Showing posts with label politics. Show all posts
Showing posts with label politics. Show all posts

Friday, July 09, 2010

अमेठी का नाम बदला, अब देश का भी बदलेगा?

शेक्सपियर ने कहा था "नाम में क्या रखा है?"। मुझे नहीं पता कि यह किस संदर्भ में कहा गया लेकिन इतना जरूर है कि आज की तारीख में यह कथन उपयुक्त नहीं लगता। हाल ही में "माया प्रदेश" (यूपी) में एक और शहर का नाम बदला गया। अमेठी को जिला बनाया गया और नाम रखा गया श्री छत्रपतिशाहू जी महाराज नगर। यह पहला मौका नहीं है कि किसी शहर का नाम बदला गया हो। बम्बई का मुम्बई, मद्रास बना चेन्नई और कलकत्ता का बन गया कोलकोता। लेकिन वे नाम उस जगह की भाषा व संस्कृति को ध्यान में रखते हुए बदले गये। जबकि ये दलित नेता के नाम पर रखा गया जिनका अमेठी के लिये कोई योगदान नहीं रहा है।

मायावती की "माया" को हर कोई जानता है। जो ठान लेती हैं वो कर देती हैं। आजकल अपने और हाथी के पुतले लगाये जा रहे हैं चाहे सुप्रीम कोर्ट से फ़टकार ही क्यों न लगी हो। वैसे तो वे गाँधी परिवार से पंगा लेती ही रहती हैं। रायबरेली और अमेठी में अड़ंगा पड़ा ही रहता है। इस बार भी अमेठी ही हत्थे चढ़ा। अगर कोई दूसरा शहर होता तो बात कुछ और थी। पर उन्होंने छेड़ा है गाँधी परिवार की "धरोहर" को। कांग्रेस का आग-बबूला होना बनता था।

पर कांग्रेस नहीं जानती कि उसके खुद के दामन पर कितने छींटे हैं। कोई ऐसा शहर नहीं होगा जिसमें नेहरू नगर, इंदिरा नगर या इंदिरा विहार जैसी जगह न हों। अपने खुद के नेताओं के नाम पर हर जगह के नाम रखे हैं कांग्रेस ने। कोई सड़क बने या यूनिवर्सिटी या कोई बिल्डिंग सबसे आगे कांग्रेसी ही नजर आयेंगे। इंद्रप्रस्थ विष्वविद्यालय का नाम गुरू गोबिन्द सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय रखकर शीला सरकार ने सिखों को रिझाने की पूरी कोशिश की। कनॉट प्लेस जो सी.पी के नाम से मशहूर है उसका नाम राजीव चौक रखने में यही कांग्रेस आगे थी। कनॉट सर्कस भी इंदिरा चौक बन गया। आने वाला समय इस देश को इंडिया या भारत या हिन्दुस्तान नहीं कहेगा बल्कि गाँधीस्तान के नाम से जाना जायेगा। कुल मिलाकर कहना यह कि नामों के खेल में कांग्रेस से सब पीछे ही रहेंगे। क्या पता आगे मायावती उन्हें पीछे छोड़ सके फ़िलहाल तो यह मुश्किल लगता है।

लेकिन अगर आप कांग्रेस पर उंगली उठायेंगे तो आप को यह दलील सुनने को मिलेगी कि इन नेताओं ने देश की "सेवा" की है। इसका अर्थ यह हुआ कि कांग्रेस के बाकी नेता "बेकार" और निठल्ले थे और आज भी हैं। अगर हम यह कहें कि इन "महापुरुषों" ने देश की सेवा की है तो जब सड़कों के नाम "शहाजहाँ रोड", जहाँगीर रोड, लोदी रोड, औरांगअजेब रोड और तुगलक रोड रखा जाता है तो यह दलील कहाँ तक सही है? तुगलकाबाद व लोदी कॉलोनी के बारे में क्या कहा जाये? लोदी ने इस देश को लूटा, औरंगजेब ने देश को लूटा, मुगलों ने देश पर राज किया तो फिर उनके नाम पर सड़कों के नाम? तुगलक के आतंक को हम लोग भूल जाते हैं !!! इन सड़कों व जगहों के नाम लेते हुए दिल में आक्रोश सा भर जाता है।

किसी जाति व सम्प्रदाय को खुश करना हो तो इन्हीं नामों का सहारा लिया जाता। अम्बेडकर स्टेडियम हो या अम्बेडकर नगर या फिर उनके "मेमोरियल" पर बना कोई इंजीनियरिंग अथवा मेडिकल कॉलेज। भगत-तिलक-लाला लाजपत राय-राजगुरु-चंद्रशेखर आज़ाद-राम प्रसाद बिस्मिल-इन्होंने शायद देश के लिये ज्यादा योगदान नहीं दिया या फिर ये नाम किसी अल्पसंख्यक धर्म-सम्प्रदाय से नहीं जुड़े-ये दलित नहीं थे-वगैरह वगैरह और भी कारण हो सकते हैं (शायद इनके नाम में "गाँधी" नहीं था । शायद इसलिये इनके नाम पर सड़क-बिल्डिंग-कॉलेज का नाम रखते हुए दस बार सोचा जाता है। ये नाम किसी दल को वोट नहीं दिला सकते। बस इतनी सी बात है और यही सच्चाई है।

क्या आप जानते हैं कि वाघा बॉर्डर कहाँ है? आप कहेंगे कि अमृतसर में तो मेरा जवाब होगा कि नहीं। वाघा तो पाकिस्तान की सीमा में आता है, हमारे देश में तो अटारी आता है। शायद हमें वाघा नहीं अटारी बॉर्डर कहना चाहिये। यही उपयुक्त है या फिर वाघा-अटारी बॉर्डर। इस पर बहस हो सकती है। राज नेताओं को छोड़िये। लोगों की अंग्रेज़ी में लिखने की स्पेलिंग बदल जाती है। तो कोई अपनी फ़िल्म का नाम एक ही अक्षर से शुरु करता है। लोग अपनी किस्मत बदलने के लिये नाम तक बदल लेते हैं। ’राम’ व ’अल्लाह’ के नाम पर दुनिया टिकी है और आप कहते हैं कि "नाम में क्या रखा है!!!" अरे जनाब नाम का ही सारा खेल है। अब अगर राजनीति भी इस खेल में कूद जाये तो फिर कहना ही क्या!!

तपन शर्मा

Friday, August 28, 2009

बीजेपी : कॉट संघ बोल्ड जिन्ना

जसवंत सिंह से लेकर तमाम भाजपा नेताओं ने खुद या पार्टी के लिए ही नहीं तमाम न्यूज़ चैनल्स के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है...रोज़ बीजेपी का एक विकेट गिरता है और बीजेपी पर नया और पिछले बुलेटिन से ज़्यादा असरदार शीर्षक ढूंढने की मगजमारी शुरू हो जाती है....जसवंत सिंह की किताब कितने 'मीडियाकरों' ने पढ़ी होगी, इसमें संदेह है मगर ऐसा लगता है कि आधे घंटे के लिए टीवी में हर कोई विद्वान हो जाता है...हल्के में मत लीजिए टीवी के भद्रजनों को...सबको सब पता है...जिन्ना का नज़रिया, जसवंत का नज़रिया, (कौन जाने श्रीरामजी का नज़रिया भी)...बहरहाल, नाज़िम नक़वी क्या राय रखते है, गौर करने लायक हैं...
संपादक

ऐसा नहीं हो सकता कि जसवंत सिंह को इसका अंदाज़ा ही न हो कि उनकी किताब “जिन्ना-इंडिया-पार्टीशन-इंडिपेन्डेंस” जब बाज़ार में आयेगी तो क्या प्रतिक्रियाएं होंगी। आख़िर वो शख़्स इस बात को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता है जो देख चुका हो कि जिन्ना के इस जिन ने 2005 में लौह-पुरुष अडवाणी जी की कैसी फ़ज़ीहत की थी। सवाल है कि क्या उन्हें इस बात का अंदेशा था...? जी हां था। उन्होंने किताब के विमोचन समारोह में पहुंचे एक पत्रकार से अंग्रेज़ी में कहा भी था कि “आई हैव रिटेन द बुक एंड नाउ आई एम रेडी फार द नूज़” यानी अब मैं फांसी के फंदे के लिये तैयार हूं। साफ़ है कि ख़ुद जसवंत सिंह भी नकारात्मक प्रतिक्रियाओं के लिये दिमाग़ी तौर पर तैयार थे।

हां ये ज़रूर हो सकता है कि शायद उन्होंने ये नहीं सोचा होगा कि जिस पार्टी की उन्होंने तीस साल तक सेवा की वो इतनी बेरुखी से, बगैर उनका पक्ष जाने, महज़ एक फोन काल पर रिश्तों के सारे तार काट देगी। किताब के विमोचन (जिसमें भाजपा का कोई नेता शामिल नहीं था) के बाद से ही भाजपा और कांग्रेस की नाराज़गी किसी से छुपी नहीं है। उत्तर प्रदेश के एक कांग्रेसी नेता ने तो जल्दी से एक किताब खरीद कर टीवी कैमरे के सामने उसे जला कर अपनी पार्टी के आग-बबूला होने का मंचन कर दिया था।

