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Thursday, October 15, 2009

रोशनी के पीछे का अंधेरा

एक आत्म विश्लेषणः आलोक भट्टाचार्य

दीपावली का माहौल है। चारों ओर रोशनी जगमगा रही है। खुशी और उत्साह का प्रकाश झिलमिला रहा है। नये कपड़े, मिठाइयां, मेल-मिलाप, बधाइयां, नये वर्ष की शुभकामनाएं। वैसे परंपरा यही कहती है, संस्कारों का यही तकाज़ा है कि पर्व-त्यौहार के समय सब कुछ अच्छा-अच्छा कहो। अच्छा सोचो। सद्भावना की बात करो। खुद खुश रहो और लोगों को खुश रखो। कमियों-कमजोरियों की बात फिर कभी करना। कमियां किसमें नहीं होतीं?

लेकिन यह भी तो है कि ‘सुख में करे न कोय।‘ और ‘जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे का होय।‘ यदि पर्व-त्योहार के मौके पर थोड़ा आत्मविश्‍लेषण कर ही लिया जाये, तो बुरा क्या है? खुद को जानने-पहचानने का, खुद अपनी खोट निकालकर स्वयं को सुधारने का मौका आखिर कब निकालें? और यह कोशिश जब ‘स्व‘ की सीमा से ऊपर उठकर समाज के स्तर तक पहुंचती है, तब देश-समाज के हित में शायद बहुत महत्वपूर्ण भी साबित होती है। ऐसी ही विनम्र कोशिश यह मेरा लेख है।
कबीर ने कहा है-

‘पंडित और मसालची दोनों सूझै नाहिं
औरन को कर चांदनी आप अंधेरे माहिं।‘


मशालची दूसरों को रोशनी दिखाता है, खुद अंधेरे में रह जाता है। पंडित अपना ज्ञान दूसरों में बांटता है, लेकिन स्वयं उस ज्ञान पर अमल नहीं का पता। दीपावली की जगर-मगर में कहीं ऐसा न हो कि हम अपने खुद के अंधेरों को देख ही न पायें। हमारे साथ जो हुआ, जो हो रहा है, वह सब आगामी पीढ़ियों के साथ न हो, इसी भावना से यह आत्मविश्लेषण।

लिखता मैं रोज हूं। अच्छा-बुरा दिन नहीं देखता। निदा फाज़ली ने कहा भी है- ‘सातों दिन भगवान के,मंगल हो या पीर।‘ चूंकि लिखने से ही मुझे दोनों प्रकार की तुष्टियां मिलती हैं-पेट की भी, दिमाग की भी, और दोनों की ही आंच इतनी ज्यादा तेज है कि शुभ-अशुभ मुहूर्त की फिक्र किये बिना ही लिखने बैठ जाता हूं, आलस्य नहीं करता, क्योंकि- ‘जिस दिन सोया देर तक, भूखा रहा फकीर।‘ वैसे भी मैं भाग्य, शगुन, मुहूर्त वगैरह मानता नहीं।

लेकिन उस दिन जब लिखने की तैयारी करने लगा, तो पाया कि दिन वाकई बड़ा ही खराब निकला। सुबह-सुबह खबर आयी कि प्रसिद्ध नाट्यकर्मी हबीब तनवीर साहब नहीं रहे। मन शोक में डूब गया। इसी जनवरी 2009 में वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पांच दिवसीय ‘हिंदी समय‘ विचार गोष्ठियों के दौरान उनसे मुलाकात हुई थी। 86 वर्ष की उम्र और रोग के बावजूद उनकी कौंध में, चमक में धार में कोई कमी नहीं थी। सिर्फ छह माह बाद ही उस दिन की सुबह वह चले गये। दिन की शुरुआत वाकई बहुत खराब हुई।

लेकिन अभी तो उस दिन की खराब शुरुआत की कुछ और भी खराबियां बाकी ही थी। खबर आयी कि जिस भोपाल में हबीब तनवीर साहब ने आखिरी सांस ली, उसी भोपाल के सूखी सेवनिया क्षेत्र में उसी दिन 8 जून 2009 को सड़क दुर्घटना में हिंदी के तीन कवियों का निधन हो गया। दिग्गज हास्यकवि ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड़सिंह गुर्जर। चौथे कवि ओम व्यास भी गंभीर रूप से घायल। कोमा में। अत्यंत चिंताजनक स्थिति में। जब यह लेख लिख रहा था, तब तक की यह स्थिति थी।

चूंकि मैं पिछले 25-30 वर्षों से कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ करता रहा हूं, इन सभी कवियों से मेरे बड़े ही आत्मीय संबध रहे हैं। ओमप्रकाश आदित्य के घर दिल्ली में कई बार ठहरा। नीरज पुरी के साथ छिंदवाड़ा, सिवनी, रायपुर आदि कवि सम्मेलनों की बड़ी प्यारी यादें हैं। नीरज पुरी के साथ मेरा एक चित्र मेरे अलबम में है। और ओम व्यास तो मुंबई के ही हैं। अक्सर मुलाकातें होती ही रही हैं। समझा जा सकता है कि दुर्घटना और मौतों की खबर से मैं कितना हिल गया। शोक का कैसा शूल दिल की अतल गहराइयों में उतर गया। वाकई, मेरा वह दिन बहुत बुरा निकला।

निदा साहब कहते हैं चूंकि सातों दिन, तीन सौ पैसठों दिन भगवान के हैं, सो सबके सब अच्छे। भगवान अच्छे सो उनके दिन भी अच्छे। तो फिर 8 जून 2009 का दिन इतना बुरा क्यों? ‘अच्छे भगवान के दिन भी अच्छे‘-इस सिद्धांत को लागू करता हुआ आगे सोचा तो पाया-‘बुरे देश के दिन भी बुरे।‘

लेखक परिचय-आलोक भट्टाचार्य

हिन्दी के सुपरिचित कवि एवं पत्राकार, मातृभाषा-बंगाली, हिन्दी में मौलिक लेखन।
प्रकाशित पुस्तकें-
1-भाषा नहीं है बैसाखी शब्दों की ( कविता संकलन)
2-सात समंदर आग (कविता संकलन)
3-अपना ही चेहरा (उपन्यास)
4-आंधी के आस पास (आत्म कथात्मक कहानियां)
5-पथ के दीप (संस्मरण)
6-अधार्मिक (वैचारिक लेख संग्रह)
इसके अलावा प्रभूत साहित्यिक एवं पत्राकारीय लेखन। हिन्दी की सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। अमेरिका में कविता पाठ के लिए आमंत्रित।
पुरस्कार एवं सम्मानः
1-महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का ‘सन्त नामदेव‘ पुरस्कार
2- महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का ‘जैनेन्द्र कुमार‘ पुरस्कार
3- निराला पुरस्कार
4- नागरी भूषण पुरस्कार
5- साहित्य भूषण पुरस्कार
6- अखिल भारतीय श्रेष्ठ हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कार
7- साम्प्रदायिक सौहार्द्र पुरस्कार
8-श्रेष्ठ मंच संचालक पुरस्कार
बंगला के रवीन्द्रनाथ ठाकुर, काज़ी नजरुल इस्लाम, सुकान्त भट्टाचार्य,सुभाष मुखोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय आदि की कुछ रचनाओं के हिन्दी अनुवाद। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम के काव्य संग्रह ‘माई जर्नी‘ का हिन्दी अनुवाद ‘मेरी यात्रा‘।
जी हाँ। दिन इसलिए बुरे, कि खुद देश बुरा है। एक बुरे देश में आखिर अच्छे दिन हो भी कैसे सकते हैं? दीपावली के पावन मौके पर कह रहा हूं और कहते हुए मुझे बहुत क्षोभ है कि मैं, आप, इस देश की सवा अरब जनता, हम सब एक बुरे देश में पैदा हुए। जैसा कि हम सब को पढ़ाया-बताया जाता है, रहा होगा कभी यह देश विश्व का सिरमौर-तब हम नहीं थे। आज तो इस देश की गिनती संसार के सबसे बुरे देशों में होती है। बहुत ही दुख की बात है यह। इस बात को मानने का जी ही नहीं करता। लिखते हुए भी कलेजा टूक-टूक हो रहा है। लेकिन आज का सच यही है कि भारत एक बुरा देश है। बहुत ही बुरा।

मौत तो सभी को आती है, लेकिन यदि आपने भारत में जन्म पाया है, तो भारत की अयोग्यता, भारत की लापरवाही की वजह से आप असमय ही काल के गाल में समाने को मजबूर हो सकते हैं, जैसे कि 8 जून 2009 को ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड़सिंह गुर्जर को समय से पहले मरना पड़ा। इसलिए मरना पड़ा कि अपना भारत वह देश है, जहां विश्व में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जबकि विश्व में सबसे कम गति में वाहन यहां दौड़ते हैं। 135 कि.मी. प्रति घंटा की स्पीड से अमेरिका की गाड़ियां वहां दौड़ती हैं, दुर्घटनाएं नहीं होतीं, कम होती हैं, यहां भारत में 55-60-65 कि.मी. प्रति घंटे से ज्यादा स्पीड में गाड़ियां दौड़ नहीं पातीं, वैसी सड़कें ही नहीं हमारे पास, फिर भी विश्व में सबसे ज्यादा दुर्घनाओं का ‘वर्ल्ड रेकॉड‘ भारत के ही नाम है। इस मामले में वाकई हम दुनिया के सिरमौर हैं। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार भारत में प्रतिदिन हर घंटे 13 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है।

अपनी एक कविता में मैंने कहा है-‘दुर्घटनाएं आकस्मिक तो होती हैं, अकारण कभी नहीं होतीं।‘ अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं के क्या कारण हो सकते हैं? सड़कें खराब, यानी सार्वजनिक निर्माण विभाग खराब, सड़क-परिवहन विभाग खराब, आर.टी.ओ. खराब। रिश्वत लेकर अयोग्य आदमी को ड्राइविंग लाइसेंस दे दिया, चुकी हुई पुरानी गाड़ियों को रिश्वत लेकर ‘पास‘ दे दिया, ड्राइवर खुद खराब कि शराब पीकर ड्राइव कर रहे हैं, घमंडी कि दूसरी गाड़ियों को पीछे छोड़ने के अहंकार में गाड़ी तेज चला रहे हैं, ओवरटेक कर रहे हैं, यातायात-नियम तोड़ रहे हैं। किसी की जान चली जाये तो बला से। पुलिस तथा प्रशासन के परेशान करने वाले निहायत ही असंवेदनशील रवैये के कारण कोर्ट-कचहरी के चक्करों के डर से राह चलते साधारण लोग दुर्घटनाग्रस्त घायलों की मदद के लिए जल्दी आगे भी नहीं आना चाहते। कैसी विडम्बना है कि असंवेदनशील पुलिस-प्रशासन के रूखे रवैये ने जन-साधारण को भी असंवेदनशील बना दिया है।

सिर्फ सड़क दुर्घटना में ही हम सिरमौर नहीं हैं। अभी हाल के ही केपीएमजी नाम की विश्वविख्यात सर्वे कन्सलटेंसी फर्म द्वारा विश्वव्यापी सर्वेक्षण के बाद जारी की गयी रिर्पोट में कहा गया है कि भारत दुनिया के सर्वाधिक दस भ्रष्टतम देशों में एक है। भारत के लिए यह अत्यंत शर्म की बात है कि सूची में शामिल बाकी के जो नौ देश हैं, उनमें भारत की तरह बड़ा, विकासोन्मुख, प्राचीन, कला-संस्कृति-शिक्षा-ज्ञान से समृद्ध ऐतिहासिक तौर पर प्रतिष्ठित दूसरा कोई भी देश नहीं। बाकी नौ जो देश हैं, वे गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा के मारे छोटे-छोटे देश हैं, इथियोपिया, नाइजीरिया, नामीबिया, यूगांडा जैसे देश, जहां इतनी भयंकर गरीबी है कि भ्रष्टाचार को माफ किया जा सकता है। आदमी आखिर भूखा ही मर जाये ? प्राकृतिक संपदा और ज्ञान संपदा में भारत उन नौ देशों से इतना ज्यादा आगे और समृध्द है कि कोई मुकाबला ही नहीं, लेकिन भ्रष्टाचार में उनके कान काट रहा है। राम, महावीर, बुध्द और गांधी उन नौ देशों में पैदा नहीं हुए। गंगा-जमुना-कावेरी-कृष्णा-कावेरी-गोदावरी वहां नहीं बहतीं। उन भूखों-नंगों-अनपढ़-अज्ञानियों को तो चोरी-चकारी की माफी मिल सकती है, लेकिन भारत ? इस हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा भ्रष्ट, बेईमान, झूठा, ढोंगी और पाखंडी देश है भारत। इस शर्म को छिपाने तक की कोई जगह नहीं।

