Showing posts with label Ashok Gautam. Show all posts
Showing posts with label Ashok Gautam. Show all posts

Saturday, January 16, 2010

तुम जिओ हजारों काल

अबके उनके जन्मदिन पर फेस टू फेस उन्हें शुभकामनाएं देने के लिए मैं उतावला था। पर मेरे उतावले होने से क्या होता है? जितनी बार भी उनके कार्यालय में फोन लगाता तो हर बार पीए कहता,’ अभी तुम उनसे से नहीं मिल सकते। पंद्रह दिन तक तो उन्हें बधाई देने वालों की रिजर्वेशन हो चुकी है। रोज फोन कर अपना समय तो खराब कर ही रहे हो मेरा भी समय खराब करते हो?’
‘उनका जन्मदिन कब तक चलने की संभावना है?’
‘यार ! झुग्गी वाले तो हैं नहीं। दमखम वाले हैं। जब तक उनके नियाोक्ताओं की इच्छा होगी तब तक जन्मदिन का जश्न चलता रहेगा। पर तुम हो कौन?’
‘ मैं... मैं तो रामजी दास हूं सर जी। जिसने उन्हें वोट दिया है। जो जबसे उनकी सरकार बनी है तबसे अभावों में जी रहा है। ’
‘यार बड़े बदतमीज हो। चार साल पहले एक वोट क्या दिया, जैसे उन्हें ही खरीद लिया।’
‘एक एक वोट कर ही तो वे नेता बने हैं। कभी कहते हैं कि मैं ज्योतिषी नहीं जो यह बता दूँ
कि कब चीनी सस्ती होगी। और दूसरे ही दिन भविष्यवाणी कर देते हैं कि आने वाले समय में जल्दी ही चीनी सस्ती हो जाएगी। उनसे मेरी ओर से यह तो पूछना कि उन्हें हमने जिताकर भविष्यवाणियाँ करने के लिए भेजा है या आम जनता के लिए काम करने के लिए?’
‘ अच्छा चल यार! जो नेता चरित्र और जबान फिसले लानत है उस नेता पर। ज्यादा दिमाग मत खा! कल आ जाना उनसे मिलने ठीक चार बजे। बीच में से उनका कीमती समय चुराकर तुझे दे रहा हूं।’
‘दो बजे क्यों नही?’
‘दो बजे तो उनका जनता का पेट काटने सॉरी, केक काटने का प्रोगाम है।’
‘धन्यवाद सर जी! बहुत बहुत धन्यवाद सर जी!’
‘ अच्छा अब बंदकर फोन! हिंदुस्तान का तभी तो विकास नहीं हो रहा है जब तुम लोग हिंदी को मरी बंदरिया के बच्चे की तरह गले से लगाए हो।’
....और मैं कल दस बजे कोहरे को चीरता हुआ उनके कार्यालय की ओर कूच कर गया। न कहीं ठंड लग रही थी न ही महीने से चल रहे जुकाम का दूर दूर तक कोई नामोनिशान था। इन दोनों को पता था कि मैं किस से मिलने जा रहा हूं। बड़ी से बड़ी बीमारियां इनका नाम सुनते ही समाज से छू मंत्र हो जाती हैं।
पीए द्वारा बताए टाइम के दो घंटे आद मेरी बारी आई। मर गया बैठ बैठ कर,‘ हूं! क्या नाम है?’ मुझे बिलकुल खाली देख उनका पीए घूरा।
‘ रामजी दास! जनाब को जन्मदिन की शुभकामनाएं देना चाहता हूं! बस!!’
‘क्या काम करते हो?’
‘ प्रधानमंत्री रोजगार योजना में सबको देने के बाद जो बचता है, करता हूं।’
‘चलो अंदर! पता नहीं कहां कहां से उठकर खाली हाथ चले आते हैं।’ और मैं उनसे मिलने अंदर। वे कुर्सी पर जन्मदिन इतने दिन जक मना शुभकामनाएं ले लेकर पूरी तरह थके हुए।
‘नमस्कार जी!’
‘ कौन??’
‘जी मैं रामजी दास !’
‘पर तुम तो मेरे जलसे के लिए हो। यहां कैसे आ गए?’
‘ जन्मदिन की शुभकामनाएं देने आया हूं।’
देख लो ,साथ में कोई समस्या तो नहीं लाए हो? समस्या से मुझे बहुत चिढ़ है।’ उनके कहने पर मैंने खुद को झाड़ा तो पता नहीं कहां से मरी एक समस्या झड़ गई। मैं इसे साथ लेकर तो आया नहीं था। समस्या फर्श पर गिरते देख वे गुस्साए,‘ यार! कम से कम जन्मदिन वाले दिन तो रंग में भंग मत डाला करो। जब देखो! कपड़ों की जगह समस्याओं को ओढ़े घूमते रहते हो। तुम लोगों के साथ यही तो एक प्राब्लम है। तभी तो तुम लोगों से सरकार में आने के बाद हम लोगों को मिलना कतई भी अच्छा नहीं लगता। प्राब्लम के अतिरिक्त कभी तो कुछ और भी लाया करो यार!’
‘अपने जन्म महीने में आप जनहित में क्या करना चाहते हो सर जी!’
‘सबसे पहले तो जनहित में इस महीने अपने लिए चार फार्म हाउस बनाऊंगा। जनता के कामों से जब जब थका करूंगा तो जनता के लिए रीफ्रेश होने कहीं भी चला जाया करूंगा ताकि मीडिया को पता ही न चले कि मै थक कर कहां हूं। फिर जनहित में इसी महीने अपने दिल का इलाज करवाने विदेश जाऊंगा ताकि लंबे समय तक जनता की सेवा कर सकूं। फिर जनहित में पक्की सड़कों को तुड़वा उन्हें फिर और पक्की करवाऊंगा। इसी महीने जनहित में अपनी दवाई की फैक्टरी की सप्लाई सरकारी अस्पतालों में लगवाऊंगा जनहित में गरीब बस्ती उठवा वहां फाइव स्टार होटल का पत्थर रखवाऊंगा। जनहित में अपने जन्म महीने में अपने नाम के दस और शिक्षा संस्थान खुलवाऊंगा ताकि वहां पर जनता के बच्चे चैन से पढ़ सकें। इसी महीने जनहित में ऊंचे पदों पर अपनों को बिठाऊंगा ताकि वे बेहिचके मेरे एंगिल से जनसेवा कर सकें।
‘और??’
‘अपने जन्म महीने में जनहित में शहर के अपने बंगले को और बड़ा करूंगा ताकि दूसरे नेताओं के आगे तुम्हारे नेता का कद बौना न लगे। विपक्ष की ऐसी तैसी घूमा कर रख दूंगा।‘
‘और????’
‘यार! बहुत नहीं हो गया एक महीने के लिए! काम करवा करवाकर मुझे मारने का इरादा है क्या!! तुम लोगों के साथ यही तो एक सबसे बड़ी मुश्किल है। दारू की बोतल ले एक वोट क्या देते हो सोचते हो स्वर्ग जमीन पर उतारने वाला मिल गया।’
‘जन्म मुबारक हो सर जी। आप जिओ हजारों साल, दिन के एक घंटे हो एक लाख!’

डॉ.अशोक गौतम

Friday, December 25, 2009

थैंक्स सांता क्लाज!!

नींव से लेकर छत तक, कटोरे से लेकर ओवन तक लोन का नकली सुख भोगते हुए आजकल कुछ ज्यादा ही तंगी में चल रहा हूं। क्या है न कि महंगाई कुछ अधिक ही हो गई है। मंदी का दौर आसमान से भू तक पसरा है। हवा में मंदी, पानी में मंदी, रिश्वत देकर काम करवाने वालों की रवानी में मंदी। रिश्वत देने के लिए जेब में हाथ बाद में डालते हैं मंदी का रोना पहले शुरू कर देते हैं जैसे महाशोक में डूबे हों।
कल तक मेरे पडोसी महंगाई से हिले हुए थे तो बड़ा मजा आ रहा था। हफ्तों बाद कल शाम उनके घर से प्रेशर कुक्कर की सीटी की आवाज सुनी। मैं तो सोच बैठा था कि शायद आजकल किसी के यहां मेहमान होकर डटे होंगे।
हाय रे चार्वाक जीवन शैली! नब्बे प्रतिशत वेतन तो लोन में कटा जा रहा है। और महंगाई हैं कि बाजार जाता हूं तो मेरी जेब की खिल्ली उड़ाती है।
क्रिसमस वाले रोज घर में पत्नी को ये हिदायत दे दुबका बैठा ही था कि अगर किसी दोस्त का फोन आए कि वह हमारे घर सपरिवार आ रहा है तो कह देना घर पर नहीं हूं कि अचानक लोन के पालिश किए हुए दरवाजे पर बेल हुई। बेल होते ही मेरा दिमाग झनझनाया। पत्नी को डरते हुए कहा,‘ देख तो सूरज से पहले ये कौन राक्षस आ गया?’
पत्नी मुझसे भी ज्यादा तैश में बोली,‘ आ गया होगा कोई आपका प्रिय पड़ेासी। अब कटोरी टेबल पर रख कहेगा,‘ माफ करना भाई साहब! शाम को दफ्तर से आते आते चीनी लाना भूल गया। सुबह जब चाय को पानी रख डिब्बे में हाथ डाला तो...’ अरे तो हमारे खाली होते चीनी के डिब्बे को क्यों अपनी बुरी नजर लगा रहे हो। खुद तो कंगाल हो गए, अब क्या हमें भी कंगाल बनाकर ही दम लोगे? पर शुक्र गॉड का दरवाजा खोला तो सांता क्लाज! ‘हैप्पी क्रिसमस! हैप्पी क्रिसमस टू आल !! कहां है पप्पी?’
‘सोया है।’ मैंने अनमने से कहा। अब कम से कम इसे भी तो चाय पिलानी पड़ेगी न! सांता है न!!
‘तो जगाओ उसे। कहो, सांता क्लॉज आया है उसे गिफ्ट लेकर।’ कह उसने कमर में ठूंसी घंटी बजानी शुरू कर दी। मैंने सोचा दो टॉफियों के लिए रात को बारह बजे तक फिल्म देख कर सोए एट इअर ओल्ड पप्पी की नींद क्यों खराब करूं। बेचारा स्कूल से आते ही दस बजे तक मां से होम वर्क करवाता थक जाता है। मां उसका होमवर्क करती रहती है और वह अपनी मां को सीरियल की कहानी सुनाता रहता है। तभी तो उसकी मां उससे बहुत प्यार करती है।
अचानक उसे मेरी आंखों के आसपास छाइयां दिखीं तो सांता क्लाज ने पूछा,‘ कमाल है यार! क्रिसमस वाले दिन भी उदास?’
‘ पप्पी के लिए तो टॉफियां ले आए पर पप्पी के पा के लिए??’ हाय रे इजी लोन स्कीम!
‘ लाया हूं। बहुत कुछ लाया हूं। भैया जरा ऊपर आना ,’ सांता क्लाज ने आवाज दी तो धड़ाम धड़ाम किसी के सीढ़ियां चढ़ने की आवाज सुनाई दी। दो मिनट बाद देखा तो एक कुली एक बड़ा सा भरा बोरा उठाए। कुली ने बोरा उतार कमर सीधी की तो मैंने सांता क्लाज से पूछा,‘ ये क्या??’
सांता क्लाज ने बोरा खोलते कहा,‘ क्रिसमस के अवसर पर खास तुम्हारे लिए दो किलो अरहर की दाल, ये दो किलो सबूत मूंगी, ये चार किलो काले चने, ये दो किलो सफेद चने,ये एक किलो मसूर, ये दो किलो रौंगी, ये दो किलो राजमां,ये दो किलो धुली मूंग, ये दो किलो दले माश, ये दस किलो बासमती चावल, ये दो किलो पनीर, ये चार किलो चीनी, , ग्रीन लेबल चाय, ये आधा किलो काफी,पांच लिटर कच्ची घानी सरसों का तेल, ये पांच किलो प्याज, और ये दस किलो आलू.. और..’ कहता सांता क्लाज हंसता रहा।
‘पर आटा तो रह गया?’ मैं पगलाने लगा था। महीने की आखिरी तारीखों में जिस के घर में इतना राशन अचानक आ जाए वह पगलाएगा नहीं तो क्या होगा? ये सब देख तभी पत्नी ने पहली बार आत्मीयता से मेरे गले लगते कहा,‘ डियर पति! हैप्पी क्रिसमस! मैंने उधर उधर देखा तो कोई पडा़ेसी बाहर न था। नहीं तो आने में कौन सी देर करता,‘ भाई साहब! क्या है न कि शाम को आते आते प्याज लाना भूल गए। सुबह तड़के के लिए कड़ाही गैस पर रखी तो देखा कि प्याज तो है नहीं। पर पड़ोस तो है न!!
‘वह भी लाया हूं। जानता हूं कि बिन आटे सब बेकार है। ये लो दस किलो ‘ाक्ति भोग आटे की थैली। हैप्पी क्रिसमस!!’
‘पर!!’
‘ उसके लिए ये लो। चार महीने की लोन की किश्तों के लिए चैक। पर एक अनुरोध जरूर रहेगा।’
‘क्या??’
‘उधार की जिंदगी पर कंट्रोल करो तो और मजा आएगा।’ कह सांता क्लाज मेरे लोनी घर की सीढ़ियां मुसकराते हुए उतर गया।

डॉ. अशोक गौतम
गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि. प्र.

Thursday, December 10, 2009

मजा आ गया

अपने देश की सरकार की वैसे तो बहुत सी खासियतें हैं पर उसकी सबसे बड़ी खासियत है कि वह जिंदों को रोटी देने में भले ही कोताही बरते पर उनके हताहत होने पर उन्हें बड़ी धूमधाम से श्रद्धांजलि देना कभी नहीं भूलती।
त्रासदियों के दौर में उस त्रासदी में खासतौर पर उन हताहतों को श्रद्धांजलि लेने के लिए विशेष रूप से महीना पहले निमंत्रण पत्र जारी कर दिए गए थे जिनके पीछे बचों को लचर व्यवस्था के चलते राहत राशि न मिल सकी थी । और उनके पीछे बचे वाले उस राहत राशि में से हताहतों के क्रिया कर्म पर अनमने मन से ही सही, फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं कर पाए थे जिस कारण वे अभी तक प्रेत यानि में ही विचरण कर रहे थे।

अशांत प्रेतों को जैसे ही निमंत्रण पत्र मिले तो वे फूले न समाए। उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि चलो! आज सरकार बेशक सबकुछ भूल रही है पर प्रेतों को श्रद्धांजलि वाली डेट तो नहीं भूली। जनता को सरकारी डिपुओं पर समय पर राशन पहुंचे या न पहुंचे पर प्रेतों को उनके श्रद्धांजलि समारोह के निमंत्रण पत्र समय पर मिलते रहे हैं। सरकार के प्रति एकबार फिर उन प्रेतों के मन में गहरी आस्था जगी। अब जनता चिल्लाती रहे तो सरकार क्या करे साहब! जनता को चाहिए कि वह प्रेतों से कुछ सीखें।

नियत समय से दो घंटे बाद एक खुले अति सुरक्षित मैदान में त्रासदी में हताहत प्रेतात्माओं को श्रद्धांजलि देने का दौर शुरू हुआ। श्रद्धांजलि की तैयारियां वैसे तो डीसी साहब की देखरेख में पिछली शाम ही पूरी तरह पूरी हो चुकी थीं। नेता जी ने उन्हें साफ कह दिया था कि दो चार दिन वे जिले के सारे कामों को छोड़ श्रद्धांजलि के आयोजन पर खुद को केंद्रित करें ताकि विपक्ष को उंगली उठाने को कोई भी मौका हाथ न लगे। अगर ऐसा वे नहीं कर पाए तो उनके पास उन्हें किसी पिछड़े जिले में भेजने के अतिरिक्त और कोई चारा न होगा। अब डीसी साहब कहां जाते बेचारे!
श्रद्धांजलि समारोह का उदघाट्न नेता जी ने किया तो पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा। श्रद्धांजलि समारोह में आए हताहतों के परिवार जनों के खाने पीने का विशेष इंतजाम किया गया था ताकि उन्हें इस बात का मलाल न हो कि उन्हें तो अनदेखा किया ही जा रहा है पर प्रेतों के प्रति भी सरकार उदासीन है।

लोंगों की भीड़ को देख नेता जी का सीना फूलता ही जा रहा था। वे मन ही मन त्रासदी में मरने वालों का धन्यवाद कर रहे थे कि न वे लोग इस त्रासदी का शिकार होते और न ही उन्हें उम्मीद से अधिक भीड़ को संबोधित करने का सुअवसर मिलता। आज मजा आ गया भाषण देने का।

नेता जी के काजू बादाम पर हाथ साफ करने के बाद श्रद्धांजलि आयोजन संयोजक ने नेता जी से कार्यक्रम को आरंभ करने की इजाजत मांगी तो उन्होंने खिलखिलाकर इजाजत दी।

