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Sunday, June 06, 2010

तपती जमीन, तपते सवाल

पर्यावरण दिवस(5 जून) पर लेखों को ढूंढने के क्रम में पुण्यप्रसून वाजपेयी के ब्लॉग पर नज़र पड़ी...ज़ी न्यूज़ में प्राइम टाइम एंकर पुण्यप्रसून वाजपेयी की शैली में ख़बरें सुनना-देखना अलग अनुभव है। आधे घंटे का शो हो या घंटे भर का, उनकी अनूठी प्रस्तुति में समय कट जाता है.... मगर, ब्लॉग पर उनके लेखों की लंबाई ज़रा उबाऊ हो जाती है...ये लेख उबाऊ नहीं लगा क्योंकि मुद्दा बेहद ज़रूरी है...दिल्ली जैसे शहरों की आधुनिक आदतों का असर पहाड़ों में बसे कुदरती इलाकों पर दिखने लगा है...ये चिंता करने की फुर्सत तक किसके पास है?

पेड़ों को रखे आस-पास, तभी रहेगी मानसून की आस।

दिल्ली से रानीखेत की तरफ जाते पहाड़ के गांवों की दीवार पर लिखी इन पंक्तियों ने कई बार ध्यान खींचा। हर बार जेहन में यही सवाल उठा कि जो इलाके पेड़-जंगलों से घिरे हैं, जहां पहाड़ों की पूरी कतार है। वहां इन पंक्तियो के लिखे होने का मतलब कहीं भविष्य के संकट के एहसास के होने का तो नहीं है। क्योंकि समूचा उत्तर भारत जब लू के थपेड़ों से जूझता है, तब राहत के लिये उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके ही एसी का काम करते हैं। पहाड़ पर मई-जून में भी मौसम गुलाबी ठंड सरीखा होता है, तो इसे महसूस करने बडी तादाद में लोगों का हुजुम वहां पहुंचता है। यही हुजुम पहाड़ की अर्थव्यवस्था को रोजगार में ढाल कर बिना नरेगा भी न्यूनतम जरुरत पूरा करने में समाजवादी भूमिका निभाता है। सामान ढोने से लेकर जंगली फलों को बेचने और होटलों में सेवा देने वालों से लेकर जंगलों में रास्ता दिखाने वालो की बन पडती है। सिलाई-कढाई से लेकर जंगली लकड़ी पर नक्कशी तक का हर वह हुनर जो महिलाओ के श्रम के साथ जुडता है, वह भी बाजारों में खूब बिकता है, और गरमियो का मौसम पहाड़ के लिये सुकुन और रोजगारपरक होकर कुछ यूं आता है कि पहाड़ का मुश्किल जीवन भी जमीन से जुड़ सा जाता है और अक्सर पहाड़ के लोग यही महसूस करते है कि जमीन पर आय चाहे ज्यादा है लेकिन सुकुन पहाड़ पर ज्यादा है। क्योंकि सुकुन की कीमत चुकाने में ही पहाड़ की रोजी रोटी मजे से चल जाती है।

लेकिन जमीन पर अगर आय असमान तरीके से बढ़े और सिर्फ एक तबके की बढ़े तो खतरा कितना बड़ा है, इसका एहसास जमीन पर रहते हुये चाहे थ्योरी के लिहाज से यही समझ में आता है कि देश के 10 से 15 करोड़ लोग अगर महीने में लाख रुपये से ज्यादा उड़ा देते हैं तो देश के 70 से 80 करोड़ लोगों की सालाना आय दस हजार रुपये भी नहीं है। करोड़ों परिवार के लिये एक रुपये का सिक्का भी जरुरत है और देश के पांच फीसदी लोगों के लिये दस-बीस रुपये का नोट भी चलन से बाहर हो चुका है। दिल्ली के किसी मंदिर पर भिखारी को एक रुपया देना अपनी फजीहत कराना है, पहाड पर एक रुपया किसी भी गरीब के पेट को राहत देने वाला है। लेकिन प्रैक्टिकल तौर पर पहाड़ में इसकी समझ पहली बार यही समझ में आयी कि जिस एक छोटे से तबके के लिये दस-बीस रुपये मायने नही रखते, वही छोटा सा तबका अपनी सुविधा के लिये जिस तरह जमीन पर सबकुछ हड़पने को आमादा है वैसे ही पहाड़ पर भी अपने सुकून के लिये वह सबकुछ हड़पने को तैयार हो चुका है और जो गर्मियां पहाड़ के लिये जीवनदायनी का काम करती हैं, चंद बरस में वही गरमी पहाड़ को भी गरम कर देगी और फिर पहाड़ का जीवन भी जमीन सरीखा हो जायेगा।

इसकी पहली आहट सबसे गर्म साल के उस दिन {18 मई 2010 } मुझे महसूस हुई जब दिल्ली का तापमान सौ बरस का रिकार्ड पार कर रहा था और कमोवेश हर न्यूज चैनल से लेकर हर अखबार पर भेजा-फ्राई शब्द के साथ गर्मी-लू की रिकार्ड जानकारी दी जा रही थी। इस दिन रानीखेत की सड़कों पर भी कर्फ्यू सरीखा माहौल था। तापमान 33 डिग्री पार कर चुका था। पेड़ों की पत्तियां भी खामोश थीं। चीड़-देवदार के पेड़ों की छांव भी उमस से जुझ रही थी । बाजार खाली थे। सालों साल स्वेटर बेच कर जीवन चलाने वालो की दुकानों पर ताले पड़े थे। कपडे पर महीन कारीगरी कर कुरते बना कर बेचने वाली महिलायें के जड़े-बूटे देखने वाला कोई नही था। और तो और दुनिया के सबसे बेहतरीन गोल्फ कोर्स में से एक रानीखेत का गोल्फ कोर्स शाम सात बजे तक भी सूनसान पड़ा था। और यह सब इसलिये कहीं ज्यादा महसूस हुआ क्योंकि रानीखेत अभी भी खुद को रानीखेत ही मानता है, जहां गर्मियों में होने का मतलब है खुशनुमा धूप। ठंडी बयार। गुलाबी शाम । और इन सब के बीच घरो में कही कोई पंखा नहीं। घर ही नहीं होटल और सराय में भी पंखों की कोई जगह नहीं। वहां की छतें आज भी खाली ही रहती हैं। छतों की दीवारो की ऊंचाई जरुर आठ फीट से बठकर दस फीट तक पहुंची है। लेकिन कोई इस शहर में मानता ही नहीं कि प्रकृतिक हवा कभी तकनीकी हवा के सामने कमजोर पड़ेंगी या मशीनी हवा पर शहर को टिकना पडेगा।

