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Saturday, August 21, 2010

बारिश बहा ले गई कपास और दलहन के दुख...

इस वर्ष जून में भले ही वर्षा कम हुई हो लेकिन जुलाई की वर्षा और अधिक भाव के कारण देश में कपास की बिजाई रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार 6 अगस्त तक देश के विभिन्न राज्यों में 103.37 लाख हैक्टेयर पर कपास की बिजाई की जा चुकी है जबकि गत वर्ष पूरे वर्ष में 103.29 लाख हैक्टेयर पर की गई थी। अभी तमिलनाडु में बिजाई जारी है और जानकारों का कहना है कि इस वर्ष रकबा 105 लाख हैक्टेयर के स्तर को पार कर जाएगा।
देश में बीटी कपास का रकबा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इस वर्ष 103.37 लाख हैक्टेयर में से 91.10 लाख हैक्टेयर पर बीटी कपास की बिजाई की गई है। आंध्र प्रदेश में कपास का रकबा 10.26 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 15.96 लाख हैक्टेयर हो गया है जबकि महाराष्ट्र में 33.30 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 39.22 लाख हैक्टेयर हो गया है। इन दोनों ही राज्य में शानदार वर्षा हुई है और कपास का रिकार्ड उत्पादन होने का अनुमान है।
पंजाब और कर्नाटक में भी कपास की बिजाई अधिक क्षेत्र पर की गई है लेकिन गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में रकबा कम हुआ है। व्यापारियों का कहना है कि चालू वर्ष में अधिक निर्यात के कारण देश के किसानों को कपास के ऊंचे भाव मिलें हैं। विश्व बाजार में कपास के भाव लगभग 87 सेंट प्रति पौंड के आसपास चल रहे हैं जबकि गत वर्ष 64 सेंट चल
रहे थे। सरकार घोषणा कर चुकी है कि वह नए सीजन के आरंभ में निर्यात पर लगे प्रतिबंध को समाप्त कर देगी। इससे आगामी दिनों में देश में कपास के भाव में तेजी का अनुमान है। इसे देखते हुए देश में कपास का उत्पादन 300 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलो) से ऊपर पहुंच जाने का अनुमान है। वास्तव में बीटी काटन के कारण भारत विश्व में कपास का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश बन गया है। कुछ वर्ष पूर्व तक इसका स्थान तीसरा था, लेकिन अब अमेरिका तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। पहला स्थान चीन का है। जानकारी के लिए चीन विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक, आयातक और उपभोक्ता देश है। सूती कपड़े के निर्यात में भी चीन का स्थान पहला है।

दलहन अधिक

इस वर्ष देश में दलहनों की बिजाई भी किसानों ने अधिक की है। अनेक स्थानों पर किसानों ने तिलहन के स्थान पर दलहनों की बिजाई की है। इस वर्ष दलहनों की बिजाई 88.37 लाख हैक्टेयर पर की जा चुकी है। गत वर्ष की इसी अवधि की तुलना में यह लगभग 12 लाख हैक्टेयर अधिक है। अरहर की बिजाई 27.62 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 34.13 लाख हैक्टेयर पर हो गई
है। उड़द और मूंग का रकबा भी बढ़ा है लेकिन अरहर की तुलना में कम। तिलहन के क्षेत्रफल में केवल 3 लाख हैक्टेयर की वृद्धि हुई है और 153.20 लाख हैक्टेयर पर की गई है। मूंगफली का क्षेत्रफल 35.73 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 46 लाख हैक्टेयर पर
पहुंच गया है। इसका प्रमुख कारण समय पर वर्षा के कारण आंध्र प्रदेश में रकबा 8 लाख हैक्टेयर बढ़ कर 12.57 लाख हैक्टेयर हो गया है। अरंडी का रकबा भी कुछ बढ़ा हैट लेकिन सोयाबीन, तिल और सूरज मुखी की बिजाई गत वर्ष की तुलना में पीछे चल रही है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में सोयाबीन का रकबा कम है।

चावल व मोटे अनाज
चावल का रकबा 225.75 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 244.83 लाख हैक्टेयर हो गया। मक्का के रकबे में में लगभग 3 लाख हैक्टेयर की बिजाई हुई है। बाजरा का रकबा 64.14 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 75.90 लाख हैक्टेयर हो गया लेकिन ज्वार
का रकबा कुछ कम हुआ है।

राजेश शर्मा

Sunday, August 01, 2010

मौसम की मार से छोटी इलायची के बड़े भाव

छोटी इलायची के उत्पादन पर मौसम की मार पड़ चुकी है। हालांकि इस समय मौसम फसल के अनुकूल है लेकिन पहले काफी नुकसान हो चुका है। अधिक उत्पादन की आशा अब धूमिल पड़ चुकी है और छोटी इलायची का उत्पादन गत वर्ष के बराबर ही होने का अनुमान लगाया जा रहा है। केरल के इडुक्की जिले में गर्मियों के दौरान वर्षा नहीं होने से फसल प्रभावित हुई है। वर्षा के अभाव में फल का आकार बढ़ नहीं पाया है। इस जिले में छोटी इलायची का उत्पादन सबसे अधिक होता है। गर्मी अधिक समय तक रहने के कारण नई फसल की आवक में देरी भी हो रही है। इस समय वहां पर मौसम अनुकूल चल रहा है और जानकारों का कहना है कि आगामी माह से नई फसल की आवक गति पकड़ लेगी। अब 15 अगस्त के बाद आवक जोरों पर होने का अनुमान है।

आवक कम

खराब मौसम के कारण उत्पादन प्रभावित होने से गत सप्ताह 5 नीलामियों में केवल 41 टन की आवक हुई है। इसमें से कसीपीएमसी में 12 टन की आवक हुई और पूरी बिक गई। भाव ऊंचे होने के कारण निर्यातकों की खरीद बाजार में बिल्कुल भी नहीं है। भाव अधिक होने के अतिरिक्त क्वालिटी भी हल्की है। निर्यातक ऊंचे भाव और हल्की क्वालिटी के कारण वे इस वर्ष रमजान की निर्यात मांग पूरी करने में सक्षम नहीं हैं। नीलामी में उच्चतम भाव 1,796.50 रुपए और न्यूनतम भाव 1,304 रुपए रहा जबकि औसत भाव 1,639.51 रुपए प्रति किलो रहा। इसी बीच, एक अगस्त से आरंभ हुए वर्ष के दौरान 25 जुलाई तक कुल 9,815 टन छोटी इलायची की आवक हुई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 10,298 टन की आवक हुई थी।

उल्लेखनीय है कि विश्व में छोटी इलायची केवल दो ही प्रमुख उत्पादक देश हैं। पहला स्थान ग्वाटेमाला का है जबकि दूसरा भारत का है। क्वालिटी में भारतीय छोटी इलायची बेहतर और इसकी खुशबू के कारण खाड़ी के देशों में इसकी मांग अधिक रहती है और भाव भी अधिक होते हैं। दूसरी ओर, विश्व के लगभग प्रत्येक देश में इसकी खपत होती है लेकिन सबसे अधिक खपत खाड़ी के देशों, पाकिस्तान, अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन आदि में होती है।
वर्ष 2009-10 अगस्त-जुलाई के दौरान भारत में छोटी इलायची के भाव रिकार्ड स्तर को छू चुके हैं। अब भाव में कुछ कमी आ रही है लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि दीपावली तक इनमें कुछ खास कमी आ पाएगी क्योंकि सारे त्यौहार सिर पर हैं जबकि पुराना स्टाक नगण्य है।

राजेश शर्मा

Sunday, July 25, 2010

अब तेरा क्या होगा चीनी?

देश में गन्ने की बिजाई को देखते हुए चीनी उद्योग ने आगामी सीजन के लिए उत्पादन अनुमान जारी कर दिया है। हाल ही में चीनी उद्योग ने कहा है कि एक अक्टूबर से आरंभ होने वाले चीनी वर्ष 2010-11 के दौरान चीनी का उत्पादन 255 लाख टन होने का अनुमान है। चालू वर्ष में उत्पादन 188 लाख टन होने का अनुमान है।
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष 8 जुलाई तक देश में गन्ने की बिजाई 47.37 लाख हैक्टेयर पर हो चुकी है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 41.79 लाख हैक्टेयर पर हुई थी। चीनी उद्योग का कहना है कि गन्ने की बिजाई अधिक होने के साथ ही हाल की वर्षा से उत्पादकता भी अधिक होगी और रिकवरी में भी सुधार होगा।
इससे कुल मिलाकर चीनी उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। अब तक देश में केवल दो ही बार ही चीनी का उत्पादन 250 लाख टन के आंकड़े को पार कर पाया ह। पहली बार 2006-07 में और दूसरी बार 2007-08 में। चीनी उद्योग का कहना है कि 250 लाख टन के उत्पादन और 40 लाख टन के बकाया स्टाक को मिलाकर कुल उपलब्धता 290 लाख टन ही हो जाएगी जबकि खपत का अनुमान 230 लाख टन का ही है। इस प्रकार आगामी वर्ष चीनी की अधिकता हो जाएगी। इसी को आधार मान कर चीनी उद्योग आयात पर शुल्क लगाने की मांग कर रहा है।

यकीन नहीं
एक ओर जहां चीनी उद्योग उत्पादन 250 लाख टन होने के अनुमान लगा रहा है यहीं दूसरी ओर सरकारी अनुमान 230 लाख टन का ही है। हाल ही में एक समारोह के दौरान 240 लाख टन के चीनी उत्पादन के आंकड़ों पर असहमति व्यक्त करते हुए स्वयं कृषि व खाद्य मंत्री श्री शरद पवार ने कहा था कि ‘मुझे इसका भरोसा नहीं है।’ इसी बीच, खुले बाजार में चीनी के भाव में गिरावट आ रही है। जनवरी-फरवरी में चीनी के भाव थोक बाजार में 4,300-4,400 रुपए प्रति क्ंिवटल पर पहुंच गए थे जो अब गिर कर 2,800-2,900 रुपए पर आ गए हैं।
विश्व बाजार में भी चीनी के भाव फरवरी में 30.4 सेंट प्रति पौंड का स्तर छूने के बाद अब गिर कर 17 सेंट के करीब आ गए हैं। चीनी व्यापारियों का कहना है कि चीनी उद्योग अधिक अनुमान के आंकड़े बता कर सरकार पर चीनी पर आयात शुल्क लगाने और इसे नियंत्रण मुक्त करने का दबाव बना रहा है। स्वयं कृषि भवन के अधिकारी इस समय चीनी के उत्पादन के अनुमान के बारे में कुछ भी कहने से करता रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस समय चीनी के उत्पादन के बारे मंे कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। यह समय किसी ठोस अनुमान लगाने का नहीं है।
वास्तव में अधिक उत्पादन के आंकड़े दर्शा कर चीनी उद्योग नियंत्रण से मुक्ति चाहता है। अब देखना यह है कि सरकार इन आंकड़ों को सही मानते हुए नए सीजन में चीनी को कन्ट्रोल से मुक्त कर देगी या कुछ महीनों तक उत्पादन की स्थिति का आंकलन करेगी।