सामने के पेड़ पर उल्टी सीधी लटकी प्रेतात्माएं दिल को थाम कार्यक्रम को देख फूली न समा रही थीं। उनके दिल की धड़कनें रूकी हुईं थी। उन्हें इस त्रासदी में मरना भूख से मरने वालों से सौ गुणा बेहतर लग रहा था। राहत राशि मिले न मिले। इससे उन्हें क्या! जो बचे हैं वे चोरी चकारी कर खाएं कमाएं। जिन हताहतों के परिवारों को राहत राशि मिली भी उन्हें कौन सी नरक से राहत मिली? हां उससे उनके पीछे बचों के महीना दो महीना मौज जरूर रही।
तभी एक चमचमाती कार से फिल्मों की हीरोइन उतरी तो पेड़ों पर लटकी त्रासदी की शिकार प्रेतात्माएं झूम उठीं। वे तो बड़ी देर से इस हीरोइन का इंतजार कर रही थीं। ज्यों ही हीरोइन ने गाड़ी से अपने कदम जमीन पर रखे तो सारा पंडाल तालियों से गूंज उठा। लगा भीड़ त्रासदी में हताहतों को श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं , हीरोइन के दर्शन के लिए इकट्ठी हुई हो। नेता जी हीरोइन के गले लगे तो जन्नत मिली।

श्रद्धांजलि आयोजन के संयोजक ने हीरोइन के हाथ में चार फूल धरे तो हीरोइन के हाथों का हल्का सा स्पर्श पा वह भी भवसागर पार हुआ।

हीरोइन ने मंद मंद चल मंच पर त्रासदी के हताहतों के प्रतीक रूपी बुत के आगे फूल पूरे फिल्मी स्टाइल में चढ़ाए तो श्रद्धांजलि देने आए लोग तो लोग, श्रद्धांजलि कार्यक्रम देखने आई पे्रतात्माएं भी अपनी प्रेत योनि को भूल कुलांचे भरती हुई प्रेतलोक को बिना किसी डर के सपनों में खोई वापस लौट गईं इस आस के साथ कि अगले साल इस बहाने सरकार इससे भी खूबसूरत हीरोइन के दर्शन करवाएगीे। यार, मजा आ गया,कसम से। मेरा भी सरकार से आग्रह रहेगा कि वह अगले श्रद्धांजलि समारोह में अच्छी सी हीरोइन को विशेष अतिथि के रूप में लाए ताकि प्रेत होने का मजा बना रहे। राहत राशि जाए भाड़ में।

अशोक गौतम
गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Sunday, November 29, 2009

एक डिस्टर्ब्ड जिन्न

रात के दस बज चुके तो मैंने चैन की सांस ली कि चलो भगवान की दया से आज कोई पड़ोसी कुछ लेने नहीं आया। भगवान का धन्यवाद कम्प्लीट करने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई, एक बार, दो बार, तीन बार। लो भाई साहब, अपने गांव की कहावत है कि पड़ोसी को याद करो और पड़ोसी हाजिर। खुद को खुद ही गालियां देते हुए दरवाजा खोलने उठा कि यार ! ये किस मुहल्ले में आकर बस गया तू? जहां के आदर्श जनों को ये भी शऊर नहीं कि कम से कम मांगने तो टाइम से आ जाना चाहिए। दरवाजा खोला तो पहचानते देर न लगी। सामने जिन्न! हवा निकल गई। बड़ा चौड़ा होकर उठा था कि पड़ोसी को वो झाड़ूंगा! वो झाड़ूंगा कि सात जन्मों तक मांगना भूल जाएगा । पर सामने जिन्न देखा तो बरसों से याद हनुमान चालीसा एकदम भूल गया।
‘नमस्कार सर!’ उसने ऐसे दोनों हाथ जोड़े जैसे चुनाव के दिनों में वोट मांगने वाले जोड़ते हैं।
‘कौन?? अलादीन का जिन्न? मैं मन ही मन खुश हुआ कि चलो अब अपने दिन भी फिरे।’
‘नहीं सर!’
‘तो कौन सा जिन्न? आलू-प्याज जिन्न?’
‘नहीं सर!’ उसने चेहरे पर ऐसी मुस्कराहट बिखेरी जैसी कभी विवाह से पूर्व अपने चेहरे पर हुआ करती थी।
‘तो चीनी-पत्ती जिन्न?’
‘सर नहीं! वह तो आपके पड़ोस वालों के घर डेरा जमाए बैठा है।’
‘सब्जी-भाजी जिन्न?’
‘नहीं सर!’
‘आटा-दाल जिन्न?’
‘नहीं, साहब नहीं!’ कह उसने अपना सिर पीटा। बडी दया आई मुझे यह करते उस पर। जिस देश में जिन्न की यह दशा हो वहां आम आदमी की क्या दशा होगी? पर यहां है ही कौन जो इस बात का अंदाजा लगाए।
‘तो यार अब ये नया जिन्न कहां से आ गया? अच्छा तो मुर्गीदाना जिन्न?’ मैंने जिन्नों के भार तले दबे दिमाग पर थोड़ा और भार डाल करंट जिन्न याद कर पूछा।
‘नहीं।’ अबके वह मुस्कुराया। मेरी हालत पर ही मुस्कराया होगा। अपनी हालत पर तो यहां कोई नहीं मुस्कराता। और वह तो ठहरा जिन्न।
‘तो जिन्ना का जिन्न?’
‘उसे तो सोए हुए फिर बड़े दिन हो गए। वाह! क्या कमाल का जिन्न था! जागा। पार्टी के कई कभी न सोने वाले बंदों को गहरी नींद सुला फिर सो गया।’
‘तो बाबरी मस्जिद का जिन्न?’
‘नहीं।’
‘तो मेरे बाप हो आखिर कौन से जिन्न? क्या ये देश अब जिन्नों के अधीन ही होगा? क्या इस देश पर क्या अब जिन्न ही राज करेंगे?’
‘नहीं भाई साहब! भीतर आने को नहीं कहोगे? ठंड लग रही है। बुरा न मानों तो भीतर चाय का कप भी हो जाए और बात भी। मैं परेशान करने वाला जिन्न नहीं, परेशान हुआ जिन्न हूँ।’ कह वह भीतर झांकने लगा।
‘देखो जिन्न साहब ! आप मेरे यहां गलती से आ गए हैं शायद! ये कब्रिस्तान नहीं। वार्ड नंबर 14 का हाउस नंबर 125 है।’ कह मैंने दरवाजा बंद करना चाहा तो उसने दोनों हाथ एकबार फिर जोड़े। बड़े दिनों बाद अपने सामने किसी को हाथ जोड़े देखा तो अपना मन लबालब दया से भर आया घोर सूखे के बावजूद भी। और मैं न चाहते हुए भी उसे भीतर ले गया। जितने को मैं चाय बना कर लाया तब तक वह हीटर सेक काफी चुस्त हो चुका था। जिन्नों के बारे में जो अब तक मेरी राय थी बदलते देर न लगी। मैंने चाय की चुस्की ले चुटकी लेते पूछा,‘अच्छा तो एक बात बताओ.....’
‘पर ये मत पूछना कि लूटमार कब खत्म होगी। और जो चाहो पूछो।’ कह उसने गहरी सांस ली। लगा बंदा लूटमार का शिकार हो ही ज्यों जिन्न बना हो।
‘ये जिन्न बोतल से बाहर आते कैसे हैं? जबकि बोतल के ढक्कन पर देश के अति जिम्मेदार लोग जमे होते हैं।’
‘अपराधी जेल से बाहर बिना ताला खुले कैसे आते हैं? और ये तो जिन्न हैं जिन्न! आका ने हुक्म दिया तो आ गए। किसीको मरवा गए तो किसीको संजीवनी पिलवा गए। सरकारी फाइलों और सरकारी पाइपों की लीकेज आजतक कोई रोक सका? असल में ये हमारी फाइलों और पाइपों का वंशानुगत मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट है। कुछ समझे?’ हालांकि मैं कुछ न समझा था पर अपने को बुद्धिजीवी घोषित करने के लिए मैंने उसके आगे सहज मुंडी हिला दी,‘ तो तुम किस किस्म के जिन्न हो?’
‘मैं तो आपजिओं का सताया जिन्न हूं।’
‘मतलब!!!’
‘ आपजिओं ने अब तो कब्रिस्तान को भी हथियाना शुरू कर दिया है। अब वहां रहें तो कहां? तुम्हारे मुहल्ले में कोई कमरा किराए के लिए खाली हो तो... किराए की चिंता नहीं। बस कोई परेशान करने वाला न हो। कम से कम मरने के बाद कौन चैन से रहना नहीं चाहता?’ मित्रो! पहली बार एक परेशान जिन्न देखा, वरना आजतक संसद और फुटपाथ वालों दोनों को ये जिन्न परेशान करते रहे।


-अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Tuesday, November 24, 2009

आपका पेट फल

मेषः- आपने जो कुछ पिछले कई महीनों से पेट काट कर जमा किया है अब उसे मन मसोस कर आटे दाल पर खर्च करना ही होगा। आपको भीतर ही भीतर किसी मेहमान के आने की चिंता हर पल सताएगी। इस चिंता के कारण न तो आप दिन में जागे रह सकेंगे और न ही रात को घर वालों को चैन से सोने देंगे। गणेश जी का कहना है कि घर में खर्च को देखते हुए संयम बरतें नही तो घर में हंगामा हो सकता है। उपाय- पीपल को रोज सुबह पानी चढ़ाएं।

वृषः- चाह कर भी आप अपने घर आने वाले मेहमानों को टाल कर भी नहीं टाल पाएंगे। असल में उनके अपने घर में आटा दाल खत्म हो चुके हैं। जितना वे पड़ोस से बेशरम बन ले सकते थे, उतना ले चुके हैं। कुल मिलाकर उनके पास अब आपके घर आने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा है। इसलिए गणेश जी का कहना है कि जैसे भी हो उनको झेलें। उपाय- कुत्ते को रोटी दें।

मिथुनः-बढ़ती महंगाई को देख कर अब आपकी भी रिश्वत लेने की योजना सिरे चढ़ेगी। आपके साहब आपसे अपने लिए लंच न लाने पर नाराज हो सकते हैं। इसलिए गणेश जी का कहना है कि किसी अनहोनी से बचने के लिए आप अपने लिए लंच भले न ले जाएं पर साहब के लिए लंच जरूर ले जाएं। जिसकी आपने कई दिनों से गलत फाइल रोक रखी है वह आपके घर उल्टे पांव कुछ लेकर आने वाला है। जो कुछ दे, निःसंकोच ले लीजिए। उपाय- फिलहाल मौज करें।

कर्कः- औरों की जेब पर आप सपरिवार डट कर मौज मस्ती करेंगे। गणेश जी का कहना है कि आपका मंगल केंद्र में होने से लग रहा है कि आपकी सास आपको किचन का सारा सामान लेकर आएंगी और आपका पूरा महीना भरपेट खाकर कटेगा। उपाय- अपने पेट का ध्यान रखें।

सिंहः- आप अबके भी महंगाई से उबरने की बहुत कोशिश करेंगे पर गणेश जी साफ देख रहे हैं कि कुछ न कर पांएगे। सब्जी खाने से आपका पेट खराब हो सकता है। बच्चों के लाख कहने पर भी उनके साथ बाजार न जाएं। वे आपको केक खाने के लिए परेशान कर सकते हैं और आपके पास पैसे न होने के कारण आपको कलंकित होना पड़ सकता है। उपाय- कौवे का काग बलि दें।

कन्याः- आप सरकारी टूअर पर रहेंगे जिससे आपका पेट तो भर जाएगा पर घर के बाकी जनों को पड़ोसी के घर से आई तड़के की बास से ही प्रसन्न होना पड़ेगा। गणेश जी का कहना है कि माना आपने कई महीनों से मदिरा पान नहीं किया है सो आपका मन कर सकता है पर भलाई इसी में है कि मदिरा के पैसों से घर में बच्चों के लिए मिठाई ले आएं। उन्हें भी लगेगा कि उनके पापा सरकारी टूअर से आएं है। उपाय- साहब को कोई अच्छा सा गिफ्ट दें।

तुलाः- किचन के डिब्बे खाली देख आप खालीपन और निराशा का अनुभव कर पत्नी को पतिआने की असफल कोशिश यह कह करेंगे कि ये महंगाई और अधिक दिन जिंदा रहने वाली नहीं। सपने में ही फल मेवों के दर्शन होंगे। गणेश जी कहना है कि बीवी बच्चों को कुछ दिन उसके मायके भेज दें। भले ही बच्चों को स्कूल से एबसेंट करवानी पड़े। उपाय- मलका का दान करें।

वृश्चिकः-पड़ोसी का आप पूरा लाभ लेंगे। आप उसे जैसे चाहे खाने में महारत रखते हैं। इसलिए आपको कितनी भी महंगाई क्यों न हो जाए चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं। वैसे भी आप जब ते कुंआरे हैं, गणेश जी का कहना है तब तक आपके वारे न्यारे हैं। उपाय- जब तक कुंआरे हैं आपको कुछ करने की जरूरत नहीं।

धनुः-आप सब्जियों की परेशानियों के चलते अकेला रहना पसंद करेंगे । हो सकता है आपके मन में यह सुविचार भी आएं कि आपने विवाह क्यों किया। हो सकता है महंगाई को देख आपका मन वैराग्य की ओर भी प्रवृत हो। गणेश जी का कहना है कि आप अब शिली के बदले ईश्वर की शरण में अधिक समय बिताएंगे। शुभ रंग- अरबी का।

मकरः- आपका गुजारा हाथी की चाल चल रहा है। भगवान की दया से विभाग भी आपको अच्छा मिला है। पड़ोसी आपके घर से बासमती चावलों की खुशबू को सूंघ परेशान रहते हैं और इनकम टैक्स विभाग को भी सूचित करने की योजना बना रहे हैं। गणेश जी का कहना है कि कुछ दिन के लिए बासमती चावल बनाना बंद कर दें। वरना बुरा होते देर नहीं लगती। उपाय- शुद्ध देसी घी के दीए जलाएं।

कुंभ- आप घर में फल लाने में कामयाब होंगे। चीनी लाने के मामले में आपको अबके खुशी मिलेगी। इससे परिवार में आपका कद ऊंचा होगा। गणेश जी का मानना है कि बादाम छवारे लाने के लिए आपको कठोर निर्णय लेना पड़ सकता है। बच्चों द्वारा पुराने दिनों को याद करने पर आपको उनके विरोध का सामना करना पड़ सकता है। उपाय- सूखे नलके पर रोज सुबह चाय पिए बगैर जल चढ़ाएं।

मीनः- आपकी पत्नी रोटी बनाने के पुराने तरीकों को बचत वाला टच देगी। कम खर्च में वह अधिक जायकेदार भोजन बनाने की कोशिश करेगी ताकि आप महंगाई के नियंत्रण में रह सकें। गणेश जी का कहना है कि पड़ोसी द्वारा आपको सपरिवार अपने घर डिनर पर बुलाने के भी पूरे योग बन रहे हैं। आपको पिछले सारे बैर भुलाकर जेब के हित में दो दिन व्रत रख जरूर जाना चाहिए। उपाय-इधर उधर से उधार लेना शुरू कर दें।

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Friday, November 20, 2009

महंगाई नियरे राखिए,संसद कुटि छवाई


अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद । स्रोत- केगलकार्टून्स । अनुवादक- शैलेश भारतवासी

महंगाई में बंस गरीब का, हो गई अब कमाल। राम रहीम को छोड़ के, घर में सब बेहाल। थाली घर घर में फिरे, जीभ मरी मुख माहीं। दाल भात चहुं दिसि दिखे, पर पेट तो कछु नाहीं। जो दाल दे रोटी दे, मुझे तो वही सरकार। अब तो मूली के पत्ते भी, हो गए पहाड़। जान गवाय रोटी मिले, हर कोई लेए गवाए। दो रोटी जिसे मिले, अब वही स्वर्ग को जाय। कंट्रोल रेट सब झूठ है, मत भरमो जग कोय। चोर बाजारी किए बिना, यहां साध न होय।

डिग्री लिए रोए जग मुआ, नौकरी मिलि न कोय। मूंगफली जो बेच रहा, अब सोई पंडित होय। रेता र्इंटा चोरी के, दो कमरे लिए बनाय। तां चढ़ी बंदा बांग दे, पर रोटी कहां से पाय। दिन भर रोजा रखत है, राती भी कुछ न खाय। अब तो हर पल दिखत है, सबको बस खुदाय। रामू ‘यामू सलमान अब, क्या बाजार को जाई। सारा दिन मंते घूमे, सब खाली झोला आई। बकरी खाती गंद है, ताकि काढ़ी खाल। जो जनता को खात है, वो हो रहे तालो ताल। पेट में रोटी, रोटी में पेट, देखे जो वो ही ग्यानी। भूखा पेट रोटी में समाए, यह तत कहत है रानी।
मनवा चीनी में लिपटा, पंख घी लिपटाय। हाथ मले और सिर धुने, सरकार चुप रही जाए। आंखड़ियां झाई पड़ी, सब्जी निहारी निहारी, जीभड़िया छाले पड़े, दूध पुकारि पुकारि। बहुत दिनन से देखती, बाट तुम्हारी पनीर। फाकों से मुक्ति मिले, तो अमर हो ये सरीर।

जनता खड़ी बाजार में, लिए थालियां हाथ। जिसके घर रोटी मिले, ले जाए सबको साथ। हे प्रभु इतना दीजिओ, मेरा परिवार पल जाए। पड़ोसी भाड़ में जाए, साधु भाड़ में जाए।
सपने में रोटी मिली,सोबत दिया जगाय। आंखिन खोली तो क्या देखा,घर रोटी को हाय। बहुत दिनन से जोवता, बाट तुम्हारी लंच। जीभ तरसे तुझ मिलन को, मारे महंगाई के दंश। चोट सतानी महंगाई की,अंग अग जरजर होई। हंसने वाले हंस रहे, जनता मरी रोई रोई। रोटी रोटी न कहो, रोटी वाले बेईमान। जा पेट रोटी संचरै, वही यहां सुलतान। जो रोऊं तो जग हंसे, हंसों तो पेट दुखाई। अब तब तक मन में रोना है, जब तक कम न हो महंगाई। कै जनता को मार दे, या कम कर दे महंगाई। अब ये पेट की आग और, मुझसे सही न जाई। भूखा सारा देस है, क्या खावै क्या सोवे। आटा लाया जत्न से , बच्चे दूध को रोवै।

