Monday, May 04, 2009

यथा-राजा तथा-प्रजा


जी हाँ वक्त के साथ-साथ न केवल कहावतों, मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं अपितु उनकी शब्दावली में भी उलट-फ़ेर हो जाता है। पिछले जमाने में राजा का पद वंशानुगत होता था और पीढियों तक चलते-चलते प्रजा मजबूरी में राज-परिवार की फ़ितरत-स्वभाव के मुताबिक खुद को ढाल लेती थी, गुजारा जो करना था। जैसा हमने सुना है कि कई रजवाड़ों में नवविवाहिता को अपनी पहली रात मजबूरन राजमहल में गुजारनी पड़ती थी। मेरे गांव में कलानौर के नवाब के महल से पहली रात को भाग कर एक नवविवाहिता ने लगभग १२५ साल पहले शरण लेने व उसके बाद गांव वालों के कलानौर पर चढाई कर नवाब के कत्ल की कथा आज भी कही जाती है। उसके महल के बुर्ज पर लगे हवा की दिशा जानने हेतु लगाए गए यंत्र व नवाब के नगाड़े जो आज भी एक संत की समाधि-स्थल पर सुरक्षित है, को सबूत बतलाया जाता है। यह कथा आसपास के गावों तथा भांदो द्वारा आज भी गाई जाती है। खैर यह कथा एक ओर।

आज देश में प्रजातन्त्र है, यानी प्रजा अपना राजा या प्रतिनिधि चुनने में स्वतंत्र है, तो हम कह सकते हैं कि जैसी प्रजा है वैसा राजा होगा। मैं, आप यानी प्रजा यह मानने को कतई तैयार न होगी कि गैंगस्टर-अपराधियों को चुनने में उसका कोई दोष है। हम सब विकल्प न होने की दुहाई देने लगते हैं- क्या मैं गलत कह रहा हूँ?
पर हम यानी जनता-जनार्दन खासी तंग है अपने चुने गये प्रतिनिधियों से। तो क्या करें ? हमें इस चुनाव तथा आगे आने वाले चुनावों में कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिये।

हम सब जानते हैं कि पिछले कुछ बरसों से देश में संयुक्त मोर्चा सरकारें राज कर रहीं है क्योंकि कांग्रेस या भाजपा दोनो तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियाँ बहुमत प्राप्त नहीं कर पा रहीं और उन्हे क्षेत्रिय दलों की वैशाखी पर आश्रित रहना पड़ता है। और उनकी ब्लैकमेलिंग तो हमने पिछली लोक सभा के शक्ति परीक्षण काल में देखी ही है, शिबू सोरेन और देवगौड़ा एक दिन में ही 3-4 बार इधर-से उधर होते नजर आए। हम यह भी जानते हैं (आज मीडीया आंकड़े दे रहा है) कि ये क्षेत्रिय दल ही सब से ज्यादा अपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी खड़े करते हैं, जो अपने धन-बल व जातीय समीकरण द्वारा जीत भी जाते हैं। अब ऐसे तत्वों की जीत की संभावनाओं के चलते राष्ट्रीय पार्टियाँ भी उन्हें टिकट देने को मजबूर हो गयीं, मैं यह नहीं कहता कि ये तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां दूध-धुलीं हैं। वे तब तक ऐसे तत्वों को टिकट देंगी, जब तक वे जीतते रहेंगे। तो हमें चाहिये कि
इस चुनाव व आगे आने वाले चुनावों में भी केवल इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों को ही वोट दें चाहे वह कैसा ही हो। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां का उम्मीदवार न हो वहां भी क्षेत्रिय पार्टी के उम्मीद्वार के स्थान पर किसी निर्दलीय कोवोट दें। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों में किसी पार्टी ने दल-बद्लू को टिकट दी हो वहां उसे वोटे न दें।

इससे आज ही कोई परिणाम आएगा ऐसा नहीं है लेकिन धीरे-धीरे हवा बदलेगी और जब इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों को जनता की मनसा का ज्ञान होने लगेगा तो वे खुद भी इस और ध्यान देंगी। तब जनता इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उस उम्म्मीद्वार को नकारना आरम्भ करेंगे जो आपराधिक पृष्ठभूमि का होगा।
हमें (हम पढे लिखे लोगों) को यह अभियान केवल चुनाव के समय ही नहीं अपितु सतत जारी रखना होगा, जिससे अगले-उससे अगले चुनाव तक आमजन इस बात को अपना ले और सच मानें आमजन जो ब्लॉगिंग नही जानता, अब इस बात को मानता है कि देश में दो पार्टियां ही होनी चहियें, उसे जरूरत है मार्ग-दर्शन की। यह विश्वास दिलाने की कि ऐसा संभव है। अब तक ये आपराधिक तत्व उन्हे विश्वास दिलाने में काम्याब रहें है कि उनकी जाती का सासंद-विधायक ही उनका भला कर सकता है, पर अब वे भी जान गये हैं कि यह केवल दिखावा है और वे आपकी रहनुमाई की राह देख रहे हैं। इस चुनाव में हरियाणा की जनता का मूड देखकर मैं यह बात कह रहा हूं और चुनाव नतीजे बतला देंगे कि मेरा आकलन सही है या गलत है। केवल कुछ दिनों की बात है।
आगे चलकर हम ब्लॉगिंग व सेमिनारों-सभाओं मे जहां ये सांसद-इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के बुलाए जाएंगे इन्हें ही कुछ बातें पहुंचाएं (हम हरयाणा मे ऐसा करने में लगे है)कि

