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Friday, May 22, 2009

शाम तक क्या बेचें....

हिंदुस्तान के बाक़ी इलाकों के बारे में नहीं जानता, मगर बिहार में बीबीसी आज भी सबसे ज़्यादा सुना जाना वाला रेडियो है.....हालांकि, प्राइवेट एफएम वहां भी दस्तक दे चुका है, मगर वहां का श्रोता अब भी रेडियो के फटाफट संस्करण से ज़्यादा रेडियो के समझदार संस्करण को तरजीह देता है.....ब्लॉगिंग पर बीबीसी भी सजग है और वहां अक्सर नज़र जाती है.....एक बढिया लेख वुसतुल्लाह ख़ान साहब का पढ़ा तो जी हुआ बैठक पर सबको पढ़ाया जाए....मीडिया के हाल के चरित्र और चेहरे पर ऐसी छींटाकशी कम ही पढ़ने को मिलती है.....
संपादक


जो फटीचर लतीफ़ा मैं आपको सुना रहा हूँ. ये लतीफ़ा पाकिस्तान में पठानों पर और भारत में सरदारों पर रखकर सुनाया जाता है.

एक सरदार जी/ख़ान साहब, तेज़ गर्मी में ठेले पर फ़ालसे बेच रहे थे. एक ग्राहक आया, पूछा भाई साहब फ़ालसे क्या हिसाब बेच रहे हो. ठेले वाले ने कहा 70 रुपये किलो. ग्राहक ने कहा सब तौल दो. रेहड़ी वाले ने कहा कि सब फ़ालसे तुम ले गए तो शाम तक क्या बेचूंगा!!!

अब आप पूछेंगे यह वर्षों पुराना लतीफ़ा सुनाने का क्या मतलब है??? मतलब यह है कि मुझ जैसे सैंकड़ों पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों को सोलह मई के नतीजों की वजह से भारतीय जनता से मायूसी हुई है.

हम तो पिछले दो महीने से यह सोच कर अपने क़लम के भाले और ज़ुबानों की छुरियाँ तेज़ किए बैठे थे कि हिसाब-किताब, आँकड़े और सितारों की चाल बता रही है कि किसी भी पार्टी को चुनावों में बहुमत नहीं मिलेगा.

ऐसे में सरकार बनाने के लिए राजनेताओं में ख़ूब जूता चलेगा. धौंस और घूस से काम लिया जाएगा. तब कहीं जा कर 15-20 दिन बाद एक ऐसी सरकार की शकल उभरेगी जो शायद दो ढाई साल भी न निकाल पाए. फिर मध्यावधि चुनाव होंगे और फिर हम मीडिया वालों का धँधा चमकेगा.

मगर भोले वोटरों को शायद अंदाज़ा ही नहीं कि उसने हमारे अंदाज़ों पर बर्फ़ीला पानी उंडेल कर मीडिया को कितना नुक़सान पहुँचाया है.

वोटरों की इस हरकत से अगले 15-20 दिन तक की योजना बनाने वाले चैनलों, और समाचार पत्रों से जुड़े सैंकड़ो राजनीतिक टीकाकारों, विश्लेषकों, लेखकों, ग्राफ़िक डिज़ाइनरों, हाई प्रोफ़ाइल ऐंकरों, कैमरामैनों, कैमरे के आगे खड़े होकर नए राज़ खोलने की आदत में लगे रिपोर्टरों और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू की दौड़ में हिस्सा लेने वाले संपादकों के करोड़ों रुपये डूब गए जो उन्हें फ़ीस और आने-जाने के ख़र्चे के रुप में मिल सकते थे.
हम सबके दिल में अरमान था कि आने वाले कई दिनों तक हाथी का चीटियों के साथ, शेर का बकरी के साथ और बिल्ली का चूहे के साथ राजनीतिक तोड़-जोड़ बैठाएं. रंगीन ग्राफ़िक्स और टिप्पणियों की मदद से अपनी-अपनी मनपसंद सरकार बनाएंगे, मिटाएंगे और फिर बनाएंगे. ख़ुद भी मज़े लेंगे और देखने, सुनने और पढ़ने वालों को भी मज़ा करवाएंगे.

लेकिन 15-20 दिन तक जो सर्कस लगना था वो 16 मई की शाम तक शामियाने के बाँस के साथ गढ़ने से पहले ही लद गया.

और अब हम सब मीडियाकर्मी विश्लेषक 46 डिग्री सेल्सियस में सच्चाई के तपते सूरज तले वोट के फ़ैसले की गर्म ज़मीन पर बैठे ये सोच रहे हैं कि सारे फ़ालसे वोटर ले गया, अब शाम तक क्या बेचें!

लेकिन मायूसी की कोई बात नहीं. गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में. 2004 में भी यही हुआ था. आने दें 2014 के चुनाव. हमने भी फ़ालसे की जगह तरबूज़ और कटहल का ठेला न लगाया तो नाम बदल देना. यह वोटर ख़ुद को आख़िर समझता क्या है!!!

Wednesday, May 20, 2009

....क्योंकि कोई विकल्प नहीं था !

लोक सभा के चुनाव परिणामों से सिर्फ एक राहत महसूस की जा सकती है और वह यह है कि केंद्र में अस्थिरता का डर नहीं रहा। लेकिन यह राहत भी सिर्फ उनके लिए हैं जो किसी भी कीमत पर स्थिरता को तरजीह देते हैं। सरकार या शासन की स्थिरता अपने आपमें कोई काम्य चीज नहीं है। स्थिरता तब अच्छी होती है जब वह देश को बेहतर ढंग से चलाने का माध्यम बने। अगर बकवास नीतियों और बकवास नेतृत्व के बावजूद स्थिरता बनी रहती है, जैसा नरसिंह राव के जमाने में था, तो वह देश के लिए नुकसानदेह और कभी-कभी खतरनाक भी होती है। मनमोहन सिंह सरकार की उपलब्धियां ऐसी नहीं रही हैं कि उन्हें एक महान प्रधानमंत्री माना जा सके। इसी तरह, सोनिया गांधी दूसरे नेताओं की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली साबित हुई हैं, पर यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि उनके नेतृत्व में हम एक महान भारत का सृजन करने जा रहे हैं। न ही कांग्रेस के बारे में यह दावा किया जा सकता है कि उसका कायाकल्प हो चुका है और अब वह राष्ट्र निर्माण की ऐसिहासिक भूमिका का निर्वाह करने जा रही है।

ये सब ऐसी खामखयालियां हैं जो कांग्रेस को इतनी अधिक सीटें मिलने से पैदा हुई हैं। वैसे, इन सीटों की संख्या इतनी भी नहीं है कि बहुमत के लिए उसे अन्य दलों का सहारा न लेना पड़े। इसलिए सीटों की संख्या पर इतराने का कोई वास्तविक कारण दिखाई नहीं देता। राजीव गांधी को 1984 में तीन-चौथाई बहुमत मिला था। लेकिन उनके शासन की कौन-सी उपलब्धियां आज याद आती हैं? बोफोर्स का दाग अभी तक नहीं मिट पाया है। इसी तरह, नरसिंहराव को बहुमत तो नहीं मिल पाया था, पर धीरे-धीरे तोड़-फोड़ की अपनी कुशलता के कारण उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए बहुमत का प्रबंध कर लिया था। लेकिन अंत में हुआ क्या? आज उन्हें देश के सबसे निस्तेज प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है। बाबरी मस्जिद कांड उन्हीं के समय में घटित हुआ था।

फिर कांग्रेस की इस अप्रत्याशित जीत की व्याख्या कैसे की जाए? इस व्याख्या पर ही निर्भर है कि हम वर्तमान राजनीति से क्या उम्मीद करते हैं। अगर कोई यह कहता है कि अब क्षेत्रीय दलों की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है तथा यह उनके पराभव का समय है, तो यह मिथक है। बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, बिहार का जनता दल (यूनाइटेड), उत्तर प्रदेश का समाजवादी दल, बहुजन समाज पार्टी आदि क्षेत्रीय दल नहीं तो और क्या हैं? यह जरूर है कि जिन क्षेत्रीय दलों की उपयोगिता बची हुई है, वे दल ही बचे हैं; जिन्होंने अपनी उपयोगिता का खुद ही भक्षण कर डाला है, वे ढलाव के शिकार हुए हैं। लेकिन यह तो राष्ट्रीय दलों के साथ भी होता रहा है। कांग्रेस और भाजपा, दोनों कई-कई बार नीचे जा चुकी हैं और फिर उभरी हैं। इसी तरह, क्षेत्रीय दल भी नीचे-ऊपर आते-जाते रहे हैं। इस राजनीतिक चक्र को भूल कर किसी एक चुनाव के आधार पर कोई बड़ा निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी राजनीतिक विश्लेषण के बचकानेपन के अलावा कुछ नहीं है।

सवाल यह भी है : अगर राष्ट्रीय दलों का जमाना सचमुच लौट आया है, तो यह सिर्फ कांग्रेस के लिए ही क्यों लौटा? भाजपा को भी तो राष्ट्रीय दल माना जाता है। सच पूछिए तो दोनों में से कोई भी व्यापक और सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय दल नहीं है। इसीलिए जिस अर्थ में कांग्रेस राष्ट्रीय दल है, उसी अर्थ में भाजपा भी राष्ट्रीय दल है। उसी अर्थ में बसपा भी राष्ट्रीय दल बनने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय दलों की वापसी का समय आ गया है, तो इसका लाभ कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी दलों को भी मिलना चाहिए था, जो नहीं हुआ है। इसलिए यह स्थापना भी निराधार प्रतीत होता है।

फिर कांग्रेस की जीत को कैसे समझा जाए? इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि कांग्रेस का कोई ऐसा विकल्प चुनाव मैदान में नहीं था जिसे कांग्रेस से बेहतर कहा जा सके। चुनाव की घोषणा के पहले ही लालकृष्ण आडवाणी ने अपने को भावी प्रधानमंत्री घोषित कर दिया था। इस नाते भाजपा ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी थी। भाजपा अपने सांप्रदायिक चेहरे के साथ-साथ हर अर्थ में दक्षिणपंथी पार्टी है। कांग्रेस को मध्यमार्गी दल माना जाता है, पर उसकी आर्थिक नीतियां भी पूरी तरह से दक्षिणपंथी हैं। अमेरिका से नजदीकी कांग्रेस भी चाहती है और भाजपा भी। यह जरूर है कि कांग्रेस का एक इतिहास, भले ही वह मुखौटा ही हो, गरीबी हटाओ का भी है, जो भाजपा का नहीं है। भाजपा उद्योगपतियों और व्यापारियों की ही नहीं, सवर्ण जातियों की भी पार्टी मानी जाती है। दूसरी ओर, कांग्रेस भी उद्योगपतियों और व्यापारियों की पार्टी है, पर वह गरीबों का नाम भी लेती रहती है और उनके लिए समय-समय पर कुछ कार्यक्रम भी बनाती रहती है। राष्ट्रीय ग्रामीण राजगार गारंटी योजना उसी ने लागू की थी, जिसका कुछ इलाकों में अच्छा असर पड़ा है। इस दृष्टि से देखा जाए, तो मतदाताओं ने कांग्रेस को चुन कर कुछ भी गलत नहीं किया।