कुल मिलाकर एक पक्ष रह गया है और वो है देश का मुसलमान। पता नहीं आम मुसलमान इसे कैसे देख रहा है लेकिन बरेली के एक पढ़े लिखे निवासी महमूद भाई ने विचारों को कहीं दूसरी तरफ़ ही मोड़ दिया। कहने लगे “जसवंत सिंह के साथ वही हुआ जो जिन्ना के साथ हुआ था... भई जिन्ना को भी उस वक्त पार्टी से तकरीबन बेदख़ल कर दिया गया था... जिन्ना लिबरल आदमी थे और नाराज होकर कम्यूनल पार्टी में चले गये। ये कम्यूनल पार्टी के आदमी हैं... ये सेक्यूलरिज्म में आ जायेंगे...।”

हालांकि आदमी विचारों से कभी बूढ़ा नहीं होता शायद इसीलिये जसवंत सिंह भी कह रहे हैं कि उनका राजनैतिक जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन सत्तर पार कर लेने के बाद उनमें कितनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा बची है ये अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है, और इसी बुनियाद पर कहा जा सकता है कि उनका पार्टी से निष्कासन कोई ख़ास मायने नहीं रखता। जो चीज़ मायने रखती है वो ये कि क्या पार्टी से जुड़ने के बाद व्यक्ति की सोच भी गुलाम हो जाती है? पार्टी अनुशासन और सेना अनुशासन में क्या कोई फ़र्क़ नहीं है? जसवंत जी के अफ़ीम प्रदर्शन को क़ानून की आंखों से बचा लिया जाता है लेकिन तथ्य प्रदर्शन की ये सज़ा दी जाती है।
बहरहाल जो भी हो इस किताब के आ जाने से सबसे ज्यादा हालत खराब है उन मौलवी हज़रात की जो कांग्रेस की चाटुकारिता में भाजपा को खरी खोटी सुनाते हैं और भाजपा के निवाले तोड़ते हुए कांग्रेस को मुसलमानों का दुश्मन बताते हैं, और इस बीच अपनी दुकान चलाते हैं। आज़ाद भारत में मुसलमानों की राजनैतिक समझ की शुरूआत ही विभाजन की सियासत से शुरू होती है और अब इस किताब के बाद उन्हें दिखाई दे रहा है कि दोनों पार्टियां तो इस विषय पर एक हो गई हैं, अब क्या किया जाए? रमजान के महीने में सियासी इफ़्तार पार्टियों में बातचीत का रुख क्या होगा इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

सच पूछिये तो जिन्ना किसी के हीरो नहीं हो सकते, न जमाते-इस्लामी के, न संघ के, न कांग्रेस के। पाकिस्तान के अंदर एक बहुत बड़ा तबक़ा उन्हें विलेन के रूप में देखता है। विदेशी सूट पहनने वाले जिन्ना, अंग्रेजी औरतों के साथ सैर-सपाटे करते जिन्ना, सिगार के कश लगाते जिन्ना, व्हिसकी से परहेज़ न करने वाले जिन्ना, सिर्फ ख़ुद को और अपने टाइप राइटर को “पाकिस्तान” बनाने का श्रेय देने वाले जिन्ना पाकिस्तान बनने के बाद पाकिस्तानियों से ये कहते हैं कि - अब पाकिस्तान बन गया अब आप गाइये बजाइये, खाइये पकाइये, मस्जिद जाइये, मंदिर जाइये, गिरजा जाइये तो कई दाढ़ियां नाराज होकर उनसे कहती हैं कि वाह! ये अच्छी कही आपने... इस्लाम के नाम पर मुल्क बनाया और अब ये कह रहे हैं कि मंदिर जाइये गिरजा जाइये...। असल बात तो ये है कि जिन्ना के सेक्यूलर बनते ही कई चेहरों का मुखौटा खुद-ब-खुद पिघलने लगता है।

लेकिन सवाल न जिन्ना का है, न जसवंत सिंह का है, सवाल है किताब लिखने की आज़ादी का। 1989 में सेनेटिक वर्सेस ने जो आग लगाई थी उसकी आंच में तपते हुए एक मौलाना साहब के पास मैं बेठा था। मौलाना अपने अनुयाइयों के बीच रश्दी पर लगे मौत के फ़रमान पर अपनी सहमति दर्ज कर रहे थे। मैं जानता था कि मौलाना ने किताब नहीं पढ़ी है, उनकी अंग्रेजी कमज़ोर है और अनुवाद बाजार में अभी आया नहीं है। मैंने सबके बीच उनसे सीधा सवाल कर डाला- मौलाना आपने किताब पढ़ी…? वो सकपकाये फिर संभलते हुए बोले ऐसी गंदी किताब मैं पढ़ भी कैसे सकता हूं...। मौलाना का दर्द मैं समझ सकता था, ईमान की रस्सी पर आस्था का बैलेंस रॉड लिये दूसरे किनारे तक पहुंचने को मजबूर लोग इधर-उधर देखने का ख़तरा मोल नहीं लेते क्योंकि हल्की सी डगमगाहट आसमान से जमीन पर ले आती है, चोट अलग लगती है। हां जो विचारों की स्वत्रंता की अहमियत को समझते हैं वो खिलाफ विचारधाराओं का स्वागत भी तहे दिल से करते हैं।
1990 में पाकिस्तान में एक फिल्म बनी “इंटरनैशनल गुरिल्ले” जान मुहम्मद निर्देशित इस फिल्म में रूसी फौजों के खिलाफ, इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए कुछ तालिबानी किरदार लड़ाई के लिये निकल पड़ते हैं। लेकिन तब तक रश्दी इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में उभारे जा चुके थे, इसलिये फ़िल्म की कहानी का विलेन उन्हें बना दिया गया। फिल्म में ये रोल अफजाल अहमद ने निभाया। फिल्म पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में जबरदस्त हिट रही लेकिन इत्तेफाक़ से यही पहली पाकिस्तानी फिल्म थी जिसके वीडियो ब्रिटेन में बैन कर दिये गये थे। और हुस्ने-इत्तेफ़ाक़ देखिये कि खुद सलमान रश्दी ने ब्रिटिश सेंसर बोर्ड से अनुरोध करके उसपर लगी रोक को हटवाया था।
सलमान रश्दी अपने खिलाफ उपजे रोष का स्वागत करने के लिये ज़िंदा थे सो ऐसा हो गया। मगर सरदार पटेल और नेहरू अब हमारे बीच नहीं हैं तो कौन है जो कहे कि सहमति और असहमति से परे, जसवंत जी ने जो लिखा वो स्वागत योग्य है। इतिहास के विद्यार्थी जब किसी काल-खंड में पीछे जाकर वापिस लौटते हैं तो हर बार हर कोई उनसे एक अनुरोध ज़रूर करता है कि “पुन: आगमन प्रार्थनीय है...।”

नाज़िम नक़वी

Friday, July 10, 2009

होरी कहे पुकार के.....

होरी कहे पुकार के

हे रे होरी, हे रे गोबर, हे री धनिया , हे रे दमड़ी बसोर, हे रे हरखू, हे री सिलिया,हे रे हीरा, ओ री रूपा, ओ रे रामसेवक, ओ रे शोभा, हां री सोना, ओ री पुनिया, ओ री गोविंदी, ओ री झुनिया, आओ रे , चलो देश में लाकतंत्र आ गया है। आओ रिश्वत खाएं। छोड़ो रे तिल तिल कर मरना, कुछ खाने को नहीं मिल रहा है तो कोनो चिंता। सरकार बहादुर ने सब के लिए रिश्वत खाने के द्वार समान रूप से खोल दिये हैं। का हुआ जो राशन की दुकान पर से आटा गायब हुई गवा है। का हुआ जो राशन की दुकान पर से चावल गायब हुई गवा है। रिश्वत खाने के अवसर तो सरकार सड़क से संसद तक सभी को बराबर दे रही है। छोड़ो खेतों में काम करना, छोड़ो गऊदान के लिए तिल तिल मरना। चलो छोड़ो सब काम और पेट पर हाथ फेर फेर कर रिश्वत खाओ। देखते ही देखते मोटे हो जाओ। सब देश में रिश्वत खा रहे हैं। सबने आटा खाना छोड़ दिया है। सबने सब्जी खानी छोड़ दी है।

`पर साहब हम तो जन्मजात अनपढ़ हैं। हम तो जन्मजात शोषित हैं। मातादीन आज भी हमें लूट रहा है। दातादीन आज भी हमें लूट रहा है। झिंगुरी सिंह आज भी हमारा तेल निकाल रहा है। पटवारी को अगर मेरे माई बाप हम आज भी नजराना और दस्तूरी न दें तो गांव में तो गांव में, खेत में जाना मुश्किल हो जाए। आज भी जो गांव के प्रधान और उसके कारिंदों के पेट न भरें तो राशन कार्ड कैंसिल हो जाए। बी पी एल में तो लाला लोगन का ही हक है। पुलिसवाले तो आज भी हमारे दामाद हैं। जब जब गांव में उनका खाने को मन करे बिन सूचना दिए सांड की तरह आ धमकते हैं और तब धर्म निरपेक्ष देश में हमारा धर्म हो जाता है कि हम सबकुछ छोड़ उनका आदर सत्कार करें। उन्हें नजर नयाज दें। नहीं गांव में हरेक की मां बहन हो जाए। गांव में कुत्ते कम आते हैं मुलाजिम अधिक । हम तो आज भी उनके सामने हाथ बांधे खड़े रहते हैं। अपने पशुओं के लिए चारे का इंतजाम हो या न हो उनके लिए सारे काम छोड़ चारे, अंडे ,मुर्गी दूध,घी का इंतजाम करना पड़ता है। आज भी हमें रोटी खाने की आदत नहीं तो रिश्वत कैसे खांए?´ सबने सिसकते हुए हाथ जोड़ते कहा। धत्त तेरे की ! मैंने भी कैसे भूखे नंगों को रिश्वत खाने के लिए आमंत्रित कर अपनी नाक कटवा ली। सोचा था, ये भी जो सदियों से गंगा की केवल धाराएं गिनते गंगा किनारे बैठे हैं, थोड़ा बहती गंगा में हाथ धो लें। समाजवादी हूं न! सोचता हूं देश के अन्य संसाधनों की तरह रिश्वत पर भी सभी का समान रूप से हक हो। सोचता हूं देश में सब अधिकार सबको समान रूप से मिलें।