  1. संसद में ऐसा नियम कानून लाया जाए कि किसी पार्टी में अगर किसी पार्टी का विघटन होता है, तो जो घटक एक पार्टी से समर्थन वापिस लेकर (जिसे अब तक पूरी पार्टी समर्थन दे रही थी) दूसरी पार्टी को समर्थन देना चाहे तो उसे इस नई पार्टी में विलय होना पड़ेगा अन्यथा उसके सदस्यों की सदन सदस्यता स्वत: खत्म हो जाएगी (ऐसा अब तक तब होता है जब इन की संख्या पार्टी की अविभाजित संख्या के एक तिहाई से कम हो)।

  2. यही नहीं अगर कोई पूरी की पूरी पार्टी भी एक मोर्चे से समर्थन वापिस लेकर दूसरे मोर्चे का समर्थन करना चाहे तो उसे भी दूसरे मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे विलय करना पड़ेगा।

  3. किसी को भी बहुमत प्राप्त न होने पर अगर कई पार्टियां मिलकर सरकार बनाना चाहें तो उन्हें अपनी पार्टी का विलय उस मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे करना अनिवार्य कर दिया जाए।

  4. चुनाव में अगर किसी पार्टी को कम से कम 5 राज्यों में प्रतिधित्व प्राप्त नहीं हो तो उसके सदस्यों का किसी राष्ट्रीय पार्टी में विलय अनिवार्य हो। अगर वे ऐसा न करें तो उनकी सदस्यता खत्म कर दी जाए।

  5. निर्दलीय सदस्य अगर किसी एक मोर्चे में शामिल होने के बाद अपना समर्थन वापिस लेना चाहे तो उसकी सदस्यता खत्म हो।


यह सच है कि ऐसा होना अभी संभव नहीं है लेकिन अगर देश के बुद्धिजीवी लामबंद हो जाएं तो निकट भविष्य में स्थिति अवश्य सुधरेगी।
आमजन को अगर दिशा दी जाए तो वह करने को तैयार रहता है। हमारे देश में एमरजेंसी के बाद के चुनाव, बोफ़ोर्स के बाद के चुनाव व बर्लिन की दीवार का टूटना-सोवियत संघ व ईस्टर्न यूरोप की तथाकथित तानाशाहियों का टूटना,आमजन की ताकत का नमूना नहीं तो क्या हैं ? जरा सोचें

कुछ और विकल्प
एक अन्य विचारधारा- हमें अमेरिकन यानि राष्ट्रपति पद्धति अपनानी चाहिये, जिससे यह अनिश्चितता खत्म हो जाए। सरकार गिरने का खतरा न रहे। अगर आप ध्यान करें तो देखें केवल दो उदाहरण- बिल क्लिंटन कांड अगर हिन्दुस्तान में होता (जब बिल क्लिन्टन अपने रक्षामन्त्री से बात कर रहा था तो मोनिका लेविन्सकी से संलग्न था), क्या भारतीय प्रधानमन्त्री ऐसी बात उजागर होने पर इस्तीफ़ा देने को बाध्य नहीं होता? ब्रिटेन में प्रोफ़्मयो कांड का उदाहरण देखें।
हमारे यहां न्यूक्लियर संधि में मनमोहन की कुर्सी ही नहीं, सरकार भी येन-केन प्रकारेण बची, लेकिन जनाब बुश तो गलत रिपोर्ट बनवाकर इराक पर हमला कर बैठे। क्योंकि उन्हें तानाशाह जैसी ताकत हासिल थी।

एक और विचार- चुनाव में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलें उतने ही सांसद उसे मिल जाने चाहियें। दोस्तो, हमारे समाज मे जाति-धर्म का दुरुपयोग चुनाव में जिस तरह होता है, यह तरीका उसे और बढावा देगा। मित्रो, हमारे पुरखों ने जो आजादी की लड़ाई से तपकर कुन्दन बनकर निकले थे और उस वक़्त उनके दिमाग में आमजन की भलाई व आमजन की स्वतंत्रता कायम रखने व उनके मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के अलावा कोई और विचार नहीं था। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सविंधानो को पढ़कर-मनन कर एक बेहतरीन संविधान हमें दिया था, जिसमें जो कमियां नजर आईं उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता दूर भी करने के प्रयत्न जारी हैं। जैसे दल-बदल पर कानून, सूचना का अधिकार अधिनियम आदि। मुझे लगता है कि अगर वोटर सही प्रतिनिधियों को चुनकर भेजेंगे तो आमजन के कल्याण हेतु और भी नियम बनेंगे। हमारा संविधान एक बहुमूल्य दस्तावेज है। बस यह जिनके (हमारे) लिये बनाया गया है, उन्हें जागरूक रहना है।

लेखक- डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

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3 बैठकबाजों का कहना है :

Rajesh Sharma का कहना है कि -

desh mein change laane ke liye hame ek smt. Indira Gandhi ki jaroorat hai aur ek J.P. ki. kaaran chahe koi bhi raha ho satta/raaj mein change to keval do ke hi kaaran aayaa tha. kaash, aaj inmese koi ek bhi hota.

dschauhan का कहना है कि -

बिन्दु संख्या 4 को छोड़कर बांकी सभी बिन्दु उचित हैं!

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

kya kahoon kuchh kaha naheen jaaye...

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