जनता को उपवास भाया, अब करे निरंतर उपवास। सिवाय रूखे सूखे के, कुछ नहीं उस के हाथ। आया था इस देस में, खाने को बहुरूप। आ कर यहां पर फंस गया, सब जगह भूख ही भूख। अरहर से कल मिला, लाहौरिया भरपूरि। सकल पाप देखत गए, ज्यों सांई मिला हजूरि। अल्लाह को था ढूंढता, कल चानक मिलिया आई, सोचा था उसको खाऊंगा, पर उसने मेरी खाई। मार्किट में हाहाकार, जीव जीव भटकाहिं, छिलके वाले छिलके चुगै,मटरों से नजर चुराहिं। निम्न वर्ग समाज का, रटे कंटरोल कंटरोल,वो क्या जाने बेचारा, क्या सत्ता को झोल। जनता कुत्ता सरकार की,गली गली भटकाए। गली वाले भी खुद बेचारे, और गली में जाए। बंदे ये जग बाजार का, खाला का घर नाहीं। कीमत दे माल ले जा, तब घर में चूल्हा जलाहीं।

रोटी न रिश्ते उपजै, रोटी तो हाट बिकाहीं। लालू पालू जेहि रूचै, नोट दे ले जाहीं। ऐसा मिला न कोय जो,घर आए को दे खिलाए। घर आए साधु तो अब , दरवाजा खुद बंद हुई जाय । महंगाई महंगाई करे मरे , हर मानुस की जात। स्वर्ग में खाएंगे, क्या दाल क्या भात। खिलावन वाले तो मुए, मुए अब खावनहार। सौ सौ ढाबे थे जहां, अब जमा घटाकर चार। साधु आप ही खाइए, और न खिलाइए कोय। आप खाए सुख उपजे, और खिलाए दुख होय। हाट बाजार ह्वै ह्वै गया ,केती बार गरीब। हर बार वहां बिकती देखी, उसने एक सलीब। हम घर बांधा आपणा, अब चूल्हा चैका बंद। न जीने का अधिकार उसे , जेब हो जिसकी तंग। जिनि वोट पाए ते जिए, वोटर अब चालनहार। उनते पाछै पूंगरे, संभलें वे करतार।

महंगाई नियरे राखिए,संसद कुटि छवाई। बिन दवा बिन दारू कै, पेट रहे सफाई।


अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

Wednesday, November 11, 2009

नो हींदी नो हींदी नो हींदी!!

अब आप को अपणे बारे में क्या क्या बताऊं? बस इतणा जाण लेओ कि मैं अपणी जिंदगी में जो कुछ भी आज तक बणा दुर्घटणावस ही बणा। मैं पति नहीं होणा चाता था। पर हो गया ! मैं चोर होणा चाता था पर मास्टर होणा नहीं चाता था। वो तो चुणाव में अपणे नेता जी के पोस्टर लगाए, और बो बदकिस्मती से चुणाव जीत गए और उण्होंणे मास्टरी की नौकरी का पेपर लीक करवा मेरे हाथ सौंप मुझे अपणे कर्ज से मुक्त किया। उस वक्त मैंणे उणसे कहा भी था,‘ नेता जी! मुझे पटवारी बणा दीजिए, मुझे पुलिस में भर्ती करवा दीजिए पर मास्टर तो मत बणाइए। मुझे पढ़णे पढ़ाणे से बहुत डर लगता है।’ तो वे मंद मंद मुस्कराते कहे थे,‘बचुआ आज हर नौकरी में रिस्क है। कुछ खाओ भी णहीं तो भी जणता शक की नजर से देखे है। और मास्टर हो के जो मण कहे करो, कोई कुछ नहीं कहणे वाला। देश निर्माता का फट्टा माथे पे लगाओ और मौज मणाओ।

और उणके आशीर्वाद से प्राइमरी स्कूल का मास्टर हो गिया। सच्ची को मास्टर होणे के आज की डेट में बहुत फादे हैं। गांव वाले सबकुछ फ्री में दे जाते हैं और हम भी मास्टरी का प्रसाद समझ मजे से खा लेते हैं। भगवाण उण नेता जी को स्वर्ग दे जो मेरी पुकार सुण रहा हो। ण वे चुणाव लड़ते, ण मैं उणके पोस्टर लगाणे के लिए दिण रात एक करता और ण वे मेरी भक्ति पर प्रसण्ण हो मास्टरी का पेपर लीक करवा मुझ तक पहुंचाते और ण मैं आज मास्टर शब्द अंग्रेजी तो अंग्रेजी हींदी में भी गलत लिखणे वाला मास्टर हो पाता।

आज तो साहब हम बड़ों बड़ों को पटखणी देते हैं और सीणा चैड़ा कर कते हैं कि है कोई पूरे विभाग में अपणे जैसा मास्टर कि जो स्कूल टाइम में ही स्कूल के पीछे जुए वालों को जमाए, बच्चों को सारा साल कुछ ण पढ़ाए पर परीक्षा में अपणे हर बच्चे को फस्र्ट क्लास में पास कराए!

जबसे स्कूल में सरकार की खिचड़ी चली है अपणे तो साब चांदी है। सारा दिण बच्चों का पूरी लग्ण से खिचड़ी पकाते हैं , पहले खुद खाते हैं फिर बच्चों को खिलाते हैं और जो बच जाती है उसे घर में शाम को बीवी बच्चों को ले जाते हैं। अब अकेला मास्टर स्कूल में क्या क्या करे? खिचड़ी का हिसाब, बच्चों का हिसाब, ऊपर से हिसाब का हिसाब!

बच्चों के मा बाप मुझसे बहुत खुश है। कहते हैं,‘क्या हुआ जो कुछ णहीं पढ़ा रहा है, बच्चे तो कते हैं कि स्कूल मास्टर खिचड़ी उणकी माओं से कई गुणा स्वाद बणा रहा है। बिणा पढ़ाए ही बच्चों को पूरे इलाके में फ्रस्ट ला रहा है। ऐसे में ये पढ़ाए तो इसके पढ़ाए बच्चे पता णहीं क्या तबाही मचाए। हमारे स्कूल में मास्टर जी णहीं, मास्टर जी के वेश में कोई जादूगर हैं आए। भगवाण करे ये मरणे के बाद भी यहां से ण जाए। ’ खिचड़ी बणाणे में पूरे विभाग में कोई मेरा साणी णहीं। मैं बच्चों को सारा दिण डटकर खिचड़ी खिलाता हूं और कभी कभार जो खिचड़ी का माच ण लगा होवे तो उण्हें अंग्रेजी उण्हीकी जबाण में पढ़ाता हूं।

कल सुणार का लड़का रोता हुआ आया तो मैंणे उससे पूछा,‘ रो कयों रा है? कल क्या खिचड़ी में मिर्च ज्यादा थी?’
‘णाहीं।’
‘तो क्या नमक ज्यादा थिया?’
‘णाहीं।’
‘तो क्या खिचड़ा खा खा के कब्ज हो गया?’
‘णाही!’
‘तो क्या आज खिचड़ी वाली थाली किताबों के साथ घर भुल आया?’
‘णाहीं। गुरू जी! मारोगे तो णाहीं?’
‘ णाही! खुल के बोल,अरे पगले जब हमणे कूछ करवाए ही णाहीं तो मारेंगे काहे।’
‘मैं हींदी बोलणा चाहे हूं।’
‘का करेगा हींदी बोलके? अपणी बोली बोल अपणी। हुणा जिणा है जो! हींदी तेरे बाप ने बोली?’
‘णाही!’
‘तेरे मास्टर णे बोली?’
‘णाही।’
‘तो तेरे को हींदी बोलने का दौरा कहां से आ पड़ा रे? पिटेगा हींदी बोलेगा तो, सड़क में भी और संसद में भी। टांग बाजू तुड़वाणे का जादा सौक है तो जा कबड्डी खेल आ, दंगा कर आ पर हींदी मत बोल। हींदी के दिण आजकाल बुरे चले हो रे बिटुआ। मास्टर का कहणा माण और जा अपणी थाली धो कर ला, खिचड़ी तैयार है। ’
‘पर हींदी हमार रास्टर भासा है ण?’
‘कौण कहे है रे देसभक्त?? जा णहीं तो तेरे बाप से कहे दूंगा कि तेरा बेटा आजकाल बिगड़ रहा है। ऐसी उटपटांग भासा सीखेगा कहेगा ण तो कहीं का ण रहेगा। तू बड़ा होकर बड़ा बणणा चाहे हो ण?’
‘हा।’
‘ तो सबकुछ सीख पर हींदी ण सीख। हिंदुस्थान में सबकुछ बोलते हैं पर हींदी हुींदू णहीं कहते। समझा!’
‘ णा। समझा हो माटर समझा।’

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Saturday, November 07, 2009

व्यंग्य- यार, बाजार गया था!!

दफ्तर में आज भी बैठने को मन नहीं किया सो दोपहर को बिन छुट्टी दिए घर आ गया। दफ्तर में रहता तो भी कौन से पहाड़ उल्ट देता! दफ्तर में मुझे देखते ही बंदे तो बंदे, अब तो फाइलें भी थर्र-थर्र कांपने लगती हैं। मुझे देखते ही काम करवाने आए वालों की तरह इन्हें भी छुपने को जगह नहीं मिलती और लाख कोशिश करने के बाद भी महीनों-महीनों चपरासी को नहीं मिलतीं। दफ्तर में अब सीनियर बंदा हो गया हूं। इसलिए अवकाश देने से ऊपर उठ चुका हूं। दफ्तर से आकर अभी जूते भी नहीं खोले थे कि मुहल्ले में हलचल कुछ अधिक ही होती लगी। सभी थे कि वर्मा के घर की ओर दौड़े जा रहे थे। घरवाली भी बदहवास सी लगी।
मैंने न चाहते हुए भी पूछ लिया,‘ क्या बात हो गई? ये मुहल्ले वाले कहां जा रहे हैं?’
‘वर्मा के घर।’
‘क्यों? क्या हो गया ऐसा वहां कि....’ फरलो का सारा मजा किरकिरा हो गया। नहीं तो आते-आते सोचा था कि आज तो टीवी के आगे मजे से पांच बजे तक पसरा रहूंगा।
‘ कह रहे हैं कि उन्हें कुछ हो गया।’ न चाहते हुए भी मुहल्ले की मर्यादा को बचाए रखने के लिए वर्मे के घर की ओर देखा ही था कि सामने चारपाई पर पांच-सात जनों के पीछे आठ दस किसी को उठा कर हमारे मुहल्ले की ओर आते दिखे तो मन कुछ कांपा। यार वर्मे को सच्ची कुछ हो गया होगा तो संडे को ताश खेलने वाला चौथा कहां से आएगा? बिल देने के लिए घंटों लाइन में खड़ा कैसे होऊंगा? बेचारा कितना नेक बंदा था! कोई भी काम बता दो, कभी न नहीं करता था। भाई साहब, आप रहते होंगे मुहल्ले में प्रेम के लिए। मैं तो स्वार्थवश मुहल्ले में तो मुहल्ले में, अपने घर रह रहा हूं। अगर मुझे किसी की जरूरत न होती तो बाप की कसम! मुहल्ले में रहना तो दूर, मुहल्ले की ओर देखता भी नहीं। बाय गॉड! मुझे पता नहीं एकाएक शरम कहां से आई कि मैं वर्मे के घर चला गया। वहां उस आंगन में मुहल्ले वालों को रेला देखा तो परेशान हो गया। लगा जैसे सभी उसके मरे होने के इंतजार में रोने की रिहर्सल कर रहे हों। असल में क्या है न कि मैं आजतक औरों को परेशान देख कर कभी परेशान नहीं हुआ बल्कि औरों की परेशानी से अपने आराम को परेशान होते देख ही परेशान होता रहा हूँ।
‘क्या कहीं गिर गए थे?’
‘नहीं। उनके सिर की तरफ लगे ने मुँह में कुछ बड़बडा़ते कहा। वर्मा बिल्कुल शांत चारपाई पर पड़ा हुआ। औरों के कंधों पर चढ़ने का मजा ही कुछ और होता है! चाहे मरने पर ही यह मौका क्यों न मिले।
‘ तो क्या कहीं गाड़ी गुड़ी से टकरा गए?’
‘नहीं।’ उनके पांव की ओर लगे ने हँसी रोकते हुए कहा।
‘तो दफ्तर में किसी से हाथापाई तो नहीं हो गई?’ अब जनता पगलाने भी लग गई है भाई साहब। घर का सारा गुस्सा हम ईमानदार कर्मचारियों पर उतारने लगी है। चाहती है दो टूटे हाथों से सौ हाथों का काम करें। साले रिश्वत के चार पैसे क्या हाथ में रख देते हैं, सोचते हैं बंदा गुलाम बना लिया। अरे भैया! ये तो साला रिश्वत का खून मुंह लग गया है, वरना हम तो न काम करते और न रिश्वत ही लेते।
‘नहीं। थोड़ा हाथ दो।’
‘यार! माफ करना। मैंने तो आज तक दफ्तर में भी कलम तक नहीं उठाई तो इस बंदे को कैसे उठाऊंगा? आखिर इन्हें हुआ क्या??’
‘होना क्या यार! बाजार गया था।’ वर्मे ने चारपाई पर पड़े हुए संवेदनाएं बटोरना शुरू किया। उसे उठाने वाले बंदे किराए के थे सो चुप रहे। मुहल्ले वाले होते तो उसे गिरा कर कभी के जा चुके होते।
‘तो क्या वहां लाला से हाथापाई हो गई?’
‘नहीं।’ उसने करहाते हुए कहा।
‘तो??’
‘तो क्या! प्याज को छुआ भर था कि साले ने ऐसी दुल्लती मारी.. ऐसी दुल्लती मारी कि... चीनी को प्यार से देखा भर ही था कि चीनी ने गाल पर तड़ातड़ घूंसे दे मारे। गाल सहलाने ही लगा था कि दाईं ओर से काले कलूटे माश से अचानक नजर मिल गई। फिर क्या था! माश ने आव देखा न ताव। बाजू ही मरोड़ दी। इससे पहले कि मैं संभल पाता आलू पर गलती से हाथ पड़ गया। बस फिर क्या था! आलू ने सिर पर टचाटच लगा दी। उसके बाद क्या हुआ! मुझे कुछ पता नहीं। बस! मैं बेहोश हो गया।’
‘अब कैसा फील कर रहा है?’
‘ अब तो भगवान से हाथ जोड़ यही विनती है कि वह मुझे श्मशान भेज दे पर बाजार न भेजे।’ कह वह फिर बेहोश हो गया। सरकार! वर्मे को होश में कब तक ला रहे हो? पानी का बिल भी देना था जमा कराने को उसके पास मुझे तो।

--अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,
नजदीक मेन वाटर टैंक सोलन-173212 हि.प्र.

Tuesday, October 27, 2009

मुहल्ले वालो, मुबारकां!!

