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Tuesday, August 10, 2010

दिल्ली का बर्थडे और बिगड़ने की ख्वाहिश...

2005 था शायद....2005 ही था...5 अक्टूबर 2005...दिल्ली आए ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था....नए-नए दोस्तों में दो-चार ‘अच्छे’ दोस्त बन गए थे...उन्हीं में से एक का जन्मदिन था...वो दिल्ली का ही रहनेवाला है.....मेरे कम ही दोस्त ऐसे हैं जिनके पिताओं ने दिल्ली में अपना घर बना लिया और यहीं के हैं....उनमें से एक था..उसके घर पर बर्थडे की पार्टी थी...हम भी आमंत्रित थे...मेरे लिए दिल्ली भी नई थी और किसी बर्थडे की पार्टी भी....अच्छा लग रहा था कि ‘दिल्ली’ के किसी दोस्त का बर्थडे है और वहां बुलाया गया हूं....हम दो-तीन दोस्त इकट्ठे घर पहुंचे तो देखा पार्टी शुरू नहीं हुई है....कुछ और दोस्त पहुंचे हुए हैं....तीन-चार लड़कियां भी थीं...मैं उन्हें जानता था...ज़्यादा तो नहीं, मगर पहचान भर दोस्ती थी....ये नहीं जानता था कि उनसे किसी एक ही पार्टी में मुलाकात होगी....घर में और कोई था नहीं.....दोस्त के मां-पिताजी शायद पुणे गए हुए थे....बस हम सात-आठ दोस्त ही थे और एक नौकर....
पार्टी शुरु हुई....दोस्तों में आपसी परिचय हुआ, थोड़ा हंसी-मज़ाक और फिर शराब परोसी गई...मैं पीता नहीं हूं, तो बाक़ी मुझे चौंककर देखने लगे...एक और दोस्त और नहीं पीता था...हम दोनों ने कोल्ड ड्रिंक पी और संतुष्ट रहे...फिर दो लड़कियों ने अपना गिफ्ट निकाला और उसे दिया....सबके सामने गिफ्ट खोलने को कहा गया....दोस्त ने खोला तो कांडम का डिब्बा था.....दस का पैक...मैंने कांडम पहली बार तभी देखा था, इतना नज़दीक से...थोडा संकोच हो रहा था मगर अचानक सबके सामने ‘भोला’ बनता तो बेवकूफी होती.....ऐसे बैठा रहा जैसे बडी नॉर्मल-सी बात हो मेरे लिए....हालांकि, कांडम को लेकर बहुत ज़्यादा सोचा नहीं था इससे पहले और ये तो बिल्कुल ही नहीं सोचा था कि दो लड़कियां एक दोस्त को कांडम भी गिफ्ट कर सकती हैं...फिर आपसी मज़ाक शुरू हुआ....दोस्त से कहा गया कि वो कांडम खोले और लगाकर दिखाए....फिर किसी तरह से ये सब टाला गया और हंसी-मज़ाक की वजहें बदलती रहीं...मेरे लिए ये सब बिल्कुल नया था...मैं अब तक बहुत असहज महसूस कर चुका था....इन सबके बीच शराब का नशा परवान पर था और औपचारिक हंसी-मज़ाक अब गाली-गलौज तक पहुंच चुका था....किसी दोस्त ने मुझसे भी दो-चार बातें कहीं जो मुझे अच्छी नहीं लगीं....उस रात किसी को वापस नहीं जाना था....खा-पीकर वहीं सो जाना था और सुबह अपने-अपने घर जाना था....ये मेरे पिछले पार्टी अनुभवों से अलग था...मुझे ये बर्दाश्त नहीं हुआ.....जब सब पी लिए और नींद में जाने लगे तो मैं ढाई बजे रात को नौकर से दरवाज़ा खुलवाकर उसके घर से निकल गया...एक और दोस्त भी साथ में था जिसने पी नहीं थी....हम जैसे-तैसे वापस अपने कमरे तक पहुंच गए और उस रात को भूलने की कोशिश करने लगे..उस रात को मैं न चाहते हुए भी बिगड़ गया था...
वो रात भूल भी चुका था कि अचानक पांच साल बाद फिर याद आ गई....9 अगस्त मेरा जन्मदिन होता है...8 अगस्त की रात से इतने फोन कॉल्स आते हैं कि बैटरी चार्ज में लगाकर ही बात करनी पड़ती है...एकाध गिफ्ट भी मिलते हैं...डायरी, पेन, किताबें, शर्ट, डियोड्रेंट वगैरह....इस बार दो कांडम मिले...ऑफिस के एक साथी ने दिया....बाद में कहा गया कि मज़ाक है....शुक्र है, मुझे कांडम खोलकर दिखाने और पहनने के लिए नहीं कहा गया था...इस बार ये मज़ाक बुरा नहीं लगा.....अच्छा लगा...शायद उम्र का असर हो....शायद दिल्ली के तोहफों की आदत लग गई हो....लाख प्रचार देख लें बिंदास बोल, मगर कांडम से शर्म जुड़ी हुई है....हाथ में कांडम लेकर बहुत अच्छा नहीं लगता....जन्मदिन के दिन भी नहीं....मज़ाक के तौर पर तो बिल्कुल भी नहीं...कांडम कोई मज़ाक की चीज़ तो है नहीं...शायद ये अहसास दिलाने की चीज़ है कि जन्मदिन बड़ा होने के लिए होते हैं...
खैर, जन्मदिन से जुड़ी कई यादें हैं....कांडम दिल्ली से जुड़ी हुई याद है...सबसे अलग.....जब स्कूल में था तो एक दोस्त ने जन्मदिन पर एक कैसेट गिफ्ट किया था....कुमार सानू की आवाज़ में किशोर कुमार के हिट गाने....कई दिनों तक संभाल कर रखा....पहला गाना था ‘समझौता ग़मों से कर लो, समझौता....’..फिर एक दिन वो कैसेट टूट गई.....मुझे बुरा लगा था..वो बुरा लगना याद है अब तक....वो गाना भी कभी भूल नहीं पाया....न ही वो लड़की जिसने कैसेट दी थी....उस लड़की से पूछूंगा, इस जन्मदिन पर याद क्यों नहीं किया.... क्या मुझे गिफ्ट नहीं दोगी इस बार....कैसेट न सही, कांडम ही सही....मज़ाक में ही....प्लीज़...दिल्ली के बर्थडे में बिगड़ना ज़रूरी-है....इस रात को चाहकर भी बिगड़ नहीं पाया.....


निखिल आनंद गिरि

Friday, July 23, 2010

पिता की समझ पर बेटे की मासूम हंसी है 'उड़ान'

यूं तो एक हफ्ते की कीमत कुछ भी नहीं, मगर रिलीज़ के एक हफ्ते बाद भी किसी फिल्म को बेतहाशा दर्शक मिलें तो समझ लेना चाहिए कि फिल्म की कुछ न कुछ तो कीमत है ही। मैं इस मनहूस उम्मीद में था कि उड़ान जैसी कम चर्चित फिल्म को दर्शक नहीं मिलेंगे मगर मैं गलत था। दर्शक मिलने की एक वजह ये हो सकती है कि फिल्म देखने वाला बड़ा दर्शक वर्ग या तो किशोर उम्र का है या फिर इस उम्र की एक-दो सीढ़ियां आगे चढ़ चुका है। उड़ान इसी उम्र के दर्शकों के लिए ढाई घंटे के सुख की पुड़िया लेकर आई है, जो हर दर्शक पॉपकॉर्न की तरह बांट नहीं सकता, अंधेरे में अकेले चखना चाहेगा। हिंदी सिनेमा में कितनी फिल्मों के नायक किशोर बालक हैं, या फिर पिता...शायद बहुत कम। ये साहस फिल्म बनाने वालों में कम ही रहा है। उड़ान इसलिए एक अलग, उम्दा और काबिले-तारीफ फिल्म है कि निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने ने फिल्म में कई तरह के साहसी प्रयास किये हैं और अनुराग कश्यप जैसे निर्माता ने उस साहस को पर्दे पर उतारने की क्षमता दी है।
फिल्म की कहानी बेहद सीधी है, मगर कहने का अंदाज़ उतना ही कसा हुआ। एक बोर्डिंग स्कूल में आठ साल से पढ़ रहा लड़का रोहन अपने दोस्तों के साथ एडल्ट फिल्म देखता हुआ पकड़ा जाता है क्योंकि उसका वॉर्डन भी उसी हॉल में ‘किसी’ के साथ बैठकर पिक्चर देख रहा है। फिर, पूरी कहानी ऐसे ही विरोधाभासों के साथ आगे बढ़ती है। फिल्म निर्देशक सईद मिर्ज़ा ने कहा था कि निर्देशक के पास कहानी अलग नहीं होती, कहने का तरीका अलग होता है। फिल्म में आसान दृश्यों की महीनता दिखा पाना ही कला है। ये महीन पल उड़ान मे खूब हैं। किशोर उम्र का उतावलापन, बेवकूफियां और बहुत-सा आक्रोश। दर्शक जब पहली बार जान रहे होतें हैं कि फिल्म का 16 साल का नायक रोहन कविताएं लिखता हैं तो ये बताना भी ज़रूरी था कि ये एक विलक्षण कला है जो हर किशोर के पास नहीं होती। उसका दोस्त पूरी कविता सुनने के बाद झूठी दाद देता है तो रोहन पूछता है, समझ आई और दोस्त मासूमियत से कहता है नहीं। निर्देशक ने कविता लिखने के हुनर को जो सम्मान इस फिल्म में दिया है, वो हिंदी सिनेमा में शायद ही कभी मिली हो। लिखने के इस हुनर को रोहन के पिता भी कूड़ा समझते हैं और पूरी फिल्म पिता की इसी समझ को तौबा करती है, रोहन की गुस्ताखियों के ज़रिए।
शिमला के बोर्डिंग स्कूल से निकाले जाने के बाद जमशेदपुर में अपने पिता के घर वापस आना पड़ता है। रोहन की मां नहीं है, उसके पिता आठ सालों से बोर्डिंग में मिलने नहीं आए और रोहन की टीस इन आठ सालों में बहुत बड़ी हो चुकी है। उसे घर आकर मालूम होता है कि पिता ने दूसरी शादी कर ली और उसका एक छोटा भाई भी है। वो अपने पिता से उतना ही चिढ़ता है जितना उसके पिता उससे। पिता उसे जमशेदपुर की स्टील कंपनी में भट्ठी में काम करने वाला इंजीनियर बनाना चाहते हैं और रोहन लेखक के सिवा कुछ बनने की सोच ही नहीं सकता। ये घर-घर की कहानी है, मगर रोहन फिल्म में जो कर पाया, वो हर बेटा कर सके मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है।
फिल्म में पिता को क्रूरता की हद तक सख्त दिखाया गया है जो शायद फिल्म का कमज़ोर पक्ष कहा जा सकता है। फिल्म में पिता बिल्कुल नीरस है और बेटों पर हुक्म चलाना ही अपना पितृ-धर्म समझता है। उसे पिता की बजाय सर कहलाना पसंद है और वो दो बेटों के घर मे होने के बावजूद अकेलेपन को वजह बताकर तीसरी शादी की सोच सकता है। खैर, पिता की इतनी भयानक कल्पना शायद बेटे रोहन का किरदार और मज़बूत उभारने के लिए की गई होगी।
चूंकि मैं जमशेदपुर में लंबे वक्त तक रह चुका हूं इसीलिए कह सकता हूं कि जमशेदपुर कैमरे के ज़रिए उतना खूबसूरत नहीं लगा जितना सचमुच है। शायद विक्रमादित्य कंपनी का धुंआ और सुस्त-सी हरियाली दिखाकर हर सीन में ये बताना चाहते हों कि इस फिल्म का जमशेदपुर क्रूर पिताओं का शहर है और जिस शहर में पिता क्रूर हों, वो इससे खूबसूरत नहीं दिख सकता। पिता अपनी हुकूमत चलाने के दरमियां रोज़ सुबह अपने बेटों को उठाता है और साथ दौड़ लगाता है। रोहन अक्सर इस उबाऊ दौड़ में थककर हार जाता है, पर पिता आगे निकल जाते हैं। इस एक उबाऊ दौड़ को आखिरी सीन में फिल्म का हथियार बनाकर विक्रमादित्य ने ग़ज़ब का काम किया है। इस सीन के दौरान हॉल में तालियां बजती रहती हैं जो अहसास दिलाती हैं कि अंधेरे हॉल में कई रोहन बैठे हैं, जो अपने पिताओं को उजाले में कुछ नहीं कह सके। यही फिल्म की असली जीत है, सच्ची उड़ान है।
फिल्म के गीत कहानी के हिसाब से लिखे गए हैं और जादू-सा असर करते हैं। जमशेदपुर के जुबिली पार्क में पिकनिक मना रहे बाप-बेटे-चाचा जब बोर हो रहे होते हैं तो चाचा रोहन से कुछ सुनाने को कहता है कि पिता भी शायद सुन-समझ पाए। रोहन सुनाता है और पिता और गुस्से से भर जाता है। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जब आप खुद को रोहन समझने लगते हैं, भले ही पिता का चेहरा आपके पिता से मेल न खाता हो।
निर्देशक का धन्यवाद कि उड़ान के ज़रिए कई पुराने साथियों से फिल्म के पर्दे पर ही मुलाकात हो गई। मेरे कॉलेज (जमशेदपुर) के कुछ साथियों ने फिल्म में छोटी भूमिका निभाई है। उन्हे अचानक कुछ साल बाद देखना ऐसा अनुभव था कि बता नहीं सकता। उड़ान एक भावुक कर देने वाली बेहतरीन फिल्म है, जिस पर ज़्यादा लिखना ठीक नहीं। आप देख कर आएं तो ज़रूर लिखें। ये सबको देखनी चाहिए और देखने के बाद लिखना भी चाहिए। शायद फिल्म देखने के बाद वो हिम्मत आ जाए कि हम अपने पिताओं से आंखें मिलाकर कह सकें कि हम आपके बेटे हैं, कोई फिक्स डिपॉज़िट नहीं।

निखिल आनंद गिरि

Tuesday, July 06, 2010

धोनी संग साक्षी : DOGS & MEDIA NOT ALLOWED !

