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Friday, March 12, 2010

महिला आरक्षण के सख्त विरोध में

O राजकिशोर

महिला आरक्षण विधेयक अगर पास हो गया तो कोई प्रलय नहीं आ जाएगा। लेकिन मीडिया में और खासकर महिला जगत में इसे लेकर उत्सव का जो माहौल है, वह लगभाग अश्लील जान पड़ता है। इनके मूड से ऐसा लगता है जैसे जन्नत का एक तिहाई हिस्सा महिलाओं को सौंप दिया जाने वाला है और कुछ गंवार लोग इसके विरोध में लट्ठ लेकर घूम रहे हैं। जो आरक्षण के भीतर आरक्षण चाहते हैं, उनकी जाति चिंता उनकी समाज चिंता के स्तर का पर्दाफाश करती है। पुराने द्विज संस्कारों की भुतही नकल करते हुए पिछड़ी जातियों के ये तथाकथित नेता आमतौर पर अपनी बहू-बेटियों को सार्वजनिक जीवन में उतरने से रोकते हैं। लेकिन जब स्त्री मात्र के लिए विधायिका की कुछ जगहें स्थायी रूप से खाली कराने का मौका आता है तब ये चौंक कर जाग उठते हैं और अपना फर्रा पेश कर देते हैं कि जब तक हमारे समुदाय की स्त्रियों को उनका हिस्सा नहीं दिया जाता, तब तक हम यह कानून नहीं बनने देंगे। इन शूरवीरों में यह कहने की हिम्मत नहीं है कि महिलाओं को तमाम तरह की नौकरियों और पदों में एक-तिहाई या उससे ज्यादा हिस्सा दो, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से सम्मानित महसूस कर सकें।

यह हिम्मत तो द्विजों में भी नहीं हैं, क्योंकि उनका एक बड़ा हिस्सा वास्तव में स्त्री-विरोधी है और नहीं चाहता कि स्त्रियों को आगे लाने के लिए कुछ दिनों के लिए खुद पीछे बैठा जाए। चूंकि लोकसभा में 543 और विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या 4,109 है, इसलिए अगर लोकसभा में181 और विधानसभाओं में कुल मिला कर 1,167 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाती हैं तो पुरुष वर्ग का, वास्तविक जीवन में, कोई नुकसान होने वाला नहीं है।

पुरुषों की दरियादिली, जो अन्य मामलों में कम ही दिखाई पड़ती है, इस खास मामले में कबड्डी-कबड्डी का ध्वनि-घोष कर रही है, तो यह बहुत रहस्यमय नहीं है। वे बहुत कम कीमत चुका कर दानवीर का तमगा खरीदना चाहते हैं। असल बेचैनी सामान्य पुरुष सांसदों और विधायकों में है लेकिन वे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि उनके आका किसी भी कीमत पर लोकसभा का अगला चुनाव जीतना चाहते हैं। इनके लिए चुनावी जीत देश और उसके भविष्य से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। स्त्रियों के शुभैषी शायद यह उम्मीद कर रहे हैं कि संसदीय जीवन में स्त्रियों के इतनी बड़ी संख्या में उतरने से राजनीति का चरित्र ही बदल जाएगा। मेरी भविष्यवाणी यह है कि राजनीति का चरित्र बदले या न बदले, स्त्रियों का चरित्र जरूर बदल जाएगा। वे पुरुष मुट्ठियों में बंधे चुनाव टिकट के लिए जन सेवा के बल पर नहीं, बल्कि अपने स्त्रीत्व के बल पर वीभत्स और दयनीय प्रतिद्वंद्विता करेंगी, जैसे पुरुषों को पैसे, बाहुबल और शक्ति पीठों से सामीप्य के आधार पर प्रतिद्वंद्विता करते हुए देखा जाता है।

यह सारा मायालोक राजीव गांधी का खड़ा किया हुआ है, जिन्होंने शाह बानो नामक एक बेसहारा और बूढ़ी मुसलमान औरत से उसका मानवीय और संवैधानिक हक छीनने के लिए देश का कानून ही बदल डाला था। पंचायतों और नगर निकायों में स्त्रियों के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देकर राजीव ने भारत के इतिहास में अपने दस्तखत जोड़ दिए हैं। पर यह कठोर सत्य बहुत आसानी और बेदर्दी से भुला दिया जाता है कि राजीव गांधी का लक्ष्य न तो पंचायतों को गांव की और न नगरपालिकाओं को शहर की संसद के रूप में विकसित करना था।

तब भी यह सच था और आज भी यही सच है कि स्थानीय निकाय केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं को लागू करने की प्रशासनिक इकाइयां मात्र हैं और निर्वाचित सरपंच को सरकार द्वारा नियुक्त खंड विकास अधिकारी के सामने भीगी बिल्ली बन कर रहना पड़ता है।

महिलाओं के नए हिमायती-कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी, सभी-पंचायतों और नगरपालिकों पर से सरकारी अंकुश हटाने के लिए अब भी राजी नहीं हैं। अपनी-अपनी पार्टियों में स्त्रियों को अधिक से अधिक जगह और सम्मान देने की बात तक उनके दिलों में पैदा नहीं होती। फिर भी वे महिला आरक्षण विधेयक के शैदाई बने हुए हैं, ताकि कोई एक दल अपने को महिला आरक्षण का एकमात्र पैरवीकार साबित कर वोटों का मैदान न चर जाए। पढ़ने-लिखने वाली महिलाएं भी खुश हैं कि लोकसभा की अध्यक्षता का काम एक महिला को सौंप दिया गया, तब जाकर संसद में महिलाओं के लिए अलग से एक टॉयलेट बन सका। अपनी बिरादरी को कानून के बल पर तैंतीस प्रतिशत तक ले जाने की ख्वाहिश रखने वाली महिला सांसद क्या अंधी हैं कि इसके पहले इस असाधारण स्त्री-विरोधी चूक पर उनकी नजर तक नहीं गई?

सरपंच या नगरपालिका अध्यक्ष का काम प्रशासनिक जिम्मेदारी का है। सरकार जैसी शक्ति न होते हुए भी बेचारों को, जिनके अधीन स्थानीय पुलिस तक नहीं होती, तमाम तरह के सरकारी काम निपटाने पड़ते हैं। इस व्यवस्था का सही विस्तार यह होता कि प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर- चपरासी से लेकर मुख्य सचिव तक- स्त्रियों को तैंतीस या पचास प्रतिशत तक आरक्षण दे दिया जाता। इससे आम महिलाओं का ज्यादा भला और सशक्तीकरण भी होता। वर्तमान विधेयक स्त्रियों को पंद्रह सौ से भी कम सीटों के लिए आमंत्रित करता है। इसलिए महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से भी यह विधेयक घाटे का सौदा है। दक्षिण एशिया में चुनिंदा सीटों पर महिलाओं को बैठते हुए हम पहले भी देख चुके हैं और आज भी देख रहे हैं। कौन दावा कर सकता है कि इससे राजनीति के चरित्र में कोई उल्लेखनीय फर्क आया है?

यह सही है कि परिमाण में वृद्धि होने से गुण भी बदल जाता है, पर भारत की राजनीति यह नहीं होने जा रहा है। पुरुषों की तरह महिलाएं भी अपने समय और संस्कृति की उपज होती हैं। विधायिका में पिछड़ी जातियों और दलितों के बेशी संख्या में आने से बेईमानी और सत्तावाद बढ़ा है या कम हुआ है? अगर आप चाहते हैं कि पैसा, पद और पॉवर के इस दलदल में नाक तक धंसने का अधिकार स्त्रियों को भी मिलना चाहिए तो आप ऐसे समानतावादी हैं जो जन्नत और दोजख के फर्क को मिटा देना चाहता है। आपका एतराज यह है कि बदनीयती और बेईमानी पर किसी एक जेंडर का एकाधिकार क्यों हो? अगर लोकसभा का चुनाव लड़ने में दस-पंद्रह करोड़ और विधानसभा का चुनाव लड़ने पर दो-तीन करोड़ का न्यूनतम खर्च आता है, तो महिलाएं भी इसका जुगाड़ कर लेंगी। बेशक अपने पिता या पति की कमाई पर उनका अधिकार भरण-पोषण से ज्यादा न हो और अपनी कमाई पर वे सिर्फ अपना अधिकार रखना चाहें तो यह दांपत्य कलह का कारण बन जाता हो, लेकिन चूंकि सांसद और विधायक का पद हर तरह से लाभ का पद है, इसलिए महिला उम्मीदवारों को अपनी फाइनेंसिंग कराने में दिक्कत पेश नहीं आएगी।
चुन लिए जाने के बाद उन्हें यह कर्ज उतारना भी होगा, जो जनता की कमाई हड़पने के पाप में हिस्सेदारी के बगैर मुमकिन नहीं है। अंतत: सचाई यही ठहरती है कि इस विधेयक के माध्यम से लोभी और छलात्कारी पुरुष महिलाओं को अपनी भ्रष्ट बिरादरी में शामिल करने पर आमादा हैं। यह बहुत खुशी की बात होगी अगर महिलाएं इस चक्रव्यूह को भेद सकें। लेकिन यह तैंतीस प्रतिशत और सड़सठ प्रतिशत यानी दीये और तूफान का मुकाबला होगा। फिर संसद के बाहर तो पुरुष वर्चस्व को बने ही रहना है।

मूल आपत्ति लेकिन दूसरी है। इसका संबंध राजनीति की परिभाषा से है। राजनीति क्या है? क्या यह पैसा, पद और पॉवर हासिल करने में प्रतिद्वंद्विता का खेल है? क्या राज्य की शक्तियां मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को अधिक से अधिक लूट का अवसर देने के लिए हैं? जो भी व्यक्ति ऐसा सोचकर राजनीति में आता है या राजनीति में बना हुआ है, वह राजनीति, संविधान और जनता के साथ खुल्लमखुल्ला बलात्कार करता है। जब कोई व्यक्ति राजनीति में आरक्षण की मांग करता है तो यह मांग बलात्कारियों के इस नापाक क्लब में शामिल होने की मांग बन जाती है। कोई कह सकता है कि बेईमानी कहां नहीं है- धर्म में नहीं है, संस्कृति में नहीं है, शिक्षा में नहीं है या साहित्य में नहीं है? इसका त्वरित जवाब यह है कि भेड़ की खाल में कुछ भेड़िए भी टहल रहे हैं, इसलिए धर्म, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य की परिभाषा तो नहीं बदल दी जाएगी? इसी तरह, अगर आज राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर दिखाई पड़ रही है और राजनेता, एक वर्ग के रूप में, श्रद्धा और विश्वास के नहीं, बल्कि नफरत के पात्र हो गए हैं तो इससे प्रभावित होकर राजनीति की परिभाषा कैसे बदल दी जा सकती है? सांसद और विधायक चुने जाने पर संविधान की आत्मा और उसके शब्दों के अनुसार काम करने की जो शपथ ली जाती है, उस पर काली स्याही कैसे पोती जा सकती है?

राजनीति की एकमात्र वैध परिभाषा यह है कि यह जनता की सेवा करने का एक पवित्र माध्यम है। तकनीकी तौर पर तो हमारे मंत्री, सांसद, विधायक आदि भी जन सेवक (पब्लिक सरवेंट) कहलाते हैं और इसलिए उन्हें कुछ विशिष्ट अधिकार भी दिए गए हैं, लेकिन इनमें से प्राय: सभी पब्लिक को ही अपना सरवेंट समझते हैं।

यह राजनीति का खलनायकीकरण है। धीरोदात्त नायक तो वही राजनेता कहलाएगा, जिसे जनता की सेवा करने में आनंद आता है और जो अपने लिए कम से कम की कामना करता है। यही वह बिंदु है जहां आकर राजनीतिक और नैतिक का द्वंद्व मिट जाता है। इसी अर्थ में हर नैतिक कर्म एक राजनीतिक कर्म है और हर राजनीतिक कर्म एक नैतिक कर्म।

इसीलिए यह प्रश्न भी वैध है कि नैतिकता में आरक्षण कैसा? अच्छा बनने के लिए तैंतीस या पचास प्रतिशत आरक्षण की कामना क्यों? सेवा के क्षेत्र में विशेषाधिकार के लिए जगह कहां है? जो स्त्री या पुरुष जन सेवा करना चाहता है, उसकी राह कौन रोक सकता है? जो संसद या विधानसभा में पहुंच कर जनता की सेवा करना चाहता है, उसके लिए दरवाजा पहले से ही खुला हुआ है-लोगों की भलाई करने में अपने आप को झोंक दीजिए, लोग आपको अपने कंधों पर बैठा कर संसद और विधानसभा के दरवाजे तक ले जाएंगे।

अगर संसद या विधानसभा में सीट आरक्षित कर दिए जाने के बाद ही कोई जन सेवा के मैदान में उतरना चाहता है, तो उसकी नीयत पर शक करने का हमें पूरा हक है। महिला आरक्षण विधेयक राजनीति की पतित परिभाषा को मान्यता देता है और स्त्रियों को आमंत्रित करता है कि हम पुरुष जो कर रहे हैं, आओ तुम भी वही करो। अन्यथा यह विधेयक पेश करने के पहले सरकार चुनाव कानून में ऐसे संशोधन जरूर करती, जिससे गरीब से गरीब आदमी भी चुनाव लड़ना चाहे तो लड़ सके। जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन सिर्फ तैंतीस प्रतिशत नहीं, सौ प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए खुल जाएंगी।

(जनसत्ता से साभार)

Sunday, July 12, 2009

दिल्ली की हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष !

हमारे हाजी साहब बहुत काम के आदमी हैं। उनसे किसी भी विषय पर राय ली जा सकती है और वे किसी भी विषय पर टिप्पणी कर सकते हैं। सुबह-सुबह पढ़ा कि दिल्ली की हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष एक व्यंग्यकार को बनाया गया है, तो उनके पास दौड़ गया। हाजी साहब की एक खूबी और है। कई बार वे मन की बात भांप लेते हैं। उन्होंने ठंडे पानी के गिलास से मेरा स्वागत किया और बोले, ‘बैठो, बैठो। मैं समझ गया कि कौन-सी बात तुम्हें बेचैन कर रही है।’ मैंने आपत्ति की, ‘हाजी साहब, मैं किसी राजनीतिक मामले पर चरचा करने नहीं आया हूं।’ हाजी साहब – ‘हां, हां, मैं भी समझता हूं कि तुम जी-5, जी-8 और जी-14 पर बात करने नहीं आए हो। ये पचड़े मेरी भी समझ में नहीं आते। इस तरह सब अलग-अलग बैठक करेंगे, तो संयुक्त राष्ट्र का क्या होगा? कुछ दिनों के बाद तो वहां कुत्ते भी नहीं भौंकेंगे। लेकिन तुम आए हो राजनीतिक चर्चा के लिए ही, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं।’ मुझे हक्का-बक्का देख कर उन्होंने अपनी बात साफ की, ‘तुम्हें यही बात परेशान कर रही है न कि हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष पहली बार एक व्यंग्यकार को बनाया गया है!’


मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखता रह गया। वे बोले जा रहे थे, ‘बेटे, यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक है। यह तो तुम्हें पता ही होगा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ही यहां की हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष हैं। वे साहित्यकर्मी नहीं, राजनीतिकर्मी हैं। साहित्यकर्मी होतीं, तो इस प्रस्ताव पर ही उनकी हंसी छूट जाती। राजनीतिकर्मी हैं, सो आंख से नहीं, कान से देखती हैं। उनके साहित्यिक सलाहकारों ने कह दिया होगा कि इस समय एक व्यंग्यकार से ज्यादा उपयुक्त कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री जी ने बिना कुछ पता लगाए, बिना सोचे-समझे ऑर्डर पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे। इसमें परेशान होने की बात क्या है? बेटे, दुनिया ऐसे ही चलती है। हमारा राष्ट्रीय मोटो भी तो यही कहता है - सत्यमेव जयते। आज का सत्य राजनीति है। सो राजनीति ही सभी अहम चीजों का फैसला करेगी। वाकई कुछ बदलाव लाना चाहते हो, तो तुम्हें राजनीति ज्वायन कर लेना चाहिए।’


मेरे मुंह का स्वाद खट्टा हो आया। मैंने यह तो सुना था कि साहित्य में राजनीति होती है, पर यह नहीं मालूम था कि राजनीति में भी साहित्य होता है। आजकल राजनीति की मुख्य खूबी यह है कि मेसेज छोड़े जाते हैं और संकेत दिए जाते हैं। हाजी साहब से पूछा, ‘फिर तो आप कहेंगे कि एक शीर्ष व्यंग्यकार के हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने में भी कुछ संकेत निहित हैं !’ हाजी साहब ने मुसकराते हुए कहा, ‘तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। संकेत बहुत स्पष्ट है कि यह व्यंग्य का समय है। पहले दावा किया जाता था कि यह कहानी का समय है, कोई कहता था कि नहीं, कविता का समय अभी गया नहीं है, तो कोई दावा करता था कि उपन्यास का समय लौट आया है। हिन्दी अकादमी का नया चयन बताता है कि यह व्यंग्य का समय है। व्यंग्य से बढ़ कर इस समय कोई और विधा नहीं है।’


मैंने अपना साहित्य ज्ञान बघारने की कोशिश की, ‘हाजी साहब, आप ठीक कहते हैं। आज हर चीज व्यंग्य बन गई है। हिन्दी में तो व्यंग्य की बहार है। कविता में व्यंग्य, कहानी में व्यंग्य, उपन्यास में व्यंग्य, संपादकीय टिप्पणियों में व्यंग्य -- व्यंग्य कहां नहीं है? एक साहित्यिक पत्रिका ने तो अपने एक विशेषांक के लेखकों का परिचय भी व्यंग्यमय बना दिया था। क्या इसी आधार पर आप कहना चाहते हैं कि व्यंग्य इस समय हिन्दी साहित्य की टोपी है -- इसके बिना कोई भी सिर नंगा लगता है। शायद इसीलिए सभी लेखक एक-दूसरे पर व्यंग्य करते रहते हैं। कभी सार्वजनिक रूप से कभी निजी बातचीत में।’


हाजी साहब बोले, ‘तुम कहते हो तो होगा। पर मेरे दिमाग में कुछ और बात थी। हिन्दी में तो दिल्ली शुरू से ही व्यंग्य का विषय रही है। इस समय मुझे दिल्ली पर दिनकर जी की कविता याद आ रही है - वैभव की दीवानी दिल्ली ! / कृषक-मेध की रानी दिल्ली ! / अनाचार, अपमान, व्यंग्य की / चुभती हुई कहानी दिल्ली ! डॉ. लोहिया ने लिखा है कि दिल्ली एक बेवफा शहर है। यह कभी किसी की नहीं हुई। पूरा देश दिल्ली की संवेदनहीनता पर व्यंग्य करता है। लेकिन दिल्ली पहले से ज्यादा पसरती जाती है। हड़पना उसके स्वभाव में है। इसी दिल्ली में कभी हड़पने को ले कर कौरव-पांडव युद्ध हुआ था। इसलिए अगर आज दिल्ली में व्यंग्य को इतना महत्व दिया जा रहा है, तो इसमें हैरत की बात क्या है? तुम भी मस्त रहो और जुगाड़ बैठाते रहो। यहां जुगाड़ बैठाए बिना जीना मुश्किल है।’


मैंने कहा, ‘हाजी साहब, लगता है, आज आपका मूड ठीक नहीं है। मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे ! मेरा जुगाड़ होता, तो मैं मुंह बनाए आपके पास क्यों आता?’ हाजी साहब – ‘नहीं, नहीं, मैं तुम्हें अलग से थोड़े ही कुछ कह रहा था। मैं तो तुम्हें युग सत्य की याद दिला रहा था। हर युग का सत्य यही है कि युग सत्य को सभी जानते हैं, पर उसे जबान पर कोई नहीं लाता। अपनी रुसवाई किसे अच्छी लगती है?’