मुझे मालूम है, मेरी यह बात कुछ लोगों को बहुत बुरी लगेगी। उन्हें आडवाणियों-अटलों-नरेंद्रों-तोगड़ियाओं ने बता जो रखा है कि अपना देश महान, अपना धर्म महान। इन झूठों के इस झूठे को लोगों ने मान भी लिया, क्योंकि मानना अच्छा लगता है। आखिर किसको भला यह मानना अच्छा नहीं लगता है कि अपना देश दुनिया का सबसे अच्छा, सबसे महान देश है। यह सत्य है कि कभी था। लेकिन आज जो कुछ यह देश है, वह इस देश की जनता के लिए सिर्फ और सिर्फ शर्म तथा अपमान का ही कारक है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पाखंड में डूबे इन झूठे नेताओं, ज्ञानपापियों, आंख के अंधों या फिर भोले-भ्रमियों के सूचनार्थ कुछ तथ्य यहां मैं अत्यंत क्षोभ और दुख के साथ दे रहा हूं।

इस वक्त हमारे इस महान देश में काले धन के तौर पर कुल 10 लाख करोड़ रुपये प्रचलित हैं। ये रुपये काले इसलिए हैं कि इनके मालिकों ने आयकर चोरियां कीं। आयकर की चोरी से बचाया-छिपाया गया यह धन है- 10 लाख करोड़ रुपये! इसके अलावा अपने इस महान देश के महान लोगों ने स्विस बैंकों में जो कुल रुपया जमा रखा है, वह है 1 अरब करोड़ रुपये। इस रकम से हम आज हम पर जो कुछ विदेशी कर्ज है, उसे 13 बार चुका सकते हैं! गरीबी रेखा से नीचे जीने को मजबूर जो 45 करोड़ अभागे हैं इस देश में, उनमें यदि स्विस बैंकों में जमा बेईमान भारतीयों के ये 1 अरब करोड़ रुपये बराबर-बराबर बांट दिये जायें, तो हर व्यक्ति लखपति हो जाये।

अभी हाल ही एक और रिर्पोट आयी है। यह एक बिजनेस सर्वे की रिर्पोट है। उसमें 12 देशों को शामिल किया गया- सिंगापुर, हांगकांग, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, जापान, मलेशिया, ताइवान, वियतनाम, चीन, फिलीपिन्स, इंडोनेशिया और अपना यह भारत महान! पाया गया कि इन बारह देशों की अफसरशाही, यानी नौकरशाही, यानी प्रशासन में भ्रष्टतम है भारत की अफसरशाही। भारत के नौकरशाह (चपरासी से लेकर,क्लर्क, हेडक्लर्क, मैनेजर, कैशियर, डाइरेक्टर, कलक्टर, कमिश्नर, सचिव आदि) काम ही नहीं करते। हाजिरी बजाते हैं, हाजिर नहीं रहते। आलसी होते हैं। रिश्वतखोर हैं और रिश्वत लेकर भी काम नहीं करते।‘ट्रान्सपरेन्सी इंटरनेशनल इंडिया सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़‘ के वर्ष 2007 के प्रतिवेदन में (जो 2008 को पेश किया गया) कहा गया है कि ‘देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों को एक साल में मूलभूत, अनिवार्य तथा जनकल्याणकारी सरकारी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए लगभग नौ सौ करोड़ रुपयों की रिश्वत देनी पड़ती है। ज़ाहिर है, नौ सौ करोड़ की यह सारी रिश्वत भारत के नौकरशाहों की बेईमान-बेशर्म जेबों में जाती है। यहां एक बात पर गौर करना होगा। वह यह कि नौ सौ करोड़ की यह रिश्वत भारत की ‘गरीबी रेखा के नीचे का जीवनयापन करने वाले लोग‘ ही देते हैं, जो कुल आबादी में 45 करोड़ ही है। बाकी के 90 करोड़ लोग जो रिश्वत देते हैं, वे आर्थिक क्षमता में उन गरीबों से बहुत ज्यादा आगे हैं। जाहिर है, इनके भी सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों के काम बिना रिश्वत के बनते नहीं। उन गरीबों की तुलना में 90 करोड़ लोग ज्यादा ही रिश्वत देते होंगे। एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल रिश्वत के तौर पर कुल 3200 करोड़ रुपये दिये जाते हैं।

सिर्फ रिश्वतखोरी और कामचोरी में ही नहीं, गबन में भी अपना भारत महान है। ताजा मामला तो ‘सत्यम‘ का है ही। ‘इंडिया फ्रॉड सर्वे‘ की वर्ष 2008 की रिर्पोट में कहा गया है कि गबन की वजह से देश की 5 % कंपनियों को प्रति कंपनी 10 करोड़ रुपयों से अधिक का नुकसान हुआ, और 10 % कंपनियों को 1 करोड़ से 10 करोड़ रुपयों तक का नुकसान। वर्ष 2009 की तुलना में भारत में गबन के शिकारों में 54 % बढ़ोतरी हुई है। यानी अपना देश तरक्की कर रहा है। बधाई!

सिर्फ अफसरशाह ही क्यों, उनके आकाओं को लीजिये। सुखरामों की कोई कमी तो नहीं इस देश में। लेकिन एक सुखराम ही को यदि आप लें- जिन्हें हाल ही अदालत ने आय से अधिक साढ़े चार करोड़ रुपयों की संपति रखने के अपराध में दोषी मानकर सजा दी है, तो भी आपका सर शर्म से झुक जायेगा, आश्चर्य से चकरा जायेगा। मज़ा यह है कि सुखराम की जिन संपत्तियों की कीमत साढ़े चार करोड़ आंकी गयी, उनकी मौजूदा कीमत सौ करोड़ रुपये की है। पिछले साल मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य संचालक योगीराज शर्मा से भी करोड़ों की राशि और जमीन-जायदाद के कागज़ात मिले। सुखराम जैसे नेताओं और योगीराज जैसे अफसरों की कोई कमी नहीं यहां, लेकिन मज़ा यह है कि अपनी न्याय-व्यवस्था भी इतनी मज़ेदार कि दोनों में से किसी को एक दिन के लिए भी जेल नहीं जाना पड़ा। गिरफ्तारी-जमानत-सजा की घोषणा के बाद ऊपरी अदालतों को अपील करने तक बेल की व्यवस्था-इस बात को तो अपने स्वदेशी-सांस्कृतिक राष्ट्रीयवादी, ‘गर्व से कहो‘ वादी धुरंदर देशप्रेमी-धर्मप्रेमी लोग भी मानेंगे ही कि भारत जननी की जो सबसे भ्रष्ट और बेईमान संतानें हैं, वे हैं वकील और पुलिस। झूठे, मक्कार, बेईमान। कू्रर। इधर कुछ जजों के किस्से उजागर हुए हैं। मुंबई की एक अदालत के एक माननीय जज पिछले पांच-छह साल से फरार हैं। मुंबई की (देश की सबसे काबिल) पुलिस उन्हें ढूंढ ही नहीं पा रही ! भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एंटी करप्शन ब्यूरो) की ताजा रिर्पोट बताती है कि भ्रष्टाचार के मामलों में देशभर की पुलिस में महाराष्ट्र पुलिस अव्वल है। बधाई! महाराष्ट्र पुलिस के खिलाफ 81 मामले साल भर में दर्ज हुए। साल भर में 103 पुलिसकर्मी घूसखोरी में पकड़े गये। जो पकड़े नहीं गये, उनका हिसाब कौन बताये! और तो और, महाराष्ट्र के एंटी करप्शन ब्यूरो का भी एक अधिकारी रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। ‘ट्रान्सपरेन्सी इंटरनेशनल इंडिया‘ की रिर्पोट से पता चलता है कि अपने इस महान देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राष्ट्रीय रोजगार गारंटी, पाठशालाओं के बच्चों के लिए मघ्याह्न भोजन, पोलियो उन्मूलन आदि विभागों में किस कदर भ्रष्टचार का बोलबाला है।

राजनीति और नेताओं की बात करें क्या? मेरी ही एक ग़ज़ल का एक शेर इस संदर्भ में-

‘कुछ और भी कहें क्या, अल्लाह रे, तौबा
आदाब कहां जायें अपनी जुबान के !‘


सच है, देश के नेताओं के बारे में कुछ कहना खुद अपनी जबान गंदी करना है, भाषा को बेअदब बनाना है। इस बार के लोकसभा चुनाव में पिछली बार (वर्ष 2004) की तुलना अपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या में 30.9 % की वृद्धि हुई है। बधाई! इस बार 150 ऐसे उम्मीदवार संसद में पहुंचे हैं, जिनके खिलाफ अपराधिक मामले दर्ज हैं। 73 सांसदों के खिलाफ संगीन अपराधों के 412 मामले चल रहे हैं। पिछली बार 128 ऐसे सांसद थे, इस बार 150-वाकई, तरक्की कर रहा है देश, ‘शाइनिंग इंडिया !‘ सांसदों पर जो आरोप लगे हुए हैं, उनके एवज में उन्हें आजीवन कारावास या फांसी तक की सज़ाएं हो सकती हैं। ऐसे सांसदों की सबसे ज्यादा संख्या इस देश की सबसे चरित्रावान, पवित्रा, राष्ट्रभक्त पार्टी भाजपा में है ! ‘हिंदू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता‘ का गर्वपूर्ण उद्घोष करने वाली इस पार्टी के 23 सांसद बाहुबली अपराधी हैं। यह भी तब, जबकि इस बार बहुत से बाहुबली हारे हैं।

विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के तीन पाये हमने देख लिये- विधायिका यानी नेता, संसद आदि, कार्यपालिका यानी प्रशासन, अफसर वगैरह, और न्यायपालिका (जहां बेईमान पुलिस, झूठे वकीलों, फर्जी गवाहों का दुष्चक्र तो है ही, जजों के रवैयों की वजह से 10-15-20 वर्षों तक लटके हुए लाखों मामले हैं, जवान आदमी बूढ़ा हो जाता है, मर जाता है, न्याय नहीं मिलता और देर से मिला भी, तो न्याय नहीं रह जाता अंततः), अब आइये, लोकतंत्र के हमारे चौथे पाये को भी जरा देख लें कि वह कितना सच्चा माई का लाल है। यह पाया है मीडिया। अदालत से ज्यादा भरोसा जिस पर जनता को है। जिस मीडिया को हम समाज का सजग प्रहरी कहते नहीं अघाते। जिस मीडिया के पास जनता के विचारों को मोड़ने की ताकत है। दुख है कि इस महान देश का महान मीडिया, लोकतंत्रा का चैथा खंभा, जनता की आवाज- वह भी इस महान देश के महान बेईमान चरित्रा के उसी महान अंधकूप में पड़ा हुआ है। देश या जनता की सेवा नहीं, मीडिया का उद्देश्य आज सिर्फ ग्लैमर और पैसा कमाना रह गया है। वह बेईमान नेता और लोभी उद्योगपति के हाथों बिक गया है। वह यह तो बहुत गाजे-बाजे के साथ बताता है कि भारत का सुनील मित्तल विश्व का स्टील किंग बन गया है, या टाटा ने कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अधिग्रहण करके भारत की साख दुनिया में बढ़ायी, लेकिन वह इस बात का जिक्र तक नहीं करता कि कृषिप्रधान इस देश के ढाई हज़ार किसानों ने आत्महत्या कर ली, और आत्महत्याओं का सिलसिला थम ही नहीं रहा। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की वार्षिक रिर्पोट की वह बात भी मीडिया नहीं बताता, जिसमें आंकड़ों के सहारे यह बताया गया है कि गरीबी और भुखमरी से निपटने की भारत की स्थिति इथियोपिया और पाकिस्तान से भी गयी-गुजरी है। अखबारों और टीवी चैनलों को इस बात का भी होश नहीं कि भारत में प्रतिदिन 20 करोड़ लोग रात का भोजन नहीं कर पाते, भूखे ही सो जाते हैं। पत्रकार यह नहीं बताते कि देश के 80 % लोगों की दैनिक आय 20 रुपये से भी कम है। वे नहीं बताते कि पिछले साल भर में मध्यप्रदेश के कोरकू आदिवासियों के 62 बच्चों की मौत भूख से हो गयी। नहीं बताते कि महाराष्ट्र के जव्हार-मोखाड़ा और चिखलदरा के आदिवासी बच्चे पिछले 12-12 वर्षों से हर वर्ष 25-30-40 की संख्या में कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं।