लेकिन पहली बार बीच मई के महिने में अगर रानीखेत ने गर्मियो के आगे घुटने टेके और पहली बार यहां के बहुसंख्य लोगों की आय डगमगाती नजर आयी तो चिंता की लकीर माथे पर उभरी कि रानीखेत का मौसम अगर इसी तरह हो गया तो उनका जीवन कैसे चलेगा। पहली बार इसी रानीखेत में यह भी नजर आया कि जमीन पर अपनी सुविधा के लिये मौसम बिगाड़ चुका देश का छोटा सा समूह, जो सबसे ताकतवर है,प्रभावी है, किसी भी बहुसंख्यक समाज पर भारी पडता है, अब पहाड़ को भी अपनी हद में लेने पर आमादा है। कॉरपोरेट सेक्टर के घनाड्य ही नही बल्कि सत्ता की राजनीति करने वाले सत्ता-धारियों और विपक्ष की राजनीति करने वालो की पूरी फौज ही पहाड़ों को खरीद रही है। सिर्फ रानीखेत में ही तीन हजार से ज्यादा छोटे बडे कॉटेज हैं जिन पर मालिकाना हक और किसी की नहीं बल्कि उसी समूह का है, जो ग्लोबल वार्मिग को लेकर सबसे ज्यादा हल्ला करता है। पहाड़ पर नाजायज तरीके से जमीन खरीद कर अपने लिये सुविधाओं को कैद में रखने वालो में रिटायर्ड भ्रष्ट नौकरशाहों से शुरु हुआ यह सिलसिला अब के प्रभावी नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों और बिचौलियों की भूमिका निभाकर करोड़ों बनाने वाले से होते हुये तमाम कारपोरेट सेक्टर के प्रभावी लोगो तक जा पहुंचा है। बाहर का व्यक्ति पहाड़ पर सिर्फ सवा नाल जमीन ही खरीद सकता है। जिसकी कीमत तीन साल में दस गुना बढकर 20-25 लाख रुपये हो चुकी है। लेकिन यहां रईसों के औसतन काटेज की जमीन पांच से आठ नाल तक की है। यानी जमीन ही करोड़ों की। चूंकि प्रकृति के बीच में काटेज के इर्द-गिर्द प्रकृतिक जंगल बनाने को ही पूंजी लुटाने का असल हुनर माना जाता है तो कॉटेज की इर्द-गिर्द जमीन पर प्रकृति का जितना दोहन होता है, उसका असर यही हुआ है कि रानीखेत में बीते पांच साल में जितना क्रंकीट निर्माण के लिये पहुंचा है, उतना आजादी के बाद के पचपन सालों में नहीं पहुंचा। इन कॉटेजो के चारों तरफ औसतन 75 से लेकर 160 पेड़ तक काटे गये। और कॉटेज जंगल और हरियाली के बीच दिखायी दे, इसके लिये औसतन 15 से 25 पेड़ तक लगाये गये । अगर इसी अनुपात में सिर्फ रानीकेत को ही देखे तो करीब दस लाख पेड काटकर पैंतालिस हजार पेड लगाये गये। लेकिन पहाड़ों को रईस तबका जिस तेजी से हड़पना चाह रहा है, उसका नया असर पेड़ों का काटने से ज्यादा आसान पूरे जंगल में आग लगाकर पेड खत्म करने पर आ टिका है। खासकर चीड के पेड़ों से निकलने वाले तेल को निकाल कर पेडो को खोखला बनाकर आग लगाने का ठेका समूचे कुमायूं में जिस तेजी से फैला है, उसका असर यही हुआ है कि बीते तीन साल में छोटे-बडे सवा सौ पहाड़ बिक चुके हैं और पहाड़ों को पेड़ों से मुक्त करने के ठेके से लेकर पहाड़ों के अंदर आने वाले सैकड़ों परिवारों को जमीन बेचने के लिये मनाने के ठेके को सबसे मुनाफे का सौदा अब माना जाने लगा है। रईसो के निजी कॉटेज से शुरु हुआ सिलसिला अब पहाड़ों के बीच काटेज बनाकर बेचने के सिलसिले तक जा पहुंचा है।

बिल्डरो की जो फौज जमीन पर घरों का सपना दिखाकर मध्यम तबके के जीवन में खटास ला चुकी है, अब वह भी पहाड़ों पर शिरकत कर रइसों के सपनों को हर कीमत पर हकीकत का जामा पहनाने में जुटा है। और पहाड़ के समाज को तहस-नहस करने पर आ तुला है। जिस तरह सेज के लिये जमीन हथियाने का सिलसिला जमीन पर देखने में या और सैकड़ों सेज परियोजना को लाइसेंस मिलता चला गया, कुछ इसी तर्ज पर पहाड़ों पर बिल्डरों की योजनाओं को मान्यता मिलने लगी है। और पहाड़ी लोगों को मनमाफिक कीमत दी जा रही है, लेकिन इस मनमाफिक रकम की उम्र किसानी और जमीन मालिक होने का हक खत्म कर मजदूर में तब्दील करती जा रही है। सैकड़ों कॉटेज की रखवाली अब वही पहाड़ी परिवार बतौर नौकर कर रहे हैं, जिस जमीन के कभी वो मालिक होते थे । रानीखेत से 40 किलोमीटर दूर भीमताल के करीब एक बिल्डर ने अगर समूचा पहाड़ खरीद कर सवा-सवा करोड के करीब पचास कॉटेज बेचने का सपना पैदा किया है तो अल्मोडा के करीब एक बिल्डर का सपना हेलीकाप्टर से काटेज तक पहुंचाने का है। यानी जहां सड़क न पहुंच सके, उस इलाके के एक पहाड को खरीद कर अपने तरीके से कॉटेज बना कर सवा दो करोड में एक कॉटेज बेचने का सपना भी यहीं बसाया जा रहा है। लेकिन वर्तमान का सच रइसों की सुविधा तले कितने खतरनाक तरीके से पहाड़ों के साथ जीवन को भी खत्म कर रहा है, यह पहाड़ पर कब्जे और काटेज की सुविधा को साल में एक बार भोगने से समझा जा सकता है, जहां कॉटेज का मतलब है दो से तीन लोगों के रोजगार का आसरा बनना और औसतन 25 से 50 लोगों का रोजगार छीनना।