मैंने हाजी साहब का आदाब किया और चलने की ख्वाहिश जाहिर की। हाजी साहब का आखिरी कलाम था – ‘आदमी की फितरत ही ऐसी है। फर्ज करो, तुमसे पूछा जाता कि जनाब, आप हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनेंगे, तो क्या तुम इनकार कर देते? क्या तुम यह कहने की हिम्मत दिखाते कि ‘मुआफ कीजिए, दिल्ली में बड़े बड़े काबिल लोग बैठे हैं। मैं तो उनके पांवों की धूल हूं। मुझसे पहले उनका हक है।’ आती हुई चीज को कोई नहीं छोड़ता। यहां तो लोग तो जाती हुई चीज को भी बांहों में जकड़ कर बैठ जाते हैं। और जब आना-जाना किसी नियम से न होता हो, तो अक्लमंदी इसी में है कि हवा में तैरती हुई चीज को लपक कर पकड़ लिया जाए। सागर उसी का है जो उठा ले बढ़ाके हाथ।’

राजकिशोर

Wednesday, May 27, 2009

फार्मूलों से न जिंदगी चलती है न राजनीति

अब हर कोई यह कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया। जब इस फार्मूले के बल पर मायावती उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गईं, उस वक्त कहा जा रहा था कि मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला चल निकला। उन दिनों बसपा नेता की कुशाग्र बुद्धि की जम कर प्रशंसा की जा रही थी और यह उम्मीद की जाने लगी थी कि जल्द ही वे भारत की प्रधानमंत्री बन जाएं, तो यह हैरत की बात नहीं होगी। बहन जी खुद भी ऐसा सोचती थीं। यह भी कहा जा सकता है कि बहन जी खुद ऐसा सोचती थीं, इसलिए हमारे विद्वान लोग भी ऐसा ही सोचने लगे थे। हमारे विद्वान देखते तो हैं – पर उधर नहीं जिधर सत्य होता है, बल्कि उधर जिस तरफ हवा चल रही होती है। अब हवा मायावती के उलटी दिशा में चल रही है, तो कहा जाने लगा है कि उन्होंने अपनी बनती हुई इमारत को अपने ही पैरों से धक्का दे कर नेस्तनाबूद कर दिया। विद्वानों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सोशल इंजिनियरिंग क्या चीज है, यह कैसे काम करती है और इसका संचालन कैसे करना चाहिए।

अनाड़ी हाथों में पड़ कर अच्छा से अच्छा फार्मूला भी फेल हो सकता है। लेकिन मूल बात यह नहीं है। मूल बात यह है कि फार्मूले गणित और विज्ञान में ही गुल खिला सकते हैं, जहां दो और दो हमेशा चार होते हैं तथा दस में से पांच निकाल दो तो हमेशा पांच ही बचेगा। जिंदगी में ऐसा नहीं होता। यहां चार करो तो नतीजा आठ भी हो सकता है और दो भी हो सकता है। इसी में जिंदगी का रोमांच है। नहीं तो वह एकरस हो जाती। इसीलिए जब से जिंदगी की पेचीदगी बढ़ी है, दुनिया भर में ऐसी किताबों की बाढ़ आ गई है जो सुख से जीने और सफलता पाने के गुर सिखाती हैं। ऐसी किताबों की एक पीढ़ी लोकप्रिय हो जाने के बाद जब बाजार में दम तोड़ देती है, तो उनकी दूसरी पीढ़ी जन्म लेती है। इस तरह सुख-शांति-सफलता-समृद्धि-नेतृत्व देने के फार्मूले पानी के बुलबुलों की तरह पैदा होते रहते हैं और उन्हीं की तरह शीघ्रमृत्यु के शिकार हो जाते हैं। पर जिंदगी इतनी पेचीदा चीज है कि समस्याओं का पैदा होना बंद नहीं होता। बताते हैं कि चुनाव प्रचार के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी को जब भी थोड़ा-सा वक्त मिलता था, वे डेल कार्नेगी की एक समय बहुत बिकनेवाली पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लुएंस पीपल’ पढ़ने लगते थे। इसमें दी गई शिक्षाओं के आधार पर आडवाणी ने कितने मित्र बनाए और कितने लोगों को प्रभावित किया, यह कोई नहीं जानता। अगर फार्मूलों पर अमल करने से हर विवाह सफल हो जाता, हर संबंध सरस हो जाता, हर व्यवसाय प्रगति करने लगता और हर क्षेत्र में सफलता मिलती होती, तो धरती पर इतना दुख-दैन्य दिखाई नहीं देता।

फिर भी फार्मूलाबाजी चलती रहती है तो इसीलिए कि सभी लोग सफलता का शॉर्टकट खोजते रहते हैं। पैदल, साइकिल या मोटरगाड़ी के लिए शॉर्टकट हो सकते हैं, पर जिंदगी का सफर इतना सीधा नहीं है। यहां कोई भी फार्मूला काम नहीं करता। हर आदमी को हर चीज की खोज अपने ढंग से करनी होती है। टाटा घराना अपने ढंग से सफल हुआ तो अंबानी ग्रुप अपने ढंग से। बिड़ला परिवार का तरीका कुछ और था। बीआर चोपड़ा और ह्मषीकेश मुखर्जी, दोनों की फिल्में हिट होती थीं, पर दोनों का फिल्म बनाने का तरीका अलग-अलग था। अमिताभ बच्चन अगर राजेश खन्ना की तरह अभिनय करते और गुलजार आनंद बख्शी की तरह गीत लिखते, तो वे आज इतिहास के डस्टबिन में होते।

मायावती ने जब अवर्ण-सवर्ण एकता तथा सद्भाव की खोज की – किसी नई राजनीति की पीठिका के तौर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक सफलता के शॉर्टकट के रूप में, तो वे एक फार्मूले की रचना कर रही थीं – न उनका निजी परिप्रेक्ष्य बदल रहा था, न उनकी राजनीति में परिवर्तन आ रहा था, न उनके कामकाज के तरीके बदल रहे थे। वे जानती थीं कि ओबीसी उनके साथ आएँगे नहीं, मुसलमान उनके बाएं बाजू की तरह जाना शुरू कर चुके हैं, इसलिए दलितों के साथ चलने के लिए ऊंची जातियों को ही लुभाया जा सकता है, जो अब तक की अपनी उपेक्षा से संतप्त थे। यही मायावती ने किया -- अपनी बुद्धि से किया या किसी सवर्ण सलाहकार की बात मान कर किया, यह मायावती के जीवनीकार जानें। फार्मूला हिट हो गया और उत्तर प्रदेश का मुकुट उड़ते हुए बहन जी के सिर पर आ बैठा। दुर्भाग्यपूर्ण घटना यह हुई कि इसके नतीजे में, इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में, बहन जी का दायित्व बोध तो नहीं जागा, उनकी महत्वाकांक्षा के पटाखे में दियासलाई जरूर लग गई। अब उनके पैर उत्तर प्रदेश नामक अभागे राज्य के जूते से बहुत बड़े हो गए और वे प्रशासन तथा विकास की चुनौतियों को भुला कर दिल्ली का सिंहासन खरीदने के लिए रुपयों का हिमालय खड़ा करने में लग गर्इं। वे अपनी पार्टी के हर सांसद, विधायक और कार्यकर्ता को, सरकार के हर विभाग को, हर विभाग के हर अफसर को अपने ‘प्रधानमंत्री सहायता कोष’ का चलता-फिरता एटीएम समझने लगीं। यहीं से उनके पैर डगमगाने लगे।

सत्ता महत्वाकांक्षा का बोझ सहन करती है, लेकिन एक हद तक ही। जब उसने एक समय इंदिरा गांधी की आदमकद से बड़ी महत्वाकांक्षाओं का बोझ वहन करने से इनकार कर दिया और उत्तर भारत में कांग्रेस की एक भी सरकार न रहने दी, तो मायावती किस खेत की मूली हैं। अब वे कार्यकर्ताओं और अफसरों को डांट-फटकार रही हैं कि तुम्हीं लोगों के कारण मेरी हार हुई। इसके बजाय अगर वे किसी आदमकद आईने के सामने खड़ी हो जातीं, तो उन्हें अपनी हार के लिए जिम्मेदार एकमात्र व्यक्ति तुरंत दिख जाता। पर यह प्रकृति की माया है कि आंखें खुद को देखने के लिए बनाई ही नहीं गई हैं और आईने के सामने हर आदमी को अपना चेहरा प्यारा लगता है।

सड़क सभी को चाहिए – चाहे वह दलित हो, या पिछड़ा या मुसलमान या बाभन-ठाकुर। बिजली भी सभी को चाहिए। अच्छा प्रशासन किसी एक जाति का जीना सुगम नहीं करेगा, इससे सभी को राहत मिलेगी। यही हाल शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से संबंधित संस्थानों का है। गुंडागर्दी सभी के लिए दुखमय है। संक्षेप में यह कि सुशासन का कोई विकल्प नहीं है। मायावती को दिल्ली ले जाने का रास्ता सुशासन से हो कर ही जाता था -- अब भी जाता है, पर उन्होंने सोचा कि नीति, कार्यक्रम और अमल की त्रयी के स्थान पर तिकड़म का अद्वैतवाद ही काफी है। यह सोशल इंजिनियरिंग नहीं, राजनीतिक इंजिनियरिंग थी। इसका फेल होना उतना ही निश्चित था जितना नीम के पेड़ पर आम के उगने की उम्मीद का फेल होना। विधान सभा चुनाव के दौरान पोलिंग बूथ पर तो अवर्ण-सवर्ण एकता हो गई थी, पर इससे सत्ता की जो मदांध राजनीति पैदा हुई, उसने उस अवर्ण समूह के बीच भी दरारें पैदा कर दीं जिसे मायावती अपना फिक्स्ड अकाउंट मानती रही हैं। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों से मायावती के उम्मीदवारों का हारना और क्या बताता है? बहरहाल, मई 2009 का सवाल यह है कि एक फार्मूले के फेल होने के बाद दलित की बेटी कोई और फार्मूला खोजने का यत्न करेगी या कांशीराम के वचन याद करते हुए यह समझने की कोशिश कि राजनीति की नौटंकी क्या होती है और असली राजनीति क्या होती है।

राजकिशोर
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं)

Sunday, May 24, 2009

झूठ से शुरुआत...

इस शुक्रवार को जिन उन्नीस सांसदों ने केंद्र के मंत्री पद की शपथ ली है, वे बुरा न मानें, तो एक बात कहना चाहता हूं। उन्होंने, प्रधानमंत्री सहित, अपनी शुरुआत झूठ से की है। मैं यहां इस बात का जिक्र नहीं करना चाहता कि जो लोग चुनाव जीत कर लोक सभा में आए हैं, उन्होंने अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में चुनाव खर्च की सीमा का जरूर उल्लंघन किया होगा। यह एक ऐसा उल्लंघन है जिसके बिना संसद या विधान सभा का कोई भी चुनाव आज जीता ही नहीं जा सकता। यही कारण है कि जन सामान्य के मन में यह धारणा घर कर गई है कि जब इतना खर्च करके चुनाव लड़ा जाता है, तो सांसद या मंत्री बनने के बाद इसकी भरपाई किए बिना किसी का काम कैसे चल सकता है? भरपाई ही नहीं, कुछ अतिरिक्त उपार्जन भी होना चाहिए। घर की पूंजी लुटाने के लिए तो कोई सांसद नहीं बनता! अगर यह घाटे का सौदा होता, तो किसी भी चुनाव क्षेत्र के लिए इतने उम्मीदवार कहां से आते! मैं जिस बात का जिक्र करना चाहता हूं और बहुत भरे ह्मदय से, वह इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। जिन्होंने मंत्री पद की शपथ ली है, एक तो उन्हें पता नहीं होगा कि वे किस बात की शपथ ले रहे हैं और जिन्हें पता होगा, वे जानते होंगे कि वे जो शपथ ले रहे हैं, उसका निर्वाह करने नहीं जा रहे हैं। पहले शपथ की शब्दावली पर ध्यान दिया जाए। संविधान में दी गई शपथ की भाषा इस प्रकार है : ‘मैं, अमुक, ईश्वर की शपथ लेता हूं/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा, मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंत:करण से निर्वहन करूंगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा।’
शपथ के केंद्र में संविधान और उसके प्रति निष्ठा ही मुख्य है, जिसके अनुसार मंत्री को राज-काज करना चाहिए। इस निष्ठा के दो अर्थ हैं। एक अर्थ यह है कि सभी नागरिकों के साथ न्याय किया जाएगा। किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं किया जाएगा। लेकिन यह तो प्रशासनिक फैसलों की बात है, सरकारी कार्य प्रणाली का मामला है। मूलभूत सवाल यह है कि राज्य का काम क्या है। भारत सरकार को करना क्या चाहिए? यह तय किए बिना प्रशासनिक फैसले किस आधार पर किए जाएंगे?
यहां दो चीजें प्रासंगिक हैं। राज्य का एक कर्तव्य यह है कि सभी नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा की जाए। पर यह एक तरह से नकारात्मक कर्तव्य है। राज्य किसी के मूल अधिकारों की अवहेलना न करे। सबको संविधान के अनुसार स्वसंत्रतापूर्वक जीने का अवसर मिले। इससे यह पता चलता है कि राज्य को क्या नहीं करना चाहिए। राज्य को क्या करना चाहिए, इसका उल्लेख संविधान के भाग चार में किया गया है। इस भाग में राज्य की नीति के इक्यावन तत्व निश्चित किए गए हैं। यानी अपनी नीतियां बनाते समय और फैसले करते समय राज्य को इन निदेशक तत्वों को दिमान में रखना होगा। संविधान कहता है : ‘...इनमें अधिकथित तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।’ कहा जा सकता है कि राज्य के नीति निदेशक तत्वों वाला यह भाग चार ही भारत सरकार का वेद, कुरआन और बाइबल है।
दुर्भाग्यवश भारत सरकार के संचालन में संविधान के जिस हिस्से की सर्वाधिक अवहेलना हुई है, वह यही भाग चार है। भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को स्वीकार किया गया था। तब से अब तक कुछ महीने कम साठ साल हो चुके हैं। संविधान के भाग चार का अनुच्छेद 45 कहता है : ‘राज्य, इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा।’ हम जानना चाहते हैं कि अभी तक किस सरकार ने इस अनुच्छेद को लागू करने का प्रयास किया है? मनमोहन सिंह की पिछली सरकार ने इस बारे में एक कानून जरूर बनाया है, जो संविधान के इरादे से मेल नहीं खाता। इस कानून को भी अभी तक लागू नहीं किया गया है।
लेकिन भाग चार के उद्देश्यों की व्यापकता देखते हुए बालकों की नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा बहुत मामूली बात है। कुछ बड़े उद्देश्यों पर विचार कीजिए -- राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का संचार किया जाएगा, आय की असमानताओं को कम करने की कोशिश की जाएगी, पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार दिया जाएगा, आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चलाई जाएगी जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो, कर्मकारों को निर्वाह मजदूरी मिले तथा काम की दशाएं ऐसी हों जो शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करनेवाली हों। इसके अतिरिक्त लगभग एक दर्जन निदेश और हैं जो इसी प्रकृति के हैं।
सवाल यह है कि इस शुक्रवार को जिन सांसदों ने मंत्री पद की शपथ ली है, क्या वे राज्य की नीति के इन निदेशक तत्वों का पालन करेंगे? भविष्य में जो सांसद मंत्री पद की शपथ लेंगे, क्या उनका ऐसा कोई इरादा होगा? क्या केंद्रीय मंत्रिमंडल यह सामूहिक जिम्मेदारी महसूस करेगा कि सरकार संविधान के भाग चार के अनुसार चलाई जाए?
यह सच है कि संविधान स्वयं कहता है कि इन उपबंधों को लागू कराने के लिए कोई नागरिक अदालत में नहीं जा सकता। लेकिन इससे क्या होता है? संविधान के अनुसार सरकार का जो कर्तव्य है, वह कर्तव्य है। उस कर्तव्य का पालन करने की ईमानदार कोशिश किए बगैर ‘संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा’ रखने के संकल्प का अर्थ क्या है?

राजकिशोर

Thursday, April 23, 2009

मुसलमान बेआवाज़ क्यों

यह देख कर अफसोस होता है कि केरल में तो मुसलमानों का राजनीतिक संगठन है, पर अन्य राज्यों में नहीं। चुनावों के दौरान हमेशा यह सवाल उठता है कि मुसलमान किधर जाएंगे। सबका अपना-अपना अनुमान होता है और अपने-अपने तर्क। खुद मुसलमान नहीं बोलते कि वे किस दल का साथ देंगे और क्यों। अपना संगठन होने का एक और फायदा यह है कि वे विभिन्न दलों से मुसलमानों के हित में मोलभाव भी कर सकते हैं। मोलभाव में कोई बुराई नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में तरह-तरह के दबाव समूह काम करते ही हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

केरल में मुस्लिम लीग है। वह आम तौर पर वाम मोर्चे के साथ होती है। केरल में मुस्लिम लीग के बने रहने तथा राजनीतिक सफलता प्राप्त करने के दो मुख्य कारण हैं। एक कारण यह है कि वहाँ कई चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ मुसलमान बहुमत में हैं या स्थनीय आबादी का बड़ा हिस्सा हैं। दूसरे, वाम मोर्चे का अंग होने के कारण वामपंथी दल यह खयाल रखते हैं कि मुस्लिम लीग कुछ सीटों पर विजय हासिल करे। एक तीसरा कारण यह भी है कि इस प्रगतिशील राज्य में मुस्लिम तबके के प्रति कोई असामान्य दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता। जैसे ईसाई समाज का सामान्य और स्वीकृत अंग हैं, वैसे ही मुसलमान भी। किसी भी अच्छे समाज में ऐसा ही होना चाहिए।

उत्तर भारत में ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि इसी क्षेत्र में मुसलमानों की सबसे ज्यादा सांसत है। वे न केवल अपेक्षया गरीब और कम पढ़े-लिखे हैं, बल्कि सामाजिक स्तर पर उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनका कोई राजनीतिक संगठन नहीं है। भाजपा को छोड़ कर सभी दल उन्हें अपनी ओर खींचने तथा उनका प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। लेकिन इससे उनकी किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। हाँ, यह जरूर होता है कुछ मुसलमान नेता मंत्री बन जाते हैं। जाहिर है, वे मंत्री पद अपने लिए ग्रहण करते हैं, न कि आम मुसलमानों के हित में।

राजनीतिक संगठन से कितना फर्क पड़ता है, यह बहुमत समाज पार्टी बनने के बाद दलितों में आए स्वाभिमान के उदाहरण से देखा जा सकता था। पहले उत्तर प्रदेश में दलितों की हालत बहुत खराब थी। अकसर उनके साथ सरकारी और गैरसरकारी हिंसा की जाती थी। समाज ही नहीं, प्रशासन भी उनका दमन और शोषण करता था। पर अब ऐसी स्थिति नहीं है। जाहिर है, अपना राजनीतिक संगठन हो, तो मुसलमानों की हालत में भी सुधार हो सकता है।

ऐसा क्यों नहीं हो पाता? इसका प्रमुख कारण यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में कोई चुनाव क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ से कोई उम्मीदवार सिर्फ मुसलमान मतदाताओं के भरोसे जीत सके। कुछ चुनाव क्षेत्रों में मुसलमान मतदाताओं का असर जरूर है, पर यह असर किसी मुसलमान उम्मीदवार को तभी जीता सकता है जब उसे अन्य समुदायों का भी समर्थन मिले। यह कोई कठिन बात नहीं है, बशर्ते मुसलमानों का जो राजनीतिक संगठन बने, वह अन्य समुदायों को अपना दुश्मन मान कर न चले। जब अन्य अनेक राजनीतिक संगठन मुसलमान को अपना दुश्मन या विरोधी मान कर नहीं चलते, तो मुस्लिम संगठन ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