मंदी के दौर के बहाने चैनलों ने यह बात तो बहुत बढ़-चढ़कर बतायी कि कितनी बड़ी कंपनियों को कितने लाखों-करोड़ों का भारी नुकसान हुआ, लेकिन यह नहीं बताया कि उन कंपनियों में पिछले दस-पंद्रह वर्षों में भारी पूंजी निवेश भी हुआ। उसका करोड़ों का जो लाभ हुआ, वह किसकी जेब में गया? यह नहीं बताया कि मुक्त बाजार के नाम पर जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपना व्यापार फैलाया, उन्होंने भारत की सरकारी बैंकों, बीमा कंपनियों से करोड़ो-अरबों का लोन लिया, उसका कितना लौटाया? किसी चैनल ने नहीं बताया कि अगर वामपंथी पार्टियों ने रोक-टोक नहीं लगायी होती, तो मनमोहन सरकार बेलगाम होकर बैंकिग व्यवस्था में परिवर्तन, बीमा सेक्टर और रेल्वे का निजीकरण और श्रमिक सुधार के नाम पर देश को बेच ही देती।

स्टिंग ऑपरेशन के नाम पर भी मीडिया झूठ कितना खतरनाक है, और कितना ज्यादा गैर जिम्मेदाराना, यह तब पता चला जब एक चैनल फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के जरिये दिल्ली की एक अध्यापिका को अपने स्कूल की छात्राओं द्वारा देह-व्यवसाय कराने के लिए फुसलाते दिखाया गया। बाद में किस्सा सिरे से सफेद झूठ निकला। ऐसे ही एक और चैनल ने ‘स्टिंग ऑपरेशन‘ के नाम पर तत्कालीन गृहराज्यमंत्री माणिकराव गावित को जेल में कैद एक कुख्यात माफिया सरगना से मोबाइल पर बातचीत करते दिखाया कि गावित कह रहे हैं कि जेलर बदल दिया जायेगा, बदले में सरगना छूटने के बाद गावित के दामाद को किसी भूमि-विवाद से मुक्त करा देगा। दोनों स्टिंग ऑरपेशन झूठ के पुलिंदे साबित हुए।

दरअसल इस बेईमान देश के बेईमान पत्राकार भी पूरी तरह धंधेबाज हो गये हैं। चैनलों ने शेयर बाजार में पैसा लगा रखा है। पब्लिक ईशू के जरिये धन बटोरा है। जाहिर है इनके हित शेयर बाजार में हैं। ये सच्ची पत्राकारिता कैसे करेंगे? ये धंधेबाज पत्राकार तो इस हद तक चले गये हैं कि अपने ही कर्मचारियों के पेंशन और प्रोविडेंड फंड का पैसा भी शेयर बाजार में लगाने की तैयारी में हैं।

इन सब का परिणाम जो होना था, वह होकर रहा। आज हमारे देश के राष्ट्रीय चरित्रा की ही तरह देश की जनता का भी ‘सामाजिक-सार्वजनिक चरित्र‘ निहायत ही बेईमान है। देश की जनता परम स्वार्थी, संकीर्णहृदय और पाखंडी है। गांवों के स्कूल टीचर रोज स्कूल नहीं जाते। किसी तरह एक दिन जाकर छह दिनों की हाजिरी लगा देते हैं। कॉलेज के लेक्चरर-प्रोफेसर कॉलेज में क्लास नहीं लेते, प्राइवेट ट्यूशन या कोचिंग क्लास से लाखों कमाते हैं। मिड डे मील का पैसा डकार जाते हैं। डॉक्टरों ने तो मानों लूटने की दुकान ही लगा रखी है। गांवों की पंचायतराज की व्यवस्था भ्रष्टाचार में डूबी है। गांवों की जो महिलाएं अपने खेत में काम करना अपनी शान के खिलाफ समझती हैं, वे स्वयं को कागजों पर मजदूर बताकर ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का पैसा उड़ा रही हैं। गांव में जो तालाब है ही नहीं, उसी की खुदाई हो रही है चार-चार साल से। जो परिवार किसी एनजीओ को बता रहा है कि बच्चे भूखे मर रहे हैं, पता कीजिये तो पाइयेगा कि उस परिवार ने अपने बेटे की शादी में 5,000 रुपयों की कारतूस दागीं।

गांव बेईमान, शहर बेईमान, नेता बेईमान, जनता बेईमान-इस बुरे देश में पैदा होकर इतने सारे बुरे लागों के बीच रहकर कोई व्यक्ति भला अच्छा कैसे बन सकता है? यहां तो सच बोलने तक का अधिकार नहीं। आज जो मैं महान भारत, विश्वगुरू भारत, ज्ञान का प्रथम प्रकाश भारत, विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म हिंदुत्व आदि-आदि के बारे में थोड़ा-बहुत सच बोल-लिख गया, तुरंत बाल ठाकरे, उध्दव ठाकरे, आडवाणी-जोशी-मोदी जैसे सत्य के पुतले दूध के धुले आर्य, हिंदू, भारतीय वीर मुझ पर टूट पड़ेंगे। कहेंगे ‘हिंदू कभी आतंकवादी नहीं होता‘ और ठाकरे पत्रकारों को पीटेंगे, दूकानें लूटेंगे, अखबार जलायेंगे, राज ठाकरे परप्रांतियों की हत्या करवायेंगे, नरेंद्र मोदी अपनी सरकारी मशीनरी के माध्यम से खुले आम गणहत्या करवायेंगे। पाखंड, झूठ और बेईमानी की हद है।

सड़क दुर्घटना हो, एनकाउंटर हो, दंगा हो, मिलावटी दवा हो-मरना इस देश की जनता को बेमौत ही है-

‘अब तो अपनी भी मौत मरना नहीं नसीब
हत्या से बचोगे, तभी तो अपनी मौत मर पाओगे!‘


हबीब तनवीर को भोपाल के अस्पताल में सही इलाज मिला ही होगा, गलत-लापरवाह चिकित्सा और मिलावटी दवा भी मिलती, तो अजब क्या था। इस देश के अस्पताल भी तो इसी देश के हैं आखिर! जिस देश में पैकेट का दूध भी सिर्फ मिलावटी ही नहीं, नकली भी हो, उस देश में क्या नहीं हो सकता! सो सड़क दुर्घटना में मारे गये ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी, लाड़सिंह गुर्जर-तुम अच्छे लोग, अच्छे और सच्चे कवि जो इस देश में पैदा हुए, तो तुम्हें तो यूं ही मरना था। अब तुम इस देश की हद से बाहर चले गये हो, तुम्हारी आत्माओं को अब शांति तो जरूर ही मिल रही होगी। तुम्हें श्रद्धाँजलि देते हुए मैं आज के इस बुरे दिन में यही कामना करता हूं कि तुम्हारी संतानों, तुम्हारे नातियों-पोतों को, हमारे बाद आने वाली पीढ़ियों के नन्हें-मुन्नों को अच्छे दिन नसीब हों। मेरी तरह उन्हें अपने ही देश को कोसने के बुरे दिन कभी नसीब न हों। दीपावली के मौके पर आत्मविश्लेषण करने की उन्हें जरूरत न पड़े।

आमीन!

(आलोक भट्टाचार्य)
18, अंबिका निवास, (मॉडेल इंग्लिश स्कूल के पीछे)
पांडुरंगवाड़ी, डोंबिवली (पूर्व) 421201
फोन- (0251) 2883621, मो॰- 09869680798

Wednesday, September 09, 2009

आईए शहर और गांव के बीच की लकीर मिटाएं...


जब भी गांव के विकास की बात आती है ...शहरों की खिंचाई शुरू हो जाती है..ये थोड़ा सा अन्याय है मुझे लगता है..शहर विकास का एक नैसर्गिक पड़ाव है..ऐसा नहीं होता तो विकास के चश्मे से शहरों का भी वर्गीकरण नहीं होता..मसलन छोटा शहर..बड़ा शहर..सिटी..मेट्रो सिटी..कॉस्मोपॉलिटन सिटी..वगैरह वगैरह..छोटे शहरों के लोगों का भी मेट्रोपॉलिटन के सामने कुछ ऐसा ही रोना है...पिछड़े रह जाने की ऐसी ही दुहाई है..सबकुछ नहीं मिल पाने की ऐसी ही कसक है..लेकिन उनको नहीं मालूम कि दिल्ली का दिल भी लंदन या न्यूयार्क को देख कर जल सकता है...या फिर ये कह सकता है कि वो आगे निकल गये..हम कहां रह गये...ये शिकायत व्यक्तिगत तौर पर मुझे थोड़ी 'रिस्पेक्टिव' या 'रेलेटिव' लगती है. बहरहाल, ये सवाल कि शहरों ने गांवों को क्या दिया है.. बताने की ज़रूरत नहीं है..शहर उन लोगों का आलंब बने जो बाढ़ या सूखे में अपना सबकुछ खो बैठे..जब गांव घर में पानी घुसा तो शहरों की तंग गलियों ने आसरा दिया..जब गांव के स्कूल बदहाल हो गये..तब शहरों ने हमें ये क़ाबलियत दी कि हम पुरज़ोर ढ़ंग से अपने गांवों के लिए आवाज़ उठा पाने की ताक़त रखते है..आज हमारे गांवों की बात हमारे मुंह से सुनी और समझी जा रही है तो बीच में कहीं न कहीं एक शहर ज़रूर खड़ा रहता है..कमज़ोरी नहीं बल्कि हौसला बनकर..अत्मविश्वास बनकर. गांवों की जो तस्वीर हम अपने आनेवाले दिनों के लिए बुनते हैं..जिसे दिमाग के काग़ज से ज़मीन की ठोस परत पर उतारना चाहते है...तो कल्पना की वो जमीन भी कहीं न कहीं इन शहरों ने मिल कर बनाई है....बीच की लाईन क्यों बना देते हैं हम..मान लीजिए कि दिल अगर गांव है..वैसे बापू ने भी माना था कि भारत की आत्मा गांवो में ही बसती है...तो इस शरीर का दिमाग शहर है..शहरों का आधार गांव रहे है..इसमें कोई दो राय नहीं...यहां के फाईवस्टार होटलों में परोसा जाने वाला खाना..और उसे परोसने वाला दोनों ज्यादातर गांवों के ही होते है...शहर के हाथ गांव से आते है...लेकिन ये भी नहीं भूलना होगा..कि शहर इन हाथों को थाम भी लेते हैं..बीच की लाईन को मिटा कर बात करते हैं..ये मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि गांव पीछे छूट गये..कारणों की विवेचना नहीं करूंगा...लेकिन गांवों की बड़ी ज़रूरतें क्या हैं इस समय..उनके पास क्या कुछ है जिससे इन ज़रूरतों को पूरा किया जा सकेगा...ये समझना ज्यादा ज़रूरी है..गांवों के पास कुछ चीज़े ऐसी हैं जो शहरों के पास नहीं हैं....गांवों-ज़रूरतों को तोड़ कर देखेंगे तो शहरों के मुक़ाबले छोटी लगेंगी लेकिन ग्रासरूट लेवल पर सब मिलजुल कर अभाव की बड़ी तस्वीर बना देते हैं....तो मेरे हिसाब से हल ग्रास लेवल से शुरू होना चाहिए..गांव की ताक़त क्या है?..गांवों की असल ताक़त उनका सस्ता संसाधन है..बात चाहे प्राकृतिक संसाधनों की हो, मानव संसाधन की हो ..हर मामले में उपलब्धता ज्यादा है...लेकिन इन संसाधनो के साथ सबसे बड़ी चुनौती इनकी क्वालिटी को लेकर...सबसे ज्यादा काम की ज़रूरत मानवसंसाधन के विकास और उसके इस्तेमाल पर करने की है..डीसेंट्रलाईज़ेशन ऑफ डेवलपमेंट..अगर इस संकल्पना पर काम किया जाये तो विकास के विकेंद्रीकरण का अंतिम बिंदु गांव का कोई वही आदमी होगा..जिसे हम शहरों की ओर पलायन करने से रोकना चाहते हैं..जब बिहार के मुख्यमंत्री ने ये कहा कि राज्य की श्रम शक्ति का 50 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा राज्य से बाहर है तो पलायन की गंभीरता समझी जा सकती है..तो जब हम विकास के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं तो यहीं से शहरों की गांवों के अंदर भूमिका शुरू हो जाती है...इस प्रक्रिया में वो सबकुछ आता है जो शहरों की तरफ़ गांवों के लोगों को खींच कर ले जाता है..कारण चाहे ज़रूरत हो या सपने...आउट ऑफ द बॉक्स जाकर क्यों नहीं सोच पाते....हर चीज़ को विकेंद्रीकृत कर दे- शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय सबकुछ. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अंग्रेजी बोलने-पढ़ने का माहौल हम गांवो और छोटे शहरों में पैदा कर दे..फिर वहां से विलेज कैंपस कर वहां के युवा को किसी बीपीओ में उसे नौकरी दे दे..और ये आउटसोर्सिंग गांवो से ही हो..ये सुविधा दिल्ली से नहीं हटेगी तो लोग भागेंगे...गया का पटुआ टोली गांव एक बेहतरीन उदाहरण है..जहां जुलाहों की बस्ती से हर साल आईआईटी में बच्चे दाखिला लेते है..पटना का सुपर थर्टी भी बेहतरीन मिसाल है....ये लोग महंगी पढ़ाई करने के लिए दिल्ली नहीं जा सकते ...लेकिन अच्छी पढ़ाई अपने घर में ज़रूर कर लेते ...गांवों में और छोटे शहरों में जहां बिजली नहीं रहती वहां के लड़के-लड़कियां एजुकेशन क्लब बना कर तैयारियां करते है..और खुद को साबित करते हैं..अगर इन युवाओं को ये शहरी सुविधायें विकेंद्रित हो गांव में मिलें तो ..कौन जाये कमबख्त अपने गांव की गलियां छोड़कर....शहर की सड़कें जब हरियाणा, पंजाब, गोवा, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों के गांवों तक विकेंद्रीकृत होती हुई पहुंची..तो शहर की चीज़े भी वहां तक गई..बस यही प्रक्रिया हर मामले में हो..एक बार बीबीसी में ये पूछा गया कि एक दिन के लिए पीएम बनने पर आप क्या करेंगे? तो किसी का सुझाव था कि एक दिन के लिए कैबिनेट की बैठक किसी गांव में कराऊंगा..उस एक दिन के चक्कर में उस गांव की कई चीज़े सुधर जायेंगी..मुझे अच्छा लगा..क्या शहरों में,राजधानियों में होने वाली इस तरह की बैठकों ,सम्मेलनों, सभाओं, महोत्सवों को हम गांवों में नहीं कर सकते ...यक़ीन मानिये कोई मुश्किल काम नहीं है..अलबत्ता गांवों में रोज़गार के साथ-साथ कई चीज़ो का इज़ाफा होगा...इन सब पर तो गांव का भी हक है... यानि शहरों का विकेंद्रीकरण ऐसे भी हो सकता है.. इससे शहरों को भी एक बड़ा फ़ायदा होगा...एक तो उनपर दबाव घटेगा..दूसरे आयोजनों का खर्च घटेगा...शहरों में स्लम्स के लिए टूरिज़म नाम की चीज विकसित हो जाती है..इससे लाख बेहतर है कि विलेज टूरिज़म विकसित करें..दुनियां को गांवों के दर्शन करायें..सरकार अपने किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए गांवो को प्राथमिकता दे..खेलों के स्टेडियम गांवों में क्यों नहीं बने...जगह काफ़ी है वहां ..क्यों शहरों में भीड़ बढ़ाते हैं हम... बडी बात ये है कि गांव के लोग भी ये महसूस कर पायेंगे कि हम भी इन सब चीज़ो से जुड़े है..फिर शहर और गांव के बीच की जो लाईन है वो हल्की होती जायेगी...जब मै विकेंद्रीकरण की बात करता हूं तो यही सोचता हूं...सुविधाओं के गढ़ बन चुके बड़े शहर टूटें..और ये सविधायें छोटे शहरों और गांवों तक जायें...सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात पर तो पहल बहुत तेज़ी से हुई..लेकिन दिल्ली में जमा हुई सुविधाओं के बारे में ऐसा विचार क्यों नहीं आया..आख़िऱ में मै आपको एक सपने के साथ छोड़ जाता हूं....आंखें बंद कीजिए..और देखिये...मऊ का बीपीओ सेंटर..छपरा के किसी गांव का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम..गुंटूर के गांव में बना आईआईएम....उड़िसा के चिल्का गांव में कैबिनेट मीटिंग भवन...प्रगति मैदान का मोटर एक्सपो श्रीगंगानगर के किसी गांव में....नागालैड या सिक्किम के किसी पहाड़ी गांव में राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव....आंखे खोलिये ..आपको लगता है कि इस एक क़दम से उन जगहों की इससे तस्वीर बदेलगी?..नहीं लगता तो आप इसे मेरा यूटोपिया कह सकते हैं..मुझे बुरा नहीं लगेगा...