पहाड़ के रईसों के इस जीवन का नया सच यह भी है कि इन काटेज में पंखे भी है और एसी भी। यानी पहाड़ पर जमीन सरीखा जीवन जीने की इस अद्भभुत लालसा का आखिरी सच यह भी है कि पहाड का सुकुन अगर जमीन पर ना मिले तो भी पहाड पर जमीन सरीखा जीवन जीने में हर्ज क्या है। लेकिन संकट पहाड़ को भी जमीन में तब्दील करने पर आ टिका है जो मौत के एक नये सिलसिले को शुरु कर रहा है। क्योंकि पहाड़ पर गर्मी का मतलब जमीन पर आकर रोजगार तलाशना भर नहीं है बल्कि पारंपरिक जीवन खत्म होने पर मरना भी है। पहाड़ पर औसतन जीने की जो उम्र अस्सी पार रहती थी अब वह घटकर सत्तर पर आ टिकी है और बीते साल साठ पार में मरने वाले पहाड़ियों में 18 फीसदी का इजाफा हुआ है। इन परिस्थितियों में आर्थिक सुधार की थ्योरी नयी पीढियों के जरीये अब बुजुर्ग पहाड़ियों की सोच पर आन पड़ी है, जहा पहाड़ी भी मानने लगा है कि सबकुछ खरीदना और मुनाफा बनाना ही महत्वपूर्ण है। त्रासदी यह भी है कि पहाड़ों पर अब जिक्र वाकई दो ही स्लोगन का होता है। पहला , जब सोनिया गांधी कौसानी में अपना काटेज बना सकती है, तो दूसरे क्यों नहीं। और जब सरकार पेड़ काट कर विकास का सवाल उठा सकती है तो जंगल जला कर दुसरे क्यों नहीं। लेकिन पहाड़ों पर बारह महीने सालो साल रहने वाले अब एक ही स्लोगन लिखते है, पेडो को रखे आस-पास,तो ही रहेगी मानसून की आस।

पुण्य प्रसून वाजपेयी

(साभार)

Monday, November 16, 2009

आजकल के बच्चे, बच्चे नहीं रहे

शनिवार को बाल-दिवस था। बाल-दिवस! चलो एक दिन के दिवस के बहाने बच्चों की सुध ली जाती है। शायद स्कूलों में कार्यक्रम होते होंगे। हमारे समय में तो होते थे। अब का पता नहीं। वैसे अब ज्यादा ध्यान दिया जाता है बच्चों पर। ज्यादा भाग्यशाली हैं आज के बच्चे। जैसे पाठ्यक्रम में बदलाव, परीक्षा समाप्त करना जैसे अनेक कदम उठाये जा रहे हैं।

बच्चे मतलब बचपन। आज से दस वर्ष पूर्व बचपन मतलब कॉमिक्स। पर अब हैं कार्टून, टीवी, विभिन्न चैनल। तब मोगली होता था, अब जैटिक्स जैसे चैनलों पर मारधाड़। तब चाचा चौधरी, मिनी, रमन, बिल्लू, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव में खो जाते थे। पर अब कब्जा है अमरीकी व चीनी कार्टून किरदारों का। माफ़ कीजियेगा सब के नाम नहीं पता। मेरी बुआ का लड़का है वो बता पायेगा।

चंपक, नंदन, चंदामामा व बालहंस पत्रिकायें कहीं खो गई हैं। अब बच्चों को इंतज़ार होता है शिनचैन की मूवी का। हैरी पॉटर का। इनसे बच्चा कुछ तो सीखता होगा? ऐसा कईं बार मैंने सोचा...सीखता तो होगा न?

बच्चे अब टीवी देखते ही नहीं बल्कि अब टीवी पर आने भी लगे हैं। अब परिवार को नहीं बल्कि दुनिया को हँसाने लगे हैं। माँ बोलने से पहले तो गाना गाने लगे हैं। चलना तो पैदा होने से पहले सीख लेते हैं पर चैनल पर अब नाचने लगे हैं। गर्मियों की छुट्टियों में नानी के जाते थे, फ़ालसे खाते थे पर अब "समर वेकेशन्स" हैं तो डांस और "सिंगिंग क्लासेस" भी जरूरी हैं। नहीं तो कोई न कोई हॉबी तो सीखनी ही होगी। बच्चे ही नहीं बच्चों के अभिभावक भी यही चाहते हैं। एक भी दिन बेकार न जाये। बच्चा अव्वल आना चाहिये।

पाठ्यक्रम में परिवर्तन हुआ। मैंने किसी से पूछा तो पता चला सुभद्रा कुमारी चौहान की रानी लक्ष्मीबाई की कविता अब गायब हो गई है। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उस कविता ने बच्चों का क्या बिगाड़ा है। ताँत्या टोपे पर एक पाठ हुआ करता था। काबुलीवाला और कदम्ब का पेड़ जैसी रचनायें अब किताब के पन्नों में नहीं, इतिहास के पन्नों में चली गईं हैं। राज्य स्तर के बोर्ड में जरूर ये आती होंगी, पर सीबीएसई इन्हें जरूर समाप्त करना चाह रहा है। हैरानी और परेशानी होती है कि बच्चों के पाठ्यक्रम से इनको हटा कर क्या मिला? सीबीएसई को महात्मा गाँधी के जंतर ने तो ऐसा नहीं कहा था!! क्या अब हैरी पॉटर में अपना वर्तमान और भविष्य खोजेंगे बच्चे?