राजेश शर्मा

Thursday, July 15, 2010

सात समंदर पार फैली भारतीय मसालों की खुशबू

भारतीय मसालों का वैश्विक बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्व में मसालों के उत्पादन में भारत सबसे आगे है और यहां पर लगभग 3,000 मसालों का उत्पादन होता है। छोटी इलायची, काली मिर्च, हल्दी, लाल मिर्च आदि के उत्पादन ने विश्व में भारत पहले या दूसरे पासदान पर है।हाल ही में समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान देश से सभी प्रकार के मसालों के निर्यात में 7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई और यह बढ़ कर 5.02 लाख टन पर पहुंच गया। मूल्यानुसार निर्यात 53 बिलियन रुपए से बढ़ कर 55.61 बिलियन रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। अनेक वर्षों के बाद छोटी इलायची का निर्यात चार अंकों मं पहुंचा है। वर्ष 2009-10 के दौरान 1,975 टन छोटी इलायची का निर्यात किया गया जो पिछले 10 वर्षों का रिकार्ड है। गत वर्ष केवल 750 टन का ही निर्यात किया गया था।
ग्वाटेमाला में उत्पादन कम होने के कारण भारत से सऊदी अरबिया, यूएई, कुवैत, मिस्र आदि देशों को अधिक मात्रा में निर्यात किया गया। आलोच्य वर्ष में छोटी इलायची का निर्यात 839 रुपए प्रति किलो की दर पर किया गया जबकि गत 2008-09 में 630.20 रुपए प्रति किलो की दर पर किया गया था। लाल मिर्च का निर्यात भी 9 प्रतिशत बढ़ कर 2.04 लाख टन हो गया। बोर्ड के अनुसार मलेशिया, श्रीलंका, बांग्लादेश और इंडोनेशिया आदि को अधिक मात्रा में निर्यात किया गया लेकिन पाकिस्तान को निर्यात केवलन 175 टन का किया गया। वर्ष 2008-09 में निर्यात 22,375 टन का किया गया था।
कुल मसाला निर्यात में लाल मिर्च की हिस्सेदारी मात्रा अनुसार भी और मूल्यानुसार भी सबसे अधिक है। देश से बड़ी इलायची का निर्यात 1,875 टन से गिर कर 1,000 टन का रह गया। बहरहाल, निर्यात से प्राप्त औसत भाव 121.64 रुपए प्रति किलो से बढ़ कर 178.86 रुपए प्रति किलो हो गया। धनिया निर्यात 56 प्रतिशत बढ़ कर 47,250 टन हो गया। लहसुन का निर्यात भी गत वर्ष की तुलना में अधिक रहा।
प्राप्त आंकड़ों के अनुसार काली मिर्च का निर्यात 22 प्रतिशत गिर कर 19,750 टन रह गया। इसका प्रमुख कारण अमेरिका और यूरोपीय समुदाय की मांग कम होना है।
हल्दी और जीरे के निर्यात में मामूली कमी आई और घट की क्रमशः 50,750 टन और 49,750 टन रह गया। निर्यात की यह गति अप्रैल में भी बनी रही।

राजेश शर्मा
(लेखक बैठक पर बिज़नेस और अर्थव्यवस्था से जुड़े कॉलम लिखते रहे हैं...अगर आपके पास भी इस मुद्दे से जुड़ा कोई सवाल हो तो लेखक से rajeshsharma1953@gmail.com या baithak.hindyugm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )

Sunday, September 06, 2009

चालीस रुपए की चीनी क्या मीठी लगेगी 'सरकार' ?


सरकार चीनी के भाव बढ़ा रही है। जी हां, यह सुनने में यह विचित्र लगता है लेकिन सच है। इस समय चीनी के भाव में जो तेजी आ रही है वह सरकार की शह पर है। यह बात आज वह हर व्यक्ति कह रहा है जो चीनी के गणित को जानता है।
चीनी के भाव में तेजी के बीज तो गत वर्ष ही बो दिए गए थे जब देश में गन्ने का उत्पादन कम होने के कारण चीनी के उत्पादन में कमी की आशंका पैदा हो गई थी। बहरहाल, सरकार ने उस समय कहा कि उत्पादन 220 लाख टन
होगा। बाद में इसे घटा कर 200 लाख, फिर 180 लाख टन और अंत में 160 लाख टन पर आकर रुक गई। लेकिन आज वास्तविक उत्पादन 150 लाख टन से नीचे पर सिमट गया है।
सरकार चाहती तो अब भी तेजी को रोक सकती थी जिस प्रकार मई में मिलों पर साप्ताहिक बिक्री सम्बंधी आदेश लगाकर किया था। न मालूम किस कारण से सरकार ने इस नियम को बाद में निरस्त कर दिया। यह सब जानते हैं कि इस वर्ष भी देश में गन्ने की बिजाई गत वर्ष की तुलना में कम हुई और इसका उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। पहले यह अनुमान था कि एक अक्टूबर से आरंभ होने वाले सीजन 2009-10 के दौरान चीनी का उत्पादन 200 लाख टन तक पहुंच जाएगा लेकिन अब अनुमान है कि यह 170 लाख टन से ऊपर नहीं पहुंच पाएगा।
हालांकि यह बात चीनी उद्योग जानता है लेकिन जब सरकार यह कहे कि उत्पादन कम होगा और भारत को फिर चीनी का आयात करना पड़ेगा तो इसका संदेश विश्व बाजार में अलग ही जाता है। जिस दिन भारत सरकार की ओर से कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने यह बयान दिया कि विश्व बाजार में चीनी के भाव बढ़ गए, इसका अर्थ है कि चीनी का आयात और महंगा होगा।

40 रुपए के संकेत

सरकार की ओर से बयानबाजी की बात यहीं पर समाप्त नहीं होती है। गत सप्ताह चीनी पर आयोजित एक सम्मेलन में शरद पवार ने फिर एक सुर्रा छोड़ दिया कि विश्व बाजार में चीनी के भाव बढ़ रहे हैं, इससे अक्टूबर में जो चीनी आयात होगी वह 40रुपए प्रति किलो के आसपास पड़ेगी। अर्थात वह संकेत दे रहे हैं कि मिलों को आयातित चीनी के भाव 40 रुपए प्रति किलो पड़ेंगे और उपभोक्ता अधिक भाव चुकाने के लिए तैयार रहें। साथ ही मिलों को शह भी दे दी कि वे 40 रुपए तक चीनी बेच सकती हैं। उनके इस बयान के बाद ही दिल्ली सहित देश के लगभग सभी भागों में थोक बाजार में चीनी के भाव 3350 रुपए रुपए प्रति क्विंटल के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि खुदरा बाजार में चीनी के भाव 36 रुपए प्रति
किलो के पार चले गए हैं। ब्रांडेड चीनी तो अब भी 40 रुपए प्रति किलो के आसपास चल रहे हैं।

खो जाएगी मिठास
ऐसा नहीं लगता कि उपभोक्ता के लिए चीनी में अब मिठास रह पाएगा। गत वर्ष की तुलना में भाव लगभग डबल हो चुके हैं और आगामी सीजन में भी भाव में किसी भारी कमी का अनुमान नहीं है। देश में उत्पादन तो कम होगा ही विश्व बाजार में भी उत्पादन कम होने से आयात महंगा होगा और इसका असर देश में उपभोक्ता मूल्यों पर पड़ेगा। दूसरी ओर, चीनी मिलों के मजे हैं। मुनाफा अधिक होने के संभावनाओं के कारण लगभग सभी मिलों के शेयरों में निवेशों की खरीद हैं और भाव बढ़ रहे हैं।
हालांकि सरकार ने चीनी के भाव पर अंकुश लगाने के लिए कुछ कदम उठाएं हैं, लेकिन वे नाकाफी हैं। थोक उपभोक्ताओं पर स्टाक सम्बंधी पाबंदी का कोई असर होने वाला नहीं है। थोक व खुदरा व्यापारियों पर स्टाक व बिक्री की समय की सीमा पहले से ही लागू है। हां, यदि सरकार मिलों पर अंकुश लगाए और उन्हें एक तय भाव पर चीनी बेचने के लिए कहे तो बाजार
में भाव पर कुछ काबू पाया जा सकता है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि वास्तव में सरकार को चीनी के भाव
में तेजी रोकने में कोई दिलचस्पी है ही नहीं, ऐसा उसके द्वारा उत्पादन व भाव सम्बंधी बयानों से स्पष्ट है।

राजेश शर्मा

Sunday, August 30, 2009

डेयरी उद्योग पर भी सूखे की मार

डेयरी उद्योग परेशानी मे
देश का डेयरी उद्योग इन दिनों परेशानी के दौर से गुजर रहा है। एक ओर जहां पशु आहार आदि की भाव वृद्वि से दूध की उत्पादन लागत बढ़ने से उससे तैयार पदार्थ महंगे हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर विदेशी निर्यातक भारत में सस्ते उत्पाद डम्प कर रहे हैं। इस वर्ष देश के अनेक हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति है। इससे पशु आहार और हरा चारा मंहगा हो गया है। सोयामील, राईस ब्रान खल, सरसों की खल, शीरा आदि पशु आहार तैयार करने में प्रमुख रुप से प्रयोग किए जाते हैं। पिछले कुछ महीनों में इन सबके भाव में एकतरफा बढ़ोतरी हुई है। पशु आहार महंगा होने से इसका असर दूध की उत्पादन लागत पर आ रहा है। दूध उत्पादों घी, मिल्क पावडर आदि के भाव भी बढ़ रहे हैं।

