फ कहानियां लिखते हैं.....कहानियां ऐसी जैसे किसी कविता को हर सिरे से खींचकर लंबा कर दें और कहानी बन जाए....चूंकि, उनसे ज़रा पर्सनल ताल्लुक भी है, तो कह सकता हूं कि ज़िंदगी के दिनों को भी फिलहाल किसी नज़्म की तरह पढ़ रहे हैं जो उनकी समझ से बाहर हो...बैठक पर अब इस लंबी कहानी के ज़रिए कुछ हफ्तों तक नज़र आते रहेंगे...क्या पता, तब तक महान ही बन जाएं.... इत्तेफाक से आज गौरव का जन्मदिन भी है.....

भाग-1

भूखी गाली, भूखा घूंसा, भूखा सपना.....

जिस तरह ज़रूरी नहीं कि चाट पकौड़ियों की सब कहानियाँ करण-जौहरीय अंदाज़ में चाँदनी चौक की गलियों से ही शुरु की जाएँ या बच्चों की सब कहानियाँ ‘एक बार की बात है’ से ही शुरु की जाएँ या गरीबी की सब कहानियाँ किसानों से ही शुरु की जाएँ या कबूतरों की सब कहानियाँ प्रेम-पत्रों से ही शुरु की जाएँ, उसी तरह ज़रूरी नहीं कि सच्चे प्रेम की सब कहानियाँ सच से ही शुरु की जाएँ। इसीलिए मैंने रागिनी से झूठ बोला कि वही पहली लड़की है, जिससे मुझे प्यार हुआ है। ऐसा कहने से तुरंत पहले वह अपने विश्वासघाती प्रेमी की कहानी सुनाते सुनाते रो पड़ी थी। “तुम रोते हुए बहुत सुन्दर लगती हो”, यह कहने से मैंने अपने आपको किसी तरह रोक लिया था। फिर मैंने उसके लिए एक लैमन टी मँगवाई थी। मैंने सुन रखा था कि लड़कियों को खटाई पसन्द होती है, खाने में भी और रिश्तों में भी।
उसे कोई मिनर्वा टाकीज पसन्द था। मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह इमारत दुनिया के किस कोने में है। वह देर तक उसके साथ वहाँ बिताए हुए ख़ूबसूरत लम्हे मुझे सुनाती रही। बीच में और एकाध बार मैंने दोहराया कि वही पहली लड़की है, जिससे मुझे प्यार हुआ है। मेरी आँखें उसकी गर्दन के आसपास कहीं रहीं, उसकी आँखें हवा में कहीं थीं। मैंने सुन रखा था कि लड़कियों के दिल का रास्ता उनकी गर्दन के थोड़ा नीचे से शुरु होता है। मैं उसी रास्ते पर चलना चाहता था। वैसे शायद सबके दिल का रास्ता एक ही जगह से शुरु होता होगा। सबका दिल भी एक ही जगह पर होता होगा। मैंने कभी किसी का दिल नहीं देखा था, लेकिन मैं फिर भी इस बात पर सौ प्रतिशत विश्वास करता था कि दिल सीने के अन्दर ही है। हम सब को इसी तरह आँखें मूँद कर विश्वास करना सिखाया गया था। हम सब मानते थे कि जो टीवी में दिखता है, अमेरिका सच में वैसा ही एक देश है। यह भी हो सकता है कि अमेरिका कहीं हो ही न और किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए कोई बड़ा सैट तैयार किया गया हो, जिसे अलग अलग एंगल से बार बार हमें दिखाया जाता रहा हो। जो लोग अमेरिका का कहकर यहाँ से जाते हों, उन्हें और कहीं ले जाकर कह दिया जाता हो कि यही अमेरिका है और फिर इस तरह एमिरलैंड अमेरिका बन गया हो। क्या ऐसा कोई वीडियो या तस्वीर दुनिया में है, जिसमें किसी देश के बाहर ‘अमेरिका’ का बोर्ड लगा दिखा हो? लेकिन टीवी में देखकर विश्वास कर लेना हमारी नसों में इतने गहरे तक पैठ गया था कि कुछ लोग अमेरिका न जा पाने के सदमे पर आत्महत्या भी कर लेते थे। ऐसे ही कुछ लोग प्रेम न मिलने पर भी मर जाते थे, चाहे प्रेम सिर्फ़ एक झूठी अवधारणा ही हो।