रवि मिश्रा

Wednesday, September 02, 2009

गरीब जनता के सब दुख हरती है जी बी रानी !


बच्चों को नौजवान बना दे, और बूढ़ों मे कूट-कूट कर भर दे जवानी! जी हॉं , अदभुत चमत्कारी हैं ये जी.बी. रानी। ये न कोई अंग्रजी दवा हैं न फ्रेंच , न स्पैनिश , न चीनी दवा। न ही किसी पहाड़ की जड़ी-बूटी हैं न ही कोई आयुर्वेदिक या हकीमी नुस्खा ! बाबा रामदेव के योग का भी नहीं है इनमें सूत-कपास-चरखा ! ये देश के गरीबों पर हैं बेहद मेहरबान, अमीरों को बिलकुल ही घास नहीं डालती हैं, ये अद्भुत कद्रदान ! माना कि वेदों-पुराणों , कुरान, बाईबिल , गुरुग्रन्थ साहिब , अजावेस्ता इत्यादि में नहीं है इनके वर्णन की बहार , फिर भी जो पा जाये इनका प्यार , उसे तार-तार करके देती हैं उसे तार ! चुस्ती , फुर्ती , चैतन्यता , चपलता का देती हैं ये उसे उपहार ! ये तुम्हारी ही महान कृपा है जो मैं घटती उम्र के बावजूद , लोगों को दिखता हूं स्मार्ट ,यंग , फुर्तीला और दमदार !!

आइए शुरु करता हूं इनकी राम कहानी। जी.बी. का अर्थ है भारतीय रेल की जनरल बोगी, जिसमें पन्द्रह-बीस बार सफर कर लेने के बाद कोई नहीं रहता है रोगी। या तो रोग चला जाता है, या फिर रोगी ही चला जाता है हमेशा-हमेशा के लिए, या तो ए.सी. कम्पार्टमेण्ट जैसे, देवताओं के स्वर्ग में , अथवा अपेक्षाकृत जनरल बोगी से कम असुविधाजनक , तथाकथित नर्क में। ठसाठस भरी हुई , चांपा-चांपी से भरपूर जनरल बोगी, अपने आप में दुनिया की किसी भी जेल से बढ़के है, किसी भी पुलिस लॉकप में , धुनाई के बाद कोई मुजरिम , इतना चूर-चूर नहीं होता , जितना जनरल बोगी के दमघोंट माहौल में लोगों की दुलतियां-पंचललियां झेलने वाला- इसमें लगातार चालीस घंटे तक सफर करने वाला।
पहले एक पैर पर खड़े होके तपस्या करने वाले लोगों का लोग महान ऋषि-मुनि मानकर उनका सम्मान करते थे, मगर कैसा घोर कलयुग आ गया है कि पूरा या आधा सफर एक पैर खड़े होकर, करने वालों की आजकल कोई नोटिस ही नहीं लेता। महान तपस्वियों से महान, भयानक भीड़ में दबा-सहमा सा इनसान किसी भी तरह न पानी पीने का इन्तजाम कर सकता है, न खाने-पीने का, न ही ट्रेन के शौचालय में जाने का ! वास्तविक, जनरल बोगी में ! जिस बोगी में, यह सब दुष्कर कार्य आसान हो, उसे मैं किसी भी कीमत पर , वास्तविक जनरल बोगी मानने को तैयार नहीं। वो निश्चित रुप से ´´मुकद्दर का सिकन्दर´´ है जो कुली को उसका फिक्स्ड रेट देकर जी.बी. में बैठने की जगह पा जाता है, और वो साक्षात् ´शहंशाह´ है जो जी.आर.पी. वालों की मुट्ठी गरम करके , ऊपर सोने का जुगाड़ फिट कर लेता है! वो एक नम्बर का ´चालबाज´ व ´दस नम्बरी´ का बाप है , जो बगैर टिकट के उक्त दोनों में से किसी सुविधा का जुगाड़ कर लेता है। वास्तविक जी.बी. में , शातिर से शातिर चोर आपका सामान नहीं उड़ा सकता-चुरा भी ले तो पांच कदम भी लेके नहीं जा सकता , कोई आपको जहर खुरानी का शिकार नहीं बना सकता , जिसके पास एक पुड़िया ज़हर होगा वो खुद खाके जानलेवा यंत्रणा से मुक्ति चाहेगा या आपको खिलायेगा....कोई भी टी.टी. टिकट चेक करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता, और न ही कोई चाय वाला, खीरे वाला, आप तक पहुंचने की गुस्ताखी कर सकता है।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसी तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद जी.बी. रानी आपको कैसे बूढ़े से जवान बनाती हैं.. आपको पूरी तरह स्वस्थ, निरोग, चुस्ती-फुर्ती से भरपूर इन्सान बनाती हैं...अगर भगवान ने आपको मेरे जैसा दिमाग दिया होता, तो मुझे बताने की जरुरत नहीं पड़ती, मगर बताने की महती कृपा कर दे रहा हूं ताकि नासमझां तक की समझ में आ जाये, सौ टके की सच्ची बात ! पुलिस में भर्ती पाने वाले रंगरुटों को रोज सुबह मीलों दौड़ा के क्यों सताया जाता है, सेना में भर्ती होने वाले जवानों को, सौ तरह की बेहद कठिन कसरतों व उछल-कूद से क्यों गुजरना पड़ता है..क्रिकेट खेलने वालों को फिटनेस के नाम पर घंटों ´नेट´ पर पसीना बहाके चूर-चूर होने को क्यों विवश किया जाता है, कभी सोचा है आपने.. यह सब होता है इन्सान की मांसपेशियों, हडि्डयों, धमनियों-शिराओं से हर तरह की जकड़न, सुस्ती व शिथिलताएं बाहर भगाने के लिए !
जनरल बोगी। इस मामले में पूरी दूनिया में इसका कोई जवाब नहीं। चूंकि आजकल रामदेव बाबा ने आसनों एवं योग की महिमा को पुनर्जीवित व स्थापित किया है लिहाजा आसनों के माध्यम से आप सबको बात समझाने की कोशिश करता हूं।

गधासन- जब आप जी.बी. में खड़े रहते हैं किन्तु मजबूरन आपको अपना सामान अपने कंधों या सिर पर ही रखने की मजबूरी रहती है। इससे आपके कंधों की मांसपेशियां, गर्दन एवं सिर की हडि्डयां बेहद मजबूत होती हैं।

पंजासन- जब आपके पंजों पर दर्जनों लोगों के पांवों का बारी-बारी इतना दबाव पड़े कि आप कराह उठें-चीत्कार उठें। इससे पांवों के पंजे, बिल्ली या शेर के पंजों से ज्यादा मजबूत हो जाते हैं, धीरे-धीरे।

कम्प्रेशन आसन- जब आप जी.बी. के गलियारे में चारों और से इतना चंप जाये कि आपको अपना पोर-पोर टूटता महसूस हो तो सच मानिये कि आप ही वो भाग्यशाली हैं जो हजारों रुपये बचाते हुए बहुमूल्य मसाज-सेंक पा रहे हैं एक दम मुफ्त में। पोर-पोर को एवं फेफड़ों को चुस्त-दुरुस्त करने वाला आसन!

''वासन- जब आप कुछ मिनटों के लिए एकदम से “वास लेना ही भूल जायें। इस आसन से आप पानी में कभी भी नहीं डूब सकते, आंसू गैस आप पर असर नहीं करती और युद्ध छिड़ने पर बमों के धुएं आप का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं क्योंकि “वास रोकने की कला में आपको प्रवीण कर देती हैं जी.बी.

कपिआसन- लोगों के सिर पर जबरन, बेहयाई से पांव रखते हुए यदि आप वास्तव में उछल-कूद के, शौचालय तक पहुंच जायें तो कपि-आसन में दक्ष हो जाते हैं , इससे आप बानर की तरह फुर्तीले हो जाते हैं।

पायदान आसन- लाख प्रयास करके भी जब भयानक भीड़ के चलते बोगी में घुस सकें और पूरा सफर टेन के पायदान पर ही, भारी सांसत सहते-करना पड़े तो समझिए आपके पांव, हाथ एवं हाथ के पंजे बेहद मजबूत हो रहे हैं ,ऊंगलियों में असीम ऊर्जा का समावेश हो रहा है।

स्थानाभाव के कारण, ´एक पदासन´ संड़स्यासन, ´शीश झंकृति आसन, ´मिल्खासन´ आदि अनेक आसनों की व्याख्या नहीं कर पा रहा हूं , किन्तु अब तो आपको पक्का यकीन हो ही गया होगा कि कैसे जी.बी. रानी भरती हैं बूढों में जवानी- ´कूट-कूट कर। यदि आप अमीर हो, मोटापे या गठिया इत्यादि के शिकार हो तो कम से कम पच्चीस बार, वास्तविक, जी.बी. में कम से कम तीन सौ किलोमीटर की यात्रा करें और आशातीत लाभ होने पर मुझे धन्यवाद अवश्य दें। खैर, मैने तो कसम खा रखी है, जब तक जिऊंगा, जी.बी0.और सिर्फ जी.बी. में सफर करुंगा और चिर युवा बना रहूंगा। यदि आप ऐसा न कर रहे हों तो अपने मस्तिष्क की किसी डाक्टर से जांच अवश्य ही करा लें।

संदीप कुमार श्रीवास्तव
लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। फिलहाल इलाहाबाद के एक पत्रकारिता संस्थान में पढ़ाते हैं। बैठक पर ये इनका पहला लेख है.. )

Thursday, July 16, 2009

मुर्दे का प्रोमोशन !