आयात

जहां एक ओर, पशु आहार महंगा होने और अन्य खर्च बढ़ने से दूध आदि की लागत बढ़ गई है वहीं दूसरी ओर विदेशों से सस्ता आयात किया जा रहा है। स्किम्ड मिल्क पावडर (एसएमपी) के अतिरिक्त बटर आयल आदि का आयात भारी मात्रा में
किया जा रहा है। सरकारी संगठन राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड यानि एनडीडीबी, टैरिफ रेट कोटा स्कीम के तहत 10,000 टन मिल्क पावडर का आयात करने की योजना बन रही है। यह आयात केवल 5 प्रतिशत के रियायती शुल्क दर पर किया जा रहा है। (कुछ समय पूर्व टैरिफ रेट कोटा स्कीम के तहत आयात शुल्क 15 प्रतिशत लगता था।) पूर्वी यूरोप के देशों में इस समय मिल्क पावडर के भाव लगभग 1,900 डालर प्रति टन चल रहे हैं। इस भाव पर आयात करने पर सभी खर्च मिलाने पर विदेशी
मिल्क पावडर की आयातित लागत लगभग 100 रुपए प्रति किलो आएगी। इसकी तुलना में घरेलू खुदरा बाजार में मिल्क पावडर के भाव लगभग 135 रुपए प्रति किलो चल रहे हैं। इसमें से डेयरी उद्योग को वास्तव में लगभग 115 रुपए प्रति किलो की ही प्राप्ति होती है।

बटर आयल
इसी प्रकार बटर आयल का आयात भी सस्ता पड़ रहा है। इसका आयात 30 प्रतिशत की दर पर किया जा रहा है। कुछ समय पूर्व आयात की दर 40 प्रतिशत थी। बटर आयल का आयात लगभग 1500 डालर प्रति टन के आयात पर न्यूजीलैंड से किया
जा रहा है। इसकी आयातित लागत भी लगभग 100 रुपए प्रति किलो ही आती है। इसे देश में देसी घी के रुप में बेचा रहा है।
घरेलू डेयरी उद्योग द्वारा जो घी तैयार किया जा रहा है उसकी लागत लगभग 200 रुपए प्रति किलो आती है। यदि इसी प्रकार डेयरी उत्पादों का सस्ता आयात जारी रहा तो निसंदेह देश के डेयरी उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और उसके बाद देश का दूध उत्पादक यानि किसान प्रभावित होगा। ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार कुछ ऐसे कदम उठाए कि किसानों के हितों की रक्षा हो सके।


राजेश शर्मा

Sunday, August 23, 2009

छोटी इलायची के बड़े भाव


नए सीजन की आवक आरंभ होने के बावजूद छोटी इलायची के भाव थमने का नाम नहीं ले रही है। उल्लेखनीय है कि आमतौर पर नई फसल के आने पर भाव में गिरावट आती है लेकिन छोटी इलायची के मामले में ऐसा नहीं है। छोटी इलायची का सीजन अगस्त से जुलाई होता है और एक अगस्त से ही केरल के तमिलनाडु के उत्पादक व नीलामी केंद्रों पर इसकी आवक आरंभ हो चुकी है। नवीनतम प्राप्त आंकड़ों के अनुसार एक अगस्त से आरंभ हुए चालू सीजन में अब तक लगभग 145 टन छोटी इलायची की आवक हुई जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 149 टन की आवक हुई थी। हालांकि आवक में मामूली ही कमी आई है, लेकिन इस वर्ष औसत भाव 680.71 रुपए प्रति किलो रहे जबकि गत वर्ष इसी अवधि मे 591.24 रुपए प्रति किलो थे। वास्तव में ऐसा नहीं लगता है कि जल्दी ही इसके भाव में कमी आ पाएगी। इसका कारण त्यौहारी मांग है व निर्यातकों की मांग है। खाड़ी के देशों को रमजान के महीने के लिए पिछले दिनों छोटी इलायची का निर्यात किया गया था। आगामी दिनों में इसकी निर्यात मांग में कुछ और वृद्वि का अनुमान है। उसके बाद दशहरा और दीपावली की मांग आरंभ हो जाएगी।

वास्तव में छोटी इलायची में तेजी का कारण गत वर्ष का बकाया स्टाक कम होना है। यही कारण है कि भाव में तेजी आ रही है। तेजी का एक अन्य कारण इस वर्ष केरल और तमिलनाडु के उत्पादक केंद्रों पर वर्षा की कमी होना भी है। इस
वर्ष मानसून के दौरान वहां पर वर्षा कम होने से पौधे पूरी तरह पनप नहीं पाए हैं और उत्पादन कम होने का अनुमान है।
गत वर्ष भी यानि 2008-09 के दौरान भी देश में छोटी इलायची के भाव में तेजी रही थी, हालांकि उत्पादन 15,000 टन के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया था लेकिन नीलामी केंद्रों पर औसत भाव भी 539.62 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गए थे। इसका कारण जहां देश में पिछला स्टाक कम होना था वहीं ग्वाटेमाला में उत्पादन प्रभावित होने से देश से निर्यात में बढ़ोतरी भी
था। इससे पूर्व वर्ष यानि 2007-08 में उत्पादन लगभग 9,000 टन था और औसत भाव 507.84 रुपए प्रति किलो रहे थे।

निर्यात

इसी बीच, चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-जून के दौरान देश से 12.80 करोड़ रुपए मूल्य की 200 टन छोटी इलायची का निर्यात किया गया जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 7.77 करोड़ रुपए मूल्य की 120 टन का निर्यात किया गया था। इस
वर्ष औसत भाव 640 रुपए प्रति किलो रहे।

राजेश शर्मा

Sunday, August 09, 2009

सोना हुआ रे बड़ा महंगा....


सोने के भाव एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं क्योंकि विश्व बाजार में इसके
भाव चार अंकों में पहुंचने जा रहे हैं। इस समय विश्व बाजार में सोने के
भाव 950 डालर प्रति औस (31.100 ग्राम) के आसपास चल रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व गत वर्ष मार्च में विश्व बाजार में सोने के
भाव 1000 डालर का स्तर पार करके 1034 डालर प्रति औंस का रिकार्ड स्तर छू
चुके हैं।
हालांकि हाल के कुछ महीनों में विश्व बाजार में सोने की मांग कुछ कमी आई
है और भारत में भी इसका आयात कम हुआ है लेकिन इसके बावजूद विश्व बाजार
में सोने के भाव बढ़ रहे है।
सोने में तेजी का कारण निवेशकों की दिलचस्पी है। इसके अलावा विश्व में
सोने के उत्पादन में भी कमी आई है और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी होना भी
है।
आस्ट्रेलिया का विश्व में सोने के उत्पादन में तीसरा स्थान है लेकिन गत
वर्ष वहां पर उत्पादन में कमी आई है। वर्ष 2008 में आस्ट्रेलिया में सोने
का उत्पादन 219 टन हुआ था जो पिछले 20 वर्षों में सबसे कम है। वर्ष 2007
में वहां पर 248 टन का उत्पादन हुआ था। वहां पर न केवल सोने के उत्पादन
में ही कमी आई है अपितु लागत भी बढ़ गई है क्योंकि खान पुरानी होने के
कारण काफी गहराई पर जाकर खनन करना पड़ रहा है और अयस्क की क्वालिटी भी
बेहतर नहीं है। अयस्क में सोने की मात्रा कम होती जा रही है।
सोने के उत्पादन में पहला स्थान चीन और दूसरा स्थान दक्षिणी अफ्रीका का है।
अमेरिका अर्थ-व्यवस्था की स्थिति, कच्चे तेल के मूल्य, उत्पादन लागत और
घटते उत्पादन लागत को देखते हुए विश्व बाजार में सोने के भाव बढ़ना
स्वाभाविक ही है।

भारत की स्थिति

विश्व बाजार में सोने के भाव बढ़ने का असर भारतीय बाजारों पर भी तेजी का आ
रहा है लेकिन तुलनात्मक कम। इसका कारण रुपए की तुलना में डालर का कमजोर होना
है।
विश्व बाजार में भारत सोने की खरीद कम कर रहा है और इस वर्ष की पहली
तिमाही में सोने का आयात 83 प्रतिशत लुढ़क कर केवल 17.7 टन ही रह गया है।
गत वर्ष इसी अवधि में 107.2 टन सोने का आयात किया गया था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में सोने की मांग कम हो गई है। वास्तव में
सोने की मांग में हर वर्ष बढ़ोतरी ही हो रही है लेकिन इसकी पूर्ति पुराने
सोने की सप्लाई से हो रही है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों ने निवेश के लिए
जेवर के बजाए ठोस सोने यानि बिस्कुट के रुप में खरीद की है वे भी मुनाफा
वसूली के लिए बाजार में इसकी बिकवाली करते रहते हैं। इससे आयात में कमी
के बावजूद घरेलू बाजार में सोने की आपूर्ति बराबर बनी रहती है।
जहां भारत के सोने के आयात में कमी आई है चीन का सोने का आयात कुछ बढ़ा है।

राजेश शर्मा

Sunday, August 02, 2009

चीनी के भाव रोकना सरकार के बस का नहीं...