लेकिन डॉक्टर समझदार थे। कभी किसी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में नहीं लिखा गया कि अमुक व्यक्ति प्यार की कमी से मर गया। यदि दुनिया भर की आज तक की सब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी जाएँ तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि दुनिया में हमेशा प्यार बहुतायत में रहा। लोग सिर्फ़ कैंसर, पीलिया, हृदयाघात और प्लेग से मरे।
वह एक पुराना शहर था जिसे अपने पुराने होने से उतना ही लगाव था जितना वहाँ की लड़कियों को अपने पुराने प्रेमियों से। रागिनी ने मुझे समझाया कि लड़के कभी प्यार को नहीं समझ सकते। मैंने सहमति में गर्दन हिलाई। गर्दन के थोड़ा नीचे मेरे दिल तक जाने वाला रास्ता भी उसके साथ हिला। फिर हम एक मन्दिर में गए, जिसके दरवाजे पर कुछ भूखे बच्चे बैठे हुए थे। अन्दर एक आलीशान हॉल में सजी सँवरी श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने वह सिर झुकाए कुछ बुदबुदाती रही। मैं इधर उधर देखता रहा। जब हम लौटे तो भूखे बच्चे भूखे ही बैठे थे। उनमें से एक ने दूसरे को एक भूखी गाली दी, जिस पर भड़ककर दूसरे ने पहले के पेट पर एक भूखा घूंसा मारा। और बच्चे भी लड़ाई में आ मिले। वहाँ भूखा झगड़ा होता रहा। अपने में खोई रागिनी ने यह सब नहीं देखा। मैंने जब उसे यह बताया तो उसने कहा कि भूख बहुत घिनौना सा शब्द है और कम से कम मन्दिर के सामने तो मुझे मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। यह सुनकर मेरा एक भूखा सपना रोया। मैं हँस दिया।
वहीं पास में एक सफेद पानी की नदी थी जो दूध की नदी जैसी लगती थी। सर्दियों की रातों में जब उसका पानी जमने के नज़दीक पहुँचता होगा तो वह दही की नदी जैसी बन जाती होगी। उस नदी के ऊपर एक लकड़ी का पुल था जिस पर खड़े होकर लोग रिश्ते तोड़ते थे और दो अलग-अलग दिशाओं में मुड़ जाते थे। उस पुल का नाम रामनाथ पुल था। मुझे लगता था कि रामनाथ बहुत टूटा हुआ आदमी रहा होगा।
हम उस पुल के बिल्कुल बीच में थे कि एकाएक रागिनी रुककर खड़ी हो गई। रिश्ते टूटने वाला डर मुझे चीरता हुआ निकल गया। वह पुल के किनारे की रेलिंग पर झुकी हुई थी। फिर उसने कुछ पानी में फेंका, जो मुझे दिखा नहीं।
मैंने कहा- रागिनी, तुम ही दुनिया की एकमात्र ऐसी लड़की हो, जिससे प्यार किया जा सकता है।
वह गर्व से मुस्कुराई। वह मुस्कुराई तो मुझे अपने कहने के तरीके पर गर्व हुआ।
वह एक ख़ूबसूरत शाम थी, जिसमें एक अधनंगी पागल बुढ़िया पुल पर बैठकर ढोलक बजा रही थी और विवाह के गीत गा रही थी। कॉलेज में पढ़ने वाले कुछ लड़के वहाँ तस्वीरें खिंचवा रहे थे। रागिनी ने अपना दुपट्टा हवा में उड़ा दिया जो सफेद पानी में जाकर गिरा। उसका ऐसा करना उन लड़कों ने अपने कैमरे में कैद कर लिया। चार लड़कों वाली फ़ोटो के बैकग्राउंड में दुपट्टा उड़ाती रागिनी।
उन चारों लड़कों को उससे प्यार हो गया था। वे जीवन भर वह तस्वीर देखकर उसे याद करते रहे। उन्होंने एक दूसरे को यह कभी नहीं बताया।
फिर रागिनी ने अपना मुँह मेरे कान के पास लाकर धीरे से कहा कि वह मुझे कुछ बताना चाहती है। उसके कहने से पहले ही मैंने आँखें बन्द कर लीं। उसने हाथ हवा में उठाकर कोई जादू किया और उसके हाथ में शादी का एक कार्ड आ गिरा। वह जादू जामुनी रंग का था जिस पर लिखा था, ‘रागिनी संग विजय’।
यह बहुत पहले ही किसी ने तय कर दिया था कि सब शादियों के निमंत्रण पत्र गणेश जी के चित्र से ही शुरु किए जाएँ। कहानी यहीं से आरंभ हुई....