`अनपढ़ हो तो क्या हुआ! जन्मजात शोषित हुए तो क्या हुआ। अब देश आजाद हो गया है। अनपढ़ को क्या रिश्वत खाते हुए शर्म आती है? शोषित को क्या रिश्वत खाते हुए शर्म आती है? अनपढ़ को क्या रिश्वत खाते हुए पेट में दर्द होती है? शोषित का क्या आजाद देश में रिश्वत खाते हुए पेट में दर्द होती है? अनपढ़ के क्या पेट नहीं होता? शोषित को क्या पेट नहीं होता? अनपढ़ का क्या हराम का खाने को मन नहीं करता? शोषित का क्या हराम का खाने का मन नहीं करता? जिनमें दिमाग है जब उनको ही रिश्वत खाते हुए शर्म नहीं आती तो अनपढ़ में जब दिमाग ही नहीं होता तो उसे तो कम से कम रिश्वत खाते हुए शर्म नहीं आनी चाहिए। देखो, रिश्वत खाने वाले कैसे धड़ा धड़ पुरस्कृत हो रहे हैं। रायसाहब की तरह हवेलियों पर हवेलियां बनाए जा रहे हैं।´

`पर हम रिश्वत कैसे खाएं? हम तो तंत्र से बाहर हैं।´

`तो तंत्र में आओ।´

`कैसे??´

`किसी लीडर को पटाओ। चुनाव के दिनों में उसके पोस्टर चिपकाओ। उसके लिए जान हथेली पर रख वोट जुटाओ। फिर तंत्र में कुछ भी हो जाओ।´

` तो क्या हम राय साहब हो जाएंगे? तो क्या हम पंडित दातदीन हो जाएंगे? तो क्या हम थानेदार साहेब हो जाएंगे? तो क्या हम कानिसिटिबल हो जाएंगे? तो क्या हम कानूनगो हो जाएंगे? तो क्या हम डिप्टी हो जाएंगे? तो क्या हम कमिसनर हो जाएंगे? तो क्या हम कलक्टर हो जाएंगे? तो क्या हम डाक्टर हो जाएंगे? तो क्या हम इंजिनियर हो जाएंगे? तो क्या हम नहर वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम जंगल वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम ताड़ी- सराब वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम गांव सुधार वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम खेती वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम पादड़ी हो जाएंगे? तो क्या हम जमींदार हो जाएंगे?´

`इस सबके लिए तो पढ़ा लिखा होना जरूरी होता है। तभी तो सरकार कहती है पढ़ो और पढ़कर देश का बेड़ा गर्क करो।´

` तो??´ सबको सांप सूंघ गया,` तो रिश्वत कैसे खाएं?´

` लीडर से कहो तुम्हें चेयरमैन बना दे। नेता से कहो तुम्हें मंत्री बना दे।´

`इस सबके लिए अनपढ़ चलेगा क्या?´

` चलेगा क्या, दौड़ेगा। सरपट । खरगोश की तरह। देश का वोटर पढ़ा लिखा होना चाहिए पर नेता नहीं। ´ मैंने कहा तो होरी ने सबको बला बुला कुलांचे भरते हुए कहा,` `हे रे काली, हे रे जीतू, हे रे मंगू, हे रे नंदसिंह, हे री प्रीतो, हे रे चौधरी कंता, हे रे चौधरी बसंता हे रे गोबर, हे री धनिया , हे रे दमड़ी बसोर, हे रे हरखू, हे री सीलिया,हे रे हीरा, ओ री रूपा, ओ रे रामसेवक, ओ रे शोभा, हां री सोना, ओ री पुनिया, ओ री गोविंदी, ओ री झुनिया, आओ रे , चलो देश में लाकतंत्र आ गया है। पर भैया! हम काहे रिश्वत खाएं? लोक तो बिगड़ा ही ,परलोक भी बिगाड़ें क्या?? जारी रखो रे तिल तिल कर मरना, कुछ खाने को नहीं मिल रहा है तो कोनो चिंता। लेओ भैया! सरकार बहादुर ने सब के लिए रिश्वत खाने के द्वार समान रूप से खोल दिये हैं। फुकने दो जो राशन की दुकान पर से आटा गायब हुई गवा है। फुकने दो जो राशन की दुकान पर से चावल गायब हुई गवा है। पर लेओ रिश्वत खाने के अवसर तो सरकार सड़क से संसद तक सभी को बराबर दे रही है। पर हम तो मजूरी ही करें। चलो भूखो ही मरें। ईमानदारी से ही पेट पालें। रिश्वत खाने वालों का नहीं रे! देश अपना है ,धरती अपनी है। सब तो देश में रिश्वत खा रहे हैं। पर आओ रिश्वत न खाकर हम देश के विकास में हाथ बंटावें, हम तो बच न सके, पर चलो मिलीके देश बचावें।´

डॉ. अशोक गौतम

गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

Sunday, June 28, 2009

गन्ने की राजनीति

विगत दिनों केंद्रीय सरकार ने एक अक्टूबर से आरंभ होने वाले चीनी सीजन 2009-10 के लिए गन्ने के एमएसपी में लगभग 32 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर करने की घोषणा की है। यह फैसला सरकार ने किसानों को गन्ने की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए किया है ताकि देश में चीनी का उत्पादन बढ़ाया जा सके। चालू वर्ष के लिए एसएमपी 81.18 रुपए था जो आगामी सीजन में 107.76 रुपए प्रति क्विटल होगा यानी 26.68 रुपए या 32 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी।
यह भाव 9.50 प्रतिशत रिकवरी यानि जिस गन्ने में 9.50 प्रतिशत रस की मात्रा हो उसके लिए है। इससे अधिक प्रत्येक 0.1 की अतिरिक्त रिकवरी होने पर 1.13 रुपए प्रति क्विटल की दर से मिलों को अधिक देना होगा।

पहली नजर में सराकर का यह फैसला देश के किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है लेकिन यह वास्तविकता से दूर है। इसके लिए जरा गहराई में जाना होगा। गन्ने के लिए तीन भाव होते हैं। एक जो केंद्रीय सरकार तय करती है यानी एसएमपी, दूसरे जो राज्य सरकारें तय करती हैं, जिन्हें एसएपी यानी सरकार द्वारा सुझाई गए जो मिलों को देने चाहिएं और तीसरे जिस भाव पर किसानों से गन्ना या खांडसारी निर्माता गन्ना खरीदते हैं।
राज्य सरकारें एसएपी राज्य के वोटरों यानी किसानों को ध्यान में रखते तय करती हैं। चालू वर्ष के लिए गन्ने की एसएमपी 81.18 रुपए प्रति क्विटल हैं, लेकिन हरियाणा सरकार ने गन्ने के भाव 165/165 रुपए तय किए हुए हैं, उत्तर प्रदेश सरकार ने 140/145 रुपए तय किए हुए हैं लेकिन वहां की मिलों ने इस वर्ष 220 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर गन्ने की खरीद की है। तमिलनाडु की मिलें स्वेच्छा से किसानों को 122/127 रुपए दे रही हैं।

महाराष्ट्र में चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में हैं और वहां पर गन्ने में रिकवरी अधिक होती है और किसानों को अन्य राज्यों की तुलना में अधिक कीमत मिलती है। गुड़ व खांड़सारी निर्माता गुड़ व खांड़सार के भाव देते हैं। इस वर्ष इन्होंने 225 रुपए प्रति िक्वंटल तक गन्ने की खरीद की है क्योंकि गुड़ के भाव 30/32 रुपए तक चले गए थे।
वास्तव में केंद्रीय सरकार द्वारा हाल ही में वृद्वि की गई है उसका सीधा लाभ महाराष्ट्र के किसानों को मिलेगा या यों कहा जाए कि यह फैसला महाराष्ट्र के किसानों को देखते हुए किया गया तो गलत नहीं है।

उल्लेखनीय है कि राज्य में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और हमारे कृषि मंत्री श्री शरद पवार इसी राज्य से हैं। वहां पर गन्ने में रिकवरी अधिक होती है और किसानों को भुगतान इसी आधार पर किया जाता है।
इस भाव वृद्वि से अन्य राज्यों के किसानों को कोई लाभ नहीं होगा लेकिन सरकार ने वाही-वाही अवश्य लूट ली है।

--राजेश शर्मा

Tuesday, June 16, 2009

कोई हिंदुस्तानियों को भी आईना दिखाए....