कांग्रेस को असली चुनौती तब मिलती जब उसके मुकाबले कोई सचमुच का वामपंथी दल या दल समूह खड़ा होता। वामपंथी दलों ने यही सोच कर तीसरा मोर्चा बनाया था। लेकिन क्या यह वास्तव में तीसरा मोर्चा था? सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि इसका नेतृत्व कर रहे सीपीएम और अन्य वामपंथी दल स्वयं केरल और प. बंगाल में अपनी वामपंथी साख लुटा चुके थे। गरीब किसानों का दमन करने के मामले में वे किसी भी अन्य दल के मुकाबले ज्यादा क्रूर साबित हुए हैं। केरल के सीपीएम में घमासान चल रहा था। तीसरा मोर्चा बनाने के लिए जिन दलों का साथ लिया गया, वे अपने-अपने राज्य में राजनीतिक रूप से दिवालिया हो चुके थे। गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा होने का ऑटोमेटिक मतलब प्रगतिशील या जनवादी नहीं होता। फिर इनमें से अनेक दल ऐसे भी हैं जो अतीत में भाजपा के साथ रह चुके हैं। इसलिए उनकी विश्वसनीयता भी खटाई में थी। सच पूछा जाए तो तीसरा मोर्चा इतना बोगस था कि उसे वोट देने के बारे में कोई गंभीरता से सोच ही नहीं सकता था। इस तरह, बिना कुछ ज्यादा किए-कराए सत्ता एक तरह से मुफ्त में कांग्रेस की झोली में आ गिरी।

यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी की जीत स्वयं उसके लिए भी अविश्सनीय है। जब मीडिया के लोग अनुमान लगा रहे थे कि किसी भी दल समूह को बहुमत नहीं मिलेगा, तो वे हवा में कबड्डी नहीं खेल रहे थे। यही आकलन स्वयं राजनीतिक दलों का भी था। राहुल गांधी तो विपक्ष में बैठने के लिए भी तैयार थे। लालकृष्ण आडवाणी की आशाएं भी धीरे-धीरे धूमिल हो रही थीं, क्योंकि तमाम प्रयासों के बावजूद भाजपा की कोई लहर नहीं बन पा रही थीष्। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का खयाल आसमान से नहीं टपका था। इससे भी आडवाणी का भविष्य कुछ धूमिल हुआ।

बहरहाल, जो होना था, हो चुका। एक मान्यता है कि जो हुआ, वही हो सकता था। अगर कुछ और हो सकता था, तो वह हुआ क्यों नहीं? इसलिए कांग्रेस के जीतने को एक ऐसिहासिक घटना मान कर चलना ही उचित है। सवाल अब यह है कि आगे क्या? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि फिलहाल कांग्रेस का कोई प्रगतिशील विकल्प उभरता दिखाई नहीं देता। वामपंथियों में आत्मपरीक्षण के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। कायदे से प्रकाश करात को सीपीएम की शोचनीय पराजय के बाद अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए था। पर इसकी हलकी-सी आहट भी सुनाई नहीं देती। प. बंगाल की हार तो इतनी जबरदस्त है कि वहां के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को एक दिन के लिए भी अपने पद पर रहने का नैतिक हक नहीं है। इसी तरह, तीसरा मोर्चा में शामिल अन्य दलों में भी अंत:परीक्षण का कोई साक्ष्य दिखाई नहीं देता। यानी, भविष्य का परिदृश्य अत्यधिक धूमिल जान पड़ता है।

क्या यह चिंता की बात नहीं है कि इतने बड़े देश में कोई राजनीतिक विकल्प न हो जो जरूरत पड़ने पर वर्तमान सत्तारूढ़ दल का स्थान ग्रहण कर सके? कांग्रेस सफल होती है तो और नहीं सफल होती है तो भी, अच्छा लोकतंत्र वही होता है जिसमें वर्तमान का विकल्प हमेशा मौजूद रहे। इसे ही असली विपक्ष कहा जाता है। मौजूदा लोक सभा का सबसे दैन्यपूर्ण पक्ष यह दिखाई देता है कि इसमें कोई मजबूत विपक्ष नहीं है। यह सत्ता को निरंकुश बनाने के लिए काफी है। चूंकि वर्तमान राजनीति में कांग्रेस का कोई ठीक-ठाक विकल्प उभरता दिखाई नहीं देता, इसलिए कम से कम जनतंत्र के हित में आवश्यक है कि इसके लिए ठोस प्रयास किया जाए। ऐसा न हो कि पांच साल बाद फिर चुनाव की घड़ी आए और हम हाथ पर हाथ धरे पछताते रहें कि हाय, हमारे पास कोई सार्थक विकल्प नहीं हैं। विकल्प दो-चार महीनों में खड़ा नहीं होता। इसके लिए पांच वर्ष भी कम हैं। पर पांच वर्ष की अवधि इतनी छोटी भी नहीं है कि कुछ हो ही न सके। सवाल सिर्फ इतना है कि देश की तकदीर बदलने की कोई राजनीतिक इच्छा हमारे मनों में खदबदा रही है या नहीं।

राजकिशोर

Tuesday, May 12, 2009

मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और भारतीय मतदाता

मैं जब कभी लोगों से राजनीति के बारे में बात करता हूँ या किसी फोरम में लोगों के कमेंट्स पढता हूँ तो एक बात बहुत ही शिद्दत से उभर कर आती है, लोगों का पार्टी प्रेम। मैं हैरान हूँ, यहाँ तक कि हैरानगी की हद तक चला गया हूँ। इन लोगों के लिए समझ क्या बाहर से आयात करनी पड़ेगी?
जब किसी का ध्यान किसी क्षेत्र विशेष की समस्याओं पर दिलाया जाये तो वो उस पार्टी को गालियाँ देने लगता है जिसके खिलाफ वो आज तक वोट करता आया है। कल ही मैं एक वेबसाइट पर एक लेख पढ़ रहा था जिसमें मध्यप्रदेश की बदहाली का ज़िक्र और सीएम साहब से कुछ सवालात किये गए थे। उसमें नीचे पाठकों की टिप्पणियाँ थीं। सिर्फ ३ या ४ लोगों ने समझदारी की बात कही थी बाकी सारे लोग वाहियात सी बातें कर रहे थे। चूंकि मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है, वहां पर लोग लेखक को कांग्रेस का एजेंट साबित करने पर तुले हुए थे। उस बेचारे ने जो हाल देखा वो लिख दिया और इन लोगों को बिना बात की मिर्ची लग गई। एक महाशय लिखते हैं कि आप कांग्रेस शासित राज्यों में जाकर देखिये वहां क्या हुआ है? अरे मेरे भाई, तेरे घर में खाना नहीं होगा तो क्या तेरा पेट इसलिए भर जायेगा कि दूसरे के घर में भी खाना नहीं है? अजीब बातें करते हैं लोग, पता नहीं क्यों इस लोकतंत्र में लोक ही किसी काम का नहीं है, शायद इसीलिए लोकतंत्र भी किसी काम का नहीं रहा। मैं मध्यप्रदेश के एक छोटे कस्बे से हूँ। इतना छोटा भी नहीं, तहसील है। मैंने वहां अपने बचपन से लेकर आज तक हमेशा अँधेरा ही देखा है, बिजली थोड़ी देर ही आती है, सड़कें हमेशा ख़राब ही रहीं हैं लेकिन ये कांग्रेस बीजेपी के पिट्ठू अपनी वफादारी साबित करने में लगे रहते हैं। अरे यार तू ये देख न कि तेरी समस्या कौन हल करता है, नहीं लेकिन, मर जायेंगे पर पार्टी को वोट देंगे। यहाँ तक कहते हैं लोग कि फलां पार्टी से अगर कोई कुत्ता भी खड़ा होता है तो हम उसी को वोट देंगे और ऐसी बेशर्मी की बातें ये लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं। बताइये अब कहाँ जायेगा ये देश ऐसे बेवकूफों के हुजूम के साथ? यही वजह है कि कोई नेता कुछ नहीं करता, पता है कि ये बेवकूफ ऐसे ही मुट्ठी में है, और नहीं होंगे तो एक-आध मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और पकड़ा देंगे। बिजली नहीं है, पानी नहीं है, सड़कें नहीं हैं, ज़माने भर की समस्याएँ हैं लेकिन पार्टी का पट्टा गले में डाले रहते हैं। ६० साल से ज्यादा हो गएँ हैं जब अँगरेज़ हमें छोड़ गए थे लेकिन हमारे लोग बड़े ही नहीं हो रहे ... | क्या आप बता सकते हैं कोई हल... ?

--अनिरूद्ध शर्मा

Monday, May 11, 2009

प्रथम बार वोट देने वालों का सरोकार काम से - एक चुनाव झलकी

प्रेमचंद सहजवाला

लोकसभा 2009 पर मैं अभी तक तीन बड़ी रिपोर्ट्स दे चुका हूँ. पर ब-तौर एक झलकी प्रस्तुत करने के मुझे लगा कि ज़रा उन नौजवान मतदाताओं से साक्षात्कार किया जाए, जो मन में पहली बार वोट डालने का उत्साह लिए घर से निकले थे. सन् '84 में जब राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री बने तो अपने 5 - वर्षीय कार्य-काल में जो काम किए, उन में से एक महत्वपूर्ण काम यह था कि पहले मतदान करने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होती थी, उसे राजीव गाँधी ने घटा कर 18 वर्ष किया. देश की युवा पीढ़ी बेहद प्रसन्न थी. युवा पीढ़ी को देश की समस्याओं पर गौर करने और अपने निर्वाचन-क्षेत्र के प्रतिनिधियों का मूल्यांकन करने की प्रेरणा मिली. दिनांक 7 मई 2009 को दिल्ली में भी बहुत इंतज़ार के बाद मतदान की सरगर्मी आई. मैं इस दिन नई दिल्ली लोकसभा सीट के अलग अलग मतदान केन्द्रों पर जायजा लेने घूम रहा था. कुछ देर के लिए मेरी नज़र उन नौजवान मतदाताओं को खोज रही थी, जिन्हें बेसब्री से इंतज़ार था कि पहली बार वोट देने वाली शुभ सुबह आए तो वे वोट देने जाएँ. इस बात में दो राय हो ही नहीं सकती कि वरिष्ठ पीढ़ी कि तुलना में युवा पीढ़ी अधिक प्रखर भी है, और बेहद आशावान भी. अलबत्ता कुछ युवक-युवतियां राजनेताओं के गिरते चारित्रिक स्तर के कारण खिन्न भी थे और कुछ तो कतिपय उन बड़ों जैसी बातें भी कर रहे थे जो कहते रहते हैं कि सब के सब चोर हैं बाबूजी. आख़िर किसे पसंद करें. मैंने बहुत पहले किसी चुनाव में 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' पत्रिका में एक कार्टून देखा था कि एक आदमी एक मोटा से लेंस ले कर बहुत सारे टोपी-धारी नेताओं को एक एक कर के गौर से देख रहा था. किसी के पूछने पर उस ने कहा कि आज चुनाव है. मैं देख रहा हूँ कि इन में सब से कम बुरा कौन सा है, क्यों कि अच्छा मिलना तो ना-मुमकिन है न!