(क्रमश:)

गौरव सोलंकी

Tuesday, June 23, 2009

जूतमपैजार से प्रेमिका के द्वार तक....

ऐसा मेरे साथ पता नहीं भाई साहब क्यों होता है कि दो बच्चों को भरा पूरा बाप होने के बाद भी सुबह सैर को जाते-जाते पांव अनायास ही जूतमपैजार हुई प्रेमिका के द्वार की ओर यकायक मुड़ जाते हैं। क्या आप के साथ भी ऐसा होता है ?

अब पता नहीं बंदे की किस्मत ही खराब है या आदमी सच्ची को गलती का पुतला है। आदमी भी क्या कुत्ती(यहां आप बीप की आवाज़ के साथ पढ़ें) चीज है भाई जी, सेहरा बांध कर बाजे गाजे, पियक्कड़ दोस्तों की टोली के साथ दारू-शारू पीकर, बूढ़ी घोड़ी को रूलाता, अग्नि को साक्षी मानकर ब्याह कर किसी और को लाता है और प्रेम किसी और से कर बैठता है। आह री जिंदगी!

जिस प्रेमिका के चक्कर में पड़ लोक-लाज को लात मार सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेंगे पर रख धर्म बदल, कर्म बदल दो बच्चों को एक्स बाप की यादों के सहारे छोड़ अपनी पत्नी के सिंदूर में से चुटकी भर सिंदूर अपनी प्रेमिका को दे शान से सबकी थू थू को थू थू करता हनीमून पर निकल पड़ा था वैवाहिक जीवन में एक नया इतिहास रचने तो समाज ने पता नहीं तब क्या क्या नहीं कहा था। समाज का क्या? इसे तो कुछ न कुछ कहना ही होता है। उम्र भर एक ही पत्नी के पल्लू के साथ बंध कर रहो तो भी कुछ न कुछ कहता ही है। मेरा तो मानना है कि आम आदमी को भी जिंदगी में कम से कम एक बार सच्चा प्यार जरूर करना चाहिए। विवाहेतर प्रेम कोई बड़े लोगों की बपौती नहीं। विवाहेतर प्रेम पर सबका हक है। इसलिए जब दाव लगे तब सही।

यारो! ये तो अपनी हिम्मत थी कि टांगों तक बाल सफेद हो जाने के बाद भी हमने इश्क को जिंदा रखने के लिए एक बार फिर सिर ओखली में दे डाला। सबने कहा, "हमारा धर्म केवल एक बार ही ओखली में सिर देने की इजाजत देता है।´ कोई बात नहीं , मुझे तो बस ओखली में सिर देने को जुनून था सो ऐसे भी तो वैसे भी कर दे दिया।

समाज को और तो सब कुछ पसंद आता है पर विवाहित का किसी और से प्यार करना रास क्यों नहीं आता? मैं समाज से पूछता हूं कि विवाह होने के बाद क्या आदमी के भीतर का प्रेमी मर जाना चाहिए? एक ही खूंटे से पुरूष को क्यों बांध कर रखना चाहते हो....हे समाज सुधारकों! पुरूष प्रधान समाज में भी पुरूष के साथ ऐसी ज्यादती! जहां पहले और केवल पहले प्यार के विशुद्ध प्रेमी भी रहते हैं खटपट तो वहां भी होती है। और अपना प्यार तो ....