एक मशहूर कहावत है-जिनके घर शीशे के होते हैं वे दूसरे के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते। लेकिन हम भारतीय अनूठे हैं। हम अपनी ही कही बात पर अमल नहीं करते। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमले पर भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही जगहों पर इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। नस्लभेदी हमलों पर हर कोई आगबबूला हो रहा है। हर ओर हड़कम्प मचा हुआ है।
पर मुझे लगता है कि हमें ऑस्ट्रेलिया को कुछ भी कहने का हक नहीं है। महाराष्ट्र में जब हिन्दी भाषियों पर हमले होते हैं तब हम कहाँ होते हैं? "मराठी मानुस" और हिन्दी भाषियों में लड़ाई है नौकरी की। हक की। एक आदमी दूसरे देश या राज्य में पैसा कमाने ज्यादा है इसका कारण होता है उसके खुद के देश में नौकरी व संसाधनों की कमी। या फिर और अधिक पैसा कमाने की लालसा उसे दूसरे देश ले जाती है। इसके अलावा और कोई कारण नहीं होता। आप और हम नहीं चाहेंगे कि बांग्लादेश से कोई गैरकानूनी रूप से आये और हमारा हक हमसे छीने। जब घर में ही दाल-रोटी के लाले पड़े हों तो दूसरे को निवाला कैसे दें? कमोबेश वही हाल विदेशियों का हैं। जब हम हिन्दुस्तान से लोग विदेश में गैरकानूनी तरीके से जा कर रहते हैं तब तो सरकार कुछ नहीं करती?
पूर्वांचल में बिहारियों को ट्रेन में पीटा जाता है, बुरा बर्ताव होता है तब कोई कुछ क्यों नहीं करता? शेष भारत के लोग कौन सा पूर्वोत्तर का ध्यान रखते हैं? हमारा मीडिया उन इलाकों को कितना कवर करता है? इसे मीडिया कौन सा "वाद" कहेगा? क्षेत्रवाद? जातिवाद? रंगभेद? आखिरी बार आपने नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम आदि की खबर कब सुनी या देखी थी? मुझे तो याद नहीं आ रहा। किस मुँह से किसी विदेशी पर आरोप लगायें जब हम खुद ही एक नहीं हैं? हाल ही में रूसी राजदूत ने कहा कि गोवा में रूसी पर्यटकों से ठीक वैसा ही व्यवहार होता है जैसा कि भारतीयों के साथ ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है। ये सुनकर क्या हमें शर्म नहीं आती? क्या भारत की सरकार इस पर चुप्पी साध लेगी?
दक्षिण भारतीय और हिन्दी भाषियों के बीच में मनमुटाव कुछ कम नहीं हैं। मेरे और मेरे एक मित्र के साथ चेन्नई में बुरा बर्ताव हो चुका है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग एक जैसे हैं पर असमाजिक तत्वों की कमी भी नहीं।
ये तो केवल क्षेत्र की बात करी है। हमारे देश में ऐसे अनगिनत वाद-विवाद मिल जायेंगे। गुर्जर और मीणा विवाद कैसे भूल सकते हैं? यूपी, राजस्थान और बिहार में न जाने ऐसे कितने ही वाद-विवाद रोज़ होते रहते हैं। उनपर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता। जब हम स्वयं ही अपने लोगों से उसी तरह से पेश आते हैं जैसे कि ऑस्ट्रेलिया वाले तो हमें कुछ कहने का हक ही नहीं बनता। राज ठाकरे हमारे घर में है विदेश में नहीं। नस्लभेद टिप्पणियाँ कोई नई बात नहीं है। इस तरह के "भेद" हमारे घर में अधिक हैं। पर हम बेशर्म हो चुके हैं।
अपने एक मित्र संदीप के शब्दों में :
यह कहना ग़लत नही होगा की अगर कोई नस्लवाद/जातिवाद की प्रतियोगिता हो तो भारतीय प्रथम आयेंगे ये हमारे अन्दर कूट कूट के भरा हुआ है, वह तो शुक्र है कि भारत एक धनी देश नही है वरना बाकी और देशो के साथ बहुत ही बुरा बर्ताव करता देश से बाहर रह कर भारतीय नस्लवाद और भी स्पष्ट दिखता है वहाँ अगर कोई काला (अफ्रीकी) व्यक्ति दिख जाए तो भारतीय सबसे आगे होते हैं उसका मजाक उडाने में ये इस देश का दुर्भाग्य ही कह लीजिये कि जहाँ भगवान के नाम में भी काले रंग का वर्णन है, उस देश में fairness creams की बिक्री धड़ल्ले से होती है


निदा साहब ने शायद ऐसे ही मौके के लिए कहा है-


अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये,


घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये


तपन शर्मा

Monday, June 15, 2009

बीजेपी के महा'खल'नायक...



एक पुरानी कहावत है....जब रोम शहर जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था....भारतीय जनता पार्टी के लिए फिलहाल ये जुमला एकदम फिट बैठता है....इधर यशवंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर पार्टी की हार के ज़ख्मों पर नमक छिड़का तो अपनी हालत पर विचार करने के बजाय पार्टी के नेता अपने-अपने शौक पूरे करने में लगे हैं.....टीवी पर टी-20 क्रिकेट मैच देखते-देखते नज़र पड़ी अरुण जेटली पर....लॉर्डस के मैदान में भारतीय क्रिकेट टीम का हौसला बढ़ाने के लिए अरुण जेटली अपनी हाज़िरी लगा रहे थे.....अरुण जेटली नेता विपक्ष हैं....चुनाव में पार्टी की नीति तय करने वाले बीजेपी के चाणक्य.....सियासत के इस चाणक्य की नीतियों का क्या हश्र हुआ, चुनाव के नतीजे बता चुके हैं.....यूपी की चुनावी नैया भी इन्हें ही पार लगानी थी, मगर वहां भी पार्टी ने कांग्रेस को लगभग वाकओवर दे दिया.....

यूपी की बदनसीबी

इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस रामनाम के फॉर्मूले की ज़मीन यूपी में है, वहां उसकी हालत सबसे ज़्यादा पतली है...राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी यूपी के ही हैं....सूबे के सीएम भी रह चुके हैं....मगर, पार्टी के लिए कुछ नहीं कर सके....लालजी टंडन और कलराज सिंह यूपी के सबसे दिग्गज नेताओं में हैं मगर जनाधार कितना है ये मायने रखता है.....कल्याण सिंह के पर कतर दे गए तो वो पार्टी से बाहर समाजवाद का ढोंग कर रहे हैं....फिर, यूपी में बचा क्या.....वरुण गांधी ! जिन्हें ख़ुद ही नहीं पता कि पार्टी के हित में कहां तक जाना उचित रहेगा....
राजनाथ सिंह की बेबसी पर तरस आता है....डमी अध्यक्ष की तरह लगते हैं....अटल जी की तरह पॉज ले-लेकर बोलते हैं, मगर सुनता कौन है.....पूरी पार्टी असमंजस में है.....

चुटकी हो जाए....
राजनीति की बहुत ज़्यादा समझ नहीं है.....दसवीं क्लास में एक ख़ास दोस्त की बात याद है....समय बरबाद करने का सबसे आसान तरीका है कि आप भारतीय राजनीति पर बातचीत शुरु कर दें......कोई नतीजा नहीं निकलने वाला, चाहे जितना सर खपा लें.....अरुण जेटली भी शायद ये समझ चुके हैं....ठीक किया, मन बदलेगा तो कहीं किस्मत भी बदल जाए.....खूब क्रिकेट देखिए....सूट-बूट में तो रहते ही हैं.....कहीं एकाध विज्ञापन ही मिल जाएं तुक्के में....विज्ञापन वाला पूछे,
‘क्यों जेटली जी, आजकल तो खाली-खाली ही हैं....आइए ना, एक ऐड कर लीजिए.....’
‘किस चीज़ का ऐड है भाई ’
‘ठंडे तेल का विज्ञापन करना है , ख़ास आपके लिए...आपको ज़रुरत भी है आजकल ’
‘उड़ा लो बेटा, मज़ाक उड़ा लो....क्या फर्क पड़ता है...वैसे साइनिंग अमाउंट कितना है’
‘सर, इससे क्या फर्क पड़ता है....’
‘हां, फर्क तो नहीं पड़ता.....आजकल और कुछ करने को तो है भी नहीं....विपक्ष में बैठने में रखा भी क्या है.....मुझे कुछ कहने की ज़रुरत ही नहीं पड़ने वाली....हमारी पार्टी में बोलने वालों की कमी है क्या ’
‘सो तो है, 29 साल के बच्चे भी बोलते हैं तो अच्छे-अच्छों की बोलती बंद कर देते हैं....सर, हम आपको इस तेल का ब्रांड एंबेसडर बनाना चाहते हैं....मुझे लगता है कि आपकी पार्टी से हमें बहुत फायदा होने वाला है...वैसे भी आपकी पार्टी में सब तेल लगाने में माहिर हैं.....’
‘मुझे बार-बार लग रहा है कि आप मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं....’
‘नहीं सर, मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं (जनता ने तो आपका जो मज़ाक उड़ाया है, उसके आगे मैं.....)’
‘ठीक है, ठीक है....मैं यहां मैच का मज़ा लेने आया हूं....मुझे मैच देखने दो..’
‘सॉरी सर, मैं चलता हूं.....’
‘अच्छा सुनो, वो साइनिंग अमाउंट स्विस बैंक वाले खाते में ही डलवाना....भारत में आजकल बड़े ख़तरे हैं......’