ज़रा सोचिए, अगर महेंद्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट में अपनी जगह नहीं बना पाते और झारखंड के ही मैदानों पर चौके-छक्के लगा रहे होते। फिर, उनकी उम्र 29 साल की होती और वो शादी कर रहे होते। तो एक कैमरामैन लड़केवालों की तरफ से और एक लड़कीवालों की तरफ से भाड़े पर मंगाया जाता। ये तो नहीं होता कि देश के सबसे अच्छे कैमरे और सबसे बुद्धिमान होने का भ्रम पाले मीडिया वाले मुफ्त में धोनी की शादी पर खर्च हो रहे होते। मगर, ऐसा हुआ और हमें ताज्जुब इसलिए नहीं हुआ कि मीडिया की ऐसी दीवानगी पहली बार नहीं थी....सानिया-शोएब की शादी भी मीडिया के लिए कूदने-फांदने का ऐतिहासिक दिन था...ऐसे जैसे भारत और पाकिस्तान दोस्ती के सात फेरे लेने जा रहे हों...इसी बीच दंतेवाड़ा में 76 जवान मारे गए, मगर सानिया-शोएब की खबर टीवी के पर्दों पर ज़्यादा ज़रूरी बनी रही....
खैर, धोनी की शादी पर लौटते हैं.... ज़ी न्यूज़(इसी के एक छोटे-से हिस्से में मैं भी नौकरी करता हूं...) भी बाक़ी चैनलों की तरह शादी के मंडप से कोसों दूर कैमरा टिकाए इंतज़ार में था कि कब क्या ब्रेकिंग न्यूज़ मिल जाए......देहरादून में हमारे रणबांकुरे साथी और नोएडा के न्यूज़रूम में हम....देहरादून से नोएडा सिग्नल पर मिल रहे वीडियो में कोई भी गाड़ी दिखती तो लगता ये साक्षी होगी, ये साक्षी की अम्मा होगी...और न जाने क्या-क्या....इतनी बारीकी से तो मैंने कभी किसी शादी में हिस्सा नहीं लिया....
खैर, हमारी एक रिपोर्टर ने तो उस घोड़ी का 'जायज़ा' ले लिया जिस पर धोनी सवार होने वाले थे....इतना उत्साह था रिपोर्टर में कि दर्शक अपने भोलेपन में ये तक समझ लें कि धोनी की शादी इसी घोड़ी से हो रही है! और तो और, हमारी एक एंकर ने शादी पर विशेष बुलेटिन के लिए खास तौर पर एक लाल रंग का लहंगा पहन लिया था ...ऐसा लग रहा था कि वहां देहरादून में बारात निकलेगी और यहां हम नाच उठेंगे...
सबसे मज़ेदार था पसीने से लथपथ घोड़ीवाले का 'एक्सक्लूज़िव' इंटरव्यू जो हर चैनल पर चल रहा था....घोड़ीवाला ही मीडियावालों के लिए सबसे विश्वस्त सूत्र था कि धोनी ने क्या पहना, भज्जी ने कितना नाचा और खाने में क्या-क्या था वगैरह-वगैरह....बेचारा घोड़ीवाला इतने सारे कैमरे एक साथ अपने मुंह पर देखकर राहत की सांस ज़रूर ले रहा होगा कि उसके सामने उससे भी 'बेचारे' कितने लोग हैं...
एनडीटीवी के रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग पर पहले ही लिख दिया है कि उन्हें आदर्शवादी होकर टीवी के गिरते स्तर पर मर्सिया पढ़ने वाला पत्रकार न समझा जाए....नहीं समझेंगे जी, बस कुछ सलाह और दे दें ताकि आने वाले समय में शादियों की कवरेज में पत्रकारों को टीवी पर मंडप बनाने में और आसानी हो जाए.... सलाह नंबर एक... हो सकता है कि मीडिया चैनल कुछ बड़ी हस्तियों के शादी के ऑर्डर अभी से ही बुक कर लें....जैसे, राहुल गांधी, युवराज सिंह, भज्जी और 'प्रिंस' (गड्ढे में गिरने वाला महान बालक)....फिर इन्हीं चैनलों के ज़िम्मे कैटरिंग का सारा ज़िम्मा हो...पत्तलें बांटने से लेकर पत्तले उठाने तक का...शॉट्स की दिक्कत ही नहीं आएगी साहब...बड़े-बड़े एंकर बड़े-बड़े लोगों की पत्तले उठाएं...वाह! देश की सबसे बड़ी शादी....सबसे बड़ी कवरेज.....सबसे बड़ा पंडाल....हम सबसे बड़े युग में जी रहे हैं....वाह!
सलाह नं दो... शादी के सारे छोटे-बड़े काम छोटे-बड़े चैनल्स आपस में बांट लें...मसलन, पंडित जी को लाने-ले जाने का ज़िम्मा किसी एक चैनल को.....जनवासे (जहां बारात ठहरती है) का इंतज़ाम किसी और चैनल को....न्योता (वो लिफाफा या तहफा जो शादी में आने वाले मेहमान लेकर आते हैं) लिखने का काम किसी और चैनल को...हां, मंगल गीत वगैरह गाने का काम किसी एफएम चैनल को भी सौंपा जा सकता है.....
मेरी बड़ी दीदी की शादी हुई थी तो दस-पंद्रह दिन बाद शादी की कैसेट बनकर आई थी...अलग-अलग फिल्मी गानों और पहाड़-समुंदर वाले लोकेशन्स पर उड़-उड़कर दीदी और जीजाजी की तस्वीरें आती थीं और हम रोमांचित होते थे....मैं दसवीं में पढ़ता था तब....अब एमए पास हूं...नौकरी भी करने लगा हूं...मगर, काम वही शादी के वीडियो बनाने का ही रहा...देहरादून से दूर जहां ये शादी हो रही थी, दूर-दूर तक मीडिया के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी....कैमरे पर भूख-प्यास से बेहाल रिपोर्टर ऐसे जंगल में खड़े लग रहे थे कि दंतेवाड़ा से कवरेज कर रहे हों...फिर भी कवरेज किए जा रहे थे...कोई चैनल बता रहा था कि धोनी ने गोल्डन शेरवानी पहनी थी, किसी ने कहा भूरी शेरवानी पहनी थी...सबको रतौंधी हो गई थी...जिसे जो दिखा, अपने-अपने चैनल को बता दिया...देश अलग-अलग शेरवानी में धोनी की शादी देख रहा था...जैसे धोनी धोनी न रहे हों, धोनी शिव का अवतार हो गए हों....देहरादून की पहाड़ियां कैलाश हों और साक्षी साक्षात पार्वती....मीडिया वाले भूत-बेताल बनकर नाच रहे थे और कोई खाने तक को नहीं पूछ रहा था....
खाने से एक और खबर याद आई जो इस दिन हल्के में कहीं-कहीं चल रही थी....हमारे प्रधानमंत्री 3 जुलाई को आईआईटी कानपुर गए थे तो उनके खाने में 26 व्यंजनों में मिलावट पाई गई थी ! ऐसे-ऐसे ज़हरीले केमिकल पाए गए कि मुझे नाम ही समझ नहीं आ रहे थे....मगर, प्रधानमंत्री की किसी को फिक्र नहीं थी.....अजी, इस देश में खाने में मिलावट कोई खबर है क्या....पीएम ने पहली बार खाया तो क्या हो गया...धोनी रोज़-रोज़ थोड़े ही शादी करेगा....मीडिया को नहीं बुलाया, न सही....जाना तो ज़रूरी है...बिन बुलाए पहुंचने का मजा ही कुछ और है...

निखिल आनंद गिरि
(फोटो : बीबीसी से साभार)

Thursday, July 01, 2010

गर्व से कहो हम वर्जिन (नहीं) हैं...

हाल ही में किसी अंग्रेज़ी अखबार में एक ख़बर पढी कि पाकिस्तान की आधुनिक सड़कों पर कुछ अलग किस्म के बैनर और होर्डिंग्स इन दिनों खूब दिखने लगे हैं । इन होर्डिंग्स के ज़रिए महिलाओं को लुभाने की कोशिश की जा रही है। ये विज्ञापन हैं चिकित्सा विज्ञान द्वारा वर्जिनिटी बचाए रखने के तरीकों के !  हाइमन सर्जरी या हाइमनोप्लास्टी तकनीक के ज़रिए उन महिलाओं का कौमार्य यानी वर्जिनिटी बरकरार रखने में मदद मिलती है जो शादी के पहले सेक्स संबंध बनाती हैं और चाहती हैं कि उनके संबंधों का पता उसके पति को न चले ताकि वैवाहिक जीवन में कोई बाधा न आए । ऐसे में हाइमन सर्जरी तकनीक 40-50 हज़ार रुपये में ' कुंवारेपन' की गारंटी देती है। एक तरह से रुढ़िवादी देशों में ये तकनीक महिलाओं के लिए हथियार की तरह है जो सेक्स की आज़ादी भी ले सकती हैं और फिर सामान्य वैवाहिक जीवन भी गुज़ार सकती हैं। बाद में जब कुछ साथियों से पूछा तो पाया कि भारत में भी ये तकनीक ठीकठाक लोकप्रिय है। मुझे इसके बारे में पता नहीं था। (और न ही इसका कोई आंकड़ा कहीं से मिल पाया है)
इसीलिए जानकर हैरत भी हुई और उत्सुकता भी। हैरत इसीलिए कि क्या सचमुच कट्टर, तालिबानी (या फिर भारत जैसे रुढिवादी)देशों की महिलाएं सेक्स को लेकर इतनी सजग हो गई हैं कि वो अपनी पसंद से संबंध भी बनाएं और फिर बाद में दकियानूसी सोच वाले समाज से बचाकर इस सच पर पर्दा डाल दें?  उत्सुकता इसीलिए कि क्या सेक्स सचमुच इतना 'आसान' और  'हल्का' विषय हो गया है कि  जब चाहा किया और फिर भुला  दिया ।  पता नहीं।
कुछ महीने पहले मध्यप्रदेश के शहडोल में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने कन्यादान योजना के तहत एक सामूहिक विवाह का आयोजन किया था। शादी से ठीक पहले मंडप से दुल्हनों को उठाकर मेडिकल टेस्ट करा दिया गया । ये टेस्ट कौमार्य परीक्षण का था। मतलब, ये जांचने की कोशिश कि कौन-सी लड़की वर्जिन है और कौन नहीं ! मुझे नहीं मालूम उस टेस्ट के बाद उन जोड़ों का क्या हुआ। मुझे नहीं मालूम उनमें से कितनी लड़कियों ने इस कौमार्य परीक्षण को समझा भी होगा। और कितनों को हाइमनोप्लास्टी जैसी मेडिकल तकनीक के बारे में पता होगा जो इस परीक्षण से पहले वो करवा चुकी होंगी। मगर, इतना मालूम है कि उस परीक्षण के लिए सिर्फ दुल्हनें ही आई थीं, दूल्हे नहीं।

सवाल ये है कि वर्जिनिटी को लेकर सारी मुश्किलें लड़कियों से ही क्यों जुड़ी हैं। क्या लड़कों को वर्जिनिटी छिपाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। क्या उन्हें मालूम होता है कि वर्जिनिटी से जुड़ा सवाल भारत में अब भी लड़की (पत्नी) शायद ही लड़के (पति)  से पूछे। या फिर, उन्हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि लड़की उसके 'चरित्र' के बारे में क्या सोचती है। वैसे भी लड़कों की वर्जिनिटी मापने का कोई तरीका शायद है भी नहीं । तो उन्हें छिपाने की ज़रूरत भी क्या है।
दरअसल, भारत जैसे देश में समाज का दोहरापन शुरू से रहा है। लड़के और लड़की के लिए नैतिक मापदंड अलग-अलग हैं। देहरादून की एक दोस्त (महिला) से इस बारे में राय ली तो उसने कहा कि शहर में हर लड़का चाहता है कि एक लड़की का साथ उसे ज़रूर मिले। लड़की जो खुलकर बातें कर सके, सब कुछ शेयर कर सके, मतलब 'इज़ी-गोइंग गर्ल' (ये मेरी दोस्त का इजाद किया हुआ शब्द है)। मगर, जब शादी की बात आएगी तो कैसी भी लड़की चल जाएगी, सिवाय उस इज़ी-गोइंग  गर्ल के ! 
ये लड़कियों के लिए समाज का पैमाना है जो उसकी सब खूबियों को एक झटके में दरकिनार कर सकता है, अगर उसे ये पता चल जाए कि 'लड़की' ने शादी से पहले 'आज़ादी' का अपराध किया है।
फिर, ऐसे समाज में मेडिकल साइंस का सहारा बुरा विकल्प तो नहीं है। क्या आधुनिक समाज का रास्ता देह की आज़ादी से होकर नहीं जाता है?  आप क्या सोचते हैं?

निखिल आनंद गिरि

Friday, June 11, 2010

प्रकाश झा को अब फिल्म नहीं, 'राजनीति' करनी चाहिए...