पर 7 मई वृहस्पतिवार को अधिकाँश युवकों युवतियों में मुझे एक बहुत उत्साहवर्द्धक आशा-वादिता भी दिखी. नौजवानों का कहना है कि अगर नौजवानों को मौका दिया जाएगा तो मुमकिन है कि देश को एक नई और स्वस्थ दृष्टि भी दे सकें और काम भी बहुत कर सकें. 'दिल्ली का दंगल', जैसा कि इसे माना गया है, मुख्यतः दो ही पहलवान पार्टियों के बीच रहा है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा). मैं जितने भी नव-मतदाताओं से मिला (पहली बार वोट देने वाले), वे सब मुख्यतः इन्हीं दो पार्टियों के बीच बँटे हुए थे, भले ही वोटिंग-मशीन पर 40 या उस से भी ज्यादा नाम लिखे हों. किसी का चुनाव-चिह्न आसमान पर खिंचा तीर-कमान था तो किसी का
डबलरोटी या केक या बल्लेबाज़ वगैरह. पर नज़र सब की या तो हाथ पर थी या कमल पर. यह बताना मुश्किल कि कमल खिलेगा या हाथ हंसेगा. पर एक बात सब में गज़ब की समानता रखती थी कि सब का सरोकार काम करने वाले से ही था. इस निर्वाचन-क्षेत्र में कोई विजय गोयल (भाजपा) की तारीफ़ कर रहा था कि उस ने चांदनी-चौक में बहुत काम किया और हमेशा कोई न कोई नई योजना बनाता रहता है तो कोई अजय माकन के लिए तारीफों के पुल बाँध रहा था कि अब उन्होंने यमुना नदी को साफ़ करने का वादा किया है, जो कि बहुत ज़रूरी काम है. कुछ युवतियों में बहस भी ठनी क्यों कि किसी किसी को सोनिया-प्रियंका अच्छी लगती हैं तो उस के विरोध में दूसरी का कहना है कि अच्छी महिलाएं भाजपा में भी हैं, सोनिया-प्रियंका बड़ी फैमिली की हैं, इसलिए हर कोई उनकी तरफ़ है. बहरहाल जो बात मन को खुश करने वाली थी, वो यह कि युवा पीढ़ी देश से बहुत प्यार करती है और चाहती है कि देश को केवल बातें करने वाले निकम्मे नेताओं से छुटकारा मिले और देश में कुछ कर गुज़रने का वातावरण बने. यह सोच ही आशा का वह दीपक है, जिस की रौशनी में भरष्टाचार और आतंकवाद का अँधेरा भी पार हो जाएगा, ऐसी आशा की जा सकती है.


--प्रेमचंद सहजवाला

Saturday, May 09, 2009

नोटिस है या नौटंकी

क्या मज़ाक़ लगा रखा है चुनाव आयोग ने। सन्नी देओल की दामिनी फ़िल्म का एक डायलॉग याद आता है जब वो भरी अदालत में ये कहता है कि तारीख पर तारीख़....तारीख़ पर तारीख़... मन करता है...चेप लूं...और बोलूं..नोटिस पे नोटिस ..नोटिस पे नोटिस। जया प्रदा पर चुनाव आचार संहिता का जब एक और मामला फिर से दर्ज हुआ, तो कुछ ऐसा ही लगा। एक सरकारी नोटिस से इस लोकतंत्र का तथाकथित राजा यानी आम आदमी के हाथ पैर फूलने लगते है। लेकिन जया जी पर आयोग की घुड़कियां असर डालती नज़र नहीं आती..नोटिस नहीं हो गया नौटंकी हो गयी। हम जैसे ख़बरियों के लिए हेडलाईन हो गई। साथ में पता चली नेताओं के सामने आयोग की औक़ात। ये कोई पहला मामला नहीं है। कोई पार्टी नहीं ह, जिसके नेताओं को आचार संहिता की अनदेखी करने के लिए नोटिस न जारी हुआ हो। सरकार की रेल चला रहे लालू हों या उनकी धर्मपत्नि राबड़ी हो। जया प्रदा हों। छुटभैया नेता हों। गाली गलौज़ हो, बिंदी बांटू अभियान हो या मुलायम जी और गोविंदा के नोट लुटाने जैसी दरियादिली हो। ये सब चुनाव आयोग की आँखों के सामने आया। आंखों में किरकिरी भी हुई। नतीजा नोटिस पर नोटिस। और दूसरी ओर से सफ़ाई पर सफ़ाई। जवाब पर जवाब। और हर जवाब के साथ आयोग लाजवाब। या तो चुनाव आयोग नोटिस के अलावा कुछ करने की हिम्मत नहीं जुटा रहा है, या फिर इन खद्दरधारियों के सामने नोटिस और उस पर सफ़ाई एक रूटीन वर्क बन गया है। सही भी है- चुनाव है तो जोश आ ही जाता है। आदमी कुछ बोल ही जाता है। कुछ ग़लत जैसा फ़ील नहीं होता। और भई दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का शो चल रहा है, कुछ तो मसालेदार आईटम होना ही चाहिए नहीं तो रंग नहीं जमेगा। पब्लिक बोलेगी कि इस बार के इलेक्शन में कुछ मजा नहीं आया। तो शो की टीआरपी बनी रहे। नेताओं की टीआरपी बनी रहे। कुछ न कुछ तो करते रहना पड़ेगा भाई। ऐसे में जनता जनार्दन का मूड देखा जायेगा या कि चुनाव आयोग की बंदरघुड़की, .डर नहीं लगता। अरे वरूण गांधी इतना कुछ बोल गया, तो चुनाव आयोग कुछ कर ही नहीं पाया। मुख्तार अंसारी का क्या कर पाया है चुनाव आयोग। इसी चुनाव आयोग के राज में फूलन देवी भी चुनाव लड़ चुकी है। शहाबुद्दीन जैसे लोग लोगों की नुमाईन्दगी करते आये हैं। ख़ून बहता रहा है। पैसा लूटता रहा है। लोग पाला बदलते रहें हैं। वोट ख़रीदते रहे हैं। वोट बिकते रहे हैं। बूथ लुटते रहे हैं। चौराहे पर बोली लगती रही है उस भरोसे की जो आम आदमी ने जताया इन तथाकथित अपने सेवकों पर। और ये सब कुछ होता रहा है चुनाव आयोग के सामने। चुनाव आयोग के रहते। तब अगर नेता इसके नोटिस को नौटंकी समझे तो समझ में आता है आयोग का असर। चावला जी इन नोट वालों को नोटिस नहीं आपका डंडा समझा सकता है। आप इस बात को समझे। नहीं तो सारी कोशिशे अंडा हो जायेंगी यानी ज़ीरो। नेताओं के फेवर में एक शायरी चुनाव आयोग के नाम-

मिटा सके हमको ये ज़माने में दम नहीं
ज़माना हमसे है ज़माने हम नहीं।


-रवि मिश्रा (लेखक ज़ी (यूपी) में न्यूज़ एंकर हैं)