निखिल आनंद गिरि

Wednesday, May 27, 2009

फार्मूलों से न जिंदगी चलती है न राजनीति

अब हर कोई यह कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया। जब इस फार्मूले के बल पर मायावती उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गईं, उस वक्त कहा जा रहा था कि मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला चल निकला। उन दिनों बसपा नेता की कुशाग्र बुद्धि की जम कर प्रशंसा की जा रही थी और यह उम्मीद की जाने लगी थी कि जल्द ही वे भारत की प्रधानमंत्री बन जाएं, तो यह हैरत की बात नहीं होगी। बहन जी खुद भी ऐसा सोचती थीं। यह भी कहा जा सकता है कि बहन जी खुद ऐसा सोचती थीं, इसलिए हमारे विद्वान लोग भी ऐसा ही सोचने लगे थे। हमारे विद्वान देखते तो हैं – पर उधर नहीं जिधर सत्य होता है, बल्कि उधर जिस तरफ हवा चल रही होती है। अब हवा मायावती के उलटी दिशा में चल रही है, तो कहा जाने लगा है कि उन्होंने अपनी बनती हुई इमारत को अपने ही पैरों से धक्का दे कर नेस्तनाबूद कर दिया। विद्वानों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सोशल इंजिनियरिंग क्या चीज है, यह कैसे काम करती है और इसका संचालन कैसे करना चाहिए।

अनाड़ी हाथों में पड़ कर अच्छा से अच्छा फार्मूला भी फेल हो सकता है। लेकिन मूल बात यह नहीं है। मूल बात यह है कि फार्मूले गणित और विज्ञान में ही गुल खिला सकते हैं, जहां दो और दो हमेशा चार होते हैं तथा दस में से पांच निकाल दो तो हमेशा पांच ही बचेगा। जिंदगी में ऐसा नहीं होता। यहां चार करो तो नतीजा आठ भी हो सकता है और दो भी हो सकता है। इसी में जिंदगी का रोमांच है। नहीं तो वह एकरस हो जाती। इसीलिए जब से जिंदगी की पेचीदगी बढ़ी है, दुनिया भर में ऐसी किताबों की बाढ़ आ गई है जो सुख से जीने और सफलता पाने के गुर सिखाती हैं। ऐसी किताबों की एक पीढ़ी लोकप्रिय हो जाने के बाद जब बाजार में दम तोड़ देती है, तो उनकी दूसरी पीढ़ी जन्म लेती है। इस तरह सुख-शांति-सफलता-समृद्धि-नेतृत्व देने के फार्मूले पानी के बुलबुलों की तरह पैदा होते रहते हैं और उन्हीं की तरह शीघ्रमृत्यु के शिकार हो जाते हैं। पर जिंदगी इतनी पेचीदा चीज है कि समस्याओं का पैदा होना बंद नहीं होता। बताते हैं कि चुनाव प्रचार के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी को जब भी थोड़ा-सा वक्त मिलता था, वे डेल कार्नेगी की एक समय बहुत बिकनेवाली पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लुएंस पीपल’ पढ़ने लगते थे। इसमें दी गई शिक्षाओं के आधार पर आडवाणी ने कितने मित्र बनाए और कितने लोगों को प्रभावित किया, यह कोई नहीं जानता। अगर फार्मूलों पर अमल करने से हर विवाह सफल हो जाता, हर संबंध सरस हो जाता, हर व्यवसाय प्रगति करने लगता और हर क्षेत्र में सफलता मिलती होती, तो धरती पर इतना दुख-दैन्य दिखाई नहीं देता।

फिर भी फार्मूलाबाजी चलती रहती है तो इसीलिए कि सभी लोग सफलता का शॉर्टकट खोजते रहते हैं। पैदल, साइकिल या मोटरगाड़ी के लिए शॉर्टकट हो सकते हैं, पर जिंदगी का सफर इतना सीधा नहीं है। यहां कोई भी फार्मूला काम नहीं करता। हर आदमी को हर चीज की खोज अपने ढंग से करनी होती है। टाटा घराना अपने ढंग से सफल हुआ तो अंबानी ग्रुप अपने ढंग से। बिड़ला परिवार का तरीका कुछ और था। बीआर चोपड़ा और ह्मषीकेश मुखर्जी, दोनों की फिल्में हिट होती थीं, पर दोनों का फिल्म बनाने का तरीका अलग-अलग था। अमिताभ बच्चन अगर राजेश खन्ना की तरह अभिनय करते और गुलजार आनंद बख्शी की तरह गीत लिखते, तो वे आज इतिहास के डस्टबिन में होते।

मायावती ने जब अवर्ण-सवर्ण एकता तथा सद्भाव की खोज की – किसी नई राजनीति की पीठिका के तौर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक सफलता के शॉर्टकट के रूप में, तो वे एक फार्मूले की रचना कर रही थीं – न उनका निजी परिप्रेक्ष्य बदल रहा था, न उनकी राजनीति में परिवर्तन आ रहा था, न उनके कामकाज के तरीके बदल रहे थे। वे जानती थीं कि ओबीसी उनके साथ आएँगे नहीं, मुसलमान उनके बाएं बाजू की तरह जाना शुरू कर चुके हैं, इसलिए दलितों के साथ चलने के लिए ऊंची जातियों को ही लुभाया जा सकता है, जो अब तक की अपनी उपेक्षा से संतप्त थे। यही मायावती ने किया -- अपनी बुद्धि से किया या किसी सवर्ण सलाहकार की बात मान कर किया, यह मायावती के जीवनीकार जानें। फार्मूला हिट हो गया और उत्तर प्रदेश का मुकुट उड़ते हुए बहन जी के सिर पर आ बैठा। दुर्भाग्यपूर्ण घटना यह हुई कि इसके नतीजे में, इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में, बहन जी का दायित्व बोध तो नहीं जागा, उनकी महत्वाकांक्षा के पटाखे में दियासलाई जरूर लग गई। अब उनके पैर उत्तर प्रदेश नामक अभागे राज्य के जूते से बहुत बड़े हो गए और वे प्रशासन तथा विकास की चुनौतियों को भुला कर दिल्ली का सिंहासन खरीदने के लिए रुपयों का हिमालय खड़ा करने में लग गर्इं। वे अपनी पार्टी के हर सांसद, विधायक और कार्यकर्ता को, सरकार के हर विभाग को, हर विभाग के हर अफसर को अपने ‘प्रधानमंत्री सहायता कोष’ का चलता-फिरता एटीएम समझने लगीं। यहीं से उनके पैर डगमगाने लगे।

सत्ता महत्वाकांक्षा का बोझ सहन करती है, लेकिन एक हद तक ही। जब उसने एक समय इंदिरा गांधी की आदमकद से बड़ी महत्वाकांक्षाओं का बोझ वहन करने से इनकार कर दिया और उत्तर भारत में कांग्रेस की एक भी सरकार न रहने दी, तो मायावती किस खेत की मूली हैं। अब वे कार्यकर्ताओं और अफसरों को डांट-फटकार रही हैं कि तुम्हीं लोगों के कारण मेरी हार हुई। इसके बजाय अगर वे किसी आदमकद आईने के सामने खड़ी हो जातीं, तो उन्हें अपनी हार के लिए जिम्मेदार एकमात्र व्यक्ति तुरंत दिख जाता। पर यह प्रकृति की माया है कि आंखें खुद को देखने के लिए बनाई ही नहीं गई हैं और आईने के सामने हर आदमी को अपना चेहरा प्यारा लगता है।

सड़क सभी को चाहिए – चाहे वह दलित हो, या पिछड़ा या मुसलमान या बाभन-ठाकुर। बिजली भी सभी को चाहिए। अच्छा प्रशासन किसी एक जाति का जीना सुगम नहीं करेगा, इससे सभी को राहत मिलेगी। यही हाल शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से संबंधित संस्थानों का है। गुंडागर्दी सभी के लिए दुखमय है। संक्षेप में यह कि सुशासन का कोई विकल्प नहीं है। मायावती को दिल्ली ले जाने का रास्ता सुशासन से हो कर ही जाता था -- अब भी जाता है, पर उन्होंने सोचा कि नीति, कार्यक्रम और अमल की त्रयी के स्थान पर तिकड़म का अद्वैतवाद ही काफी है। यह सोशल इंजिनियरिंग नहीं, राजनीतिक इंजिनियरिंग थी। इसका फेल होना उतना ही निश्चित था जितना नीम के पेड़ पर आम के उगने की उम्मीद का फेल होना। विधान सभा चुनाव के दौरान पोलिंग बूथ पर तो अवर्ण-सवर्ण एकता हो गई थी, पर इससे सत्ता की जो मदांध राजनीति पैदा हुई, उसने उस अवर्ण समूह के बीच भी दरारें पैदा कर दीं जिसे मायावती अपना फिक्स्ड अकाउंट मानती रही हैं। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों से मायावती के उम्मीदवारों का हारना और क्या बताता है? बहरहाल, मई 2009 का सवाल यह है कि एक फार्मूले के फेल होने के बाद दलित की बेटी कोई और फार्मूला खोजने का यत्न करेगी या कांशीराम के वचन याद करते हुए यह समझने की कोशिश कि राजनीति की नौटंकी क्या होती है और असली राजनीति क्या होती है।

राजकिशोर
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं)

