Wednesday, March 04, 2009

क्या आप सुन पाए संसद में सिसकी....

चौदहवीं लोक सभा की उम्र पूरी हो चुकी थी। शोक सभा में स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, लालकृष्ण आडवाणी आदि नेता अपना-अपना वक्तव्य रख चुके थे। निर्णय हुआ कि लाश को अभी श्मशान तक न ले जाया जाए। जब पंद्रहवीं लोक सभा का जन्म हो जाए, तब क्रिया-कर्म की रस्म पूरी हो। उसके पहले अंतिम संस्कार कर दिया गया, तो बीच की अवधि में लोक सभा की आत्मा कहां-कहां भटकती फिरेगी? वैसे, कुछ लोगों का मत है कि लोक सभा की आत्मा तो पहले ही कूच कर चुकी है। अब हम उसका शरीर ढो रहे हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। जब शरीर है, तो आत्मा भी होगी ही। इसलिए पता लगाने की चीज यह है कि लोक सभा की असली आत्मा के कूच करने के बाद जिस आत्मा ने लोक सभा पर कब्जा कर लिया है, वह कैसी है, कहां की है और क्या करने पर वह अपने मूल क्षेत्र में जा बैठेगी। मैं प्रस्ताव करता हूं कि यह पता लगाने के लिए तुरंत एक राष्ट्रीय आयोग गठित किया जाए, जिसमें संसद का एक भी सदस्य न हो।

लोक सभा के सभी ऑनरेबल सदस्य बाहर निकल आए, तो गार्ड सदन के दरवाजे बंद करने के लिए लपका। बाकी सारे दरवाजों पर वह ताला लगा चुका था। जब वह आखिरी दरवाजे पर ताला लगाने जा रहा था, तभी उसे किसी लड़की की सिसकी सुनाई पड़ी। गॉर्ड भौंचक रह गया। सिसकी की आवाज दीवार के एक कोने से आ रही थी। गॉर्ड थोड़ा डर भी गया -- कहीं भूत-प्रेत का मामला तो नहीं है? फिर धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ा जिधर से सिसकी की आवाज आ रही थी। दूर ही से टॉर्च की रोशनी उधर फेंकी, तो देखा, सोलह-सत्तरह साल की एक लड़की बार-बार अपना माथा पीट रही थी और रो रही थी। उसका सिर सामने की ओर झुका हुआ था। उसके आंसू के कण फर्श पर बिखरे हुए थे।

गॉर्ड तीस साल से लोक सभा में नौकरी कर रहा था। कई लोक सभाओं के ताले खोल और बंद कर चुका था। इसके पहले उसने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी समझ जवाब दे रही थी। कौतूहल, जिज्ञासा और भय से वह आगे बढ़ा और दीवार पर लगे एक स्विच को ऑन कर दिया। एक ट्यूब लाइट जल उठा। उसकी रोशनी में उसने उस दुखिनी बाला का भरपूर जायजा लिया। वह कोई युवा प्रेतनी नहीं, हाड़-मांस की जिन्दा लड़की थी। उसकी शक्ल गॉर्ड की मझली बेटी से मिलती-जुलती थी। गॉर्ड का दिल सहानुभूति से भर आया।

गॉर्ड रोती हुई लड़की के नजदीक गया। उसने बहुत ही मुलायम स्वर में पूछा, 'क्या बात है बेटी, क्यों रो रही हो?'