मुझे पता नहीं लाख बदनाम होने के बाद भी किस आकर्षण ने खींचा कि मैं कल सुबह निकला तो था सेहत सुधार के लिए और जा पहुंचा फिर प्रेमिका के घर। जो प्रेमिका मेरे वियोग में पहले बीसियों नींद की गोलियां खाने के बाद भी न सो पाती थी तब ठाठ से सोई थी।

मुझे ट्रैक सूट में हांफते देख मेरी प्रेमिका की मां ने मुस्कारते हुए पूछा,` और कैसे हो मेरी बेटी को हीरोइन बनाने वाले?´

`जहाज का पंछी अब जहाज पर लौट आना चाहता है।´

`पुराने जहाज का क्या होगा?´ कुछ कहने के बदले मैं चुप रहा।

`हमारी किश्ती में छेद डालकर इतने दिन कहां रहे?´

` विदेश चला गया था।´

` वहां फिर कोई धर्म तो नहीं बदल आए?´

` बदलता तो अखबार में पढ़ नहीं लेतीं आप। खुदा कसम खाकर कहता हूं कि अब जीना छोड़ दूंगा पर ये साथ न छोड़ूंगा। ´

` भौंरें और पतियों पर विश्वास करना है तो कठिन है, पर चलो दिल लुभाने के लिए कर लेती हूं। बेटी! देख तेरा भौंरा लौट आया है।´

`तुम कहां थे इतने दिन हे मेरे प्राणनाथ?´

`प्राणनाथ रास्ता भटक गया था हे मेरी प्रिय!´

` अब तो छोड़कर कहीं नहीं जाओगे न? तुम अगर अबके मुझे छोड़कर गए तो मैं सच्ची को आत्महत्या कर लूंगी। देखो तो समाज ने हमारा हुक्का पानी बंद कर दिया।´

` करने दो। दो प्यार करने वालों के साथ ये और कर ही क्या सकता है।´

`देखो सेकिंड हैंड पति, समाज ने हमारे पुतले जलाने शुरू कर दिए।´

` इससे तो हमारे प्रेम की उम्र ही बढ़ेगी। बट, आलरेडी विवाहित पुरूष पर इतना विश्वास ठीक नहीं प्रिय!´

मैंने अपनी ओर से फ्री होते हुए उसे वैधानिक चेतावनी दी ताकि कल को मुझे और ग्लानि न हो।

`अब विश्वास करने के सिवाय और मेरे पास बचा भी क्या है मेरे भी प्राणनाथ!´
हाय रे प्रेमिका की विवशता!

` चलो, चलो, प्रेस वाले भी आए हैं। एक फैमिली फोटो हो जाए।´ सास ने दनदनाते हुए कहा। ऐसे दामाद किसी-किसी सास को ही नसीब होते हैं न भाई साहब!

`स्माइल प्लीज!´ प्रेस फोटोग्राफर ने कहा तो मुझे लगा जैसे मैं पहली पत्नी के साथ होऊं।

