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Tuesday, August 25, 2009

माँओं ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया...

शायर अहमद फ़राज़ की पहली पुण्यतिथि पर


अहमद फ़राज़ एक ऐसा नाम जिसके बिना उर्दू शायरी अधूरी है. आज अगर एशिया में इश्किया शायरी में फैज़ अहमद "फैज़" के बाद किसी शायर का नाम आता है तो वो हैं अहमद "फ़राज़". आज उनकी ग़ज़लें हिन्दुस्तान और पकिस्तान के अलावा कई और मुल्कों में भी मशहूर हैं. जहाँ भी इंसानी आबादी पाई जाती है. उनकी ग़ज़लें पढ़ी और सुनी जाती है.

अहमद फ़राज़ साहब की पैदाइश पकिस्तान के नौशेरा जिले में 14 जनवरी 1931 को को एक पठान परिवार में हुई. उन्होंने पेशावर युनिवर्सिटी से इल्म हासिल किया और वही पर कुछ वक़्त तक रीडर भी रहे. उनका विसाल (निधन) 25 अगस्त, 2008 को इस्लामाबाद के एक अस्पताल में हुआ. वो गुर्दे की बीमारी में मुब्तिला हो चुके थे. उन्हें पकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान हिलाल-ऐ-इम्तियाज़ भी हासिल था. इसी के साथ उन्हें कई और गैर मुल्की सम्मान भी मिले था.

फ़राज़ साहब की मकबूलियत और शोहरत का अंदाजा एक वाकये से लगाया जा सकता है. एक दफा अमेरिका में उनका मुशायरा था जिसके बाद एक लड़की उनके पास आटोग्राफ लेने आयी। नाम पूछने पर लड़की ने कहा "फराज़ा". फराज़ ने चौंककर कहा "यह क्या नाम हुआ?" तो बच्ची ने कहा "मेरे मम्मी पापा के आप पसंदीदा शायर हैं। उन्होंने सोचा था कि बेटा होने पर उसका नाम फराज़ रखेंगे। लेकिन बेटी पैदा हो गयी तो उन्होंने फराज़ा नाम रख दिया।"

इस बात पर एक शे'र कहा था.

"तुझे और कितनी मोहब्बतें चाहिए फराज़,
मांओ ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया"


क्या कहते हैं दूसरे शायर

फ़राज़ की शायरी ग़में दौराँ और ग़में जानाँ का एक हसीन संगम है। उनकी ग़ज़लें उस तमाम पीड़ा की प्रतीक हैं जिससे एक हस्सास (सोचने वाला) और रोमांटिक शायर को जूझना पड़ता है। उनकी नज़्में ग़में दौराँ की भरपूर तर्जुमानी करती हैं और उनकी कही हुई बात, जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है।
कुंवर महेंद्र सिंह बेदी "सहर"

आज के दौर में भारत और पाकिस्तान की बंदिशों को नहीं मानने वाले लोगों की बेहद कमी है। पाकिस्तान में रहते हुए जिस तरह की परेशानियों को उन्होंने झेला और उसके बाद भी इंसानी आजादी और मजहब के भेदभाव से ऊपर उठकर लिखा वह काबिले तारीफ है।
डॉ. अली जावेद
(नेशलन काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के निदेशक)

फराज़ उर्दू रोमांटिक शायरी का ऐसा नाम है जिसकी गज़लों और नज्मों से तीन पीढ़ियां वाकिफ है। इस वक्त उनके जितने शेर लोगों को याद है उतने शायद ही किसी अन्य शायर के हों
मशहूर शायर मुमताज राशिद