उस देश की जनता भय भूख से परेशान, बहुत परेशान। पर सरकार को इस बात से कोई लेना देना नहीं । उसे मजे से अपनी चाल चलना है सो चल रही है। उसे लंबी तान कर सोना है सो लंबी तान के सो रही है। जनता चाहे कहीं की भी हो, वह कुल मिलाकर जमा-घटा कर औसतन जनता ही होती है। न उसकी कोई चाल होती है न ढाल।

मैं भी उस देश की जनता हूं, सो कहने की जरूरत नहीं कि परेशान न होऊं। परेशानी में ही सोता और सुबह परेशानी में ही जागता हूं। यह सिलसिला बरसों से चला हुआ है। तय है मरने तक चलता रहेगा। न आप कुछ कर सकते न खुदा। मेरे बस में तो कुछ है ही नहीं।

तब भी मैं परेशानी में ही जागकर घूमने निकला था कि सामने से मुर्दा सा कोई आता दिखा। हमको तो यारों सेहत का ख्याल रखना जरूरी हो गया पर अब मुर्दे भी इस देश में अपनी सेहत के प्रति जागरूक हो गए? पता नहीं किसकी बददुआ से इन दिनों कमबख्त पेट भर रोटी क्या मिलने लगी कि मैं सेहत के प्रति कुछ ज्यादा ही जागरूक हो गया । भगवान किसी भी देश की जनता को और तो सबकुछ दे, पर भर पेट रोटी कभी न दे। इससे देश में कई गड़बड़ हो जाती हैं।

`और बंधु क्या हाल हैं? तुम भी सुबह सुबह सैर को आ निकले।´

`पत्नी जागने से पहले ही किचकिच शुरू कर देती है, बस इसीलिए चला आता हूं।´
कह मैंने अपने मुंह का कफ सामने खिले फूल के मुंह पर दे मारा,` पर आप की तारीफ! पहले तो आपको यहां कभी सैर करते नहीं देखा।´

` देखते कैसे? कब्र से आज ही जागा हूं।´

` कमाल है यार! यहां लोग सोचते है कि कब जैसे कब्र नसीब हो तो रोज की किचकिच से छुटकारा मिले और एक तुम हो कि कब्र में भी चैन नहीं आया और निकल आए एक बार फिर मरने। क्या इस देश में जी कर जी नहीं भरा जो मरके भी एक बार फिर जीने निकल आए?´ अजीब किस्म का मुर्दा है भाई साहब ये भी। लोग मरने के लिए खुदा से दुआएं कर रहे हैं और एक ये मुर्दा महाशय हैं कि....

`क्या करूं यार! मैं तो कब्र में चैन से पड़े रहना चाहता था पर ये एक तुम्हारी सरकार है न! हम मुर्दों तक को कब्र में चैन से सोने देना नहीं चाहती। यार परेशान किए रखने के लिए जिंदा मुर्दे क्या कम हैं जो हमें परेशान करने चले पड़े।´ कह वह आधा सड़ा मुर्दा रूआंसा हो गया। पर चलता वह मेरे साथ साथ रहा। अब मुर्दे को मुर्दे से घिन आने से तो रही। फर्क हम दोनों में केवल इतना था कि वह अतीत का मुर्दा था तो मैं वर्तमान का। थे तो हम दोनों औसतन मुर्दे ही,
´अब देखो ना यार! हफ्ता पहले सरकार ने मेरे साथ की कब्र में पांच साल से चैन से पड़े मुर्दे का प्रमोशन कर दिया। बेचारे ने जैसे ही अखबार में यह खबर पढ़ी, तबसे अपने होशो हवास में नहीं है। पागलों की तरह बहका हुआ है। मजे से कब्र में सो रहा था सारे झंझटों से दूर। अब कह रहा है, मुझे तो बस दफ्तर जाना है। हम मर गए उसे समझाते समझाते। पर वही नहीं मान रहा। कह रहा है मेरा प्रमोशन उस पद के लिए हुआ है जहां पर खाने की मौज ही मौज है। चाहे कुछ भी हो, मैं तो बस दफ्तर जाकर ही रहूंगा।´
`और तुम किसलिए कब्र से निकल आए? क्या तुम्हारा भी प्रमोशन हो रहा है?´
बड़ा गुस्सा आया सरकार पर। यार सरकार! हम मर गए यहां बीसियों बरसों से प्रमोशन के लिए एड़ियां रगड़ते-रगडत़े और एक आप हो कि मुर्दों को पटाने में जुटे हो। वोट हमारे लेकर सरकार बनाओगे कि मुर्दों के वोट लेकर!

पर यहां आजकल मुर्दों के वोटों से ही तो सरकारें बनती हैं। मंद बुद्धिजीवियों को और काम ही इतने हैं कि बेचारे चाह कर भी वोट पाने के लिए वक्त ही नहीं निकाल पाते।

` नहीं मेरा प्रमोशन नहीं होना है। मुझ पर सरकार मुकदमा चलाने की सोच रही है। मैं तो कहता हूं कि मुकदमे चलाने हैं तो डटकर चलाओ पर उन पर चलाओ जो भूख में रोटी की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उन पर चलाओ जो बेरोजगारी में रोजगार की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उनपर चलाओ जो झूठ को मात देने के लिए सच की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उन पर चलाओ जो सामाजिक न्याय की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उनपर चलाओ जो सामाजिक सुरक्षा की मांग करते हैं। सो कोई वकील ढूंढने निकला हूं जो मेरे केस की पैरवी कर सके। तुम्हारी नजरों में कोई ईमानदार वकील हो तो बताओ।´

उसने कहा तो बड़ी हंसी आई। ओ यार! जहां पर ईमानदारी भी ईमानदार नहीं वहां ........!

` यार! टेक इट सीरियसली! मामला सच्ची को गंभीर न हो तो खुदा कसम कब्र में चैन से सो रहा गधा भी बाहर न आए। मैं तो बंदा हूं। खुदा का न सही तो न सही।

`हं अ...! जिंदों के फैसले तो सरकार से उनके जिंदा जी हो नहीं रहे और लो भैया खोल दी मुदोंZ की फाइलें।´

`यही तो अपना रोना है भैया! सजा देनी है तो जिंदों को दो! हम तो कभी के मर लिए, आधे सड़ भी लिए भैया! फाइलें खोलनी है तो उनकी खोलो जिन्होंने देश को दोजख बना रखा है। उनको तो सादर उनके घर उनके गले में फूलों की मालाएं डाले सरकारी अमले के साथ छोड़ने जा रहे हो। गढ़े मुर्दे उखाड़ने से कभी समाज चला है क्या?? हम तो जो खा गए सो गू बना गए। अब तो कुत्तों ने भी हमारी कब्रों पर मूतना छोड़ दिया है। ऐसे में सरकार हमें तो बख्शे।´

`पर सरकार से मैं क्या गुजारिश करूं यार! अपनी तो घर में भी नहीं चलती।´ मैंने कहा तो वह कुछ कहने के बदले मन नही मन मुझे गालियां देता हुआ आगे हो लिया। चाहे मुर्दे जमीन के नीचे के हों चाहे जमीन के ऊपर के ,मुर्दे कुल मिलाकर होते मुर्दे ही हैं।

डॉ.अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक
सोलन-173212 हि.प्र.

Friday, July 10, 2009

होरी कहे पुकार के.....

होरी कहे पुकार के

हे रे होरी, हे रे गोबर, हे री धनिया , हे रे दमड़ी बसोर, हे रे हरखू, हे री सिलिया,हे रे हीरा, ओ री रूपा, ओ रे रामसेवक, ओ रे शोभा, हां री सोना, ओ री पुनिया, ओ री गोविंदी, ओ री झुनिया, आओ रे , चलो देश में लाकतंत्र आ गया है। आओ रिश्वत खाएं। छोड़ो रे तिल तिल कर मरना, कुछ खाने को नहीं मिल रहा है तो कोनो चिंता। सरकार बहादुर ने सब के लिए रिश्वत खाने के द्वार समान रूप से खोल दिये हैं। का हुआ जो राशन की दुकान पर से आटा गायब हुई गवा है। का हुआ जो राशन की दुकान पर से चावल गायब हुई गवा है। रिश्वत खाने के अवसर तो सरकार सड़क से संसद तक सभी को बराबर दे रही है। छोड़ो खेतों में काम करना, छोड़ो गऊदान के लिए तिल तिल मरना। चलो छोड़ो सब काम और पेट पर हाथ फेर फेर कर रिश्वत खाओ। देखते ही देखते मोटे हो जाओ। सब देश में रिश्वत खा रहे हैं। सबने आटा खाना छोड़ दिया है। सबने सब्जी खानी छोड़ दी है।

`पर साहब हम तो जन्मजात अनपढ़ हैं। हम तो जन्मजात शोषित हैं। मातादीन आज भी हमें लूट रहा है। दातादीन आज भी हमें लूट रहा है। झिंगुरी सिंह आज भी हमारा तेल निकाल रहा है। पटवारी को अगर मेरे माई बाप हम आज भी नजराना और दस्तूरी न दें तो गांव में तो गांव में, खेत में जाना मुश्किल हो जाए। आज भी जो गांव के प्रधान और उसके कारिंदों के पेट न भरें तो राशन कार्ड कैंसिल हो जाए। बी पी एल में तो लाला लोगन का ही हक है। पुलिसवाले तो आज भी हमारे दामाद हैं। जब जब गांव में उनका खाने को मन करे बिन सूचना दिए सांड की तरह आ धमकते हैं और तब धर्म निरपेक्ष देश में हमारा धर्म हो जाता है कि हम सबकुछ छोड़ उनका आदर सत्कार करें। उन्हें नजर नयाज दें। नहीं गांव में हरेक की मां बहन हो जाए। गांव में कुत्ते कम आते हैं मुलाजिम अधिक । हम तो आज भी उनके सामने हाथ बांधे खड़े रहते हैं। अपने पशुओं के लिए चारे का इंतजाम हो या न हो उनके लिए सारे काम छोड़ चारे, अंडे ,मुर्गी दूध,घी का इंतजाम करना पड़ता है। आज भी हमें रोटी खाने की आदत नहीं तो रिश्वत कैसे खांए?´ सबने सिसकते हुए हाथ जोड़ते कहा। धत्त तेरे की ! मैंने भी कैसे भूखे नंगों को रिश्वत खाने के लिए आमंत्रित कर अपनी नाक कटवा ली। सोचा था, ये भी जो सदियों से गंगा की केवल धाराएं गिनते गंगा किनारे बैठे हैं, थोड़ा बहती गंगा में हाथ धो लें। समाजवादी हूं न! सोचता हूं देश के अन्य संसाधनों की तरह रिश्वत पर भी सभी का समान रूप से हक हो। सोचता हूं देश में सब अधिकार सबको समान रूप से मिलें।

`अनपढ़ हो तो क्या हुआ! जन्मजात शोषित हुए तो क्या हुआ। अब देश आजाद हो गया है। अनपढ़ को क्या रिश्वत खाते हुए शर्म आती है? शोषित को क्या रिश्वत खाते हुए शर्म आती है? अनपढ़ को क्या रिश्वत खाते हुए पेट में दर्द होती है? शोषित का क्या आजाद देश में रिश्वत खाते हुए पेट में दर्द होती है? अनपढ़ के क्या पेट नहीं होता? शोषित को क्या पेट नहीं होता? अनपढ़ का क्या हराम का खाने को मन नहीं करता? शोषित का क्या हराम का खाने का मन नहीं करता? जिनमें दिमाग है जब उनको ही रिश्वत खाते हुए शर्म नहीं आती तो अनपढ़ में जब दिमाग ही नहीं होता तो उसे तो कम से कम रिश्वत खाते हुए शर्म नहीं आनी चाहिए। देखो, रिश्वत खाने वाले कैसे धड़ा धड़ पुरस्कृत हो रहे हैं। रायसाहब की तरह हवेलियों पर हवेलियां बनाए जा रहे हैं।´