Monday, May 04, 2009

यथा-राजा तथा-प्रजा


जी हाँ वक्त के साथ-साथ न केवल कहावतों, मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं अपितु उनकी शब्दावली में भी उलट-फ़ेर हो जाता है। पिछले जमाने में राजा का पद वंशानुगत होता था और पीढियों तक चलते-चलते प्रजा मजबूरी में राज-परिवार की फ़ितरत-स्वभाव के मुताबिक खुद को ढाल लेती थी, गुजारा जो करना था। जैसा हमने सुना है कि कई रजवाड़ों में नवविवाहिता को अपनी पहली रात मजबूरन राजमहल में गुजारनी पड़ती थी। मेरे गांव में कलानौर के नवाब के महल से पहली रात को भाग कर एक नवविवाहिता ने लगभग १२५ साल पहले शरण लेने व उसके बाद गांव वालों के कलानौर पर चढाई कर नवाब के कत्ल की कथा आज भी कही जाती है। उसके महल के बुर्ज पर लगे हवा की दिशा जानने हेतु लगाए गए यंत्र व नवाब के नगाड़े जो आज भी एक संत की समाधि-स्थल पर सुरक्षित है, को सबूत बतलाया जाता है। यह कथा आसपास के गावों तथा भांदो द्वारा आज भी गाई जाती है। खैर यह कथा एक ओर।

आज देश में प्रजातन्त्र है, यानी प्रजा अपना राजा या प्रतिनिधि चुनने में स्वतंत्र है, तो हम कह सकते हैं कि जैसी प्रजा है वैसा राजा होगा। मैं, आप यानी प्रजा यह मानने को कतई तैयार न होगी कि गैंगस्टर-अपराधियों को चुनने में उसका कोई दोष है। हम सब विकल्प न होने की दुहाई देने लगते हैं- क्या मैं गलत कह रहा हूँ?
पर हम यानी जनता-जनार्दन खासी तंग है अपने चुने गये प्रतिनिधियों से। तो क्या करें ? हमें इस चुनाव तथा आगे आने वाले चुनावों में कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिये।

हम सब जानते हैं कि पिछले कुछ बरसों से देश में संयुक्त मोर्चा सरकारें राज कर रहीं है क्योंकि कांग्रेस या भाजपा दोनो तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियाँ बहुमत प्राप्त नहीं कर पा रहीं और उन्हे क्षेत्रिय दलों की वैशाखी पर आश्रित रहना पड़ता है। और उनकी ब्लैकमेलिंग तो हमने पिछली लोक सभा के शक्ति परीक्षण काल में देखी ही है, शिबू सोरेन और देवगौड़ा एक दिन में ही 3-4 बार इधर-से उधर होते नजर आए। हम यह भी जानते हैं (आज मीडीया आंकड़े दे रहा है) कि ये क्षेत्रिय दल ही सब से ज्यादा अपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी खड़े करते हैं, जो अपने धन-बल व जातीय समीकरण द्वारा जीत भी जाते हैं। अब ऐसे तत्वों की जीत की संभावनाओं के चलते राष्ट्रीय पार्टियाँ भी उन्हें टिकट देने को मजबूर हो गयीं, मैं यह नहीं कहता कि ये तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां दूध-धुलीं हैं। वे तब तक ऐसे तत्वों को टिकट देंगी, जब तक वे जीतते रहेंगे। तो हमें चाहिये कि
इस चुनाव व आगे आने वाले चुनावों में भी केवल इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों को ही वोट दें चाहे वह कैसा ही हो। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां का उम्मीदवार न हो वहां भी क्षेत्रिय पार्टी के उम्मीद्वार के स्थान पर किसी निर्दलीय कोवोट दें। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों में किसी पार्टी ने दल-बद्लू को टिकट दी हो वहां उसे वोटे न दें।

इससे आज ही कोई परिणाम आएगा ऐसा नहीं है लेकिन धीरे-धीरे हवा बदलेगी और जब इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों को जनता की मनसा का ज्ञान होने लगेगा तो वे खुद भी इस और ध्यान देंगी। तब जनता इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उस उम्म्मीद्वार को नकारना आरम्भ करेंगे जो आपराधिक पृष्ठभूमि का होगा।
हमें (हम पढे लिखे लोगों) को यह अभियान केवल चुनाव के समय ही नहीं अपितु सतत जारी रखना होगा, जिससे अगले-उससे अगले चुनाव तक आमजन इस बात को अपना ले और सच मानें आमजन जो ब्लॉगिंग नही जानता, अब इस बात को मानता है कि देश में दो पार्टियां ही होनी चहियें, उसे जरूरत है मार्ग-दर्शन की। यह विश्वास दिलाने की कि ऐसा संभव है। अब तक ये आपराधिक तत्व उन्हे विश्वास दिलाने में काम्याब रहें है कि उनकी जाती का सासंद-विधायक ही उनका भला कर सकता है, पर अब वे भी जान गये हैं कि यह केवल दिखावा है और वे आपकी रहनुमाई की राह देख रहे हैं। इस चुनाव में हरियाणा की जनता का मूड देखकर मैं यह बात कह रहा हूं और चुनाव नतीजे बतला देंगे कि मेरा आकलन सही है या गलत है। केवल कुछ दिनों की बात है।
आगे चलकर हम ब्लॉगिंग व सेमिनारों-सभाओं मे जहां ये सांसद-इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के बुलाए जाएंगे इन्हें ही कुछ बातें पहुंचाएं (हम हरयाणा मे ऐसा करने में लगे है)कि

  1. संसद में ऐसा नियम कानून लाया जाए कि किसी पार्टी में अगर किसी पार्टी का विघटन होता है, तो जो घटक एक पार्टी से समर्थन वापिस लेकर (जिसे अब तक पूरी पार्टी समर्थन दे रही थी) दूसरी पार्टी को समर्थन देना चाहे तो उसे इस नई पार्टी में विलय होना पड़ेगा अन्यथा उसके सदस्यों की सदन सदस्यता स्वत: खत्म हो जाएगी (ऐसा अब तक तब होता है जब इन की संख्या पार्टी की अविभाजित संख्या के एक तिहाई से कम हो)।

  2. यही नहीं अगर कोई पूरी की पूरी पार्टी भी एक मोर्चे से समर्थन वापिस लेकर दूसरे मोर्चे का समर्थन करना चाहे तो उसे भी दूसरे मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे विलय करना पड़ेगा।

  3. किसी को भी बहुमत प्राप्त न होने पर अगर कई पार्टियां मिलकर सरकार बनाना चाहें तो उन्हें अपनी पार्टी का विलय उस मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे करना अनिवार्य कर दिया जाए।

  4. चुनाव में अगर किसी पार्टी को कम से कम 5 राज्यों में प्रतिधित्व प्राप्त नहीं हो तो उसके सदस्यों का किसी राष्ट्रीय पार्टी में विलय अनिवार्य हो। अगर वे ऐसा न करें तो उनकी सदस्यता खत्म कर दी जाए।

  5. निर्दलीय सदस्य अगर किसी एक मोर्चे में शामिल होने के बाद अपना समर्थन वापिस लेना चाहे तो उसकी सदस्यता खत्म हो।


यह सच है कि ऐसा होना अभी संभव नहीं है लेकिन अगर देश के बुद्धिजीवी लामबंद हो जाएं तो निकट भविष्य में स्थिति अवश्य सुधरेगी।
आमजन को अगर दिशा दी जाए तो वह करने को तैयार रहता है। हमारे देश में एमरजेंसी के बाद के चुनाव, बोफ़ोर्स के बाद के चुनाव व बर्लिन की दीवार का टूटना-सोवियत संघ व ईस्टर्न यूरोप की तथाकथित तानाशाहियों का टूटना,आमजन की ताकत का नमूना नहीं तो क्या हैं ? जरा सोचें

कुछ और विकल्प
एक अन्य विचारधारा- हमें अमेरिकन यानि राष्ट्रपति पद्धति अपनानी चाहिये, जिससे यह अनिश्चितता खत्म हो जाए। सरकार गिरने का खतरा न रहे। अगर आप ध्यान करें तो देखें केवल दो उदाहरण- बिल क्लिंटन कांड अगर हिन्दुस्तान में होता (जब बिल क्लिन्टन अपने रक्षामन्त्री से बात कर रहा था तो मोनिका लेविन्सकी से संलग्न था), क्या भारतीय प्रधानमन्त्री ऐसी बात उजागर होने पर इस्तीफ़ा देने को बाध्य नहीं होता? ब्रिटेन में प्रोफ़्मयो कांड का उदाहरण देखें।
हमारे यहां न्यूक्लियर संधि में मनमोहन की कुर्सी ही नहीं, सरकार भी येन-केन प्रकारेण बची, लेकिन जनाब बुश तो गलत रिपोर्ट बनवाकर इराक पर हमला कर बैठे। क्योंकि उन्हें तानाशाह जैसी ताकत हासिल थी।

एक और विचार- चुनाव में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलें उतने ही सांसद उसे मिल जाने चाहियें। दोस्तो, हमारे समाज मे जाति-धर्म का दुरुपयोग चुनाव में जिस तरह होता है, यह तरीका उसे और बढावा देगा। मित्रो, हमारे पुरखों ने जो आजादी की लड़ाई से तपकर कुन्दन बनकर निकले थे और उस वक़्त उनके दिमाग में आमजन की भलाई व आमजन की स्वतंत्रता कायम रखने व उनके मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के अलावा कोई और विचार नहीं था। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सविंधानो को पढ़कर-मनन कर एक बेहतरीन संविधान हमें दिया था, जिसमें जो कमियां नजर आईं उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता दूर भी करने के प्रयत्न जारी हैं। जैसे दल-बदल पर कानून, सूचना का अधिकार अधिनियम आदि। मुझे लगता है कि अगर वोटर सही प्रतिनिधियों को चुनकर भेजेंगे तो आमजन के कल्याण हेतु और भी नियम बनेंगे। हमारा संविधान एक बहुमूल्य दस्तावेज है। बस यह जिनके (हमारे) लिये बनाया गया है, उन्हें जागरूक रहना है।

लेखक- डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

Thursday, February 19, 2009

देश की तक़दीर तय करेंगे नचनिये और खिलाड़ी....