पिछले कुछ महीनों से चीनी के भाव में तेजी आ रही है। सरकार भाव को काबू
में रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। सरकारी प्रयासों से चीनी के
भाव कुछ नीचे आते हैं लेकिन तुरंत ही पूर्व स्तर से भी ऊपर चले जाते हैं।
हाल ही में सरकार ने चीनी के भाव को काबू में करने के लिए कुछ उपाय किए
हैं। सरकार ने ड्यूटी मुक्त रिफाईंड चीनी के आयात की अवधि को बढ़ा कर 30
नवम्बर, 2009 कर दिया है। इसी प्रकार कच्ची चीनी के ड्यूटी मुक्त आयात की
अवधि 31 मार्च, 2009 कर दी है। इसके साथ ही मिलों के साथ व्यापारियों को
भी इसके आयात की अनुमति प्रदान कर दी है।

सरकार आश्वस्त लेकिन ?
सरकार अब आश्वस्त है कि आगामी त्यौहारी सीजन में चीनी के भाव काबू में
रहेंगे और उपभोक्ताओं के लिए कड़ुवाहट पैदा नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा लगता
नहीं है कि सरकार चीनी के बढ़ते भाव को रोक पाएगी।
उत्पादन, बकाया स्टाक, आयात को मिलाकर कुल उपलब्ध्ता और खपत का गणित साफ
संकेत दे रहा है कि चीनी के भाव कम होने की बात ही दूर वर्तमान स्तर पर
रुकने भी संभव नहीं हैं। यही नहीं आगामी सीजन में भी चीनी के भाव नीचे
आने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं।

चीनी का गणित
चालू चीनी वर्ष 2008-09 (अक्टूबर 2008-सितम्बर 2009) में चीनी का उत्पादन
147 लाख टन पर ही सिमट जाने के अनुमान हैं जबकि गत वर्ष यह 264 लाख टन
था।
चालू चीनी वर्ष के आरंभ में चीनी का बकाया स्टाक लगभग 100 लाख टन का था
(हालांकि सरकार और उद्योग में इस पर एक मत नहीं हैं।)। आयात आदि को मिला
कर चीनी की कुल उपलब्धता लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है। भाव बढ़ने के
कारण चीनी की खपत में कमी आई है और सरकार ने निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा
दिया है। इससे अब आलोच्य वर्ष में खपत का अनुमान 230 लाख टन का है।
उपलब्धता में खपत को घटाने के बाद देश में चीनी का स्टाक लगभग 30 लाख टन
बचने का अनुमान है। जबकि सरकारी व व्यापारिक अनुमानों के अनुसार किसी भी
समय देश में चीनी का स्टाक कम से कम तीन माह ही अवधि के बराबर होना
चाहिए। ये आंकड़े ही तेजी के संकेत दे रहे हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि आगामी महीनों में रिफाईंड चीनी का आयात भी
होगा और कुछ कच्ची चीनी पाईप लाईन में भी होगी लेकिन घरेलू चीनी के स्टाक
की कमी ही चीनी की तेजी को हवा देने के लिए पर्याप्त है।
इसके अलावा भारत में चीनी का उत्पादन कम होने और इसके द्वारा आयात किए
जाने से विश्व बाजार मे भाव लगातार बढ़ रहे हैं और चोटी पर पहुंच गए हैं।
इससे आयात भी महंगा होगा। व्यापारियों का कहना है कि वास्तव में आयातित
चीनी की लागत स्वदेशी चीनी की तुलना में अधिक होगी। इससे नहीं लगता कि
त्यौहारों के दौरान चीनी के भाव में कोई कमी आएगी।

आगामी सीजन

वास्तव में आगामी सीजन में भी उपभोक्ताओं के चीनी के अधिक दाम चुकाने
पड़ेंगे क्योंकि मानसून की देरी और कमी ने गन्ने की बिजाई को गड़बड़ा दिया
है।
इस वर्ष अब तक 42.50 लाख हैक्टेयर पर गन्ने की बिजाई की जा चुकी है जो गत
वर्ष की इसी अवधि की बिजाई की तुलना में 1.29 लाख हैक्टेयर कम है। राज्य
के अधिकांश जिले सूखे की चपेट में आ चुके हैं। देश के अन्य गन्ना उत्पादक
राज्यों में भी वर्षा की कमी अनुभव की जा रही है। इससे निसंदेह गन्ने के
कुल उत्पादन और उसमें रस की मात्रा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हालांकि
अभी से आगामी सीजन में चीनी के कुल उत्पादन के बारे में कुछ नहीं कहा जा
सकता है लेकिन यह तय है कि वह चीनी की घरेलू मांग को पूरा नहीं कर पाएगा।
आगामी वर्ष भी मांग को पूरा करने के लिए आयात का सहारा लेना ही
पड़ेगा।

राजेश शर्मा

Sunday, July 26, 2009

सावन में सूखा, रामा हो रामा....



अनेक वर्षो के बाद देश एक बार फिर सूखे की चपेट में आ गया है। हालांकि इस वर्ष देश में मानसून का आगमन समय से पूर्व हो गया था लेकिन बाद में पहले केरल में कुछ ठिठका और फिर अन्य क्षेत्रों में अटक गया।
उसके बाद मानसून ने गति तो पकड़ी लेकिन देरी से। एक जून से मानसून सीजन की शुरुआत होती है। आरंभ के सप्ताहों में तो मानसून औसत से 46 प्रतिशत कम था लेकिन धीरे-धीरे मानसून ने गति पकड़ी और यह कमी घटती चली गई। अब हालात यह हैं कि औसत की तुलना में अब तक मानसून की कमी केवल 19 प्रतिशत ही रह गई है।ह
हालांकि मौसम विभाग और सरकार का कहना है कि देश में वर्षा औसत की तुलना में अब केवल 19 प्रतिशत ही कम रह गई है लेकिन इस कमी की चपेट में वे राज्य आए हैं जो देश के खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
वर्षा के लिए मौसम विभाग ने देश को 36 उप-खंडों में बांटा हुआ है। नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पूर्व सप्ताह तक 36में से 20 उपखंडों में वर्षा सामान्य से कम दर्ज की गई है। इन उपखंडों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, छत्तीसगढ़ आदि राज्य आते हैं। असम में 14 और झारखंड में 4 जिलों को अब तक सूखा ग्रस्त घोषित किया जा चुका है।

आशंका है कि भविष्य में कुछ अन्य राज्यों में यही स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
वास्तव में दक्षिणी राज्यों में सामान्य से कहीं अधिक वर्षा दर्ज की गई है जिससे औसत वर्षा कुछ ठीक नजर आ रही है। दक्षिणी राज्यों की भूमिका अनाज के उत्पादन में बहुत ही कम है।

फसल तबाह
वर्षा की कमी के कारण देश में खरीफ फसलों की बिजाई बुरी तरह प्रभावित हुई है जबकि देश की कृषि अर्थ-व्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
इस वर्ष देश में अब तक चावल की बिजाई 114.63 लाख हैक्टेयर पर ही की गई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 145.21 लाख हैक्टेयर पर की गई थी। देश कुल लगभग 391 लाख हैक्टेयर पर चावल की खेती की जाती है।
बाजरा की बिजाई भी अब तक 34.67 लाख हैक्टेयर पर की गई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 46.01 लाख हैक्टेयर पर की गई थी। मक्का और ज्वार का क्षेत्रफल भी कुछ घटा है लेकिन अपेक्षाकृत कम।
तिलहनों की स्थिति कुछ इसी प्रकार हैै क्योंकि अब तक वह गत वर्ष की तुलना में केचल 3 लाख हैक्टेयर ही पीछे चल रही है। अब तक 107.10 लाख हैक्टेयर पर की जा चुकी है। मूंगफली की बिजाई अधिक प्रभावित हुई है जबकि इसमें तेल की मात्रा अधिक होती है।
दलहनों की बिजाई अब तक 38.38 लाख हैक्टेयर पर की गई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 40.73 लाख हैक्टेयर पर की जा चुकी थी। भाव ऊंचे होने के कारण अरहर की बिजाई गत वर्ष की तुलना में लगभग 3.66 लाख हैक्टेयर अधिक क्षेत्र पर की जा चुकी है लेकिन अन्य दलहनों की बिजाई घटी है। इसका असर आगामी दिनों में दलहनों के कुल उत्पादन पर पड़ेगा।
गन्ने की बिजाई भी गत वर्ष की तुलना में पीछे चल रही है लेकिन संतोष की बात है कि कपास की बिजाई गत वर्ष की तुलना में लगभग 7 लाख हैक्टेयर आगे चल रही है।

कम होगा उत्पादन
जिन फसलों की बिजाई कम हुई है निसंदेह उनका उत्पादन कम होगा और इसका आने वाले महीनों में भाव पर असर पड़ेगा। चावल व मक्का के मामले में स्टाक स्थिति संतोषजनक है लेकिन दलहनों, तिलहनों और गन्ने की स्थिति चिंताजनक है।
दलहनों के भाव तो पहले की आसमान छू चुके हैं। चीनी भी गत वर्ष की तुलना में काफी मंहगी चल रही है। आगामी दिनों में इनके भाव में और तेजी की आएगी।
तिलहनों की स्थिति अभी तक ठीक चल रही है और भाव काबू में हैं लेकिन यह सब रिकार्ड आयात के कारण ही संभव हुआ है। अब विश्व बाजार में भी भाव बढ़ने आरंभ हो गए हैं और देश में तिलहनों का उत्पादन कम होने की आशंका है। इसका असर जल्दी ही उपभोक्ताओं को नजर आएगा जब वे अगले माह की खरीद करने बाजार जाएंगे।

Thursday, July 23, 2009

दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ, लेकिन कैसे खाएं दाल?