अभी हाल ही में एक मित्र मिला जो सातवीं के बच्चे को ट्यूशन पढ़ाता है। माँ कहती है कि बेटा अव्वल आये। इसलिये उसे मोबाइल और इंटेरनेट दिया हुआ है। अब मोबाइल दिया है तो इस्तेमाल तो होगा ही बेशक क्लास के बीच में बात करनी हो। लैपटॉप पर चैटिंग जारी रहती है। एक मिनट के लिये भी बंद नहीं होता। पर लाडला अच्छे अंकों से पास होना चाहिये। कपिल सिब्बल ऐसे परिवारों के लिये परीक्षा समाप्त कर रहे हैं। एक शानदार कदम है उनका। इससे सूचना क्रांति में बहुत मदद मिलेगी। अभिभावक और मंत्री जी सही दिशा में जा रहे हैं।

"नानी तेरी मोरनी को मोर ले गये", "दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ", "हम भी अगर बच्चे होते", "नन्हा मुन्ना राही हूँ" जैसे अनेकों गीत हैं जो गुनगुनाये जाते थे, गाये जाते थे। सभी की जुबान पर थे। पर अब बच्चे अम्मा को "ग्रैंडमा" बुलाने लगे हैं तो गाने ऐसे क्यों बनेंगे? वैसे भी आजकल बच्चों के गाने तो दूर उन पर फ़िल्म कोई नहीं बनाता। हाँ, बच्चे जरूर बड़ों जैसी बातें करते हुए अलग अलग फ़िल्मों में दिख जायेंगे। कोई एंकर बन गया है तो कोई एड-जगत में नाम कमा रहा है। कोई धारावाहिकों में आता है तो कोई रियलीटि शो में आता है। यही आज का बचपन है!! बच्चे और अभिभावक इसी में खुश हैं।

बच्चे अब बच्चे नहीं रहे। बड़े हो गये हैं। शब्दकोश से बचपन शब्द कब गायब होगा ये तो वक्त ही बतायेगा। कुछ भी कहो, आजकल के बच्चे कामयाब जरूर हैं। क्या हुआ जो उन्होंने बचपन का "स्टापू" नहीं खेला(!), कम्प्यूटर पर ऑनलाइन गेम तो खेली है।

देर से ही सही, बाल(?)-दिवस की शुभकामनायें!

--तपन शर्मा

Tuesday, September 15, 2009

शरीर का अंग बन गया है मोबाइल...

शन्नो अग्रवाल उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से ताल्लुक रखती हैं। 1969 में एम.ए. की पढ़ाई खत्म होते ही शादी हुई और सात समंदर पार लंदन जा बसीं। पति कंप्यूटर के क्षेत्र में नौकरीपेशा थे तो इन्होंने घर-गृहस्थी संभाल ली....बच्चों की परवरिश करने में शन्नो अपने सभी शौक भूल चुकी थीं...हिंदयुग्म से जुड़ने पर कविता-कहानी के इनके पुराने शौक वक्त मांगने लगे...अब चूंकि इनके बच्चे भी गृहस्थी बसा चुके हैं तो ब्लॉगिंग के ज़रिए इन्हें कहने-सुनने की फुर्सत मिल गई है...बैठक पर सात समंदर पार से इनका ये पहले लेख है...

मुझे भी बच्चों ने जिद करके खरीद कर दे ही दिया, हाँलाकि मुझे कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई किन्तु बच्चों की जिद के आगे सर झुका दिया क्योंकि यदि बाहर हुई और उन्हें नहीं पता कि कहाँ हूँ तो उनको बड़ी चिंता हो जाती थी. अब कम से कम पता लग जाता है कि मैं कहाँ हूँ. चलो कोई बात नहीं, मिस्ड काल मारो तो बिल बच्चे ही तो भरते है। ऐसी ही हिदायत दी गयी थी. खैर अपने को तो खुराफाती बातें करना नहीं आता सो कभी - कभी की बात रही.

जी हाँ, सारी दुनिया में ही जिसकी इतनी महिमा है और जिसके बिना अब किसी भी घर में चाहें वह देश हो या विदेश लोगों का काम ही नहीं चलता या बाहर जाओ तो खासतौर से बिना उसे साथ ले जाये हुए, मैं उसी मोबाइल की ही बात कर रही हूँ. और जिसके साथ के बिना जीवन में अब खालीपन सा लगता है. अगर घर पर भूल जाये उसे तो शायद पति अपनी पत्नी को उसकी अनुपस्थिति में इतना याद न करता होगा जितनी मोबाइल के साथ की कमी उसे खलती है अब. चाहे वह......चलिये, छोडिये भी पति-पत्नी की बात. तो फिर मैं जो बात कर रही हूँ वह है कि जिधर भी देखो उधर ही सब चटर-पटर बातों में उलझे होते हैं उसे कान से चिपकाये हुये. कुछ लोग उसे कहते हैं सेलफोन भी....सही कहा ना मैंने?

सोचती हूँ कि मोबाइल फोन न हुआ जैसे एक खिलौना हो गया. चाहे किसी और चीज की अकल हो या न हो लेकिन मोबाइल जरूर चाहिये. कितनी किसे जरूरत है उसकी परवाह करे बिना उसे पाने की हसरत सभी में फ़ैल चुकी है एक रोग की तरह. ना पूछिये अब.....बात करने की अकल हो या न हो पर उसे खरीद कर नक़ल जरूर करनी है. शॉपिंग को गयी हुई वापस आते हुए रिक्शे में बैठी सासू माँ को अचानक सूझती है मोबाइल निकाल कर अपनी बहू से बात करने की. कह रही हैं ' अरी सुन, जरा मुझे आज अपनी सहेली के यहाँ भी जाना है, तुझे बताना भूल गयी थी. और कहारिन आवे तो कहियो की माँ जी आज घर पर नहीं है इस समय, पैसे किसी और दिन ले जाये और यह भी सुन ......' अरे यह सब बेकार की बातें तो उनके घर में ना होने पर बहू भी बता सकती थी कहारिन को...लेकिन मोबाइल पर बात करने का मजा तो और ही है ना? किन्तु क्या इसकी वाकई में सभी को या अधिकतर लोगों को जरूरत है? सहेली के यहाँ जाकर भी तो फोन किया जा सकता था.

कुछ लोगों को इसकी जरूरत एक फैशन की तरह होती है. अगर कुछ भी नहीं है बात करने को फिर भी टुन्न-टुन्न बजता रहता है और फोन करने वाले को इतना भी ख्याल नहीं की जिसको फोन करके अपनी बोरियत के पलों को बांटना चाहता है वह इंसान अभी-अभी अपनी दाढ़ उखड़वा कर डेंटिस्ट के यहाँ से आया है और इंजेक्शन के असर से मुंह भी नहीं खोल सकता. हाँ, कभी-कभी यह बहुत ही लाभदायक साबित हो सकता है. एक बार मैक्सिको में आये हुये भूचाल से एक शहर तहस नहस हो गया और वहां जब मलबे में से लोगों की लाशें निकाली जा रही थीं तो किसी का मोबाइल बजने लगा ...... मलबा हटा कर पता लगा की उस आदमी ने लोगों की आहट सुनकर बटन दाब दिया था. वह किसी तरह भगवान् की कृपा से जिन्दा बचकर निकल आया.