वे हाव भाव से पूरे के पूरे सरकारी बंदे ही लग रहे थे। उन पांच में से एक ने कंधे पर एक टूटी कुदाल ली थी तो दूसरे ने बिना हथ्थी का बेलचा उठाया हुआ था। तीन जनों ने पैंट में हाथ डाले हुए थे। उन्होंने गुनगुनाते हुए, कमर मटकाते हुए मुहल्ले में एंट्री मारी तो हम मुहल्ले वालों की खुशी का ठिकाना न रहा। लगा सरकार के कान पर जूं रेंग गई है। हम तो मान बैठे थे कि कि सरकार के पास और तो सबकुछ होता है पर कान नहीं होते। छः महीने से मुहल्ले की इकलौती स्ट्रीट लाइट खराब है। पचास बार शिकायत दर्ज करवा चुके थे। कुछ नहीं हुआ। चार महीने से मेन सिवरेज पाइप टूटी हुई है। जो भी कोई मुहल्ले से बाजार जाता कमेटी के दफ्तर जा शिकायत कर आता। कुछ न हुआ। वैसे तो मुहल्ले के हर घर में ही सरकार ने नल लगवाया हुआ था पर पानी सार्वजनिक नल में ही आता था। पंद्रह दिन से वह नल भी बच्चे की शू शू की धार पर उतर आया था। बारीनुसार कमेटी में शिकायत करने गया तो वहां पर कुर्सी तोड़ते बंदे ने डांटते कहा,‘ यार! तुम लोगों को कोई और काम भी है या नहीं!’
‘क्या मतलब?’
‘ माडल मुहल्ले से ही हो न?’
‘हां जी!’
‘मैं तो देखते ही पहचान गया था।’ कुछ देर हँसने के बाद वह आगे बोला, 'कहो किस चीज की शिकायत दर्ज करवानी है बिजली की?’
‘ नहीं, वह तो चार महीने पहले करवाई थी। अब शिकायत लिखवा लिखवा कर थक गए।’
‘तो गंदगी की?’
‘थक हार कर अब हम खुद ही मुहल्ले को साफ करने लग गए हैं।’
‘वैरी गुड यार! लगता है समझदार हो रहे हो। अगर व्यवस्था को इसी तरह सहयोग दो तो न कठिनाई तुम्हें हो और न हमें। तो सीवरेज की.....!’
‘नहीं साहब! अब हमने अपने मुहल्ले में शौच करना बंद कर दिया है।’
‘ अरे वाह! तुम तो हद से ज्यादा समझदार हो रहे हो। अब देखना! तुम भी चैन से रहोगे और हम भी। जीना इसी का नाम है मित्र।’ कह उसने मुझे शादीशुदा प्रेमिका की तरह गले लगा लिया। मैं उसके गले लगते ही उसके कान में फुसुसाया,‘पानी की शिकायत करने आया हूं।‘ मेरे कहते ही एकदम मुझसे दूर हटते बोला, ' बस यार! कर दी न फिर वही बात! आप लोग हो ही ऐसे। नाक में दम करके रखते हो। एक शिकायत निपटती नहीं कि दूसरी लेकर आ धमकते हो। तुम्हें शिकायत करने के सिवाय कोई और काम भी हैं क्या? मालूम है, हमें तो आप लोग दम लेने नहीं दोगे पर कम से शिकायत को तो दम लेने दिया करो। जीना हो तो कुछ और भी करो दोस्त! शिकायत करने से पेट नहीं भरा करते। रजिस्टर ही भरा करते हैं। लो, दर्ज कर दी शिकायत! अब खुश??’
उन बंदों में से एक मेरे पास आया, बोला, ‘दरी होगी?’
‘हां है।’
‘ तो दीजिए।‘ मैं भीतर गया और उसका मुँह देखते हुए दरी उसे पकड़ा दी। उसने दरी ली और मुहल्ले के चबूतरे पर बिछा ताश खेलने जम गए। ग्यारह बजे....बारह बजे ...एक बज गया... दो भी बज गए... वे ताश में ही मस्त रहे। हिम्मत कर मुहल्ले के प्रधान ने उनसे पूछा, ‘माफ कीजिए कहां से आए हो?’
‘कमेटी से।’ उनके कहते ही यह खबर मुहल्ले में आग की तरह फैल गई।
‘नलका ठीक करने आए हो?’
‘नहीं।’ एक ने बालों में उंगलियां देते कहा।
‘बिजली ठीक करने आए हो?’
‘नहीं, चाय बनेगी क्या?’ दूसरे ने अलसाते हुए कहा।
‘तो फिर सीवरेज ठीक करने आए होंगे?’
‘ एक बात बताना? इस मुहल्ले में शिकायतें रहती हैं या बंदे?’ तीसरे ने गुस्साए कहा। शायद ताश खेलकर कुछ ज्यादा ही थक गया था।
‘तो आप किसलिए आए हैं?’ काका में पता नहीं हिम्मत कहाँ से आ गई थी।
‘मुहल्ले के लिए बुत सेंक्शन हुआ है। लड्डू शड्डू खिलाओ यार! बड़ी भूख लगी है। मंत्री जी के आदेश हैं कि मुहल्ले में जगह देखो कि कहां लगाना है। अगले हफ्ते वे बुत का शिलान्यास करेंगे। इस नल की जगह लगा दें बुत? वैसे भी इसमें पानी तो आ नहीं रहा। कि ये बिजली का पोल हटा दें यहां से? लाइट है इसमें?’
‘जी नहीं।’
‘बेकार की चीजें ही भरी हैं क्या यार इस मुहल्ले में?’
‘ साहब! सीवरेज भी बंद है।’
‘इस मुहल्ले के लोगों को खाने और हगने के सिवाय और भी कोई काम है क्या?? चलो यार! चलते हैं अब चार बज गए, बाकी कल देख लेंगे।’
‘ड्यूटी तो पांच बजे तक होती है न सरकार??’
‘चार के बाद पांच ही बजते हैं न? तीन तो नहीं बजते?’ चारों ने बड़बड़ाते हुए एक साथ कहा और ये गए कि वो गए। जाते-जाते मुए झाड़ कर दरी भी नहीं दे गए।

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212 हि.प्र.

Wednesday, October 14, 2009

लक्ष्मी के चक्कर में

.........रात के ग्यारह बज चुके थे। पत्नी द्वारा बार बार पड़ोसियों के द्वार दौड़ाए जाने के बाद अब मैं पूरी तरह थक चुका था। जब भी पत्नी को लगता कि बगल के फलां पड़ोसी के घर से कोई आवाज नहीं आ रही है तो वह झट से चार लड्डुओं के डिब्बे को मेरे हाथ में पकड़ा उस पड़ोसी के घर यह जासूसी करने यह आदेश दे भेज देती कि हे रा के एजेंट! जाकर पता लगाओ कि उनके घर लक्ष्मी तो नहीं आ गई! मैं सहमा हुआ सा दबे पांव पड़ोसी के घर बहाने से घुसता वहां, सूंघता और उस घर में लक्ष्मी की खुशबू न पा मुस्कुराता लौट आता। जब तक मैं अपने घर न आता पत्नी की जान उसके गले में अटकी रहती और ज्यों ही वह मेरे मुस्कुराते चेहरे को देखती तो खुशी के मारे उछल पड़ती।
पड़ोसियों के घर जासूसी करने के लिए स्पेशल आर्डर पर बनवाए चार चार लड्डुओं के तमाम जब डिब्बे खत्म हो गए तो पत्नी ने निराश होते पूछा,‘ अब ??’
‘ अब क्या??’
‘ डिब्बे तो खत्म हो गए। अब?? अच्छा ऐसा करो ...’ कह उसने जिम्हाई ली।
‘क्या करूं अब?? अब बचा ही क्या है करने को??’
‘ लगता है मुहल्ले में किसीके घर भी अभी तक लक्ष्मी नहीं आई है...’
‘ तो???’
‘तुम मुहल्ले के नाके पर चले जाओ और जैसे ही वह आए उसे जैसे भी हो अपने घर ले आना।’
‘ इतनी रात को? अब तो कुत्ते भी सो गए हैं!’
‘ तो क्या हुआ! इसी रात की तो बात है। बस एक बार अबके हमारे घर में लक्ष्मी आ गई तो पूरे जन्म की कंगाली गई पानी में।’
‘पर पानी में तो भैंस जाती है।’ मैंने मुहावरा ठीक किया तो वह झल्लाई। पता नहीं क्यों?
‘ क्या तुम नहीं चाहते कि लाला रोज हमारे घर पर उधार दिया मांगने न आए? क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे पास भी कबाड़ी के बदले ब्रांडेड सूट हो? क्या तुम नहीं चाहते कि तुम भी अपने बेटे को डोनेशन देकर एमबीए कराओ? क्या तुम कबाड़ी से खरीदे कोट में प्रसन्न हो? मेरा क्या! मैं तो जैसे कैसे जी लूंगी। पर मैं नहीं चाहती कि मेरा मर्द.......’ पता नहीं क्यों आदर्श पत्नी के ये कथन सुन मेरा कलेजा पसीज गया और मैं बिन टार्च, डंडे के घुप्प अंधेरी रात में कुत्तों की परवाह किए बिना मुहल्ले के नाके की ओर कूच कर गया।
बड़ी देर तक मुहल्ले के नाके पर दुबक कर बैठा रहा हनुमान चालीसा पढ़ता। पर कहीं से भी किसीके आने की कोई आहट नहीं।
ठंड भी लगने लगी थी कि अचानक किसीके आने की आहट सुनाई दी। मैं चैकन्ना हुआ। आंखों की नींद को लात मार परे भगाया तो देखा कि सामने लक्ष्मी। हाय रे मेरे भाग! सरी ठंड हवा होती रही। सब्र का फल पहली बार चखा।
‘प्रणाम देवि!!’ कह मैं पूरा का पूरा जुड़ गया।
‘कौन???’
‘ मैं, लच्छमी नंद।’
‘यहां क्या करे हो इतनी अंधेरी रात में?पी के गिरे हो?’
‘नहीं,तुम्हारा इंतजार कर रहा था देवि! बड़ी देर कर दी अबके आने में। पड़ोसी तो सो भी गए होंगे। अबके इतनी लेट कैसे हो गईं आप?’
‘मेरा वाहन दिल्ली में मेट्रो साइट हादसे में घायल हो गया था, पैदल आने में देरी हो गई।’ कह देवि ने माथे से पसीना पोंछा।
‘ तो मुझे बुला लेते। मैं आपको ले आता।’ अब पता चला विश्व में मंदी का दौर क्यों चला है?
‘ नहीं वत्स! तुम तो ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ कृति हो। कहां तुम और कहां मेरा वाहन उल्लूक!’
‘नहीं देवि नहीं। मैं देखने में ही लच्छमी नंद हूं। इसलिए मुझे अपने वाहन के रूप में सहर्ष सवीकार कर कृतार्थ करो।’ कह मैं घोड़ा बन गया।
‘ पर तुम मेरे वाहन से कैसे?’
‘देखो देवि! यह जानते हुए भी की लोकतंत्र में मत अमूल्य है और मैं हर चुनाव में चंद लोभों में बिक उल्लू बनता रहा हूं। अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने के बदले अन्याय को चुपचाप सहता रहा हूं। ऐसा उल्लू ही कर सकता है न! घरवाली कहती मर गई कि अब तो बच्चे बड़े हो गए। महंगाई दम ले रही है,। भगवान ने भी रिश्वत लेनी शुरू कर दी है। तुम भी रिश्वत लेना ‘ाुरू कर दो,पर नहीं ले पा रहा हूं। ऐसा उल्लू ही कर सकता है न? न मुझे अपने अधिकारों का पता है और न अपने कत्र्वयों का। अपना दिमाग मेरे पास है ही नहीं। बस, जो घरवाली कहती है उसे ही संसार का अंतिम सत्य मानता रहा हूं। घर में बिजली नहीं होती मैं बिजली वालों से शिकायत नहीं करता। नलके में पानी नहीं आता मैं पानी वालों से शिकायत नहीं करता। लाला कम तोलता है । मैं सरकार के बार बार जगाने के बाद भी सोया खड़ा रहता हूं। सोया ग्राहक हूं न!......... अब अपने उल्लूपने के और कितने प्रमाण तुम्हें दूं देवि??’
‘तो ऐसे उल्लू के घर जाकर मैं करूंगी क्या वत्स??’
‘ तो जाओगी किसके घर देवि!!’
‘ पूंजीपति के। वह मुझे संभालना जानता है।’
उस रात को जो ठंड लगी थी आज भी बीमार चल रहा हूं मित्रो! हजार रूपये की दवा खा चुका हूं। पर ठंड है कि जाने का नाम ही नहीं ले रही।

अशोक गौतम
गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212
हि.प्र.,

Wednesday, September 16, 2009

सर्वे के मुताबिक देश में सिर्फ जानवर बचे हैं...

वे थे तो चार ही सरकारी बंदे पर अब चालीस पर भी भारी पड़ने लगे थे। आधे घंटे तक लगातार खाते रहने के बाद उनमें से एक ने बड़े रौब से दूसरे के पेट पर हाथ फेरते मुझसे पूछा,`जानते हो यहां हम लोग किसलिए आए हैं´

`मुहल्ले वालों को खाने के लिए।´ कहना तो चाहता था पर न जाने क्या सोचकर क्यों चुप रहा।
`असल में हम लोग यहां पर एक पुनर्वास की योजना लेकर सर्वे करने आए हैं।´ दूसरे ने जुगाली करते चौथी बार खाली होती थाली को घूरते कहा तो मुहल्ले के चार पांच जो वहां पर उपस्थित थे उन्हें लगा कि आज उनका खिलाना सार्थक हुआ। वरना आज तक तो पेट को मार-मार कर खिलाते ही रहे और नतीजा.... वहीं ढाक के तीन पात। मुझे भी लगा कि ऊपर वाले ने शायद मेरी मुफ्त की आवाज सुन ली। अब भगवान ने चाहा तो कम से कम मरूंगा तो अपने घर में। वरना आज तक अपनी तीन पीढ़ियों के सोलह संस्कार तो किराए के कमरों में ही हुए। जब भी कोई सस्ता सा पंडित हमारे यहां कोई संस्कार करवाने आता है तो उसके मंत्रों से अधिक जोर से मकान मालिक की पों पों गूंजती है। भगवान से तब मैंने पचासों बार तहेदिल से मन्नत की कि हे भगवान! अगर हमारे पास एक अपना कमरा और रसोई हो जाए तो उसका नाम आपके नाम पर ईश्वर सदन ही रखूं। पर अपने नाम पर अपने पास गुसलखाना भी नहीं हुआ। भगवान ने नहीं सुनी तो नहीं सुनी। हर बार वहां से एक ही बात लौट कर आई कि,`मुफ्त की सभी लाइनें व्यस्त हैं। कृपया थोड़ी देर बाद संपर्क करें। ´ पत्नी ने कई बार कहा भी कि मन्नत में सवा पांच का बांध ही रख लो। हो सकता है नंबर मिल ही जाए। पर साहब , अब क्या रिश्वत एक और केवल एक रास्ता भगवान के पास जाने का है तो रिश्वत के बगैर क्या बचा है। अब लो, वह भी बंद। सच्ची को, अब तो ऊपर वाला भी उस्ताद हो गया है। लगता है उसे भी अब जमाने की हवा लग गई। भारी भरकम जेब वालों की गलत फरियादें तक बिन कहे भी सुनता है। और हम जैसों के गले सूख जाते हैं उसे आवाज देते देते। भारी जेब के आगे कौन नहीं झुकता साहब. भरी जेब में बहुत शक्ति होती है। भगवान से भी कई गुणा अधिक। पैसा बड़ों बड़ों की आंखें फोड़ देता है। तभी तो वह भी उनकी ही कान लगाए सुनता है जिनके पास मन नहीं, भरी हुई जेब हो। झूठ बोल रहा होऊं तो फटी जेब, भरे मन से भगवान को बुला कर देख लो, उनका आना तो दूर किसी मंदिर में उनके दर्शन करने जाकर पंक्ति में खड़े होकर ही देख लीजिए। नोट वालों के तो वे दर्शन करने अंदर से दौडे़ चले आते हैं नंगे पांव। और हम जैसों को पुजारी के माध्यम से भी नहीं खुद ही उनकी ओर से पुजारी गुस्से में कहता है कि अभी भगवान सो रहे हैं। अगर हम जैसे हिम्मत कर पूछ ही बैठें कि कब जैसे जागेंगे तो आग बबूला होकर कहता है,` गरीबों से बहला फुसला कर उनके वोट ले सरकार बन खाने वाले ही जब नहीं जागते तो वे क्यों जागें´

`क्या वे सरकार से बड़े होते हैं" कुछ कहने के बदले पुजारी गालियां देता भगवान के पास जा बैठता है।

`काहे का सर्वे करने आए हैं माई-बाप, गरीबी का या गरीबों का´

` गरीबी और गरीबों का सर्वे बहुत हो लिया यार! सरकार को सर्वे करते करते शर्म आ गई पर न तो गरीबों को शर्म आई और न ही गरीबी को।´

`तो´

हम सर्वे करने आए हैं कि तुम्हारे मुहल्ले में कितने कुत्ते, बिल्लियां, उल्लू , गीदड़ आदि हैं। सरकार उनके पुनर्वास के लिए वचनबद्ध है।
` कह वह प्लेट में से मुट्ठा भर भूनी मूंगफली उठाने के बाद भैंसा हुआ। दूसरा जेब से माचिस की तिल्ली निकाल अपने सड़े दांत कुरेदता रहा। मैं कुछ कहता इससे पहले मुहल्ले के सबसे आदरणीय ने दोनों हाथ जोड़कर कहा,` साहब! हम कुत्ते ही हैं। दिन रात भौंकते रहते हैं। पर चोर हैं कि अपनी सी कर ही लेता है। हम बिल्लियां ही हैं। दिन रात रोटी के लिए लड़ते रहते हैं। पर किसी के हिस्से रोटी को कौर तक नहीं आता। हजू़र! हम गीदड़ ही हैं। सबके खाने के बाद जो जूठन बचती है, उसी पर बरसों से जी रहे हैं। सरकार, हम ही उल्लू हैं। दिन में तो कुछ दिखता नहीं, ‘शायद रात में ही कुछ दिख जाए। इसलिए रात रात भर पैदा होने के बाद से आज तक जाग रहे हैं। क्या सरकार हमें सच्ची को बसाने की सोच रही है´

` हद है यार! ये हम किस मुहल्ले में आ गए.. यहां कोई आदमी भी है क्या´ और वे तयशुदा सर्वे किए बिना ही वहां से चले गए।

हिंदी के साथ कुछ क्षण-
हिंदी हिंदी दिवस आयोजन से एकबार फिर आहत हो अपने लोक लौट रही थी कि अचानक मिल गई। मैंने दौड़ते दौड़ते उससे पूछा,`फिर कैसा रहा हमारा श्राद्ध´

`देसी बरतनों में अंग्रेजी पकवान अच्छे लगे। और वे तुम्हारे इस लोक में पैदा होने के बाद भी अज्ञात रहने वाले हिंदी प्रेमी सचमुच कमाल के थे। अब तो मेरी समीक्षा करते हुए समीक्षक अपना नाम भी छुपाने लगे हैं। वे खाते तो हिंदी हैं पर कै अंग्रेजी में करते हैं। वे मेरे लिए हाय आदरणीय हैं जो आज के दौर में जब कि आदमी नाम के लिए मर रहा है और एक वे हैं कि नाम छुपा साहित्य की समझ तो भूले ही हैं मेरी समझ भी भूले जा रहे हैं। मुझमें किसीकी प्रशंसा करने में वह दम कहां जो अंग्रेजी में हैं। ज्ञात होने के मारधाड़ी दौर में अज्ञातों को मेरा ‘शत-शत नमन!

अशोक गौतम
गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,
नजदीक मेन वाटर टैंक सोलन-173212 हि0प्र0

Thursday, September 10, 2009

अपने-अपने मोहल्ले, अपने-अपने रावण...