Thursday, May 07, 2009

सन् 84 का दर्द और सिक्ख मत-दाता

समाज सेवक कुलदीप सिंह चन्ना के साथ अन्तरंग बातचीत - प्रेमचंद सहजवाला

उपरोक्त बातचीत के विषय में लिखने से पहले मुझे याद आ रहा है सन 2004, जब लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की शपथ ले रहे थे. शपथ-समारोह को देश के सभी चैनल दिखा रहे थे पर मैं यह कार्यक्रम देख रहा था बी.बी.सी पर. प्रारम्भ में ही बी.बी.सी पर दो पत्रकार बड़ी गरमागरम गुफ्तगू कर रहे थे. मनमोहन सिंह के शपथ लेने पर एक अजीब सा उत्साह पत्रकारों में भी था. एक पत्रकार दूसरे से भारत देश की तारीफ कर रहा था कि भारत एक सच्चे अर्थों में secular देश है जिस का राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम मुस्लिम है और अब एक सिख नेता प्रधानमंत्री की शपथ लेने जा रहा है. यानी दोनों अल्प-संख्यक समुदायों से. पर दूसरे साथी पत्रकार ने उसे तुंरत रोकते हुए कहा कि ये दोनों शख्सियतें इन महत्वपूर्ण पदों पर इसलिए नहीं पहुँची कि वे अल्पसंख्यक हैं, वरन् दोनों ही देश की राजनैतिक मुख्यधारा के माध्यम से अपनी योग्यताओं के आधार पर आगे आए हैं. उस समय एक जिज्ञासा सब के मन में थी कि यदि सोनिया ने प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार कर दिया तो आख़िर मनमोहन सिंह को ही क्यों चुना. कुछ लोग अपनी ओर से अटकल लगा रहे थे कि सन 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जिस नृशंस तरीके से अबोध सिक्खों की हत्याएं हुई, उस के बाद सिक्ख समुदाय कांग्रेस पार्टी को कभी क्षमा नहीं करेगा क्यों कि दिल्ली के कतिपय कांग्रेसी नेताओं पर यह इल्जाम लगता रहा है कि उन नृशंस हत्याओं के पीछे उन्हीं का हाथ है. इसलिए सोनिया जी सिक्ख समुदाय से अपने टूटे रिश्तों को जोड़ने के लिए उनके ज़ख्मों पर अपने तरीके से मरहम लगना चाहती हैं. पर जहाँ एक तरफ़ मनमोहन सिंह के पाँच वर्ष के शासन काल में बी.बी.सी पत्रकारों द्वारा कही हुई बात साबित हो गई कि वे किसी विशेष समुदाय के प्रधानमंत्री नहीं हैं, वहीं पाँच वर्षों में उन्होंने किसी भी समुदाय विशेष को प्रसन्न करने के लिए कोई अलग से कदम नहीं उठाया, वरन वे देश की आर्थिक स्थिति व आतंकवाद से जूझते रहे, जिसमें उन्हें कभी सफलता मिली कभी असफलता. पर हाल ही में मैंने जब अपने निर्वाचन क्षेत्र में अजय माकन का भाषण एक पत्रकार के रूप में कवर किया तो यह देख कर चकित था कि मंच पर अच्छी खासी मात्रा में सिख भी उपस्थित थे क्यों कि मानसरोवर गार्डन व राजौरी गार्डन के आसपास के इस इलाके में जहाँ भाषण हो रहा था, वहां सिक्ख जनसँख्या भी अच्छी खासी है. ऐसे में किसी के भी मन में यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि क्या सिख समुदाय कांग्रेस को क्षमा कर चुका है? या कि अब वह कांग्रेस के साथ इसलिए है कि कांग्रेस एक सिक्ख नेता को प्रधानमंत्री बनाए हुए है. दोनों प्रश्नों के उत्तर मेरे मन में मिले जुले से हैं. पिछले महीने जगदीश टाईट्लर को टिकट मिलने के सवाल पर एक सिख पत्रकार ने गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंक दिया. उधर अदालत जब टाईट्लर पर फ़ैसला देने वाली थी तब बाहर जमा सिख समुदाय व उस का आक्रोश काबिले-गौर था. पर उस भीड़ का थोड़ा सा विश्लेषण करने पर यह भी स्पष्ट था कि उस आक्रोश का नेतृत्व अकाली-दल कर रहा था. यानी सिक्ख परिवार, जिनके घरों से कई प्यारे लोग चले गए, उन के साथ न्याय तो जाने कब हो, पर उस पर राजनीती भी कम नहीं हो रही. यही कहना है इस इलाके के प्रसिद्ध समाज-सेवी सरदार कुलदीप सिंह चन्ना का कि सिक्ख समुदाय तो सदियों से अत्याचार सहन करता आ रहा है. उनकी लाचार आस्था है ईश्वर में कि ईश्वर कभी न कभी गुनाहगारों को सज़ा देगा ही, पर वे गुजरात में सन 2002 में हुई नृशंस मुस्लिम हत्याओं का सन्दर्भ दे कर कहते हैं कि कुछ पार्टियाँ सन 84 की नृशंस हत्याओं को केवल चुनाव के दौरान ही उठाती हैं. यह पूछने पर कि क्या मनमोहन सिंह के प्रति उन का उत्साह इसलिए है कि वे उन के ही मज़हब के हैं, यानी सिक्ख हैं, वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि नहीं, मनमोहन सिंह एक काबिल प्रधानमंत्री हैं जिन की विदेशों में भी बहुत अच्छी साख है. अलबत्ता वे कांग्रेस के प्रति आभार भी प्रकट करते हैं कि कांग्रेस ने ही देश को सिक्ख राष्ट्रपति दिया, सिक्ख सेना-अध्यक्ष दिया और अब सिक्ख प्रधान मंत्री. उनकी बात आइये, हम उनकी ही ज़बान से सुनें, शायद इसे सुनने से हम एक झलक सिक्ख समुदाय के हृदय की पा सकेंगे.



बातचीत-1बातचीत-2
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Tuesday, May 05, 2009

गिरता मतदान- लोकतंत्र या अल्पतंत्र

रवि मिश्रा ओसामा से ओबामा तक और मैडोना से मल्लिका तक की ख़बर, हम तक पहुँचाने वाले एक ख़बरिया चैनल की बोलती ज़ुबान हैं। ज़ी (यूपी) में न्यूज़ एंकर रवि मिश्रा छपरा, बिहार से चलकर नोएडा पहुँचे हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 15वें महापर्व में वोटरों का घटता रूझान इन्हें चिंतित कर रहा है।

चुनाव आयोग ने जब चुनाव की घोषणा की तो कई आंकड़े दिये. सत्तर करोड़ से भी ज्यादा मतदाता बताये और ये भी बताया कि कितने नये मतदाता जुड़े हैं वोटर लिस्ट में. सुनकर लगा कि हमारे लोकतंत्र का दायारा बढ़ता जा रहा है. अब जबकी धीरे - मतदान आगे बढ़ रहा है और ये बात सामने आ रही है कि ये बड़ी संख्या में वोटर मतदान नहीं कर रहे हैं. मतदान का कम प्रतिशत भले ही चिंता की बात है- चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के लिए, लेकिन ये एक बेहद गंभीर संकेत है अल्पतंत्र की ओर बढ़ते क़दम का.पप्पू को जगाने के लिए जागो रे जैसे अभियान भी चले लेकिन लगता है पप्पू पप्पू ही बना रहना चाहता है.वोट नहीं डालता. ये सवाल तो ये है ही कि क्यों वोटिंग प्रतिशत कम है. देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाला राज्य उत्तर प्रदेश चालीस और पचास प्रतिशत के बीच झूल रहा है, जहां के चुनावी दंगल में नेता जितना ताल ठोक रहे हैं वहीं जनता ताली तक बजाने के मूड में नज़र नहीं आती. कारण कई हैं. पर इस सबसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के आलोचकों के उस तर्क को बल मिलता है जो ये कहते हैं कि लोकतंत्र कुछ लोगों का ही तंत्र हैं. बहुमत सत्ता की भागीदारी से दूर रहती है. जब उत्तर प्रदेश में 44-45 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया तो ये बात तो तय है कि नतीजे भी इन्हीं के दिये वोटों पर तय होंगे.यानि 55 प्रतिशत की आबादी बिना मत व्यक्त किए एक सरकार को स्वीकार कर लेगी. अगर पूरे भारत की भी बात कर लें तो हार जीत भी 50-60 प्रतिशत मतदान पर तय होगा. पार्टियों की हार जीत इन्ही वोटों पर तय होगी. फिर हार का अंतर कितना भी हो , जीता हुआ प्रत्याशी उस पूरे क्षेत्र के लोगों की नुमाइंदगी करेगा. सरकार बनवायेगा.ये कैसा शासन होगा जहां कम वोटिंग में भी हार जीत का फ़ैसला हो जाता है. सरकारे बन जाती हैं. अगर वोटिंग 40 प्रतिशत है जो बाक़ि के 60 प्रतिशत लोगों की राय लिए बिना हार जीत का फ़ैसला हो जाता है. और फिर फ़ैसला होता उनके पांच सालों का. इस अल्पतंत्र के तत्व के साथ पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था का दंभ कैसे भरता है हमारा सिस्टम, समझना मुश्किल है. वोटों का लगातार गिरता हुआ प्रतिशत हमें असल में एक ऐसी व्यवस्था की तरफ ले जा रहा है जहां अल्पमत बहुमत के छद्म रूप में दिखता है और लोकतांत्रिक व्यवस्थ का झूठा आभास दिलाता है. कई देशों में ख़ास कर सोवियत संघ के टूटे हूए घटकों में ऐसी व्यवस्था है जिसमें 50 प्रतिशत से कम वोटिंग होने पर हार-जीत का फ़ैसला नहीं होता. पुन: मतदान कराया जाता है. ये सुनिश्चित किया जाता है जो राज करेगा उसे असल में बहुमत का समर्थन प्राप्त है. अगर भारत में ये सिस्टम लागू हो जाये तो अल्पतंत्र की तरफ़ बढ़ते क़दम पर एक अवरोध लगाया जा सकता है. लेकिन ये स्पीडब्रेकर लगाने के लिए शायद चुनाव आयोग को ये सुनिश्चत करना होगा कि वोटिंग प्रक्रिया और ज्यादा प्रो- पीपुल हो. ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान प्रक्रिया का हिस्सा बन सके. वोटरों की उदासीनता और नेताओं का चरित्र देखकर यह निकट भविष्य में आसान नहीं दिखता. और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक पप्पू पप्पू बना रहेगा और इस लोकतंत्र के अल्पतंत्र द्वारा शासित रहेगा.

Monday, May 04, 2009

यथा-राजा तथा-प्रजा


जी हाँ वक्त के साथ-साथ न केवल कहावतों, मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं अपितु उनकी शब्दावली में भी उलट-फ़ेर हो जाता है। पिछले जमाने में राजा का पद वंशानुगत होता था और पीढियों तक चलते-चलते प्रजा मजबूरी में राज-परिवार की फ़ितरत-स्वभाव के मुताबिक खुद को ढाल लेती थी, गुजारा जो करना था। जैसा हमने सुना है कि कई रजवाड़ों में नवविवाहिता को अपनी पहली रात मजबूरन राजमहल में गुजारनी पड़ती थी। मेरे गांव में कलानौर के नवाब के महल से पहली रात को भाग कर एक नवविवाहिता ने लगभग १२५ साल पहले शरण लेने व उसके बाद गांव वालों के कलानौर पर चढाई कर नवाब के कत्ल की कथा आज भी कही जाती है। उसके महल के बुर्ज पर लगे हवा की दिशा जानने हेतु लगाए गए यंत्र व नवाब के नगाड़े जो आज भी एक संत की समाधि-स्थल पर सुरक्षित है, को सबूत बतलाया जाता है। यह कथा आसपास के गावों तथा भांदो द्वारा आज भी गाई जाती है। खैर यह कथा एक ओर।

आज देश में प्रजातन्त्र है, यानी प्रजा अपना राजा या प्रतिनिधि चुनने में स्वतंत्र है, तो हम कह सकते हैं कि जैसी प्रजा है वैसा राजा होगा। मैं, आप यानी प्रजा यह मानने को कतई तैयार न होगी कि गैंगस्टर-अपराधियों को चुनने में उसका कोई दोष है। हम सब विकल्प न होने की दुहाई देने लगते हैं- क्या मैं गलत कह रहा हूँ?
पर हम यानी जनता-जनार्दन खासी तंग है अपने चुने गये प्रतिनिधियों से। तो क्या करें ? हमें इस चुनाव तथा आगे आने वाले चुनावों में कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिये।

हम सब जानते हैं कि पिछले कुछ बरसों से देश में संयुक्त मोर्चा सरकारें राज कर रहीं है क्योंकि कांग्रेस या भाजपा दोनो तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियाँ बहुमत प्राप्त नहीं कर पा रहीं और उन्हे क्षेत्रिय दलों की वैशाखी पर आश्रित रहना पड़ता है। और उनकी ब्लैकमेलिंग तो हमने पिछली लोक सभा के शक्ति परीक्षण काल में देखी ही है, शिबू सोरेन और देवगौड़ा एक दिन में ही 3-4 बार इधर-से उधर होते नजर आए। हम यह भी जानते हैं (आज मीडीया आंकड़े दे रहा है) कि ये क्षेत्रिय दल ही सब से ज्यादा अपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी खड़े करते हैं, जो अपने धन-बल व जातीय समीकरण द्वारा जीत भी जाते हैं। अब ऐसे तत्वों की जीत की संभावनाओं के चलते राष्ट्रीय पार्टियाँ भी उन्हें टिकट देने को मजबूर हो गयीं, मैं यह नहीं कहता कि ये तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां दूध-धुलीं हैं। वे तब तक ऐसे तत्वों को टिकट देंगी, जब तक वे जीतते रहेंगे। तो हमें चाहिये कि
इस चुनाव व आगे आने वाले चुनावों में भी केवल इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों को ही वोट दें चाहे वह कैसा ही हो। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां का उम्मीदवार न हो वहां भी क्षेत्रिय पार्टी के उम्मीद्वार के स्थान पर किसी निर्दलीय कोवोट दें। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों में किसी पार्टी ने दल-बद्लू को टिकट दी हो वहां उसे वोटे न दें।