दिलीप वेंगसरकर, शाहरूख खान, अजहरूद्दीन, संजय दत्त और अब नया नाम सौरभ गांगुली। क्या समानता है इन नामों में। ये बड़े नाम आते हैं बॉलीवुड और क्रिकेट से। दो ऐसे क्षेत्र जिनका भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर पूरा असर देखा जा सकता है। ये वो लोग हैं जिनके पीछे दुनिया दीवानी है। आज की तारीख में इन नामों से कोई भी अपरिचित नहीं हैं। इस देश में बच्चा बोलना सीखता है तो उसे 'स' से सचिन और 'ध' से धोनी सिखाया जाता है। 'अ' से अमिताभ होता है तो 'श' से शाहरूख। इन के नामों से जूते, चप्पल से लेकर तेल व कपड़े तक बिकते हैं। लेकिन आज इन नामों को क्यों याद किया जा रहा है। क्या है क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्मों के खिलाड़ी होने में समानता है?

पहले नेता जमीन से जुड़े होते थे। लोगों के करीब होते थे। समय बदला तो चोर,डाकू व बदमाश नेता बनने लगे। वो समय आ गया कि नेता ही चोर और बदमाश बन गये। दोनों के बीच में जो लकीर थी वो मिट गई। मुख्तार अंसारी को उम्मीदवार बनाते वक्त अब पार्टी ज्यादा नहीं सोचती। डी.पी यादव हो या अमरपाल सिंह बदमाश वहीं पार्टियाँ अलग अलग। लेकिन बात उनकी नहीं। समय ने फिर करवट ली और अब फिल्म स्टार और खिलाड़ी चुनावी मैदान में आ गये हैं। पार्टियों का वोट लेने का और इन स्टार लोगों का मौका भुनाने का अचूक और आसान रास्ता। ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ है। ज्यादा दूर न जायें तो गुज़रे जमाने के कई सितारे आज राजनीति में हैं और बखूबी काम कर रहे हैं। और सभी वही हैं जिनका पेशा अब राजनीति हो गया है और एक्टिंग अब कभी-कभार ही करते हैं। इनमें शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, राज बब्बर, जया प्रदा व कीर्ति आज़ाद आदि बड़े नाम शामिल हैं। ये लोग पार्टी की मीटिंग में जाते हैं। लोगों के पास भी जाते हैं। परेशानियाँ भी सुनते हैं। न भी सुने तो भी राजनीति में तो सक्रिय तो रहते हैं। एक और बड़ा नाम है अमिताभ बच्चन का। ये पहले राजनीति में आये कामयाब नहीं हुए। फिर दोबारा आये लेकिन सीधे तौर पर नहीं। खुद नहीं लड़ते, बल्कि जिताने की माँग करते रहते हैं।

ऊपर दिये गये लोग वे हैं जो सक्रिय राजनीति में हैं। पिछले चुनावों की बात करें तो मुझे इन क्षेत्रों से चार नाम याद आ रहे हैं जो चुनाव लड़े थे। वैसे तो सभी बॉलीवुड सितारे किसी न किसी पार्टी के लिये प्रचार करते ही रहते हैं। उन्हें सिर्फ पैसे से मतलब है। दलेर मेहंदी को कांग्रेस और भाजपा दोनों अपनी रैली में बुलाती हैं। मकसद..भीड़ को खीचना। पिछले आम चुनावों के बड़े नाम थे नवजोत सिंह सिद्धू, स्मृति इरानी, धर्मेंद्र और गोविंदा। कोई नाम भूल गया होऊँ तो कृपया याद दिलाइयेगा। इनमें से पहले दो लोगों की बात करें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि ये लोग राजनीति को गम्भीरता से लेते हैं और चुनावी रैलियों के अलावा पार्टियों की मीटिंग वगैरह में भी शामिल होते रहते हैं। लेकिन बाकि दोनों फिल्मी सितारों का क्या? ये लोकसभा चुनाव तो जीत गये पर शायद इनका मकसद समाज की भलाई करना नहीं रहा। दोनों को ही फिल्में तो मिल नहीं रही थी तो सोचा कि क्यों न राजनीति में हाथ हाजमाया जाये। धर्मेंद्र की पत्नी हेमा मालिनी ओ वैसे भाजपा के लिये काफी समय से प्रचार कर रही है तो शायद भाजपा ने धर्मेंद्र को महज पुतले के रूप में खड़ा किया और बीकानेर वालों को पूरी तरह से बहकाया। शायद एक या दो बार राजस्थान गये हों...शायद वो भी नहीं...दूसरी ओर गोविंदा की बात करें तो उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया। समाज की भलाई के लिये कुछ भी नहीं किया। देखा जाये तो उन्हें तो राजनीति का 'र' भी नहीं आता। जब पिछले वर्ष सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो उन्हें इस प्रक्रिया के बारे में जानकारी ही नहीं थी। हमारे चीची भाई ने तो केवल फिल्मों में फूहड़ हास्य डाल कर हँसाना सीखा है, सदन में हाजिर होकर लोगों के लिये काम करना नहीं। इस बजट सेशन में केवल एक बार हाजिर हुए। वैसे मुझे एक भी ज्यादा लग रहा है!!

अब जसपाल राणा का नाम भी उठा। वे टिहरी से लड़ रहे हैं। राजनाथ सिंह के रिश्तेदार जो ठहरे, टिकट तो मिल ही जाना था। पॉपुलर तो हैं ही तो शायद वोट भी मिल जाये। उधर संजय दत्त समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ से लड़ रहे हैं। सपा की हालत हाथी के आगे वैसे ही पतली चल रही है। अमिताभ के बाद मुन्ना...देखते हैं कि कामयाब होते हैं या नहीं। फिल्मी सितारों को पार्टी के लिये लपेटने का काम राजनैतिक दल बखूबी कर रहे हैं और बदले में फिल्मी सितारे राजनीति की 'एक्टिंग' करने का मेहनताना लेते हैं। आज बहुत कम सितारे या खिलाड़ी ऐसे हैं जो समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं। धर्मेंद्र और गोविंदा जैसे सितारे दोबारा चुनाव लड़ पायेंगे ये मुझे संदेह है क्योंकि जनता इन्हें समझ चुकी है। वैसे जनता क्या सोच कर वोट देती है? क्या हर फिल्मी सितारा या खिलाड़ी अच्छा समाजसेवी हो सकता है या राजनैतिक दलों की महज कठपुतली? यदि पुराने दिग्गजों की बात न करूं तो आज यहाँ सिद्धू और स्मृति ईरानी जैसे नेता भी हैं और धर्मेंद्र गोविंदा जैसे भी। वो समय बीत गया जब शत्रुघ्न, राज बब्बर जैसे सितारे सक्रिय राजनीति में उतर आये थे और इसी को अपना पेशा बना लिया था। आजकल राजनीति इन फिल्म-स्टारों का पार्ट-टाइम धंधा है।

मुझे इंतज़ार है ये जानने का कि क्या संजय दत्त भी गोविंदा की राह पर निकलेंगे? मुम्बई से लखनऊ साल में कितनी बार चक्कर लगायेंगे? क्या मुन्नाभाई की इमेज का असर वोटिंग पर भी पड़ेगा? क्या लोगों को बहकाना इतना सरल हो गया है कि कोई भी बड़ी शख्सियत आ कर चुनाव लड़े और जीत जाये। शायद अब तक लोगों को समझ आ जाना चाहिये। और अगर नहीं आया तो यह इस देश का दुर्भाग्य कहलायेगा और भविष्य अँधकारमय। वैसे चुनाव आते आते कईं और नाम सामने आ सकते हैं.. देखें क्या होता है इन सितारों का..क्या इन सितारों को जनता दिन में तारे दिखायेगी?

तपन शर्मा

Thursday, February 12, 2009

राहुल, मनमोहन या आडवाणी: युवा कौन?

पिछले कुछ हफ्तों से अखबारो और समचार चैनलों से जाना कि राहुल गाँधी आने वाले चुनावों के लिये युवाओं की फौज तैयार कर रहे हैं। यानि कि कांग्रेस चाहती है कि युवा इस देश का नेतृत्व करें। मनमोहन सिंह तो वैसे भी पहले से ही कांग्रेस के लिए कठपुतली रहे हैं। यदि आप कांग्रेस के होर्डिंग देखेंगे तो पायेंगे कि ५० फीसदी में मनमोहन गायब होंगे। और अगर विश्व में सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की बात होती है तो सोनिया का नाम ज़रूर आता है पर अपने प्रधानमंत्री का नहीं। पिछली बार तो कांग्रेस की मजबूरी थी मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाना लेकिन इस बार राहुल बाबा पिछले २-३ सालों से मेहनत कर रहे हैं। पसीना बहा रहे हैं। अभी हाल ही में दिल्ली में मैंने बैनर देखा था.. लिखा था : "युवा देश युवा नेता" और फोटो थी केवल राहुल गाँधी की। अब इसका क्या मतलब निकाला जाये? कांग्रेस में ही विरोधाभास है। मनमोहन या राहुल? वे युवा के तौर पर राहुल को प्रोजेक्ट कर रहे हैं और प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह को। वैसे कांग्रेस की नीति कभी भी प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री को प्रोजेक्ट करने की नहीं रही। हर बार चुनाव के बाद ही पासे खुले हैं। क्या इस बार भी...?