फ़राज़ अपने वतन के मज़लूमों के साथी हैं। उन्हीं की तरह तड़पते हैं, मगर रोते नहीं। बल्कि उन जंजीरों को तोड़ते और बिखेरते नजर आते हैं जो उनके माशरे (समाज) के जिस्म (शरीर) को जकड़े हुए हैं। उनका कलाम न केवल ऊँचे दर्जे का है बल्कि एक शोला है, जो दिल से ज़बान तक लपकता हुआ मालूम होता है।
मजरूह सुल्तानपुरी
इसी तरह से उनकी वतनपरस्ती की एक मिसाल मिलती है. पश्चिम एशिया के अरबी बोलने वाले मुल्कों में एक जश्ने-शायराँ (काव्योत्सव) बहुत मशहूर है—अल मरबिद पोयट्री फेस्टिवल. उसमें तमाम मुल्कों से अलग-अलग ज़बानों के मशहूर शायर हिस्सा लेने के लिए बुलाये जाते हैं. उसी में पाकिस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने आए थे जनाब अहमद फ़राज़. हिन्दुस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने के लिए भेजे गए थे जनाब रिफ़त सरोश. यह वह वक़्त था जब इराक़ की लड़ाई ईरान से चल रही थी और ख़ूब घमासान चल रहा था.

तमाम मुल्कों के शायर बग़दाद में मौजूद थे. इराक़ी हुकूमत को लगा कि यह बढ़िया मौक़ा है दुनिया भर के शायरों को ‘ईरान की ज़्यादतियों को दिखाने का'. इसलिए उन्होंने काव्योत्सव के एक दिन पहले जंग के मोर्चे पर ले जाने के लिए एक बस का इन्तज़ाम किया और सभी को एक-एक यूनिफॉर्म पकड़ाना शुरू कर दिया। सबब यह बताया गया कि जंग के मोर्चे पर जा रहे हैं तो जंग की पोशाक ही होनी चाहिए। हिफाज़त के मद्देनज़र यह ज़रूरी है. तमाम मुल्कों के शायर पोशाक की पुलिन्दा लेकर बस में जा बैठे। जब एक भारत से गए हिंदी कवि का नंबर आया तो वह अड़ गए कि मैं यह नहीं पहनूंगा. इंचार्ज इराक़ी कमाण्डर उसे समझाने आया तो उन्होंने उसे समझाना शुरू कर दिया और बताया कि मैं बसरा से एक बार उस इलाक़े को देखने एक पत्रकार के रूप में सादे लिबास में जा चुका हूँ। दुबारा अगर आप उस इलाक़े में ले ही जाना चाहते हैं तो मैं जैसा हूँ, भारतीय, वैसा ही चलूँगा. आपकी फौजी वर्दी पहनकर हर्गिज़ नहीं जाऊँगा। कभी अगर फौजी वर्दी पहनने का अवसर आया भी तो अपने देश के लिए पहनूँगा, इराक़ या ईरान के लिए नहीं। अफसर ज़रा तन्नाया लेकिन कर कुछ न पाया। उसने तुरुप चाल चली कि अगर मोर्चे पर आपको कुछ हो गया, गोली ही लग गई तो ?

"तो मैं, ज़ाहिर है कि मर जाऊँगा। लेकिन मरूँगा तो भारतीय. आपकी सैनिक वर्दी में अगर मरा तो मेरी पहचान भी सही न हो सकेगी," उन्होंने कहा।

उन हिंदी कवि के साथ साथ रिफ़त सरोश साहब भी अड़ गए. और लोग भी मेरी इस दलील में शामिल न हो जाएँ, इस डर से वर्दी न लेने वाले लोगों को साथ न ले जाना मुनासिब पाया गया और वह वापस रिफ़त साहब के साथ होटल लौट आये. लॉबी में देखा कि फ़राज़ साहब पहले से ही कुछ चाहने वालों के साथ बैठे हैं।

उन्होंने ही टोका : ‘तो आप लोग भी नहीं गए?’
‘जी नहीं ! हमें उनकी वर्दी पहनना गवारा नहीं था.’ हिंदी कवि ने कहा।
‘निहायत अहमक़ाना ज़िद थी। मैं भी इसी वजह वापस आ गया।’ फ़राज़ साहब ने कहा।