बचपन में एक गाना सुना था- दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। शायद उस समय दाल सस्ती होती होगी जो यह कहा जाता था।
इसी प्रकार एक अन्य मुहावरा दालों पर होता था-यह मुहं और मसूर की दाल।
यानि मसूर की दाल महंगी होती होगी जो यह कहा जाता था। (अगर गलत हो तो पाठक सुधार कर दें।)
लेकिन आज के समय में यह दोनों की पुरानी कहावतें या मुहावरे पुराने पड़ चुके हैं।
दालों के भाव आसमान छू रहे हैं और दाल-रोटी पाकर संतोष कर पाना एक कठिन कार्य हो चुका है।
नया मुहावरा है यह मुहं और अरहर की दाल क्योंकि अरहर की दाल अब 88 रुपए प्रति किलो हो गई है।

महंगाई मार गई

जहां अरहर की दाल 88 रुपए प्रति किलो है वहीं साबुत मसूर का भाव 66 रुपए, साबुत उड़द 60 रुपए और दाल उड़द 66 रुपए, मूंग साबुत और दाल मूंग दोनो ही 66 रुपए प्रति किलो हैं। चना 40 रुपए और चना दाल 56 रुपए प्रति बिक रही हैं।
दालें हमारे दैनिक आहार की प्रमुख खाद्य वस्तु है और मानव शरीर के लिए आवश्यक भी है क्योंकि इनमें प्रोटीन की मात्रा सबसे अधिक होती है। प्रोटीन प्राप्ति का दूसरा स्त्रोत मांस है जिसे शाकाहारी खा नहीं सकते हैं।
देश में दालों की कमी कोई नई बात नहीं है क्योंकि उत्पादन की तुलना में खपत अधिक होती है। एक अनुमान के अनुसार देश में दालों की वार्षिक खपत लगभग 180 लाख टन है जबकि उत्पादन 130 से 148 लाख टन के बीच घूम रहा है। अपनी खपत को पूरा करने के लिए दालों का आयात करना पड़ता है। हर वर्ष दलहनों का आयात किया जा रहा है जो 25 से 30 लाख टन के बीच होता है।
गत वर्ष भी देश में दालों के भाव में बढ़ोतरी हुई थी लेकिन आयात के कारण भाव अधिक नहीं बढ़ पाए। सरकार ने दालों के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

बेकाबू अरहर

बहरहाल, इस वर्ष अरहर के बारे में हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं। इसका कारण इस वर्ष वर्षा की कमी या सूखे जैसी स्थिति है। अरहर खरीफ की प्रमुख दलहन है। देश में 2005-06 के दौरान अरहर का उत्पादन 27.38 लाख टन हुआ था जो 2006-07 में गिर कर 23.14 लाख टन होने के बाद अगले ही वर्ष सुधर कर 30.75 लाख टन हो गया था। गत वर्ष उत्पादन 25 लाख टन ही होने का अनुमान है। और चालू वर्ष यानि 2009-10 का मानसून ही मालिक है।
जहां तक विदेशों का प्रश्न है वहां पर भी अरहर के भाव में तेजी आ रही है। गत माह तक अरहर का आयात लगभग 800 डालर प्रति टन की दर पर किया जा रहा था लेकिन अब आयात 1100 डालर से ऊपर के भाव पर किया जा रहा है।

घटती उपलब्धता
देश में दालों का उत्पादन मांग की तुलना में नहीं बढ़ रहा है। इससे बढ़ती जनसंख्या के कारण दलहनों की प्रति व्यक्ति खपत कम होती जा रही है।
वर्ष 2005-06 के दौरान देश में दलहनों का कुल उत्पादन 134 लाख टन था जो 2006-07 में बढ़ कर 142 लाख टन और 2007-08 में बढ़कर 148 लाख टन हो गया। बहरहाल, गत वर्ष यह गिर कर लगभग 142 लाख टन पर आ गया है। इससे सारा संतुलन बिगड़ गया।

खपत
देश में दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी कम होती जा रही है। वर्ष 1990 में देश में प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता 41 ग्राम थी जो अब गिर कर 30 ग्राम के आसपास आ गई जबकि अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए।

उत्पादन कम क्यों?
देश में दलहनों का अधिकांश उत्पादन सिंचित क्षेत्र में होता है और वर्षा की जरा सी भी कमी उत्पादन का सारा गणित बिगाड़ देती है। दूसरा कारण अन्य देशों की तुलना में प्रति हैक्टेयर उत्पादन कम होना है क्योंकि बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध नहीं है।
यदि सरकार बेहतर किस्म व रोग तथा कीट रोधक कम समय में पक कर तैयार होने वाले बीज किसानों को उपलब्ध कराए तो किसी सीमा तक देश में दालों की कमी को पूरा किया जा सकता है।

राजेश शर्मा

Friday, July 17, 2009

बजट पर बहस : आम आदमी के लिए क्या?



विगत दिनों संसद में पेश किए गए 2009-10 के बजट को सत्तारुढ़ दल के नेताओं के अलावा अनेक उद्योगपतियों और कुछ अर्थशास्त्रियों ने आम आदमी के बजट की संज्ञा दी है। हर किसी ने इस बजट को आम आदमी का बजट कहा था। वित्त मंत्री प्रणब दा ने खूब वाहवाही बटोरी थी।
अब देखिए आम आदमी के इस बजट में उसके लिए क्या है?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि वित्त मंत्री ने आम आदमी के लिए आयकर छूट की सीमा बढ़ा दी है। इस सीमा को बढ़ाने की मांग हर वर्ष की जाती है।
वित्त मंत्री ने इस सीमा को बढ़ाया है और सरचार्ज भी समाप्त कर दिया है लेकिन इससे आम आदमी को जो राहत मिली है वह ऊंट के मुहं में जीरा ही है। जिस व्यक्ति की सालाना आय 5 लाख रुपए तक है उसे लगभग 1100 रुपए का लाभ मिला है, यानि हर माह 100 रुपए का लाभ भी नहीं।
सरकार ने `आम आदमी´ के लिए बड़ी कारों पर शुल्क घटा दिया है और एलसीडी पर शुल्क में कमी कर दी है। यह वास्तव में सराहनीय है।
आम आदमी को राहत का एक और नमूना:
सरकार ने कमोडिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (सीटीटी) को वापिस ले लिया है। इस टैक्स को गत वर्ष के बजट में लगाया गया था लेकिन व्यापारियों के विरोध कारण इसे लागू ही नहीं किया गया था। अब वित्त मंत्री ने इसे वापिस ही ले लिया था।
सीटीटी उन व्यापरियों या कारोबारियों पर लगना था जो प्रमुख कमोडिटी एक्सचेंजों में जिंसों में वायदा कारोबार करते हैं। इन एक्सचेंजों में रोजाना कागजों में करोड़ों का कारोबार होता है और केवल चंद व्यापारियों को लाखों का मुनाफा होता है। सरकार को इस मद से कई हजार करोड़ रुपए प्राप्त हो सकते थे और वह भी बिना आम आदमी को छूए बिना।
ब्रांडेड ज्यूलरी से उत्पाद शुल्क समाप्त कर दिया गया है। जूतों और स्पोर्टस के बनाने के कच्चे माल पर आयात शुल्क हटाया जा रहा है।
इससे आम आदमी को कितना लाभ होगा यह हो आने वाले समय ही बताएगा।
वास्तव में वित्त मंत्री ने अनेक वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी की है। उसका पता फिलहाल उपभोक्ता को नहीं चला है। बहरहाल, गैस स्टोव निर्माताओं ने अवश्य कहा है कि अब गैस से चूल्हे महंगे हो जाएंगे क्योंकि बजट में शुल्क बढ़ गया है।
देखिए कराधान की बात
अब कुछ वर्ष पूर्व तक वित्त विधेयक के भाग-दो में वित्त मंत्री द्वारा लगाए गए प्रस्तावों का विवरण होता था। वास्तव में बजट का लेखा-जोखा कहा जा सकता है क्योंकि उसमें इस बात का खुलासा होता था कि कौन से प्रस्ताव से सरकार को कितना नुकसान होगा या फायदा होगा। मसलन यदि किसी वस्तु पर एक्साईज शुल्क कम किया है तो सरकार को कितना अधिक राजस्व प्राप्त होगा। यही स्थिति नए शुल्क या शुल्क में बढ़ोतरी के बारे में होती थी।
इससे तुरंत मालूम हो जाता था कि सरकार ने किसी मद पर कितना अधिक राजस्व जुटाने का प्रस्ताव रखा है। बहरहाल, अब इस चैप्टर को ही समाप्त कर दिया है।
इस बजट में वित्त मंत्री ने अपने भाषण में कहा है कि अप्रत्यक्ष करों के प्रस्ताव से पूरे वर्ष में सरकार को 2000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा।
इसका सीधा अर्थ कि जनता पर 2000 करोड़ रुपए का कर बोझ लादा गया है। यह किन-किन आईटमों पर लादा गया है, यह समय बताएगा।

राजेश शर्मा

Thursday, July 09, 2009

प्रणब दा चले गांव की ओर लेकिन.......



देश की अधिकांश जनता गांवों में बसती है और ऐसा प्रतीत होता है कि यूपीए सरकार ने अपनी दूसरी पारी में पहला बजट पूरी तरह से ग्रामीण जनता को समर्पित कर दिया है क्योंकि इसमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जारी लगभग सभी योजनाओं के लिए आंबटन में बढ़ोतरी की है।
श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रहा है। हमारी 60 प्रतिशत जनसंख्या इससे अपना आहार प्राप्त करती है। उन्होंने कहा कि 2008-09 में कृषि ऋण प्रवाह 2,87,000 करोड़ रुपए था जबकि 2009-10 के लिए लक्ष्य 3,25,000 करोड़ रुपए तय किया गया है। किसानों को ऋण 7 प्रतिशत की दर से दिया जाएगा और जो किसान अपने अल्पावधि ऋण का भुगतान समय पर कर देंगे, उन्हें एक प्रतिशत की दर से सहायता देगी।
वित्त मंत्री ने ग्रामीण जनता को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी थैली खोल दी है।
उन्होंने कहा कि 2009-01 में राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन के लिए 2057 करोड़ रुपए की वृद्वि की जाएगी। अंतरिम बजट में इस मद में 12,070 करोड़ रुपए का प्रावधान था। उन्होंने कहा कि इस योजना को गत वर्ष ही लागू किया गया है और इसके परिणाम अच्छे मिल रहे हैं।

अंतर
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर को कम करने के लिए वित्त मंत्री ने भारत निर्माण योजना के बजट में गत वर्ष की तुलना में 45 प्रतिशत अधिक आबंटन किया है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युत्तीकरण योजना के तहत 7,000 करोड़ रुपए का प्रस्ताव है। यह गत वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत भी आबंटन की राशि बढ़ाई गई है।
ग्रामीण आवास निर्माण में गति लाने के लिए भी सरकार विशेष प्रयास कर रही है।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के लिए सरकार ने आबंटन में जोरदार वृद्वि की है। वर्ष 2009-10 के लिए सरकार ने 39,100 करोड़ रुपए का आबंटन किया है जो गत वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना में 144 प्रतिशत अधिक है। यह योजना 2006 में आरंभ की गई थी और इसे भारी सफलता मिली है।