`पर हम रिश्वत कैसे खाएं? हम तो तंत्र से बाहर हैं।´

`तो तंत्र में आओ।´

`कैसे??´

`किसी लीडर को पटाओ। चुनाव के दिनों में उसके पोस्टर चिपकाओ। उसके लिए जान हथेली पर रख वोट जुटाओ। फिर तंत्र में कुछ भी हो जाओ।´

` तो क्या हम राय साहब हो जाएंगे? तो क्या हम पंडित दातदीन हो जाएंगे? तो क्या हम थानेदार साहेब हो जाएंगे? तो क्या हम कानिसिटिबल हो जाएंगे? तो क्या हम कानूनगो हो जाएंगे? तो क्या हम डिप्टी हो जाएंगे? तो क्या हम कमिसनर हो जाएंगे? तो क्या हम कलक्टर हो जाएंगे? तो क्या हम डाक्टर हो जाएंगे? तो क्या हम इंजिनियर हो जाएंगे? तो क्या हम नहर वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम जंगल वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम ताड़ी- सराब वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम गांव सुधार वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम खेती वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम पादड़ी हो जाएंगे? तो क्या हम जमींदार हो जाएंगे?´

`इस सबके लिए तो पढ़ा लिखा होना जरूरी होता है। तभी तो सरकार कहती है पढ़ो और पढ़कर देश का बेड़ा गर्क करो।´

` तो??´ सबको सांप सूंघ गया,` तो रिश्वत कैसे खाएं?´

` लीडर से कहो तुम्हें चेयरमैन बना दे। नेता से कहो तुम्हें मंत्री बना दे।´

`इस सबके लिए अनपढ़ चलेगा क्या?´

` चलेगा क्या, दौड़ेगा। सरपट । खरगोश की तरह। देश का वोटर पढ़ा लिखा होना चाहिए पर नेता नहीं। ´ मैंने कहा तो होरी ने सबको बला बुला कुलांचे भरते हुए कहा,` `हे रे काली, हे रे जीतू, हे रे मंगू, हे रे नंदसिंह, हे री प्रीतो, हे रे चौधरी कंता, हे रे चौधरी बसंता हे रे गोबर, हे री धनिया , हे रे दमड़ी बसोर, हे रे हरखू, हे री सीलिया,हे रे हीरा, ओ री रूपा, ओ रे रामसेवक, ओ रे शोभा, हां री सोना, ओ री पुनिया, ओ री गोविंदी, ओ री झुनिया, आओ रे , चलो देश में लाकतंत्र आ गया है। पर भैया! हम काहे रिश्वत खाएं? लोक तो बिगड़ा ही ,परलोक भी बिगाड़ें क्या?? जारी रखो रे तिल तिल कर मरना, कुछ खाने को नहीं मिल रहा है तो कोनो चिंता। लेओ भैया! सरकार बहादुर ने सब के लिए रिश्वत खाने के द्वार समान रूप से खोल दिये हैं। फुकने दो जो राशन की दुकान पर से आटा गायब हुई गवा है। फुकने दो जो राशन की दुकान पर से चावल गायब हुई गवा है। पर लेओ रिश्वत खाने के अवसर तो सरकार सड़क से संसद तक सभी को बराबर दे रही है। पर हम तो मजूरी ही करें। चलो भूखो ही मरें। ईमानदारी से ही पेट पालें। रिश्वत खाने वालों का नहीं रे! देश अपना है ,धरती अपनी है। सब तो देश में रिश्वत खा रहे हैं। पर आओ रिश्वत न खाकर हम देश के विकास में हाथ बंटावें, हम तो बच न सके, पर चलो मिलीके देश बचावें।´

डॉ. अशोक गौतम

गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

Thursday, June 18, 2009

जब फ्लू महाराज मेरे घर पधारे !

सच कहूं तो मैं किसी अशोक गौतम को नहीं जानता...ख़ुद-ब-ख़ुद व्यंग्य लेकर बैठक में दाखिल हो गए....बिना दस्तक दिए...हिमाचल प्रदेश जैसे दूर राज्य से चलकर आए हैं, मना कैसे करते....बताते हैं कि 20 साल पहले से ही व्यंग्य और कहानी लेखन में कलम तोड़ रहे हैं....फिलहाल, शिमला स्थित राजकीय महाविद्यालय शिमला में हिंदी संकाय में वरिष्ठ प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं....टिकने को तो जगह दे दी है, बाक़ी आप लोग तय करें कि इनसे पिंड छुड़ाना चाहते हैं कि आगे भी बर्दाश्त करते रहेंगे.....इनकी तस्वीर भी आपको दिखाए देते हैं....

जिंदगी के टंटों से बचने के लिए रोज सुबह की तरह तब भी गुणगान चालीसा पढ़ने में मग्न था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। पहले तो सोचा कि शायद मेरी भक्ति से हनुमान जी प्रसन्न होकर टंटों से रक्षा करने के लिए आ पहुंचे हों। मैं गुणगान चालीसा और भी जोर से पढ़ता हुआ फटी पैंटलून धारण किए दरवाजे की ओर लपका। दरवाजा खोला तो सामने एक निहायत अपरिचित। वह अपरिचित किसी भी कोण से परिचित नहीं लग रहा था। चाहे कितना ही मान लेता कि गुणगान अपने भक्तों को वेश बदल कर दर्शन देते हों। बचपन में दादी मां से सुना था कि न जाने किस वेश में आ जाएं गुणगान, सो न चाहकर भी उस अपरिचित के स्वागत के लिए बाहें खोलने का नाटक करना पड़ा, `आओ गुणगान! धन भाग हमारे! हमारी कुटिया में जो आप मंहगाई के दौर में पधारे।´
मैंने मुस्कराने का सफल अभिनय किया। अपने दोस्तों के बीच निरंतर उठने बैठने से मैं अभिनय में विद्या वाचस्पति हो गया हूं।
` और भक्त कैसे हो?´
कह उस अपरिचित आगंतुक ने मेरी आंखों में झांकते हुए पूछा तो लगा अपने सारे कष्ट कट गए हरिद्वार।
` ठीक हूं प्रभु! पर आप इतनी गर्मी में।´
`हम गर्मी-सर्दी से ऊपर उठे हुए बंदे हैं।´
उसने यों कहा जैसे मुझसे मजाक कर रहा हो तो उसमें मेरी जिज्ञासा और भी बढ़ी।
` आओ भीतर आओ! पर माफ कीजिएगा मैंने आपको पहचाना नहीं। अपने असली रूप में आओ तो मैं धन्य होऊं।´
कह मैंने दोनों हाथ सविनय जोड़े तो उस आगंतुक की सांसों में सांस आई।
`यार, मैं तो डरा था कि तुम दरवाजा खोलोगे ही नहीं।पर तुमने तो मेरी पहली ही दस्तक में घर का तो घर का, दिल का द्वार भी बड़ी आत्मीयता से मेरे लिए खोल दिया। सच्चाई को जितना किताबों में पढ़ा था तुम भारतीयों का हृदय आज भी उससे हजारों गुणा विशाल है।´
`प्रभु, आज के आपाधापी के दौर में बस कम्बख्त एक यह दिल ही तो हमारे पास बचा है। बाकी तो मंहगाई मार गई। अब देखो न! मंदी के इस दौर में भगवान को जलाने वाले धूप को खरीदने के भी लाले पड़ने लगे हैं। ऊपर से साहब है कि रोज शिकायत करता है कि मेरे लिए जलाने वाले धूप की क्वालिटी सुधारो वरन् छंटनी कर दूंगा। बस, अब अपने से न तो जीते बन पड़ रहा है न मरते। समझ नहीं आ रहा कि जिआ जाए या मरा जाए। बस इसी दुविधा में जी रहा हूं।´
`यही दुविधा तो हम तुम्हारी खत्म करने के लिए आए हैं। बस, अब कुछ दिनों की बात है। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।´
उसने कहा तो मन किया उसके पांव में ऐसे लोटूं जैसे पड़ोसी का कुत्ता मेरे पांव में लोटता है एक टुकड़ा रोटी के लिए।
` तो अंदर पधारिए न प्रभु! हमारे लिए आज भी अतिथि देवो भव ही है। वह चाहे आतंकी ही क्यों न हो।´
`सच!! अगर मैं कहूं कि मैं भी आतंकी ही हूं तो?´
` पचास का हो गया अतिथि! इतना तो आज का बच्चा भी जानता है कि जो आदमी कहता है असल में वो होता नहीं और जो वह कहता नहीं असल में वह वह ही होता है।´
कह मैं उस अपरिचित को मुस्कराते हुए भीतर ले आया।
पत्नी को ठंडा लाने के लिए कहा तो वह गर्म ले आई। अपरिचित ने मुस्कराते हुए गर्म ही ठंडा समझ पीना शुरू करते कहा,` डांट वरी! वैवाहिक जीवन की एक उम्र पार करने के बाद सबके साथ ऐसा ही होता है। और गृहस्थी कैसी चली है?´
`चली क्या बस खींच रहे हैं जनाब छाले पड़े पैरों पर। मां को चार साल से लकवा हो गया है। बापू सरकारी अस्पताल के हो कर रह गए हैं। जितने दिन सरकारी अस्पताल में रहते हैं, ठीक रहते हैं, घर आते ही फिर वही हाल हो जाते हैं। पहला बेटा एमबीए कर फैक्टरी फैक्टरी की धूल फांक रहा है। दूसरा एमए कर रहा है। बेटी विवाह लायक हो गई है, पर कहीं सुयोग्य तो छोड़िए योग्य वर दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रहा। ऊपर से पत्नी है कि दिन पर दिन ढलती जा रही है। ´

मैंने अपनी व्यथा कही तो वह आगंतुक गंभीर होने के बदले मुस्कराने लगा। काफी देर तक मुस्कराने के बाद बोला,
`और?´
` और क्या! ऊपर से साहब की रोज़-रोज़ की किच किच!´ कहते कहते रोना निकलन को आ गया पर उम्र का ख्याल आते ही हिम्मत कर दांत कस लिए।
`बस, अब मैं आ गया न, अब चिंता की कोई बात नहीं। अब पूरे देश में सब ठीक हो जाएगा।´
`पर हे आगंतुक आप हो कौन? आप तो ऐसे कह रहे हो जैसे इन दिनों यूपीए सरकार बोलती है।´
` बंधु, मैं स्वाइन फ्लू हूं। सरकार से बड़ा, बहुत बड़ा।´
कह उसने गिलास किनारे रख ठहाका लगाया।
`तो?´
`तो क्या! कहीं भी मुझे शरण नहीं मिली। सोचा भारत में तो कम से कम मुझे शरण मिलेगी ही। इतिहास गवाह है । वर्तमान गवाह है। इसलिए सब छोड़ चला आया। और देखो! तुमने मेरा किस गर्मजोशी से भी स्वागत किया।´
`पर यहां तुम करोगे क्या?´
`सबको बेहाल कर कर मारूंगा।´
`यहां तो सभी पहले से ही बेहाल होकर मर रहे हैं। बेकारी से भी बड़ी बेहाली और कोई होती है क्या? भुखमरी से भी बड़ी बेहाली और कोई होती है क्या? गरीबी से भी बड़ी और कोई बेहाली होती है क्या? पल पल के भय से बड़ी बेहाली और होती है क्या?ऐसे में तुम हमें क्या बेहाल करोगे, देख लेना चार दिन बाद खुद ही बेहाल होकर यहां से चले न गए तो तुम्हारे जूते पानी पीऊं।´


मैंने कहा तो उसने मेरे पांव छुए और सिर झुकाए उदास चेहरा लटकाए चला गया। उसे जाते देख पत्नी के चेहरे की रौनक देखने लायक थी।..... जो कोई अपनी व्यथा सुनावै...


डा. अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,सोलन-173212 हि.प्र.

Monday, June 15, 2009

बीजेपी के महा'खल'नायक...



एक पुरानी कहावत है....जब रोम शहर जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था....भारतीय जनता पार्टी के लिए फिलहाल ये जुमला एकदम फिट बैठता है....इधर यशवंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर पार्टी की हार के ज़ख्मों पर नमक छिड़का तो अपनी हालत पर विचार करने के बजाय पार्टी के नेता अपने-अपने शौक पूरे करने में लगे हैं.....टीवी पर टी-20 क्रिकेट मैच देखते-देखते नज़र पड़ी अरुण जेटली पर....लॉर्डस के मैदान में भारतीय क्रिकेट टीम का हौसला बढ़ाने के लिए अरुण जेटली अपनी हाज़िरी लगा रहे थे.....अरुण जेटली नेता विपक्ष हैं....चुनाव में पार्टी की नीति तय करने वाले बीजेपी के चाणक्य.....सियासत के इस चाणक्य की नीतियों का क्या हश्र हुआ, चुनाव के नतीजे बता चुके हैं.....यूपी की चुनावी नैया भी इन्हें ही पार लगानी थी, मगर वहां भी पार्टी ने कांग्रेस को लगभग वाकओवर दे दिया.....