फिर हिंदी कवि ने मजाकिया लहजे में कहा कि इतने लम्बे-तगड़े पठानी बदन पर कोई इराक़ी वर्दी फिट भी तो नहीं आ सकती थी, फ़राज़ साहब। इतने ख़ूबसूरत बदन के सामने वर्दी को खुदकुशी करनी पड़ती और उन्होंने फ़राज़ साहब की ही ग़ज़ल का एक शेर उन्हें नजर किया :

जिसको देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है।
शहर का शहर हुआ दाखिले-ज़िन्दा जानाँ!


फ़राज़ साहब को जिन दो ग़मों ने ज़िन्दगी भर परेशान किया. वो हैं उन्हें देश निकला दे देना और पकिस्तान में जम्हूरियत कायम न हो पाना.

उन्होंने एक ग़ज़ल कही थी.

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है तो जमाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ
जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ


कुछ लोगों का कहना है कि यह ग़ज़ल फ़राज़ साहब ने अपनी महबूबा के लिए कही थी तो कुछ लोगो का कहना है कि उन्होंने यह ग़ज़ल पुष्पा डोगरा के लिए कही थी जो कि भारतीय कत्थक डांसर थी. लेकिन अहमद फ़राज़ साहब का कहना था कि यह ग़ज़ल उन्होंने पकिस्तान की जम्हूरियत के लिए कही. फर्क सिर्फ इतना है कि उसे अपनी महबूबा मान लिया है.

दूसरा गम उन्हें देश निकाला से मिला था. अपने इस गम को कितनी खूबसूरती से उन्होंने अपने अश'आर में कहा है.

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़न्दगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा।

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफर में रहा।


हिजरत यानी देश से दूर रहने का दर्द और अपने देश की यादें अपनी उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें :

वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है।

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है।

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है।


फ़राज़ साहब हिन्दोस्तानी मुशायरों में उन्हें बख्शी गई इज़्जत का बयां करते नहीं थकते थे.

"हिन्दुस्तान में अक्सर मुशायरों में शिरकत से मुझे ज़ाती तौर पर अपने सुनने और पढ़ने वालों से तआरुफ़ का ऐज़ाज़ मिला और वहाँ के अवाम के साथ-साथ निहायत मोहतरम अहले-क़लम ने भी अपनी तहरीरों में मेरी शेअरी तख़लीक़ात को खुले दिल से सराहा। इन बड़ी हस्तियों में फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, डॉक्टर क़मर रईस, खुशवंत सिंह, प्रो. मोहम्मद हसन और डॉ. गोपीचन्द नारंग ख़ासतौर पर क़ाबिले-जिक्र हैं"

वैसे तो फ़राज़ एक ग़ज़ल कहने वाले शायर कि हैसियत से जाने जाते हैं. लेकिन उनकी नज्मों का भी कोई सानी नहीं है.

ये दुख आसाँ न थे जानाँ
पुरानी दास्तानों में तो होता था
कि कोई शाहज़ादी या कोई नीलम परी
देवों या आसेबों की क़ैदी
अपने आदम ज़ाद दीवाने की रह तकते


फ़राज़ साहब को गुज़रे एक साल हो गया मगर उनकी शाइरी आने वाली कई पीढ़ियों को रोशनी देगी....

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


शामिख फ़राज़
(लेखक हिंदयुग्म के यूनिपाठक भी हैं...)

Thursday, August 20, 2009

कवि की आवाज़ सुन बेहोश हुए यमराज !!

बात की बात! हमारे मुहल्ले के कवि महोदय लौट आए ....