इससे आज ही कोई परिणाम आएगा ऐसा नहीं है लेकिन धीरे-धीरे हवा बदलेगी और जब इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों को जनता की मनसा का ज्ञान होने लगेगा तो वे खुद भी इस और ध्यान देंगी। तब जनता इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उस उम्म्मीद्वार को नकारना आरम्भ करेंगे जो आपराधिक पृष्ठभूमि का होगा।
हमें (हम पढे लिखे लोगों) को यह अभियान केवल चुनाव के समय ही नहीं अपितु सतत जारी रखना होगा, जिससे अगले-उससे अगले चुनाव तक आमजन इस बात को अपना ले और सच मानें आमजन जो ब्लॉगिंग नही जानता, अब इस बात को मानता है कि देश में दो पार्टियां ही होनी चहियें, उसे जरूरत है मार्ग-दर्शन की। यह विश्वास दिलाने की कि ऐसा संभव है। अब तक ये आपराधिक तत्व उन्हे विश्वास दिलाने में काम्याब रहें है कि उनकी जाती का सासंद-विधायक ही उनका भला कर सकता है, पर अब वे भी जान गये हैं कि यह केवल दिखावा है और वे आपकी रहनुमाई की राह देख रहे हैं। इस चुनाव में हरियाणा की जनता का मूड देखकर मैं यह बात कह रहा हूं और चुनाव नतीजे बतला देंगे कि मेरा आकलन सही है या गलत है। केवल कुछ दिनों की बात है।
आगे चलकर हम ब्लॉगिंग व सेमिनारों-सभाओं मे जहां ये सांसद-इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के बुलाए जाएंगे इन्हें ही कुछ बातें पहुंचाएं (हम हरयाणा मे ऐसा करने में लगे है)कि

  1. संसद में ऐसा नियम कानून लाया जाए कि किसी पार्टी में अगर किसी पार्टी का विघटन होता है, तो जो घटक एक पार्टी से समर्थन वापिस लेकर (जिसे अब तक पूरी पार्टी समर्थन दे रही थी) दूसरी पार्टी को समर्थन देना चाहे तो उसे इस नई पार्टी में विलय होना पड़ेगा अन्यथा उसके सदस्यों की सदन सदस्यता स्वत: खत्म हो जाएगी (ऐसा अब तक तब होता है जब इन की संख्या पार्टी की अविभाजित संख्या के एक तिहाई से कम हो)।

  2. यही नहीं अगर कोई पूरी की पूरी पार्टी भी एक मोर्चे से समर्थन वापिस लेकर दूसरे मोर्चे का समर्थन करना चाहे तो उसे भी दूसरे मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे विलय करना पड़ेगा।

  3. किसी को भी बहुमत प्राप्त न होने पर अगर कई पार्टियां मिलकर सरकार बनाना चाहें तो उन्हें अपनी पार्टी का विलय उस मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे करना अनिवार्य कर दिया जाए।

  4. चुनाव में अगर किसी पार्टी को कम से कम 5 राज्यों में प्रतिधित्व प्राप्त नहीं हो तो उसके सदस्यों का किसी राष्ट्रीय पार्टी में विलय अनिवार्य हो। अगर वे ऐसा न करें तो उनकी सदस्यता खत्म कर दी जाए।

  5. निर्दलीय सदस्य अगर किसी एक मोर्चे में शामिल होने के बाद अपना समर्थन वापिस लेना चाहे तो उसकी सदस्यता खत्म हो।


यह सच है कि ऐसा होना अभी संभव नहीं है लेकिन अगर देश के बुद्धिजीवी लामबंद हो जाएं तो निकट भविष्य में स्थिति अवश्य सुधरेगी।
आमजन को अगर दिशा दी जाए तो वह करने को तैयार रहता है। हमारे देश में एमरजेंसी के बाद के चुनाव, बोफ़ोर्स के बाद के चुनाव व बर्लिन की दीवार का टूटना-सोवियत संघ व ईस्टर्न यूरोप की तथाकथित तानाशाहियों का टूटना,आमजन की ताकत का नमूना नहीं तो क्या हैं ? जरा सोचें

कुछ और विकल्प
एक अन्य विचारधारा- हमें अमेरिकन यानि राष्ट्रपति पद्धति अपनानी चाहिये, जिससे यह अनिश्चितता खत्म हो जाए। सरकार गिरने का खतरा न रहे। अगर आप ध्यान करें तो देखें केवल दो उदाहरण- बिल क्लिंटन कांड अगर हिन्दुस्तान में होता (जब बिल क्लिन्टन अपने रक्षामन्त्री से बात कर रहा था तो मोनिका लेविन्सकी से संलग्न था), क्या भारतीय प्रधानमन्त्री ऐसी बात उजागर होने पर इस्तीफ़ा देने को बाध्य नहीं होता? ब्रिटेन में प्रोफ़्मयो कांड का उदाहरण देखें।
हमारे यहां न्यूक्लियर संधि में मनमोहन की कुर्सी ही नहीं, सरकार भी येन-केन प्रकारेण बची, लेकिन जनाब बुश तो गलत रिपोर्ट बनवाकर इराक पर हमला कर बैठे। क्योंकि उन्हें तानाशाह जैसी ताकत हासिल थी।

एक और विचार- चुनाव में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलें उतने ही सांसद उसे मिल जाने चाहियें। दोस्तो, हमारे समाज मे जाति-धर्म का दुरुपयोग चुनाव में जिस तरह होता है, यह तरीका उसे और बढावा देगा। मित्रो, हमारे पुरखों ने जो आजादी की लड़ाई से तपकर कुन्दन बनकर निकले थे और उस वक़्त उनके दिमाग में आमजन की भलाई व आमजन की स्वतंत्रता कायम रखने व उनके मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के अलावा कोई और विचार नहीं था। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सविंधानो को पढ़कर-मनन कर एक बेहतरीन संविधान हमें दिया था, जिसमें जो कमियां नजर आईं उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता दूर भी करने के प्रयत्न जारी हैं। जैसे दल-बदल पर कानून, सूचना का अधिकार अधिनियम आदि। मुझे लगता है कि अगर वोटर सही प्रतिनिधियों को चुनकर भेजेंगे तो आमजन के कल्याण हेतु और भी नियम बनेंगे। हमारा संविधान एक बहुमूल्य दस्तावेज है। बस यह जिनके (हमारे) लिये बनाया गया है, उन्हें जागरूक रहना है।

लेखक- डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

Friday, May 01, 2009

भाजपा प्रचार जानी पहचानी लीक पर

हिन्द-युग्म के प्रेमचंद सहजवाला उम्र के इस पड़ाव पर भी हाथ में कैमरा लिये कोई न कोई चुनाव रैली में शामिल हो जाते हैं। आम जनता और उनके भावी प्रतिनिधियों से एक पेशेवर पत्रकार की तरह बात करते हैं। सभाओं में श्रोता बनना इन्हें ख़ासा रुचिकर लगता है। पिछले हफ़्ते इन्होंने कांग्रेस के अजय माकन को कैमरे में कैद किया था और उसकी एक रिपोर्ट दी थी। आज कैद हुए है भाजपा के रविशंकर प्रसाद॰॰॰॰


लोक सभा चुनाव 2009 कई अर्थों में बेहद महत्वपूर्ण हो रहे हैं। एक तो यह कि 15वीं लोक सभा शायद सरकार बनाने वाली पार्टी के लिए सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण होगी। पार्टियों और नेताओं का एक लंबा जुलूस सा है। कांग्रेस के बारे में भले ही यह कहा जा रहा हो कि भाजपा की तुलना में उस की स्थिति थोड़ी सी ही बेहतर है, पर दिन ब दिन कांग्रेस की मुश्किलें भी बढ़ती नज़र आ रही हैं और कांग्रेस-भाजपा की टक्कर और अधिक तीखी होती जा रही है। कभी तो कांग्रेस को लालूप्रसाद और मुलायम सिंह छोड़ कर अपनी डफली बजाने में लगे हैं, कभी शरद पवार को प्रधानमंत्री बनने के सपने आते हैं। तो कभी अचानक क्वात्राची का पुराना भूत आकर 10 जनपथ पर मंडराने लगता है। कभी कोई कह देता है कि मनमोहन सिंह तो केवल 'नाइट वॉचमैन' हैं और चुनाव जीतते ही कांग्रेस सहसा राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बना देगी। टीवी चैनलों के भी खूब मौज हो गई है। कोई-कोई चैनल ग्लैमर को बढ़ावा देने के लिए प्रियंका गाँधी की साड़ियों की प्रदर्शनी लगा देता है, जिन में प्रियंका अपनी दादी माँ यानी इंदिरा गाँधी की साड़ियों में से अपने लिए साड़ी चुनती नज़र आती हैं। पर सारी चमक-दमक व मनमोहन सिंह की साफ़ सुथरी छवि के बावजूद कांग्रेस पर यह खतरा बना हुआ है कि जैसे 2004 के चुनावों में उम्मीद वाजपेयी की जीत की थी और जीत गई थी सोनिया, तो कहीं इस बार ठीक उल्टा न हो जाए। नए प्रधान मंत्री को शपथ दिलवाने के तैय्यारी कर रही हों सोनिया जी और बाज़ी मार ले जाएँ आडवानी जी! आडवानी और मोदी के द्वंद्व पर भी मीडिया अच्छे पैसे कमा लेता है, यह कह कर कि क्या मोदी ही भाजपा का असली चेहरा हैं?