आदर्श ग्राम
श्री मुखर्जी के अनुसार इस समय देश में लगभग 44,000 ऐसे गांव हैं जिनमें अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। इन ग्रामों के विकास के लिए प्रधान मंत्री आदर्श योजना नामक एक नई योजना आरंभ की जा रही है।

अच्छी बात?
यह एक अच्छी बात है कि सरकार ने ग्रामीण विकास की ओर अधिक ध्यान दिया है और ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है।
लेकिन क्या यह पूरी राशि ग्रामीण जनता तक पहुंच पाएगी। उल्लेखनीय है कि एक बार स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि सरकार जो फंड ग्रामीण जनता के लिए आबंटित करती है उसमें से लगभग 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। बाकी रकम कहां जाती है यह किसी से छुपा नहीं है।
कुछ समय पूर्व यही बात उनके सुपुत्र और युवा नेता श्री राहुल गांधी ने भी कही थी।
ऐसे में प्रश्न फिर यही उठता है कि इस बात की क्या गारंटी है कि यह पूरी रकम जनता तक पहुंच पाएगी। बेहतर होता कि प्रणब दा इस बात की भी कोई ठोस व्यवस्था करते।

--राजेश शर्मा

Sunday, June 28, 2009

गन्ने की राजनीति

विगत दिनों केंद्रीय सरकार ने एक अक्टूबर से आरंभ होने वाले चीनी सीजन 2009-10 के लिए गन्ने के एमएसपी में लगभग 32 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर करने की घोषणा की है। यह फैसला सरकार ने किसानों को गन्ने की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए किया है ताकि देश में चीनी का उत्पादन बढ़ाया जा सके। चालू वर्ष के लिए एसएमपी 81.18 रुपए था जो आगामी सीजन में 107.76 रुपए प्रति क्विटल होगा यानी 26.68 रुपए या 32 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी।
यह भाव 9.50 प्रतिशत रिकवरी यानि जिस गन्ने में 9.50 प्रतिशत रस की मात्रा हो उसके लिए है। इससे अधिक प्रत्येक 0.1 की अतिरिक्त रिकवरी होने पर 1.13 रुपए प्रति क्विटल की दर से मिलों को अधिक देना होगा।

पहली नजर में सराकर का यह फैसला देश के किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है लेकिन यह वास्तविकता से दूर है। इसके लिए जरा गहराई में जाना होगा। गन्ने के लिए तीन भाव होते हैं। एक जो केंद्रीय सरकार तय करती है यानी एसएमपी, दूसरे जो राज्य सरकारें तय करती हैं, जिन्हें एसएपी यानी सरकार द्वारा सुझाई गए जो मिलों को देने चाहिएं और तीसरे जिस भाव पर किसानों से गन्ना या खांडसारी निर्माता गन्ना खरीदते हैं।
राज्य सरकारें एसएपी राज्य के वोटरों यानी किसानों को ध्यान में रखते तय करती हैं। चालू वर्ष के लिए गन्ने की एसएमपी 81.18 रुपए प्रति क्विटल हैं, लेकिन हरियाणा सरकार ने गन्ने के भाव 165/165 रुपए तय किए हुए हैं, उत्तर प्रदेश सरकार ने 140/145 रुपए तय किए हुए हैं लेकिन वहां की मिलों ने इस वर्ष 220 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर गन्ने की खरीद की है। तमिलनाडु की मिलें स्वेच्छा से किसानों को 122/127 रुपए दे रही हैं।

महाराष्ट्र में चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में हैं और वहां पर गन्ने में रिकवरी अधिक होती है और किसानों को अन्य राज्यों की तुलना में अधिक कीमत मिलती है। गुड़ व खांड़सारी निर्माता गुड़ व खांड़सार के भाव देते हैं। इस वर्ष इन्होंने 225 रुपए प्रति िक्वंटल तक गन्ने की खरीद की है क्योंकि गुड़ के भाव 30/32 रुपए तक चले गए थे।
वास्तव में केंद्रीय सरकार द्वारा हाल ही में वृद्वि की गई है उसका सीधा लाभ महाराष्ट्र के किसानों को मिलेगा या यों कहा जाए कि यह फैसला महाराष्ट्र के किसानों को देखते हुए किया गया तो गलत नहीं है।

उल्लेखनीय है कि राज्य में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और हमारे कृषि मंत्री श्री शरद पवार इसी राज्य से हैं। वहां पर गन्ने में रिकवरी अधिक होती है और किसानों को भुगतान इसी आधार पर किया जाता है।
इस भाव वृद्वि से अन्य राज्यों के किसानों को कोई लाभ नहीं होगा लेकिन सरकार ने वाही-वाही अवश्य लूट ली है।

--राजेश शर्मा

Sunday, June 21, 2009

पिछड़ी खरीफ फसलों की बुआई, फिर महंगाई की आशंका

गत 6 जून को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान महंगाई की दर घट कर मायनस 1.61 प्रतिशत पहुंच जाना भले ही सरकार के लिए संतोष की बात हो लेकिन वर्षा की वर्तमान स्थिति आगामी महीनों में स्थिति को बदल सकती है और उपभोक्ता की परेशानियों को और बढ़ा सकती है।

शुरूआत अच्छी होने के बाद अब मानसून की स्थिति अच्छी नहीं बनी हुई है। हालांकि इस वर्ष दक्षिणी तट पर मानसून ने 23 मई को ही दस्तक दे दी थी और मौसम विभाग ने समय से पूर्व इसके आने की घोषणा कर दी है लेकिन अब मानसून की गति ठहर सी गई है। देश के अधिकांश भागों में वर्षा की कमी अनुभव की जा रही है।
मौसम विभाग के अनुसार अब तक देश में वर्षा की स्थिति अच्छी नहीं है। देश के कुल 36 मौसमीय उप-खंडों में से केवल 8 उप-खंडों में ही वर्षा सामान्य या सामान्य से अधिक हुई है। बाकी उप-खंडों में वर्षा की कमी है।
इस सीजन में देश भर में अब तक केवल 39.5 मिली मीटर वर्षा ही दर्ज की गई है जबकि आमतौर पर 72.5 मिली मीटर होती है।

बुआई
मानसून में देरी और वर्षा की कमी का असर खरीफ फसलों की बुआई पर पड़ रहा है। कृषि भवन से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक तिलहनों की बुआई 4.14 लाख हैक्टेयर पर की गई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 5.02 लाख हैक्टेयर पर की गई थी। इसी प्रकार आलोच्य अवधि में दलहनों का रकबा 1.88 लाख हैक्टेयर से घट कर 1.81 लाख हैक्टेयर रह गया है।

हालांकि सोयाबीन, तिल और सूरजमुखी की बुआई गत वर्ष की तुलना में कुछ अधिक हुई है लेकिन प्रमुख तिलहन मूंगफली का रकबा 2.39 लाख हैक्टेयर से घट कर 1.08 लाख हैक्टेयर रह गया।
दहलनों मूंग का रकबा 87,000 हैक्टेयर से घट कर 57,000 हैक्टेयर रह गया है जबकि उड़द और मूंग की बुआई गत वर्ष की तुलना में क्रमश: 7,000 हैक्टेयर औ 11,000 हैक्टेयर अधिक क्षेत्रफल पर हुई है।
दूसरी ओर, धान की बुआई 7.15 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 8.01 लाख हैक्टेयर, मक्का की 57,000 हैक्टेयर की तुलना में 1.05 लाख हैक्टेयर, ज्वार की 76,000 हैक्टेयर से बढ़ कर 91,000 हैक्टेयर और बाजरा की 5,000 हैक्टेयर से बढ़ कर 39,000 हैक्टेयर पर की जा चुकी है। कपास का रकबा भी 17.30 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 18.51 लाख हैक्टेयर हो गया है।

गिरता जल स्तर
वर्षा की कमी के कारण देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर भी लगातार कम होता जा रहा है। गत 18 जून को 81 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर केवल 15.068 बिलियन क्यूबिक मीटर रह गया जो क्षमता का केवल 10 प्रतिशत ही है।
गत वर्ष की तुलना में इस समय पानी का स्तर आधा ही रह गया है।
हालांकि मौसम विभाग जल्दी ही मानसून के सक्रिय होने की बात कर रहा है लेकिन यदि कुछ देरी हो जाती है तो खरीफ की बुआई तो कम होगी ही उत्पादकता कम होने से कुल उत्पादन में भी गिरावट आएगी।
खरीफ के दौरान मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी आदि तिहलनों, गन्ना, कपास, धान, अरहर आदि का उत्पादन प्रमुखता से होता है। अरहर के भाव पहले ही आसमान को छू रहे हैं। गन्ने की कमी से चीनी के उत्पादन में आई गिरावट के कारण उपभोक्ता को चीनी के लिए अधिक दाम चुकाने पड़ रहे हैं।
ऐसे मे मानसून की देरी या वर्षा की कमी उपभोक्ता की परेशानी को और बढ़ा सकती है।

--राजेश शर्मा

Sunday, June 14, 2009

गोदाम अनाज से फिर हुए लबालब

अनेक वर्षों के बाद अब फिर सरकारी गोदाम अनाज यानी गेहूं और चावल के स्टाक से लबालब हो चुके हैं और इसका कारण सरकारी एजेंसियों द्वारा दोनों ही अनाजों की रिकार्ड खरीद किया जाना है। इस वर्ष गेहूं और चावल की रिकार्ड खरीद की गई है।

उल्लेखनीय है कि चार वर्ष पूर्व देश में गेहूं की कमी हो गई थी, आवश्यकता को पूरा करने के लिए आयात का सहारा लेना पड़ा था। अनेक वर्षो के बाद गेहूँ का आयात किया गया था।

अदूरदर्शिता
वास्तव में सरकारी अनाज के भंडार के बारे में कोई दूरदर्शितापूर्ण नीति नहीं होने के कारण ही हमें आयात का सहारा लेना पड़ा था। हालांकि सरकार ने गेहूं व चावल के न्यूनतम बफर स्टाक की सीमा तय की हुई है लेकिन कुछ वर्ष उसका भी कोई लाभ नहीं मिला था और आयात करना ही पड़ा था।