हुआ यों कि पिछले हफ्ते अचानक हमारे मुहल्ले के कवि महाराज हम सबको बिन बताए एकाएक मुहल्ले से कूच कर गए। उनके जाने पर भाभी से ज्यादा कविता ने रो-रो कर अपना वो हाल कर दिया था कि मत पूछो। थक हार कर हमने एक शरीफ सा बंदा जबरदस्ती पकड़ कर कविता के हवाले कर दिया । बंदा बहुत रोया चिल्लाया,`मैं तो क्या, मेरे किसी पुरखे तक ने कभी कविता के साथ एक पल भी नहीं काटा,ऐसे में मेरे साथ क्यों अन्याय कर रहे हो। मुझे मारना ही है तो जहर देकर मार दो। मैं जहर खुशी से पीने के लिए तैयार हूं पर कविता के साथ एक पल भी रहना मुझे स्वीकार नहीं।´ पर मुहल्ले में था ही कौन, जो उसकी सुनता।

चार दिन तक उनकी कविता की चार पंक्तियां याद रहीं और बिजली-पानी का बिल आते ही वे भी भूल गईं। आज के दौर में न कविता याद रखने की चीज है न कवि। आटे-दाल से फुर्सत मिले तो तो कविता याद रहे, कवि याद रहे। आज के दौर में तो कम्बख्त खुद को भी भूलने की बीमारी होने लगी है। कवि तो याद रखने की चीज होता ही नहीं, सो रिश्तेदारों की तरह मुझे वह भी भूल गया। अब औरों की तरह वह भी उसकी पुण्यतिथि को याद आ जाया करेगा, वह भी तब अगर भाभी ने उस दिन कुछ खाने-पीने का इंतजाम कर दिया तो....सच मानिए, अब तो बिना मतलब के मैंने अपने आप को भी याद रखना छोड़ दिया है।

कल सुबह कुत्ते के साथ घूमने निकला ही था कि सामने से गए कवि सा कोई आता दिखा। वैसे ही खांसता हुआ, चालीस का होने के बाद भी वैसे ही साठ का सा कुबड़ाता हुआ। पहले तो मैंने सोचा कि मन का भूत होगा। इस संसार से गए हुओं में से सब लौट कर आ सकते हैं पर कोई कवि भूल कर भी ये भूल करने वाला नहीं। मैं डरा भी, अगर सच्ची को कवि ही होगा तो दस कविताएं सुना कर ही छोड़ेगा। इतने दिनों से किसी को कविता सुनाई नहीं होगी। हो सकता है बेचारा कब्ज से परेशान हो। कुत्ते ने उसे देख भौंकना शुरु किया तो मैं समझ गया कि बंदा तो कोई न कोई है जरूर। मेरे मन का भूत होता तो कुत्ता तो कम से कम न भौंकता।

और वह पूरे का पूरा कवि मेरे बिलकुल सामने। ठीक वैसा ही जैसे वह पंच तत्व में विलीन ही न हुआ हो।
`क्यों राम आसरे भैया कैसे हो, मुहल्ले में सब कुशल तो हैं? घरवाली के चूल्हे पर तवा चढ़ा कि नहीं... किसी रचना-वचना का कोई मनीआर्डर वार्डर आया होगा, क्यों...
कवि ने पेट पकड़े हंसते हुए पूछा तो मेरी तो जैसे घिग्घी ही बंध गई।

`तुम!! तुम यार! तुम तो.....´

`दुनिया मरा करती है भैया! लेखक नहीं। मुहल्ले के बिना रहना मुश्किल-सा हो गया था सो सब छोड़ चला आ गया। ´
`पर आए कैसे, कहते हैं कि प्रेमिका के चंगुल से आदमी छूट कर आ सकता है पर यमराज के चंगुल से नहीं।´

`बस आ गया तो आ गया।´
कह उसने ऐसा ठहाका लगाया कि... पास वाले कब्रिस्तान के चार मुर्दे कब्र छोड़ बाहर आ गए।

`यमराज को पटा लिया भाई जान!´
`यमराज को !! यार यहां तो चालीस साल तक नौकरी की पर एक अदद साहब नहीं पटा और तुम हो कि .... बड़े घाघ निकले यार...´