यूपी की बदनसीबी

इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस रामनाम के फॉर्मूले की ज़मीन यूपी में है, वहां उसकी हालत सबसे ज़्यादा पतली है...राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी यूपी के ही हैं....सूबे के सीएम भी रह चुके हैं....मगर, पार्टी के लिए कुछ नहीं कर सके....लालजी टंडन और कलराज सिंह यूपी के सबसे दिग्गज नेताओं में हैं मगर जनाधार कितना है ये मायने रखता है.....कल्याण सिंह के पर कतर दे गए तो वो पार्टी से बाहर समाजवाद का ढोंग कर रहे हैं....फिर, यूपी में बचा क्या.....वरुण गांधी ! जिन्हें ख़ुद ही नहीं पता कि पार्टी के हित में कहां तक जाना उचित रहेगा....
राजनाथ सिंह की बेबसी पर तरस आता है....डमी अध्यक्ष की तरह लगते हैं....अटल जी की तरह पॉज ले-लेकर बोलते हैं, मगर सुनता कौन है.....पूरी पार्टी असमंजस में है.....

चुटकी हो जाए....
राजनीति की बहुत ज़्यादा समझ नहीं है.....दसवीं क्लास में एक ख़ास दोस्त की बात याद है....समय बरबाद करने का सबसे आसान तरीका है कि आप भारतीय राजनीति पर बातचीत शुरु कर दें......कोई नतीजा नहीं निकलने वाला, चाहे जितना सर खपा लें.....अरुण जेटली भी शायद ये समझ चुके हैं....ठीक किया, मन बदलेगा तो कहीं किस्मत भी बदल जाए.....खूब क्रिकेट देखिए....सूट-बूट में तो रहते ही हैं.....कहीं एकाध विज्ञापन ही मिल जाएं तुक्के में....विज्ञापन वाला पूछे,
‘क्यों जेटली जी, आजकल तो खाली-खाली ही हैं....आइए ना, एक ऐड कर लीजिए.....’
‘किस चीज़ का ऐड है भाई ’
‘ठंडे तेल का विज्ञापन करना है , ख़ास आपके लिए...आपको ज़रुरत भी है आजकल ’
‘उड़ा लो बेटा, मज़ाक उड़ा लो....क्या फर्क पड़ता है...वैसे साइनिंग अमाउंट कितना है’
‘सर, इससे क्या फर्क पड़ता है....’
‘हां, फर्क तो नहीं पड़ता.....आजकल और कुछ करने को तो है भी नहीं....विपक्ष में बैठने में रखा भी क्या है.....मुझे कुछ कहने की ज़रुरत ही नहीं पड़ने वाली....हमारी पार्टी में बोलने वालों की कमी है क्या ’
‘सो तो है, 29 साल के बच्चे भी बोलते हैं तो अच्छे-अच्छों की बोलती बंद कर देते हैं....सर, हम आपको इस तेल का ब्रांड एंबेसडर बनाना चाहते हैं....मुझे लगता है कि आपकी पार्टी से हमें बहुत फायदा होने वाला है...वैसे भी आपकी पार्टी में सब तेल लगाने में माहिर हैं.....’
‘मुझे बार-बार लग रहा है कि आप मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं....’
‘नहीं सर, मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं (जनता ने तो आपका जो मज़ाक उड़ाया है, उसके आगे मैं.....)’
‘ठीक है, ठीक है....मैं यहां मैच का मज़ा लेने आया हूं....मुझे मैच देखने दो..’
‘सॉरी सर, मैं चलता हूं.....’
‘अच्छा सुनो, वो साइनिंग अमाउंट स्विस बैंक वाले खाते में ही डलवाना....भारत में आजकल बड़े ख़तरे हैं......’

निखिल आनंद गिरि

Saturday, March 21, 2009

सोने का पिंजर (9)

नौवां अध्याय

अमेरिका में हिंदुस्तानी शान से हिंदी बोलता है....

हम अमेरिका हिन्दी सम्मेलन के निमित्त गए थे तो हिन्दी की बात भी करनी होगी। सच तो यह है कि पूरा अमेरिका घूम आइए आपको हिन्दी ही हिन्दी दिखाई और सुनाई देगी। इतने हिन्दुस्तानी वहाँ बसे हुए हैं और सभी को अपनी पहचान भी स्थापित और सुरक्षित रखनी होती है तब हिन्दी का ही सहारा रहता है। फिर जहाँ भारतीय हों वहाँ भारतीय खाना तो अवश्य ही होगा। शहर में कई-कई भारतीय रेस्ट्रा, वहाँ खाना भी हिन्दुस्तानी और भाषा भी हिन्दी। भारतीय खाने का जवाब नहीं और इसी कारण क्या अमेरिकी और क्या अन्य सभी वहाँ आते हैं। जब खाना खाने आते हैं तब कुछ न कुछ तो हिन्दी के प्रति आकर्षण पैदा हो ही जाता है। हिन्दी वहाँ खाने और फिल्मों के कारण ही पसन्द नहीं की जाती है, उसका एक ठोस कारण भी है। युवा दंपति आकर बस गए अमेरिका, कुछ दिन मौज-मस्ती कर ली, फिर बच्चे हो गए। जैसे ही बच्चे बड़े होने लगे कि डर सताने लगता है। कहीं ये अपनी भाषा नहीं भूल जाएं, अपने संस्कार नहीं भूल जाएं? हम तो भारत में अपने घर-परिवार को छोड़कर यहाँ आकर बस गए लेकिन यदि हमारे बच्चे पूर्णतया अमेरिकी बन गए तो फिर हमारा भविष्य क्या होगा? जिस राम की कथा को उन्होंने भुला दिया था उसी राम की कथा को वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। पिता का स्वार्थ है कि बच्चे अपने संस्कारों से जुड़े रहें इसलिए हिन्दी सीखे और बच्चों का स्वार्थ है कि हिन्दी फिल्में और गाना सुनना है तो फिर हिन्दी तो सीखनी ही पड़ेगी। बिना हिन्दी सीखे हिन्दी फिल्मों का आनन्द कैसे लिया जा सकता है?
इण्डियन कम्यूनिटी सेंटर पर कार्यक्रम चल रहा था, एक बच्चा बड़ा अच्छा गाना गा रहा था। उससे पूछा गया कि क्या तुम्हें हिन्दी आती है, तो वह बोला कि नहीं गाना याद कर लिया है। जब गाना याद हो गया है तब हिन्दी भी दबे पाँव उसके अन्दर उतर ही जाएगी। वहाँ सारा दिन हिन्दी और भारतीय ज्ञान की कक्षाएं लगती हैं। कोई हिन्दी सीख रहा है, कोई भारतीय शैली के विभिन्न नृत्य। फिर भारतीय बाजार इतना बड़ा है कि सभी को व्यापार करना है। इसलिए ही अमेरिका के प्रेसीडेन्ट कह उठते हैं कि हिन्दी नहीं सीखोगे तो पीछे रह जाओगे। हमारा युवा भारत में रहकर हिन्दी की उपेक्षा करता है, लेकिन वहाँ हिन्दी उसके लिए गौरव का विषय है। क्योंकि वही उसकी पहचान है।
विश्व हिन्दी सम्मेलन में सारे विश्व के प्रतिनिधि थे। जब चीन और जापान के प्रतिनिधि बोलने को खडे हुए तब आश्चर्य हुआ। मैंने मजाक में कहा कि यहाँ तो पता ही नहीं चलता कि कौन हिन्दी नहीं जानता, हम यदि किसी को ऐसा वैसा हिन्दी में कह दें तो ये तो सभी हिन्दी जानते हैं, फिर क्या होगा? मेरे साथ ही सम्मानित होने वालों की सूची में कोरिया की एक सुन्‍दर सी महिला थीं। मुझे उनसे हिन्दी में बात करने में संकोच हो रहा था। बड़ा अजीब सा लग रहा था, एक विदेशी महिला को हिन्दी बोलते हुए देखते। वहाँ कोई भी प्रतिनिधि अंग्रेजी में बात नहीं कर रहा था, जबकि हमारे भारत में लोग अंग्रेजी में बात करना अपनी शान समझते हैं। भारत में सभी को हिन्दी आती है लेकिन क्या टी.वी, क्या संसद सभी ओर अंग्रेजी छायी रहती है। वह तो व्यापारीकरण के कारण टी.वी. चैनलों को समझ आ गया है कि हिन्दी में ही सफलता का सूत्र छिपा है तो वे अब हिन्दीकरण में लगे हैं।
सम्पूर्ण अमेरिका में घूम आइए, उनकी संस्कृति के मूल चिंतन का दिग्दर्शन प्रत्येक क्रियाकलाप में आपको मिलेगा। वे प्रकृति के सिद्धान्त ‘सर्ववाइवल आफ द फिटेस्ट’ के पोषक हैं। वहाँ व्यक्ति अकेला है। उसे स्वयं को ही सारे कार्य करने हैं। आपका कोई सहयोगी नहीं। यदि आप ताकतवर नहीं, आत्मविश्वासी नहीं तो फिर आप वहाँ रह नही सकते। वहाँ पब्लिक ट्रांस्पोर्ट न के बराबर हैं अतः जब तक आप गाड़ी चलाना नहीं जानते आप घर से बाहर भी नहीं निकल सकते। कमसिन सी लड़कियां, जो हवा के झोंके से भी लहरा जाए, बड़ी-बड़ी गाड़ियां चलाती हैं। चलाती ही नहीं सरपट दौड़ाती हैं। वहाँ की अमूमन स्पीड है 80 मील प्रति घण्टा, कि.मी. की भाषा में कहें तो वहाँ गाड़ियां लगभग 125 से 150 कि.मी. प्रति घण्टे की रफ्‍तार से चलती हैं। सड़कों पर केवल गाड़ियां दौड़ती हैं, पुलिस भी दिखायी नहीं देती। आप रास्ता किसी से पूछ नहीं सकते, या तो आपकी गाड़ी में नेवीगेटर लगा हो या फिर आप मैप लेकर बैठे। वहाँ 99 प्रतिशत लोग अपनी गाड़ी रखते हैं केवल एक प्रतिशत लोग पब्लिक ट्रांस्पोर्ट का उपयोग करते हैं।
हम कई दिनों तक वहाँ घूमते रहे और हमें रेल कहीं दिखायी नहीं दी, आखिर हमने बेटे से पूछ ही लिया कि यहाँ की रेल तो दिखा दो। कुछ देर बाद ही उसने पास जाती दो डिब्बों की बस जैसी रेल दिखा दी। जो हमारे साथ ही शहर की सड़कों पर दौड़ रही थी, पटरी समानान्तर बिछी थी और रेल भी ग्रीन-रेड लाइट से रुकती-चलती थी। शहरों को भी आपस में जोड़ने के लिए रेलमार्ग है लेकिन वह बहुत ही कम है। उनमें भी यात्री गिने-चुने ही होते हैं। यही हाल बस का है, पूरी खाली या फिर एकाध सवारी को ले जाती हुई आपको दिख जाएगी। हमारे जैसा नहीं है कि घर से बाहर निकलो और रिक्शा, टेम्पो, बस सभी कुछ तैयार।
हाँ तो मैं वहाँ की संस्कृति के बारे में कह रही थी, जैसे वहाँ स्वयं को ही गाड़ी हाँकनी होती है वैसे ही आपको अपने पेट भरने के लिए सारे काम करने होते हैं। बाजार में न कोई दर्जी, न कोई जूते सीने वाला और न कोई मेकेनिक। यूज एण्ड थ्रो बस। हमारे यहाँ एक-दूसरे के लिए कार्य करने की प्रवृत्ति है, कोई कमाता है, कोई घर देखता है। अमेरिकन्स का तो खाना अलग तरह का होता है, तो सारी खटपट हो जाती है और शायद उन्हें तो आदत भी है। लेकिन भारतीयों की मुश्किल होती है, जब वे भारत से चलते हैं तब तक नौकर-चाकर, ड्राईवर आदि सभी होते हैं। लेकिन यहाँ अपना हाथ-जगन्नाथ। बुढ़ापे की कद्र वहाँ भी है, उनके लिए सुविधाएं भी खूब हैं लेकिन वे बूढ़े हैं इसलिए सरकार सुविधाएं देती हैं, वे परिवार के सम्मानित सदस्य हैं यह सोच नहीं है। लेकिन वे सब प्रसन्न हैं क्योंकि उन्होंने भारत नहीं देखा है। वे जब भारत के बारे में पढ़ते हैं तो उन्हें भी उत्सुकता होती है कि देखें कैसे परिवार होते हैं, जहाँ घर का मुखिया एक बूढ़ा दादा होता है।
कल तक वे भी परिवार के साथ ही रहते थे, लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता और अर्थ ने अपने पैर जमाए हैं, वैसे-वैसे परिवार टूटकर बिखरते जा रहे हैं। वहाँ एक आम नागरिक के जीवन में संघर्ष नहीं है। सभी कुछ उपलब्ध है। जो बनना चाहते हो, उस पर भी पाबंदी नहीं है। पढ़ाई के प्रति इतना आग्रह नहीं है। वहाँ का समाज अधिक पढ़ाकू बच्चे को पसन्द नहीं करता। इसीलिए खेलों के प्रति अधिक रूझान है। बच्चा खेले, कूदे या फिर कोई साहस का कार्य करे, वह ज्यादा अच्छा माना जाता है। पैसा जमा करना उनका शौक नहीं। क्या करेंगे पैसा जमा करके? सामाजिक उत्तरदायित्व कुछ नहीं। सरकार ही बुढ़ापे का सहारा है। पढ़ने के लिए लोन मिल जाता है। बस पाँच दिन कमाओ और दो दिन खर्च कर दो। आम अमेरिकी सोमवार से लेकर शुक्रवार तक काम करता है, लेकिन शुक्रवार की रात से रविवार तक पूर्ण आराम। शुक्रवार की रात जश्न की रात होती है। सड़कों पर गाड़ियां दौड़ती रहती है, पीछे बड़ी-बड़ी नावें बंधी हैं, साइकिले बंधी हैं, समुद्र किनारे कैम्प करेंगे, किसी जंगल में जाकर कैम्प करेंगे या फिर किसी होटल में जाकर दूसरे शहर रहेंगे। मुख्य शहर वहाँ डाउन टाउन कहलाता है, वहाँ शुक्रवार और शनिवार की रात को चले जाइए, दीवाली जैसा माहौल मिलेगा। लोग बैठे हैं, नाच रहे हैं, सिगरेट पी रहे हैं और क्लब में जाने के लिए लम्बी-लम्बी कतारों में लगे हैं। उस दिन दो-तीन बजे तक जश्न रहेगा। लेकिन सोमवार से फिर खामोशी, जीवन रात को आठ बजे ही थम जाएगा।
वहाँ नौकरी पर जाना भी मनमाना है, कोई सुबह सात बजे जा रहा है और फिर दिन में तीन बजे वापस आ रहा है और कोई दस बजे जाकर पाँच बजे। अधिकतर ऑफिस चौबीस घण्टे खुले रहते हैं तो काम अपने हिसाब से ही करते हैं। एक दिन रात्रि को हम भी बेटे के साथ उसके ऑफिस पहुँच गए। गेट पर कोई संतरी नहीं, चौकीदार नहीं। बस अपना कार्ड निकालिए और स्क्रेच कीजिए और गेट खुल जाएगा। वह हमें अपना ऑफिस दिखा रहा था, उसका एक साथी देर रात तक केबिन में बैठा था। वह बोला कि यार घर पर कोई है नहीं तो यहाँ ही आराम से बैठा हूँ, किताब पढ़ रहा हूँ। वहाँ अधिकतर सभी के केबिन होते हैं। मैंने पूछा कि तुम्हें कमरा कब मिलता है? वह बोला कि मेरे वाइस-प्रेसीडेन्ट भी बगल वाली केबिन में ही बैठते हैं। कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं। बस वेतन में बहुत अन्तर है। किसी को कुछ हजार डॉलर वेतन है तो कुछ को लाखों में। एक ही पद पर काम करने वाले लोगों में भी वेतन का अन्तर है। जिसका जैसा काम, उसका वैसा वेतन। कोई किसी का वेतन पूछता भी नहीं, क्योंकि यह आउट ऑफ एटिकेट है। क्या पता पूछ ले तो हमारे जैसे हड़ताल हो जाए? खैर हम सारा ऑफिस देखकर बाहर आ गए। जैसे ही उसके कक्ष से निकलकर गैलेरी में बाहर आए, मालूम पड़ा कि उसका कार्ड अन्दर ही रह गया। अब क्या हो? बाहर तो निकल सकते हैं, लेकिन वापस अन्दर नहीं जा सकते। उसने कहा कोई बात नहीं सुबह किसी के साथ भी अन्दर चला जाऊँगा। नहीं तो इमरजेन्सी में दूसरा कार्ड बनवाना पड़ेगा। वहाँ आपके पास कार्ड नहीं है तो आप कहीं भी प्रवेश नहीं कर सकते।
रात्रि भोज का रिवाज नहीं, सब आठ बजे पहले-पहले खाना खा लेते हैं। अमेरिकन रेस्ट्रा आठ बजे बन्द। सूर्य छिपता है कहीं नौ बजे और कहीं साढ़े आठ बजे। यहाँ भी भारतीय अपनी चलाते हैं, उनके रेस्ट्रा बन्द होंगे रात्रि दस बजे। किसी भी अमेरिकन को रात्रि में आठ बजे बाद फोन करना अनुशासनहीनता कहलाती है। मन में प्रश्न उचक-उचक कर आता है, कि हम भारतीयों ने देर रात तक जागना किससे सीखा? क्यों हम कहते हैं कि पश्चिम की नकल कर रहे हैं? पश्चिम में केवल दो दिन देर रात तक जागने का रिवाज है, बाकि सब कुछ मर्यादित। हमारे यहाँ तो रोज ही रात्रि में दस बजे बाद दिन शुरू होता है। रोज ही हुल्लड़, वह भी सड़कों पर। वहाँ कहीं भी शोर नहीं। होर्न बजाना तो जैसे अपराध। न कोई लाउड-स्पीकर न कोई बैण्ड-बाजे। कॉलोनियों में तो सातों दिन ही सन्नाटा पसरा रहता है।
हम जैसे भारतीयों की तो जीभ ही सूख जाती है। आलोचना रस तो गोंद जैसे सूख कर हलक में अटक जाता है। किससे बात करें? सब आते-जाते केवल मुस्कराहट फेंकते हैं। ज्यादा से ज्यादा गुडमार्निग बस। भारतीय तो कुछ भी आदान-प्रदान नहीं करते। मैंने पूछ ही लिया इसका कारण कि अमेरिकन तो गुडमार्निंग करता है और भारतीय मुँह फेर कर क्यों चलता है? उत्तर बड़ा ही मजेदार था, यहाँ भारतीय एम.वे. वालो से बड़े डरे हुए हैं। जरा सा मुस्करा दो, एम.वे. वाला एजेन्ट आपको धर दबोचेगा। भई इनसे दूर ही रहो, अपनी नौकरी के लिए अपना देश छोड़कर आए हैं और यहाँ अपनी नौकरी छोड़कर इनके तैल-शैम्पू बेचो। एक पर्यटक स्थल है ‘येशूमिटी’ हम वहाँ गए। सुबह जल्दी उठकर पैदल ही पहाड़ पर चढ़ना था, रास्ते में अमेरिकन्स मिलते गए और गुडमार्निंग होती रही। हमने सोच लिया था कि भारतीय मिलने पर हम भी नमस्ते करेंगे। दो भारतीय लड़के मिल गए, हमने दूर से कहा कि ‘नमस्ते’। अब उनके चौंकने की बारी थी, उन्होंने भी बड़े गर्व से कहा नमस्ते। हिन्दी सुनकर लगा कि उनकी आत्मा तक खिल उठी है। मुझे लगा कि हमने नाहक ही संकोच बना लिया है और दूरियां भी। लेकिन पास लाने का काम मन्दिर और कम्यूनिटी सेन्टर कर रहे हैं। सारे भारतीय रोज ही एकत्र होते हैं और सब मिलकर सारे ही त्यौहार मनाते हैं। मज़ेदार बात तो यह है कि पाकिस्तानी भी वहाँ आ जाते हैं। एक दिन इण्डियन कम्यूनिटी सेंटर पर एक सज्जन गाना गाने खड़े हुए और गाना था ‘मेरा जूता है जापानी’ फिर परिचय दिया कि मैं पाकिस्तानी हूँ। वहाँ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान से अधिक एशियन ज्यादा प्रचलित नाम है।