यदि कांग्रेस यह मानती है कि राहुल गाँधी युवा हैं और राहुल भी अपने जैसे युवाओं की एक ब्रिगेड खड़ा करना चाहते हैं तो उनके 'युवा' देश के मंत्रियों की एक लिस्ट देखें:
मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शरद पवार, लालू प्रसाद, ए.के.एंटनी, ए.आर. अंतुले, सुशील कुमार शिंदे, रामविलास पासवान व जयपाल रेड्डी आदि। इनमें से कितने राहुल बाबा के हमउम्र हैं, ये कांग्रेस व राहुल गाँधी को समझना चाहिये। फिलहाल तो यही लोग देश का नेतृत्व कर रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब तक यह देश बुजुर्ग हाथों में हैं?

खैर कांग्रेस तो उलझी रहेगी। उधर बीजेपी में आडवाणी के नाम पर फैसला ५ साल पहले ही तय हो गया था जब भाजपा चुनाव हारी थी। अगर वर्तमान स्थिति देखें तो मनमोहन और आडवाणी में मुकाबला... ये दोनों बुजुर्ग हैं या युवा? हो सकता है कि लोगों में बात उठे कि कहीं युवा भारत के बुजुर्ग प्रधानमंत्री तो नहीं होने जा रहे? आडवाणी ने पिछले दिनों चैट के दौरान लोगों से कहा कि देश चलाने के लिये अनुभव की जरूरत होती है। ऐसा व्यक्ति जो देश व विदेश की सभी नीतियों को जानता हो। अपने दोस्त व दुश्मन को जानता हो। बात भी सही है। अनुभव के बिना देश नहीं चलता। तो क्या राहुल गाँधी में अनुभव है कि वे देश को चला सकें?

युवा और बुजुर्ग पर बहस चली है तो मुझे एक वाकया याद आ गया। अभी पिछले महीने जनवरी में संघ के एक कार्यक्रम में जाना हुआ जिसमें दिल्ली की आई.टी और मैनेजमेंट कम्पनियों के कईं इंजीनियर, मैनेजमेंट के छात्र आदि उपस्थित थे। उसमें संघ के जनरल सेक्रेट्री मोहन राव भागवत को सुना। युवा होने की परिभाषा में उनका कहना था कि आयु युवा होने का प्रमाण नहीं होती। इंसान सोच से युवा या बुजुर्ग होता है शरीर से नहीं। उन्होंने आगे कहा कि युवा होने के लिए संवेदना होनी आवश्यक है। जिस व्यक्ति में संवेदना होती है, जो दूसरों के दुख-सुख को समझ सकता है वही युवा है। एक और लक्षण जो उन्होंने बताया वो था दृढ़ निश्चय। जो लक्ष्य हासिल करना होता है उसको पाने के लिये वो जी-तोड़ मेहनत करता है जबकि जो बुजुर्ग होगा वो थक जायेगा व हताश हो जायेगा। इसका मतलब ये हुआ कि २५ बरस में भी इंसान बूढ़ा हो सकता है और ७० वर्ष का भी युवा हो सकता है।

राहुल गाँधी को भविष्य का प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करना या न करना इस उलझन में फिलहाल कांग्रेस भी है। पर राहुल देश के प्रधानमंत्री तो बनेंगे ही, आखिर ख़ास परिवार से हैं। इसमें जो पैदा हुआ वो प्रधानमंत्री बना। इस बार नहीं तो १०-१५-२० वर्षों बाद वो दिन तो आयेगा ही। पिछली बार इनका बचपन था अब युवा हैं.. उम्र से.. राजनीति में शायद अभी भी बचपन ही है...राजनैतिक समझ तो अभी बाकी है। देखें कब तक वे परिपक्व होते हैं पर तब तक भारत की जनता दो उम्रदराज़ युवाओं, मनमोहन और आडवाणी, के बीच ही फैसला करेगी।

तपन शर्मा

Friday, January 30, 2009

मदमस्त पीढियां, लड़खड़ाती सभ्यताएं....

मैंगलौर में पब में क्या हुआ, ये सब को पता है। किसने क्या कहा, ये बात दोहराने की जरूरत नहीं है। लेकिन जो कुछ हुआ, उसका दोषी कौन है, ये जानना जरूरी है। उसी की पड़ताल करते हैं आज। कठघरे में खड़े होंगे राजनैतिक दल, श्री राम सेना, मीडिया और हम।

पब में युवा नाच रहे थे, शराब पी रहे थे, और क्या क्या कर रहे थे..ये हमें नहीं पता। रेव पार्टी थी या नहीं, ये भी नहीं पता। रेव पार्टी गैरकानूनी है क्योंकि वहाँ ड्रग्स का सेवन होता है। उस पब में क्या वैसा हो रहा था? यदि हाँ, तो क्या हमारा युवा वर्ग अपने भविष्य को लेकर चिंतित नहीं है? ड्रग्स सेहत के लिये हानिकारक है, क्या उसके नशे में हमारा युवा खोता जा रहा है? इस सबके जिम्मेवार वे खुद हैं, उनके माता-पिता हैं। और अगर वैसा नहीं था..और केवल लोग नाच-गा रहे थे..तो..?

वैसे कोई अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी में क्या करता है उससे किसी को क्या दिक्कत हो सकती है? हम कौन होते हैं किसी की ज़िन्दगी में दखल देने वाले। पूछिये किसी से भी यही जवाब मिलेगा...मेरी पर्सनल लाइफ है..तू कौन होता है? बात भी सही है। अब श्रीराम सेना या मनसे या शिवसेना या और भी कोई "संस्कृति समर्थक" दल कौन होता है लड़के-लड़कियों को पीटने वाला? उन्होंने कोई ठेका नहीं लिया हुआ देश का। और न ही वे हमेशा सही होते हैं। ये दल वैलेंटाइन डे का विरोध करेंगे लेकिन युवाओं में बसंत पंचमी के बारे में जागरुकता नहीं फैलायेंगे। भई प्यार का इज़हार हर कोई अपने तरीके से करता है। भारतीय तरीका यदि है तो लोगों तक पहुँचा जाये। अब पाश्चात्य की कब तक बुराई करेंगे? वहाँ से पैसा भी तो बहुत आता है... ये केवल हिंदू दल करते हों ऐसा नहीं है। सानिया मिर्ज़ा को कैसी ड्रेस पहननी चाहिये, ये उलेमा और फतवा जारी करने वाले संगठन बताते हैं। फलाने पर १ करोड़ का इनाम, कभी ये फतवा कभी वो फतवा। जिन लोगों को फ़तवे का मतलब नहीं पता वे भी इस शब्द से वाकिफ़ हो गये हैं।

अब बात करते हैं राजनैतिक दलों की। ये दल अब नैतिक दल बन गये हैं। कर्नाटक में येदुरप्पा बोले कि पब कल्चर गलत है तो कांग्रेस शासित प्रदेश राजस्थान के सी.एम. अशोक गहलोत भी यही जुबान बोले। पर इनको समझाओ की शराब से इन्हें कितनी कमाई होती है। पब कैसे बंद करोगे? दिल्ली में शीला आँटी ने कुछ समय पहले कहा था कि मॉल में भी ठेके खुलने चाहिये। अब? भई जब पैसा दिख रहा हो तो थोड़ा सोच कर बोलिये। कर्नाटक के ४००० पबों को कैसे बंद करोगे? बंद करना है तो ड्रग्स के बारे में जागरूकता फैलाये। किसी पर पाबंदी ठीक नहीं। डेमोक्रेसी के खिलाफ है। लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। वैसे अगले ही पल कांग्रेस और बीजेपी दोनों पीछे हट जायेंगी..हम जानते हैं...

अब बात करते हैं उस क्षेत्र की जो अपनी ही धुन में चला जा रहा है। यानि कि मीडिया। श्री राम सेना नामक संगठन का हमला होने वाला है। ये बात कुछ मीडिया वालों को पता थी। तो बस पहुँच गये कैमरा लेकर। पुलिस को सूचित करना अपना धर्म नहीं समझा। लड़कियों को पिटते हुए देखते रहे पर खुद कुछ नहीं किया सिवाय शूट करने के। अगर रोक देते तो ब्रेकिंग न्यूज़ कैसे दिखा पाते? हद है पत्रकारों की... या सोच का फर्क है....

मैंगलौर में जो कुछ हुआ वो गलत हुआ। हमें कोई हक नहीं कुछ करने का, किसी को कुछ कहने का। पुलिस व कानून अपनी जगह है। पब चलते रहेंगे। उन्हें बंद करना कोई उपाय नहीं है। ज़ोर जबर्दस्ती से अपनी बात कोई नहीं मनवा सकता है। युवाओं को खुद समझना होगा कि उनके लिये क्या सही है व क्या गलत। राजनैतिक दल, मीडिया, 'सेना', उलेमा या हम..सब इसी समाज का हिस्सा हैं... थोड़ा सोच समझकर काम लिया जाये तो स्थिति से निपटा जा सकता है।

तपन शर्मा