कायदे से तो जाति और धर्म के आधार पर कोई राजनीतिक संगठन नहीं बनना चाहिए। राजनीति का आदर्श रूप सर्व जनता की सेवा है। कोई भी सच्चा राजनीतिक संगठन यह दावा नहीं कर सकता कि वह किसी खास समुदाय के लोगों की सेवा करेगा, किसी अन्य समुदाय का नहीं। संत की तरह राजनेता का दरवाजा भी सभी समाजों और समूहों के लिए खुला रहना चाहिए। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता। जाति और धर्म राजनीतिक संरचना में बुरी तरह हावी हो गए हैं। इसी को वोट बैंक की राजनीति कहा जाता है। प्रत्येक दल को किसी खास समुदाय या समुदायों का समुच्चय माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी राजनीतिक दल पूरे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता, न करना चाहता है। इस स्थिति की मांग है कि मुस्लिम समाज के हितों की रक्षा के लिए एक या दो ऐसे राजनीतिक संगठन होने चाहिए जो मुसलमानों का सच्चा प्रतिनिधित्व कर सकें। जब पंजाब में अकाली दल हो सकता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का अपना दल क्यों नहीं हो सकता? यह प्रवृत्ति तभी समाप्त होगी जब राजनीति में जाति और धर्म का स्वर कम होता जाए और सभी राजनीतिक दल समाज के सामान्य हितों का संवर्धन करने के लिए प्रतिबद्ध हों। लेकिन हमारे भाग्य ऐसे कहां? अभी तो राजनीतिक और सामाजिक विखंडन का समय है।

चूंकि मुसलमानों का कोई दल अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकता, क्या इसलिए उनका राजनीतिक संगठन नहीं बनाया जा सकता? यह एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। ऐसा संगठन अन्य दलों से तालमेल कर अपने लिए कुछ सीटों की व्यवस्था कर सकता है। इस तरह विधान सभा और लोक सभा में मु्स्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। लेकिन किसी भी मुस्लिम दल की सामाजिक भूमिका ज्यादा विस्तृत होगी। वैसे जरूरत तो यह भी है कि अन्य दल भी समाज सुधार की भूमिका निभाएं, पर मुस्लिम संगठनों के लिए यह और भी आवश्यक है। दुर्भाग्य से मुस्लिम समाज का मार्गदर्शन करने के लिए सिर्फ उनके धार्मिक संगठन ही हैं और उनमें से किसी की भी भूमिका आधुनिक या प्रगतिशील नहीं है।

मुस्लिम समाज का हित इसी में है कि वह अपने अहितकर रीति-रिवाजों से बाहर निकले। यह काम उनके राजनीतिक संगठन बखूबी कर सकते हैं। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी यह काम किया करती थी। मुस्लिम लीग ने इस तरह के कामों की ओर ध्यान नहीं दिया। मिस्टर जिन्ना खुद आधुनिक थे, पर उन्होंने अपने अनुयायियों को आधुनिक बनाने की कोशिश नहीं की। उसका नतीजा आज का पाकिस्तान है। वहां कट्टरवाद ने लोगों का जीना हराम कर रखा है। आतंकवाद का जन्म भी उसी के पेट से हुआ है। हिन्दुस्तान का मुसलमान अपेक्षया ज्यादा लोकतांत्रिक है। पर उसका पारिवारिक और सामाजिक जीवन कई दृष्टियों से बाधित बना हुआ है। मुंबई के बम कांड के बाद मुस्लिम बुद्धिजीवियों में चेतना और उत्साह की लहर आई थी। पर वह जल्दी ही ठंडी पड़ गई। इसी के साथ भारत का मुसलमान बेआवाज भी हुआ है। यह जड़ता जल्द से जल्द टूटनी चाहिए। इसमें मुस्लिम समाज के साथ-साथ भारतीय समाज का भी हित है।

---राजकिशोर

Thursday, April 02, 2009

आधी रात, ट्रेन में टीटी, राजकिशोर का धैर्य....

दरभंगा से चल कर मुजफ्फरपुर, बनारस, इलाहाबाद और अलीगढ़ होते हुए नई दिल्ली जानेवाली स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस के स्लीपर क्लास में एस 3 डिब्बे (कोच नंबर 90309) का बर्थ नंबर 12 (टिकट नंबर 97361975) मेरे लिए आरक्षित था। इस रेलगाड़ी में मैं मुजफ्फरपुर से चढ़ा था। मुजफ्फरपुर में विख्यात समाजवादी चिंतक तथा श्रमिक नेता सच्चिदानंद सिन्हा के अस्सी वर्ष का हो जाने पर एक दिन का घरेलू आयोजन था। आयोजन में सिर्फ सच्चिदानंद सिन्हा की जीवन यात्रा, रचनावली और वैचारिक दृष्टि की ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि आधुनिक सभ्यता के संकट के विभिन्न पहलुओं पर सुनने लायक व्याख्यान भी हुए। बाहर से आनेवाले लोगों के स्वागत तथा आवभगत का बहुत उत्तम प्रबंध मनोरमा सिन्हा और प्रभाकर सिन्हा ने किया था। हम सभी अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में अपने-अपने घर लौट रहे थे। मानो किसी तपोवन से लौट रहे हों। इस समय देश में सैकड़ों विद्वान और चिंतक हैं। लेकिन उनमें से कौन ऐसे तपोवन में रहता है, जिसका मासिक खर्च मुश्किल से हजार रुपए होगा?
वापसी की इस कृतज्ञ और प्रसन्न यात्रा के स्वाद को खट्टा कर दिया एक ऐसे टीटी ने, जिसे कायदे से जेल में होना चाहिए था। उससे मेरी मुठभेड़ हुई 29-30 मार्च की रात बारह बज कर पंद्रह मिनट पर। गाजीपुर और बनारस के बीच। इस युवा टीटी के दर्शन होने के पहले मेरी यात्रा बहुत अच्छे ढंग से चल रही थी। कई यात्रियों का सहयोग भाव देख कर मैं चकित हो गया। उनके मधुर व्यवहार से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि अभी भी भारत के सबसे भले लोग गांवों में रहते हैं। कुछ सहयोग मैंने भी किया था। मेरा बर्थ सबसे नीचे था। वह मैंने एक सज्जन को दे दिया, जो शायद किडनी के मरीज थे। उनके नाम आठ नंबर का बर्थ था। उस पर जा कर मैं लेट गया। एक टीटी लगभग आठ बजे उस डिब्बे के टिकटों की जांच करके जा चुका था।

आधी रात को इस दूसरे टीटी ने हमारे डिब्बे में प्रवेश किया। सबसे पहले उसने एक व्यक्ति से 300 रुपए गैरकानूनी ढंग से वसूल किए। कुछ और लोगों का शोषण किया। फिर वह सात नंबर बर्थ किसके नाम पर है, यह खोजने लगा। वह बर्थ मेरे बर्थ के नीचे था। उस पर एक युवा दंपति लेटा हुआ था। उसका टिकट देख कर टीटी ने उनके अपने बर्थ पर भेज दिया। इससे सात नंबर बर्थ खाली हो गया। इस बर्थ को उसने एक व्यक्ति को बेच दिया। कितने में, यह मैं बता नहीं सकता, क्योंकि उन दोनों की बातचीत मैं सुन नहीं पाया था।

अब वह मेरे पास आया। उसने मेरा टिकट देखने की मांग की। अगर वह पूरे डिब्बे के यात्रियों के टिकट चेक कर रहा होता, तो अपना टिकट दिखाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। पर मैं लक्ष्य कर चुका था कि वह उन्हीं बर्थों के पास जा कर टिकट देख रहा था, जहां से उसे कुछ नकद मिलने की उम्मीद की। इस कारण से उस पर मेरे मन में कुछ गुस्सा भी था। उसके साथ मेरा जो संवाद हुआ, उसका एक हिस्सा इस प्रकार है :
वह -- टिकट दिखाइए।
मैं - अपना टिकट दिखाने के पहले मैं आपका आई कार्ड देखना चाहूंगा।
वह - मेरा कोट नहीं दिखाई नहीं दे रहा है?
मैं - ऐसे कोट बाजार में बहुत मिल जाएंगे।
वह - यह चार्ट भी आप नहीं देख पा रहे हैं?
मैं -- यह तो कंप्यूटर का खेल है। आप मेरे घर चलें, मैं ऐसे कई चार्ट बना कर उनका प्रिंट आपको दे दूंगा।
वह -- बकवास छोड़िए। आप अपना टिकट दिखाइए।
मैं -- मैं अपना टिकट तभी दिखाऊंगा जब आप अपना आई कार्ड दिखा देंगे। मुझे यह यकीन कैसे हो कि आप ही टीटी हैं? वह -- सरकार हमें आई कार्ड नहीं देती।
मैं -- ऐसा नहीं हो सकता। सरकार अपने हर सार्वजनिक अधिकारी को आई कार्ड जारी करती है।
वह - टिकट देखना मेरा काम है। आप सरकारी काम में बाधा डाल रहे हैं।
मैं -- जी नहीं, आपका काम बर्थ बेचना, रिश्वत लेना और यात्रियों का शोषण करना है। यह मैं अपनी आंखों से देख चुका हूं।
वह -- तो ठीक है, जो उखा..ते बने, उखा..ड़ लेना। पहले हिन्दुस्तान को सुधार लो, फिर मुझसे बात करना।
मैं -- सर, आप भी इसी हिन्दुस्तान के पार्ट हैं। मान लीजिए, मैं आप ही से शुरुआत करना चाहता हूं।


बातचीत जारी रही।

वह -- बाबूजी, आप टिकट दिखाइए।
मैं -- सर, मैं आपको टिकट नहीं दिखाऊंगा।
वह - आप बुजुर्ग हैं, इसलिए मैं सीधे से कह रहा हूं कि आप अपना टिकट दिखाइए।
मैं -- मैं बच्चा होता, तब भी यही करता।
वह -- आप टिकट दिखाइए।
मैं -- मैं आपको नहीं दिखाऊंगा। आपने अभी-अभी सात नंबर बर्थ बेचा है।
वह - यह मेरा बर्थ है। इसे मैं बेच सकता हूं।
मैं -- जी नहीं, आप नहीं बेच सकते। आप इसे अलॉट कर सकते हैं। लेकिन रसीद काटने के बाद। आपने अलॉट नहीं किया है, बेचा है।
वह -- तो आपकी क्यों ..ट रही है? आप अपना टिकट दिखाइए।
मैं -- यह टिकट देखने का समय नहीं है। सवा बारह बज रहे हैं। आप मेरी नींद में खलल डाल रहे हैं।
वह -- आप दिल्ली तक नहीं पहुंच पाएंगे।
मैं -- मुझे इसकी परवाह नहीं है। आपका आई कार्ड देखे बिना मैं आपको टिकट नहीं दिखा सकता।
वह -- मुझे दूसरे तरीके भी आते हैं। आप टिकट दिखा दीजिए।
मैं -- आप मुझे खिड़की से फेंक देंगे. तब भी मैं आपको टिकट नहीं दिखाऊंगा। मुझे आप पर विश्वास नहीं है। क्या पता आप मेरा टिकट फाड़ कर फेंक दें और बाद में मुझे बेटिकट साबित कर मुझे अगले स्टेशन पर उतार दें। फिर मेरा बर्थ किसी और को बेच दें।


अब उसे यकीन हो गया कि वह मुझे सिर्फ धमकी दे कर बाध्य नहीं कर सकता। उसने एक फोन निकाला और किसी से अनुरोध किया -- एक आदमी सरकारी काम में दखल दे रहा है। दो पुलिसवाले तुरंत भेजिए। मैंने कहा -- हां, मैं पुलिस को टिकट दिखा सकता हूं। कुछेक मिनट बाद दो पुलिसवाले प्रगट हुए। टीटी ने उन्हें मेरा केस बताया। मैंने कहा -- ये सज्जन अपना आई कार्ड नहीं दिखा रहे हैं। जब तक इनका परिचय इस्टैब्लिश नहीं हो जाता, मैं इन्हें किस आधार पर टिकट दिखाऊं? एक पुलिसवाले ने मुलायम आवाज में कहा -- आप कैसी बात कर रहे हैं? टीटी ही हैं। मैं -- तो आप पहले इनकी तलाशी लीजिए। इन्होंने मेरे सामने कई आदमियों से रिश्वत ली है। पुलिसवाला -- क्यों बात बढ़ा रहे हैं? आप टिकट दिखा दीजिए, सारा मामला खतम हो जाएगा। मैंने उसकी ओर टिकट बढ़ा दिया। उसने टिकट हाथ में ले कर जोर से पढ़ा -- एस तीन, बर्थ नंबर बारह। चलिए, आप अपने बर्थ पर चलिए। मैंने अपना सामान उतारा और अपने बर्थ की ओर जाने लगा। पुलिसवाला मेरे पीछे-पीछे। बारह नंबर पर वही मरीज था। उसने बताया -- मैं पेशेट हूं। पुलिसवाले ने उस पर दया की। मुझे अपना पहलेवाला बर्थ मिल गया। टीटी और पुलिसवाले चले गए। उनके जाते ही, एक मुसाफिर ने सात नंबर सीट पर लगी हुई एक पट्टी दिखाई, जिस पर लिखा हुआ था -- विकलांग के लिए सुरक्षित।

कुछ देर बाद बनारस स्टेशन आ गया। मैंने सोचा, ट्रेन में जगह-जगह अंकित सुझावों के अनुसार गार्ड के पास जा कर शिकायत लिखवाऊं। पर उसका डिब्बा बहुत दूर था। वहां तक जाना संभव नहीं था। स्टेशन मास्टर के पास जाता, तब तक रेल छूट जाती। इलाहाबाद आया, तब भी कोई ऐसा रास्ता नहीं दिखाई दिया, जिससे मैं अपनी शिकायत दर्ज करवा सकूं। उधर टीटी से विवाद के दौरान दस-पंद्रह आदमी जमा हो गए थे, पर कोई कुछ नहीं बोला। अगले दिन सबेरे, वही व्यक्ति जिसने विकलांग वाला बर्थ दिखाया था, मुझे शाबाशी देने लगा। उसका नाम-पता और टिकट नंबर ( 42517369) मैंने नोट कर लिया। मैंने सोचा, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच कर अपनी शिकायत दर्ज करवा दूंगा। स्टेशन आने पर मैं अजमेरी गेट साइड की ओर चला। सीढ़ी पर रेलवे का इश्तहार देखा, जिसमें 'शिकायत' के सामने दोनों ओर तीर का निशान था। नीचे आने पर लगभग पंद्रह मिनट तक वह जगह खोजता रहा, जहां शिकायत दर्ज कराई जा सके। सफलता नहीं मिली।

घर की ओर जाते हुए मैं यही सोच रहा था कि रेल मंत्रालय को सफलतापूर्वक चलाने के लिए लालू प्रसाद को बहुत बधाई मिली है, पर लगता है कि वे रेल के आंतरिक भ्रष्टाचार को दूर नहीं कर पाए हैं। नहीं तो वह सब कैसे हो पाता जो मेरे डिब्बे में हुआ? वह और उस जैसे सैकड़ों टीटी आज जेल में होते।

फिर याद आया -- हमारे डिब्बे के दोनों शौचालयों में न पानी था, न बिजली थी। मन में यह सवाल उठा -- अगर मैं उस टीटी को पानी और बिजली की कमी दूर कराने के लिए अनुरोध करता, तो उसकी क्या प्रतिक्रिया क्या होती? डिब्बे के शौचालयों में पानी और रोशनी हो तथा टीटी बेईमान और बदतमीज न हों, यह सुनिश्चित करने के लिए मैं या मेरे सहयात्री क्या कर सकते थे? शायद रेल मंत्री अपने चुनाव भाषणों में इस पर प्रकाश डालें।

राजकिशोर

Monday, March 30, 2009

....सबको ये फिक्र है कि सरदार कौन हो ??

कहा जाता है कि वह राजनेता उतना ही बड़ा होता है जो जितना बड़ा ख्वाब देखता है। जवाहरलाल नेहरू से ले कर राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण तक की पीढ़ी ख्वाब देखते-देखते गुजर गई। पता नहीं इनमें कौन कितना बड़ा राजनेता था। जब कोई नेता अपने जीवन काल में अपना ख्वाब पूरा नहीं कर पाता, तो उसका कर्तव्य होता है कि वह उस ख्वाब को अगली पीढ़ी में ट्रांसफर कर दे। इनमें सबसे ज्यादा सफल नेहरू ही हुए। लोहिया और जयप्रकाश के उत्तराधिकारी लुंपेन बन गए। कुछ का कहना है कि वे शुरू से ही ऐसे थे, पर अपने को साबित करने का पूरा मौका उन्हें बाद में मिला। पर नेहरू का ख्वाब आज भी देश पर राज कर रहा है। नेहरू ने आधुनिक भारत का निर्माण किया था। हम आधुनिकतम भारत का निर्माण कर रहे हैं। सुनते हैं, इस बार के चुनाव का प्रमुख मुद्दा है, विकास। नेहरू का मुद्दा भी यही था। इसी मुद्दे पर चलते-चलते कांग्रेस के घुटने टूट गए। अब फिर वह दौड़ लगाने को तैयार है।

इस देश के सबसे बड़े और संगठित ख्वाब देखनेवाले कम्युनिस्ट थे। उनका ख्वाब एक अंतरराष्ट्रीय ख्वाब से जुड़ा हुआ था। इसलिए वह वास्तव में जितना बड़ा था, देखने में उससे काफी बड़ा लगता था। यह ख्वाब कई देशों में यथार्थ बन चुका था, इसलिए इसकी काफी इज्जत थी। लेकिन जब तेलंगाना में असली आजादी के लिए संघर्ष शुरू हुआ, तो नेहरू के ख्वाब ने उसे कुचल दिया। तब का दर्द आज तक कम्युनिस्ट ख्वाब को दबोचे हुए है। किताब में कुछ लिख रखा है, पर मुंह से निकलता कुछ और है। कम्युनिस्टों के दो बड़े नेता -- एक प. बंगाल में और दूसरा केरल में -- एक नया ख्वाब देख रहे हैं। समानता के ख्वाब को परे हटा कर वे संपन्नता का ख्वाब देखने में लगे हुए हैं। ईश्वर उनकी सहायता करे, क्योंकि जनता का सहयोग उन्हें नहीं मिल पा रहा है।

बाबा साहब अंबेडकर ने भी एक ख्वाब देखा था। यह ख्वाब अभी भी फैशन में है। पर सिर्फ बुद्धिजीवियों में। राजनीति में इस ख्वाब ने एक ऐसी जिद्दी महिला को जन्म दिया है जिसका अपना ख्वाब कुछ और है। वे अंबेडकर की मूर्तियां लगवाती हैं, गांवों के साथ उनका नाम जोड़ देती हैं, उनके नाम पर तरह-तरह के आयोजन करती रहती हैं। पर उन्होंने कसम खाई हुई है कि आंबेडकर वास्तव में क्या चाहते थे, यह पता लगाने की कोशिश कभी नहीं करेंगे। इसके लिए अंबेडकर साहित्य पढ़ना होगा और आजकल किस नेता के पास साहित्य पढ़ने का समय है? फिर इस जिद्दी महिला का ख्वाब क्या है? इस बारे में क्या लिखना! बच्चों से ले कर बड़ों तक सभी जानते हैं। सबसे ज्यादा वे जानते हैं जो तीसरा मोर्चा नाम का चिड़ियाघर बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