वर्ष 2000 में भी एक बार ऐसी ही स्थिति आई थी जब देश में गेहूं और चावल की भरमार हो गई थी और इन्हें रखना एक समस्या बन गई थी। तत्कालीन सरकार ने उस समय स्टाक से निजात पाने के लिए निर्यात का सहारा लिया और निर्यात की पूरी छूट दे दी। देश में गेहूं व चावल के भाव ऊंचे थे और विदेशों में नीचे। निर्यातकों के लिए निर्यात को लाभकारी बनाने के लिए सरकार ने उन्हें रियायती दरों पर गेहूं और चावल की सप्लाई दी। सरकार ने निर्यातकों को उस समय घरेलू बाजार में प्रचलित भाव से भी नीचे पर चावल दिया। निर्यातकों ने सरकार की इस नीति का भरपूर लाभ उठावा और सरकारी गोदामों से जी भर कर अनाज उठाया। हालांकि बीच में यह चर्चा भी रही कि कुछ निर्यातक चावल को केवल कागजों पर ही निर्यात कर रहे थे और उसे घरेलू बाजार में ही बेच कर लाभ कमा रहे थे। सरकार ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। हालांकि सरकारी गोदामों में स्टाक काफी कम हो गया था लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों से निर्यात जारी रहा।

सरकारी नीति के कारण स्थिति यह गई कि एक अप्रैल 2006 को सरकारी गोदामों में केवल 20 लाख टन गेहूं का ही स्टाक रह गया जबकि बफर नार्म के अनुसार स्टाक 40 लाख टन होना चाहिए था।

आयात का सहारा
देश में गेहूं की कमी हुई और भाव बढ़ गए। इन्हें रोकने के लिए सरकार को आयात का सहारा लेना पड़ा। सरकार ने निर्यात सस्ते भाव पर किया और बाद में आयात महंगे भाव पर।
चावल के बारे में स्थिति बदतर होने से बच गई क्योंकि सरकार ने समय रहते निर्यात पर अंकुश लगा दिया था।

फिर रिकार्ड
अब सात वर्ष के बाद गेहूं और चावल की खरीद के फिर रिकार्ड बन गए हैं क्योंकि सरकार ने प्राईवेट सेक्टर पर शिकंजा कस दिया और वे बाजार से बाहर ही रहे और गेहूं व चावल की अधिकांश मात्रा सरकारी एजेंसियों को खरीदनी पड़ी।

खरीफ वर्ष 2008-09 (अक्टूबर-सितम्बर) में अब तक सरकारी एजेंसिया 300 लाख टन से अधिक चावल की खरीद कर चुकी हैं जबकि 2007-08 के पूरे वर्ष में कुल खरीद केवल 284.93 लाख टन ही थी।

इसी प्रकार रबी विपणन वर्ष 2009-10 (अप्रैल-मार्च) में अब तक 243 लाख टन गेहूं की खरीद की जा चुकी है जबकि गत पूरे वर्ष में 226.89 लाख टन की खरीद की गई थी।
इस प्रकार गेहूं व चावल दोनों ही रिकार्ड खरीद की जा चुकी है।

रिकार्ड खरीद के कारण एक मई को सरकारी गोदामों में 298.2 लाख टन गेहूं और 214 लाख टन चावल का स्टाक जमा हो चुका था। इससे पूर्व एक अप्रैल 2002 को सरकारी गोदामों में 260.39 लाख टन गेहूं और 249.12 लाख टन चावल का रिकार्ड स्टाक था।

सरकारी गोदामों में स्टाक रखना भी महंगा सौदा है। एक मोटे अनुमान के अनुसार सरकार को गोदामों में रखे स्टाक के भंडारण और रख-रखाव के लिए ही लगभग 36 रुपए प्रति टन प्रति माह खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा पूंजी पर ब्याज, प्रशासनिक व्यय, अनाज का नष्ट होना अलग से है।

ठोस नीति
सरकार कोई ठोस नीति अपना कर अधिकता या कमी की स्थिति से बच सकती है। उदाहरण के लिए यदि सरकार इस वर्ष सीमित मात्रा में गैर-बासमती चावल के निर्यात की अनुमति दे देती तो निर्यातक बाजार में खरीद करते और सरकार पर बोझ कम होता। इसी प्रकार यदि सरकार गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में तीव्र वृद्वि करती और गत वर्ष खुले बाजार में भाव कुछ सुधरने देती तो इस वर्ष व्यापारी व स्टाकिस्ट मुनाफा कमाने के लिए इसकी खरीद करते और सरकार को कम मात्रा में गेहूं की खरीद करनी पड़ती।

--राजेश शर्मा

Monday, June 08, 2009

कपास की खपत में होगा सुधार लेकिन भाव कम

काफी समय तक वैश्विक मंदे का असर चलने के बाद कपड़ा उद्योग में गतिविधियां तेज हो गई हैं। और आने वालों में महीनों में खपत और बढ़ेगी। साथ ही भारत और पाकिस्तान में आगामी वर्ष कपास की खपत में भी बढ़ोतरी होगी।
इसका असर विश्व बाजार में कपास के सप्लाई, मांग और खपत के साथ ही भाव पर भी पड़ेगा।
आगामी सितत्बर को समाप्त हो रहे वर्ष के दौरान भारत में कपास की खपत अिध्क होगी। आगामी वर्ष भी भारत में कपास की खपत में बढ़ोतरी के अनुमान लगाए जा रहे हैं। यही नहीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी कपास की खपत में बढ़ोतरी का अनुमान है।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष की अंतिम तिमाही तक विश्व में कपास की खपत में कमी आ रही थी।
आगामी वर्ष भारत में कपास का उत्पादन बढ़ कर 325 लाख गांठ हो जाने का अनुमान है जबकि इस वर्ष उत्पादन घट कर 290 लाख गांठ रह गया था।

विश्व
रिपोर्ट के अनुसार आगामी वर्ष विश्व में कपास की खपत 232.6 लाख टन होने का अनुमान है जबकि गत माह इसने 230.9 लाख टन का अनुमान लगाया था। इस वर्ष का अनुमान 227.4 लाख टन का है।
दूसरी ओर, विश्व में कपास का उत्पादन 231.3 लाख टन होने का अनुमान है जबकि गत वर्ष उत्पादन 233.5 लाख टन हुआ था। इसका कारण अनेक देशों में किसानो द्वारा कपास के स्थान पर अन्य फसलों की खेती किया जाना है।

भाव
विश्व में लगातार तीसरे वर्ष कपास के भाव में गिरावट आएगी। वर्ष 2009-10 में कपास का उत्पादन एक प्रतिशत घट कर 234 लाख टन होने का अनुमान है क्योंकि चीन, ब्राजील, तुकीZ, पश्चिमी अफ्रीका और उज्बेकिस्तान में उत्पादन कम होने की आशंका है। दूसरी ओर, भारत में कपास के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी का अनुमान है। अमेरिका मे भी कपास के उत्पादन में कुछ अधिक होने का अनुमान है।

विश्व में मिलों में की खपत 2 प्रतिशत बढ़ कर 233 लाख टन हो जाने का अनुमान है। इसके अनुसार चीन, भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, वियतनाम आदि देशों में खपत में वृद्वि का अनुमान है। अमेरिका में आगामी वर्ष भी कपास की खपत में कमी आने का अनुमान है। एशिया के कुछ छोटे देशोें और यूरोप में भी कपास की खपत में कमी की आशंका है।

स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर होने के कारण विश्व में कपास के भाव गत वर्ष की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत नीचे चल रहे हैं। आगामी वर्ष भी भाव में कमी आने की आशंका है। कपास का वैश्विक स्टाक बढ़ने का अनुमान है। वर्ष 2009-10 में कॉटलुक इंडैक्स इस वर्ष के स्तर 60 सेंट से घट कर 54 सेंट प्रति पौंड पर आ सकता है।
वर्ष 2009-10 कें अंत में विश्व में कपास का स्टाक बढ़ कर 132 लाख टन तक जा सकता है।

कारोबार
विश्व में कपास का कारोबार 8 प्रतिशत बढ़ कर 65 लाख टन होने का अनुमान है। चीनी सरकार द्वारा रिर्जव स्टाक से कपास बेचे जाने की नीति के कारण उसके आयात में 14.5 लाख टन पर मामूली वृद्वि का अनुमान है।
भारत से कपास के निर्यात में बढ़ोतरी होगी। अनुमान है कि भारत से निर्यात लगभग तीन गुणा बढ़ कर 11 लाख टन हो जाएगा। दूसरी ओर, अमेरिका से आयात का निर्यात लगभग 11 प्रतिशत घट कर 23 लाख टन रह जाने का अनुमान है।

--राजेश शर्मा

Tuesday, June 02, 2009

चीनी नहीं हो रही हजम!




पिछले दिनों वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) ने चीनी में वायदा कारोबार नए सौदों पर दिसम्बर अंत तक के लिए प्रतिबंध लगा दिया। आयोग का कहना है कि ऐसा चीनी के भाव को काबू में रखने के लिए किया गया है। बहरहाल, यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है क्योंकि चीनी के भाव तो अब नीचे आ ही रहे थे। इसका कारण अप्रैल और मई के दौरान उठाए गए कुछ कारगार कदम हैं। सरकार ने पहले तो अतिरिक्त कोटा जारी किया, लेकिन जब भाव नहीं रुके तो मिलों पर शिकंजा कसा और उनके लिए मासिक के बजाए सप्ताह के आधार पर कोटा बेचना अनिवार्य कर दिया। इसका चीनी के भाव पर तुरंत असर हुआ और चीनी के भाव घटने आरंभ हो गए। अप्रैल में जो चीनी खुदरा बाजार में 28/29 रुपए प्रति किलो बिक रही थी वह मई में घट कर 26/27 रुपए प्रति किलो पर आ गई। अर्थात दो रुपए प्रति किलो की कमी। थोक बाजार में चीनी के भाव में 250/300 रुपए प्रति क्विंटल तक की गिरावट आ गई।