अगर एक साथ बी आर चोपड़ा की महाभारत, रामानंद सागर की रामायण, मनमोहन देसाई का मसाला और गॉडफादर की झलक देखनी हो तो ‘राजनीति’ देखनी चाहिए...बस यही है कि निर्देशक प्रकाश झा से तीन घंटे के दौरान कम ही भेंट हो पाएगी...बॉलीवुड के एक दर्जन फॉर्मूले को एक साथ पेश करने में ही प्रकाश झा का टाइम पास हो जाता है और फिल्म खत्म हो जाती है....फिल्म में इतनी गुत्थियां हैं कि आप आंखे फाड़े ‘आगे क्या होगा’ के लिए फिल्म देखते जाते हैं और आखिर में होता कुछ नहीं है, बरसों पुरानी परंपरा के तहत सब हीरो-विलेन इत्यादि गोलियां खा-खाकर अपना रोल खत्म करते जाते हैं....बचपन में मां कभी किसी पुराने स्वेटर को उघाड़ने के लिए कहती थी, तो हम बड़े मज़े से ऊन खींचते जाते थे और स्वेटर उघड़ता रहता था...लेकिन, एक जगह ऊन के धागे उलझते तो खीझ कर उलझन भरा गोला मां के हाथों में थमाकर भाग जाते थे खेलने...यही काम प्रकाश झा ने किया...बड़े मज़े से पूरी फिल्म में परतें उघाड़ते रहे और कहानियां उलझाते रहे, लेकिन आखिरी आधे घंटे में दर्शकों से ज़बरदस्ती सीट खाल करवा दी कि जाईए अब क्या बचा है फिल्म में, सब मर जाएंगे, कुछ नया थोड़े ही होना है...आप हिंदुस्तान में हैं और भारत के महाकाव्य महाभारत का एक हज़ारवां रीमेक देख रहे हैं...हम इससे छेड़छाड़ नहीं कर सकते....

दरअसल, मानने को तो ये फिल्म किसी एक सिरे से पकड़ कर समझी जा सकती है....एक मुख्य कहानी है और कई कहानियां (सब-प्लॉट्स) साथ-साथ चलते रहते हैं...पर, ये निर्भर दर्शक पर करता है कि वो मुख्य कहानी किसे मानता है....मान लें कि मुख्य कहानी एक भाई का दूसरे भाई से अटूट प्यार है और लक्ष्मण अपनी (लोग कहते रहे कि ये महाभारत है, मगर हमने रामायण ढूंढ लिया) भक्ति में सब कुछ कुर्बान कर देता है...इस बीच उसे अपने पिता के हत्यारों से बदला भी लेना है और अमेरिका लौट जाना है...इसके इर्द-गिर्द सारी कहानियां रची गई हैं...जैसे, भाई कोई साधारण लोग नहीं हैं, देश के सबसे प्रभावी राजनैतिक खानदान के चिराग हैं...उनके पास गाड़ी है, बंगला है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है और मां भी है....बस नहीं है तो कुर्सी....तो इस कुर्सी को पाने के लिए उन्हें अपने ही भाईयों से मुकाबला करना है और फिर भाई-भाई-चचेरा भाई-नाजायज़ भाई एक दूसरे से उलझते रहते हैं और स्टार न्यूज़ पर खबर देख-देखकर दांत पीसते रहते हैं...

फिल्म की शुरूआत में ही इतने सारे रिश्तों से दर्शकों का पाला पड़ता है कि आधा घंटा ये समझने में निकल जाता है कि कौन किसका क्या लगता है....फिर, जब तक ये थोड़ा-बहुत समझ आता है, कहानी का रस मिलना शुरू हो जाता है...फिल्म का बीच का हिस्सा बेहद कसा हुआ है और यही वो हिस्सा है जिसकी वजह से राजनीति देखने वालों की तादाद घटी नहीं है...प्रकाश झा कहानी का शिल्प गढ़ने में कितने उस्ताद हैं, यही हिस्सा साबित करता है...एक के बाद एक कहानी इतनी पलटी मारती है कि देखने वाले की आंखें पर्दे से हटती ही नहीं....एक मंच पर मनोज वाजपेयी मुख्यमंत्री की दावेदारी करने के लिए भीड़ जुटा चुके हैं और अचानक अर्जुन रामपाल और उसका मास्टरमाइंड भाई रणबीर कपूर उसी मंच पर प्रकट होकर सारा खेल उलट देते हैं....ये ग़ज़ब का सीन था, जिसमें रणबीर कपूर की अभिनय क्षमता निखर कर सामने आई है...इस फिल्म की सबसे बड़ी खोज रणबीर ही हैं, जिन्हें प्रकाश झा ने तराश कर हीरा कर दिया है । इस फिल्म के बाद से रणबीर कपूर किसी फिल्म में अकेले हीरो हुए तो भी पैसा लगाने की आप सोच सकते हैं। ये गलती कैटरीना कैफ पर मत कीजिएगा..कतई नहीं। प्रकाश झा जैसे ठेठ बिहारी भी कैटरीना से हिंदी नहीं बोलवा सके तो उसका कुछ नहीं हो सकता...प्रकाश झा ने उन्हें क्यों अपनी फिल्म में लिया, समझ में नहीं आता। अगर खानदान की बहू का राजनीति मे मज़बूती से उभरना सोनिया गांधी से मिलता हुआ दिखाने के लिए किया गया तो उतनी देर के लिए ठीक था। लेकिन, बाक़ी फिल्म सिर्फ इसी एक वजह से उन्हें दी गई, ये तो गलत है। कोई गधी भी उनसे बेहतर एक्टिंग कर सकती थी। इतने बढ़िया डायलॉग रट-रट कर जब कैटरीना बोल रही थीं तो रणबीर तो इंकार हीं करेंगे ना। हमें तो कैटरीना के सीरियस सीन देखकर भयंकर हंसी आ रही थी। यही गलती अर्जुन रामपाल को लेकर भी हुई है....उनकी जगह कोई और होता तो भी फिल्म चलनी ही थी। एक झबरीले बाल वाला फैशनेबल-सा, छिछोरा-सा नेता किस राज्य का मुख्यमंत्री बन सकता है, प्रकाश झा ही जानते होंगे । अच्छे सीन्स भी मार दिये हैं अर्जुन रामपाल ने। जब पार्टी कार्यकर्ता टिकट के लिए अर्जुन रामपाल से संबंध बनाती है तो संबंध बनाने के बाद अर्जुन एक सीरियस डायलॉग बोलते हैं, राजनीति कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बस नहीं, जो हर कोई सवार हो जाए….साफ दिखता है कि रट्टा मारकर बोल रहे हैं, मज़ा ही नहीं आता। कुछ ब्लॉग्स पर अर्जुन रामपाल को युधिष्ठिर बताया गया है। भाईयों के क्रम की वजह से ऐसा मानना गुनाह नहीं है, मगर अर्जुन अय्याश भी है और क़ातिल भी, फिर युधिष्ठिर कैसे हो सकते हैं, समझ नहीं आता।
अगर महाभारत से प्रेरणा की बात है, तो सिर्फ कुंती और कर्ण ही मुझे ढूंढने से मिलते हैं। कुंती और कर्ण का एक बोरिंग सीन भी है आखिर में, बिल्कुल ज़बरदस्ती का । सदियों से फिल्मी मां जो करती आई है, वही कुंती भी करती है। अपने बेटे को इमोशनली ब्लैकमेल करने की कोशिश करती है, मगर नाजायज़ बेटा मां..मां...मां....कहने के बजाय पलटकर चला जाता है। ये कर्ण अजय देवगन बने हैं, जो पूरी फिल्म में एंग्री यंग मैन बने फिरे हैं..एक कबड्डी चैंपियन अचानक दलित नेता बन जाता है और फिर बस्ती का भला करने के बजाय अपने ‘पॉलिटिकल गॉडब्रदर’ यानी मनोज वाजपेयी यानी दुर्योधन के तलवे चाटता रहता है। अजय देवगन का गुस्सा फिज़ूल का दिखता है। दलित नेता शोषित है, तो चेहरा हमेशा तना ही रहेगा, ये कोई ज़रूरी थोड़े ही है।

यहीं पर आकर प्रकाश झा फिल्म को क्लासिक होने से बचा लेते हैं। एक मसाला फिल्म की तरह गोलियों से सब एक-दूसरे को निढाल करते रहते हैं और हीरो को कुछ नहीं होता। नाना पाटेकर मामाजी के रोल में एकदम फिट हैं...उन्हें शकुनी छोड़कर कृष्ण मानने का मन तब तक नहीं होता जब आखिर में वो रणबीर यानी महाभारत के हिसाब से अर्जुन को अंग्रेज़ी में गीता का उपदेश देते हैं कि ‘कम ऑन, शूट दुर्योधन’....

इस फिल्म में द्रौपदी भी है, जिसके दो पुरुष हैं...एक रणबीर कपूर जो उसका हो नहीं पाता और दूसरा अर्जुन रामपाल जो रणबीर का बड़ा भाई है। सिंदूर लगाकर कैटरीना भारतीय बनने की पूरी कोशिश करती हैं, मगर मुंह खुलते ही दर्शक गला फाड़कर हंसता है। अचानक अपना पहला प्यार छोड़कर पति परमेश्वर से इमोशनली जुड़ने में कैटरीना को पंद्रह मिनट भी नहीं लगते और बिस्तर पर अर्जुन रामपाल और कैटरीना होते हैं तो दर्शक आवाज़ लगाते हैं- इसे भी मिल गया टिकट...

फिल्म की कहानी में विदेशी लड़की सारा क्यों आती है, मैं अब तक सोच रहा हूं। मुझे लगा कि वो आखिर में विदेशी बहू का मुद्दा बनकर राजनीति को सार्थक करेगी, मगर वो तो पहले ही ढेर हो जाती है। इस फिल्म में भारत का राजनैतिक इतिहास कई बार झांकी दिखाता है, जब बम धमाके में या गोली खाकर देश के बड़े लीडर जान गंवाते हैं। लेकिन, इससे आगे राजनीति में कुछ भी राजनैतिक नहीं है। सब कुछ एकता कपूर के सीरियल की तरह मसालेदार है, जो देखने में तो अच्छा लगता है, मगर प्रकाश झा के निर्देशन में देखना पचता नहीं है। कहीं-कहीं भारी-भरकम शब्दों को डायलॉग का हिस्सा बनाना भी नहीं जंचा, वो भी तब जब कैटरीना जैसी हीरोइन को मुंह खोलना हो। 21वीं सदी की कुंती कर्ण से कहेगी कि तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो कर्ण तो कौन कर्ण इस संवाद को सच मानेगा....एकाध मिनट का आइटम सांग प्रकाश झा ने फिल्म में क्यों डाला, पता नहीं। उसका न तो फिल्म की कहानी से कोई लेना-देना था, न गाने के बोल से।

सबसे मज़ेदार है कर्ण यानी अजय देवगन का राज़ खुलना कि वो किसी और की औलाद है। पालने वाली मां ने 30 सालों तक वो लाल कपड़ा साफ-सुथरा, नया—नवेला ही रखा जिसमें उसे बच्चा नदी में मिला था। ये सबूत तो मनमोहन देसाई से भी आगे की सोच निकला।

मनोज वाजपेई का अभिनय ज़बरदस्त है। वो पक्के दुर्योधन लगते हैं, लेकिन उनके सामने पांडव कहीं नहीं हैं। वो सब छोटे दुर्योधन हैं...कोई विधानसभा टिकट देने के नाम पर लड़की को सुला रहा है तो कोई रिमोट से कार उड़ा रहा है। मज़े की बात है कि दर्शक कहीं बोर नहीं होता। उसे वो सब कुछ मिलता है, जो एक फिल्म में वो ढूढता है। तीन-चार बेडसीन, पचास ग्राम आइटम सांग, भयंकर मारपीट और कैटरीना कैफ। ये फिल्म बिना किसी सोच के साथ देखने जाएं तो भरपूर मनोरंजन होगा। नसीरुद्दीन शाह एक सीन के लिए आते हैं और वो निशानी छोड़कर जाते हैं कि पूरी फिल्म बन जाती है। एक खूबसूरत डायलॉग भी उनके हिस्से आया है, जो पूरी फिल्म का सबसे साार्थक डायलॉग है 'भीड़ की तरफ जो भी दो रोटियां फेंकेगा, वो उसी का झंडा उठा लेगी'
प्रकाश झा खुद भी चुनाव लड़ चुके है और हार भी चुके हैं. ज़ाहिर है, राजनीति को रसीला बनाने में उनके खट्टे अनुभव भी काम आए होंगे। मगर, क्या भारतीय राजनीति सचमुच हिंसा और पारिवारिक दुश्मनी के आगे कुछ भी नहीं है। अगर ऐसा है भी तो प्रकाश झा को फिल्मकार की हैसियत से एक ज़िम्मेदारी भरा अंत ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए थी, जैसा अंकुर में श्याम बेनेगल करते हैं। इतने उम्दा निर्देशक से इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है। उनसे तो ये भी अपेक्षा है कि जिस भोपाल में इस फिल्म की शूटिंग हुई है,(पर्दे पर सबसे पहले भोपाल और एमपी की जनता को शुक्रिया करता हुआ संदेश आता है) उसी भोपाल के गैस हादसे पर भी एक फिल्म बनाएं और दर्शकों को बताएं कि कैसे हम गुलामी के बेहद करीब हैं..प्रकाश झा ऐसा कर सकते हैं।

निखिल आनंद गिरि

Wednesday, June 09, 2010

25 सालों से भोपाल जाग रहा है ?