हिन्दू राष्ट्र के दावेदारों ने भी एक ख्वाब देखा था। उनका ख्वाब काफी पुराना है। जब बाकी लोग आजादी के लिए लड़ रहे थे, तब वे एक छोटा-सा घर बना कर अपने ख्वाब के भ्रूण का पालन-पोषण कर रहे थे। उनकी रुचि स्वतंत्र भारत में नहीं, हिन्दू भारत में थी। वैसे ही जैसे लीगियों की दिलचस्पी आजाद हिन्दुस्तान में नहीं, मुस्लिम पाकिस्तान में थी। लीगियों को कटा-फटा ही सही, अपना पाकिस्तान मिल गया, पर संघियों को इतिहास ने ठेंगा दिखा दिया। तब से वे स्वतंत्र भारत के संविधान को ठेंगा दिखाने में लगे हुए हैं। लीगियों ने आजादी के पहले खून बहाया था, संघियों ने आजादी के बाद खून बहाया। शुरू में उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। वे सिर्फ अपना विचार फैला सके। बाद में जब भारतवाद कमजोर पड़ने लगा, तब हिन्दूवाद के खूनी पंजे भगवा दस्तानों से निकल आए। कोई-कोई अब भी दस्तानों का इस्तेमाल करते हैं,पर उनके भीतर छिपे हाथों का रंग दूर से ही दिखाई देता है।

अब कोई बड़ा ख्वाब देखने का समय नहीं रहा। कुछ विद्वानों का कहना है कि महास्वप्नों का युग विदा हुआ, यह लघु आख्यानों का समय है। भारत में इस समय लघु आख्यान का एक ही मतलब है, प्रधानमंत्री का पद। मंत्री तो गधे भी बन जाते हैं, घोड़े प्रधानमंत्री पद के लिए दौड़ लगाते हैं। अभी तक हम इस पद के लिए दो ही गंभीर उम्मीदवारों को जानते थे। अब महाराष्ट्र से, बिहार से, उड़ीसा से, उत्तर प्रदेश से -- जिधर देखो, उधर से उम्मीदवार उचक-उचक कर सामने आने लगे हैं। यह देख कर मुझे लालकृष्ण आडवाणी से बहुत सहानुभूति होने लगी है। बेचारे कब से नई धोती और नया कुरता ड्राइंग रूम में सजा कर बैठे हुए हैं। इस बार तो उनके इस्तेमाल का मौका नजदीक आते दिखाई नहीं देता। बल्कि रोज एकाध किलोमीटर दूर चला जाता है। चूंकि मैं सभी का और इस नाते उनका भी शुभचिंतक हूं, इसलिए आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने का आसान नुस्खा बता देना चाहता हूं। इसके लिए सिर्फ दो शब्द काफी हैं -- पीछे मुड़ (अबाउट टर्न)। सर, संप्रदायवाद, हिन्दू राष्ट्र वगैरह खोटे सिक्कों को सबसे नजदीक के नाले में फेंक दीजिए। आम जनता की भलाई की राजनीति कीजिए। अगली बार आपको प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक नहीं सकेगा।

राजकिशोर
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं...)

Tuesday, March 24, 2009

इंटरनेट की पटरी पर आडवाणी की पीएम यात्रा...

देश को लालकृष्ण आडवाणी से कोई आशाएं हो या नहीं, लालकृष्ण आडवाणी को देश से बहुत आशाएं हैं। वे चाहते हैं कि इस बार उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाया जाए। यह विचित्र बात है। भारतीय राजनीति में एक नई घटना है। इसके पहले कभी मतदाताओं से यह कभी नहीं कहा जाता था कि वे अगले प्रधानमंत्री का चुनाव करें। अपनी-अपनी पार्टी को जितवाने की अपील की जाती थी। सिर्फ कांग्रेस का मामला अलग था। वह हाथ को वोट देने का आह्वान करती थी, पर जनता को मालूम रहता था कि कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है। सिर्फ एक अवसर पर ऐसा नहीं हुआ, जब राजीव गांधी की अकाल मृत्यु के बाद लोक सभा का चुनाव हुआ। उसके बाद प्रधानमंत्री पद के लिए अपने चयन में कांग्रेस ने जो महागलती की, उसकी सजा वह आज तक भुगत रही है। नरसिंह राव को छोड़ कर कांग्रेस का कोई ऐसा प्रधानमंत्री नहीं हो सकता था, जो बाबरी मस्जिद को तुड़वाने के लिए इस कदर तैयार रहता। दूसरी बार संसद में बहुमत का प्रबंध हो जाने के बाद सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनना था, पर मनमोहन सिंह के भाग्य खुल गए। राहुल गांधी जब वयस्क हो जाएंगे, तब कांग्रेस को चुनाव के समय यह बताना नहीं होगा कि प्रधानमंत्री पद के लिए उसका उम्मीदवार कौन है। राजग का गठबंधन शायद पहला प्रयोग था, जिसने अपने भावी प्रधानमंत्री की घोषणा पहले से कर रखी थी।

इस बार शरद पवार, लालू प्रसाद आदि ने भी अपनी आकांक्षाओं को प्रगट कर रखा है, प्रणव मुखर्जी का मौन काफी मुखर है, मायावती तो बहुत दिनों से दिल्ली पर कब्जा करने का स्वप्न देख रही हैं, पर लालकृष्ण आडवाणी की तरह कोई भी मकान की छत से चिल्ला-चिल्ला कर नहीं कह रहा है कि मुझे प्रधानमंत्री बनाओ। कुछ समय से इंटरनेट का कोई भी स्थल (साइट) खोलिए, आडवाणी के फोटो के साथ एक बड़ा-सा विज्ञापन मिलेगा, जिसका नारा है -- आडवाणी फॉर पीएम। पचासों स्थलों पर तो मैं ही यह नारा देख चुका हूं। मेरा अनुमान है कि सैकड़ों या शायद हजारों साइटों पर 'आडवाणी फॉर पीएम' का नारा जगमगा रहा है। इस नारे के साथ-साथ दर्शक-पाठक को लालकृष्ण आडवाणी के निजी ब्लॉग पर जाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। वहां भी आडवाणी को पीएम बनाने का जबरदस्त आह्वान है।

यह क्या है? क्यों है? क्या हमने संसदीय प्रणाली का त्याग कर दिया है और अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली अपना ली है? नहीं, सच यह है कि हमारे यहां ही नहीं, दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी संसदीय प्रणाली राष्ट्रपति प्रणाली में बदल गई है या बदलती जा रही है। इस सिलसिले में ग्रेट ब्रिाटेन की राजनीति की चर्चा उपयुक्त होगी। वहां अभी भी मुख्य प्रतिद्वंद्विता दलों के बीच ही होती है, पर दलों को उनकी नीतियों से कम, उनके नेता के व्यक्तित्व से ज्यादा आंका जाता है। नेता ही दलों के चुनाव अभियान का नेतृत्व करता है और जीत जाने के बाद वही प्रधानमंत्री बनता है। उसके बाद शासन चलाने में दल की भूमिका क्षीण और प्रधानमंत्री की भूमिका प्रमुख हो जाती है।

भारत में संसदीय प्रणाली को राष्ट्रपति प्रणाली में बदल देने की मुख्य जिम्मेदारी इंदिरा गांधी की है। उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले कांग्रेस में काफी हद तक आंतरिक लोकतंत्र हुआ करता था। इंदिरा गांधी ने अपने इर्द-गिर्द सत्ता का केंद्रीकरण किया। धीरे-धीरे यह अन्य दलों का भी आदर्श होता चला गया। पश्चिम बंगाल में नौवें दशक से वाम मोर्चा का शासन है, लेकिन लगभग पच्चीस वर्षों तक ज्योति बसु वहां के एकछत्र शासक बने रहे। अब यही भूमिका बुद्धदेव भट्टाचार्य निभा रहे हैं। अन्य दलों का तो कहना ही क्या। वे सभी अपने-अपने नेता के इर्द-गिर्द उसी तरह चक्कर लगाते रहते हैं जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती रहती है।

क्या यही कारण है कि चुनाव का बिगुल बजने के काफी पहले से ही लालकृष्ण आडवाणी ने अपने प्रधानमंत्री बनने का डंका पीटना शुरू कर दिया था? हो सकता है, बाद में वे अन्य प्रचार माध्यमों का भी सहारा लें। लेकिन इंटरनेट पर उनकी अतिशय निर्भरता से यह संदेह होता है कि वे इंटरनेट से छलांग लगा कर सीधे पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) में उतरने की उम्मीद कर रहे हैं। शायद हाल के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव ने उन्हें इस दिशा में प्रेरित किया है। लेकिन आडवाणी भूलते हैं कि भारत में इंटरनेट का प्रयोग भले ही तीव्र गति से बढ़ रहा हो, पर अभी भी हम इंटरनेट का देश नहीं बन पाए हैं। दूसरे, इतने सारे नेट स्थलों पर आडवाणी फॉर पीएम देख कर वितृष्णा ही पैदा होती है। भारत में अभी भी सत्ता लोलुपता को अच्छा नहीं माना जाता। सोनिया गांधी को दो-दो बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला और दोनों ही बार उन्होंने प्रधानमंत्री बनने का लालच छोड़ दिया। इस त्याग वृत्ति से उनकी महिमा बढ़ी। हालांकि वास्तविक सत्ता अभी भी कांग्रेस अध्यक्ष के ही पास है, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काफी सम्मान दिया है और उनके प्रधानमंत्री पद के विशेषाधिकारों को कुचलने का प्रयास नहीं किया है। इससे मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी, दोनों के प्रति आदर बढ़ा है।

दूसरी बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में टेलीविजन की बहुत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका होती है। राष्ट्रपति पद के प्रतिद्वंद्वी टेलीविजन पर अपना-अपना प्रचार करते हैं और एक-दूसरे से बहस तथा तर्क-वितर्क भी करते हैं। इससे मतदाताओं को यह तौलने में आसानी होती है कि उनके लिए कौन-सा उम्मीदवार बेहतर है। भारत में ऐसा नहीं होता। यहां पार्टी और नेता का पिछले पांच साल का काम बोलता है। चुनाव सभावों में पैदा किया जानेवाला जज्बा भी कम प्रभावशाली नहीं होता। दल के संगठन की भी निर्णायक भूमिका होती है। इस आधार पर कह सकते हैं कि हमारे यहां चुनावी सफलता का फैसला सड़कों, चौपालों पर और खेत-खलिहानों में होता है, न कि टेलीविजन और इंटरनेट जैसे आधुनिक माध्यमों से।

यह सब जानते-समझते हुए भी लालकृष्ण आडवाणी अगर इंटरनेट पर इतना ज्यादा भरोसा कर रहे हैं, तो साफ है कि वे किस वोटर वर्ग को अपना निशाना बना रहे हैं। यह भारत का अवसरवादी मध्य वर्ग है जिसे राजग ने इंडिया शाइनिंग का प्रतीक मान रखा था। ऐसा लगता है कि भाजपा नेता अपनी इस ग्रंथि से अब तक उबरे नहीं हैं। यह चुनावी जीत का सशक्त आधार बन सकता है, इसमें गहरा संदेह है। हमारे देश में तो वही पार्टी जनता के मन पर राज कर सकती है जो गरीब तथा असहाय लोगों की वाणी बन सके। अगर लालकृष्ण सचमुच प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो उन्हें अपने दल की नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए और उसे जनवादी बना कर उन लाखों गांवों में ले जाना चाहिए जहां अभी भी भारत की आत्मा बसती है। अभी तक तो आडवाणी और उनकी पार्टी ने अपनी आस्तीन से बाबरी मस्जिद और गुजरात दंगों का खून भी नहीं धोया है।

राजकिशोर
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं...)

Tuesday, March 17, 2009

पुरुषों के विरुद्ध एक अविश्वास प्रस्ताव...

उस दिन मैं अचानक क्या कह गया, यह मेरी भी समझ में नहीं आया। अवसर था स्त्री-विमर्श पर केंद्रित ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ की पहली वर्षगांठ पर दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक विचार बैठक का। मधु किश्वर और सुकृता पॉल बोल चुकी थीं। दोनों के ही भाषण बहुत अच्छे थे। दोनों ने ही स्त्री अस्मिता के मुद्दों पर गहराई से विचार किया था। उनके बाद अपनी बात कहते हुए मैंने पहले तो इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि यहां मैं अकेला पुरुष वक्ता हूं। इस पर ‘चोखेर बाली’ की संचालिकाओं में एक सुजाता ने स्पष्ट किया कि हमारे ब्लॉग पर पुरुष भी लिखते हैं। मुझे यह बात मालूम थी, क्योंकि मैं भी उनमें एक हूं। फिर, मैंने कहा कि स्त्री विमर्श सिर्फ पुरुषों का मामला हो भी नहीं सकता, क्योंकि अगर यह सभ्यता विमर्श और सभ्यता समीक्षा है, तो पुरुषों की सहभागिता के बिना यह काम कैसे पूरा हो सकता है? आगे मैंने कहा कि यह भी उल्लेखनीय है कि नारी अधिकारों को प्रतिष्ठित करने में पुरुष लेखको, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मूल्यवान भूमिका रही है। यह भी कि ऐसे असंख्य पुरुष हुए हैं जिनमें स्त्री के गुण थे और ऐसी स्त्रियां भी कम नहीं हुई हैं जिनका व्यक्तित्व पुरुष गुणों के कारण विकृत हुआ है। इसी संदर्भ में मैंने कहा कि स्त्री विमर्श में पुरुषों को खुल कर सहभागी बनाइए और बनने दीजिए, लेकिन स्त्री-पुरुष संबंधों के इतिहास को देखते हुए पुरुषों पर विश्वास कभी मत कीजिए। वे कभी भी धोखा दे सकते हैं और अगर यह धोखा उन्होंने मित्र बन कर दिया, तो यह और भी बुरा होगा।

बात कुछ हंसी की थी और हंसी हुई भी, पर विचार करने पर लगा कि बात में दम है। एक बहुत पुरानी मान्यता है कि स्त्री-पुरुष का साथ आग और फूस का साथ है। दोनों निकट आएंगे, तो फूस का भभक उठना तय है। आजकल के लोग इस तरह की मान्यताओं की खिल्ली उड़ाते हैं। उनका कहना है कि यह बेहूदा बात इसलिए फैलाई गई है ताकि स्त्रियों को बंधन में रखा जा सके। मैं इस स्थापना से पूरी तरह सहमत नहीं हूं। पुरुष से अधिक कौन जानता होगा कि स्त्री को देख कर पुरुषों के मन में सामान्यत: किस प्रकार की भावनाएं पैदा होती हैं। इसलिए अगर उन्होंने आग और फूस को दूर-दूर रखने का फैसला किया, तो यह बिलकुल निराधार नहीं था। इसके साथ-साथ होना यह चाहिए था कि ऐसी समावेशी संस्कृति का विकास किया जाता जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच की सामाजिक और सांस्कृतिक दूरी घटे और दोनों मित्र भाव से जी सकें। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका। पुरानी, रूढ़िवादी संस्कृति चलती रही, बल्कि कहीं-कहीं उग्र भी हो गई, और उसके प्रति विद्रोहस्वरूप आधुनिक संस्कृति का भी विकास होता रहा, जिसमें स्त्री-पुरुष के साथ को खतरनाक नहीं, बल्कि अच्छा माना जाता है। पुरानी संस्कृति में स्त्री के शील की रक्षा उस पर पहरे बिछा कर, उसे उपमानव बना कर की जाती थी, जैसा आज के तालिबान चाहते हैं, तो दुख की बात यह भी है कि आधुनिक संस्कृति में स्त्री का उपयोग उपभोक्तावाद को बढ़ाने और कामुकता का प्रचार करने में हो रहा है तथा बलात्कार या इसकी आशंका से उसे परिमित और खामोश करने की कोशिश की जा रही है। जरूरत बीच का रास्ता निकालने की है, जहां प्रेम भी हो, निकटता भी हो और मानव अधिकारों का सम्मान भी।

‘चोखेर बाली’ की विचार-बैठक के हफ्ते भर बाद सुजाता ने उनके अपने ब्लॉग ‘नोटपैड’ पर किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा भेजी गई यह टिप्पणी मुझे अग्रेषित की : ‘सविता भाभी के बहाने स्त्री विमर्श का डंका पीटनेवाले ब्लॉगर पत्रकार आकाश (मूल नाम बदल दिया गया है) जी के सारे स्त्री विमर्श की कलई उस समय खुल गई, जब उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की एक छात्रा के साथ, जहां अभी कुछ दिनों पहले वे क्लास लेने जाते थे, के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। लड़की की तबीयत ठीक नहीं थी। उन्होंने उसे किसी काम के बहाने ऑफिस में बुलाया और फिर उसके लाख मना करने के बावजूद उसे अपनी नई कार से उसे घर छोड़ने गए। फिर वहां उसे चुपचाप छोड़ कर आने के बजाय लगभग जबरदस्ती करते हुए उसका घर देखने के बहाने उसके साथ कमरे में गए। लड़की मना करती रही, लेकिन संकोचवश सिर्फ ‘रहने दीजिए सर, मैं चली जाऊँगी’ जितना ही कहा। वे उसकी बात को लगभग अनसुना करते हुए खुद ही आगे आगे गए और उसका घर देखने की जिद की। लड़की को लगा कि पांच मिनट बैठेंगे और चले जाएंगे। लेकिन उनका इरादा तो कुछ और था। उन्होंने घर में घुसने के बाद जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ा, उसके लाख छुड़ाने की कोशिश करने के बावजूद उसे जबरदस्ती चूमने की कोशिश की। लड़की डरी हुई थी और खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन इनके सिर पर तो जैसे भूत-सा सवार था। आकाश ने उस लड़की को नारी की स्वतंत्रता का सिद्धांत समझाने की कोशिश की, ‘तुम डर क्यों रही हो। कुछ नहीं होगा। टिपिकल लड़कियों जैसी हरकत मत करो। तुम्हें भी मजा आएगा। मेरी आंखों में देखो, ये जो हम दोनों साथ हैं, उसे महसूस करने की कोशिश करो।’ डरी हुई लड़की की इतनी भी हिम्म्त नहीं पड़ी कि कहती कि जा कर अपनी बहन को क्यूं नहीं महसूस करवाते। लड़की के हाथ पर ख्ररोंचों और होठ पर काटने के निशान हैं। लड़की अभी भी बहुत डरी हुई है।’

यह घटना कितनी सत्य है और कितनी मनगढ़ंत, पता नहीं। लेकिन भारत में ही नहीं, दुनिया के एक बड़े भूभाग में इस तरह की घटनाएं सहज संभाव्य हैं और होती ही रहती हैं। इसीलिए मेरा यह विश्वास बना है कि स्त्रियों को पुरुषों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए – चाहे वे गुरु हों, शिक्षक हों, चाचा, मामा, मौसा-ताऊ हों, मुंहबोले भाई हों, पड़ोसी हों, मेहमान हों, शोध गाइड हों, संपादक हों, प्रकाशक हों, अकादमीकार हों, नियोक्ता हों, मैनेजर हों, पुजारी हों, पंडे हों – कुछ भी क्यों न हों। कई हजार वर्षों की मानसिकता जाते-जाते ही जाएगी। इस संक्रमण काल में स्त्री को बहुत अधिक सावधान रहने की जरूरत है – खासकर अपने शुभचिंतकों से। इसका मतलब यह नहीं है कि हर पुरुष को संदेह की नजर से देखो। इससे तो सब कुछ कबाड़ा हो जाएगा। नहीं, किसी पर भी अनावश्यक संदेह मत करो। विश्वास का अवसर हरएक को दिया जाना चाहिए। लेकिन सावधानी का दीपक हाथ से कभी नहीं छूटना चाहिए। दीपक बुझा कि परवाना लपका।

वैसे, जीवन के एक सामान्य सिद्धांत के तौर पर भी यह सही है। पुरुष पुरुष पर कितना विश्वास करते हैं? स्त्री स्त्री पर कितना विश्वास करती हैं? जहां आत्मीयता होती है, वहां भी लोग ठगे जाने से बचने की कोशिश करते हैं। यह सावधानी स्त्री-पुरुष व्यवहार में और ज्यादा अपेक्षित है, क्योंकि अब तक के इतिहास की सीख यही है। इसलिए माता-पिता और अभिभावकों का यह एक मूल कर्तव्य है कि वे लड़की को लड़की के रूप में विकसित होते समय ही उन फंदों और गड्ढों से अवगत कराते रहें जो आगे उसकी राह में आनेवाले हैं। इसके साथ ही, उसे निर्भय होने और स्व-रक्षा में सक्षमता की शिक्षा भी देनी चाहिए। लेकिन इस कीमत पर नहीं कि मानवता में ही उसका विश्वास डिग जाए। बहुत ही प्रेम और समझदारी से उसमें यह बोध पैदा करना होगा कि लोग सभी अच्छे होते हैं, पर हमेशा सचेत रहना चाहिए कि वे बुरे भी हो सकते हैं। लड़कियों को यह सीख भी दी जानी चाहिए कि यह बहुत गलत होगा अगर अति सावधानी के परिणामस्वरूप वे किसी पुरुष से आत्मीय रिश्ता बना ही न पाएं। घृणा तो किसी से भी न करो – ज्ञात पापी से भी नहीं, सभी को प्रेम और विश्वास दो, पर अपनी सुरक्षा की कामत पर नहीं। हर संबंध की तरह स्त्री-पुरुष संबंध भी एक जुआ है, लेकिन यह जुआ खेलने लायक है, क्योंकि इसी रास्ते हम अपने मनपसंद साथी खोज सकते हैं। इस प्रक्रिया में दुर्घटनाएं होती हैं, तो होने दो। डरो नहीं, न परिताप करो। लेकिन आंख मूंद कर उस रास्ते पर कभी मत चलो जिसके बारे में तुम्हें पता नहीं कि उस पर आगे क्या-क्या बिछा और फेंका हुआ है। यह संतुलन साधना मामूली बात नहीं है, लेकिन अच्छा जीवन जी पाना भी क्या मामूली बात है?