लेकिन किसी और जगह आप देखें तो......पत्नी घर से फोन पर पति के लेट होने के बारे में चिंता करती है और पति महाशय उस समय अपने ऑफिस की किसी काम करने वाली लेडी के साथ कॉफी और समोसे खाते हुए कुछ सुनहरे पलों को जी रहे होते हैं तो पत्नी को बता कर उसकी चिंता दूर करते हैं ' डार्लिंग, मैं अभी उस काफी हाउस के बाहर जो बस स्टाप के पास है वहां भीड़ में इंतज़ार कर रहा हूँ. दो बसें ठसाठस भरी हुई सामने से निकल गयीं उनमें तो चढ़ना भी मुश्किल था...इसीलिए लेट हो रहा हूँ, तुम खाना खा लेना मैंने कुछ लेट लंच खाया था इसलिए भूख नहीं है.' यदि पत्नी भोली हुई तो अविश्वास की परछाईं को भी अपने पर पड़ने नहीं देगी. वरना.... उसका माथा कभी न कभी तो ठनकना चाहिये.

बिस्तर में हैं तो छुपकर, या कभी - कभी दरवाजे पर की गई खटखट किसी ने ना सुनी हो तो घर के फोन पर, आप घर की चाबी भूल गये हों और पत्नी सहेली के यहाँ हो तो उसे वहां पर, बाहर कहीं खाना खा रहे हों तो वहां से, या टॉयलेट की सीट पर बैठे हों तो वहां आराम से हर जगह से इसका उपयोग करके बातचीत कर सकते हैं.
गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड के लिये तो और भी उपयोगी.....घर वालों की निगाहें बचाकर छत पर जाकर गुटरगूं कर सकतें हैं आपस में. तब कोई यह तो नहीं कहेगा की ' हाय-हाय देखो तो आजकल के बच्चों को, हमें पता भी न चला की कब हमारा बच्चा बड़ा हो गया और आज को यह दिन देखना पड़ रहा है हमें की इसने अपनी गर्लफ्रेंड भी ढूंढ ली. हमारे ज़माने में तो लड़के लोग लड़कों से और लड़कियां केवल लड़कियों से ही बातें करती थीं और लड़कियां तो रास्ते में निगाह झुका कर चलती थीं '. लेकिन कभी - कभी इसकी वजह से सब त्रस्त भी हो जाते हैं. बच्चे अब अधिकतर समय इसी पर दोस्तों से बात करने में गुजारते हैं और घर में बातचीत की उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती. बिना मतलब का बिल अलग से बढ़ता है. और हम अन्य चीजों के भाव ऊपर जाने की बातें करते रहते हैं. कभी-कभी इसपर फिजूल की करी बातों से और बकवास के टेक्स्ट भेज कर जो बिल बढ़ता है उसका क्या?

बूढे-बच्चे, जवान, अकल या बेअकल वाले, बाबू-अफसर, ठेले वाले, दुकानदार, चाट वाला या लोहार, कुल्फीवाला हो या सुनार. कोई फर्क नहीं किसी में. सबको इसका इस्तेमाल आता है और पता है आपको की यह खिलौना अकेले में बड़े काम का होता है. आप स्टेशन पर जब अकेले बैठे ऊब रहे हों तो चलो किसी से बात ही कर ली जाये वैसे तो फुर्सत नहीं मिलती है. या कहीं सुनसान जगह पर जा रहे हों और कोई खतरे वाली बात हो तो घर या पुलिस को फ़ोन करके सूचना तो दे सकते हैं, शॉपिंग पर गये हों तो पत्नी से उसकी पसंद का रंग पूछ सकते हैं (यदि उसे कभी अचानक से उपहार देकर खुश करने का मूड हो तो) आप क्या काम करते हैं, अधिक पढ़े - लिखे हैं या कम, कमजोर हैं या पहलवान, भिखारी हैं या कोचवान सभी को ही इसका चस्का लग गया है..... जिसे देखो वह इसपर बात करते हुये मस्त दिखता है.

आजकल तो लगता है की भिखारी भी इतने पैसे वाले और अक्लमंद हो गये हैं की सुना गया है कि कहीं कोई फोन पर रात में चाइनीज खाना आर्डर कर रहा था मोबाइल पर. अभी कुछ महीने पहले बरेली की स्टेशन पर बैठी ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी की एक भिखारी एक पर्चा हाथ में लिये हुये आया और बेंच पर बैठे सज्ज़न से बोला ' बाबू जी जरा अपना फ़ोन दे दीजिये एक फोन करना है.'

एक दिन मायके में ही बाहर जाते हुये देखा कि ठेले पर सब्जी बेचने वाला खाली खड़ा है फिर अपना मोबाइल निकाला और बात करने लगा ' अरे सुनौ खाना बनि गऔ होइ तौ अम्मा और बाबू जी और बच्चन को खवाइ देउ हम भी कुछ देर में ठेलुआ संग घर पहुँचत हैं.'

कोई हंस रहा है या गाली दे रहा है उस समय किसी पर ध्यान नहीं जाता यदि आप पूरी तरह से बातचीत में मगन हैं तो. . . सड़क पार कर रहे हैं, कार चला रहे हैं तब भी इस पर बात करने की इतनी तलब होती है जैसे एक शराबी को पीने की. दिन हो या रात हो, आंधी हो या बरसात हो या कैसी भी खुराफात हो मोबाइल से बात करो तो फिर कोई बात हो.

शन्नो अग्रवाल

Wednesday, September 09, 2009

आईए शहर और गांव के बीच की लकीर मिटाएं...