2-3 दिसंबर की रात को जब जहरीली गैस ने पूरे भोपाल को मौत की नींद बांटनी शुरू की होगी, मेरी उम्र के लोग अपनी मां की गोद में छोटी-छोटी आंखे बंद किए निश्चिंत सो रहे होंगे....हमारी मांओं को भी तब सिर्फ अपने बेटों की तरक्की के सपने ही आते होंगे...फिर भी, अब जब 25 साल बाद इस घटना के पन्ने दोबारा देश भर में ज़हर फैला रहे हैं तो हमारा  खून भी खौल उठता है...ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही मुमकिन है कि एक कंपनी पूरे शहर को तबाह कर दे और कंपनी का गुनाह तय कर पाने में 25 साल गुज़र जाएं....इस पूरे मामले ने 19 जज देखे, करोड़ों रुपए बर्बाद हुए और फैसला क्या आया.....दो साल की सज़ा वो भी ज़मानत पर रिहाई के साथ.....सज़ा उसको नहीं जिसका दोष जगज़ाहिर था...सज़ा उन छोटी मछलियों को जो उस वक्त सिर्फ अपनी सैलरी लेकर इंक्रीमेंट और प्रोमोशन के लालच में अमेरिकी बॉस की गुलामी करने को मजबूर थे......25 हज़ार मौतों के बाद भी एक एंडरसन भारत नहीं लाया जा सका...अमेरिका की बेशर्मी की हद देखिए कि इस मौके पर जब पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता, वो कहता है कि इस फैसले के बाद आगे किसी जांच की गुंजाइश नहीं है और इस मुद्दे पर अब हर तरह से पर्दा गिर जाना चाहिए....अमेरिका इतनी बेहयाई से कह इसीलिए पा रहा है कि हम विदेशियों को सुनने और गुलामी करने के लिए ही बने हैं.....मनमोहन सिंह या फिर सुपर प्राइम मिनिस्टर सोनिया गांधी इस मुद्दे पर कोई सफाई नहीं दे रहे हैं.....वॉरेन एंडरसन 89 साल की उम्र में अमेरिका में मज़े ले रहा है और यहां उसकी लापरवाही की सज़ा भुगत रहे बेगुनाह अपने मुआवाज़े की रकम के लिए दर-दर भटक रहे हैं....मुमकिन है कि उनके मुआवज़े की रकम दलाल खा गए और अपने-अपने बंगले बनवा लिए.....वीरप्पा मोइली कहते हैं अभी एंडरसन का मामला बंद नहीं हुआ है.....वाह जी, अभी तो एंडरसन जी के गए 25 साल ही हुए हैं....कभी न कभी तो भारत आने का मन करेगा उनका....कभी न कभी तो मन होगा कि जवानी की यादें ताज़ा करें....तो जब भारत आएंगे फिर उन पर नए सिरे से सोचा जाएगा....अभी तो भारत की जनता 2 साल की सज़ा से ही खुश रहे..... जिस वक्त भोपाल हादसा हुआ, अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे....मगर, उन्हें इस घटना की प्रतिक्रिया देने से पहले दस बार राजीव गांधी से मशवरा करना पड़ा.....तब तक मुंह छिपाए फिरते रहे....इस बीच एक काम ये हो गया कि एंडरसन जिसे लोकल पुलिस ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया था, रात भर में ही ससम्मान जमानत दे दी गई और वो तभी अपने निजी विमान से अमेरिका उड़ गया...तब भोपाल अपने परिजनों के अंतिम संस्कार में व्यस्त था.....


कानून अंधा होता है, झूठी बात है...कानून देखता है कि फैसला किसके खिलाफ लेना है, ये देखने के बाद अंधा होने का ढोंग करता है.....हमें अफसोस है कि हमने उस पीढ़ी में होश संभाला जब हम पहले ही किसी और देश को बिक चुके हैं.....अभी न्यूक्लियर डील के तहत सिविल लियाबिलिटी बिल आना बाक़ी है...तब देश में कम से कम 18 परमाणु संयंत्र लगने हैं और वो भी रिहाइशी इलाकों में....कहीं एक भी चूक हुई तो पूरा देश ऊर्जारहित हो जाएगा.....मैं तो कहूंगा कि अदालतों के फैसले के कागज़ जांचे जाएं....कहीं ऐसा न हो कि नया खुलासा हो कि भारत की अदालतों के फैसलों पर आखिरी मुहर अमेरिका ही लगाता है....हम अपनी अगली पीढ़ी को एक सच की विरासत देना चाहते हैं....

एक और बात जो आज ही कहीं पढ़ रहा था......भोपाल में फैक्ट्री लगाए जाने के वक्त जब भारत ने अमेरिका से नुकसान के बारे में रिपोर्ट मांगी गई थी तो लिखा आया था कि भोपाल के उस इलाके में फैक्ट्री लगाना उतना ही नुकसानरहित है जितना चॉकलेट की फैक्ट्री लगाना....इस अमेरिका का झूठ तो हम तब से बर्दाश्त करते आ रहे हैं...और ये सब सरकारें करती आई हैं.....बीजेपी ने ही अपनी सत्ता के सात साल में क्या उखाड़ लिया....और हमारे इस लेख से भी क्या हो जाएगा....हम तो आज भी चैन की नींद सो ही लेंगे, भोपाल की आंखों में 25 सालों से नींद नहीं है....वो जाग रहा है क्योंकि उसकी पहचान पर अमेरिका के कुछ दलालों ने गैस की कालिख पोत दी है.....

शर्म...शर्म...शर्म.....
 
निखिल आनंद गिरि

Wednesday, March 24, 2010

स्टिंग कैमरा, मीडिया और धोखा..

लव, सेक्स और धोखा....नाम बेहद अजीब है...उस दौर में जब हर हिंदी फिल्म के साथ अंग्रेजी टैग का रिवाज़ हो....हालांकि, फिल्म देखने के बाद साफ़ हो गया कि लव सेक्स और धोखा आजकल के फ़टाफ़ट संबंधों का कच्चा चिटठा है....फ़टाफ़ट संबंधों में पहले फ़टाफ़ट लव होता है, फिर सेक्स होता है और फिर एक तयशुदा धोखा....(जैसा कर्म करोगे, वैसा फल मिलेगा टाइप)....लव आजकल और कमीने से एक कदम आगे की फिल्म....अब सीधे-सीधे फिल्म की कहानी कहने का दौर रहा नहीं.....कि कैमरा ऑन किया, एक्शन बोला और एक लम्बा सा सीन चालू
है....फिर, वक़्त-बेवक्त बढ़िया बोल वाले गाने....दर्शक को सब कुछ मालूम होता था कि वो हॉल से क्या लेकर लौटेगा....एक साफ़-सुथरा सन्देश (जैसे सत्य हमेशा जीतता है या फिर माँ-बाप भगवन होते हैं टाइप) और मिश्री जैसे गाने.....इस फिल्म का गाना है 'तू नंगी अच्छी लगती है....तू गन्दी अच्छी लगती है.....' याद कीजिये 'देव डी'....मॉडर्न पारो अपने देव को नंगी तस्वीर भेजती है....और खेत में आमंत्रण भी देती है....ये मल्टीप्लेक्स दौर का सिनेमा है...आप परदे से सिर्फ दूरी के मामले में नजदीक नहीं होते, परदे पर चल रही फिल्म आपके आसपास की लग रही होती है....लव सेक्स और धोखा (टिकट काउंटर पर जल्दबाजी में एक लड़की इसे एल एस डी कह रही थी ) देखकर डर लगा मुझे....जैसे पूरी फिल्म कह रही हो "आप कैमरे की निगाह में हैं, २४ घंटे, स्टिंग कैमरे आपकी सेवा में सदैव तत्पर..."
देश की बड़ी आबादी शहरी हो रही है...जो खेत थे, वहाँ मॉल उग रहे हैं....मॉल्स में प्यार होता नहीं, किया जाता है.... गुप्त कैमरे को साक्षी मानकर......और फ़टाफ़ट किया जाता है....शिफ्ट में नौकरी करनी है, शिफ्ट के बाद प्यार-व्यार भी करना है....प्यार में कटौती करनी है....भूमिका बांधे बिना सीधा 'मुद्दे' पे आना है.... लड़की के साथ भी यही सब समस्याएं है....शिफ्ट वाली, कटौती वाली...मगर वो कहेगी नहीं, लड़की जो है.....फिल्म सब कुछ कहती है....स्टिंग कैमरा पूरी फिल्म का सूत्रधार जैसा है....फिल्म आगे बढती है और कैमरा गुस्ताखियाँ करता जाता है....किरदार कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं करते....कैमरा सब कुछ करवा देता है.....कैमरे के आगे कहीं फिल्म तो कहीं पैसा बनाने की सनक में ज़िन्दगी धोखा खा जाती है (लव और सेक्स के बाद ) तो कहीं किसी को बर्बाद करने की सनक....मीडिया सबको बर्बाद कर रहा है....चालाक बना रहा है.....होशियार बना रहा है....ये फिल्म हमें बार-बार बताती है...इसके लिए निर्देशक दिबाकर का लाख-लाख धन्यवाद....मीडिया रेड लाइट इलाके के दलाल जैसा हो गया है की जहां जिस्म की बू आती है, वहाँ पान चबाता नज़र आ जाता है....अपना कैमरा घुसेड़ देता है....लड़की का इस्तेमाल होता है, चैनल को सुपरहिट बनाने के लिए....हिंदी चैनलों के न्यूज़ रूम में आधे घंटे के प्रोग्राम का नाम रखने के लिए जैसे 'कैची' नाम सोचे जाते हैं, फिल्म में उसकी एक झलक भर है....'फलां नंगा अच्छा लगता है....' आह, क्या नाम है....क्या तमाचा है दिबाकर जी.....
ये फिल्म नौसिखियों की कहानी है....जो फिल्म बनाना सीख रहे हैं, उनके लिए एक सन्देश कि फिल्म बनाना बेहद आसन है, अगर आप अपने समाज को पढ़ पाते हैं तो हर गली के आखिरी मकान में एक कहानी है जो कही जानी है....इसके लिए किसी बड़े सेट, बड़े स्टार की ज़रूरत नहीं है....एक हैंडी कैम भर चाहिए, जो बच्चों के बायें हाथ का खेल है आजकल....ये फिल्म बॉलीवुड के आने वाले दशक के लिए क्रांति है....फिल्म इतनी ओरिजिनल है कि अगर आप दो-चार साल किसी भी महानगर में रह चुके हैं, तो लगेगा ही नहीं कि आपने कोई फिल्म देखी है....सीधे-सीधे कहानी कहने-समझने का ज़माना अब रहा नहीं, इसीलिए भारतीय दर्शकों, हॉल जाएँ तो थोड़ी-बहुत बुद्धि भी साथ लेकर जाएँ, फिल्म का भरपूर आनंद ले पायेंगे....हॉल में फिल्म देखते वक़्त हर सीन पर युवा दर्शकों की विशेष टिप्पणियाँ फिल्म का जायका और बढ़ा देगी....
ये फिल्म उन तमाम मृगनयनियों की कहानी है, जिन्हें इंडियन आईडल बनने की जल्दी में बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है..... और जो चुकाने को तैयार भी हैं...ये आदर्शों को ढोती फिल्म नहीं है....ये आदर्शों को धोती फिल्म है....इस फिल्म को देखना इसीलिए ज़रूरी है क्योंकि देखने में ये फिल्म जैसी बिलकुल भी नहीं...ये हमारे आपके समय का सच है जहां सेक्स एक सीढ़ी की तरह है जिसे इस्तेमाल करना मर्द पहले से जानते थे, औरत अब सीख रही है.

--निखिल आनंद गिरि

Friday, August 14, 2009

मुंह में रखकर घास कहिए देश क्या आज़ाद है !!

आज़ादी की सालगिरह पर हम आपको चंद अलग-अलग अनुभव पेश कर रहे हैं.....हमें ये लेख चार अलग-अलग जगहों से मिले हैं..कहानियां अलग हैं, मगर सवाल वही...आज़ादी के 62 साल बाद का सच क्या सिर्फ वही है जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लालकिले से बयां कर गए.....क्या इन बेआवाज़ लेखों को सुनना ज़रूरी नहीं है....

घास खाए देसवा हमार....