राजकिशोर
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में वरिष्ठ फेलो हैं)

Wednesday, March 11, 2009

रस ही जीवन, जीवन रस है.....

भारत में होली सबसे सरस पर्व है। दशहरा और दीपावली से भी ज्यादा। दूसरे त्योहारों में कोई न कोई वांछा है या वांछा की पूर्ति का सुख। होली दोनों से परे है। यह बस है, जैसे प्रकृति है। अस्तित्व के आनंद का उत्सव। वांछा और वांछा की पूर्ति, दोनों में द्वंद्व है। यह जय-पराजय से जुड़ा हुआ है। दोनों ही एक अधूरी दास्तान हैं। सच यह है कि दूसरा हारे, तब भी हमारी पराजय है। कोई भी सज्जन किसी और को दुखी देखना नहीं चाहता। किसी का वध करके उसे खुशी नहीं होती। करुणानिधान राम ने जब रावण पर अंतिम प्राणहंता तीर चलाया होगा, तो उनका हृदय विषाद से भर गया होगा। उनके दिल में हूक उठी होगी कि काश, रावण ने ऐसा कुछ न किया होता जो उसके लिए मृत्यु का आह्वान बन जाए; काश, उसने अंगद के माध्यम से भेजे गए संधि प्रस्ताव को मंजूर कर लिया होता; काश, उसने विभीषण की सत सलाह का तिरस्कार नहीं किया होता। अर्जुन का विषाद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। युद्ध छिड़ने के ऐन पहले उसे अपने तीर-तूरीण भारी लगने लगे। उसके मन में उचित ही यह भाव पैदा हुआ कि अपने संगे-संबंधियों को मार कर सुख पाना एकदम अनैतिक है। यह भावना जितनी ज्यादा फैले, दुनिया के लिए उतना ही अच्छा है। श्मशान में सभ्यता का विकास नहीं होता। फिर भी महाभारत इसीलिए हो पाया, क्योंकि कृष्ण अपने सखा को यह समझा सके कि अन्याय का प्रतिरोध करना अगर जीवन-मरण का प्रश्न बन जाए, तब भी संघर्ष से भागना नहीं चाहिए। नतीजा यह हुआ कि दिन में कुरुवंश के लोग दिन में एक-दूसरे की जान लेते थे और रात को उनकी याद कर आंसू बहाते थे। इस तरह, द्वंद्व और उनका शमन जीवन प्रक्रिया को आगे बढ़ाता था। होली की विशेषता यह है कि यहां किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है; सामाजिक नैतिकता के नाम पर लादी हुई अनैतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप द्वंद्व है भी, तो उसका शमन नहीं, समाहार है। हृदय की मुक्तावस्था को क्या कहते हैं, मुझे नहीं मालूम, पर यह अनुभव जरूर है कि होली को मन से मनाया जाए, तो कुछ ऐसी ही अवस्था पैदा होती है।

फागुन में ससुर जी देवर लागे....
होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, तो इसके ठोस कारण हैं। इन कारणों से हर कोई अवगत है। ये कारण मुख्यत: बाहर से आते हैं। लेकिन वे प्रभावी तभी होते हैं जब भीतर संचित कोई अद्भुत चीज अंगड़ाई ले कर जाग उठती है। कामना, विचार, हर्ष. विषाद सब कुछ हमारे भीतर ही है। लेकिन जागते वे तब हैं जब बाहर से उन्हें उद्दीपन और आलंबन मिलता है। बाहर और भीतर का विभाजन वास्तविक से ज्यादा कृत्रिम है। तभी तो यह विभाजन अकसर चिटख जाता है। श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?
बताते हैं, प्रकृति हर्ष और विषाद से परे हैं। उसे न दुख होता है न सुख होता है। लेकिन क्या पता। प्रकृति के बारे में हमारी जानकारी इतनी संक्षिप्त है कि उसके आधार पर कोई बड़ा फैसला नहीं किया जा सकता। हम यह तो जान गए हैं कि कीट-पतंगों को, पेड़-पौधों को भी दुख-सुख होता है, वे हर परिवर्तन से संवेदित होते हैं। लेकिन सभी प्राणी, जिनमें उद्भिज भी शामिल हैं, अगर प्रकृति की कोख से ही जन्म लेते हैं, तो यह कोख किसी भी स्तर पर इतनी बांझ नहीं हो सकती कि वह बिलकुल संवेदनहीन हो जाए। मार्क्स ने ठीक पहचाना था कि पदार्थ से ही चेतना पैदा होती है। तो फिर पदार्थ खुद अचेतन कैसे हो सकता है?
प्रकृति की यह सचेतनता वसंत ऋतु में पूरे शबाब में होती है। अन्य सभी ऋतुओं में कुछ न कुछ द्वंद्व होता है। गरमी, बारिश, जाड़ा -- सभी आवश्यक हैं और इस नाते प्रिय भी, पर अतिरेक में वे कष्ट भी देते हैं। वसंत ही एकमात्र ऋतु है जिसका कोई अतिरेक नहीं हो सकता। सभी चीजों का उत्कर्ष होता है, पर उत्कर्ष का उत्कर्ष क्या होगा? सागरमाथा (एवरेस्ट) अपनी ऊंचाई को कैसे लांघ सकता है? वसंत ऋतु परिवर्तन के पूरे चक्र का उत्कर्ष है। इसी के लिए प्रकृति साल भर तैयारी करती है, जैसे मानवी का शरीर सोलह साल तक साधना करता है ताकि उस पर यौवन का फूल खिल सके या जैसे जननी नौ महीने तक हर रंग से गुजरती है तब कोई शिशु धरती पर प्रगट होता है और सभी के दिलों पर छा जाता है। वसंत प्रकृति का यौवन भी है और उसकी रचनात्मकता का चरम उभार बिंदु भी। उसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आनंद ही आनंद है। रस ही रस है। जीवन ही जीवन है। इसीलिए मनुष्य ही नहीं, संपूर्ण जीव जगत के साथ उसकी अनुकूलता है। वसंत में जैसे प्रकृति खुलती है, उसकी कंचुकियां छोटी पड़ जाती हैं, वैसे ही हम भी खुलते हैं, हमारे लिए हमारा परिवेश छोटा लगने लगता है। यह वह सर्वश्रेष्ठ उपहार है जो सृष्टि अपने आपको देती है। वरना तो बाकी सृष्टि में आंखों को जला देनेवाली रोशनी है -- जहां-जहां तारे हैं, या फिर उनके बीच का ठोस सघन अंधेरा, जिसमें कोई अपने आपको भी देख नहीं सकता। हम धरतीवालों को अपनी किस्मत पर इतराना चाहिए।
धरती इसलिए अनोखी है, क्योंकि सृष्टि भर में यहीं जीवन है। यहीं रस है। यह रस सबसे ज्यादा नर-नारी के बीच पैदा होता है, क्योंकि प्रकृति की अभी तक की योजना यही है। उसने पशु-पक्षियों में भी, पेड़-पौधों में भी युग्म बनाए हैं, पर इन युग्मों में वह आकर्षण, वह ताकत, वह निरंतरता नहीं है, जो मानव युग्म में दिखाई देता है। हो सकता है, लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वज स्त्री-पुरुष भी जब-तब ही एक-दूसरे की ओर प्यार और लालसा की निगाहों से देखते रहे हों, पर वह संस्कृति के ककहरे का युग था। संस्कृति के निरंतर विकास ने न केवल शरीर को कोमल और सुंदर बनाया है, बल्कि दो शरीरों के बीच कला का इतना बड़ा सागर पैदा किया है जिसमें हम निरंतर ऊभ-चूभ होते रहते हैं। इसीलिए हमारे एक पूर्वज ने आह भरते हुए कहा था कि जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह सींग-पूंछ रहित जानवर की तरह है। होली इसी सांस्कृतिकता का उत्सव है। जो होली के दिन सूखे पेड़ की तरह अपना और दूसरों का मूड खराब किए रहता है, उसे नरक का अनुभव करने के लिए जीवनोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी होती। वह आंखवाला हो कर भी अंधा है, कानवाला हो कर भी बहरा है और हृदय होते हुए भी पत्थर है। वह समाज में होते हुए भी समाज से बाहर है, अपने भीतर होते हुए भी अपने को नहीं पहचानता। खु़दा ऐसे लोगों को माफ करे -- ये नहीं जानते कि ये क्या खो रहे हैं।

तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं....
नर-नारी का आकर्षण एक विशिष्ट प्रकार का आकर्षण है, जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। इसीलिए सभी भक्त ईश्वर को अपना माशूक मान कर उसकी मादक अनुभूति से घिरे रहते हैं। कबीर को लगता था कि राम उनके प्रियतम हैं और वे राम की बहुरिया हैं। कृष्ण को तो पति मान कर ही भजने की प्रथा है। ईसाई संतों को ईश्वर की वधू होने का अनुभव होता था। ये सभी अभिव्यक्तियां प्रगाढ़तम संबंध की जानी-पहचानी अनुभूति हैं। लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते हैं। जब स्वकीयता के साथ परकीयता होगी और परकीयता के साथ स्वकीयता, तब हमें होली जैसे अद्भुत त्यौहार की महत्ता समझ में आएगी, जो स्वकीय और परकीय के विभाजन की दीवार को अपने रंग-गीले हाथों से गिरा देता है। फागुन के नशे में कौन स्वकीय रह जाता है या रह जाती है और कौन इस बोध से घिरा रहता है या घिरी रहती है कि वह परकीय है? जैसे प्रकृति की व्यवस्था अभिन्न है, हर जर्रा हर जर्रे का मायका या ससुराल है, वैसे ही सभी स्त्री-पुरुष एक नैसर्गिक व्याकरण की संज्ञाएं, विशेषण और क्रियापद बन जाते हैं। अब इससे आगे क्या कहूं, तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं। अगर यह प्रेम है, तो अध्यात्म भी यही है।
रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है। इंद्रियों के सभी विषयों में रंग ही दूर से चमकता है। सूर्य की लालिमा हमें कितनी दूर से दिखाई पड़ती है। चंद्रमा का प्रकाश निकटतर है, लेकिन वह भी कम दूर नहीं है। यह गुण किसी और तत्व में नहीं है। शायद इसीलिए रंग को होली का मुख्य दूत माना गया। प्रकृति भी इस मौसम में अपने रंगों का पूरा खजाना खोल देती है। एक-दूसरे के शरीर और उसके जरिए आत्मा पर गीला रंग फेंक कर हम मानो इस रंगीनियत का ही इजहार करते हैं। यही वह रस है जो हमारे तन-मन को आह्लादित कर देता है और हमारी भौगोलिक तथा मानसिक दूरियों को पाट देता है। हर कोई फूल और हर कोई भौंरा बन जाता है।
मेरी उलझन यह है कि जो रस स्त्री-पुरुष के बीच पैदा होता है, उसका कुछ हिस्सा पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच क्यों नहीं पैदा होता? स्त्रियां भी स्त्रियों के साथ होली खेलती हैं और पुरुष भी पुरुषों के साथ होली खेलते हैं। पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों की अपनी होली ज्यादा मजेदार, ज्यादा चुहल भरी होती है, क्योंकि उनमें प्राकृतिक लालित्य होता है और उनकी आपस की प्रतिस्पर्धा उतनी तीव्र और बहुआयामी नहीं होती जितनी पुरुषों के आपसी संबंधों में। इसीलिए युवाओं की होली ज्यादा खुली हुई होती है : वे इतने परिपक्व नहीं हुए होते हैं कि जिंदगी के द्वंद्वों को कुछ घड़ी के लिए भुला न सकें और अपने को रंगीनी के हाथों निश्शर्त सुपुर्द न कर सकें। शोक की बात यह है कि होली का यह सहज उल्लास साल भर हमारा साथ नहीं देता। स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है। होली हर साल हमें यह याद दिलाने आती है कि यारो, यह जीना भी कोई जीना है जिसमें जीवन का रस द्वंद्वों की आंच में भाप बन कर उड़ता रहता है और हम जितना दूसरों से, उतना ही अपने आपसे बेगाना होते जाते हैं।
इस विसंगति में ही हम पहचान सकते हैं कि होली का दिन मजाक और हास-परिहास का दिन क्यों बन जाता है। जब हिरण्यकश्यप की बहन उसके संतनुमा बेटे प्रह्लाद को ले कर आग के कुंड में बैठ गई थी और बालक प्रह्लाद जल कर भस्म हो जाने के बजाय उससे पूरी तरह अक्षत और साबुत निकल आए, तो उसके तुतलाते होंठों पर एक ऐसी मुसकान जरूर होगी जिसने उस क्रूर-कपटी राजा का दिल तार-तार कर दिया होगा। यह मुसकान अन्याय और जुल्म के विरुद्ध विजय की शाश्वत मुसकान है। बाद की पीढ़ियां इतनी किस्मतवाली नहीं रहीं कि वे इस विध्वंसक आग से अपने को भस्म न होने दें। पर ऐसी हर आग के खिलाफ गाने तो गाए ही जा सकते हैं, प्रहसन तो किया ही जा सकता है, उसका मजाक तो उड़ाया ही जा सकता है। यह भी एक प्रकार की विमुक्ति है : साल भर हमारे कोमल मनों में जो तनाव जमा होते रहते हैं, उनसे उल्लासपूर्ण विमुक्ति का दुर्लभ मौका, जब आप कोयले को कोयला और कीचड़ को कीचड़ कह सकते हैं। होली के दिन कोई किसी का गुसैयां नहीं रह जाता। किसी से भी प्यार किया जा सकता है और किसी पर भी छींटाकशी की जा सकती है। लेकिन यह छींटाकशी भी विनोद भाव के परिणामस्वरूप मृदु और सहनीय हो जाती है। बल्कि जिसका परिहास किया जाता है, वह भी बुरा न मानने का अभिनय करते हुए बरबस हंस पड़ता है। शायद यही 'बुरा न मानो होली है' के हर्ष-विनोद घोष का उद्गम स्थल है।

एक घंटा रोज़ होली के मूड में....
होली वह अनोखा दिन है जब जिसे बहुमत से बुरा समझा जाता है, वह भी बुरा नहीं रह जाता। जिसे बहुमत से अच्छा माना जाता है, उसकी सार्वजनिक ऐसी-तैसी की जाती है। कह सकते हैं कि होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं और जो मृत्यु का एक लघु संस्करण है, ताकि अगली सुबह के बाल सूर्य की तरह हम भी ताजादम हो कर जीवन में वापसी का सुख अनुभव करते हुए अपने दिन भर के कामकाज में लग सकें।
राजकिशोर

Tuesday, March 10, 2009

खुशी चाहिए या प्रसन्नता....