जब भी गांव के विकास की बात आती है ...शहरों की खिंचाई शुरू हो जाती है..ये थोड़ा सा अन्याय है मुझे लगता है..शहर विकास का एक नैसर्गिक पड़ाव है..ऐसा नहीं होता तो विकास के चश्मे से शहरों का भी वर्गीकरण नहीं होता..मसलन छोटा शहर..बड़ा शहर..सिटी..मेट्रो सिटी..कॉस्मोपॉलिटन सिटी..वगैरह वगैरह..छोटे शहरों के लोगों का भी मेट्रोपॉलिटन के सामने कुछ ऐसा ही रोना है...पिछड़े रह जाने की ऐसी ही दुहाई है..सबकुछ नहीं मिल पाने की ऐसी ही कसक है..लेकिन उनको नहीं मालूम कि दिल्ली का दिल भी लंदन या न्यूयार्क को देख कर जल सकता है...या फिर ये कह सकता है कि वो आगे निकल गये..हम कहां रह गये...ये शिकायत व्यक्तिगत तौर पर मुझे थोड़ी 'रिस्पेक्टिव' या 'रेलेटिव' लगती है. बहरहाल, ये सवाल कि शहरों ने गांवों को क्या दिया है.. बताने की ज़रूरत नहीं है..शहर उन लोगों का आलंब बने जो बाढ़ या सूखे में अपना सबकुछ खो बैठे..जब गांव घर में पानी घुसा तो शहरों की तंग गलियों ने आसरा दिया..जब गांव के स्कूल बदहाल हो गये..तब शहरों ने हमें ये क़ाबलियत दी कि हम पुरज़ोर ढ़ंग से अपने गांवों के लिए आवाज़ उठा पाने की ताक़त रखते है..आज हमारे गांवों की बात हमारे मुंह से सुनी और समझी जा रही है तो बीच में कहीं न कहीं एक शहर ज़रूर खड़ा रहता है..कमज़ोरी नहीं बल्कि हौसला बनकर..अत्मविश्वास बनकर. गांवों की जो तस्वीर हम अपने आनेवाले दिनों के लिए बुनते हैं..जिसे दिमाग के काग़ज से ज़मीन की ठोस परत पर उतारना चाहते है...तो कल्पना की वो जमीन भी कहीं न कहीं इन शहरों ने मिल कर बनाई है....बीच की लाईन क्यों बना देते हैं हम..मान लीजिए कि दिल अगर गांव है..वैसे बापू ने भी माना था कि भारत की आत्मा गांवो में ही बसती है...तो इस शरीर का दिमाग शहर है..शहरों का आधार गांव रहे है..इसमें कोई दो राय नहीं...यहां के फाईवस्टार होटलों में परोसा जाने वाला खाना..और उसे परोसने वाला दोनों ज्यादातर गांवों के ही होते है...शहर के हाथ गांव से आते है...लेकिन ये भी नहीं भूलना होगा..कि शहर इन हाथों को थाम भी लेते हैं..बीच की लाईन को मिटा कर बात करते हैं..ये मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि गांव पीछे छूट गये..कारणों की विवेचना नहीं करूंगा...लेकिन गांवों की बड़ी ज़रूरतें क्या हैं इस समय..उनके पास क्या कुछ है जिससे इन ज़रूरतों को पूरा किया जा सकेगा...ये समझना ज्यादा ज़रूरी है..गांवों के पास कुछ चीज़े ऐसी हैं जो शहरों के पास नहीं हैं....गांवों-ज़रूरतों को तोड़ कर देखेंगे तो शहरों के मुक़ाबले छोटी लगेंगी लेकिन ग्रासरूट लेवल पर सब मिलजुल कर अभाव की बड़ी तस्वीर बना देते हैं....तो मेरे हिसाब से हल ग्रास लेवल से शुरू होना चाहिए..गांव की ताक़त क्या है?..गांवों की असल ताक़त उनका सस्ता संसाधन है..बात चाहे प्राकृतिक संसाधनों की हो, मानव संसाधन की हो ..हर मामले में उपलब्धता ज्यादा है...लेकिन इन संसाधनो के साथ सबसे बड़ी चुनौती इनकी क्वालिटी को लेकर...सबसे ज्यादा काम की ज़रूरत मानवसंसाधन के विकास और उसके इस्तेमाल पर करने की है..डीसेंट्रलाईज़ेशन ऑफ डेवलपमेंट..अगर इस संकल्पना पर काम किया जाये तो विकास के विकेंद्रीकरण का अंतिम बिंदु गांव का कोई वही आदमी होगा..जिसे हम शहरों की ओर पलायन करने से रोकना चाहते हैं..जब बिहार के मुख्यमंत्री ने ये कहा कि राज्य की श्रम शक्ति का 50 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा राज्य से बाहर है तो पलायन की गंभीरता समझी जा सकती है..तो जब हम विकास के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं तो यहीं से शहरों की गांवों के अंदर भूमिका शुरू हो जाती है...इस प्रक्रिया में वो सबकुछ आता है जो शहरों की तरफ़ गांवों के लोगों को खींच कर ले जाता है..कारण चाहे ज़रूरत हो या सपने...आउट ऑफ द बॉक्स जाकर क्यों नहीं सोच पाते....हर चीज़ को विकेंद्रीकृत कर दे- शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय सबकुछ. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अंग्रेजी बोलने-पढ़ने का माहौल हम गांवो और छोटे शहरों में पैदा कर दे..फिर वहां से विलेज कैंपस कर वहां के युवा को किसी बीपीओ में उसे नौकरी दे दे..और ये आउटसोर्सिंग गांवो से ही हो..ये सुविधा दिल्ली से नहीं हटेगी तो लोग भागेंगे...गया का पटुआ टोली गांव एक बेहतरीन उदाहरण है..जहां जुलाहों की बस्ती से हर साल आईआईटी में बच्चे दाखिला लेते है..पटना का सुपर थर्टी भी बेहतरीन मिसाल है....ये लोग महंगी पढ़ाई करने के लिए दिल्ली नहीं जा सकते ...लेकिन अच्छी पढ़ाई अपने घर में ज़रूर कर लेते ...गांवों में और छोटे शहरों में जहां बिजली नहीं रहती वहां के लड़के-लड़कियां एजुकेशन क्लब बना कर तैयारियां करते है..और खुद को साबित करते हैं..अगर इन युवाओं को ये शहरी सुविधायें विकेंद्रित हो गांव में मिलें तो ..कौन जाये कमबख्त अपने गांव की गलियां छोड़कर....शहर की सड़कें जब हरियाणा, पंजाब, गोवा, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों के गांवों तक विकेंद्रीकृत होती हुई पहुंची..तो शहर की चीज़े भी वहां तक गई..बस यही प्रक्रिया हर मामले में हो..एक बार बीबीसी में ये पूछा गया कि एक दिन के लिए पीएम बनने पर आप क्या करेंगे? तो किसी का सुझाव था कि एक दिन के लिए कैबिनेट की बैठक किसी गांव में कराऊंगा..उस एक दिन के चक्कर में उस गांव की कई चीज़े सुधर जायेंगी..मुझे अच्छा लगा..क्या शहरों में,राजधानियों में होने वाली इस तरह की बैठकों ,सम्मेलनों, सभाओं, महोत्सवों को हम गांवों में नहीं कर सकते ...यक़ीन मानिये कोई मुश्किल काम नहीं है..अलबत्ता गांवों में रोज़गार के साथ-साथ कई चीज़ो का इज़ाफा होगा...इन सब पर तो गांव का भी हक है... यानि शहरों का विकेंद्रीकरण ऐसे भी हो सकता है.. इससे शहरों को भी एक बड़ा फ़ायदा होगा...एक तो उनपर दबाव घटेगा..दूसरे आयोजनों का खर्च घटेगा...शहरों में स्लम्स के लिए टूरिज़म नाम की चीज विकसित हो जाती है..इससे लाख बेहतर है कि विलेज टूरिज़म विकसित करें..दुनियां को गांवों के दर्शन करायें..सरकार अपने किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए गांवो को प्राथमिकता दे..खेलों के स्टेडियम गांवों में क्यों नहीं बने...जगह काफ़ी है वहां ..क्यों शहरों में भीड़ बढ़ाते हैं हम... बडी बात ये है कि गांव के लोग भी ये महसूस कर पायेंगे कि हम भी इन सब चीज़ो से जुड़े है..फिर शहर और गांव के बीच की जो लाईन है वो हल्की होती जायेगी...जब मै विकेंद्रीकरण की बात करता हूं तो यही सोचता हूं...सुविधाओं के गढ़ बन चुके बड़े शहर टूटें..और ये सविधायें छोटे शहरों और गांवों तक जायें...सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात पर तो पहल बहुत तेज़ी से हुई..लेकिन दिल्ली में जमा हुई सुविधाओं के बारे में ऐसा विचार क्यों नहीं आया..आख़िऱ में मै आपको एक सपने के साथ छोड़ जाता हूं....आंखें बंद कीजिए..और देखिये...मऊ का बीपीओ सेंटर..छपरा के किसी गांव का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम..गुंटूर के गांव में बना आईआईएम....उड़िसा के चिल्का गांव में कैबिनेट मीटिंग भवन...प्रगति मैदान का मोटर एक्सपो श्रीगंगानगर के किसी गांव में....नागालैड या सिक्किम के किसी पहाड़ी गांव में राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव....आंखे खोलिये ..आपको लगता है कि इस एक क़दम से उन जगहों की इससे तस्वीर बदेलगी?..नहीं लगता तो आप इसे मेरा यूटोपिया कह सकते हैं..मुझे बुरा नहीं लगेगा...