दो-चार जानलेवा दुर्घटनाओं को छोड़ दीजिए तो रोज़ मेट्रो का एक और नया पिलर तैयार हो रहा है....देश तरक्की की राह पर है....राजधानी की रफ्तार दुगुनी-चौगुनी होने को है....राजधानी ही क्यों, उसके आसपास का एनसीआर भी कृतार्थ होगा.....दिल्ली में इतने फ्लाइओवर हैं कि मीलों की दूरी मिनटों में तय होती है.....एफएम पर बैक टू बैक तीन गाने सुनने में कट जाता है रास्ता.....और क्या चाहिए तरक्की के लिए....ये तस्वीरें विकास की परिभाषा गढ़ रही हैं....शहरों के विकास की परिभाषा....गांव आते-आते ये परिभाषाएं बदलने लगती हैं....न कोई मेट्रो, न फ्लाईओवर...न एफएम.....गांवों के नाम बदल दीजिए तक़दीर नहीं बदलती..तस्वीर भी नहीं......
पूर्वी उत्तर प्रदेश का नामी ज़िला चंदौली.....उत्तर प्रदेश में नक्सली आंदोलन की चर्चा हो तो सबसे पहले चंदौली का नाम आता है.....अभी कुछ दिन पहले सिपाही भर्ती के दौरान मची भगदड़ में कई जानें गईं...कई नौजवान मारे गए....पूरा शहर कर्फ्यूग्रस्त हो गया....उपद्रव मचाने वालों ने सारे सरकारी भवन आग के हवाले कर दिए....कोर्ट-कचहरी, पोस्ट-ऑफिस सब कुछ.....प्रशासन ने वहां के स्कूलों में ही कचहरी लगा दी....बड़ा सा स्कूल सिमट कर रह गया....छह कमरों में हज़ारों बच्चों का स्कूल और कई कमरों में पुलिस छावनी......पूरे स्कूल में एक ही शौचालय है.....बच्चियां शौचालय भी जाने से कतराती हैं...वहां अक्सर ख़ाकी के जवानों की भीड़ होती....ख़ैर.....
चंदौली से ही सटा है नौगढ़....नौगढ़ के पास का ही गांव है मझगवां....आदिवासियों की अच्छी-खासी तादाद बसती है यहां....कभी अपने हक़ की लड़ाई में बासमती कोल जैसी चूल्हा-चौका करने वाली महिलाओं ने बंदूक थाम ली थी......उत्तर प्रदेश का नक्सली इतिहास यहीं से शुरू होता है.....यहां पहुंचने के लिए आज भी कच्ची सड़क है....शाम होते-होते लोगों की आवाजाही एकदम बंद हो जाती है.....विकास योजनाओं की आवाजाही तो बरसों से बंद है......नरेगा जैसी योजनाएं यहां पहुची तो थी, मगर सिर्फ कागज़ पर.......मझगवां की कई औरतों के पास जॉब कार्ड है, मगर जॉब किसी के पास नहीं....सूखे का असर देखना हो तो इस गांव का रुख कभी भी किया जा सकता है....दूर-दूर तक खेत पसरे है.....मगर, खेती बिल्कुल नहीं हुई.....खेतों में चकबड़ और चकोड़ घास उगती है....जानवरों के खाने के काम आती है ये घास.....इस बार फसल नहीं हुई तो अनाज हुआ नहीं.....घरों में एकाध किलो चावल बचा है....पूरे सीज़न चलाना है यही चावल....तो, यहां के लोग एक टाइम खाते हैं.....थोड़े चावल में यही घास उबाल कर सानते हैं और खाते हैं....जानवरों का चारा आदमी खा रहे हैं....हर रोज़.....बच्चे भी यही घास खाकर बड़े हो रहे हैं.....पता नहीं कितना बड़े हो पाएंगे.....उनकी मांओं को टीबी हो गया है....बाप गांव के ही किसी कोने में ताश खेल रहे होते हैं......गांव के कोने में एक स्कूल भी है....स्कूल क्या है, एक खंडहर है.....दीवारों की झुर्रियां साफ दिखाई पड़ती हैं....बड़ा सा ताला लटका रहता है वहां पर......स्कूल के कोने में ही लोग ताश खेलते रहते हैं दिन भर....बच्चे कभी बस्ता लेकर जाते भी हैं तो ताश खेलना शुरू कर देते हैं....अच्छा लगता है उन्हें....फिर भूख लगती है तो घर लौट जाते हैं...मां कटोरी में घास सान कर दे देती है....बच्चे खा लेते हैं.....बासमती कोल को पता है इस गांव में सरकारी योजनाओं के नाम पर पांच लाख रुपया आता है....मगर, जाता कहां है, ये कोई नहीं जानता....पांच लाख रुपए में तो कायापलट हो जानी चाहिए थी....कुछ भी नहीं बदल रहा यहां पर.....बासमती अगली पीढ़ी के कंधे पर बंदूक के बजाय बस्ते थमाना चाहती है.....मगर, लटके ताले उसका मुंह भी लटका देते हैं.....ये आज़ादी के 62 साल बाद का सच है.....

--निखिल आनंद गिरि
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मनीष वंदेमातरम हिंदयुग्म के पुराने साथी हैं....उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से उनकी भी चिट्ठी आई है.....लिखते हैं,
बेशक अब हम आज़ाद हैं। और जगहों का तो पता नही पर मेरे गाँव में ये आज़ादी ज़रूर दिखने लगी है। ६३ साल की आज़ादी अब धीरे-धीरे जवां हो रही है। मेरा गाँव गंगा किनारे है, वहाँ लगभग हर साल बाढ़ आती है। बचपन में इन दिनों मां-बाबूजी हमलोगो को नानी के घर भेज देते थे क्योकि सारा गाँव बाढ़ के दिनों में छोटा सा द्वीप बन जाता था। हमारे नज़दीकी कस्बे या मुख्य सड़क तक जाने के लिए एक ही विकल्प था नाव, वो भी एक थी। फिर बाढ़ के बाद संक्रमण और बीमारियां। अब 7-8 सालों से बाढ़ नहीं आती, मेरा गाँव चारों तरफ से सड़क से जुड़ गया है। सड़कों पर चलाने के लिए लोगों के पास महँगी गाड़िया हैं, बिजली है वो भी इतनी कि लोग अब दहेज में फ्रिज और टीवी मागंने लगे हैं।
सूचना क्रातिं ने भी गाँव में खूब पैर पसार लिया है। गाँव मे औसतन हर घर में मोबाइल है, डी टी एच, सेटेलाइट टीवी, एटीएम हैं। मेरे जिले मे हाल ही मे ३ जी सेवा शुरू की गयी है। लोग धीरे धीरे कंप्यूटर के उपयोग से परिचित हो रहे हैं। इंटरनेट का प्रसार बढ़ रहा है। कुछ युवा तो जमकर ब्लागिंग भी कर रहे हैं। ग्लैमर की चकाचौध भी गाँव मे घुस गयी है। अब आप सबके भदन पर फैशनेबल कपड़े और एस्सरीज देख सकते है। बच्चे गजनी कट और लड़कियां सानिया कट नथूनी से अंजान नहीं रहे। गाँव का भोलापन अब सयाना हो गया है।
शिक्षा का प्रसार तेजी से हो रहा है। महँगे महँगे कान्वेंट स्कूलों की बसें गाँव की सड़कों पर दौड़ रही है। गाँव वाले अब बच्चों को स्कूल भेजते समय बाय-बाय कहते है। लड़कियां घंटों साईकिल चलाकर स्कूल जाती हैं।
किसान अब पहले से संपन्न हो रहे हैं। उन्होंने हाइब्रिड बीजों का उपयोग सीख लिया है, और आधुनिक कृषि अभियांत्रिकी के लाभ भी समझ गये हैं। बाज़ार तक उनकी पहुंच आसान हो गयी है। प्रेमचंद अगर अब होते तो उन्हें होरी जैसा पात्र रचने में खासी मुश्किल होती।
गाँव अब बदल गया है। पर हम इस बदलाव की कीमत भी चुका रहे हैं। पहले गाँव के बारे में एक प्रसिद्ध कहावत थी कि गाँव में एक ही चूल्हे से सारे गाँव का चूल्हा जलता है। पर अब ऐसी बात नहीं रही। अब सबको अपने चूल्हे की ही पड़ी रहती है। पहले तीन चार पीढ़ियों तक एक ही घर के लोग प्रधान हुआ करते थे.... अब चुनाव होता है तो गाँव में अच्छे और सस्ते शार्पशूटर मिल जाते हैं
मुझे रंग दे बसंती का एक डायलाग याद आता है.....कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है।
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गरीब आदिवासियों के लिए लड़ रही एक जाबांज और दिलेर साथी हैं शमीम मोदी... मध्य प्रदेश में काम कर रहे सगंठन श्रमिक आदिवासिक संगठन के माध्यम से लगातार कई वर्षो से अपने को खपा चुकी शमीम को जान से मरने की धमकी कई बार दी जा चुकी है, क्योकि उनका संघर्ष उन चंद लोगो के काम और रोजगार के रास्तों में रूकावटें पैदा करता रहता है. तमाम परेशानियों के बाद भी शमीम का संघर्ष जारी है....इधर शमीम पर पिछली २३ जुलाई को एक जानलेवा हमला हुआ और वो जिन्दगी और मौत की कश्मकश में घिर गयी.... पर, खुदा का शुक्र है कि अब वो खतरे से बाहर हैं. पर सबसे चौंकाने वाली भूमिका मीडिया की रही, आम लोगो की लडाई को अपना बनाने वाली
इस जाबांज साथी को किसी अख़बार के दो पन्ने भी नसीब नहीं हुए. कुछेक को छोड़कर आखिर हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं, पड़ताल जरुरी है
(ये चिट्ठी टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई से छात्र नवीन दामले ने भेजी है)
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आज़ादी आजकल : तीन तस्वीरें

सीन 1
तारीख 12 अगस्त.... ऑफिस से निकलने की आपा-धापी थी... बाहर बहुत तेज़ धूप थी, लेकिन हड़बड़ाहट में गर्मी को कोई फिक्र ही नहीं थी। शाम 4.40 का शो था... फिल्म थी लव आजकल... मंदी के इस दौर में एक दोस्त ने फिल्म दिखाने का ऑफ़र किया था, इसलिए दिल्ली के लंबे जाम से जूझते हुए लक्ष्मीनगर के वी-3एस पहुचने की आपाधापी मची थी। सिनेमा पहुंचकर फटाफट टिकट लिया, और घुस गये हॉल में... लेकिन ये क्या... पूरा हॉल खाली पड़ा था...हमें लगा कि शायद हम गलत हॉल में आ गये... लेकिन थोड़ी देर में कुछ और लोगों ने भी एंट्री की... हॉल में सीट पर हम दोनों दोस्त लंबे पसर गये। थकावट बहुत ज्यादा थी और फिल्म शुरु होने में भी अभी दस मिनट का वक्त था... धीरे-धीरे लोग हॉल में आ रहे थे। बड़े परदे पर बोरिंड एड चल रहे थे, लेकिन मुझे थकावट की वजह से हल्की सी झपकी आ रही थी.. ऐसे वक्त में घड़ी भी शायद रुक-रुककर चलती है... लव आजकल का इंतज़ार और लंबा होता जा रहा था... मैंने फोन स्विच ऑफ़ किया.. दोस्त को बोला कि फिल्म शुरु हो जाए, तो जगा देना.. वैसे भी हॉल में तब तक तीस-चालीस लोग ही पहुंचे होंगे... अचानक ऐसा लगा जैसे जिस्म के रोंगटे खड़े हो गये... कानों में जो आवाज़ सुनाई पड़ी, उसने मन को झकझोर कर रख दिया... जन-गण-मन की मधुर आवाज़ सुनाई पड़ते ही पूरा हॉल एक साथ खड़ा हो गया... 52 सेकेंड के एक छोटे से लम्हें में ऐसा लगा जैसे सारी दुनिया सिमट आई हो। आंखो के सामने एक उभरता हुआ हिंदुस्तान था.. पंजाब-सिंधु-गुजरात मराठा से लेकर अखंड हिंदुस्तान आंखों के सामने नाच रहा था.. दिल जोश से भर उठा... खून रगों में और भी तेज़ी के साथ दौड़ने लगा। एक बार को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि मैं सिनेमाहाल में हूं.. ऐसा लगा, जैसे लालकिले की प्राचीर से सारा मुल्क एक आवाज़ में पुकार रहा है, जन गण मन अधिनायक जय है...


अब ज़रा दूसरी तस्वीर देखिए...

तारीख 13 अगस्त... राजधानी दिल्ली की सड़कों पर बच्चे पंद्रह अगस्त की ड्रेस में सजे-धजे नज़र आ रहे है... इस बार 14 अगस्त को जन्माष्टमी है, इसलिए स्कूलों ने दो दिन पहले ही पंद्रह अगस्त मना ली... ये उस राजधानी में होता है, जहां लालकिले की प्राचीर से सारे हिंदुस्तान को आज़ाद होने का एहसास कराया जाता है... लेकिन यहां के बच्चे इतने खुशनसीब कहां, जो पंद्रह अगस्त को ही अपने मुल्क में आज़ादी की सांस ले सकें। लेकिन ये बात आज तक समझ से परे है, कि दिल्ली के स्कूलों में पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी वक्त से पहले ही क्यों मना ली जाती है.. शायद ऐसा नेताजी की सुरक्षा के लिहाज़ से किया जाता होगा... लालकिले तक जाने वाले तमाम रास्ते बंद कर दिये जाते हैं... जिसको जाना है, वो पैदल जाओ... वरना आज़ादी के दिन पिकनिक मनाओ... नेताओं की हिफाज़त के लिए बच्चों से उनके एहसास छीन लिये जाते हैं। वो एक दिन पहले ही अपने मुल्क में पाकिस्तान की आज़ादी का जश्न मनाते हैं... सब जानते हैं कि पाकिस्तान हमसे एक दिन पहले ही 14 अगस्त को आज़ाद हुआ था।

आखिरी तस्वीर

14 अगस्त की सुबह.. दिल्ली में हल्की बारिश हो रही थी... सड़कें भीगी हुई थीं... घर से दफ्तर तक कम से कम पांच रेडलाइट पड़ती है... गाज़ीपुर पर लालबत्ती होती है... गाड़ियां ठहर जाती हैं.. आजकल इस साइट पर ओवरब्रिज बनने का काम चल रहा है.. लालबत्ती भी दस मिनट से कम नहीं होती... अचानक कुछ बच्चे जिनके जिस्म पर कपड़े भी ढंग से नहीं थे.. झंडे बेच रहे थे.. एक बच्चा मेरे पास आता है... भईया.. ले लो न... एक ले..लो.. पांच रुपये का है... उसकी आंखो में बेचने की बेकरारी थी.. उसे देखते ही दूसरे बच्चों ने भी मुझे घेर लिया... हर कोई कह रहा था.. भईया एक ले.. लो न.. कल पंद्रह अगस्त है... मुझे बड़ा गर्व हुआ ये जानकर.. कि अरे इन छोटे बच्चों को भी पता है.. कि कल पंद्रह अगस्त है... मैंने झट से दस रुपये निकाले.. और दो झंडे खरीद लिये.. एक बाइक पर लगाया और एक घर में लगाने के लिए रख लिया... तभी ग्रीन लाइट हो जाती है... मैंने भी गाड़ी स्टार्ट की.. और दफ्तर को चल दिया... अगली रेडलाइट यूपी बाईपास पर होती है... इस बार भी तिरंगे दिख रहे थे... लेकिन वो तिरंगे पैरों तले रौंदे जा रहे थे.. और गाड़ियां फुर्र से उनके ऊपर से निकल रही थीं...