इधर दो घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने हिन्दी-उर्दू के सवाल पर मुझे झकझोर दिया। "पंचायती राज अपडेट' में मेरी संपादकीय सहयोगी ने एक समाचार बनाते समय झंडारोहण शब्द का प्रयोग किया था। कॉपी हाथ में आते ही मैंने झंडारोहण को काट कर ध्वजारोहण लिख दिया और उसे समझाया कि सामान्यत: तद्भव और तत्सम शब्दों के बीच संधि नहीं होती। मैं उसका अफसर था, इसलिए या वह मुझे हिन्दी का जानकार समझती है, इसलिए उसने मेरे संशोधन को स्वीकार कर लिया। लेकिन मैं मानता हूं कि भाषा में अफसरी नहीं चलती। यह दावा तो मेरी कल्पना में भी नहीं आता कि मैं हिन्दी का जानकार हूं। अत: मैं सोचने लगा कि झंडारोहण में बुराई क्या है। मेरी धारणा है कि हिन्दी तद्भव-प्रधान भाषा है। अगर कोई दूसरी भाषा उसके साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ती है, तो वह उर्दू है। उर्दू यानी उसके वे लफ्ज जो आम बोलचाल में आ गए हैं। उम्र हिन्दी में चलता है, पर आब नहीं। उर्दू शब्दों के भी तद्भव रूप होते हैं -- जिसे हम खामखा कहते हैं, वह उर्दू में ख्वाहमख्वाह है। लेकिन बहुत समय से हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने का एक अटूट सिलसिला चला आ रहा है, जिससे हिन्दी का नुकसान हुआ है। जो हिन्दी लोक भाषा थी, उसका एक हिस्सा विद्वानों का, विद्वानों के द्वारा और विद्वानों के लिए हो गया। इसका कुछ उपचार होना चाहिए।
दूसरी घटना का संबंध हाल ही में पढ़ी एक कहानी में प्रेमी-प्रेमिका संवाद से है। प्रेमिका कहती है, मैं हमेशा तुम्हें खुश रखने की कोशिश करूंगी। इस पर प्रेमी कुछ नाराज हो जाता है। वह कहता है, इस तरह की घटिया बात मेरे दिमाग में आ ही नहीं सकती। खुश रखना तो नौकरों या तवायफों का काम है। इस पर प्रेमिका हंसने लगती है; कहती है -- तुमने हिन्दी में पीएचडी कर ली है, पर रहे पंडित के पंडित। चलो, मैं तुम्हें हमेशा प्रसन्न रखने का प्रयास करूंगी। इस पर प्रेमी सोच में पड़ जाता है। क्या खुश और प्रसन्न तथा खुशी और प्रसन्नता एक ही चीज नहीं हैं? फिर खुशी कैसे तुच्छ भौतिकवादी चीज और प्रसन्नता कैसे ऊंची और उदात्त चीज हो गई? कुछ देर सोचने के बाद वह प्रेमिका से कहता है, लेकिन मैं तो तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहूंगा। लड़की हंस पड़ती है। बोलती है, यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।
हिन्दू-मुसलमान एकता की चर्चा हमारे देश में काफी समय से चली आ रही है, पर हिन्दी-उर्दू एकता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। हिन्दी में शुद्धतावाद का आग्रह अभी भी बरकरार है। जो शुद्धतावादी हैं, वे इनसान कभी नहीं लिखेंगे, हमेशा मनुष्य ही लिखेंगे। जो कुछ उदार हैं, वे कहेंगे कि इनसान भी कम हिन्दी नहीं है। मैं इससे एक कदम आगे जाना चाहता हूं और जिस आदमी की कोई इज्जत नहीं है, उसे इज्जतहीन या इज्जतविहीन लिखने की इजाजत चाहता हूं। जहां हिन्दी और उर्दू की संधि बहुत खराब लगेगी, ऐसे मामलों को अपवाद मान लेना चाहिए, जैसे आजादिओत्तर (तूफानोत्तर या बाढ़ोत्तर राहत का स्वागत है)। लेकिन उम्राधिक्य लिखने में क्या हर्ज है? अगर कोई यह कहता है कि मेरा दोस्त शरीफतम लोगों में एक है या यहां से नजदीकतम स्टेशन रिवाड़ी है, तो उसकी आलोचना क्यों की जाए?
कई मामलों में इससे लिखने में सुविधा भी हो सकती है। जैसे अंग्रेजी के मार्जिनलाइजेशन का कोई अच्छा पर्याय नहीं है। सीमांतीकरण जमता नहीं है। पर हाशियाईकरण लिखा जाए तो? सीमांत की जगह हाशिया ज्यादा लोकप्रिय है और इसकी ध्वनि अर्थ के करीब भी है। इसी तरह नई अर्थनीति लोगों को गरीब बना रही है, यह कहने के बजाय यदि यह कहा जाए कि वह लोगों का गरीबीकरण कर रही है, तो आपत्ति क्यों की जाए? गरीबीकरण से एक क्रमिक प्रक्रिया का बोध होता है, जो गरीब बनाने में गैरहाजिर है। कस्बाईकरण तो चल ही पड़ा है, शहरीकरण भी अब काफी लोकप्रिय है। जो हिन्दी में अप्सरा है, उसे उर्दू में परी कहते हैं। अगर किसी स्त्री का वर्णन करते हुए कहा जाए कि उसके परीतुल्य सौंदर्य से मुग्ध होने से कौन बचा है, तो क्या हिन्दी की तौहीन हो जाएगी? रेस को नस्ल कहा जाता है। नस्ल-भेद हिन्दी का एक पुराना शब्द है। यहां संधि नहीं, समास है, जिसके उदाहरणों की कमी नहीं है, जैसे शादी-ब्याह, सुबह-सवेरे, नशामुक्ति, चाय-पान, पर कोई नस्लीय लिखे, जिसमें उर्दू नस्ल के साथ हिन्दी ईय प्रत्यय का योग है, तो क्या यह गलत हिन्दी का नमूना होगा? अश्लीलता की तर्ज पर नस्लीयता और धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर नस्लनिरपेक्षता। तद्भव शब्द गुट के आधार पर निर्गुट बनाया जा सकता है, तो उर्दू शब्द अक्ल के आधार पर निरक्ल या अक्लविहीन में क्या बुराई है? अखबारी सच्चाई को हम जानते हैं, पर अखबारेतर सच्चाइयां भी होती हैं। दमकलवाले हमेशा अग्निग्रस्त भवन की तरफ क्यों दौड़ें? वे आगग्रस्त मकान की ओर भी जा सकते हैं। हम शराबेतर नशों का जिक्र कर सकते हैं और किसी को शराब प्रेमी या शराबग्रस्त भी कहा जा सकता है। बल्कि शराब प्रेमी एक अलग कैटिगोरी है, जिसके लिए कोई माकूल शब्द नहीं है।
इस तरह के प्रयोग शुरू में कुछ अटपटे लगेंगे, पर धीरे-धीरे वे हमारी जबान पर चढ़ जाएंगे। संस्कृतनिष्ठता के प्रति मोह या अंग्रेजी की नकल के कारण मेरे मुहल्ले का एक दुकानदार लिखता है --- यहां चाय उपलब्ध है, जबकि वह आसानी से लिख सकता था -- यहां चाय मिलती है। असल में, हम अपने सामूहिक अवचेतन में संस्कृत शब्दों को पवित्र मानते हैं (संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है) और तद्भव तथा उर्दू शब्दों को कुछ हीन दृष्टि से देखते हैं। संस्कृत अगर ब्रााहृण है, तो तद्भव ओबीसी या दलित और उर्दू म्लेच्छ। यह मद्यप और शराबी के अंतर से स्पष्ट है। वर्षा में लालित्य है, बारिश में कोई रोमांस नहीं है। रेणु के उपन्यास "परती परिकथा' में नायक जिस स्त्री को अपनी रक्षिता बताता है, उसके लिए देशी शब्द रखैल है। रक्षिता कहे जाने से वह स्त्री सहज ही सम्माननीय हो उठती है, जबकि रखैल शब्द दूर से ही बदबू देता है।
शब्दों के बीच इस जाति प्रथा को खत्म करना लोकतंत्र के हित में तो है ही, हिन्दी-उर्दू की दूरी को मिटाने में भी सहायक होगा। शायद इस मिश्रित भाषा को हिन्दुस्तानी कहा जाने लगे, जो गांधी जी की हिन्दुस्तानी का ही एक और रूप है। एक और फायदा यह है कि हिन्दी शब्दों की संख्या में डेढ़ गुनी या दुगुनी वृद्धि हो जाएगी। विकसित भाषा वही मानी जाती है, जिसमें एक चीज के कई नाम हों और एक जैसी अभिव्यक्ति के लिए कई-कई शब्द हों। यदि मेरा यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया जाता है, तो हमारे पास शिकायती और शिकायतगर के साथ-साथ शिकायतकर्ता भी होगा, जो पहले दोनों से बेहतर है।

राजकिशोर

Wednesday, March 04, 2009

क्या आप सुन पाए संसद में सिसकी....

चौदहवीं लोक सभा की उम्र पूरी हो चुकी थी। शोक सभा में स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, लालकृष्ण आडवाणी आदि नेता अपना-अपना वक्तव्य रख चुके थे। निर्णय हुआ कि लाश को अभी श्मशान तक न ले जाया जाए। जब पंद्रहवीं लोक सभा का जन्म हो जाए, तब क्रिया-कर्म की रस्म पूरी हो। उसके पहले अंतिम संस्कार कर दिया गया, तो बीच की अवधि में लोक सभा की आत्मा कहां-कहां भटकती फिरेगी? वैसे, कुछ लोगों का मत है कि लोक सभा की आत्मा तो पहले ही कूच कर चुकी है। अब हम उसका शरीर ढो रहे हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। जब शरीर है, तो आत्मा भी होगी ही। इसलिए पता लगाने की चीज यह है कि लोक सभा की असली आत्मा के कूच करने के बाद जिस आत्मा ने लोक सभा पर कब्जा कर लिया है, वह कैसी है, कहां की है और क्या करने पर वह अपने मूल क्षेत्र में जा बैठेगी। मैं प्रस्ताव करता हूं कि यह पता लगाने के लिए तुरंत एक राष्ट्रीय आयोग गठित किया जाए, जिसमें संसद का एक भी सदस्य न हो।

लोक सभा के सभी ऑनरेबल सदस्य बाहर निकल आए, तो गार्ड सदन के दरवाजे बंद करने के लिए लपका। बाकी सारे दरवाजों पर वह ताला लगा चुका था। जब वह आखिरी दरवाजे पर ताला लगाने जा रहा था, तभी उसे किसी लड़की की सिसकी सुनाई पड़ी। गॉर्ड भौंचक रह गया। सिसकी की आवाज दीवार के एक कोने से आ रही थी। गॉर्ड थोड़ा डर भी गया -- कहीं भूत-प्रेत का मामला तो नहीं है? फिर धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ा जिधर से सिसकी की आवाज आ रही थी। दूर ही से टॉर्च की रोशनी उधर फेंकी, तो देखा, सोलह-सत्तरह साल की एक लड़की बार-बार अपना माथा पीट रही थी और रो रही थी। उसका सिर सामने की ओर झुका हुआ था। उसके आंसू के कण फर्श पर बिखरे हुए थे।

गॉर्ड तीस साल से लोक सभा में नौकरी कर रहा था। कई लोक सभाओं के ताले खोल और बंद कर चुका था। इसके पहले उसने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी समझ जवाब दे रही थी। कौतूहल, जिज्ञासा और भय से वह आगे बढ़ा और दीवार पर लगे एक स्विच को ऑन कर दिया। एक ट्यूब लाइट जल उठा। उसकी रोशनी में उसने उस दुखिनी बाला का भरपूर जायजा लिया। वह कोई युवा प्रेतनी नहीं, हाड़-मांस की जिन्दा लड़की थी। उसकी शक्ल गॉर्ड की मझली बेटी से मिलती-जुलती थी। गॉर्ड का दिल सहानुभूति से भर आया।

गॉर्ड रोती हुई लड़की के नजदीक गया। उसने बहुत ही मुलायम स्वर में पूछा, 'क्या बात है बेटी, क्यों रो रही हो?'

ऐसा लगा मानो लड़की ने कुछ सुना ही न हो। उसकी सिसकी जारी रही।

गॉर्ड थोड़ा और नजदीक गया। उसने अपना प्रश्न दुहराया। लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। विचलित गॉर्ड ने लड़की के माथे पर हाथ रख कर उसे उठाने की कोशिश की। लड़की ने प्रतिरोध किया। गॉर्ड ने अपना सवाल फिर दुहराया। लड़की का रोना और तेज हो गया। गॉर्ड की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। लड़की को इस तरह अकेली छोड़ कर वह लोक सभा का आखिरी दरवाजा बंद नहीं कर सकता था। उसने एक बार फिर कोशिश की, 'बताओ न बेटी, आखिर बात क्या है? हो सकता है, मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। मुझे अपने पिता की तरह समझो। मेरी एक बेटी तुम्हारी ही उम्र की है।'

लड़की ने सिर झुकाए हुए ही कहा, 'स्पीकर साहब, अब आप क्या, कोई भी मेरी मदद नहीं कर सकता। इस लोक सभा की आखिरी बैठक हो चुकी है।' गॉर्ड ने उसकी गलतफहमी दूर की, 'बेटी, मैं स्पीकर नहीं हूं। वे तो जा चुके हैं। मैं यहां का गॉर्ड हूं। तुम बिना संकोच के अपना दुख मुझसे कह सकती हो।'

लड़की ने सिसकी रोक कर अपना सिर थोड़ा-सा उठाया। बोली, 'मेरा दुख सभी जानते हैं। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। लगता है, यहां से मेरी अरथी ही निकलेगी।'

गॉर्ड का सिर चकराने लगा था। उसने जानना चाहा, 'लेकिन तुम सदन में घुसी कैसे? यहां तो कोई भी गैर-मेंबर प्रवेश नहीं कर सकता। इसके लिए पास जारी कराना पड़ता है।'

लड़की ने जवाब दिया, 'बाबा, मेरा तो जन्म ही इस सदन में हुआ है। यहीं पड़े-पड़े मेरी उम्र बढ़ रही है। इंतजार करते-करते दस साल से ज्यादा हो गया। लोक सभा शुरू होती है, तो सब कहते हैं, इस बार तुम्हारा निपटारा कर देंगे। पांच वर्ष तक मैं आंख उठाए स्पीकर और दूसरे मेम्बरान की ओर देखती रहती हूं। सत्र पूरा हो जाता है और मेरा कुछ नहीं होता। अकेले बैठ कर सिसकती रहती हूं। वे मुझे मारते भी नहीं और जीने भी नहीं देते। हमेशा अधमरी हालत में छोड़ देते हैं।'

गॉर्ड ने आश्चर्य से पूछा, 'लेकिन बेटी, तुम हो कौन? तुम्हारा नाम क्या है?'

लड़की ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, 'बाबा, मुझ अभागन को सब जानते हैं। मेरा नाम है महिला आरक्षण विधेयक।'

अब गॉर्ड की समझ में सब कुछ आ गया। उसने हाथ पकड़ कर लड़की को उठाते हुए कहा, 'बेटी, उठो, मेरे घर चलो। यहां रोने से कुछ हासिल होनेवाला नहीं है।'

लड़की ने शांत स्वर में उत्तर दिया, 'बाबा, रात हो रही है। तुम घर जाओ। मैं तो यहीं रहूंगी। या तो मेरा मनोरथ पूरा होगा या यहां से मेरी लाश निकलेगी।'

राजकिशोर

Tuesday, March 03, 2009

बूँद भर सफलता, सागर भर खुशी...

ऑस्करों की खुशी से देश दीवाना है, तो यह उचित ही है। इनमें से कई हमारे नहीं हैं। हमारे असली ऑस्कर वे हैं जो संगीत के लिए दिए गए हैं। इसके बावजूद यह कम गर्व की बात नहीं है कि दूसरी बार किसी भारतीय प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय फिल्म सम्मान मिला है। पहला ऑस्कर एक भारतीय को शेखर कपूर की फिल्म 'एलिजाबेथ' में कॉस्ट्यूम के लिए मिला था। इस बार संगीत के लिए तीन ऑस्कर सम्मान मिले हैं। इसके नशे में देश झूम रहा है। यह और बात है कि फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनर' को ले कर तरह-तरह के विवाद खड़े हो गए हैं। इस विवाद में कुछ दम भी है। फिर भी ए.आर. रहमान का सम्मान भारत की प्रतिभा का सम्मान है और इससे हम सभी गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, तो इसमें कुछ भी बेजा नहीं है। सब कुछ के बावजूद सम्मान सम्मान है।
खुशी की यह दीवानगी पहली बार नहीं देखी जा रही है। क्रिकेट में जब भारत की टीम ने विश्व कप जीता था, तब भी ऐसी दीवानगी दिखाई पड़ी थी। कपिल देव राष्ट्रीय हीरो बन गए थे। क्रिकेट का विश्व कप जीतने पर और ज्यादा दीवानगी दिखाई पड़ी, क्योंकि क्रिकेट हमारे देश के मध्य वर्ग को कुछ ज्यादा ही भाता है। गर्व की ऐसी ही लहर तब भी उठी थी, जब सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय के सौंदर्य को विश्व स्तर की मान्यता मिली थी। अर्मत्य सेन को जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, तो भारत का कद अचानक फिर बढ़ गया। जब 'फॉर्ब्स' पत्रिका द्वारा दुनिया के अमीरतम व्यक्तियों की सूची प्रकाशित की जाती है, तो उसमें भारतीयों की संख्या पढ़ कर हमें कुछ खुशी तो होती ही है। भारतीय सिर्फ साहित्य, खेल, सौंदर्य और अर्थशास्त्र की विद्वत्ता में आगे नहीं हैं, बल्कि दौलत कमाने में भी पीछे नहीं है, यह जान कर अच्छा लगना कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं है।
इसके साथ ही, क्या यह भी विचारणीय नहीं है कि जो है, उसकी रोशनी में जो नहीं है, उसका गम और गाढ़ा हो जाता है? बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जो नहीं है, उसकी मात्रा इतनी ज्यादा और इतनी दुखदायी है कि जो थोड़ा-बहुत मिल जाता है, उस पर हम झूमने लगते हैं। दुनिया के भ्रष्टतम देशों की सूची छपती है, तो उसमें भारत का स्थान काफी ऊपर होता है। मानव विकास की कसौटी पर सभी देशों के हालात की जांच की जाती है, तो यही भारत बहुत नीचे चला जाता है। शिक्षा में, साक्षरता में, स्वास्थ्य सुविधाओं में, पौष्टिकता में, बाल मृत्यु दर में, स्त्रियों की सामाजिक हैसियत में, स्त्री विरोधी आचरण में, मानव अधिकारों के सम्मान में -- कौन-सा क्षेत्र ऐसा है, जहां हम सिर ऊंचा कर खड़े हो सकते हैं? कुल मिला कर स्थिति यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति को देखते हुए हमें कई बार भारतीय होने में शर्म आने लगती है।
यह सच है कि दक्षिण एशिया में भारत का कद उसके आकार और उसकी आबादी के अनुरूप ही ऊंचा है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक साथ ही आजाद हुए थे -- तब वे एक ही देश थे। इन तीनों टुकड़ों में भारत ही राजनीतिक और आर्थिक रूप से स्थिर रहा है और जीवन के सभी क्षेत्रों में कुछ न कुछ प्रगति की है। लोकतंत्र भी यहां कमोबेश अक्षुण्ण रहा है। इस तरह भारत उपमहादेश में भारत हर तरह से अग्रणी है। दक्षिण एशिया के पूरे संदर्भ में हम दावा कर सकते हैं कि श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि की तुलना में हमारा रिकॉर्ड प्रशंसनीय रहा है।
लेकिन एशिया के स्तर पर ? इसी एशिया में चीन है, जापान है, कोरिया है तथा अन्य कई देश हैं जिन्होंने प्रगति की दिशा में शानदार रिकॉर्ड बनाए हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में श्रीलंका भी हमसे आगे है। सवाल यह है कि हम अपने विकास की तुलना सिर्फ दक्षिण एशिया के परिदृश्य से क्यों करें, वरन पूरे एशियाई संदर्भ में क्यों न करें ? और एशिया में क्या रखा है? जब तुलना ही करनी है, तो विश्व स्तर पर अपनी तुलना क्यों न करें? भारत के लोग अपने को इतना हीन क्यों मानें कि दुनिया के विकसिततम देशों से प्रतिद्वंद्विता करने की सोच ही न सकें?
शुरू में हमने जिन उदाहरणों का हवाला दिया है, उनसे पता चलता है कि व्यक्तिगत स्तर पर भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। ज्ञान-विज्ञान और कला का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें कोई न कोई भारतीय सितारा न जगमगा रहा हो। लेकिन ये सभी क्षेत्र ऐसे हैं, जहां व्यक्तिगत प्रतिभा और साधना से खास-खास व्यक्तियों ने शिखर की ऊंचाई छू ली है। हुसैन और ए.आर. रहमान बनने में परिस्थितियों का योगदान अवश्य है, पर मुख्य योगदान इन कलाकारों का अपना ही है। ध्यान देने की बात यह भी है कि इन दोनों कलाकारों का बचपन अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में बीता था, लेकिन इन्होंने लगातार तपस्या कर अपने को बनाया और नाम हासिल किया। हम फेल वहां होते हैं, जहां सामाजिक नियोजन और सामूहिक कर्म की चुनौती आती है। तो क्या हमारी सामाजिक दृष्टि और सामाजिकता में कोई भारी कमी है जिसकी वजह से हम समूह के तौर पर उल्लेखनीय विकास नहीं कर पा रहे हैं? व्यक्ति के स्तर पर उत्कर्ष हासिल करना हमारे लिए आसान रहता है, पर राष्ट्र के स्तर पर विकास करने में हम अपने महादेश एशिया के ही अनेक देशों से पिछड़ जाते हैं। इस सवाल पर गहराई से विचार नहीं किया गया और हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो हमारे चमकते हुए सितारों की छवि भी धूमिल होने को बाध्य है।
इसके अलावा, सामूहिक विकास का संबंध व्यक्तिगत विकास से भी है। इतने बड़े फिल्म उद्योग में अभी तक सिर्फ चार ही ऑस्कर क्यों ? नोबेल पुरस्कारों की बारी आती है, तो हम मुंह देखने लगते हैं। इतने विशाल देश में कुछ ही चित्रकार, कुछ ही संगीतकार, कुछ ही खिलाड़ी, कुछ ही अभिनेता, कुछ ही विद्वान और कुछ ही वैज्ञानिक क्यों चर्चित हो कर रह जाते हैं? पश्चिमी जगत का कोई भी देश, रूस को छोड़ कर, आबादी में हमसे बड़ा नहीं है। किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति हमसे ज्यादा पुरानी नहीं है। अगर हम सामूहिक रूप से विकास करने में सफल होते हैं, तो इनसे सौ गुना ज्यादा कलाकार और ज्ञानी-विज्ञानी हम पैदा कर सकते हैं। जो है, उसकी मात्रा बताती है कि जो नहीं है, उसमें कितनी बड़ी संभावनाएं छिपी हुई हैं। इसलिए निवेदन यह है कि जो है, उस पर उत्सव मनाते समय उसे न भुलाया जाए जो नहीं है पर हो सकता है।

राजकिशोर

Tuesday, February 24, 2009

हिंदी में बुद्धिजीवी होना भी कम दुखदायी नहीं.....