अपने बारे में आपको एक बात क्लीयर कर दूं - मैं तुलसीदास स्टाइल का पति कतई नहीं हूं कि श्रीमती गईं मायके और जनाब दो घंटे बाद ही जलने लगे धूं-धूं श्रीमती के वियोग में । झोला उठाया और चल पड़े ससुराल । रास्ते में शव नदी में तैरता दिखा तो बंधु समझे कि श्रीमती ने नदी पार करने के लिए पति परमेश्वर को नाव तैयार रखी है। और हो लिए प्रिया प्रेमी शव पर ही सवार! ससुराल के घर में ऊपर से लटका सांप दिखा तो महाशय समझे कि श्रीमती ने उन्हें अपने शयन कक्ष में आने के लिए रस्सी लटका कर रखी है कि पति को रात को आते वक्त ससुराल वालों को जगाना न पड़े।

अपन तो एक अदद उत्तर-आधुनिक हसबैंड हैं। पत्नी जब-जब मायके जाती है, जश्न मना लेते हैं, चार कुंआरे दोस्तों को घर आमंत्रित कर अपने बीते दिनों को श्रद्धांजलि दे लेते हैं। अभी अपनी शादी को मात्र एक साल भर ही हुआ है,पर लगता है ज्यों सात जन्म से खूंटे बंधा हूं। गले में रस्सी के निशान, हाय रे हाय। ऐसे निशान तो कोल्हू के बैल के गले में भी नहीं पड़ते होंगे भाई साहब!

अबके भी मायके जाने के चिरपरिचित बहाने के क्रम में अपनी ताजी टटकी पत्नी पिछले हफ्ते मायके चली गई। यह कहकर कि त्यौहार है, वह दीपावली के बाद ही आएगी। जाओ भाई! हम भी कौन होते हैं आपको रोकने वाले। हम तो चाहते हैं कि बीच-बीच में थोड़ी खुले में सांस ली जाए। सच कहूं , पत्नी के साथ लगातार रह लूं तो अपना तो अभी से दम घुटने लगा है। धन्य हैं वे जो एक ही पत्नी के साथ सात जन्म काटने का दावा करते फिरते हैं।

पत्नी ने यह खुशखबरी ज्यों ही दी तो मन बाग-बाग हो उठा। मन ने कहा ,`जा बच्चे, इस खुशी में मुहल्ले भर में लड्डू बांट आ। ऐसे मौके अब जिंदगी में बार-बार नहीं आने वाले।´ पर डरा, पत्नी ने गलती से प्रोग्राम कैंसिल कर दिया तो गए न लड्डुओं पर किए पैसे बरबाद! सहमा-सहमा ही सही, पर फिर भी मैं खुश था कि चलो....

......और वह सच्ची को मायके चली गई! मुझे उसके डयोढ़ी पार करते ही भीतर से किसी ने आवाज दी,` सुन ली न भगवान ने तेरी आर्त आवाज! अब तो आस्तिक हो जा मेरे बाप! भगवान किसीकी आवाज सुनें या न सुनें ,पर आदर्श पत्नियों से पीड़ितों की आवाज अवश्य सुनते हैं , भले ही उनकी अपनी आवाज भी न निकल पा रही हो।´

अभी मुहल्ले में बांटने के लिए आने वाले लड्डुओं पर होने वाले खर्च का हिसाब लगा ही रहा था कि अचानक सामने खूंटी पर टंगी श्रीमती की नाइटी पर नजर गई तो पता चला ,नहीं गधे ! तू कुंआरा नहीं, अब शादी-शुदा है । यह बुरा पता चलते ही मन एक बार फिर रोया।

अभी रोई आंखों के आंसू पोंछने की सोच ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई, बचकाना सी। जाहिर था मुहल्ले के बच्चे ही होंगे। कोई पिछले जन्म की प्रेयसी होती तो कोमल सी थाप दरवाजे पर यों देती कि वह दस्तक सीधे मन में उतर जाती।

हंसते हुए अपने वर्तमान के आंसू खुद ही पोंछता उठा। वाह रे वैवाहिक जीवन! अपने आंसू खुद ही पोंछने पड़ते हैं।

दरवाजा खोला तो सामने मुहल्ले के चार-पांच बच्चे। सबने एक साथ कहा,` अंकल! चंदा चाहिए।´

`यार, अभी से चंदा मांगना शुरू कर दिया। देखो, तथाकथित शरीफ घरों के बच्चे सब कुछ मांगते हैं पर चंदा नहीं। शरीफ बापों के बच्चे हो तो चंदा मांगना बंद करो और चुपचाप घर जाकर पढ़ने के बहाने टीवी के आगे डट जाओ। ´

`पर अंकल जब देश ही चंदे पर चला हो तो चंदा मांगना कौन सी बुरी बात है´ सबने एक साथ कहा।

` अच्छा तो चंदा किसलिए इकट्ठा किया जा रहा है´

`सोच रहे हैं अबके हम भी मुहल्ले में अपना रावण बनाते। हर मुहल्ले के तो अपने-अपने रावण हैं। बहुत बुरा लगता है अंकल, जब हमें औरों के यहां दशहरे को रावण जलते देखने जाना पड़ता है।
´ गोलगप्पे बेचने वाले के लाडले ने रूआंसेपन में कहा तो उस पर बड़ी दया आई।

`तो कितना बड़ा रावण बनाना चाहते हो´ मैंने पूछा ।

`सरकारी कालोनी वालों के रावण से बड़ा।
´ टिक्की बेचने वाले के लड़के ने सिकुड़ा सीना फुलाते कहा तो मैं परेशान हो उठा। तभी टेलर मास्टर साहब के लड़के ने बड़ी मासूमियत के साथ पूछा,`पर अंकल! सरकारी कालोनी वालों का रावण हर साल बड़ा ही क्यों होता जा रहा है´

`कालोनी भी तो सरकारी है न, बस इसीलिए।´
बच्चे बड़े होंगे तो खुद समझ जाएंगे। वक्त से पहले बच्चों को बड़ा कर क्यों उनका बचपना खराब करना।

`तो अंकल चंदा दीजिए न!´ एक ने मेरी पैंट खींचनी शुरू की तो न चाहते हुए पैंट में हाथ डालना ही पड़ा। दूसरा मेरे आगे चंदे का डिब्बा ठनकाता रहा।

मैंने यह सोचकर बच्चों को चंदा दे दिया कि शायद इनके जलाने से सच्ची को रावण जल जाए तो जल जाए। वरना बड़ों ने तो दशहरे को जितने रावण जलाए दूसरे ही दिन ठहाके लगाते हुए उससे चार गुणा और समाज में कुलांचे मारते देखे गए।

सच कहूं तो अब मुझे उतनी खुशी पत्नी के मायके जाने की नहीं है जितनी खुशी इस बात की है कि अबके अपने मुहल्ले के पास भी अपना रावण होगा।

बच्चे चंदे का धंधा तो क्या ही करेंगे....

डॉ. अशोक गौतम
सोलन-173230 हि.प्र.

Thursday, August 27, 2009

दाल-सब्जी के दर्शन दुर्लभ हैं यमराज !

कल एक बार फिर महंगाई का सताया खाली झोला थके कांधे पर डाले मुंह लटकाए बाजार से घर न चाहते हुए भी आ रहा था कि सामने वाले मोड़ पर पौराणिक भैंसे पर से उतर गिरते मकान के छज्जे के नीचे खड़े हो यमराज इधर-उधर कुछ देख रहे थे। उनका भैंसा वहीं पास खड़ा चर रहा था या कि विचर रहा था। उसके गले में मेड इन चाइना का सीडी प्लेयर जोश के साथ हनुमान चालीसा उगल रहा था....सब सुख लहे तुम्हारी सरना, तुम रच्छक काहू को डरना। आपन तेज सम्हारो आपै, तीनो लोक हांक ते कांपे। भूत पिसाच निकट नहीं आवै, महावीर जब नाम सुनावै... पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप....
पता नहीं क्यों मैं एकाएक उनकी ओर खिचा चला गया। मुझे उस वक्त न कोई डर न कोई विडर। महंगाई से बड़ा कोई और यमराज होता है क्या! भूख से भी बड़ा कोई और यमराज होता है भाई साहब... क्या भ्रष्टाचार से भी बढ़कर और कोई यमराज होता होगा भाई साहब... क्या बेरोजगारी से बढ़कर भी कोई यमराज होता है क्या! मुस्कराता उनके निकट पहुंचा तो वे डरे-डरे से, सहमे से। मुंह पर कपड़ा बांधे हुए। हद है महाराज! जिनकी वजह से यमराज के पद पर सुशोभित हो उन्हीं की सड़ांध से मुंह पर कपड़ा! देखो यमराज! अगर हम न हों तो आपको भी पूछने वाला यहां कोई न हो। फिर घूमते रहो जितना मन करे भैंसे पर बैठ कर, जहां मन करे। हम हैं, तो आप हैं। आपकी रोजी-रोटी का आधार हम ही तो हैं ,चाहे जैसे भी हों। अब ये शरीर है ही जब सड़ांध का तो क्या करें! जितना हो सकता है पचासियों अभावों के बीच भी इसे बनाकर रखते हैं। मुझे बहुत गुस्सा आ गया। वैसे भी आजकल हम जैसों के पास मंदी के दौर में आसमान छूते गुस्से के सिवाय और कुछ है भी नहीं।

` ये मुंह पर कपड़ा क्यों बांध रखा है हजूर, क्या मौत से आपको भी डर लगने लगा है´ मैंने कहा तो उन्होंने मुंह पर बंधे कपड़े के बीच में से ही बुदबुदाते कहा,` स्वाइन फ्लू यार, प्रीकाशन ले रहा हूं।´

` आपने लाल किले से प्रधान मंत्री को नहीं सुना क्या´

` क्या कहा उन्होंने´

`कहा कि स्वाइन फ्लू से डरने की जरूरत नहीं। पर हम भी अब डरते भी कहां है महाराज! अब आप ही कहो, जिस देश में चारों ओर डर ही डर हो, उस देश में आकर किस किससे डरें अगर ऐसे ही डरते रहे फिर तो जी लिए महाराज! और एक आप हो कि अजर अमर होने के बाद भी स्वाइन फ्लू से इतना डर! जो होना है वह तो होकर ही रहेगा। इसलिए छोड़ो ये प्रीकाशन- प्रूकुशन। यहां तो जितने प्रीकाशन लिए उतने ही फंसे।
´ मैंने परिवार के पालन-पोषण की मार से टूटी कमर पर जरा हाथ रख तनिक सीधा हो कहा।

`तो´

`तो क्या! चलो सामने वाले ढाबे पर चाय पिलाता हूं। मंदी के दौर में अतिथि की इतनी ही सेवा कर सकता हूं। कहां जा रहे हो'

` तुम्हारे मुहल्ले के उस आखिरी ईमानदार को ले जाने आया था। बेचारा अब परेशान बहुत हो रहा है न! पर यार यहां तो...´

`डॉन्ट बी पैनिक महाराज! टेक इट इजी। ये इंडिया है। यहां तो कुछ न कुछ रोज ही चलता रहता है, कभी स्वाइन फ्लू तो कभी वाइन फ्लू तो कभी राइम फ्लू।´


`पर सरकार ने तो कहा है कि किसी सार्वजनिक स्थान पर... घर ले चलते तो वहीं बैठकर

` सॉरी! घर तो मैं आपको किसी भी कीमत पर नहीं ले जा सकता। महीनों से घर में चीनी खत्म है और अब कोई पड़ोसी ऐसा नहीं बचा है जिससे चीनी उधार न ले चुके हों। अब तो मैं सबकुछ छोड़ कई दिनों से आपकी बाट जोह रहा था, आपकी कसम! सच कहूं महाराज, अब तो महंगाई सिर से ऊपर हो गई है। लाला बाजार में दाल को दखने के भी दाम लेने लगा है। बिन पैसे वह दाल को हाथ भी नहीं लगाने देता। सब्जियों के दर्शन किए बिना महीनो हो गए हैं। सच कहूं भगवन! आप के दर्शन करना अब आसान हो गया है पर दाल सब्जियों के दर्शन अब बड़े भाग्यशाली को ही इस देश में नसीब हो रहे हैं। जिसके घर में शाम को दाल सब्जी पक जाए वह अपने को देश का सबसे खुशनसीब मान रहा है। मैं तो जैसे कैसे रोज, बाजार जाकर ही सही दाल सब्जियों के दर्शन कर आता हूं पर पत्नी को घर में बैठे महीनों हो गए दाल सब्जियों के दर्शन किए बिना। कल तो वह सारी लोक-लाज त्याग बिगड़ ही पड़ी,` देखो अगर तुम घर में दाल सब्जी नहीं ला सकते तो कम से कम बाजार ले जाकर मुझे उनके दर्शन ही करा दो तो मैं कुशल गृहणी होने का गर्व तो अनुभव कर सकूं। अगर तुम ये भी नहीं कर सकते तो मैं चली मायके।´ पर महाराज मैंने उसे बाजार ले जाने का वचन नहीं दिया तो नहीं दिया। सोचा, मायके ही चली जाए तो भला। इस बहाने इसके पीछे पीछे ससुराल जा वहां पर दाल सब्जी तो खा आऊंगा। मुझे पता है उनकी भी इतनी हिम्मत नहीं , पर घर में आए दामाद को वे अपनी झूठी हैसियत बताने की कोशिश करेंगे और मैं दाल सब्जी खा अमरत्व को प्राप्त हो जाऊंगा।´

`डॉन्ट बी पैनिक! टेक इट इजी।´
कह उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई, भैंसे के गले में बंधे इंपोर्टेड सीडी प्लेयर का वाल्यूम और भी ऊंचा कर मुहल्ले की ओर हो लिए।

डॉ. अशोक गौतम


गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक
सोलन-173212 हि.प्र.

Thursday, August 20, 2009

कवि की आवाज़ सुन बेहोश हुए यमराज !!

बात की बात! हमारे मुहल्ले के कवि महोदय लौट आए ....

हुआ यों कि पिछले हफ्ते अचानक हमारे मुहल्ले के कवि महाराज हम सबको बिन बताए एकाएक मुहल्ले से कूच कर गए। उनके जाने पर भाभी से ज्यादा कविता ने रो-रो कर अपना वो हाल कर दिया था कि मत पूछो। थक हार कर हमने एक शरीफ सा बंदा जबरदस्ती पकड़ कर कविता के हवाले कर दिया । बंदा बहुत रोया चिल्लाया,`मैं तो क्या, मेरे किसी पुरखे तक ने कभी कविता के साथ एक पल भी नहीं काटा,ऐसे में मेरे साथ क्यों अन्याय कर रहे हो। मुझे मारना ही है तो जहर देकर मार दो। मैं जहर खुशी से पीने के लिए तैयार हूं पर कविता के साथ एक पल भी रहना मुझे स्वीकार नहीं।´ पर मुहल्ले में था ही कौन, जो उसकी सुनता।

चार दिन तक उनकी कविता की चार पंक्तियां याद रहीं और बिजली-पानी का बिल आते ही वे भी भूल गईं। आज के दौर में न कविता याद रखने की चीज है न कवि। आटे-दाल से फुर्सत मिले तो तो कविता याद रहे, कवि याद रहे। आज के दौर में तो कम्बख्त खुद को भी भूलने की बीमारी होने लगी है। कवि तो याद रखने की चीज होता ही नहीं, सो रिश्तेदारों की तरह मुझे वह भी भूल गया। अब औरों की तरह वह भी उसकी पुण्यतिथि को याद आ जाया करेगा, वह भी तब अगर भाभी ने उस दिन कुछ खाने-पीने का इंतजाम कर दिया तो....सच मानिए, अब तो बिना मतलब के मैंने अपने आप को भी याद रखना छोड़ दिया है।

कल सुबह कुत्ते के साथ घूमने निकला ही था कि सामने से गए कवि सा कोई आता दिखा। वैसे ही खांसता हुआ, चालीस का होने के बाद भी वैसे ही साठ का सा कुबड़ाता हुआ। पहले तो मैंने सोचा कि मन का भूत होगा। इस संसार से गए हुओं में से सब लौट कर आ सकते हैं पर कोई कवि भूल कर भी ये भूल करने वाला नहीं। मैं डरा भी, अगर सच्ची को कवि ही होगा तो दस कविताएं सुना कर ही छोड़ेगा। इतने दिनों से किसी को कविता सुनाई नहीं होगी। हो सकता है बेचारा कब्ज से परेशान हो। कुत्ते ने उसे देख भौंकना शुरु किया तो मैं समझ गया कि बंदा तो कोई न कोई है जरूर। मेरे मन का भूत होता तो कुत्ता तो कम से कम न भौंकता।

और वह पूरे का पूरा कवि मेरे बिलकुल सामने। ठीक वैसा ही जैसे वह पंच तत्व में विलीन ही न हुआ हो।
`क्यों राम आसरे भैया कैसे हो, मुहल्ले में सब कुशल तो हैं? घरवाली के चूल्हे पर तवा चढ़ा कि नहीं... किसी रचना-वचना का कोई मनीआर्डर वार्डर आया होगा, क्यों...
कवि ने पेट पकड़े हंसते हुए पूछा तो मेरी तो जैसे घिग्घी ही बंध गई।

`तुम!! तुम यार! तुम तो.....´

`दुनिया मरा करती है भैया! लेखक नहीं। मुहल्ले के बिना रहना मुश्किल-सा हो गया था सो सब छोड़ चला आ गया। ´
`पर आए कैसे, कहते हैं कि प्रेमिका के चंगुल से आदमी छूट कर आ सकता है पर यमराज के चंगुल से नहीं।´