सरकार की साज़िश


अब प्रश्न यह है कि जब दो माह पूर्व चीनी के भाव चोटी पर चल रहे थे और लोकसभा चुनाव भी चल रहे तो सरकार ने चीनी के वायदा कारोबार पर रोक नहीं लगाई लेकिन जब चुनाव समाप्त हो गया और यूपीए की सरकार दोबारा सत्ता में आ गई तो रोक लगा दी। इस रोक के बाद खुले बाजार में तो कोई खास गिरावट नहीं आई लेकिन वायदा कारोबार में एक बार कुछ कमी अवश्य आई। इससे उन व्यापारियों या कारोबारियों को नुकसान उठाना पड़ा जिन्होंने तेजी की आशा में वायदा कारोबार में चीनी खरीदी हुई थी। केवल दिखावा? ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार द्वारा चीनी में वायदा कारोबार पर प्रतिबंध लगाकर सरकार यह दिखाना चाहती है कि वह चीनी के बढ़ते भाव के प्रति चिंतित है और चीनी मालिकों व व्यापारियों को भाव बढ़ाने की अनुमति नहीं देगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि मिलों और व्यापारियों को अब चीनी के भाव बढ़ाने का मौका मिल जाएगा क्योंकि देश में वास्तव में चीनी की कमी है और विश्व बाजार में भी भाव लगातार तेज बने हुए हैं। इससे कच्ची या रिफाईंड चीनी का आयात कोई सस्ता पड़ने वाला नहीं है। अपितु कच्ची चीनी को आयात करने के बाद रिफाईंड करना महंगा विंसौदा साबित हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार तटीय क्षेत्रों में स्थित मिलों को यह चीनी लगभग 2600 रुपए प्रति क्विंटल पड़ेगी जबकि मिलों घरेलू चीनी को लगभग 2250 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर बेच रही हैं। अत: ऐसा नहीं लगता कि उपभोक्ताओं के चीनी के भाव में कोई स्थाई राहत मिली है। संभव है कि आगामी त्यौहारों के सीजन में चीनी के भाव में फिर तेजी आ जाए और उस समय सरकार तेजी को विदेशी बाजारों पर आधारित कह कर अपना पल्ला झाड़ सकती है।



--राजेश शर्मा

Monday, May 25, 2009

काली मिर्च रहेगी तेज

पिछले कुछ दिनों से कोची बाजार में काली मिर्च के भाव में तेजी चल रही है। यदि आंकड़ों का गणित देखें तो आगामी महीनों में इसके भाव और तेजी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

वैश्विक उत्पादन
पहले विश्व बाजार की स्थिति की बात करें। विश्व में काली मिर्च का उत्पादन पिछले कुछ वर्षों से लगातार कम होता जा रहा है। वर्ष 2003 विश्व में काली मिर्च का कुल उत्पादन 3 लाख टन था के आसपास था जो 2008 में गिर कर 2.30 लाख टन के करीब आ गया।

विश्व में काली मिर्च के प्रमुख उत्पादक देश हैं: वियतनाम, ब्राजील, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका और भारत। कोई समय था जब काली मिर्च के निर्यात में भारत सबसे ऊपर होता था लेकिन पिछले कुछ वर्ष मेंं स्थिति बदल गई है। अब काली मिर्च के उत्पादन और निर्यात में पहला स्थान वियतनाम का है।

विश्व के प्रमुख उत्पादक देशों में इस समय काली मिर्च का स्टाक कम ही बचा हुआ है। केवल ब्राजील व वियतनाम में ही कुछ स्टाक है।

भारत
अन्य देशों की भांति भारत में भी 2008-09 (नवम्बर-अक्टूबर) के दौरान काली मिर्च का उत्पादन कम हुआ है। वर्ष 2001-02 में भारत मे काली मिर्च का उत्पादन 79,000 टन के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया था लेकिन उसके बाद इसमें गिरावट ही आ रही है। अब तो इसका औसत उत्पादन गिरकर 50,000 टन के आसपास आ गया है लेकिन चालू वर्ष में तो गिर कर लगभग 42,000 टन ही रह गया। देश में सबसे अधिक उत्पादन केरल में होता है और उसके बाद तमिलनाडु और कर्नाटक का स्थान आता है।
उत्पादन में गिरावट का कारण प्रतिकूल मौसम के अलावा किसानों द्वारा खाद का कम मात्रा में प्रयोग करना और नई झाड़ियों की संख्या में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं होना है।
उत्पादन ही नहीं देश से काली मिर्च के निर्यात भी कम हो रहा है। वित्त वर्ष 1999-2000 में देश से 42,000 टन काली मिर्च का निर्यात किया गया था जो एक रिकार्ड था। उसके बाद इसका निर्यात घटता ही जा रहा है।
वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान अप्रैल से फरवरी के दौरान 23,350 टन काली मिर्च का निर्यात किया गया जो पूर्व वर्ष की इसी अवधि के निर्यात-31,760 टन-की तुलना में 26.5 प्रतिशत कम है।

चालू वर्ष में भी इसके निर्यात में सुधार की संभावना नहीं है क्योंकि भारतीय काली मिर्च के भाव अन्य देशों की तुलना में लगभग 400 डालर प्रति टन अधिक चल रहे हैैं। यह ठीक है कि अन्य देशों की तुलना में भारतीय काली मिर्च की क्वालिटी बेहतर है लेकिन आयातक देश इसके लिए 250/300 डालर प्रति टन तक ही अधिक भाव चुका सकते हैं। भाव में अधिक अंतर होने पर वे अन्य देशों की ओर रुख कर लेते हैं।

आयात
भाव में अधिक अंतर होने के कारण अब कुछ निर्यात काली मिर्च का आयात भी करते हैं। यह आयात एडवांस लाईसेंस के तहत किया जाता है और आयातित काली मिर्च को एक निश्चित अधिक के भीतर वैल्यू एडीशन करके निर्यात करना होता है। हालांकि इस स्कीम का उद्देश्य विदेशी मुद्रा कमाना होता है लेकिन कुछ आयातक व व्यापारी कथित रुप से इस स्कीम का दुरुपयोग भी करते हैं।

भाव
पिछले कुछ महीनों तक मंदे रहने के बाद भारतीय बाजारों में काली मिर्च के भाव सुधार हुआ है लेकिन अब कुछ सप्ताहों से भाव बढ़ रहे हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि आने वाले महीनों में इसके भाव में और सुधार होगा। संभव है कि एडवांस लाईसेंस के तहत वियतनाम आदि से सस्ता आयात होने के कारण काली मिर्च के भाव में कुछ गिरावट आ जाए लेकिन वह केवल कुछ समय के लिए ही होगी।

--राजेश शर्मा

Sunday, May 17, 2009

गेहूं निर्यात नहीं है संभव

भारतीय खाद्य निगम द्वारा चालू वर्ष में अधिक खरीद और सरकारी गोदामों में गेहूं का स्टाक लबालब होने के कारण ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि जल्दी ही सरकार गेहूं के निर्यात की अनुमति प्रदान कर देगी। लेकिन वास्तव में विश्व बाजार को देखते हुए देश से गेहूं के निर्यात की संभावना नजर नहीं आ रही है।

उल्लेखनीय है कि देश में गेहूं की कमी और बाजारों में बढ़ते भाव को देखते हुए सरकार ने फरवरी 2007 में गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। यही नहीं कमी को दूर करने के लिए सरकार ने प्राईवेट व सरकारी स्तर पर इसके आयात अनुमति देने के साथ ही आयात शुल्क भी समाप्त कर दिया था।

खरीद
बहरहाल, अब स्थिति बदली हुई है। गत रबी विपणन वर्ष यानी अप्रैल 2008-मार्च 2009 के दौरान सरकार ने 226.89 लाख टन गेहूं की खरीद की। एक अप्रैल से चालू हुए वर्ष के दौरान अब तक सरकारी एजेंसियां लगभग 224 लाख टन गेहूं की खरीद करक चुकी हैं और अनुमान है कि खरीद गत वर्ष के स्तर को पार कर जाएगी।

स्टाक
रिकार्ड खरीद के कारण अब सरकारी गोदामों में गेहूं की बोरियों के अम्बार लग चुके हैं। यही नहीं कुछ गेहूं खुले में भी रखी हुई है। एक अप्रैल को सरकारी गोदामों में 134 लाख टन गेहूं का स्टाक था जबकि बफर नार्म के तहत स्टाक केवल 40 लाख टन ही होन चाहिए था। अब इस सीजन की खरीद आरंभ होने के बाद एक मई को सरकारी गोदामों में गेहूं का स्टाक बढ़ कर 298.2 लाख टन हो गया है।

बढ़ते स्टाक से निजात पाने के लिए सरकार जल्दी ही 20 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दे सकती है लेकिन विश्व बाजार की स्थिति को देखते हुए भारत से गेहूं निर्यात की संभावना नजर नहीं आ रही है। अन्य देशों की तुलना में भारतीय गेहूं महंगी है जबकि क्वालिटी में कुछ हल्की ही पड़ती है।

यदि 1080 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर उत्पादक मंडियों से गेहूं की खरीद की जाए तो स्थानीय कर, मंडी शुल्क, बोरी, ट्रांसपोर्ट, बंदरगाह पर लदान आदि सभी खर्च मिला कर कांडला या मुंद्रा बंदरगाह (जहां से गेहूं का निर्यात होगा) गेहूं के भाव लगभग 14000 रुपए प्रति टन यानि लगभग 280 डालर प्रति टन पड़ेंगे। यदि यह माना जाए कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर गेहूं मिल सकती है तो भी बंदरगाह पहुंचने पर इसकी लागत लगभग 250 डालर प्रति टन आएगी।
इसकी तुलना में रशिया या यूक्रेन से जून-जुलाई शिपमेंट के सौदे 185 डालर प्रति टन पर किए जाने के समाचार हैं।
फ्रांस, जर्मनी, कनाडा आदि देशों से गेहूं लगभग 200 डालर पर मिल रही है।

आस्ट्रेलिया की बढ़िया क्वालिटी की गेहूं के सौदे लगभग 220 डालर प्रति टन पर किए जाने के समाचार हैं।
ऐसे में कौन देश भारत से गेहूं का आयात करेगा? यह सोचने का विषय है।

गेहूं उत्पाद
बहरहाल, देश से गेहूं उत्पाद यानि आटा, मैदा, सूजी आदि का निर्यात पड़ोसी देशों को अवश्य किया सकता है। सरकार निर्यात पर प्रोत्साहन देकर गेहूं के स्टाक से कुछ निजात पा सकती है।