भारत में बुद्धिजीवियों का इतिहास बेहद पुराना है....पूरी दुनिया को हर क्षेत्र में भारत ने मौके-बेमौके पाठ पढाए हैं...पूरी दुनिया ने हमारी इस क्षमता को सराहा भी है....मगर, सवाल यह है कि बुद्धिजीवियों की भाषा अंग्रेज़ी होने के कारण हिंदुस्तान का आम पाठक इन बुद्धिजीवियों से कितना लाभ ले पाता है.....एक नये लेख के साथ प्रस्तुत हैं राजकिशोर

पहली बात तो यह है कि भारत में जन बुद्धिजीवी (पब्लिक इंटेलेक्चुअल) हिन्दी में नहीं हैं और अंग्रेजी में हैं, यह बात ही सिरे से ही खारिज करने लायक है। अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों का भारतीय जन से क्या रिश्ता है? कोई रिश्ता है भी या नहीं? बताते हैं कि अंग्रेजी समझनेवालों की संख्या भारत में तीन प्रतिशत के आसपास है। इन तीन प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व करनेवाले बुद्धिजीवी देश के 97 प्रतिशत लोगों से कैसे संवाद कर सकते हैं? आषीश नंदी या रामचंद्र गुहा या अमर्त्य सेन को भारत का जन बुद्धिजीवी किस तर्क से कहा जा सकता है? ये मुख्यतः या सिर्फ अंग्रेजी जाननेवाले वर्ग के लिए लिखते या बोलते हैं। निश्चय ही, इनके सरोकारों का संबंध भारत की स्थितियों से होता है, लेकिन विदेशों में रहनेवाले ऐसे दर्जनों विद्वान हैं जो अंग्रेजी में या अपनी-अपनी भाषाओं में भारत के बारे में लिखते रहते हैं। क्या इन विदेशी विद्वानों को भारत का जन बुद्धिजीवी माना जा सकता है? इन विद्वानों में और भारत में रहनेवाले भारतीय विद्वानों में मूलभूत फर्क क्या है? दोनों एक ही पाठक वर्ग के लिए लिखते हैं। दोनों एक ही तरह के परिसंवादों में भाग लेते हैं। उनकी पुस्तकें प्राय: एक ही वर्ग के प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित की जाती हैं। जैसे सिर्फ भारतीय मूल का होने से कोई विद्वान भारतीय नहीं हो जाता, वैसे ही जनता से दूर रहनेवाला बुद्धिजीवी किसी भी हाल में भारत का जन बुद्धिजीवी नहीं कहला सकता। इसलिए हमें इस जाल में पड़ना ही नहीं चाहिए कि कोई विदेशी पत्रिका किन्हें भारत के शीर्ष जन बुद्धिजीवियों में गिनती है और किन्हें नहीं। वास्तव में यह अंग्रेजी भाषा की नट लीला है, जिसकी ओर ध्यान देने से हम अपनी बौद्धिक समस्याओं का निदान नहीं निकाल सकते।

इस ट्रेजेडी के साथ एक वृहत्तर ट्रेजेडी भी जुड़ी हुई है। ऐसा नहीं है कि जन बुद्धिजीवी न होने के कारण भारत के अंग्रेजी बुद्धिजीवियों का योगदान कुछ कम महत्व का है। महत्व है, इसीलिए अफसोस होता है कि ये विद्वान अंग्रेजी में क्यों लिखते हैं जिसका भारत के आम पढ़े-लिखे वर्ग से कोई संबंध नहीं है। इसमें क्या संदेह है कि पिछले साठ वर्षों में ज्ञान और विद्वत्ता के क्षेत्र में जो ज्यादातर काम हुआ है, वह अंग्रेजी में ही हुआ है। उदाहरण के लिए, जाति, गरीबी, भूमंडलीकरण, धर्मनिरपेक्षता, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि में जितना महत्वपूर्ण काम हमारे देश में हुआ है, उसकी भाषा अंग्रेजी ही है। इसी से इसका फायदा अंग्रेजीवालों के बीच ही सीमित रहता है। अन्य भाषाओं के जिज्ञासु भी इन्हें पढ़ते हैं, पर इनकी संख्या ज्यादा नहीं है और इन बुद्धिजीवियों का व्यक्तित्व या कार्य शैली ऐसी नहीं है कि ये भारत के जनमानस को प्रभावित कर सकें। इस तरह, अंग्रेजी में उत्पादित और संग्रहित ज्ञान भंडार भारत के अधिसंख्य लोगों के लिए किसी काम का नहीं होता। रामचंद्र गुहा या अरुंधति रॉय होंगे बहुत बड़े बुद्धिजीवी, पर उनके मुहल्ले के लोग भी नहीं जानते कि यहां हमारे समय का एक बड़ा बुद्धिजीवी रहता है। भारत का अंग्रेज़ी बुद्धिजीवी लंदन, पेरिस, हेडेलबर्ग की सैर करता होगा, अंतरराष्ट्रीय परिसंवादों में भाग लेता होगा, हर साल उसकी एक नई किताब प्रकाशित होती होगी, पर असल भारतीय समाज से वह उतना ही दूर है जितना इंग्लैंड या अमेरिका भारत से दूर हैं। इसलिए इनका ज्ञान भारतीय लोगों के उपयोग में नहीं आ पाता। ये इंटेलेक्चुअल हैं, पर पब्लिक इंटेलेक्चुअल नहीं।

फिर इन्हें भारत का जन बुद्धिजीवी क्यों मान लिया जाता है? क्योंकि एक छोटा-सा वर्ग ऐसा है, जो अपने को असली भारत माने बैठा है। इस छोटे-से वर्ग के सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करते हैं और एक-दूसरे की बात का खंडन-मंडन करते रहते हैं। यह वर्ग जो लिखता है, उसे यही वर्ग पढ़ता है। इस वर्ग का अंग्रेजी के विदेशी बुद्धिजीवियों से भी संपर्क रहता है। यही कारण है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की कोई पत्रिका जब भारत के जन बुद्धिजीवियों की सूची बनाने बैठती है, तो उसकी नजर मेधा पाटकर या अरुणा रॉय या नामवर सिंह या राजेंद्र यादव पर नहीं पड़ती। ये लोग उस मंडली से बाहर हैं जिसे भारत का बौद्धिक क्रीमी लेयर कहा जा सकता है। राजेंद्र यादव की टिप्पणियों को पढ़नेवालों की संख्या रामचंद्र गुहा के पाठकों से कई गुना ज्यादा होगी, पर यादव अमेरिकी पत्रिकाओं की नजर में पब्लिक बुद्धिजीवी नहीं हैं और रामचंद्र गुहा हैं। यह यथार्थ को सिर के बल खड़ा करना नहीं है, तो और क्या है?

नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, सच्चिदानंद सिन्हा, अशोक वाजपेयी की भी सीमाएं हैं। ये काम तो कर रहे हैं जन बुद्धिजीवी का, पर जन के बीच इनकी कोई खास मान्यता होने की बात को तो छोड़िए, आम हिन्दी भाषी इन्हें जानता तक नहीं है। जिस तरह अंग्रेज़ी बोलने और लिखनेवालों का एक छोटा-सा परिमंडल बना हुआ है, उसी तरह इन लेखकों और वक्ताओं का भी एक सीमित परिमंडल है। अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों की तुलना में इनकी स्थिति ज्यादा ट्रैजिक कही जा सकती है, क्योंकि ये अपनी मातृभाषा में काम करते हैं, उसे समर्थ और सक्षम बनाते हैं, उसके जरिए तरह-तरह की बहसें छेड़ते हैं, पर इसकी आंच या महक अपने ही लोगों के बीच दूर तक नहीं जा पाती। अंग्रेजी के लेखक नदी के द्वीप हैं, तो ये लेखक छोटी-छोटी नदियां है, जिन्हें उस व्यापक जन क्षेत्र की प्रतीक्षा है, जहां ये वेग के साथ बह सकें।

मामला यह भी है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से अंग्रेजी में विचार-विमर्श की परंपरा लगभग अक्षत बनी हुई है, पर भारतीय भाषाओं में यह परंपरा छिन्न-भिन्न हो गई है। एक समय मराठी में महात्मा फुले थे, बांग्ला में ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे और हिन्दी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और दयानंद सरस्वती थे, पर आज उनके बौद्धिक उत्तराधिकारी कहीं दिखाई नहीं देते। इसका एक बड़ा कारण यह है कि अंग्रेजी से होनेवाले अनगिनत लाभों के कारण भारत की उत्कृष्ट प्रतिभाएं अंग्रेजी में पर्यवसित होती गई, जिससे भारतीय भाषाओं में बौद्धिक विकास को आघात पहुंचा। दूसरा बड़ा कारण यह है कि हिन्दी क्षेत्र में पुनर्जागरण की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। छिटपुट प्रयत्न जरूर हुए हैं, पर वे तृणमूल स्तर पर जन जीवन को प्रभावित नहीं कर सके। इसलिए तर्क-वितर्क का माहौल क्षीण हुआ है। साहित्य को ही प्रमुख बौद्धिक गतिविधि मान लिया गया। फिर भी, महात्मा गांधी के बाद राममनोहर लोहिया, रामवृक्ष बेनीपुरी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, किशन पटनायक, माहेश्वर (आइपीएफ) आदि ने अपने-अपने समय में सार्वजनिक बहसें चलाईं और बहुत बड़ी संख्या में लोगों की बौद्धिक चेतना में खलबलाहट पैदा की। यह क्रम भी अब टूटता नजर आता है। अंग्रेज़ी का प्रभुत्व भारत की हर अच्छी चीज को नष्ट कर रहा है। इसलिए हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में जन बुद्धिजीवियों का आविर्भाव हो और उनका प्रभाव क्षेत्र फैले, इसके लिए आवश्यक है कि भारत के सार्वजनिक जीवन से अंग्रेजी को तुरंत विदा किया जाए।

राजकिशोर

Tuesday, February 17, 2009

हमारी पीढ़ी की ग़ुलामी

हमारी पीढ़ी ने वह दौर नहीं देखा है जब गुलामों की सार्वजनिक नीलामी हुआ करती थी। यह उसका दुर्भाग्य नहीं, सौभाग्य है। मानव जाति के इतिहास में जो सबसे बर्बर और घृणित प्रथा रही है, वह यही थी -- लाखों स्त्री-पुरुषों को गुलाम बना कर रखना। जरा उस दृश्य की कल्पना कीजिए जब किसी गुलाम को नीलाम किया जाता था। यह जगह बगदाद, मिस्र, पाटलीपुत्र, उज्जैन, लाहौर, पेशावर, लंदन, पेरिस कोई भी हो सकती थी। दृश्य कुछ यों होता था। दस-पंद्रह पुरुष और स्त्रियां एक छोटे- से दायरें में एक-दूसरे से बंधे खड़े हैं। हरएक के पैरों में लोहे की भारी जंजीरें हैं। हाथ भी जंजीरों से बंधे हुए हैं। उनका मालिक एक नौजवान गुलाम को पकड़ कर जनता के सामने ले आता है और नीलामी शुरू हो जाती है-- साहबान, यह मेरा सबसे अजीज गुलाम है। मजबूत, ईमानदार और वफादार। बेहद मेहनती। यह सारे काम कर सकता है। दिन भर में सिर्फ चार घंटे सोता है। जरा इसकी बांहों पर नजर दौड़ाइए, फौलाद की बनीं है। चाहें तो हाथी को एक हाथ से उठा लें। इसके पैरों में गजब की फुर्ती है। यह घोड़े की रफ्तार से भी तेज दौड़ सकता है। हां, तो साहबान, बोली लगाइए। देखें, वह कौन खुशकिस्मत है जो इसे खरीद कर अपने घर ले जाता है। उसकी जिंदगी जन्नत में बदल जाएगी। हां, तो साहबान, पहली बोली दस दीनार की लगी है। यह क्या बात हुई? जनाब, आप मुर्गा या बकरा नहीं खरीद रहे हैं। जिन्न की तरह सारे काम पलकों में करके रख देनेवाला एक ठोस, मजबूत आदमी खरीद रख रहे हैं। इसकी तौहीन मत कीजिए। लोहे के भाव सोना नहीं मिलता। ...
उस गुलाम का नया मालिक तय हो जाने के बाद गुलामों का सौदागर सिर झुकाए एक गुलाम युवती को पेश करता है और फिर शुरू हो जाता है -- अब मैं आपकी खिदमत में आज का सबसे हसीन तोहफा पेश करता हूं। इसे ईरान से पकड़ कर लाया गया है। इसकी कमसिन उम्र और दुबले-पतले शरीर पर मत जाइए। इसके भीतर गजब की ताकत भरी हुई है। बिना थके चौबीसों घंटे घर-बाहर के सारे काम कर सकती है। खाना इतना लजीज बनाती है कि आप उंगलियां चाटते रह जाएंगे। इसमें बला की शोखी है। इतने अदब से पेश आती है कि आप तवायफों की अदाएं भूल जाएंगे। बिस्तर पर आग उगलती है। तो साहबान, बोली लगाइए। शान से बोली लगाइए। मैं पहले से बता देता हूं... इसे सौ दीनार से कम पर नहीं दे सकता। समझिए, आप हीरा खरीद रहे हैं, हीरा ...
यह मत समझिए कि यह सारी दृश्य कल्पना से बुना हुआ है। सौ-दो साल पहले तक दुनिया के किसी भी बड़े शहर में यह आम बात थी। घर में दस-बीस गुलामों का होना सभ्य जीवन की अनिवार्य शर्त माना जाता था। सत्तरहवीं शताब्दी के थॉमस मोर की एक प्रसिद्ध किताब है -- यूटोपिया। इसमें एक आदर्श समाज का चित्र खींचा गया है। लेकिन यह आदर्श समाज कैसा है? थॉमस मूर बताते हैं कि इस आदर्श समाज में भारी शारीरिक मेहनतवाले सभी काम गुलाम ही करेंगे। जिस संयुक्त राज्य अमेरिका को स्वतंत्रता की भूमि माना जाता है, वहां 1863 तक -- आज से सिर्फ डेढ़ सौ साल पहले -- गुलाम रखने की व्यवस्था को जायज और कानून-संगत माना जाता था। उस साल अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहन लिंकन ने गुलामी की प्रथा को समाप्त करने के लिए अपने देश के दक्षिणी राज्यों के खिलाफ युद्ध छेड़ा। उत्तरी अमेरिका गुलामी की प्रथा को खत्म कर चुका था, पर दक्षिणी राज्य इसके लिए तैयार नहीं थे। अमेरिका के इस गृह युद्ध में गुलामी को बनाए रखनेवाले इलाकों की सैनिक पराजय हुई और अमेरिका के माथे से गुलामी प्रथा का कलंक मिटा।
इसी अमेरिकी संस्कृति की छाया में पल रहे आधुनिक वर्ग की क्या स्थिति हैं? यह हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि हम यह अश्लील दृश्य देखने के लिए बचे हुए हैं। कुछ समय पहले मुंबई के एक सुसज्जित होटल में देश के सबसे शानदार क्रिकेट खिलाड़ियों की बोली लग रही थी -- यह रहा धोनी -- क्रिकेट का आला खिलाड़ी। तो साहबान बोली लगाइए। इसकी रिजर्व प्राइस है अस्सी लाख भारतीय मुद्रा। एक व्यापारी बोली लगाता है -- एक करोड़। दूसरा कंधे उचका कर कहता है -- दो करोड़। कीमत चढ़ती जाती है -- ढाई करोड़... तीन करोड़.. चार करोड़... पांच करोड़। सवा पांच करोड़। साढ़े पांच करोड़। अंत में छह करोड़ पर नीलामी बंद होती है। छह करोड़ एक, छह करोड़ दो ... छह करोड़ तीन। लीजिए चेन्नई टीम, क्रिकेट की दुनिया का यह बेताज बादशाह आपका हुआ। अब आप इससे जी भर कर क्रिकेट खेलाइए। यह उफ तक नहीं करेगा। इसका खेल बेच कर आप जी भर कर कमाइए। इसके बाद ईशांत शर्मा की नीलामी शुरू हुई। यह इंडियन क्रिकेट के भविष्य का सबसे चमकता हुआ शिकारा है। आपको मालामाल कर देगा। इसकी प्राइस शुरू होती है साठ लाख भारतीय मुद्रा से। अंत में बोली तीन करोड़ बयासी लाख पर टूटती है। ईशान्त कोलकाता टीम का हुआ। ... जी हां, अब इरफान पठान का नंबर था। यह भी एक होनहार खिलाड़ी है... किसी से कमतर नहीं है। इरफान को तीन करोड़ इकहत्तर लाख भारतीय रुपए में नीलाम कर दिया गया।
अठारहवीं शताब्दी और इक्कीसवीं शताब्दी की नीलामियों के बीच बेहद फर्क है। वे गुलाम सचमुच के गुलाम होते थे। उन्हें कम से कम खुराक दी जाती थी और उनसे गधे की तरह काम लिया जाता था। गुलामी का बोझ सहते-सहते बहुत-से तो जवानी में ही मर जाते थे। आज के गुलाम शानदार जिंदगी जीते हैं। साल में करोड़ों रुपया कमाते हैं। हर महीने फॉरेन जाते हैं। लजीज खाना खाते हैं, उम्दा कपड़े पहनते हैं और राजमहल जैसे घरों में रहते हैं। इनकी अपनी प्राइवेट जिंदगी है। लेकिन खिलाड़ी के रूप में ये अपनी जिंदगी जीने के लिए आजाद नहीं हैं। जो इन्हें नीलामी में जीत कर ले गया है, वह इनसे अपनी इच्छा अनुसार खिलवाएगा। एक फर्क यह भी है कि वे गुलाम अपनी मर्जी से न तो गुलाम होते थे और न अपनी मर्जी से खरीदे या बेचे जाते थे। ये गुलाम अपनी मर्जी से नीलामी के मैदान में आ खड़े हुए हैं। स्वेच्छया गुलाम हुए हैं। वे गुलाम चौबीसों घंटे के गुलाम होते थे। इनकी गुलामी सिर्फ क्रिकेट खेलने तक है। बाकी वक्त इनका अपना है। फर्क हैं, तमाम तरह के फर्क हैं। मध्य युग और आधुनिक युग में फर्क हैं। लेकिन गुलामी तो गुलामी ही है। उसकी मूलभूत शर्तों में कोई फर्क नहीं आया है। गुलामी की अवधारणा वही है, सिर्फ ब्योरे बदल गए हैं।
बहुत पहले, किशोरावस्था में, एक फिल्म देखी थी -- कोई गुलाम नहीं। आज की फिल्म शायद इस नाम से बनेगी -- हम सब गुलाम हैं। जो लोग समझते हैं कि सिर्फ क्रिकेटर या अभिनेता-अभिनेत्रियां गुलाम हो रहे हैं, उनसे निवेदन है कि इस तस्वीर पर गौर फरमाएं। एक नौजवान डॉक्टर पचीस हजार रुपए महीने पर एम्स में लगता है। दो साल बाद मैक्स अस्पताल उसे तीस हजार रुपए पर अपने यहां ले जाता है। तीन साल बाद उसे अपोलोवाले पचास हजार रुपए महीने पर खींच ले जाते हैं। वहां दो साल गुजारने के बाद उसे इंग्लैंड या अमेरिका का कोई अस्पताल दो लाख रुपए भारतीय मुद्रा पर बुला लेता है। क्रिकेट खेलने की तरह हर जगह उसे रोगी ही देखना है। लेकिन जैसे-जैसे वह बेहतर डॉक्टर होता जाता है यानी अपनी दुनिया का धोनी, ईशांत शर्मा और इरफान पठान होता जाता है, उसकी कीमत बढ़ती जाती है।
किशोरावस्था में ही एक छोटे-से मुशायरे में मैंने एक शायर को, जो शायद ट्रेड यूनियन नेता भी थे, यह शेर पढ़ते सुना था -- वह दौरे-गुलामी था, इसको हम दौरे-गुलामां कहते हैं। क्या वह कोई भविष्यवक्ता था? नहीं, उसने कार्ल मार्क्स को पढ़ रखा था।
राजकिशोर