बहरहाल, इस बीच मैं दिनांक 24 अप्रैल को जनकपुरी मेट्रो स्टेशन के नज़दीक बने 'एस के बैंकेट हाल' में आयोजित भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद का भाषण सुनने चला गया। रविशंकर प्रसाद वाजपेयी के नेतृत्त्व वाली सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं तथा भाजपा की सांप्रदायिक छवि के तुलना में एक 'सेकुलर' नेता व सुलझी हुई सभ्य शख्सियत माने जाते हैं। पर जैसा कि हर चुनाव में होता है, इस बार भी भाजपा का प्रचार नकारात्मक वोटों पर ही आधारित है। कांग्रेस के विफलताओं की रोटियां सेंक कर खाना भाजपा का बहुत पुराना खेल है। रविशंकर प्रसाद सुप्रीम कोर्ट के एक जाने माने वकील भी हैं तथा भाषण बहुत प्रभावशाली करते हैं। उन्होंने सब से पहले अपने समय की एन.डी.ए सरकार की एक बड़ी उपलब्धि यही मानी कि सन 98 में परमाणु परीक्षण कर के एन.डी.ए सरकार ने भारत को अग्रणी देशों में ला खड़ा किया। परन्तु जब मैंने भाषण के अंत में मंच पर जा कर यह प्रश्न किया कि परमाणु शक्ति होने के कारण भारत पाकिस्तान पर हमला ही नहीं कर पा रहा, वरना इतने आतंकवादी हमलों के बाद भारत के पास यही विकल्प है कि पाकिस्तान पर हमला कर के उन के आतंकवादी अड्डे नेस्तनाबूद कर दे। पर रवि शंकर प्रसाद यह मानने को तैयार नहीं हैं। बल्कि रोचक बात यह है कि उन्होंने पाकिस्तान को सीधा करने का वही तरीका बताया जो इस समय कांग्रेस को अपनाना पड़ रहा है। वे कहते हैं कि भारत के पास कई और तरीके हैं, जैसे कि सख्ती। और दुनिया के कई देश भारत की बात मानते हैं. यानी राजनयिक (diplomatic) तरीका। मुझे इस से भी अधिक रोचक बात यह लगती है कि कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक व विदेशी नीतियां एक दूसरे के फोटो-कॉपी ही हैं। कुछ दिन पहले तो रजत शर्मा ने 'आप की अदालत' में भाजपा नेता अरुण जेटली से पूछ ही लिया कि इतने ढेरों दलों के खिचडी से तो बेहतर है कि कांग्रेस और भाजपा मिल-जुल कर सरकार बनाएं। अरुण जेटली ने वही जवाब दिया जिसकी उम्मीद थी, हालांकि उपस्थित दर्शक-गण ने रजत के सवाल पर भरपूर ठहाका लगाया था। जेटली कहते हैं कि समय के साथ राजनैतिक ध्रुवीकरण भी हो चुका है। अतः भाजपा और कांग्रेस का मिलना तो अब दूर की बात ही रही। रविशंकर प्रसाद ने अपने भाषण में मंहगाई, आतंकवाद, काला धन, अफज़ल गुरू, कांधार विमान-अपहरण, बंगलादेशी घुसपैठिये, कसाब के बजाय दूसरे मृत आतंकवादी का डी.एन.ए टेस्ट पाकिस्तान भेज देना, सन 84 की सिख हत्याएं, हिंदू- मुस्लिम प्रश्न... इन सब जाने पहचाने प्रश्नों के चिरपरिचित लीक पर अपना प्रभावशाली भाषण रखा। हिंदू-मुस्लिम प्रश्न पर भाजपा की गिरगिट बाज़ी का प्रदर्शन उन्हें भी करना पड़ा शायद। वोटों के समय भाजपा एक नकली मुखौटा चढ़ाती है कि वह मुसलमानों की दुश्मन नहीं है। पर ज़रूरत पड़ने पर जैसा गुजरात में हुआ, नरसंहार अपनी आंखों से होता देखते रहने में कोई संकोच नहीं करती। न ही वह उड़ीसा की शर्मनाक ईसाई हत्याओं का कोई जवाब देती है। रोचक बात यह कि रविशंकर प्रसाद जी का कहना है कि उन की पार्टी मौलाना आजाद, परम वीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद, इरफान पठान व सानिया मिर्जा पर गर्व करती है। वास्तविकता यह है कि मौलाना आजाद की छवि पुराने जनसंघी नेता चुन-चुन कर बिगाड़ते रहे और अब्दुल हमीद के विषय में उन का प्रचार यही था कि सन 65 की लड़ाई के बाद दिखावे के तौर पर एक मुस्लिम को भी परम वीर चक्र दे दिया गया। बैंकेट हॉल में जहाँ शादी के बाद दूल्हा दुल्हन बैठते हैं, ऐसे एक हॉल में लगभग 600 लोग थे जिन में कई तो कार्यकर्त्ता थे। पर रविशंकर प्रसाद अपने प्रस्तुतीकरण में काफ़ी सशक्त रहे. वोटों के दिन जनता क्या करती है, यह जनता के गत जनता जाने।
इधर दिनांक 29 अप्रैल को मैं अपने घर बैठा चंगा भला फिल्मी गाने सुन रहा था कि नीचे कार्यकर्ताओं का शोर सा सुनाई दिया. 'भारतीय जनता युवा मोर्चा' के कार्यकर्ता एक वैन में प्रचार को निकल पड़े थे और उनके साथ थी यहाँ रमेशनगर की निगम पार्षद उषा मेहता, जो यहाँ की एक लोकप्रिय नेता हैं, अपनी सुंदर वाणी और हावभाव के लिए प्रसिद्ध। उन से मैंने पूछा कि नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र को ले कर उन की क्या योजनाएं हैं तो उन्होंने भी मंहगाई की बात कर के यह कहा कि नई दिल्ली में अजय माकन के होते जो तबाही हुई है, उस से दिल्ली को बचाना हमारा ध्येय है. हर बार की तरह कार्यकर्ताओं में उत्साह और धूमधड़ाका था पर आडवानी और मनमोहन सिंह की तुलना में आख़िर इस चुनाव का ऊँट किस करवट बैठता है, यह जानने के लिए सब को इंतज़ार है चुनाव ख़त्म होने का और 16 मई को परिणाम आने शुरू होने का।

रविशंकर प्रसाद से सवाल करते प्रेमनिगम पार्षद उषा मेहता का जवाब

Thursday, April 30, 2009

भूतपूर्व का महत्व

संदीप कुमार मील राजस्थान राज्य के सीकर जिले के रहने वाले हैं। वहाँ के एक स्थानीय कॉलेज से ग्रेजुएशन कर और अपने गाँव-जवार की बातें लेकर जब ये दिल्ली के जेएनयू में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने पहुँचे तो हिंदी माध्यम के विद्यार्थी को अचानक ऐसा लगा कि एक गाँव से आने वाले किसान के लड़के के साथ पैसे वालो के व्यवहार में बहुत फ़र्क होता है, वे एक ऐसी नज़र से देखते है कि गरीब और उनके बीच कोई दीवार हो। इस हालत में इन्हें लगा कि ये सिर्फ संदीप नहीं हैं- ये उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समाज कि मुख्यधारा से अलग है, इन्हें उनके स्वाभीमान को नहीं मरने देना चाहिए। इसीलिए अंतराष्ट्रीय संबंधों का विधार्थी होते हुए भी अपनी बात कहने का जरिया इन्होंने हिन्दी साहित्य को बनाया है। पत्रिकाओ में छपते रहते हैं। बैठक पर प्रकाशित होने का पहला अनुभव है। कला से कुछा ज्यादा ही प्रेम होने के कारण नाटक में अभिनय करना शुरू कर दिया है।. पिछले दो सालों से 'सहर' नामक संस्था के साथ रंगकर्म से जुड़े हैं। जेएनयू में लोग एक नाटककार, पोस्टर चिपकाने वाला, नारा देने वाला, कहानी लिखने वाला आदि कई नामों से इन्हें जानते हैं। वैसे प्रगतिशील आदमी हैं। कहते हैं-जिनगी का कोई ठिकाना नहीं है जो मन में आता है वही करता हूँ॰॰॰॰

जबकि हर तरफ नेता-चुनाव-लोकतंत्र की चर्चा है तो ये भी इससे अछूते नहीं है। अपने व्यंग्य के ज़रिए 'भूतपूर्व' की महिमा बता रहे हैं।



साधारणतया लोग भूतों से डरते हैं मगर इस देश के राजनेता, प्रशासक, सैनिक अधिकारी आदि लोगों को भूतों से बहुत प्रेम हैं। वे जब तक पद पर बने रहते हैं तब तक बेचारे भूत की कोई फिक्र नही करते और पद छोड़ते ही श्रीमान जी अपने पीछे `भूतपूर्व' हो जाते हैं। जैसे- भूतपूर्व प्रद्यानमंत्री, भूतपूर्व मुख्यमंत्री, भूतपूर्व सचिव आदि। इन दिनों तो यह प्रचलन इतना बढ़ चुका है कि लोग अपने नाम के पीछे 'भूतपूर्व चोर' भी लगा लेते हैं। जिसका अर्थ बताते हैं कि वो पहले चोर थे मगर अब आध्यात्म अपना लिया है। फिर भी उन्हे अपने भूतकाल पर इतना फ़क्र होता है कि वो आज भी पहले `भूतपूर्व चोर' लिखते हैं फिर अपना नाम।
हाल ही में इस देश में एक आदमी बीमार था। यूं तो हजारों लोग यहाँ मरते है जिनकी कहीं कोई चर्चा नही होती मगर वो भूतपूर्व प्रद्यानमंत्री होने के नाते रोज समाचार पत्रों की दो बाई दो की जगह घेरे रहता है। मेरा भी आजकल मन करता है कि मैं भी `भूतपूर्व' हो जाऊँ मगर मुझे भूतों से बहुत डर लगता है, इसलिए यह क्रांतिकारी कदम नहीं उठा सकता।
भूतपूर्व लगाने से आदमी को उसका भूतकाल हमेशा याद रहता है। वैसे सारे मनुष्य लगा सकते है `भूतपूर्व जानवर' ताकि आदमी को यह अहसास रहे कि वो कभी जानवर था, इसीलिए आज भी जानवरों जैसी हरकतें कर देता है। कल श्री राम सेना वाले भी अपने नाम के पीछे लगाएँगे `भूतपूर्व पब कलचर पर हमलाकारी'। मेरे दादा जी के एक दोस्त भूतपूर्व मंत्री हैं। वो कहते हैं कि जब हम मंत्री थे तब यह भ्रष्टाचार जैसी चीजों के लिए कोई जगह नहीं थी मगर अब क्या करें हम तो भूतपूर्व हो गये। वो बात अलग थी कि उनके सरकारी कार्यकाल के दौरान उनकी सम्पति मे अभूतपूर्व वृद्धि हुई। आज भी उनके यहॉँ आयकर विभाग का छापा नहीं पड़ता है क्योंकि उनके पास `भूतपूर्व मंत्री' का कवच है। उनकी गाड़ी को कोई पुलिस वाला नहीं रोकता क्योंकि वो अपनी गाड़ी की नम्बर प्लेट पर बड़े-बड़े लाल अक्षरों में छपवा रखा था `भूतपूर्व मंत्री'। बेचारे पुलिस वाले डरते है कि कहीं भूत इनका पीछा छोड़ दिया और यह सिर्फ मंत्री हो गये तो उनके बच्चों को मिड डे मिल पर काम चलाना पड़ेगा, और यह अपना भूत उनके पीछे लगाकर उन्हें `भूतपूर्व इन्सपेक्टर' बना देंगे।
वाह रे! कुर्सी जब तक नीचे है तब तक तो मजा है ही और नीचे से हटते ही लोग `भूतपूर्व' लगा कर मजा करेंगे। अगर उपयोगितावाद का यह सिद्धान्त बेचारे जरमी बेंथम को पता होता तो वह छाती पीट-पीटकर रोता कि वो हिन्दुस्तान में क्यों नही जन्मा?
कुछ दिनों पहले राजस्थान के विधानसभा चुनाव में मैं वहँ एक गावँ में था, उसी दिन एक विधायक पद के उम्मीदवार का भाषण था जो पहले मुख्यमंत्री थे और अब `भूतपूर्व मुख्यमंत्री' रह गये थे। वे सभा में आये और बोले, `भाइयों और बहनों मुझे बचा लिजिए, मेरी जान आपके हाथों में है, मुझे भूत से बहुत डर लगता है। आप इस बार अपना अमूल्य वोट देकर मेरा भूतपूर्व हटा दें ताकि मैं मुख्यमंत्री रह जाऊँ।"
मुझे भी इस भूतपूर्व शब्द से इतनी मोहब्बत हो गई है कि मैंने उठकर पूछा, "श्रीमान जी आपके भूतपूर्व वादों का क्या हुआ?"
वे जोश के साथ बोले, "मैं वादा करता हूँ कि मेरा भूतपूर्व हटने के साथ ही मैं वादों का भी भूतपूर्व हटा दूँगा तब मैं सिर्फ मुख्यमंत्री रह जाऊँगा और भूतपूर्व वादे सिर्फ वादे।"