(ये लेख अबयज़ खान ने भेजा है. इस लेख की तस्वीर मंजू गुप्ता जी ने मुंबई से भेजी है...)

(आज़ादी पर आप भी अपने विचारों के साथ शरीक हो सकते हैं....)

Monday, July 20, 2009

मदरसों में कुरान के साथ कंप्यूटर भी ज़रूरी है

मुसलमानों पर बहस ज़रूरी है...



किसी भी मुद्दे पर होने वाले सम्मलेन समस्याओं का निदान तो नहीं कर सकते लेकिन लोगों में जागरूकता लाने का काम ज़रूर कर सकते हैं, इसीलिए ज़रूरी है कि बतौर वक्ता हिस्सा ले रहे विद्वान समस्याओं पर फोकस करें ना कि खोखली भाषणबाज़ी...बरेली सम्मलेन हालांकि समस्याओं पर ही केन्द्रित था....बतौर वक्ता पहुंचे पत्रकार निखिल आनंद गिरि ने जिस तरह लीडरशिप को आईना दिखाया वो काबिले तारीफ़ था उनके मुताबिक एक कोशिश ऐसी हो जैसी कभी सर सैय्यद अहमद खान ने की थी जहाँ कुछ देने का जज्बा था, जहाँ सिर्फ सेवा भाव था... निखिल ने बताया कि आप खाली नकारात्मक भाव न रखें... आप जामिया को ख़याल में रखें, आप अलीगढ को ध्यान में लायें.... उन्होंने मुसलमानों से हौसला रखने की अपील की जो आज वाकई ज़रूरी है....हिंदयुग्म के प्रयासों के बारे में बताते हुए निखिल ने ज़ोर देकर कहा अब वक्त आ गया है कि मदरसों में कुरान के साथ कंप्यूटर अनिवार्य कर देना चाहिए....हिंदयुग्म इस वहीं दूसरे पत्रकार रशीद अली ने बताया की कभी मुस्लिम ताकतें अपने इक्तिदार(पद की लालसा) के लिए दूसरो से लड़ती थीं... उनका मतलब गलत नहीं था लेकिन मेरी एक गुजारिश है कि वो पहले मुस्लिम की पहचान ठीक से कर लें वर्ना यही भ्रम की स्थिति रहेगी.... मैं यहाँ बताना चाहता हूँ कि मुसलमानों के नबी मुहम्मद साहब (स०,अo) ने वर्चस्व की कोई जंग नहीं की...
अब बात उनके घराने की आती है जहाँ इसलाम की हिफाज़त हो रही थी तो इतिहास गवाह है की सुल्हे हसनी (इस्लामी तारीख की एक मशहूर सुलह) इसलिए हुई कि तख्तो-ताज की ज़रुरत बनी हाशिम(मोहम्मद साहब के वंशज) को नहीं थी... इसके बाद कर्बला में मुस्लिम ताकतों पर क्या गुज़री उससे तो सब ही वाकिफ हैं.... ये ताक़त का मुज़ाहिरा था या अपनी कुर्बानी.... इस्लाम मारना नहीं सिखाता, हाँ अपनी कुर्बानी दे देने का नाम ही इस्लाम है.. अब रशीद साहब आप किन मुसलमान ताकतों की बात कर रहे थे नहीं मालूम.... इसके अलावा भी एक बात सम्मलेन में उठी कि उर्दू ज़बान को बचाना है... मैं पूछना चाहता हूँ कि उर्दू पर कौन सा हमला हो रहा है... उर्दू की पैरवी करने वालों को शायद नहीं पता कि उत्तर प्रदेश के हर दफ्तर में उर्दू अनुवादक उर्दू दरख्वास्तों के अभाव में मक्खी मार रहे हैं या दूसरे काम कर रहे हैं....... ये गलती किसकी है....... दूसरी तरफ देश के मीडिया संस्थान उर्दू ज़बान को फरोग(बढ़ावा) दे रहे हैं.....फिल्म उद्योग ने उर्दू को हमेशा फरोग दिया ऐसे में आप की बेचैनी समझ के बाहर है

बरेली सम्मलेन मुसलमानों की समस्याओं से रू-ब-रू कराने वाली एक बेहतरीन पहल थी.... काबिले तारीफ़ हैं वह लोग जिन्होंने यह साहसी पहल की और एक समुदाय को सच्ची तस्वीर दिखाई... समस्याओं के आंकलन में वक्ताओं ने जो नज़रिए पेश किये वह बरेली शहर की दीवारों में ज्यादा दिन क़ैद नहीं रहेंगे.. एक नयी सुबह आने वाली है बशर्ते आपको इन्तिखाब का इरफान (चुनने का सलीका) हो.... हर मुसलमान अपने हक की मांग अपने मुंह से करना सीखे... घरों से निकलिये... मुख्य-धारा का बहाव बहुत ही सुखदाई है और इस एहसास के साथ कि अगर आप समाधान का हिस्सा नहीं हैं तो आप ही समस्या हैं.......

हाशम अब्बास नक़वी 'बज़्मी'
(बरेली सम्मेलन हिंदयुग्म के लिए एक अलग तरह का अनुभव था....मुसलमानों की समस्याओं पर बहस जारी रहेगी....पाठक इस विषय पर अपने विचार भी भेज सकते हैं...फिलहाल, हाशम के लेख की ये आखिरी कड़ी थी)

Wednesday, March 11, 2009

आज की ताज़ा खबर

1) हमारे शैलेश जी एक फिल्म (चला मुरारी हीरो बनने ) देखकर वापस आ रहे थे,चूँकि उनकी शर्ट सुर्ख लाल रंग की थी अतः एक सांड़ ने उन्हें उठा कर पटक दिया और उनकी हड्डियों का चुरमा बन गया है। और इसलिए वो हिन्द-युग्म का कोई भी काम कर पाने मे आजकल असमर्थ हैं।

2)"ओरिसा में बाढ़ का कहर"- प्रशासन अत्यंत परेशान है, कारण है की तपन शर्मा हमारे हिन्द-युगम के कर्मठ सहयोगी आजकल ओरिसा में हैं, घर की याद में इतना रो रहे हैं कि समस्त ओरिसा बाढ़ की चपेट में है, हालत बेकाबू देखकर, वहाँ के मुख्यमंत्री ने उनकी फर्म से अपील की है कि उन्हें तत्काल वापस बुलाया जाए, जिससे ओरिसा के हालत को कुछ काबू किया जा सके।

3) आचार्य जी की मल्लिका शेरावत के साथ एक संक्षिप्त मुलाकात- आचार्य जी ने उन्हें जीवन दर्शन के बारे में समझाया किंतु जब मल्लिका जी ने अपने जीवन दर्शन के बारे में बताना चाहा तो, संजीव जी सर पर पैर रखते भागते हुए नज़र आए।

4) राघव जी अपनी मोटर साइकल से अंतरिक्ष की सफल उड़ान के लिए एक प्रयोग कर रहे हैं इन दिनों, पिछली सीट के लिए कोई अंतरिक्ष यात्री की तलाश में हैं। रंजना जी, रूपम जी, शोभा जी, पूजा जी, शन्नो जी, सीमा जी व नीलम जी ने उनकी अपील को ठुकरा दी है, अब वो बुझे मान से अपनी पत्नी को मनाने में लगे हुए हैं। ईश्वर उनकी यात्रा शुभ करे!

5) अरूण जी और मनु जी ने खुदकुशी करने की कोशिश की, मोके पर पुलिस ने पहुँच कर पड़ताल की और नीलम जी को सख़्त हिदायत दी की चाहे वो प्रतियोगिता में भाग लें या न लें, उन्हें सर्वश्रेष्ट प्रतिभागी ही घोषित करेंगी, इसका नीलम जी ने पूरा-पूरा आस्वसान दिया है।

6) सजीव जी, आजकल बेहद परेशान हैं, उनके आवाज़ के साथियों के गालो मे मेंढक घुस गये हैं और वो सब सिर्फ़ टर्र-टर्र कर रहे हैं। इस कारण से मार्च की कविता पाठ में विलंब हो रहा है क्योंकि कविता पाठ करने वाले सभी लोग सिर्फ़ टर्र-टर्र कर रहे हैं। उम्मीद है कि सजीव जल्दी ही इस समस्या से अपने आप को उबार लेंगे।

7) समस्त प्रवासी हिंद-युग्मी नाराज़ हो गये हैं, क्योंकि हिंद-युग्म ने उन्हें गुलाल और गुझिया का पार्सल अभी तक नहीं पहुँचाया है। इसलिए सभी लोग हिन्दुस्तान आकर होली मनाने का मन बना चुके हैं, अभी अभी खबर मिली है कि कुछ लोग वहाँ से चल भी चुके हैं।





बुरा न मानो होली है, होली का हुड़दंग आप सभी को उल्लासित करे इसी ख्वाहिश के साथ-

नीलम मिश्रा व निखिल आनंद गिरि

Wednesday, February 11, 2009

हमारे आधुनिक जंगल मुंबई में आपका "हार्दिक" स्वागत है....

डिस्कवरी चैनल पर बेहद चर्चित कार्यक्रम है “MAN Vs WILD”….बियर ग्रिल्स इस शो को प्रस्तुत करते हैं....बियर इस शो में कई हैरतअंगेज़ कारनामे करते हैं......चैनल के हर एपिसोड में वो कभी बीहड़ जंगल में, किसी टापू पर, उजा़ड़ रेगिस्तान, पहाड़ों, समंदर या किसी भी ऐसी ही सुनसान जगह पर पाये जाते हैं....और फिर, उस पूरे एपिसोड के दौरान वो ऐसी कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की अजीब तरक़ीब दिखाते हैं.....कभी किसी जंतु का कच्चा मांस खाते हैं तो कभी मल-मूत्र तक ही पी जाते हैं..फिर बताते भी हैं कि इन पदार्थों में कई तरह के प्रोटीन व पोषक तत्व पाये जाते हैं जो बहुत ही लाभप्रद हैं.....अब जबकि जंगल, पहाड़, रेगिस्तान आदि घटते जा रहे हैं (ये भी मंदी का असर कहा जा सकता है) तो बियर भाई के पास भी ऐसे बीहड़ प्रदेशों के लाले पड़ जायेंगे.....तो हार्दिक मेहता ने सोचा कि डिस्कवरी का थोड़ा भला किया जाए और उन्हें इस शो को जारी रखने के नये तरीके सुझाए जाए....बियर भाई को मिली ये मुफ्त की सलाह बैठक पर हाज़िर है....

प्रिय बियर,
अगर आपको लगता है कि सुनसान रेगिस्तान और बीहड़ जंगल सिर्फ़ प्रकृति की गोद में ही उपलब्ध हैं, तो दोबारा सोचिए....हम भी एक जंगल में रहते हैं जिसका नाम है मुंबई.....यहां हर तरह की प्रजातियां उपलब्ध हैं....अगर आप यहां अकेले छोड़ दिये गये तो मैं शर्तिया कहता हूं कि कई एपिसोड तक आप मुंबई छोड़ नहीं पायेंगे....न शारीरिक तौर पर और न दिमाग़ी तौर पर....दरअसल, ये शहर आपसे कभी बाहर नहीं आ पायेगा.....आप जैसे विदेशी भाई इसे मायाजाल कहते हैं...हम अंग्रेज़ी सीखकर इसे “मैट्रिक्स” कहते हैं....ख़ैर, मुद्दे से भटक रहा हूं....मैं आपको दस चुनौती भरी परिस्थितियां देता हूं, आप कैसे इनसे निबटते हैं, आपका सिरदर्द है....लेकिन, इतना ज़रूर है कि अगर ये दस उलझनें आपने दूर कर दीं तो समझिए ये मुंबई की मिडिल क्लास के लिए वरदान साबित होगा....ये भी बता दूं कि हमारी मिडिल क्लास इतनी बड़ी है कि आप जिस शहर में रहते हैं, वैसे कई शहर इनके लिए कम पड़ जायेंगे.....तो, दस करोड़ (लोगों) के लिए ये रहे दस सवाल....आपका समय शुरू होता है अब.....

1) मान लें कि आप उत्तरी मुंबई में रहते हैं.... अगर आप ठीक 6 बजे सुबह नहीं उठते हैं तो मुंबई के दक्षिणी कोने में ठीक 9:30 बजे अपने ऑफिस कैसे पहुंच पायेंगे ???.....(नहले पे दहला : 6:10 मिनट पर भी उठकर ये सोचना आपकी सबसे बड़ी भूल होगी..)
2) अगर आज संडे नहीं है तो चर्चगेट की एक फास्ट लोकल ट्रेन में सुबह के आठ से 11 बजे और शाम पौने सात से साढे दस के बीच औप कैसे घुसेंगे?? (सोचिए, सोचिए..... ट्रेन पर छत तो तो है मगर ये ट्रेन बिहार नहीं जाती !!!.....)
3) सड़क के दोनों तरफ़ वन-वे ट्रैफ़िक है.....दिन के चौबीसों घंटे में कभी भी चकाला पेट्रोल पंप से आप ट्रैफिक से बच कर कैसे निकल सकते हैं.....?? (आप चाहें तो अपनी लोकेशन 7 बंग्ले से अंधेरी जाने वाले रास्ते को भी चुन सकते हैं...)
4) मान लें कि मुंबई के किसी भी स्थान पर आप पहुंचे हैं और किसी मुंबई वाले से बात कर रहे हैं या किसी दीवार से सटकर खड़े हैं.........लाख चाहकर भी उस “चमत्कारी पीक/थूक” से बचकर दिखाएं जो उनके मुंह से स्वाभाविक निकलती है या फिर दीवारों पर पायी जाती है.....
5) बियर भाई, ये बताएं कि मुंबई में कहीं भी किसी डर्टी इंडियन की कमीज़ से आ रही निरंतर दुर्गंध से बचने का कोई उपाय है आपके पास ?? (चाहें आप दो सेकेंड के लिए ही क्यों न खड़े हो जायें....)
6) अगर मुंबई के ऑटोचालक हड़ताल पर हों तो घर से बाहर कैसे निकल पायेंगे...(बताइए, बताइए...)
7) मान लें कि आप हिंदी सीख जाते हैं या फ़िर मराठी.....फिर, एक अधेड़ उम्र के मराठी से हिंदी में बात कर के देख लें, फिर बताएं कि “सेना” की कार्रवाई से कैसे बच पायेंगे....
8) हफ्ते के किसी भी दिन मुंबई में छुट्टियां मनाने के लिए एक “एकांत” स्थल ढूंढकर दिखा दीजिए ?? (आप मुंबई के आस-पास की 100 मील तक मगजमारी कर सकते हैं...)
9) मंदी के इस दौर में एक नौकरी ढूंढ कर दिखाएं.....(डिस्कवरी चैनल में सैलेरी तो टाइम से मिल रही है ना.....)
10) आप अलग-अलग जगहों पर घूमते हैं, बिल्कुल अकेले......ज़रा मुंबई के किसी इलाके में, खासकर किसी ऐसे रेलवे स्टेशन पर जाकर दिखाएं जहां कोई लावारिस लाश न पड़ी हो.....

बियर भाई....ये स्लमडॉग के फिल्मी सवाल नहीं है...ये हमारा सबसे आधुनिक जंगल है.....अद्भुत, अद्वितीय....आपका स्वागत है यहां....यहां हर किसी के लिए जगह है, कभी भी, कहीं भी.......

हार्दिक मेहता

हिंदी में अनुवाद : निखिल आनंद गिरि

Thursday, January 22, 2009

कृपया ये अश्लील कविताएं न पढ़ी जाएं....

आकाशवाणी से मोह लगभग 10 साल पुराना है....जमशेदपुर में था जब पहली दफा युववाणी कार्यक्रम के ज़रिये अपनी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी....देश के हर शहर में युववाणी ही है, जिसकी कृपा से युवा लोग अपनी आवाज़ पर खुश हुआ करते हैं...माने, युववाणी मुझ जैसे हज़ारों मुंगेरीलालों के हसीन सपने की तरह हुआ करता है...
बहरहाल, युववाणी से आगे आवाज़ का सफ़र बहुत आगे बढ़ चुका है मगर दिल्ली में जब भी मौका मिलता है, युववाणी के कार्यक्रमों में शिरकत ज़रूर करता हूं.....आज भी जब युववाणी से गणतंत्र दिवस पर आयोजित काव्य गोष्ठी में अपनी कविता पढने का निमंत्रण मिला तो खुशी-खुशी गया....
स्टूडियो में बैठना बहुत पुराना अनुभव है, मगर बतौर कवि कम ही मौके मिले हैं.....रिकॉर्डिंग रूम के सामने हमारा ऑडियो लेवल वगैरह सेट करने बैठी थीं युवववाणी की प्रोग्राम अधिकारी रंगोली श्रीवास्तव.....दिल्ली में युववाणी से परिचित हर कोई इस नाम से परिचित ज़रूर होगा....रिकॉर्डिंग रूम में तीन युवा कवि बैठे थे...पंडित प्रेम बरेलवी, जितेंद्र प्रीतम और मैं...संचालक प्रेम ने जितेंद्र को अपनी कविता पढ़ने को कहा तो जितेंद्र मंचीय कवि की तरह आलाप भरकर कुछ गाने लगे....कविता में एक आशावादी पंक्ति ऐसी थी जिसमें कोई हिंदू नाम कुरान पढे और मुसलमान पात्र गीता तो अमन फैले....बस, इतना पढ़ते ही रिकॉर्डिंग रोक दी गयी...रंगोली जी को लगा कि यहां जो भी पढ़ा जा रहा है, वो भावनाओं को भड़का देगा....उनके चेहरे पर चिंताएं तो थीं, मगर वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी....उन्होंने कहा कि मुझसे ग़लती हो गयी कि मैंने सभी कवियों की कविताएं पहले से पढ़ी नहीं....
फिर, जो कविताएं मुझे पढनी थीं, वो भी उन्हें पेश की गयीं...उस कागज़ पर भी रंगोली जी ने कलम चला दी थी....कुछ पंक्तियों को उनकी कलम ने काट खाया था....

एक देश जहां शौचालयों से वाचनालयों तक,
व्यर्थ ही होती दिखी है ऊर्जा....

(पूरी कविता यहां है- ....एक ख़ास पल)
मतलब, मुझे कविताएं पढनी थीं, मगर उन पंक्तियों के बग़ैर....मैंने हंसते हुए कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि ये पंक्तियां अच्छी हैं, मगर "अश्लील" हैं...शौचालय जैसा शब्द कविता में आना ही नहीं चाहिए....इसे ग़लत संदेश जायेगा...उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर कविता पढने आये हैं तो कुछ देशभक्ति की रचनाएं पढिए, क्यूं ये सब पढ रहे हैं....
मेरे पास दो और कविताएं थीं जिनपर रंगोली जी ने अपनी कलम चलायी थी...ये हैं वो पंक्तियां..आप भी ये अश्लील पंक्तियां पढें....(पूरी कविता यहां पढ सकते हैं..."हम ख़बर हैं,बाक़ी सारा भ्रम है")

मुझको तो हर एक क़दम पर डर लगता है,
कहां-कहां तक तुमको मैं बतलाऊं पापा...
चार दवाओं की पुर्जी भर लिख देने के,
डॉक्टर पूरे दिन की कमाई ले लेता है,
धरती के भगवान अगर ऐसे होते हैं,
वो भगवान नहीं दिखता है, मुझे सुकूं है....

(अथ रंगोली उवाच- आप डॉक्टर जैसे महान पेशे के बारे में ऐसा कैसे लिख सकते हैं...लोग सुनेंगे तो बुरा असर पड़ेगा...आप अपने अनुभव के बल पर सबको बुरा नहीं कह सकते...)....

डर लगता है दूध के पैकेट में ना जाने,
बनिए ने कोई जादू-वादू घोल रखा है,
ताकि अगली बार उसी दुकान पे आऊं,
ना आया तो “पेट बिगड़ जाए ससुरे का”

(अथ रंगोली उवाच- बनिया एक जातिसूचक शब्द है, इसका प्रयोग अश्लील लग रहा है..... इसके बदले दूधिये वगैरह जैसा शब्द इस्तेमाल किया सकता है....वैसे पंक्ति ही हटी दी जाये, तो बेहतर)

एक और कविता थी, मॉल पर....उसकी अश्लील पंक्तियां ये रहीं-
(पूरी कविता यहां है- "मॉल है या कि अजायबघर है")

रोज़ परफ्यूम छिड़ककर किसी अजीज़ के साथ,
लोग पहुचते हैं उस बियाबां तक...


ख़ैर, जैसे-तैसे वहां से लौटा और मुझे लगा कि गणतंत्र दिवस पर ये ज़रूरी है कि हम बैठक में इस पर गहनता से सोचें कि आखिर देश के अनगिनत लोगों तक पहुंचने वाला सरकारी भोंपू आकाशवाणी कब अपनी परिभाषाएं बदलेगा....हो सकता है, आकाशवाणी में ऐसी दायित्व भरी कुर्सी पर बैठने वाला हर अधिकारी रंगोली जी जैसा आलोचक व काव्य प्रेमी न हो, मगर सरकारी महकमे में ऐसे किस्से आज से 60 साल बाद भी मिलेंगे, ये मुझे पूरा विश्वास हो गया....आदरणीय रंगोली जी, ठीक है कि बेहद ऊंची कुर्सी पर आसीन हैं, मगर विनम्र निवेदन है कि हम स्लमडॉगनुमा कवियों को अश्लील रचनाएं पढने दी जाएं, कैंची चलाने का काम उन्हीं को करने दीजिए, जो इसकी काबिलियत रखता हो....जय हो....

ग़ालिब का एक शेर भी याद आ रहा है, कहता चलूं-
न सताइश की तमन्ना, न सिले की परवाह,
ग़र नहीं हैं मेरे अशआर में मानी, न सही....


निखिल आनंद गिरि

Wednesday, January 07, 2009

तुलसी और राम के बीच कई आडवाणी आ गये हैं : निदा फ़ाज़ली

अपनी नज़्म पर पाठकों की प्रतिक्रियाओं को पढ़ते
नाज़िम नक़वी के घर दूसरी दफ़ा गया था...सच कहूँ, उनके यहां जाने का मन ही नहीं करता....किराये के कमरे में रहने की ऐसी आदत है कि कोई भी घर जहाँ सब कुछ करीने से रखा हो, काटने को दौड़ता है....मगर जाना हमारी मजबूरी भी थी और ज़रूरत भी.....नाज़िम जी से थोड़ी-देर की गपशप के बाद हमारे बैठकखाने के ठीक सामने का दरवाज़ा खुला और निदा फाज़ली नींद से जागकर बाहर आये....हमें पहले ही हिदायत मिल चुकी थी कि उन्हें थोड़ी ही देर में मुंबई के लिए निकलना है तो आधे घंटे से ज़्यादा वक़्त नहीं मिलेगा...

उजले कुरते में निदा थोड़ा थके-से लग रहे थे...मेरे पास निदा से पूछने को हिंद-युग्म के पाठकों के कई सवाल थे....मुझे लगा, नींद से अभी-अभी जागे हैं....शायद ज़्यादा बात न करें...ख़ैर, नाज़िम जी ने शैलेश और हमारा परिचय उनसे करवाया और हिंद-युग्म के बारे में भी बताया...निदा का रिएक्शन वैसा ही था, जैसे किसी नींद से अभी-अभी उठे बच्चे को आप पढ़ने के लिए कह दें......फिर, उन्हें हमने हिंद-युग्म पर छपी उनकी हालिया नज़्म दिखाई और ये भी कि ढेरों पाठकों ने उनकी रचना पर तफ़्सील से टिप्पणी भी की है, तो वे बड़े ध्यान से सब टिप्पणियां पढने लगे...
निखिल, शैलेश और निदा फ़ाज़ली

चाय की चुस्की ने जब उन्हें थोड़ी राहत दी तो हमने अपना रिकॉर्डर उनके सामने कर दिया और अपने आधे घंटे को भुनाने में लग गये....सवालों की पूरी लिस्ट हम लेकर आये थे और ये भी डर था कि कहीं उन्हें ऊब न होने लगे.....मग़र, निदा जब बोलने पर आये तो न हमें आधे घंटे का होश रहा तो न उन्हें अपनी फ्लाइट का.....
पूरी बातचीत में एक बात उन्होंने बार-बार कही कि एक बार कागज़ पर रचना उतर आयी तो फिर वो पाठक की हो गयी...लेखक का उस पर अधिकार खत्म....कई सारे मुद्दों पर बातचीत हुई....उनकी आत्मकथा पर, उनके लेखन पर, देश-दुनिया पर और न जाने क्या-क्या....

पाठकों के सवालों का जवाब देते निदा
एक सवाल के जवाब में निदा ने कहा कि हिंदी और उर्दू को लिपि के आधार पर अंग्रेज़ों ने बांट दिया और हम भी उधार में मिली वही आधी-अधूरी विरासत ढोए चले जा रहे हैं....उन्होंने कहा कि सियासत और साहित्य के लिए धर्म के मायने अलग-अलग हैं....गोसाईं तुलसीदास ने जब रामायण रचा, तो उनके और राम के दरम्यान बस एक आस्था ही थी.....अब, तुलसी और राम के बीच कई आडवाणी आ गये है.... उन्होंने कहा कि सियासतदानों ने राम को मानस के दोहों से “हाईजैक” कर लिया है और रथयात्राओं में ले आये हैं....

उन्होंने कहा कि निदा के भीतर का शायर मुंबई की चकाचौंध में भी अपनी मिट्टी, अपने पेड़ और अपनी पगडंडी को भी जीता रहा है....वो आम आदमी का शायर है....उसने वही शब्द रचे जो आम ज़िंदगी में सबने जिये हैं....
फिल्मों में लिखे जा रहे गीतों पर निदा ने कहा कि उन्हें फिल्मों के लिए लिखने से ज़्यादा स्वतंत्र होकर लिखने में मज़ा आता है.....फिल्म में लिखना सिर्फ आपकी मर्ज़ी पर नहीं होता....आपको औरों की “डिमांड” पर शब्दों की कांट-छांट करनी पड़ती है, जो किसी भी रचनाकार को नहीं सुहाता....

निदा फ़ाज़ली
उन्होंने कहा कि धर्म का, बिज़नेस का, समाज का अपना-अपना गणित होता है...मगर, कवि का गणित इससे बिल्कुल अलग होता है....इस गणित को सीखने पर ही दो और दो का जोड़ पांच होने लगता है....यही दर्शन है, जो माँ या चाँद से दूरी को नज़रों का धोखा मानता है....अनुभव के कई पायदान चढ़ चुका एक शख़्स मुझ नौसिखिए को एक नया गणित सिखा रहा था...ऐसा भी नहीं कि इस गणित से मैं वाकिफ़ नहीं मग़र जिसने उम्र की सारी पूंजी इसी गणित को समझने-समझाने में लुटा दी, उससे रूबरू होकर जीवन के गणित का ये पाठ मुझे आने वाले कई बरसों तक याद रहेगा....