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)

Tuesday, February 10, 2009

आतंकवाद का गांधीवादी जवाब

बहुत-से लोग पूछते हैं कि आतंकवाद की समस्या का समाधान करने के लिए क्या गांधीवाद के पास कोई कार्यक्रम है? काश, इस प्रश्न के पीछे किसी प्रकार की जिज्ञासा होती! समाधान वहीं निकलता है जहां जिज्ञासा होती है। जब मजाक उड़ाने के लिए कोई सवाल किया जाता है, तो समाधान होता भी है तो वह छिप जाता है। यह ट्रेजेडी गांधीवाद के साथ अकसर होती है। ज्ञात गांधीवादियों ने भी ऐसी कोशिश नहीं की है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि गांधीवाद की झोली में हर समस्या का कुछ न कुछ इलाज जरूर है। दरअसल, वही विचारधारा व्यापक तौर पर स्वीकार्य हो सकती है जिसमें जीवन के अधिकांश प्रश्नों का हल निकालने की संभावना हो। लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जीवन कभी भी समस्यारहित हो सकता है। कोई भी विचारधारा यह जादू कर दिखाने का दावा नहीं कर सकती। इसलिए गांधीवादी भी अपने को सत्य का अन्वेषक ही मानता है -- सत्य का गोदाम नहीं।

जब सामना प्रत्यक्ष हिंसा -- चाहे व्यक्ति द्वारा चाहे हिंसक समूह द्वारा -- से हो, उस वक्त क्या करना चाहिए, इसका कोई तसल्लीबख्श जवाब किसी के भी पास नहीं है। तनी हुई बंदूक के सामने दिमाग फेल हो जाता है। उस वक्त मैदान संवेग के हाथ में आ जाता है। संवेगों को भी प्रशिक्षित करने की सख्त जरूरत है। अन्यथा वे अपने आदिम, अराजक रूप में प्रकट होते हैं और कई लाख वर्ष पुराना हुक्म दुहराते हैं कि ईंट का जवाब पत्थर है। क्या यह सुझाव सफलता का आश्वासन देता है? संवेग को इससे कोई मतलब नहीं। वह तो उबल रहे खून की आवाज होती है, जिसे भविष्य की कोई फिक्र नहीं होती। अगर हर मामले में र्इंट का जवाब पत्थर से देने की थोड़ी भी संभावना होती, तो र्इंट उठाने का चलन ही मिट जाता। गांधी का रास्ता अहिंसक प्रतिरोध का है, जिसमें आक्रमणकारी के प्रति भी प्रेम रहता है। अगर मानवता का अधिकांश हिस्सा इस जीवन प्रणाली को स्वीकार कर लें, तो हिंसा को मिलनेवाली सफलता का अनुपात बहुत नीचे चला जा सकता है।

जब लोग आतंकवाद के गांधीवादी समाधान के बारे में पूछते हैं, तो उनका आशय यह होता है कि सारी वर्तमान व्यवस्था यूं ही चलती रहे और तब बताओ कि गांधीवादी रास्ता आतंकवाद को खत्म करने का क्या तरीका सुझाता है। यह कुछ इसी तरह का पूछना है कि मैं यही सब खाता-पीता रहूं, मेरी जीवन चर्या में कोई परिवर्तन न आए और मेरी बीमारी ठीक हो जाए। यह कैसे हो सकता है? जिन परिस्थितियों के चलते आतंकवाद पनपा है, उन परिस्थितियों के बरकरार रहते आतंकवाद से संघर्ष कैसे किया जा सकता है? गांधीवाद तो क्या, किसी भी वाद के पास ऐसी गोली या कैप्सूल नहीं हो सकता जिसे खाते ही हिंसा के दानव को परास्त किया जा सके। जब ऐसी कोशिशें नाकाम हो जाती है, तो यह सलाह दी जाती है कि हमें आतंकवाद के साथ जीना सीखना होगा।

आतंकवाद के दो प्रमुख उत्स माने जा सकते हैं। एक, किसी समूह के साथ अन्याय और उसके जवाब में हिंसा की सफलता में विश्वास। दो, आबादी की सघनता, जिसका लाभ उठा कर विस्फोट के द्वारा जानमाल की क्षति की जा सके और लोगों में डर फैलाया जा सके कि उनका जीवन कहीं भी सुरक्षित नहीं है। गांधीवादी मॉडल में जीवन की व्यवस्था इस तरह की होगी कि भारी-भारी जमावड़ेवाली जगहें ही नहीं रह जाएंगी। महानगर तो खत्म ही हो जाएंगे, क्योंकि उनकी कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। लोग छोटे-छोटे आधुनिक गांवों में रहेंगे जहां सब सभी को जानते होंगे। स्थानीय उत्पादन पर निर्भरता ज्यादा होगी। इसलिए बड़े-बड़े कारखाने, बाजार, व्यापार केंद्र वगैरह अप्रासंगिक हो जाएंगे। रेल, वायुयान आदि का चलन भी बहुत कम हो जाएगा, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोग हर समय परिवहन के तहत रहे, यह पागलपन के सिवाय और कुछ नहीं है। वर्ष में एक-दो बार लाखों लोग अगर एक जगह जमा होते भी हैं जैसे कुंभ के अवसर पर या कोई राष्ट्रीय उत्सव मनाने के लिए, तो ऐसी व्यवस्था करना संभव होगा कि निरंकुशता और अराजकता न पैदा हो। इस तरह भीड़भाड़ और आबादी के संकेंद्रण से निजात मिल जाएगी, तो आतंकवादियों को प्रहार करने के ठिकाने बड़ी मुश्किल से मिलेंगे।

लेकिन ऐसी व्यवस्था में आतंकवाद पैदा ही क्योंकर होगा? बेशक हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन संगठित हिंसा की जरूरत नहीं रह जाएगी, क्योंकि किसी भी समूह के साथ कोई अन्याय होने की गुंजाइश न्यूनतम हो जाएगी। राज्य न्यूनतम शासन करेगा। अधिकतर नीतियां स्थानीय स्तर पर बनाई जाएंगी, जिनका आधार सामाजिक हित या सर्वोदय होगा। मुनाफा, शोषण, दमन आदि क्रमश: इतिहास की वस्तुएं बनती जाएंगी। जाहिर है, सत्य और अहिंसा पर आधारित इस व्यवस्था में सांप्रदायिक, नस्ली या जातिगत विद्वेष या प्रतिद्वंद्विता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाएगा। हिंसा को घृणा की निगाह से देखा जाएगा। कोई किसी के साथ अन्याय करने के बारे में नहीं सोचेगा। अभी तक के अनुभवों को देखते हुए यह उम्मीद करना मुश्किल है कि इस तरह का समाज कभी बन सकेगा या नहीं। शायद नहीं ही बन सकेगा। लेकिन हमें इसकी आशा भी नहीं करनी चाहिए। पूर्णता की कामना ही मनुष्य की किस्मत में है, पूर्णता नहीं। लेकिन इतिहास की गति अगर हिंसा से अहिंसा की ओर, अन्याय से न्याय की ओर तथा एकतंत्र या बहुतंत्र से लोकतंत्र की ओर है, जो वह है, तो कोई कारण नहीं कि ऐसा समाज बनाने में बड़े पैमाने पर सफलता न मिले जो संगठित मुनाफे, संगठित अन्याय और संगठित दमन पर आधारित न हो। केंद्रीकरण -- सत्ता का, उत्पादन का और बसावट का -- अपने आपमें एक तरह का आतंकवाद है, जिसमें तरह-तरह का आतंकवाद पैदा होता है। आतंकवाद सिर्फ वह नहीं है जो आतंकवादी समूहों द्वारा फैलाया जाता है। आतंकवाद वह भी है जो सेना, पुलिस, कारपोरेट जगत तथा माफिया समूहों के द्वारा पैदा किया जाता है, जिसके कारण व्यक्ति अपने को अलग-थलग, असहाय और समुदायविहीन महसूस करता है।

ऐसा नहीं मानना चाहिए कि जिन समाजों में आतंकवाद की समस्या हमारे देश की तरह नहीं है, वे कोई सुखी समाज हैं। एक बड़े स्तर पर आतंकवाद उनके लिए भी एक भारी समस्या है, नहीं तो संयुक्त राज्य अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध विश्वयुद्ध नहीं चला रहा होता। लेकिन जिस जीवन व्यवस्था से आतंकवाद नाम की समस्या पैदा होती है, उससे और भी तरह-तरह की समस्याएं पैदा होती हैं, जिनमें पारिवारिक तथा सामुदायिक जीवन का विघटन एवं प्रतिद्वंद्विता का निरंतर तनाव प्रमुख हैं। इसलिए हमें सिर्फ आतंकवाद का ही समाधान नहीं खोजना चाहिए, बल्कि उन समस्याओं का भी समाधान खोजना चाहिए जिनके परिवार का एक सदस्य आतंकवाद के नाम से जाना जाता है। इस खोज में गांधीवाद सर्वाधिक सहायक सिद्ध होगा, ऐसा मेरा अटल विश्वास है।

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)

Tuesday, February 03, 2009

बैंकिंग उद्योग के लिए एक प्रस्ताव

बैंकिग और बीमा, ये दो उद्योग ऐसे हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ये अपनी पूंजी से नहीं, अपने ग्राहकों की पूंजी से चलते हैं। जो कंपनी बीमा करती है, वह अपने पास से पैसा नहीं लौटाती। उसने जिनका बीमा किया हुआ है, उन्हीं के द्वारा जमा किए गए पैसे में से क्लेम निपटाती है। चूंकि हर साल जितने लोग क्लेम लेते हैं, उससे अधिक लोग बीमा करवाते हैं और किस्तें अदा करते हैं, इसलिए बीमा कंपनियों के पास अथाह पैसा जमा हो जाता है। बैंकों की अमीरी का रहस्य भी यही है। बैंक ऋण दे कर पैसा कमाते हैं। लेकिन यह ऋण वे अपनी जेब से नहीं देते। ग्राहकों द्वारा जमा किया गया पैसा उनकी पूंजी बन जाता है, जिससे उनमें ऋण देने की क्षमता आती है। इस तरह बैंक दूसरों के पैसे से अपना पैसा बनाते हैं। सीधे शब्दों में कहा जाए तो दोनों ही पाप करते हैं। यह निजी पूंजी नहीं है। सार्वजनिक पूंजी है, इसलिए इसका इस्तेमाल जनहित में ही होना चाहिए।

इस्लाम में सूद लेना हराम माना गया है। इसके लिए उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। इसमें कोई शक नहीं कि पैसे से पैसा पैदा नहीं होता। अमरूद के पेड़ से अमरूद पैदा होता है, गाय के पेट से बछड़ा निकलता है और स्त्री बच्चा देती है। लेकिन लोहे से लोहा पैदा नहीं होता, न लकड़ी से लकड़ी पैदा होती है। कागज का रुपया भी ऐसा ही एक निर्जीव पदार्थ है। उसमें वैसा ही कागज पैदा करने की क्षमता कहां ! फिर भी अगर सदियों से यह संभव होता रहा है, तो इसीलिए कि ऋण लेनेवाले की मजबूरी से फायदा उठाने की कोशिश की जाती रही है। उधार देना सहयोग करने की क्रिया होनी चाहिए न कि मुनाफा कमाने की।

जहां मुनाफा होता है वहीं नुकसान होने की संभावना होती है। यही कारण है कि बैंकों के डूबते रहने की घटना होती रहती है। आजादी के पहले हर साल कुछ बैंक डूबते थे और हजारों ग्राहकों का पैसा मारा जाता था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने जब बैंकिंग उद्योग को रेगुलेट करना शुरू किया, तब बैंक डूबने की घटनाएं बंद होने लगीं। अब यदा-कदा ही ऐसा होता है। उस स्थिति में रिजर्व बैंक आवश्यक कार्रवाई कर ग्राहकों के पैसे का इंतजाम कर देता है। लेकिन अमेरिका और कुछ अन्य देशों में ऐसा नहीं है। जहां बैंकों पर नियंत्रण नहीं होता, वे लालच में गलत सौदे करने लगते हैं और समय पर पैसे की वापसी नहीं होती, तो दिवालिया होने लगते हैं। बैंक ग्राहकों का पैसा डूब जाता है। इस बार अमेरिका में यही हुआ, जिससे वहां मंदी आ गई। अब अमेरिका की मंदी पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही है।

बड़ा सवाल यह नहीं है कि बैंकिंग उद्योग कैसे हमेशा फूलता-फलता रहे। मुनाफाखोरी के किसी धंधे में समाज की क्या रुचि हो सकती है। समाज का काम मुनाफाखोरी को रोकना है। बैंकिंग उद्योग अगर यह तय करे कि वह दस प्रतिशत सालाना से ज्यादा मुनाफा नहीं कमाएगा, तो यह उद्योग प्राइवेट हाथों में रह सकता है। अभी हालत यह है कि बैंक कई सौ गुना मुनाफा कमा रहे हैं। पैसा जमा करनेवालों को कम ब्याज देते हैं और ऋण लेनेवालों से ज्यादा ब्याज वसूल करते हैं। बीच का पैसा खा कर वे मोटाते जाते हैं। चूंकि ऋण देने के पीछे कोई सामाजिक लक्ष्य नहीं होता, इसलिए वे गरीबों को ऋण नहीं देते ताकि वे अपने जरूरी काम निपटा सकें, बल्कि अमीरों को (ताकि वे इस पैसे से और पैसा पैदा कर सकें) और मध्य वर्ग के लोगों को (क्योंकि इनके पास कुछ पैसा पहले से होता है) ऋण देते हैं। इस तरह बैंकिंग पैसे का खेल बन कर रह गई है, जिससे गरीबों का या वास्तविक जरूरतमंदों का कोई भला नहीं होता। गरीब भले ही ईमानदार हो और समय पर पैसा चुकाने की नीयत रखता हो, पर उसे ऋण नहीं मिलेगा, क्योंकि उसके पास जमानत देने के लिए कुछ नहीं होता।

इन सब बुराइयों का इलाज है। इलाज यह है कि पैसे पर सूद लेना और सूद देना, दोनों बंद कर दिए जाएं। यह दलाली की कमाई है। दलाली की कमाई से कोई देश फूलता-फलता नहीं है। कायदे से होना यह चाहिए कि जो लोग बैंकों में पैसा जमा करते हैं, वे उसकी रखवाली के लिए एक निश्चित मात्रा में प्रबंधकीय शुल्क दें। यह बैंक की असली कमाई होगी। इस कमाई से जरूरतमंद लोगों को ऋण दिया जा सकता है। इस ऋण पर भी ब्याज न ले कर प्रशासनिक शुल्क लिया जाना चाहिए। इन दोनों शुल्कों की राशि से ही बैंकों को अपना कामकाज चलाना चाहिए। इस तरह बैंकिंग मुनाफे का उद्योग न रह कर जन सेवा का उपक्रम बन जाएगी। इसे जन बैंकिग कहा जा सकता है।

सवाल उठता है कि रुपया जमा करनेवालों के पैसे का क्या जाए। पैसे को अचल रखना ठीक नहीं है। उसका प्रवाह बने रहना चाहिए। नहीं तो अर्थव्यवस्था कुछ हद तक ठप हो जाएगी। लेकिन दूसरे के पैसे का इस्तेमाल बहुत सावधानी से होना चाहिए। इसलिए देश के अर्थशास्त्रियों को आपस में विचार करके इस विषय में अपना मत देना चाहिए। यह हो सकता है कि इस जमा राशि का एक हिस्सा छोटे उद्योग-धंधों को बढ़ावा देने के लिए खर्च किया जाए और एक हिस्सा मध्य वर्ग तथा निर्धन लोगों को ऋण देने में खर्च किया जाए। इनसे किसी तरह की जमानत न ली जाए। जैसा कि उपर कहा गया है, ऋण की सभी रकमों पर सिर्फ प्रबंधकीय शुल्क लिया जाए। अमीर संस्थानों को ऋण देने की कोई जरूरत नहीं है। वे अपने शेयरहोल्डरों से जितना अधिक पैसा ले सकते हैं, लें और उसी से धंधा करें। जहां तक ऋण की अदायगी का सवाल है, यह जगजाहिर हो चुका है कि ज्यादातर बड़े ऋण प्राप्तकर्ता ही बैंकों को धोखा देते हैं और उनका पैसा डकार जाते हैं। जो छोटी रकमें लेते हैं, उनमें से ज्यादातर ऋण चुका देते हैं। नई व्यवस्था में जो लोग ऋण नहीं चुका पाते, उन्हें पुलिस, पंचायत आदि की सहायता से ऋण चुकाने के लिए बाध्य किया जा सकता है। बदले में उन्हें दिवालिया घोषित कर (ताकि वे भविष्य में ऋण न ले सकें) उनसे विभिन्न कार्यक्रमों में मजदूरी भी कराई जा सकती है। यह भी हो सकता है कि उन्हें श्रम जेल में डाल दिया जाए और वहां काम करवाया जाए। जब उधार की पूरी रकम चुक जाए, तो उनकी दिवालिया वाली स्थिति खत्म की जा सकती है। फिर भी बैंकों को घाटा हो सकता है। चूंकि बैंक जन सेवा कर रहे हैं, इसलिए इस घाटे की पूर्ति सरकार को करनी चाहिए। सरकार को इसलिए कि वह मुनाफा कमाने के लिए नहीं, जनता का जीवन सुगम बनाने के लिए चुनी जाती है।

सीएनबीसी टीवी चैनल में काम करनेवाली और एक समय हमारे बगल में रहनेवाली एक लड़की को, जो बिजनेस समाचार देखती है, जब मैंने यह स्कीम सुनाई, तो उसने खट से कहा कि यह तो सोशलिस्टिक बैंकिंग है। वर्तमान बैंकिंग के लिए उसने कैपिटलिस्टिक बैंकिंग की संज्ञा का उपयोग किया। निश्चय ही वह एक क्षण में मेरी बात समझ गई। क्या मैं पाठक-पाठिकाओं से खूब सोच कर यह बताने का निवेदन कर सकता हूं कि कौन-सी बैंकिंग समाज के ज्यादा हित में होगी - कैपिटलिस्टिक या सोशलिस्टिक?

राजकिशोर

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं)