Tuesday, June 09, 2009

थिएटर के पितामह को आखिरी सलाम

कल हिन्दी कवि जगत के व्यंग्य-सूर्य ओम प्रकाश आदित्य के साथ-साथ भारतीय रंगमंच के शीर्षस्थ नाम हबीब तनवीर का सूरज भी बुझ गया। कलाजगत के इतिहास में 8 जून 2009 की तिथि रंगमंच को अनाथ कर जाने के तौर पर भी याद की जायेगी। युवा पत्राकर आलोक सिंह साहिल और चर्चित कला-समीक्षक अजित राय हबीब तनवीर को याद कर रहे हैं॰॰॰॰॰


चित्र साभार- मयंक
जिस जिस को था ये इश्क का अजार
मर गए अकसर हमारे साथ के बीमार...


मशहूर नाटककार, डायरेक्टर, कवि और एक्टर हबीब तनवीर महज एक नाम नहीं वरन ऐसी दरख्त हैं जिनकी छांव से थिएटर की दुनिया में कदम रखने वाला हर शख्स खुद को महफूज महसूस करता रहा है। एक ऐसा अंबर जिसके तले कला के न जाने कितने ही सितारे रोशन हुए। पर आज ये इंदू (नक्षत्र) खुद कहीं विलीन हो गया है। यह कुछ वैसा ही जैसे रात होने पर सूरज नजर नहीं आता....तब जबकि चांद उसकी रोशनी में ही अपनी चमक पर इतराता रहता है। काल की घनेरी छाया ने उन्हें हमसे दूर कर दिया है, लेकिन थिएटर जगत हमेशा उनकी आभा से दैदीप्यमान रहेगा।

तनवीर जन्म और आरंभिक जीवन
आगरा बाजार और चरनदास चोर जैसे कालजयी नाटकों के रचनाकार तनवीर साहब (हबीब अहमद खान) का जन्म एक सितम्बर 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हफीज अहमद खान के घर हुआ था, जो मूलत: पाकिस्तान के पेशावर से यहां आए थे।
जाना रंगमंच के शताब्दी पुरुष का
हबीब तनवीर के रंगकर्म में हमें भारतीय परंपरा, लोक और वैश्विक दृष्टि का जो समन्वय दिखाई देता है, वह विकासमान जन संस्कृति का वैकल्पिक मॉडल है। उन्होंने बार-बार कहा है कि रंगमंच का मूल उद्देश्य दर्शकों को आनंद प्रदान करना है। लेकिन उनके किसी नाट्य लेख का गैर-राजनीतिक पाठ संभव नहीं है। उनका अंतिम नाटक ‘राजरक्त’ (रवींद्र नाथ टैगोर) भी धर्म और सत्ता की टकराहटों में विकसित होता है। हबीब तनवीर को जीवन में कई सम्मान और पुरस्कार मिले। उनके नाटक ‘चरणदास चोर’ के लिए उन्हें विश्व के सबसे प्रतिष्ठित नाटक समारोह में ‘फ्रिज फस्र्ट’ अवार्ड एडिनबरा, इंग्लैंड में मिला। 1969 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी’ पुरस्कार भी मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की पहल पर उन्हें राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनीत किया गया। हबीब तनवीर ने हालांकि दिल्ली में 1948 से ही नाटक करना शुरू कर दिया था, लेकिन 1954 में प्रस्तुत ‘आगरा बाजार’ से उन्हें अभूतपूर्व ख्याति मिली। 1973 में उन्होंने छत्तीसगढ़ी आदिवासी कलाकारों के साथ प्रयोग करना शुरू किया। विजयदान देथा की कहानी पर आधारित ‘चरणदास चोर’ (1975) से उन्हें विश्व भर में ख्याति मिली। इसी साल जनवरी में 86 साल की उम्र में उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में ‘चरणदास चोर’ का निर्देशन-मंचन किया था। इस नाटक में हवलदार के रूप में निभाई गई उनकी भूमिका सदा याद की जाएगी। उन्होंने भारत-पाक विभाजन पर आधारित असगर वजाहत के नाटक ‘जिस लाहौर नइ वेख्यां वो जम्यइ नइ’ का 1990 में श्रीराम सेंटर रंगमंडल के कलाकारों के साथ मंचन किया था। अस्पताल में भर्ती होने से पहले वह इसे दोबारा तैयार करने में लगे हुए थे। इस वर्ष इस नाटक के मंचन के बीस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर पूरे साल दुनिया भर में इस नाटक का उत्सव मनाया जाने वाला है।