`बस आ गया तो आ गया।´
कह उसने ऐसा ठहाका लगाया कि... पास वाले कब्रिस्तान के चार मुर्दे कब्र छोड़ बाहर आ गए।

`यमराज को पटा लिया भाई जान!´
`यमराज को !! यार यहां तो चालीस साल तक नौकरी की पर एक अदद साहब नहीं पटा और तुम हो कि .... बड़े घाघ निकले यार...´

` असल में यहां से जाते-जाते कविताओं की डायरी साथ ले गया था। सोचा था, वहां पर अगर श्रोता मिल गए और उन्होंने कविता सुनाने की मांग कर दी तो....
चलते-चलते यमराज ने मुझसे चुप्पी तोड़ते पूछा- क्या करते थे´

`हजूर कविता करता था।´
मैंने बीमारी से सिकुड़ा सीना चौड़ा करते कहा।

`ये कविता क्या होती है´ यमराज ने सहमते हुए पूछा।

` मन के अंग अंग को खिला देती है। सदियों की थकान को मिटा देती है। मरे हुए मन में भी जीने की इच्छा जगा देती है जनाब!´

`यार! युगों हो गए मुर्दे ढोते ढोते। बहुत थक गया हूं। विश्राम कर लेते हैं, कोई कविता साथ लाए हो तो सुना दो।`

`बस! यमराज के कहने भर की देर थी कि मैंने बगल में दबाई डायरी खोल डाली। एक कविता, दूसरी कविता, तीसरी कविता......´

`तो´

`तो क्या! पहली बार कोई विशुद्ध श्रोता मिला था। वरना आज तक टमाटर, जूते फेंकने वाले ही अधिक मिले। वे कविता सुनते सुनते बेहोश हो गए। पर मुझे लगा कि ज्यों वे कविता में लीन हों। मैं बिन रूके तीन दिन तक वहीं बैठे बैठे कविता सुनाता रहा। जब उन्हें होश आया तो वे चीखे...´

` कैसे´

`ठीक वैसे ही जैसे यहां के कवि सम्मेलनों में श्रोता आधे घंटे बाद ही चीखने लगते हैं। श्रोता चाहे स्वर्ग के हों या नरक के, सब एक जैसे ही होते हैं बंधु!´

`तो´

`तो क्या! यमराज ने अपने कानों में उंगलियां देते पूछा-कविता कब तक सुना सकते हो´

` जब तक लोक में टमाटर रहेंगे।´

`तो यार एक काम करता हूं। तुम अपने लोक वापस चले जाओ। जाओ मैं तुम्हें मृत्यु के बंधन से मुक्त करता हूं। मेरे लोक में आत्माओं को उनके कर्मों की सजा मिलती है, कवि की कविता की नहीं।´

` तो´

` तो क्या ! ये देखो! तुम्हारे सामने हूं। ये लो, दो चार कविताएं हर वक्त अपनी जेब में रखा करो, जिस तरह लू में बंदे को प्याज का गट्ठा लू से बचाता है उसी तरह कविता भी बंदे को हर ऋतु में मौत से बचाती हैं। वैसे भी आजकल वक्त बड़ा नाजुक चल रहा है। सुबह घर से निकलो तो शाम को घर लौटने की उम्मीद कम ही होती है। दोपहर को तुम्हारे घर आऊंगा, कविता करना सीखा दूंगा। फिर निर्भय जहां चाहे घूमना। कविता करना छोड़ दूं जो कोई तुम्हारा बाल भी बांका कर दे। भाभी घर में होगी न! हफ्ते से चाय नहीं पी। चाय के बिना जैसे पूरा बदन टूट रहा है। ´

कह उसने अपनी डायरी से तीन चार कविता वाले पेज फाड़ मुझे दे दिए। मैंने आव देखा न ताव, चुपचाप उसकी डायरी के वे पन्ने अपनी जेब में डाल लिए। कुत्ता यह सब देख हंसा तो मैंने उससे कहा,
`हंस क्यों रहा है, ले एक कविता तूं भी कहीं रख ले। कमेटी वाले आजकल कुत्तों के पीछे हाथ मुंह धोकर पड़े हैं।´
और उसने वह कविता चुपचाप अपने पट्टे में बंधवा चैन की लंबी सांस ली। अब पता चला कि बंदा लाख गरीबियों के बाद भी कैसे जी रहा था!

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212 हि.प्र
.

Sunday, August 16, 2009

मंदी के दौर में एक और टीवी चैनल !

सभी वर्ग के कस्तूरों के लिए खुशखबरी- हमने तमाम कस्तूरों के हितार्थ टोटल संत चैनल शुरू किया है। यह चैनल फैशन चैनल की तरह चौबीसों घंटे भटके हुए कस्तूरों को मनचाही शांति मुहैया करवाएगा। वैसे भी आज के दौर में फैशन और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं। अर्थात् फैशन ही धर्म है और धर्म ही फैशन। मनोरोगी कस्तूरे अब चौबीसों घंटे आराम से कुर्सी पर पसर फास्ट फूड के साथ परमानन्द की प्राप्ति करेंगे,ऐसा हमारे चैनल द्वारा हायर किए संतों का विश्वास नहीं,दावा है।

हे भटके जीवो, जब कहीं भी न मिले आपकी स्वयं बुलाई समस्याओं का समाधान, तो शुरू होता है हमारे संत चैनल का काम। और चैनलिया संत परखे आपने हजार बार, हमारे चैनलिया संत परखें बस एक बार! हमारे चैनल के संत आपको स्वर्ग का टिकट, ऑटो टिकट के रेट में दिलवा सकते हैं। वे सज्जन जो ईमानदारी ,शांति से बहुत दूर जाना चाहते हों, हमारे चैनल के संतों के सामने एक बार,बस एक बार, मात्र एक पल के लिए बैठें और जिंदगी भर की अच्छाइयों से छुटकारा पाएं। हमारा संत चैनल सात समंदर पार तक पांव पसार चुका है। राजनेता से लेकर जाली वोटर तक को अपने चंगुल में फंसा चुका है। हमने अपने चैनली संतों के माध्यम से आजतक जिसका भी इलाज किया, वह अपनी पत्नी, प्रेमिका को छोड़ हमारे संतों का दीवाना हो गया, विदेशी दर्शक इस बात का सबूत हैं। कर्म क्षेत्र को छोड़ वह घोर भाग्य प्रेमी हो गया, हमारी बढ़ी टी आर पी इसका साक्षात् प्रमाण है ।

प्यारे सज्जनो और उनकी बहू-बेटियो! आप हमारे चैनल के संतों से ऑन लाइन भी संपर्क साध अपने वर्तमान और भविष्य का संपूर्ण बुरा हाल जान सकते हैं। हमारे चैनल की बीसियों लाइनें अपने भक्तों के लिए चौबीसों घंटे खुली रहती हैं। आप हमारे संतों से एसएमएस और एमएमएस द्वारा नरक जाने की विशुद्ध जानकारी कहीं भी बैठे हासिल कर सकते हैं।

घर में अशांति का निवास न हो पाना,व्यापार में अनुचित तरीके से भी लाभ न मिलना, औरों को पीड़ा न पहुंचा पाना, डट कर हरामीपना करने के बाद भी आत्मा को चैन न आना, बीसियों जुगाड़ों के बाद भी परधन न हड़प पाना, साहब की पत्नी के जूते पालिश करने के बाद भी प्रमोशन न मिलना, लाडलों का बार-बार नकल करने के बाद भी पास न हो पाना, मित्रों से
प्रसन्न रहना, एक पत्नी के होते दूसरी जगह मुंह मारने से डरना, विवाहेतर प्रेम भंग होना, पर पुरूष को लोक लाज के कारण अपना न सकना, विवाहेतर संबंधों में बच्चों की ओर से परेशान रहना, ईमानदारी से चाहकर भी छुटकारा न पाना, ग्रहों पर अंधविश्वास न होना, अहिंसा, देशभक्ति,राष्ट्रीयता जैसे बेइलाज रोगों से हरदम परेशान रहना, रात को सच से डरकर एकाएक जागकर फिर सो न पाना, भोगों से प्रेम में असफलता, झूठे मुकदमों में सफलता पाना, अपने जीवन को हर तरह से समाज दुरूपयोगी बनाने आदि-आदि लाखों रोगियों के असाध्य रोगों का सफल इलाज हमारे चैनल के संतों द्वारा अपने वचनों भर से ही शर्तिया किया जा चुका है, फुल्ल गारंटी के साथ, कोई वारंटी के साथ नहीं। जो भला चंगा आदमी हमारे चैनल के संतों की शरण में आकर बीमार न हो तो अपना संत चैनल तत्काल बंद, चैलेंज के साथ!

वे दुरात्माएं हमारे चैनल के संतों के वचन जरूर सुनें जिनका केवल कर्म पर विश्वास हो। घर में खुशहाली हो। जितना उनके पास हो और वे उसी में प्रसन्न हों, धंधे में ईमानदारी से भी लाभ हो रहा हो। जिन पति-पत्नी में स्वर्गिक प्रेम हो। जो मेहनत की खाने में अंधविश्वास रखते हों। कबूतरबाजों के थ्रू विदेश जाने के इच्छुक भी हमारे चैनलिया संतों का आशीर्वाद ले अपना भाग्य सुधारें। हमारे चैनल के संतों के पास ऐसे-ऐसे तंत्र हैं कि चींटी भी अपना घर-बार बेचकर कबूतर की तरह उड़ कर लंदन की नागरिकता पा जाएगी। जिनको लगे कि जादू-टोना कुछ नहीं होता, जो सब खिलाए-पिलाए को पचा गए हों, वशीकरण करने वाला खुद ही वशीकरण का शिकार हो गया हो तो ऐसे सब रोगी हमारे चैनल के संतों की शरण में सादर आएं, हमारे संत चैनल के दरवाजे चौबीसों घंटे ऐसी पीड़ित आत्माओं के लिए खुले हैं।

हमारे चैनल के संतों ने अपनी अमृत वाणी से बड़ों-बड़ों के दिमाग में कीड़े डाल दिए हैं। जिनको नजर न लगती हो,जो औरों को नजर लगाते हों, जिनको हाय पर विश्वास न हो, जिन सास-बहू में झगड़ा न होता हो, जिनके बच्चों का मन पढ़ाई में लगता हो, जो अपने बच्चों से सदा असंतुष्ट रहना चाहते हों, जिस पति का मन बाहर मुंह मारने को न करता हो, ऐसों की सभी शारीरिक व मानसिक समस्याओं का समाधान हमारे चैनल के संतों के पास है, चुटकी में।

प्रिय दर्शको! पर पत्नी दोष, पर पति दोष,पड़ोसन कष्ट, प्रेमी उपासना में बाधा, और भी सैंकड़ों छोटी-मोटी अपनी अप्रत्यक्ष बाधाओं का हमारे सुधी दर्शक हमारे नामी संतों को बताएंगे, फोन पर सीधे बताएंगे और हमारे संत पलक झपकते करेंगे स्क्रीन पर से ही उनका इलाज। हमारे चैनल के संतों को सुनते ही आपके दिमाग के पिछले जन्मों के मरे कीड़े भी सक्रिय हो उठेंगे। और उनके सक्रिय होते ही आपकी और आपके पूरे परिवार की जिंदगी खुशियों से लबालब हो जाएगी। हमारे चैनल के संतों का सान्निध्य मिलते ही पड़ोसन का पति बस आपको टुकुर-टुकुर देखता रहेगा ,पर कुछ कह नहीं पाएगा,न आपका कुछ बिगाड़ पाएगा, और वह लोक-लाज छोड, सोलह श्रृंगार किए दौड़ी-दौड़ी आपके पास चली आएगी। हमारे संतों की वाणी का असर यह भी हो सकता है कि उसका पति ही उसे आपके घर छोड़ जाए, विदाई गीत गाता। हम अपने चैनल के संतों की ओर से आपको विश्वास दिलाते हैं कि हमारे संत अपनी भोग विद्या से आपको इतना सम्मोहित कर देंगे कि आपको चारों ओर हमारे ही संत शिरोमणि नजर आएंगे।

कुंआरी कन्याएं हमारे संतों को जरूर सुनें। जिनका सामाजिक संबंघों पर अगाध विश्वास हो, जो संबंधों के प्रति अधिक ही संवेदनशील हों, जिनको अपने पर पूरा विश्वास हो, ऐसों को हमारे चैनल के संत रामबाण हैं।

आज का जीव हवा,पानी, भोजन के बिना जी सकता है पर चैनल के संतों के बिना नहीं। झोलाछाप संतों की वाणी से निराश हुए एक बार हमारे संतों को जरूर सुनें। उनके भोग, उपभोग, संभोग के फार्मूलों से आप पलक झपकते भव सागर पार होंगे। अपने केबल आपरेटर से संत चैनल की मांग अवश्य करें । यह आपका जुनूनी हक है।

अशोक गौतम

गौतम निवास ,अप्पर सेरी रोड,
नजदीक मेन वाटर टैंक
सोलन-173212 हि.प्र.

Thursday, August 06, 2009

पत्नी और प्रेमिका एक स्कूटर के दो पहिए हैं....

घर में जब भी पत्नी से अनबन होती है,सच कहूं भाई साहब! प्रेमिका की बहुत याद आती है। उस वक्त तो मन करता है कि गृहस्थी के सारे बंधन तोड़ प्रेमिका के किराए के दो कमरों में अपना स्थाई निवास बना लूं। लेकिन ऐन मौके पर यह क्या! कहीं छुपाई डायरी में प्रेमिका का नंबर ढूंढने सीना तान कर उठे तो पाया कि यार, डायरी का वह पन्ना तो सिलवर फिश चट कर गई है जिस पर जो प्रेमिका का फोन नंबर लिखा था। नरक मिले इस सिलवर फिश को भी! जले पर समाज तो नमक छिड़कता ही है पर इस मामले में ये सिलवर फिश भी कम नहीं। लो भैया! इस अनबन में डूबते को प्रेमिका का ही एक मात्र सहारा था, अब गया वह भी। अब रोते रहो बीते दिनों को याद करते हुए गुसलखाने में।

मेरे जो बंधु विवाह को जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेते हैं, उन सबके साथ अक्सर यही होता है। देखिए साहब! मैं तो इस सोच का बंदा हूं कि विवाह के बाद लाइफ में पत्नी की जगह अपनी, प्रेमिका की अपनी। जिस तरह से स्कूटर में दो पहिए चलने के लिए आवश्यक होते हैं, उसी तरह से विवाहित पुरूष को स्मूथ जीने के लिए पत्नी और प्रेमिका दोनों जरूरी हैं। एक पहिये पर स्कूटर आप चला सकते हैं तो चलाते रहिए, अपने बस की बात तो है नहीं भाई साहब!

बहुधा जनाब होता क्या है कि विवाह होते ही मर्द प्रेमिका को भूल जाता है। वह अक्सर इस गलत सोच का शिकार हो जाता है कि प्रेमिका का रोल जीवन में केवल विवाह से पहले का ही होता है। पर यह सोच बिलकुल गलत है। मेरा तो मानना है कि प्रेमिका की जरूरत विवाह के बाद बहुधा पहले से ज्यादा पड़ती है। अगर ऐसा न होता तो मेरा पड़ोसी सौ बार जूते खाने के बाद तो सुधरा होता।

बंधुओ!
वैवाहिक जीवन में इतनी महत्वपूर्ण पत्नी नहीं होती जितनी प्रेमिका होती है। समाज में न आदर्श जरूरी हैं न आदर्शवादी मर्द!धर्म मर्द को जंक फूड खाने से रोकता है तो पत्नी जंक धर्म के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। चाहे जंक फूड हो चाहे जंक धर्म, दोनों का आज के जीवन में बड़ा महत्व है। सनातनी चाहे इसका कितना ही विरोध करते फिरें पर मौका हाथ लगते ही वे भी उंगलियां चाट घर आते मुंह में तुलसी के पत्ते डाले कहीं भी देखे जा सकते हैं। रोज-रोज दाल-रोटी पेट खराब करते हैं तो एक पत्नी के साथ रहते मर्द दूसरी सांझ बूढ़ा हो जाता है। जो सनातनी संस्कृति के उपासक हैं उनके जूतों के निशान भी देख लीजिए,कोठों की सीढ़ियों पर इतिहास की तरह पक्के जमे हैं। अब वे इतिहास को नकारते फिरें, तो नकारते फिरें।

इसलिए-
आप विवाह के बाद कुछ संभाल कर रखें या न,प्रेमिका को अवश्य संभाल कर रखिएगा। विवाह के तुरंत बाद प्रेमिका के घर जाएं, उसके आगे अपनी विवशता का झूठा रोना रोएं,कहें,`न टाली जाने वाली परिस्थितियों के कारण मुझे इसके साथ विवाह करने के लिए विवश होना पड़ा। मैंने सामाजिक परंपरा निर्वाह मात्र के लिए विवाह तो इससे किया है,पर स्वर्गिक प्रेम तो बस तुम्ही से करता हूं।´ बस हो गया काम! कारण, आज भी समाज में ऐसी प्रेमिकाएं बहुत हैं जो दिमाग से काम कम ही लेती हैं।

पर-

गृहस्थी बिना तनाव के चले , अत: कुशल मर्द की समझदारी इसी में है कि प्रेमिका की पत्नी को बास भी न लगे। प्रेमिका को पत्नी से मिलवाना ही पड़े तो प्रेमिका को अपनी धर्म बहन बता दीजिए। वैसे भी आजकल मां-बाप, पत्नी आदि से प्रेमिका को मिलवाने में यह सम्बंध महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। धर्म के भाई-बहन चार-चार बच्चों के मां-बाप होते मैंने समाज में हजारों देखे हैं। रही बात धर्म की, जब धर्म का ही कोई धर्म नहीं तो हम आपका क्यों हो... और वह भी गृहस्थी में! गृहस्थी में और युद्ध में सब जायज होता है। सबके काम चलते रहें, इसमें कौन सी बुरी बात है....

लेकिन-

वैवाहिक जीवन में प्रेमिका की महत्ता को स्वीकारते हुए उससे कभी भी ऐसी बेईमानी न करे, कि जिसे वह नोट कर जाए। पत्नी को भले ही डोज़ दीजिए तो दीजिए। वह आपने ब्याही ही इसीलिए है। प्रेमिका को अगर लगा कि आप उससे धोखा दे रहे हैं तो वह समझदार भी हो सकती है। और अगर प्रेमिका ने घर बदल लिया तो आप न रहे घर के न घाट के! धोबी का कुत्ता मैं नहीं कहूंगा , कारण मैं खुद भी उसी बिरादरी से बिलांग करता हूं।

हमेशा याद रखें-
पत्नी का स्थान घर में होता है तो प्रेमिका का दिल में। पर परंपरा निर्वाह के लिए अधिक समय पत्नी को ही दें।
प्रेमिका को भले ही आप समाज के सामने धर्म बहन बना कर पेश करें, पर अब समाज इस रिश्ते के नए अर्थ को समझने लगा है। फिर भी, जब प्रेमिका को घर लाएं तो इस बात का ध्यान रखें कि पत्नी घर में न हो। हो सके तो प्रेमिका पर अपना विश्वास बनाए रखने के लिए बीच-बीच में उसके साथ विशेष प्रोग्राम भी बनाएं।

पत्नी को जितना चाहें डांटे। पर प्रेमिका को भूले से भी न डांटे। प्रेमिका आप की पत्नी नहीं कि सबकुछ भाग्य मान सह ले। उसने आप के साथ सात फेरे थोड़े ही लिए हैं। याद रखें, विवाहेतर प्रेम सम्बंधों की एक मात्र आधार-शिला प्रेमिका ही होती है, पत्नी नहीं। अगर वह आधार- शिला खिसकी तो समझो पूरा का पूरा वैवाहिक जीवन ही खिसका।

आवश्यक निर्देश-
वैवाहिक जीवन को समृद्ध बनाने के लिए पत्नी से मंदिर जाने के बहाने प्रेमिका को किसी अच्छे से रेस्तरा में लंच करवाने ले जाइए। उसे अच्छे-अच्छे पकवान खिलाइए, भले पत्नी घर में आटा-दाल पड़ोसियों से उधार ले आपका डिनर तैयार कर रही हो।

गांठबांध लें-

प्रेमिका के हितों की रक्षा आपके वैवाहिक जीवन का सर्वप्रथम कर्त्तव्य है। अत: भूले से भी पत्नी से सच्चा प्रेम न करें, पर सच्चे प्रेम का नाटक पूरी संजीदगी से करें। सबकुछ भूल जांए तो भूल जाएं,पर एक बात आठों पहर स्मरण रखें-हाथ से निकली प्रेमिका और शरीर से निकले प्राण पुन: लौट कर कम ही आते हैं।

अंत में
पत्नी को सोने के लिए फटी चादर दें तो प्रेमिका को अपनी पलकें बिछाएं। इससे जीवन में प्रेम फ्री प्रेम घुलता रहेगा।
गृहस्थी ने भले ही आपको लूंगी पर ला दिया हो,पर जब प्रेमिका से मिलने जाएं तो सज-धज कर जाएं ताकि प्रेमिका को लगे कि आपका गृहस्थी ने दीवाला नहीं निकाला है। सज-धज किराए पर लेने पर भी संकोच न करें। इससे प्रेमिका के मन में आपकी जेब के प्रति विश्वास बना रहेगा।

बेहतर हो -
सदा प्रेमिका को प्रेम के नीर में डुबो कर रखें। पत्नी मुरझाती हो तो मुरझाती रहे। उसने मुरझाने के लिए ही पत्नी होना स्वीकारा है। पत्नी की अपने समाज में यही नियति है मित्रो!
प्रेमिका को अगर लगे कि आपके प्रेम में झुर्रियां पड़ने लगी हैं तो तुरंत प्रेम के स्वास्थ्य लाभ के लिए किसी हिल स्टेशन पर सारे कम छोड़ हो लीजिए। पत्नी घर में बीमार हो तो होती रहे। प्रेमिका है तो वैवाहिक जीवन का आनंद है भाई साहब!

जरा अपने से पूछिए-

हम विवाह क्यों करते हैं? प्रेमिका के प्रेम को लांछन से बचाने के लिए। ऐसे में प्रेमिका को हर स्तर पर बनाए रखें ,भले ही जमाने से जूतें पड़ें। जूते टूटेंगे किसके? नुकसान होगा किसका ? जमाने का ही न! विवाहेतर सम्बंधों को जीने वाले सदा स्वर्ग के अधिकारी होते रहे हैं,मेरे बीसियों स्वर्गीय मित्र इस बात के पुख्ता सबूत हैं। मैं तो आपको अलर्ट भर कर सकता हूं, सो कर दिया। शेष, आपकी मर्जी भाई साहब!!

अशोक गौतम
द्वारा- संतोष गौतम, निर्माण शाखा,
डॉ. वाय. एस. परमार विश्वविद्यालय, नौणी,सोलन-173230 हि.प्र.

Saturday, July 25, 2009

चश्मे का रोटी से गहरा रिश्ता है !

अड़ोसने-पड़ोसने कई महीनों से दबी जु़बान में कहने लगी थीं,` भाई साहब! सुधर जाओ, आपकी नज़रें ठीक नहीं लग रहीं।´, कि दूसरे अर्थों में मेरी नज़रें खराब हो रही हैं। वैसे कई दिनों से मुझे भी लग रहा था कि मेरी नज़रें खराब हो रही हैं। पर मैं यह सोच कर चुप रहा कि इस देश में नज़रें किसकी खराब नहीं? ठीक नजर वालों को इस देश से कभी का देश निकाला हो गया है।

पर मेरी पत्नी ठहरी ठेठ देशभक्त! कई बार मैंने उससे कहा भी कि हे भागवान! देशभक्त होकर अपना तो अपना, क्यों पूरे परिवार का जीना दुश्वार कर रही हो? मानुश देह चौरासी लाख योनियों के बाद मिलती है, इस देश में शेष सबकुछ होकर मजे से जिया जा सकता है पर देशभक्त होकर नहीं। पर स्त्री हठ के आगे मेरी क्यों चलती? आज तक किसी की चली है क्या!

और कल पत्नी जबरदस्ती मुझे सरकारी अस्पताल मेरे न चाहते हुए भी मेरी खराब नज़रें चेक करवाने घर के सारे काम छोड़ ले ही गई।

अब भाई साहब प्राइवेट अस्पताल में अपना इलाज करवाने जाने की अपनी तो हिम्मत है नहीं। अपना तो मरना भी सरकारी डॉक्टर की गोली से है तो जीना भी सरकारी डॉक्टर की गोली से। पर आज के माहौल को देख कर जीने के आसार कम ही दीख रहे हैं।

मैं बीसियों औरों के साथ चार घंटे तक डॉक्टर साहब का इंतजार करता रहा। वे थे कि आने का नाम ही नहीं ले रहे थे। दफ्तर वालों से पता किया तो उन्होंने बताया कि प्राइवेट हास्पिटल में एक वी वी आई पी आप्रेशन करने गए हैं,बस आते ही होंगे।

` तो हम किस लिए आए हैं यहां?´ मुझे गुस्सा सा आ गया।

`ये तो आप ही जानो! ´ वहां पर झाड़ू लगाना छोड़ एक ने डॉक्टर का कोट पहनते कहा, हंसते हुए।

` ये धंधा क्या है भाई साहब!सरकारी डयूटी के वक्त भी प्राइवेट काम! सरकारी डयूटी खत्म हाने के बाद तो चलो मान लेते हैं कि.....´

` तो क्या हो गया! इत्ते गर्म हाने की बात क्या है इसमें? वहां भी तो खराब नजर वालों का ही इलाज हो रहा है। किसीकी आंखें तो नहीं फोड़ी जा रही हैं। कहो, आपको क्या करवाना है! बीस साल से यहीं काम कर रहा हूं। मेरे सामने यहां बीसियों डॉक्टर आए और चले गए।´

`पर तुम हो कौन?´
`आम खाने आए हो या पेड़ गिनने?´
`खाने तो आम ही आया हूं पर नीम के पेड़ पर लगे आम हमें नहीं खाने।´ मैंने कहा तो जो वह एक बार हंसने लगा तो बड़ी देर तक हंसता रहा। लगा इसे अवश्य वेतन हंसने का ही मिलता होगा। जब सब उसे घूरने लगे तो वह हंसने से रूका और गंभीर हो बोला,` बहुत पिछड़े हो यार! बहुत पिछड़े हो!! भारत ने चांद तक सफर तय कर लिया और एक तुम हो कि अभी भी आम के पेड़ वाले आम ही ढूंढ रहे हो। अब तो आम चने के झाड़ पर खाने के दिन आ गए। चलो अंदर तुम्हारी खराब नजरें मैं चेक करता हूं। बड़ों बड़ों की नजरें चैक की हैं मैंने। वैसे भी अगर डॉक्टर यहां हो तो भी वे ये काम मेरे से ही करवाते।´

और साहब, कम से कम समय की बचत करते हुए मैंने उसीसे अपनी खराब नजरें चेक करवा लीं। एक आंख का नंबर नजदीक का प्लस तीन निकला तो दूसरी का प्लस चार!

उस पर विश्वास न हुआ। मन ने कहा,´ कहीं और भी नजरें चेक करवा ले। तेरी नजरें इतनी ही खराब होती तो आज को जूते पड़ चुके होते। कहीं कुछ गड़बड़ है।´

जेब को मार मैंने मन की सुनी और सच्ची को जब दूसरी जगह नजरें चेक करवाईं तो वहां एक आंख का नंबर प्लस एक निकला तो दूसरी का प्लस आधा। मुझे गुस्सा आया, बहुत गुस्सा आया। यार! क्या ऐसे अस्पताल जनता के लिए ही रह गए! वह तब भी डॉक्टर का कोट पहने वहीं बैठा था। तय था कि डाक्टर साहब अभी भी नहीं आए थे।

`यार ! तुमने ये क्या नंबर दे दिए?´ मैंने प्राइवेट हास्पिटल के और उसके द्वारा आंखें चेक करने के बाद के दोनों नंबर उसके आगे रख दिए। उसने दोनों को गौर से देखा और फिर डॉक्टर से भी अधिक गंभीर होते बोला,` क्या हो गया इसमें?´

`तुमने दोनों आखों का दो और साढ़े तीन नंबर ज्यादा दे दिया और कहते हो कि क्या गलत हो गया।´

`कौन से वर्ग से हो?´

`मध्यम वर्ग से, क्यों? उच्च वर्ग से होता तो क्या सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने आता क्या!´

` मैंने पहचान लिया था।तभी तो तुम्हें नंबर ज्यादा दिया है सोच समझ कर। इसका एक लाभ तो यह है कि जल्दी चश्मा नहीं बदलना पड़ेगा और दूसरा उससे भी बड़ा फायदा यह है कि कहूंगा तो चक्कर खाकर गिर पड़ोगे।´
मैंने पत्नी को मुझे थामने को कहा और फिर उससे बोला,` लो अब बोलो बड़ा फायदा।´

`बहुत भोले हो यार। छोटे नंबर के चश्में से चीजें छोटी दिखती हैं और बड़े नंबर वाले से बड़ी।´
`मतलब!!!´ मुझे थामे हुए पत्नी ने पूछा।

`देखिए मैम! महंगाई के इस दौर में मध्यम वर्ग के लिए यही ठीक है कि जितने नंबर का चश्मा उसे डॉक्टर कहे वह उससे दो तीन नंबर ज्यादा का चश्मा लगाए। इससे पता है क्या होगा?´

`क्या होगा??´
`छोटी रोटी बड़ी दिखेगी, ये देख लीजिए।´ उसने अपने लंच बाक्स में बची छोटी सी चपाती उस नंबर का चश्मा मेरी आंखों पर लगा दिखाई तो मुझे सच्ची को चक्कर आ गया। उसने मुझे सहारा दे बेंच पर लिटाते कहा,` दो किलो आटे का बैग पांच किलो के आटे का लगेगा। लिफाफे में लाए किलो भर चावल तीन किलो जितने लगेंगे। ये वो नंबर है भाई साहब जो तुम्हें लगते ही सतीयुग में ले जाएगा। सही नंबर का चश्मा लगाकर क्यों अपना मानसिक संतुलन खराब करना चाहते हो? है न फायदे की बात। अब बोलो, कौन तुम्हारे हित वाला है?´

मैंने उसके पांव छुए और उसके नंबर वाला चश्मा लगाए घर आ गया । अब मजे में हूं। थाली में दो चपातियां ही इतनी हो जाती हैं कि... अब फुला महंगाई जितना मन करे सीना।

डॉ. अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,
सोलन 173212 हि.प्र.

Thursday, July 16, 2009

मुर्दे का प्रोमोशन !

उस देश की जनता भय भूख से परेशान, बहुत परेशान। पर सरकार को इस बात से कोई लेना देना नहीं । उसे मजे से अपनी चाल चलना है सो चल रही है। उसे लंबी तान कर सोना है सो लंबी तान के सो रही है। जनता चाहे कहीं की भी हो, वह कुल मिलाकर जमा-घटा कर औसतन जनता ही होती है। न उसकी कोई चाल होती है न ढाल।

मैं भी उस देश की जनता हूं, सो कहने की जरूरत नहीं कि परेशान न होऊं। परेशानी में ही सोता और सुबह परेशानी में ही जागता हूं। यह सिलसिला बरसों से चला हुआ है। तय है मरने तक चलता रहेगा। न आप कुछ कर सकते न खुदा। मेरे बस में तो कुछ है ही नहीं।

तब भी मैं परेशानी में ही जागकर घूमने निकला था कि सामने से मुर्दा सा कोई आता दिखा। हमको तो यारों सेहत का ख्याल रखना जरूरी हो गया पर अब मुर्दे भी इस देश में अपनी सेहत के प्रति जागरूक हो गए? पता नहीं किसकी बददुआ से इन दिनों कमबख्त पेट भर रोटी क्या मिलने लगी कि मैं सेहत के प्रति कुछ ज्यादा ही जागरूक हो गया । भगवान किसी भी देश की जनता को और तो सबकुछ दे, पर भर पेट रोटी कभी न दे। इससे देश में कई गड़बड़ हो जाती हैं।

`और बंधु क्या हाल हैं? तुम भी सुबह सुबह सैर को आ निकले।´

`पत्नी जागने से पहले ही किचकिच शुरू कर देती है, बस इसीलिए चला आता हूं।´
कह मैंने अपने मुंह का कफ सामने खिले फूल के मुंह पर दे मारा,` पर आप की तारीफ! पहले तो आपको यहां कभी सैर करते नहीं देखा।´

` देखते कैसे? कब्र से आज ही जागा हूं।´

` कमाल है यार! यहां लोग सोचते है कि कब जैसे कब्र नसीब हो तो रोज की किचकिच से छुटकारा मिले और एक तुम हो कि कब्र में भी चैन नहीं आया और निकल आए एक बार फिर मरने। क्या इस देश में जी कर जी नहीं भरा जो मरके भी एक बार फिर जीने निकल आए?´ अजीब किस्म का मुर्दा है भाई साहब ये भी। लोग मरने के लिए खुदा से दुआएं कर रहे हैं और एक ये मुर्दा महाशय हैं कि....

`क्या करूं यार! मैं तो कब्र में चैन से पड़े रहना चाहता था पर ये एक तुम्हारी सरकार है न! हम मुर्दों तक को कब्र में चैन से सोने देना नहीं चाहती। यार परेशान किए रखने के लिए जिंदा मुर्दे क्या कम हैं जो हमें परेशान करने चले पड़े।´ कह वह आधा सड़ा मुर्दा रूआंसा हो गया। पर चलता वह मेरे साथ साथ रहा। अब मुर्दे को मुर्दे से घिन आने से तो रही। फर्क हम दोनों में केवल इतना था कि वह अतीत का मुर्दा था तो मैं वर्तमान का। थे तो हम दोनों औसतन मुर्दे ही,
´अब देखो ना यार! हफ्ता पहले सरकार ने मेरे साथ की कब्र में पांच साल से चैन से पड़े मुर्दे का प्रमोशन कर दिया। बेचारे ने जैसे ही अखबार में यह खबर पढ़ी, तबसे अपने होशो हवास में नहीं है। पागलों की तरह बहका हुआ है। मजे से कब्र में सो रहा था सारे झंझटों से दूर। अब कह रहा है, मुझे तो बस दफ्तर जाना है। हम मर गए उसे समझाते समझाते। पर वही नहीं मान रहा। कह रहा है मेरा प्रमोशन उस पद के लिए हुआ है जहां पर खाने की मौज ही मौज है। चाहे कुछ भी हो, मैं तो बस दफ्तर जाकर ही रहूंगा।´
`और तुम किसलिए कब्र से निकल आए? क्या तुम्हारा भी प्रमोशन हो रहा है?´
बड़ा गुस्सा आया सरकार पर। यार सरकार! हम मर गए यहां बीसियों बरसों से प्रमोशन के लिए एड़ियां रगड़ते-रगडत़े और एक आप हो कि मुर्दों को पटाने में जुटे हो। वोट हमारे लेकर सरकार बनाओगे कि मुर्दों के वोट लेकर!

पर यहां आजकल मुर्दों के वोटों से ही तो सरकारें बनती हैं। मंद बुद्धिजीवियों को और काम ही इतने हैं कि बेचारे चाह कर भी वोट पाने के लिए वक्त ही नहीं निकाल पाते।

` नहीं मेरा प्रमोशन नहीं होना है। मुझ पर सरकार मुकदमा चलाने की सोच रही है। मैं तो कहता हूं कि मुकदमे चलाने हैं तो डटकर चलाओ पर उन पर चलाओ जो भूख में रोटी की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उन पर चलाओ जो बेरोजगारी में रोजगार की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उनपर चलाओ जो झूठ को मात देने के लिए सच की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उन पर चलाओ जो सामाजिक न्याय की मांग करते हैं। मुकदमे चलाने हैं तो उनपर चलाओ जो सामाजिक सुरक्षा की मांग करते हैं। सो कोई वकील ढूंढने निकला हूं जो मेरे केस की पैरवी कर सके। तुम्हारी नजरों में कोई ईमानदार वकील हो तो बताओ।´

उसने कहा तो बड़ी हंसी आई। ओ यार! जहां पर ईमानदारी भी ईमानदार नहीं वहां ........!

` यार! टेक इट सीरियसली! मामला सच्ची को गंभीर न हो तो खुदा कसम कब्र में चैन से सो रहा गधा भी बाहर न आए। मैं तो बंदा हूं। खुदा का न सही तो न सही।

`हं अ...! जिंदों के फैसले तो सरकार से उनके जिंदा जी हो नहीं रहे और लो भैया खोल दी मुदोंZ की फाइलें।´

`यही तो अपना रोना है भैया! सजा देनी है तो जिंदों को दो! हम तो कभी के मर लिए, आधे सड़ भी लिए भैया! फाइलें खोलनी है तो उनकी खोलो जिन्होंने देश को दोजख बना रखा है। उनको तो सादर उनके घर उनके गले में फूलों की मालाएं डाले सरकारी अमले के साथ छोड़ने जा रहे हो। गढ़े मुर्दे उखाड़ने से कभी समाज चला है क्या?? हम तो जो खा गए सो गू बना गए। अब तो कुत्तों ने भी हमारी कब्रों पर मूतना छोड़ दिया है। ऐसे में सरकार हमें तो बख्शे।´

`पर सरकार से मैं क्या गुजारिश करूं यार! अपनी तो घर में भी नहीं चलती।´ मैंने कहा तो वह कुछ कहने के बदले मन नही मन मुझे गालियां देता हुआ आगे हो लिया। चाहे मुर्दे जमीन के नीचे के हों चाहे जमीन के ऊपर के ,मुर्दे कुल मिलाकर होते मुर्दे ही हैं।

डॉ.अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक
सोलन-173212 हि.प्र.

Friday, July 10, 2009

होरी कहे पुकार के.....

होरी कहे पुकार के

हे रे होरी, हे रे गोबर, हे री धनिया , हे रे दमड़ी बसोर, हे रे हरखू, हे री सिलिया,हे रे हीरा, ओ री रूपा, ओ रे रामसेवक, ओ रे शोभा, हां री सोना, ओ री पुनिया, ओ री गोविंदी, ओ री झुनिया, आओ रे , चलो देश में लाकतंत्र आ गया है। आओ रिश्वत खाएं। छोड़ो रे तिल तिल कर मरना, कुछ खाने को नहीं मिल रहा है तो कोनो चिंता। सरकार बहादुर ने सब के लिए रिश्वत खाने के द्वार समान रूप से खोल दिये हैं। का हुआ जो राशन की दुकान पर से आटा गायब हुई गवा है। का हुआ जो राशन की दुकान पर से चावल गायब हुई गवा है। रिश्वत खाने के अवसर तो सरकार सड़क से संसद तक सभी को बराबर दे रही है। छोड़ो खेतों में काम करना, छोड़ो गऊदान के लिए तिल तिल मरना। चलो छोड़ो सब काम और पेट पर हाथ फेर फेर कर रिश्वत खाओ। देखते ही देखते मोटे हो जाओ। सब देश में रिश्वत खा रहे हैं। सबने आटा खाना छोड़ दिया है। सबने सब्जी खानी छोड़ दी है।

`पर साहब हम तो जन्मजात अनपढ़ हैं। हम तो जन्मजात शोषित हैं। मातादीन आज भी हमें लूट रहा है। दातादीन आज भी हमें लूट रहा है। झिंगुरी सिंह आज भी हमारा तेल निकाल रहा है। पटवारी को अगर मेरे माई बाप हम आज भी नजराना और दस्तूरी न दें तो गांव में तो गांव में, खेत में जाना मुश्किल हो जाए। आज भी जो गांव के प्रधान और उसके कारिंदों के पेट न भरें तो राशन कार्ड कैंसिल हो जाए। बी पी एल में तो लाला लोगन का ही हक है। पुलिसवाले तो आज भी हमारे दामाद हैं। जब जब गांव में उनका खाने को मन करे बिन सूचना दिए सांड की तरह आ धमकते हैं और तब धर्म निरपेक्ष देश में हमारा धर्म हो जाता है कि हम सबकुछ छोड़ उनका आदर सत्कार करें। उन्हें नजर नयाज दें। नहीं गांव में हरेक की मां बहन हो जाए। गांव में कुत्ते कम आते हैं मुलाजिम अधिक । हम तो आज भी उनके सामने हाथ बांधे खड़े रहते हैं। अपने पशुओं के लिए चारे का इंतजाम हो या न हो उनके लिए सारे काम छोड़ चारे, अंडे ,मुर्गी दूध,घी का इंतजाम करना पड़ता है। आज भी हमें रोटी खाने की आदत नहीं तो रिश्वत कैसे खांए?´ सबने सिसकते हुए हाथ जोड़ते कहा। धत्त तेरे की ! मैंने भी कैसे भूखे नंगों को रिश्वत खाने के लिए आमंत्रित कर अपनी नाक कटवा ली। सोचा था, ये भी जो सदियों से गंगा की केवल धाराएं गिनते गंगा किनारे बैठे हैं, थोड़ा बहती गंगा में हाथ धो लें। समाजवादी हूं न! सोचता हूं देश के अन्य संसाधनों की तरह रिश्वत पर भी सभी का समान रूप से हक हो। सोचता हूं देश में सब अधिकार सबको समान रूप से मिलें।

`अनपढ़ हो तो क्या हुआ! जन्मजात शोषित हुए तो क्या हुआ। अब देश आजाद हो गया है। अनपढ़ को क्या रिश्वत खाते हुए शर्म आती है? शोषित को क्या रिश्वत खाते हुए शर्म आती है? अनपढ़ को क्या रिश्वत खाते हुए पेट में दर्द होती है? शोषित का क्या आजाद देश में रिश्वत खाते हुए पेट में दर्द होती है? अनपढ़ के क्या पेट नहीं होता? शोषित को क्या पेट नहीं होता? अनपढ़ का क्या हराम का खाने को मन नहीं करता? शोषित का क्या हराम का खाने का मन नहीं करता? जिनमें दिमाग है जब उनको ही रिश्वत खाते हुए शर्म नहीं आती तो अनपढ़ में जब दिमाग ही नहीं होता तो उसे तो कम से कम रिश्वत खाते हुए शर्म नहीं आनी चाहिए। देखो, रिश्वत खाने वाले कैसे धड़ा धड़ पुरस्कृत हो रहे हैं। रायसाहब की तरह हवेलियों पर हवेलियां बनाए जा रहे हैं।´

`पर हम रिश्वत कैसे खाएं? हम तो तंत्र से बाहर हैं।´

`तो तंत्र में आओ।´

`कैसे??´

`किसी लीडर को पटाओ। चुनाव के दिनों में उसके पोस्टर चिपकाओ। उसके लिए जान हथेली पर रख वोट जुटाओ। फिर तंत्र में कुछ भी हो जाओ।´

` तो क्या हम राय साहब हो जाएंगे? तो क्या हम पंडित दातदीन हो जाएंगे? तो क्या हम थानेदार साहेब हो जाएंगे? तो क्या हम कानिसिटिबल हो जाएंगे? तो क्या हम कानूनगो हो जाएंगे? तो क्या हम डिप्टी हो जाएंगे? तो क्या हम कमिसनर हो जाएंगे? तो क्या हम कलक्टर हो जाएंगे? तो क्या हम डाक्टर हो जाएंगे? तो क्या हम इंजिनियर हो जाएंगे? तो क्या हम नहर वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम जंगल वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम ताड़ी- सराब वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम गांव सुधार वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम खेती वाले साहब हो जाएंगे? तो क्या हम पादड़ी हो जाएंगे? तो क्या हम जमींदार हो जाएंगे?´

`इस सबके लिए तो पढ़ा लिखा होना जरूरी होता है। तभी तो सरकार कहती है पढ़ो और पढ़कर देश का बेड़ा गर्क करो।´

` तो??´ सबको सांप सूंघ गया,` तो रिश्वत कैसे खाएं?´

` लीडर से कहो तुम्हें चेयरमैन बना दे। नेता से कहो तुम्हें मंत्री बना दे।´

`इस सबके लिए अनपढ़ चलेगा क्या?´

` चलेगा क्या, दौड़ेगा। सरपट । खरगोश की तरह। देश का वोटर पढ़ा लिखा होना चाहिए पर नेता नहीं। ´ मैंने कहा तो होरी ने सबको बला बुला कुलांचे भरते हुए कहा,` `हे रे काली, हे रे जीतू, हे रे मंगू, हे रे नंदसिंह, हे री प्रीतो, हे रे चौधरी कंता, हे रे चौधरी बसंता हे रे गोबर, हे री धनिया , हे रे दमड़ी बसोर, हे रे हरखू, हे री सीलिया,हे रे हीरा, ओ री रूपा, ओ रे रामसेवक, ओ रे शोभा, हां री सोना, ओ री पुनिया, ओ री गोविंदी, ओ री झुनिया, आओ रे , चलो देश में लाकतंत्र आ गया है। पर भैया! हम काहे रिश्वत खाएं? लोक तो बिगड़ा ही ,परलोक भी बिगाड़ें क्या?? जारी रखो रे तिल तिल कर मरना, कुछ खाने को नहीं मिल रहा है तो कोनो चिंता। लेओ भैया! सरकार बहादुर ने सब के लिए रिश्वत खाने के द्वार समान रूप से खोल दिये हैं। फुकने दो जो राशन की दुकान पर से आटा गायब हुई गवा है। फुकने दो जो राशन की दुकान पर से चावल गायब हुई गवा है। पर लेओ रिश्वत खाने के अवसर तो सरकार सड़क से संसद तक सभी को बराबर दे रही है। पर हम तो मजूरी ही करें। चलो भूखो ही मरें। ईमानदारी से ही पेट पालें। रिश्वत खाने वालों का नहीं रे! देश अपना है ,धरती अपनी है। सब तो देश में रिश्वत खा रहे हैं। पर आओ रिश्वत न खाकर हम देश के विकास में हाथ बंटावें, हम तो बच न सके, पर चलो मिलीके देश बचावें।´

डॉ. अशोक गौतम

गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

Wednesday, July 01, 2009

व्यवस्था का डंक और दो टांग के गधे !

कल दफ्तर में सारा दिन मूड ऑफ रहा । इसलिए नहीं कि सुबह उठते ही पत्नी का थोबड़ा देखा था । इसलिए भी नहीं कि दफ्तर आते-आते रोज की तरह पड़ोसन की प्रेम भरी चितवन ने विदा नहीं किया था। इसलिए भी नहीं कि दफ्तर जाते ही दफ्तर में साहब के चरण चाटने पड़े । साहबों का तो हमारा खानदान जन्मजात भक्त रहा है। जब तक मैं साहब के चरण न चाटूं पिछले दिन का कम्बख्त खाना ही हजम नहीं होता। मैं ज्यों ही बिल काटने बैठा बिल देने वालों की लाइन में एक गधा न जाने कहां से आकर खड़ा हो गया था। गधा होने के लिए चार टांगें होना जरूरी नहीं ! बड़े-बड़े कान होना जरूरी नहीं!! पूंछ होना जरूरी नहीं !!! गधे आजकल कई रूपों में यहां-वहां सर्वत्र उपलब्ध हैं, सुगमता से । और असली गधे बेचारे दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर, गुप्ता की तरह ।
रोज की तरह बिल काटने शुरू ही किए थे कि... उसूलन मैं ही क्या, आज के दौर में कोई भी बकाया के दो-चार रूपये वापस नहीं करता। वैसे भी महंगाई के दौर में दो-चार रूपये का आता क्या है भैया ! इसीलिए कई समझदार तो बकाया मांगते भी नहीं । इन जैसों की दया से शाम तक दो चार सौ बन जाते हैं ।
उस गधे का बिल था 145 का और उसने दिए 150 । बिल काट मैंने उसे रसीद दी तो वह धन्यवाद करने की बजाय भी वहीं अड़ा रहा । दूसरे को दिक्कत हो रही थी । आखिर मुझे ही कहना पड़ा,` यार , पिछले को आने दो । अब क्यों अड़े हो ? ´
` 5 रूपये वापस दीजिए ।´
यों बोला मानो कुबेर का खजाना रख लिया हो ।
`छुट्टे नहीं हैं । ´ गुस्सा आ गया । सारा दिन इनके लिए कुर्सी से चिपके रहो ,और ये हैं कि ....वरना अपना क्या? पगार तो मिलनी ही मिलनी है । 5 न हुए .....(ख़ैर, जाने दीजिये)
` अच्छा , पांच रूपये दे दीजिए । ´ उसने फिर साधिकार कहा । लगा गधा पहली बार बिल देने आया है , सो पूछा ` भैया, पहली बार बिल दे रहे हो क्या ? ´
` क्यों ? ´

` हर महीने देते होते तो अपना टाइम बरबाद न करते । ´
` पर पांच रूपये ?´ `टुट्टे होंगे तो ले जाना । ´
मैंने कहा तो वह किनारे खड़ा हो गया ।
अगले का बिल भी 145 , पर उसने 150 में से पांच नहीं मांगे । समझदार लोग ऐसे ही होते हैं ।
उसने फिर कहा ,` तो अब 10 दे दीजिए । ´
` किस बात के ?´

` 5 इनके , 5 मेरे । ´
` क्यों ? ´
` हम पांच -पांच बांट लेंगे । ´
` मुझे विश्वास नहीं तुम पर । देश में बांट कर खाने का रिवाज खत्म हो गया है । हद है यार , पांच रूपये के लिए पचास रूपये का समय बरबाद कर दिया । ´
बस , उसके बाद मन ही नहीं किया बैठने का । घर आते ही पत्नी ने बताया कि पण्डित जी को कुछ हो गया है। आनन-फानन में उनके यहां पहुंचा तो उनके मुंह से झाग निकल रहा था । लोग-बाग उन्हें घेरे हुए थे ।
` क्या हो गया ? ´
` इन्हें काट लिया। ´
` किसने ? ´
` सांप ने। ´
` सांप ने तो इन्हें पहले भी काटा था तो सांप मर गया था। ´
गुप्ता ने हंसते हुये कहा।
`तो सांप से ज्यादा जहरीला तो कुछ नहीं? ´
` होता होगा ! तभी इनकी यह दशा हुई है । ´ उनकी पत्नी परेशान । पेंशन सीधे हाथ में आने का मौका कौन हाथ से जाने दे ?
` झाड़-फूंक वाला नहीं बुलाया क्या ? ´
`आया था , कह रह था इस पर मन्त्र नहीं चल रहा । किसी भयानक कीड़े ने काटा है।´

` तो ? ´
` अस्पताल ले जाना पड़ेगा। ´
` तो? ´

और पड़ोसी धर्म के नाते न चाहते हुए भी उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा । सब धर्म तो मर गए साले , ये धर्म क्यों बचा है भैया ? जेब में लगाने लायक आज कुछ पड़ा न था। फिर भी सौ-पचास लगा दिए, शायद परलोक सुधर जाए ।
झल्लाए डॉक्टर ने पूछा,` कहां से लाए हो ? ´
`वार्ड 10 से । ´
`क्या हो गया मरे को ? ´
` काट दिया है। ´
मैंने मरी आवाज में कहा।
` किसने ? बिच्छू ने ? ´
` नहीं । ´
` सांप ने ? ´
`नहीं।´
` कुत्ते ने ? ´
` नहीं । ´
` पत्नी ने ? ´
` नहीं ! दफ्तर गया था जमाबन्दी की कापी लाने ।´
अचानक पण्डित जी की बेहोशी टूटी ।
`तो ? ´
` पैसे घर भूल गया था । ´
वे बेहोशी में ही बड़बड़ाए।
`उसने जेब पर डंक मारा ।' और वे फिर बेहोश हो गए ।

डॉक्टर ने गम्भीर हो कहा ,` इसका जहर नहीं कट सकता । ´
`क्यों ? ´

` इसे व्यवस्था के भरोसे छोड़ दीजिए । व्यवस्था ने चाहा तो ..... ´
` वर्ना ? ´
` व्यवस्था का डसा वैसे तो आजतक बचा नहीं । समाज गवाह है । ´
कह वह एमआर से वहीं गिफ्ट लेने जुट गया । और मैं मरते हुए पंडित जी का सिर धुनते हुए मृतात्म मंथन करने लगा, हालांकि उनके सिर में धुनने के लिए बालों के नाम पर कुछ भी शेष न बचा था।
-----------------------
डॉ.अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन -173212 हि. प्र.