ऐसा लगा मानो लड़की ने कुछ सुना ही न हो। उसकी सिसकी जारी रही।

गॉर्ड थोड़ा और नजदीक गया। उसने अपना प्रश्न दुहराया। लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। विचलित गॉर्ड ने लड़की के माथे पर हाथ रख कर उसे उठाने की कोशिश की। लड़की ने प्रतिरोध किया। गॉर्ड ने अपना सवाल फिर दुहराया। लड़की का रोना और तेज हो गया। गॉर्ड की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। लड़की को इस तरह अकेली छोड़ कर वह लोक सभा का आखिरी दरवाजा बंद नहीं कर सकता था। उसने एक बार फिर कोशिश की, 'बताओ न बेटी, आखिर बात क्या है? हो सकता है, मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। मुझे अपने पिता की तरह समझो। मेरी एक बेटी तुम्हारी ही उम्र की है।'

लड़की ने सिर झुकाए हुए ही कहा, 'स्पीकर साहब, अब आप क्या, कोई भी मेरी मदद नहीं कर सकता। इस लोक सभा की आखिरी बैठक हो चुकी है।' गॉर्ड ने उसकी गलतफहमी दूर की, 'बेटी, मैं स्पीकर नहीं हूं। वे तो जा चुके हैं। मैं यहां का गॉर्ड हूं। तुम बिना संकोच के अपना दुख मुझसे कह सकती हो।'

लड़की ने सिसकी रोक कर अपना सिर थोड़ा-सा उठाया। बोली, 'मेरा दुख सभी जानते हैं। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। लगता है, यहां से मेरी अरथी ही निकलेगी।'

गॉर्ड का सिर चकराने लगा था। उसने जानना चाहा, 'लेकिन तुम सदन में घुसी कैसे? यहां तो कोई भी गैर-मेंबर प्रवेश नहीं कर सकता। इसके लिए पास जारी कराना पड़ता है।'

लड़की ने जवाब दिया, 'बाबा, मेरा तो जन्म ही इस सदन में हुआ है। यहीं पड़े-पड़े मेरी उम्र बढ़ रही है। इंतजार करते-करते दस साल से ज्यादा हो गया। लोक सभा शुरू होती है, तो सब कहते हैं, इस बार तुम्हारा निपटारा कर देंगे। पांच वर्ष तक मैं आंख उठाए स्पीकर और दूसरे मेम्बरान की ओर देखती रहती हूं। सत्र पूरा हो जाता है और मेरा कुछ नहीं होता। अकेले बैठ कर सिसकती रहती हूं। वे मुझे मारते भी नहीं और जीने भी नहीं देते। हमेशा अधमरी हालत में छोड़ देते हैं।'

गॉर्ड ने आश्चर्य से पूछा, 'लेकिन बेटी, तुम हो कौन? तुम्हारा नाम क्या है?'

लड़की ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, 'बाबा, मुझ अभागन को सब जानते हैं। मेरा नाम है महिला आरक्षण विधेयक।'

अब गॉर्ड की समझ में सब कुछ आ गया। उसने हाथ पकड़ कर लड़की को उठाते हुए कहा, 'बेटी, उठो, मेरे घर चलो। यहां रोने से कुछ हासिल होनेवाला नहीं है।'

लड़की ने शांत स्वर में उत्तर दिया, 'बाबा, रात हो रही है। तुम घर जाओ। मैं तो यहीं रहूंगी। या तो मेरा मनोरथ पूरा होगा या यहां से मेरी लाश निकलेगी।'

राजकिशोर

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2 बैठकबाजों का कहना है :

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

अगर मैं कहूँ की सर आपने बहुत अच्छा लिखा है तो यह कोई नयी बात नहीं होगी...आज,आपको पढना एक अलग एहसास देने वाला रहा....प्रतीकों के सुन्दर प्रयोग से जो बात आपने कह डाली....मजा आ गया....बहुत ही सुन्दर आलेख...सुन्दर व्यंग्य
आलोक सिंह "साहिल"

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आभारी हूँ, आपने, सुना रुदन रह मौन.

रक्षक जब भक्षक बने, लाज बचाए कौन?

पहले भी घुट चुकी है, सांसें- सब थे मूक.

'सलिल' न हो इस बार फिर, पहले जैसी चूक.

आप सजग हैं इसलिए दूं शत बार बधाई.

भारत माता आपको, सजग देख हर्षाई.

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