रंगमंच से क्रांति नहीं हो सकती जैसा उद्घोष
यह एक संयोग ही था कि जब 1 सितंबर, 2002 को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हबीब तनवीर का 80वां जन्मदिन मनाया जा रहा था, तो ब. व. कारंथ के निधन की खबर ने सबको शोकाकुल कर दिया। कुछ साल पहले अपनी धर्मपत्नी मोनिका मिश्र के निधन पर वह भीतर से टूट गए थे। मिलने पर वह अकसर कहते कि उन्हें अपनी आत्मकथा पूरी करनी है। कुछ वर्ष पूर्व अपने दो नाटकों के कारण वह मध्य प्रदेश में हिंदू कट्टरपंथियों के हमलों का शिकार हुए थे। विचारों से वामपंथी होने के बावजूद वह बार-बार कहते थे कि रंगमंच से क्रांति नहीं हो सकती। रंगमंच को रंगमंच रहने दिया जाए।

जिम्मेदारी विरासत बढ़ाने की
हबीब तनवीर के जाने के बाद भारतीय रंगमंच ने अपना एक ‘आइकन’ खो दिया है। उन्होंने शहरी रंगमंच को छोड़कर ग्रामीण रंगमंच को चुनने का कठिन जोखिम उठाया। उन्होंने स्थानीयता को वैश्विक पहचान दी। उनकी फिदा बाई जैसी कई अभिनेत्रियाँ जीते जी किवदंती बन गर्इं। उनकी इकलौती बेटी नगीन तनवीर के सामने ‘नया थिएटर’ भी चलाने की जिम्मेदारी है। हालांकि नगीन हमेशा इस जिम्मेदारी से बचने की घोषणा करती रही हैं। हबीब साहब अकसर कहते थे कि किसी के जाने से कोई काल नहीं रुक सकता। उन्हें यकीन था कि कोई न कोई उनके काल को आगे बढ़ाएगा। जिस हिंदी रंगमंच को उन्होंने इतना दिया, आज उन पर हिंदी में एक भी ढंग की किताब का न होना दु:खद है। हिंदी समाज कब तक अपने नाटकों के मरने का इंतजार करता रहेगा। अभी हाल तक उनका कोई नाटक प्रकाशित नहीं था। अब जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो हमें चाहिए कि हम उनकी महत्वपूर्ण विरासत को आगे बढ़ाएं। हमें नगीन तनवीर को दिलासा दिलाना चाहिए कि इस घड़ी में हम उनके साथ हैं।
--अजित राय
हाई स्कूल तक की पढ़ाई उन्होंने लौरी मुनिसिपल हाई स्कूल, रायपुर से की। फिर 1944 में नागपुर के मौरिस कॉलेज से बीए की पढ़ाई करने के बाद एमए करने वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए।
युवावस्था से ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया और इस तरह हबीब अहमद खान अब अपने तखल्लुस तनवीर के साथ हबीब तनवीर बन गए।

रेडियो से हुई करियर की शुरूआत
एमए की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे 1945 में बॉम्बे (आज की मुंबई) चले गए जहां वे ऑल इंडिया रेडियो से प्रोड्यूसर के रूप में जुड़ गए। साथ ही हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखना भी शुरू कर दिया। जल्द ही वे प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से जुड़ गए। आगे चलकर वे इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन(इप्टा) से जुड़े और उसी के होकर रह गए।

जिस समय वे इप्टा से जुड़े उस समय देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। उस समय मशहूर अभिनेता और थिएटर एक्टर बलराज साहनी साहब इप्टा की कमान संभाले हुए थे। दुर्भाग्यवश ब्रितानिया हुकूमत को रंगमंच के माध्यम से इन रंगकारों की जनक्रांति रास नहीं आई और उन्होंने बलराज साहनी समेत सभी प्रमुख लोगों को सलाखों के पीछे ढ़केल दिया गया था।

ये वह समय था जब हबीब तनवीर ने अभिनय का ककहरा सीखना ही शुरू किया था। लेकिन सभी बड़े लोगों (गुरुओं) के जेल चले जाने से वे बिल्कुल टूट से गए थे।

तन्हा संघर्ष
इतिहास जब बनना होता है तो अकसर कुछ छोटी घटनाएं कारक के रूप में सामने आ जाती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ, तन्हा और कमजोर पड़ चुके तनवीर साहब जब जेल में बलराज साहब से मिलने पहुंचे तो बलराज साहब ने उनके कंधे पर पूरे इप्टा का भार डाल दिया। सच्चाई यह थी कि उन्हें उस वक्त न तो लिखना आता था और न ही सही से अभिनय करना, लेकिन गुरू की आज्ञा का पालन करते हुए तनवीर साहब ने जैसे-तैसे नाटक लिखना शुरू किया। वे पूरे समय कहानी लिखते, लोगों को इकट्ठा करते और उनसे नाटक करवाते। प्रॉम्टिंग से लगाए, गाना, मेकअप करना जैसे सारा काम वह खुद ही करते थे। समय के साथ-साथ उनकी कलम और अभिनय में धार आती गई और वे अभिनय के उस मकाम पर पहुंच गए...जहां उनके बाद कोई दूसरा पहुंचने की सोच भी न सका।