Wednesday, April 29, 2009

आज़ादी से पहले और बाद के जूता-काण्ड

हि्द-युग्म के प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रेमचंद सहजवाला चंद चुनाव सम्बन्धी प्रश्न लाये हैं। इन दिनों नेता पर जूता-चप्पल फेंको प्रतियोगिता ज़ोरों पर है। उसी से जुड़े कुछ सवाल हैं। एक-एक प्रश्न के चार-चार विकल्प हैं जिन में से एक सही है और शेष ग़लत। पाठक Comment (टिप्पणी) में अपने उत्तर दे सकते हैं। शीघ्र ही मैं इनके उत्तर आपको बताये जायेंगे।

प्रश्न 1: आज़ादी से पहले कौन से कांग्रेस नेता पर एक कांग्रेस अधिवेशन में जूता फेंका गया था?
(a) मोतीलाल नेहरू
(b) मुहम्मद अली जिन्ना
(c) लोकमान्य तिलक
(d) महात्मा गाँधी

(संकेत - जूता जिस नेता पर फेंका गया उसे न लग कर दो अन्य नेताओं को लगा जिन में से एक पारसी था एक बंगाली)

प्रश्न 2 : आज़ादी के बाद एक लोक सभा चुनाव की रैली में कौन से नेता पर पत्थर फेंका गया जिस के फलस्वरूप उस की नाक fracture हो गई थी?

(a) अटल बहरी वाजपेयी
(b) इंदिरा गाँधी
(c) मार्गरेट अल्वा
(d) तारकेश्वरी सिन्हा

प्रश्न 3 : 'दो बैलों की जोड़ी' और 'हाथ' के चुनाव चिन्हों के बीच की अवधि में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह क्या था?

(a) चरखा कातती औरत
(b) हल चलाता किसान
(c) चरखा
(d) गाय-बछड़ा

सोचिए-सोचिए। हैं ना मज़ेदार सवाल!

Tuesday, April 28, 2009

15वीं लोकसभा चुनाव को याद रखने के कई कारण

अबयज़ ख़ान टीआरपी बटोर रहे मीडिया चैनलों में से एक का अदना-सा हिस्सा हैं.....'हम ख़बर हैं' का भ्रम फैला रहे वॉयस ऑफ इंडिया न्यूज़ चैनल में इनके साथ काम करने का मेरा अनुभव महज़ तीन महीनों का है, मगर जब सोच एक-सी हो तो रिश्तों की मियाद बढ़ते देर नहीं लगती....हमने जब इनसे बैठक पर आने का न्योता दिया तो इन्होंने हिंदयुग्म को अच्छी-तरह देखभाल कर हामी भरी.....अब ये बैठक पर अक्सर नज़र आयेंगे.....ये भी बता दें कि ब्लॉगिंग की दुनिया में भी ये नये नहीं हैं.....

2009 का आम चुनाव कई मायनों में ख़ास रहेगा। मुद्दों से दूर इस बार का लोकसभा चुनाव बेमतलब की फूहड़ बयानबाज़ी के लिये याद रखा जाएगा। वरुण गांधी के ज़हर बुझे तीरों से शुरू हुआ चुनावी सफ़र अब तक के सबसे घटिया दौर से गुज़र रहा है। जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए नेता मुद्दों के बजाए एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। वरुण ने हाथ काटने की बात की, तो बिहार में राबड़ी देवी नीतीश कुमार के बारे में ऐसे-ऐसे बोल बोल गईं जो न सिर्फ़ तहज़ीब के खिलाफ़ थे, बल्कि देश की इमेज पर भी बट्टा लगा रहे थे। राबड़ी ने शुरूआत की तो लालू कहाँ पीछे रहने वाले थे। वरुण ने ज़हर उगला तो लालू वरुण पर रोड-रोलर चलवाने की धमकी दे गये। मतलब हर नेता तू सेर तो मैं सवा सेर साबित होने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मज़े की बात ये है कि इस बार के चुनाव को नेताओं ने गंभीरता की बजाए प्रैक्टिकल ग्राउंड बना दिया। समाजवादी पार्टी ने ये जानते हुए भी कि संजय दत्त मुंबई मामले में दोषी हैं, उन्हें लखनऊ से लड़ाने का ऐलान कर दिया, लेकिन जब बाद में परमिशन नहीं मिली, तो संजय की जगह नफ़ीसा अली को मैदान में उतार दिया। इसका मतलब ये है कि यूपी की इस बड़ी पार्टी को लगता है कि लखनऊ के सिर्फ़ वही ठेकेदार हैं, और लखनऊ की आवाम को इसका फैसला करने का कोई अधिकार नहीं है। संजय दत्त को नेता बनाने पर तुली पार्टी ने उन्हें महासचिव बना दिया, तो मुन्ना बहनजी के खिलाफ़ ऐसी घटिया ज़ुबान का इस्तेमाल कर गये कि उन्हें लेने के देने पड़ गये। वैसे भी ले-देकर उन्हें एक ही डायलॉग आता है, 'मैं मुन्ना और आप मेरे सर्किट' वैसे उनके सर्वहारा भाई (जो अमूमन सभी फिल्मी सितारों के भाई बन जाते हैं) अमर सिंह ने तो रामपुर से जया प्रदा के चुनाव को अहम की लड़ाई बना लिया और अपनी ही पार्टी के आज़म खान को खरी खोटी सुना डाली। बयान बहादुर बनते-बनते अमर इतने भारी हो गये कि मंच भी उनका वज़न नहीं संभाल पाए।

चलिए अब यूपी से आगे बढ़ते हैं। नेशनल लेवल पर नज़र डालें तो मौजूदा पीएम और पीएम इन वेटिंग ने एक दूसरे के खिलाफ़ तलवारें निकाल रखी हैं। अभी तक दोनों एक-दूसरे को कमज़ोर साबित करने पर तुले हैं, लेकिन शायद दोनों को ही सियासत का कॉम्पलान पीने की ज़रूरत है। तो उधर बिहार में लालू और पासवान अपनी ही सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोले खड़े हैं। तलवारें तन गईं हैं और सभी की नज़र देश को एक मज़बूत सरकार देने के बजाए पीएम की कुर्सी पर लगी हैं। तो बिहार में प्रणव मुखर्जी, लालू को उन्हीं के अंदाज़ में जवाब दे गये। ये अलग बात है कि बाद में वो कमज़ोर हिंदी का हवाला देकर बयान से किनारा कर गये। तो यूपी में दिग्विजय सिंह मायावती को सीबीआई की धमकी दे गये। और तो और बीजेपी में जेटली और राजनाथ सिंह में ही तलवारें खिंच गई, वो भी सिर्फ़ इसलिये कि जेटली को लगने लगा कि राजनाथ, सुधांशु मित्तल को आगे कर उनके पर कतर रहे हैं। हालात ये हो गई कि बयान बहादुर नेताओं के आगे चुनाव आयोग भी बेबस नज़र आ रहा है। चुनाव कराने से ज्यादा बड़ा काम तो उसके सामने नेताओं को नोटिस जारी करने का है। हालात ये हो गई है कि चुनाव आयोग को भी शायद याद नहीं होगा कि इस बार उसने कितने नोटिस बांटे हैं। लेकिन इस बार के चुनाव को बिना जूते के कैसे भूल सकते हैं। चिदंबरम पर जूता पड़ा तो टाइटलर और सज्जन कुमार चुनावी आंधी में उड़ गये। जिंदल पर जूता पड़ा को कांग्रेस की और भी फ़ज़ीहत हो गई। जूते पर कांग्रेस को घेरने वाली बीजेपी भी इस वार से नहीं बची, भले ही पीएम इन वेटिंग चप्पल का निशाना बने हों, लेकिन ये तो साफ़ हो गया कि भगवा पार्टी में भी सब कुछ ठीक नहीं है। यानि अब तक जनता से जुड़े मुद्दे कहीं भी नहीं। मंदिर पर फेल हुई बीजेपी इस बार काले धन का रोना रो रही है, जिसका न तो आम आदमी से कोई मतलब और न ही पैसा आने से रहा। लेकिन सबसे दिलचस्प रहा समाजवादी पार्टी का मेनीफेस्टो। मुद्दों की बात तो दूर, जनाब तो अंग्रेजी और कंप्यूटर के सफ़ाये की बात ही कर गये। इस बार के चुनाव में क्या-क्या नहीं हुआ जो बताया जाए, जब नेताजी को कुछ नहीं सूझा तो उन्होने नोट बांटना ही शुरु कर दिये। मतलब लिखने को इतना कुछ कि किताब छप जाए, और शायद अगर इस पर किताब आ जाए तो बेस्ट सेलर भी बन जाए। ये उस देश के महासंग्राम का हाल है जहां दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कायम है। जहां सत्ता की कुंजी आम आदमी के हाथ में मानी जाती है, लेकिन चुनाव के बाद नेताजी की झोली भरती है और आम आदमी रह जाता है खाली हाथ। वैसे भी इस बार का ड्रामा देखकर तो यही लग रहा है कि ये नेता मंडली के कलाकार हैं और सब तमाशाई हैं, जिसका नाटक ज्यादा पसंद आयेगा उस पर वोट लुटा देंगे, और फिर उनके हाथ में सौंप देंगे अपनी किस्मत पांच साल के लिए। शायद इसीलिए ये चुनाव 'अमर' रहेगा। धन्य हो...मेरा भारत महान