` असल में यहां से जाते-जाते कविताओं की डायरी साथ ले गया था। सोचा था, वहां पर अगर श्रोता मिल गए और उन्होंने कविता सुनाने की मांग कर दी तो....
चलते-चलते यमराज ने मुझसे चुप्पी तोड़ते पूछा- क्या करते थे´

`हजूर कविता करता था।´
मैंने बीमारी से सिकुड़ा सीना चौड़ा करते कहा।

`ये कविता क्या होती है´ यमराज ने सहमते हुए पूछा।

` मन के अंग अंग को खिला देती है। सदियों की थकान को मिटा देती है। मरे हुए मन में भी जीने की इच्छा जगा देती है जनाब!´

`यार! युगों हो गए मुर्दे ढोते ढोते। बहुत थक गया हूं। विश्राम कर लेते हैं, कोई कविता साथ लाए हो तो सुना दो।`

`बस! यमराज के कहने भर की देर थी कि मैंने बगल में दबाई डायरी खोल डाली। एक कविता, दूसरी कविता, तीसरी कविता......´

`तो´

`तो क्या! पहली बार कोई विशुद्ध श्रोता मिला था। वरना आज तक टमाटर, जूते फेंकने वाले ही अधिक मिले। वे कविता सुनते सुनते बेहोश हो गए। पर मुझे लगा कि ज्यों वे कविता में लीन हों। मैं बिन रूके तीन दिन तक वहीं बैठे बैठे कविता सुनाता रहा। जब उन्हें होश आया तो वे चीखे...´

` कैसे´

`ठीक वैसे ही जैसे यहां के कवि सम्मेलनों में श्रोता आधे घंटे बाद ही चीखने लगते हैं। श्रोता चाहे स्वर्ग के हों या नरक के, सब एक जैसे ही होते हैं बंधु!´

`तो´

`तो क्या! यमराज ने अपने कानों में उंगलियां देते पूछा-कविता कब तक सुना सकते हो´

` जब तक लोक में टमाटर रहेंगे।´

`तो यार एक काम करता हूं। तुम अपने लोक वापस चले जाओ। जाओ मैं तुम्हें मृत्यु के बंधन से मुक्त करता हूं। मेरे लोक में आत्माओं को उनके कर्मों की सजा मिलती है, कवि की कविता की नहीं।´

` तो´

` तो क्या ! ये देखो! तुम्हारे सामने हूं। ये लो, दो चार कविताएं हर वक्त अपनी जेब में रखा करो, जिस तरह लू में बंदे को प्याज का गट्ठा लू से बचाता है उसी तरह कविता भी बंदे को हर ऋतु में मौत से बचाती हैं। वैसे भी आजकल वक्त बड़ा नाजुक चल रहा है। सुबह घर से निकलो तो शाम को घर लौटने की उम्मीद कम ही होती है। दोपहर को तुम्हारे घर आऊंगा, कविता करना सीखा दूंगा। फिर निर्भय जहां चाहे घूमना। कविता करना छोड़ दूं जो कोई तुम्हारा बाल भी बांका कर दे। भाभी घर में होगी न! हफ्ते से चाय नहीं पी। चाय के बिना जैसे पूरा बदन टूट रहा है। ´

कह उसने अपनी डायरी से तीन चार कविता वाले पेज फाड़ मुझे दे दिए। मैंने आव देखा न ताव, चुपचाप उसकी डायरी के वे पन्ने अपनी जेब में डाल लिए। कुत्ता यह सब देख हंसा तो मैंने उससे कहा,
`हंस क्यों रहा है, ले एक कविता तूं भी कहीं रख ले। कमेटी वाले आजकल कुत्तों के पीछे हाथ मुंह धोकर पड़े हैं।´
और उसने वह कविता चुपचाप अपने पट्टे में बंधवा चैन की लंबी सांस ली। अब पता चला कि बंदा लाख गरीबियों के बाद भी कैसे जी रहा था!

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212 हि.प्र
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