जब खाया थप्पड़
एक और घटना का उल्लेख मौजूं होगा। बात उस समय की है जब अभिनय का यह वटवृक्ष अभी पल्लवित हो रहा था। बलराज साहब एक नाटक का निर्देशन कर रहे थे, उस नाटक के एक दृश्य में तनवीर साहब को रोने की एक्टिंग करनी थी। लेकिन बार-बार कोशिश करने के बावजूद वे रो नहीं पा रहे थे। वास्तव में, उन्हें झिझक हो रही थी। कई बार प्रयास करने पर भी जब स्थिति जस की तस बनी रही तब बलराज साहब मंच पर चढ़े और एक जोरदार तमाचा उन्हें रसीद कर दिया, फिर क्या था तनवीर साहब ऐसे रोए कि खुद उनके गुरू भी अचंभित हो गए। इस तरह उनकी अभिनय यात्रा दिन-ब-दिन बढ़ती चली गई। वे हमेशा इस बात को मानते रहे कि बलराज साहब का थप्पड़ न खाते जाने कहां खाक छान रहे होते।

दिल्ली का रुख
इसी दौरान देश आजाद हो गया। आजादी के बाद सात सालों तक वे वहीं (बॉम्बे) अपने कला को मांझते रहे। इसके बाद 1954 में उन्होंने दिल्ली का रुख किया। यहां उन्होंने कद्सिया जैदी के हिंदुस्तानी थिएटर और चिल्ड्रेंस थिएटर के साथ अनेकों नाटकों में काम किया। इसी बीच उनकी जिंदगी में मोहतरमा मोनिका मिश्रा का आगमन हुआ जो बाद में उनकी पत्नी बनीं।

इसी साल यानी 1954 में उन्होंने अपना कालजयी नाटक आगरा बाजार तैयार किया। इसकी खास बात यह थी कि इसमें उन्होंने किसी ट्रेंड एक्टर को नहीं लिया था बल्कि लोकल नॉन ट्रेंड लोगों को लिया था। इस सफल अनुभव ने उन्हें इस कदर उत्साहित किया कि फिर वे छत्तीसगढ़ में ऐसे ही नॉन ट्रेंड लोगों के साथ मिलकर उन्हें संवारने में जुट गए।

हबीब तनवीर के नाटक

आगरा बाजार (1954)
शतरंज के मोगरे (1954)
लाला शोहरत राय (1954)
मिट्टी की गाड़ी (1958)
गांव के नांव ससुराल,
मोर नांव दामाद (1973)
चरनदास चोर (1975)
उत्तर रामचरित्र (1977)
बहादुर कलरीन (1978)
पोंगा पंडित
जिस लाहौर नई देख्या (1990)
कामदेव का अपना बसंत रितु का सपना (1993)
जहरीली हवा (2002)
राज रक्त (2006)
बर्लिन के आठ महीने
उनकी जिंदगी में एक घटना और घटी जिसने उनको थिएटर को रूट लेवल तक ले जाने में मदद किया। वह था उनका 1955 में इंग्लैंड जाना, जहां उन्होंने दो सालों तक अभिनय और निर्देशन का प्रशिक्षण लिया। इसी दौरान उन्हें बर्लिन में तकरीबन 8 महीने रहने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने वहां बहुत सारे नाटक देखे। सौभाग्यवश उन्हें यूरोप के प्रख्यात नाटककार बर्टोल्ट ब्रेच्ट के नाटको को भी देखने का मौका मिला। इसमें उन्होंने पाया कि वे लोकल मुहावरों और लोकोक्तियों का जमकर प्रयोग करते थे। इससे वे बहुत प्रभावित हुए। बाद में भारत लौटकर उन्होंने इसी चीज को अपने नाटकों में अपनाया। इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें रूट लेवल तक अपनी पकड़ बनाने में मदद की।
नया थिएटर का जन्म 1958 में जब वे लौटकर भारत आए तो छत्तीसगढ़ी भाषा में अपना पहला महत्वपूर्ण नाटक मिट्टी की गाड़ी बनाई। इसकी सफलता ने आगे चलकर नया थिएटर के शुरुआत का मार्ग प्रशस्त किया। और 1959 में उन्होंने अपनी पत्नी मोनिका मिश्रा के साथ भोपाल में नया थिएटर की स्थापना की।