दसवीं में पढ़ता था जब एक आशुभाषण प्रतियोगिता (मतलब दिये गये विषय पर बिना सोचने का वक़्त मिले बोलना) में मुझे बोलना था…शीर्षक था “मेरी माँ”...मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहा जाये....तभी मेरे टीचर जल्दी से आए और दो-चार लाइनें कागज़ पर थमाकर चले गये...खोल कर पढ़ा तो लिखा था-

"बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी मां,
याद आती है चौका-बासन, चिमटा-फुँकनी जैसी मां"

ख़ैर, प्रतियोगिता खत्म हुई, मैं जीत भी गया....वो शेर दिमाग पर चढ़ गया...पता चला कि बहुत बड़े शायर निदा फ़ाज़ली का शेर है...मैंने सोचा कि ये जो भी हैं, मेरे सामने होते तो मैं उन्हें चूम ही लेता....निदा जब सामने थे तो दिमाग में स्कूल के दिन घूमने लगे.... आज भी माँ पर जितना लिखा गया है, मुझे चिमटा-फुँकनी वाली मां से बेहतर कुछ नहीं लगता.....आज जब कवि सम्मेलनों और मुशायरों में कवियों और शायरों की जगह चुटकुला सुनाने वालों ने लेनी शुरू कर दी है, निदा जैसे शायरों का मंच पर होना अब भी कविता की वाचिक परंपरा की आखिरी धरोहर जैसा लगता है...
निदा को ध्यान से सुनते हिन्द-युग्म के शैलेश, निखिल और प्रेमचंद सहजवाला

सच कहूं तो निदा ने हमें ज्यादा बोलने का मौका ही नहीं दिया...उनके पास बोलने को बहुत कुछ था....कोई जब शिद्दत से बोले तो सुनने का भी खूब मन करता है....मैं भी बड़ी इमानदारी से उन्हें सुनता रहा ताकि उनका प्रवाह न टूटे....वो बोलते भी बहुत खनक के साथ हैं....आवाज़ का भारीपन बात में और वज़न डाल रहा था...इतने क़रीब से सुनने का मौका फिर न जाने कब मिले....आपके लिए उनकी आवाज़ भी कैद कर के लाये हैं...शैलेश तकनीकी रूप से उस रिकॉर्डिंग को दुरुस्त कर आप सबको भी सुनाएंगे...जब आप सुनेंगे तो आपको अहसास होगा कि जब एक शायर नींद से जगकर थोड़ी-बहुत उबासी और थकान में भी बोलता है तो भी कितना “ओरिजिनल” बोलता है.....एक बात और, जहां-जहां वो ख़ामोश हुए, वहां-वहां भी उन्हें सुनता रहा क्योंकि आवाज़ उनके चेहरे का परदा है, ऐसा निदा कहते रहे हैं....

---निखिल आनंद गिरि

Tuesday, December 30, 2008

दिल्ली की दोपहर में चार घंटे हिंदी के नाम....

हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८ के अतिथिगण


डर की सुबह
नोएडा से जब हम अपने कंधे पर हिंद-युग्म का झोला लादे रूममेट नसीम के साथ 11 बजे बस में आईटीओ के लिए बैठे तो मन में कुलबुलाहट शुरू हो गयी थी…कई सारे डर थे...एक तो दिल्ली की सर्दी, साल का आखिरी इतवार और वो भी हिंदी का कोई कार्यक्रम....कितने लोग आ पायेंगे....क्या पता मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव ही नहीं आयें...नसीम भाई ने हौसला दिया....कहा, कम लोग ही सही, जो लोग भी आयेंगे, वो असल में हिंद-युग्म के प्रति इमानदार होंगे...आनन-फानन में आटीओ चौक पर पराठे खाकर बढ़ चले हिंदी भवन की ओर...

डेढ बजे से पहले नहीं घुसने देंगे....
भारत की सबसे मज़ेदार बात ये है कि जब तक आप “बड़े” आदमी जैसे दिखते नहीं, आपको कोई भाव नहीं देता...जब हम हिंदी भवन के गेट पर पहुंचे तो दरबान ने हमें देखते ही रोक दिया...कहा, प्रोग्राम दो बजे से है, बारह बजे क्यूं आ गये....जब हमने बताया कि प्रोग्राम के आयोजक हम ही हैं तो उसे भरोसा ही नहीं हुआ...हमें शैलेश जी के आने तक का इंतज़ार करना पड़ा....चूंकि, शैलेश भी मुझे “बड़े” आदमी जैसे दिखते नहीं, तो मेरा डर कम नहीं हुआ कि कहीं गार्ड उन्हें भी कोई नसीहत न दे दे... ख़ैर, शैलेश आये रुपम चोपड़ा की कार में और मुझे तसल्ली मिली की कोई तो “बड़ा” आदमी पहुंचा...तब तक हम हिंदी-भवन की बाहरी दीवार पर कूद-फांद कर हिंद-युग्म का बड़ा सा बैनर टांग चुके थे... बैनर पर दूर से हिंद-युग्म-“हिंदी को खून चाहिए” देखकर मन रोमांच से भर गया था....बैनर टांगने में हमें मदद मिली पंकज से जो वहां प्रोजेक्टर लगाने के लिए नियत समय पर पहुंच गया था... बहरहाल, शैलेश जी ने भी थोड़ी मशक्कत के बाद एक बजे ही अंदर जाने की इजाज़त ले ही ली....


गिने-चुने लोग
धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष में जब मैं पहुंचा तो हिंद-युग्म के भी गिने-चुने लोग ही साथ थे...कार्यक्रम शुरू होने में अब भी 45 मिनट थे....शैलेश प्रो़जेक्टर पर स्लाइड शो की तैयारी में लग गये और हम एक-एक कर आने वाले आगंतुकों के अभिवादन में जुटे थे...सुमित भारद्वाज, तपन शर्मा अपनी छोटी-सी टोली लेकर आ गये थे और अपने अभियान में लग गये थे...लोगों की संख्या अब बढ़ने लगी थी और हमारी धड़कनें भी...दो बजे तक स्थिति ये थी कि आधे से ज़्यादा कुर्सियां भर गयी थीं..बस, एक भी मुख्य अतिथि नहीं पहुंचे थे...हम रेडियो के कार्यक्रमों की तरह श्रोताओं को हिंद-युग्म के स्वरबद्ध गीत सुनवाए जा रहे थे और आये हुए लोगों को बहला रहे थे...


वो घड़ी आ गई…
शैलेश जी से गहन विमर्श के बाद तय हुआ कि कोई आए न आए, पौने तीन बजे कार्यक्रम शुरू कर देंगे...ठीक पौने तीन बजे जब मैं मंच पर पहली लाइन बोलने के लिए सांसें भर रहा था, कक्ष के दरवाज़े पर बैसाखी के सहारे एक शख्स हमारी ओर बढ़ रहा था..मैंने माइक छोड़ा और उनकी अगवानी में दौड़ पड़ा....वो राजेंद्र यादव थे...लगा, कि सारा आकाश हिंद-युग्म के आंगन में उतर आया हो....


कलम आज उनकी जय बोल
मेरे कार्यक्रम के शुरू करने और श्याम सखा “श्याम” जी को आगे की कमान सौंपने के अंतराल में लगभग सभी कुर्सियां भर चुकी थीं...आये हुए लोगों में कुछ तो जानने वाले थे, ज़्यादातर, पहली बार हिंद-युग्म से मिले थे...उनका आना इस बात पर मुहर लगा रहा था कि अगले चार घंटों तक वो हमें बस सुनने ही आये हैं, कोई रस्म निभाने के लिए नहीं....नाज़िम नक़वी, जो हमसे हाल ही में जुड़े हैं, राजेंद्र यादव के बाद आये....फोन पर हमने उन्हें ढाई बजे याद दिलाया कि प्रोग्राम बोरिंग भी हो तो भी घर का है, सो आना ही पड़ेगा..

हिंद-युग्म ने पिछली बार कोई बड़ा कार्यक्रम पिछली फरवरी में कराया था...प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में “पहला सुर का विमोचन”...तब के हिंद-युग्म के कई नामी चेहरे ग़ायब थे...कई नए चेहरे दुगने जोश के साथ जुटे थे...शिवानी सिंह, प्रेमचंद सहजवाला चुपचाप हमारी रवानी देखकर संतुष्ट थे...सुनीता चोटिया शालीन श्रोता की तरह पूरे कार्यक्रम में बैठी रहीं और मन ही मन वाहवाही भी देती रहीं....नीलम मिश्रा व शोभा जी न सिर्फ बाल उद्यान संभाल रही हैं, बल्कि हिंद-युग्म की हालिया ऊर्जा का केंद्र भी हैं....गौरव, अभिषेक, मनुज अलग ही मोरचा संभाले हुए थे.... किस-किस का नाम लें...क्या बताएं कि कार्यक्रम का सबसे सम्मानित पाठक आलोक “साहिल” आखिरी समय तक गुलदस्ते लाने में लगा हुआ था....सबको सलाम करने का जी करता है...सजीव सारथी, सुनीता यादव आदि की कमी बेहद खल रही थी...

वाह ! शैलेश.....
शैलेश एक अलग ही मूड में दिख रहे थे..उनके चेहरे पर आम तौर से ज़्यादा गंभीरता थी...उन्होंने जब ब्लॉगिंग की क्लास लेनी शुरू की तो राजेंद्र यादव भी सीखने के मूड में आ गये....हालांकि, मैं चाहता था कि शैलेश कम देर तक ही बोलें मगर लोगों की रुचि देखकर शैलेश बोलते गये और समय का पता ही नहीं चला...बाद में मैं भी पूरे ध्यान से उन्हें सुनने लगा और काफी कुछ सीखने को मिला...

उम्दा कवि, उम्दा श्रोता, उम्दा संचालक
हिंद-युग्म मंच के अधिकांश कवि किसी भी बड़े काव्य मंच के नियमित चेहरे नहीं है...फिर भी जब वो कविताएं पढ़ते हैं तो कहीं से नहीं लगता कि वो साल में इक्का-दुक्का बार ही पढ़ने के लिए मंच पर उतरे हैं....गौरव, पावस, रूपम, मनुज आदि जब कविताएं पढ़ रहे थे, तो मैं दर्शक दीर्घा को निहार रहा था...सब लोग डूब कर सुन रहे थे...नाज़िम जी आखिर में आए तो सब तालियां बटोर कर ले गये....”अंकल जैसे लोग थे सब....” मेरे दिल में अब तक चुभ रहा है...मज़े की बात ये रही कि पूरे कार्यक्रम के दौरान राजेंद्र यादव भी कवियों को देखते रहे, सुनते रहे और डूबते-उतरते रहे... श्याम जी का संचालन भी सबका दिल जीत रहा था...लग ही नहीं रहा था कि वो कार्यक्रम के ठीक पहले दिल्ली पहुंचे हैं …पूरे कार्यक्रम में मैं उनसे संचालन के गुर सीखता रहा और जहां ज़रूरत पड़ी, उन्हें आवश्यक निर्देश भी देता रहा...

गूंज उठा "सारा आकाश"
ठीक छह बजे राजेंद्र जी के आगे माइक पहुंचा और उन्होंने बोलना शुरू किया...उनको कभी पहले सामने सुनने का मौका नहीं मिला था...उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें एक बात साफ थी..उन्होंने तीन घंटे तक हमें बड़े ध्यान से सुना था....उन्होंने बड़ी इमानदारी से अपनी तकनीकी अक्षमता को स्वीकारा और हिंद-युग्म को ये जिम्मा भी दिया कि उन्हें हम तकनीक से जोड़ सकें...फिर बड़ी महीन बातें भी की...हमें ये निर्देश भी दिया कि तकनीक में आधुनिकता के साथ-साथ विचारों में भी आधुनिकता समय की मांग है....कई और बातें भी कहीं जो वहां कई लोगों को नाराज़ करने के लिए काफ़ी था....पर, ये तो उनका परिचित अंदाज़ है....दस गालियां और ढेर सारी तालियां बटोरे बग़ैर तो वो किसी भी कार्यक्रम से रुखसत नहीं होते...
बहरहाल, हिंद-युग्म के लिए राजेंद्र यादव का आना एक सुखद संयोग था....किताबी साहित्य का पुरोधा तकनीक के कर्णधारों की सभा में आया था...एक सेतु बनकर, जो कई और साहित्यकारों को भी ब्लॉगों की तरफ़ मुड़ने को बाध्य करेगा....


इंतिहां और भी हैं...
कार्यक्रम के बीच में कई बार हमें कुर्सियां बढ़ानी पड़ी...कार्यक्रम के आखिर में नाश्ते के पैकेट भी कम पड़ गये...ये सब हमारे लिए खुशी की बात है...इतने शुभचिंतक आये कि वो हमसे किसी भी विशेष सम्मान की अपेक्षा लेकर नहीं आये थे...जाते-जाते वो बस मुझे, शैलेश या हिंद-युग्म के किसी और सदस्य को मिलकर पीठ थपथपाकर ही गये...गज़ल की किताबें बांट रहे दरवेश भारती हों या अपनी पैनी नज़र रखे हिंद-युग्म के कार्टूनिस्ट मनु बेतख्खल्लुस, सबके सब हिंद-युग्म के कार्यक्रम में पहली बार आये थे मगर आये तो हमारे होकर रह गये....

मुझे लगता है कि अगला साल हिंदयुग्म के लिए मील का पत्थर साबित होगा...हम अपने साथ कई लोगों को जोड़ चुके हैं....अब बारी है हिंदी की मशाल सबके हाथों में थमाने का....ताकि, तकनीक और साहित्य की हर विधा से हिंदी जुड़ सके.....सबको महसूस हो कि हिंदी की बात करने वाले लोग झोलाछाप नहीं हैं..उनके पास विज़न है और हिंदी को सर्वप्रिय बनाने का माद्दा भी....

निखिल आनंद गिरि


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बाप दादाओं की तस्वीरों को निकाल कर फेंक दो
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मोहल्ला से साभार
घर मां बुलाईके जूता लगाईके अहा!
जय हिन्द, जय हिन्दी, जय हिन्दयुग्म!!!