रवि मिश्रा

Saturday, July 18, 2009

राखी के स्वयंवर में नामर्द


टीवी पर बीएसएनएल का एक एड आता था, जिसमें प्रीति जिंटा कहती थीं, कि अगर इनके पास बीएसएनएल का कनेक्शन नहीं है, तो वो इनके बेटे से शादी नहीं करेंगी। आजकल टीवी पर एक एड आता है अमूल माचो का.. जिसमें एक लड़के को देखने लड़की और उसके घरवाले आते है और बेचारा लजाता, शर्माता हुआ उनके लिए चाय लाता है। उसके बाद दूसरी तस्वीर में दिखाया जाता है कि कैसे लड़की उसे बाइक पर बैठाकर घुमाने ले जाता है, लड़की स्पीड ब्रेक लगाती है। झटका खाकर बेचारा लड़की से टकराता है। तो एक और तस्वीर में बस में खड़े होकर सफ़र कर रहे एक लड़के को एक लड़की छेड़कर निकल जाती है और बेचारा शर्म से लाल हो जाता है। आखिर क्या ज़माना आ गया है। इतने तक तो ठीक था। लेकिन अब तो सबकुछ उल्टा हो रहा है। राखी सांवत के स्वंयवर के बारे में तो आप सभी जानते होंगे। इस स्वंयवर में नाटक है, रोमांस है, और एक्शन भी। लेकिन राखी के चाहने वालों को न तो इसमें धनुष तोड़ना है और न ही मछली की आंख पर निशाना लगाना है। पूरे फिल्मी ड्रामे से भरी इस कहानी में राखी को किसी हूर से कम नहीं पेश किया है। और लड़के, वो तो बेचारे ऐसे लगते हैं, जैसे किसी रानी के गुलाम। राखी की हर अदा पर झुककर सलाम करने वाले, राखी के झूठ को सच साबित करने वाले, राखी जी बल खाकर चलती हैं, तो बेचारे मुंडे उनके कदमों में बिछे चले जाते हैं। और अगर राखी साहिबा उनसे खुश हो गईं, तो खाने को मिलेंगे लड्डू। शादी के लड्डू के बारे में तो सभी जानते हैं, जो खाए वो पछताए और जो न खाए वो पछताए। लेकिन राखी के साथ सपने बुनकर सभी 16 राजकुमार लड्डू खाना चाहते हैं। और राखी उनके सामने ऐसे पेश आती हैं, जैसे मल्लिका-ए-हिंदुस्तान। हद तो तब हो गई, जब राखी को पाने के लिए वो आग के शोलों पर भी नंगे पांव गुज़र गये। और तो और स्वंयवंर में आई ईवेंट मैनेजर ने दूल्हों को चुनौती दी, कि एक-दूसरे की गर्दन में सरिया फंसाकर जो इसे मोड़ देगा, राखी जी उससे बेहद खुश होंगी। और बेचारे दूल्हों ने ऐसा भी किया। मरता क्या न करता आखिर राखी को जो पाना है। और राखी इतनी बोल्ड हैं कि शो में खुलेआम कह रही हैं कि मुझे इनके छूने से कोई फीलिंग नहीं हो रही है, इनके छूने से मुझे कुछ एहसास ही नहीं हुआ। ये सब जानते हुए भी कि इस शो को सारी दुनिया देख रही है। लेकिन ये तो राखी हैं, राखी को क्या, कुछ भी बोल सकती हैं। बेचारे कुंआरे अब खुद को भरी पब्लिक के सामने नामर्द समझें, या राखी को संतुष्ट करने के लिए किसी नीम-हकीम से मर्दानगी की दवा खरींदे। आखिर राखी को जो पटाना है। लेकिन राखी हैं, कि आराम से पटना ही नहीं चाहतीं। लड़के लाख मिन्नतें कर रहे हैं, इतना ही नहीं, राखी को पटाने के लिए बेचारे एक-दूसरे को भगाने के लिए उसी तरह की ख़तरनाक साज़िशें रच रहे हैं, जैसे किसी रियलिटी शो में लड़कियां एक-दूसरे के खिलाफ़ जाल बुनती हैं। लड़के राखी के सामने हाथ बांधे खड़े हैं, कब मैडम की मेहरबानी हो जाए और उनको मिठाई का डिब्बा मिल जाए। लेकिन मिठाई मिलना सबकी इच्छा नहीं है, हर कोई चाहता है कि राखी उसे वरमाला पहना दें। वाकई ज़माना बदल गया है, अब मां का लाडला अपने लिए बहू नहीं ढूंढ रहा है, बल्कि एक बहू अपने लिए पति ढूंढ रही है। अब पति परमेश्वर होगा, या पत्नी पतिव्रता, ये तो भगवान ही जाने। लेकिन ज़माना सचमुच बदल गया है।