उनका रंगकर्म पूरे उफान पर था कि 1972 में में एक और बड़ी क्रांतिकारी घटना घटी। छत्तीसगढ़ की लोककथा पर उन्होंने गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद, का निर्माण किया, जिसने धमाल मचा दिया। इसने उनके नाट्य जीवन को एक अलग मुकाम और बुलंदी बख्शी।

चरनदास चोर ने गढ़ी थिएटर की नई परिभाषा
वक्त के साथ तनवीर साहब की सीमाएं बढ़ती जा रही थीं। उनकी ख्याति सरहद पार बहुत दूर तक पहुंचने लगी थी। जब भी थिएटर की बात आती तनवीर साहब को याद किया जाता। 1975 में वह समय आया जब उन्होंने मॉडर्न थिएटर की नई परिभाषा गढ़ते हुए चरनदास चोर रचा। इसकी सफलता का आलम यह रहा कि मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल ने इस नाटक को इसी नाम से स्मिता पाटिल जैसी अभिनेत्री के साथ बड़े पर्दे पर पेश किया।

थिएटर की दुनिया से इतर उन्होंने 9 फीचर फिल्मों में भी काम किया, जिसमें रिचर्ड एटनबर्ग की गांधी भी शामिल है।
हर सफल इंसान के साथ कुछ स्याह पहलू भी उनकी जिंदगी में वह दौर भी आया जब उनका नाटक पोंगा पंडित कट्टरपथियों के निशाने पर आया। अपनी दो किताबों को लेकर उनपर जानलेवा हमले भी हुए।
2005 में उनकी जिंदगी और नया थिएटर परे एक डाक्यूमेंटरी फिल्म गांव के नांव थिएटर, मोर नांव हबीब (मेरा गांव थिएटर है, मेरा नाम हबीब है) भी बनी।

आखिर के तन्हा दिन
अपनी पत्नी मोनिका से बेइंतहां मोहब्बत करने वाले हबीब तनवीर 2005 में उनकी मौत के बाद बिल्कुल तन्हा हो चले थे और टूट गए थे। उसके बाद भी अगर वह जिंदा थे तो इसकी वजह शायद उनकी रगों में दौड़ता रंगकर्म था, जो उन्हें तयशुदा मिशन को पूरा किए बगैर जाने की इजाजत नहीं देता।

उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

--आलोक सिंह साहिल

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

8 बैठकबाजों का कहना है :

रंजना [रंजू भाटिया] का कहना है कि -

दुखद घटना है यह ...उनका नाटक आगरा बाजार टीवी पर देखा था तब से उनके बारे में विस्तार से जाना था .

sunit का कहना है कि -

Habib saheb was the rockstar of Indian Theatre. A pioneer in his chosen field, he will forever be remembered like other greats who have walked the Earth, like Satyajit Ray, Vincent Van Gogh, Albert Einstien, Issac Newton, Leo Tolstoy, Fyodor Dostoyevsky, and more.
Habib Saheb, you'll be terribly missed, and your repetoire of work will continue to inspire generations to come.

vipin-choudhary का कहना है कि -

हबीब तनवीर जी की दमदार आवाज किसी जादु से कम नहीं थी। पहली बार उनका नाटक चरणदास चोर रेडियों पर सुना था जब मैं तेरह साल की थी तब से ही हबीब तनवीर की कला के आगे नतमस्तक हुँ। खुदा उनकी आत्मा को शान्ति दे।

सजीव सारथी का कहना है कि -

habib tanveer ek mahantam kalkaar the....gahra sadma laga unke jaane kii khabar sunkar....khuda unhen jannat bakshe

Manju Gupta का कहना है कि -

yeh dukhadh khabar t.v. par suni, inka vyaktitva hindyugm mein padha. Sahitya jagat ke in ratno koa yogdaan anmol hai aur inki jagah koi nahi le sakta hai. Bhagwan unki atma ko shanti de.


Manju Gupta.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

भई, जब दूरदर्शन यह सब दिखाता था तो हमारे गाँव में टीवी नहीं थी। हाँ पिछले बरस इनके नाटक की दो किताबें ज़रूर खरीदा था। अब इरादा बनाया है सबकुछ देखने और पढ़ने का। शायद यही मेरी श्रद्धाँजलि होगी।

तपन शर्मा का कहना है कि -

मैंने उनका नाटक "जिसने लाहौर नहीं वेख्या..." देखा है। जबर्दस्त प्रस्तुति थी और हम तीन दोस्त हर दृश्य बस ताली बजाते चले गये...
तब ये नहीं पता था कि हबीब तनवीर कौन है.. न जानने की कोशिश की..बस तारीफ़ करते रहे..
अब जाना.... धन्यवाद साहिल भाई..
हबीब साहब को मेरी श्रद्धांजलि।

Shamikh Faraz का कहना है कि -

नाटकों के बटक बादशाह तनवीर साहब को मेरी श्रधान्जली

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)