डॉ. अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

Wednesday, June 17, 2009

हिंदी सीख रहे हैं मैक्समूलर के वंशज




जर्मनी के कोलोन शहर में रहने वाले 23 साल के टॉमस रूथ हिंदी फ़िल्मों के दीवाने है. हम दिल दे चुके सनम और देवदास उनकी चहेती फिल्में हैं.
उनकी दीवानगी इस हद तक है कि उन्होंने हिंदी सीखने का ही फैसला कर लिया. शुरूआत उन्होंने प्राइवेट ट्यूशन के साथ की लेकिन अब वो बाकायदा हिंदी की पढ़ाई कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "जब से मैंने हिंदी पढ़ना शुरू किया मेरे लिए हिंदी फ़िल्मों का और बड़ा संसार खुल गया.”
बॉन विश्वविद्यालय से हिंदी और एशियाई अध्ययन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे जर्मन छात्र रिची की पसंदीदा फिल्में हैं 'ओम शांति ओम' और 'गजनी'. वो आमिर खान और शाहरूख खान दोनों के ही फैन हैं.
हिंदी फिल्मों के गाने उनकी ज़बान पर रहते हैं. उनका उच्चारण और लहजा बहुत साफ़ है. वे कहते हैं, “हिंदी बहुत खूबसूरत भाषा है और मैं भारत जाना चाहता हूं.” जर्मनी में हिंदी को लेकर ये एक नया ट्रेंड है.



हिंदी सीखने की चाह


बॉन विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ हाइन्ज़ वेसलर कहते हैं, “जब हम हिंदी पढ़ते थे तो हमारे मन में प्राचीन भारतीय दर्शन और मेधा को जानने की ललक होती थी लेकिन अब बड़े पैमाने पर ऐसे छात्र आ रहे हैं जिनमें से अधिकतर मुंबई की फिल्मों से प्रभावित हैं या फिर उन्हें लगता है कि भारत तेज़ी से विकास कर रहा है और हिंदी सीखने से नौकरी में आसानी होगी.”
दरअसल बॉलीवुड की फ़िल्मों में प्रेम और भावुकता, विवाह के भव्य प्रदर्शन, मंगलसूत्र ,सिंदूर लगाने और पांव छूने के दृश्य यहां लोगों को बहुत सम्मोहित करते है.
इसके साथ ही कई ऐसे युवक-युवती हैं जिनका मानना है कि हिंदी सीखने से नौकरी के लिए उनकी योग्यता और दायरा बढ़ेगा.
उनका मानना है कि खुले बाज़ार और उदारवादी आर्थिक नीतियों के इस दौर में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारत में अपना विस्तार कर रही हैं और ग्लोबल रोज़गार बाज़ार (जॉब मार्केट) में हिंदी की पूछ बढ़ गई है.
हिट है भारत
20 साल की तान्या पर्यावरणवादी संगठन ग्रीनपीस में स्वयंसेवी हैं और हिंदी सीखने के पीछे उनका यही मक़सद है.
हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में हिंदी की पूर्व अध्यापिका और वर्तमान में बॉन विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ा रहीं अनुराधा भल्ला कहती हैं, “हम छात्रों को व्याकरण और साहित्य पढ़ाते हैं लेकिन सिनेमा में दृश्य और भावों के बिंब उनके लिए भाषा को आसान कर देते हैं.”
हिंदी से ये जुड़ाव लोगों को हिंदुस्तान तक ले जाता है. जर्मन लहजे में हिंदी बोलनेवाली छात्रा लेनामाई दो बार भारत में मुंबई और मसूरी जा चुकी हैं.
वे कहती हैं, "जब मैं वहां लोगों से हिंदी में बात करती हूं तो वो हैरान रह जाते हैं.”
हिंदी और हिंदी सिनेमा के प्रति बढ़े रूझान को देखते हुए अमरीका और ब्रिटेन की तरह जर्मनी के फ़्रैंकफ़र्ट, कोलोन और डज़लडर्फ़ जैसे शहरों के सिनेमाघरों में भी अब नियमित तौर पर हिंदी फिल्में दिखाई जाती हैं.
इसी तरह बर्लिन के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी बॉलीवुड की फिल्में और फिल्मकार प्रमुखता से शामिल किए जाने लगे हैं.
एक स्थानीय पत्रकार की टिप्पणी है,"भारत आज बिकता है. कोई भी चीज़ जो भारत से जुड़ी हो वो हिट है."


शालिनी जोशी


(बीबीसी से साभार)