अबयज़ खान

Wednesday, March 25, 2009

सफर हवा का, फिक्र जमीं की...

बहुत पुरानी बहस है। बचपन में एक निबंध लिखा करते थे-"विज्ञान-वरदान या अभिशाप"। छोटे हुआ करते थे इसलिये ज्यादा समझ भी नहीं आता था। अभी भुवनेश्वर से दिल्ली वापस आ रहा था। हवाई सफर २ घंटे के भीतर ही तय हो गया। ९.३० बजे उड़ान भरी और ११.३० बजे दिल्ली। मैं मन ही मन सोच रहा था कि विज्ञान ने कितनी तरक्की कर ली है जो १३०० किमी का सफ़र २ घंटे में पूरा किया जा सकता है। फिर अचानक ही मेरा मन दिल्ली की तरफ मुड़ गया। भई, मन पर किसका ज़ोर चलता है। एक यही है जो कभी भी, कहीं भी, बिना वीज़ा और टिकट के जा सकता है। तो मैं सोचने लगा कि दिल्ली से नोएडा जाने में भी तो मुझे कईं बार २ घंटे लगते हैं। ऐसा कैसे मुमकिन है कि ४५ किमी और १३०० किमी पूरा करने में एक ही समय लगता हो।

पर सच तो सच है। दिल्ली में ट्रैफिक इतना बढ़ गया है कि अब स्थिति बेकाबू सी लगती है। शायद सितम्बर-अक्टूबर की बात है जब अखबार में पढ़ा कि दिल्ली की सड़कों पर हर रोज़ औसतन ९५० नईं गाड़ियाँ आती हैं। सोच कर देखिये तो ज़रा... अब एक और आँकड़ा देखिये.. सन १९७५ में जितने लोग दिल्ली में थे आज उतनी ही गाड़ियाँ सरपट दौड़ती हैं। शादियों के मौसम में जगह ट्रैफिक जाम और फिर बंद, चक्का जाम..उस पर देश की राजधानी होने के कारण रैलियाँ। दिल्ली की कमर तोड़ देता है सब कुछ। पर इस परिस्थिति के लिये जिम्मेदार कौन? हम!!! विज्ञान ने हमारा क्या बिगाड़ा। उसने हमें गाड़ी दी, हमें हवाई जहाज दिया। हमने उसका दुरुपयोग किया। इसका अर्थ ये हुआ कि विज्ञान तो हमारा मित्र ही है..हम खुद अपने आप के शत्रु बन बैठे हैं। जहाँ एक की जरूरत है वहाँ दो गाड़ियाँ, जहाँ दो चाहिये वहाँ तीन। मंदी का दौर है इसलिये आजकल केवल २५० गाड़ियाँ ही प्रतिदिन बिकती हैं। मंदी ने एक तो अच्छा काम किया!!

आज इंसान परेशान है तेज़ भागती ज़िन्दगी से। ऐसा क्यों होता है कि इंसान जो चीज़ विज्ञान की सहायता से बना लेता है उसके साइड इफेक्ट पर ध्यान नहीं देता। कार के धुएं और एयरकंडीशनर के इस्तेमाल से ओज़ोन की परत पतली हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग नामक शब्द पिछले ४-५ सालों में ही लोगों की ज़ुबान पर क्यों आया? अमरीका जैसा बड़ा, और वैज्ञानिक दृष्टि से सशक्त देश ओज़ोन को नुकसान पहुँचाने में सबसे आगे है। ऐसा क्यों है कि वहाँ के लोग इन सब बातों को पहले नहीं सोच सके? क्या सुविधाओं के सामने हम अँधे हो जाते हैं और सही-गलत की पहचान नहीं कर पाते। पॉलीथीन का इस्तेमाल जब शुरु हुआ तो क्या उस समय ये किसी ने नहीं सोचा कि इस सब का हश्र क्या होगा? यदि तभी लगाम लग जाती तो कोर्ट को इसकी रोक का आदेश नहीं देना पड़ता। हर बार हमें तभी अक्ल आती है जब पानी सर से ऊपर चढ़ जाता है। अब हिमालय पर जमे ग्लेशियर पिघल रहे हैं तो थोड़ी बहुत समझ आने लगी है। वैज्ञानिक मान रहे हैं हैं २०२९ तक सारी बर्फ पिघल जायेगी। इसका मतलब साफ है कि पहले बाढ़ आयेगी और फिर पड़ेगा सूखा। बढ़ते औद्योगिकीकरण ने यमुना को भी मैली कर रखा है। पर यमुना के लिये क्या किया जा रहा है? यमुना नदी बोलते हुए भी अब अजीब लगता है। आकाश से देखने पर काली और गंदे नाले की तरह दिखाई पड़ती है।

हमें कुछ बातों का अभी से ध्यान रखना होगा। सरकार के भरोसे न बैठें। क्योंकि आने वाली पीड़ियाँ हमें ही गालियाँ देंगी। उनके रहने के लिये जमीन और साँस लेने के लिये हवा व पीने का पानी तो साफ रखें। पर्यावरण स्वच्छ रखने के लिये बहुत से अभियान शुरु हुए हैं। जो हो चुका है उसे हम बदल नहीं सकते, लेकिन जो हम भविष्य में नहीं चाहते उसे तो रोक सकते ही हैं। आइये हम भी वो बदलाव बनें जो बदलाव हम समाज व पर्यावरण में चाहते हैं। विज्ञान को वरदान ही रहने दें।

तपन शर्मा