डॉ अजित गुप्ता

Monday, February 23, 2009

अँधविश्वास बनाम दृढ़विश्वास...

हमारे देश का इतिहास विश्व में सबसे पुराना है। इस देश में धर्मों और सम्प्रदायों की कोई कमी नहीं। एक ढूँढो हजार मिलते हैं। और हर कोई कहता है कि 'हमसे बेहतर कोई नहीं'। खैर ये ईश्वर में श्रद्धा का विषय है। लेकिन इसी धर्म ने एक और चीज़ पैदा की.... वो है अँधविश्वास-इसे मैं कईं बार घर्म का साइड-इफेक्ट मानता हूँ। ईश्वर में आस्था अलग है पर जब यही आस्था बढ़ जाती है तो अँधविश्वास का रूप ले लेती है। आज बात इसी पर होगी। वैसे ये विश्वास और अँधविश्वास बहुत अच्छी तरह से बिकता है। टीवी पर कभी काल-कपाल दिखाई देते हैं। कभी साईं बाबा की फूलों की माला बढ़ जाती है तो कभी किसी भगवान की फोटों में आँखों से पानी आने लगता है। कभी तांत्रिक विद्या का लाइव प्रसारण होता है तो कभी लोगो को हाथों के इशारे से गिरते हुए दिखाया जाता है। पता नहीं न्यूज़ चैनल चाहते क्या हैं।

पीछे एक खबर देखी। हुआ यूँ कि नागपुर में भाजपा की बैठक शुरु होनी थी सुबह ११.३० बजे पर शुरु हुई १२ बजे। मुझे नहीं पता कि यह गलती से हुआ या जानबूझ कर। चैनल ने बताया कि ११.३० से १२ तक राहुकाल था और १२ बजे के बाद अविजीत काल जिसमें शुरु किया हुआ हर काम सफल होता है। फिर उन्होंने हैडलाइन दी- भाजपा का अँधविश्वास। मुझे हँसी आ गई। जो चैनल सुबह-सवेरे तीन देवियों के साथ आकर हमारे ग्रह-तारे बताता है वो चैनल अँधविश्वास की बात करता है!!

पिछले २ वर्षों में ज्योतिष का कारोबार चार गुना तक बढ़ा है। मंदी के दौर में केवल यही पेशा मुनाफे में है। पिछले कुछ सालों में शनिदेव और साईंबाबा के मंदिरों में बढ़ोतरी इन्हीं पंडितों और ज्योतिषियों की मेहरबानी है। मेरे इलाके में एक आदमी आता है। हर पूर्णिमा, अमावस्या, मंगलवार, शनिवार, अष्ट्मी, सक्रांति, शिवरात्रि व प्रत्येक त्योहार में। अच्छा हट्टा-कट्टा है पर हर दूसरे दिन माँगने आता है। कभी तेल, कभी अनाज। और हमारे देश में वैसे भी भोले लोग हैं जो उसे तेल इत्यादि दे देते हैं। वैसे फुटपाथों पर तेल के डिब्बे-से भी पड़े दिख जायेंगे और लोग उसमें पैसे डाल देते हैं। अच्छी कमाई का जरिया है ये "धार्मिक भीख"। कभी यह श्रद्धा हुआ करती थी आज कल कमाई के धंधे।

लेकिन बात उस घटना की जिसने मुझे यह लेख लिखने के लिये प्रेरित किया। उस आदमी की जिसे देख कर मैं मेरे इलाके में तेल माँगने से तुलना करने लगा। अभी कुछ दिन पहले की बात थी मैं ऑफिस जा रहा था कि मुझे चौराहे के बीचों-बीच एक रिक्शा दिखाई दिया। उसमें दो लोग सवार थे। दिल्ली की भीड़ से हर कोई वाकिफ है। उस भीड़ में वो रिक्शा वाला रिक्शा खींच रहा था। लेकिन ऐसा क्या था जो उसका जिक्र यहाँ करना जरुरी है? दरअसल उसका बाँया हाथ नहीं था!! वो केवल दायें हाथ से रिक्शे को खींच रहा था। उसमें मुझे दृढ़-संकल्प और विश्वास दिखाई दिया।

दो लोग..एक हृष्ट-पुष्ट और दूसरा विकलांग...एक आलसी और भिखारी व दूसरा उतना ही मेहनती और हिम्मती। एक अँध-विश्वास तो दूसरा दृढ़ विश्वास का प्रतीक। इस देश को कैसे व्यक्ति चाहिये ये हम सब समझ सकते हैं।

तपन शर्मा