Monday, April 27, 2009

चुनाव से पहले इम्तिहान देंगे नेता तब वोट करेगी जनता

"इस लोकसभा चुनाव में अब तक दो चरणों में औसतन 55 प्रतिशत मतदान हुआ। यदि देश भर की मीडिया 'वोट दो, वोट दो' नहीं चिल्लाती, तब शायद यह मतदान 35 प्रतिशत तक भी पहुँच सकता था। मतलब लोगों का इन चुनावों के ऊपर से विश्वास उठ रहा है। यह चिंता का विषय है।"

यह शब्द मेरे नहीं हैं, बल्कि देश के सबसे प्रसिद्ध बाबा स्वामी रामदेव के हैं, जो कल राष्ट्रीय सहारा द्वारा आयोजित 'चुनावः चिंता, चुनौती और समाधान' में मुख्य-अतिथि के तौर पर पधारे थे। मैं वहा उपस्थित था। बाबा ने इस बात की हिमायत की कि हमें वोट ज़रूर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग मुझसे पूछते हैं कि 100 में 99 बेईमान हैं, बाबा हम किसे वोट दें। मैं कहता हूँ, हालाँकि नहीं कहना चाहिए कि कम बेईमान को वोट दो।

बाबा ने बताया कि मैं आरोग्य विषय से हूँ लेकिन देश के आरोग्य को सर्वोपरि मानता हूँ। देश बीमार हो गया है, जिससे हम सब ग्रसित हैं। देश का प्रतिनिधित्व युवा करे या बुजुर्ग, इस विषय पर बोलते हुए रामदेव ने कहा कि बुजुर्ग कमजोर हो सकता, बीमार हो सकता है लेकिन युवा भी शराबखोर, चरित्रहीन, बेइमान, मक्कार हो सकता है।

एक बहुत ही रोचक और चौकाने वाले तथ्य की ओर बाबा ने इशारा किया। उन्होंने बताया कि एक पोलिंग बूथ पर कम से कम 700-800 मतदान करने की व्यवस्था होती है। इस कार्यक्रम में पूर्व चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति भी सम्मिलित थे, उनसे रामदेव ने पूछा कि एक मतदाता को वोट करने में औसतन कितना समय लगया है? 4-5 मिनट। मतलब कि चुनाव आयोग ही एक पोलिंग बूथ से 200-250 मतों की ही उम्मीद करता है? यानी बाकि वोट फर्जी पड़ते हैं।

बहुत से चुनाव सुधारों की बात भी बाबा ने कही। जैसे-राजनेताओं की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित हो, अदालत में प्रथम दृष्ट्या अपराधी चुनाव लड़ने से वंचित हों, व्यापारियों को देश नहीं चलाना चाहिए, उन्हें व्यापार करना चाहिए। चुनाव कराये जाने का समय निर्धारित होना चाहिए। गर्मी का मौसम है। पोलिंग बूथ पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। बुजुर्गों के लिए बैठने के लिए जगह नहीं है।

बाबा रामदेव के बाद जे॰एन॰यू॰ के कुलपति प्रो॰ बी॰बी॰ भट्टाचार्य ने अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों का पैन कार्ड बनना व आयकर रिटर्न भरना आवश्यक होना चाहिए ताकि यह पता तो चले कि उम्मीदवारों कहाँ से कितना कमाया है। मैं यह मानता हूँ कि वह सीए से हेर-फेर करके गड़बड़ रिटर्न बनवा लेगा, लेकिन फिर भी एक दबाव बनेगा।

भट्टाचार्य ने राजनेताओं की उदासीनता का उदाहरण देते हुए बताया कि हर बार बजट या किसी आर्थिक मुद्दे पर बहस के लिए टीवी वाले मुझे कार्यक्रम में बुलाते हैं। एक तरफ सत्तापक्ष का नेता और दूसरी तरफ विपक्ष का नेता और बीच में मैं। अपने देश की आर्थिक नीतियाँ बनाने वालों के बीच मैं बैठा हूँ। जैसे ही ब्रेक होगा, एक नेता पूछेगा, भट्टाचार्या जी इस बजट में जो-जो अच्छा है हमें बता दीजिए बोलना है, और दूसरा है वो पूछेगा जो-जो बुरा है वो बता दीजिए।

प्रो॰ भट्टाचार्य ने बताया कि इतने उदासीन लोग, इतने अनपढ़, गाँवार लोग हमारी लोकतंत्र की दिशा तय करते हैं, यह शर्म की बात है। उन्होंने नेता बनने के लिए न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने की बात को दुबारा उठाते हुए कहा कि चुनाव लड़ने से पूर्व उम्मीदवारों की ऐसा परीक्षा अनिवार्य हो जिसमें भारतीय संविधान, देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था व नीतियों से संबधित सवाल पूछे जाएं।

भट्टाचार्य ने कहा कि यदि सर्वे किया जाय तो शायद 15 प्रतिशत भी एसे पी॰ एम नहीं निकलेंगे जो आम बजट पढ़ते हों।

एक और महत्वपूर्ण बात भट्टाचार्य जी ने कही कि अभी तक किसी ने यह नहीं कहा कि भारत में चुनाव नहीं होने चाहिए, यह आशा की किरण है कि लोगों का लोकतंत्र से विश्वास नहीं उठा है।

इसके बाद पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति माइक पर आये। उन्होंने कहा कि चुनाव सुधार के लिए भारतीय संविधान में परिवर्तन के साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 और कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल 1961 में भी व्यापक संशोधन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग संविधान के अनुसार ही चलता है। इसलिए संविधान को बदलना जरूरी है।

कंस्सीट्यूशन क्लब (दिल्ली) में आयोजित इस संगोष्ठी के दो सत्र थे। पहले सत्र में सहारा परिवार के उपाध्यक्ष ओ॰ पी श्रीवास्तव भी बोले। उन्होंने बताया कि सहारा परिवार देश की स्थितियों को लेकर बहुत पहले से ही सजग है। यह चुनाव अभियान उस बीज-सजगता का विस्तार है।

गोष्ठी के दूसरे सत्र में सुप्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे के उद्‍बोधन से गोष्ठी आगे बढ़ी। अन्ना ने बताया कि व्यक्ति यदि ठान ले तो बहुत कुछ कर सकता है। मैंने 26 वर्ष की उम्र में ही ठान लिया था कि मुझे शादी नहीं करनी, मुझे छोटा परिवार नहीं बसाना, बड़ा परिवार बनाना है। और मुझे बहुत खुशी है कि आज मेरे लाखो-करोड़ों बच्चे हैं। आज 72 वर्ष का होने के बाद भी दिल में समाज के लिए कुछ करने का जज्बा कम नहीं हुआ है। हमने ठान लिया था गाँव-गाँव में पर्यावरण (जमीन-पानी) के प्रति लोगों को जागरूक करना है। मुझे खुशी है पूरे महाराष्ट्र के किसी भी गाँव में पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता का अभाव नहीं है। गाँव के विकास से ग्रामीणों का शहर की तरफ पलायन घटता है।

अन्ना ने यह भी बताया कि वे लगातार आंदोलन करते रहे। सरकार तब तक आपकी बात नहीं मनाती जब तक उसे अपनी कुर्सी का खतरा ना हो। जब महाराष्ट्र सरकार को कुर्सी छूटने का खतरा महसूस हुआ तो 2001 में 'सूचना का अधिकार' कानून बना। बाद में 2005 में ये पूरे देश में लागू हुआ।

अन्ना ने कहा कि कि चुनाव सुधार के लिए जरूरी है कि जनता को ‘राइट टू रिकॉल’ मिले और बैलेट पर एक निशान मतदाता की नापसंदी का भी हो, अगर नापसंदी पर ज्यादा वोट मिलते हैं तो चुनाव निरस्त कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि चुनाव में मतदान न करने वालों की सभी सुविधाएं बंद कर दी जानी चाहिए। मैं इसके लिए लड़ाई लड़ रहा हूँ।

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिन्दर सच्चर ने कहा कि इन दिनों राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा प्रमुख है लेकिन असल में यह अपराधियों का राजनीतिकरण है। पहले केवल राजनीतिज्ञ ही चुनाव जीतने के लिए अपराधियों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब बाहुबलि जान गये कि जब हमारे ही बल पर चुनाव जीते जा रहे हैं तो हम ही क्यों जीतें? अन्ना हजारे के विचारों से ये भी सहमत दिखे।

भारतीय चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार केजे राव ने कहा देश को इस स्थिति से उबारने के लिए गंभीर लोगों को एक मंच पर आना होगा और लड़कर चुनाव सुधार करना होगा। आंध प्रदेश में उनकी संस्था ने बहुत से आशचर्यजनक परिवर्तन किये हैं।

सबसे अंत में बोलने के लिए पधारे उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण। इन्होंने बोला कि भारत की डेमोक्रेसी को रिप्रेजेंटेटिव (प्रतिनिधित्व) की जगह पार्टीसिपेटरी (भागीदारी) या डायरेक्ट (सीधा) होना चाहिए। कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर पूरे देश का विचार लेना आवश्यक है। आज का युग इंटरनेट का युग है। गाँव-गाँव से इंटरनेट के माध्यम से जनता का मत जाना जा सकता है। इन्होंने शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की बात कही। प्रशांत भूषण ने कहा कि जनता लोकसभा चुनाव में जनता उम्मीदवार को वोट नहीं देती, बल्कि उसे वोट देती है जो सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। अगर यह सोचा जाय कि आज एक अच्छा और ईमानदार आदमी चुनाव में खड़ा होता है तो क्या वो जीत पायेगा?

इन्होंने न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता पर अपनी असहमति जताई और बताया कि अनपढ़ लोगों में, इलीटरेट लोगों में पोलिटिकल अंडरस्टैंडिंग (राजनैतिक समझ) पढ़े-लिखे लोगों से भी ज्यादा होती है। के॰जे॰ राव सबसा अनूठा उदाहरण हैं। उनमें लो लीडरशिप क्षमता थी, वह किसी पढ़े-लिखे लोगों में भी नहीं देखने को मिली। प्रशांत भूषण ने उम्मीदवार के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के चुनाव न लड़ने देने वाले विचार पर भी असहमति जताई। कहा कि मजिस्ट्रैड पुलिस के एफ आई आर के विना पर ही चार्जशीट तैयार करता है। विपक्षी पार्टियाँ किसी भी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करवा कर, चार्ज शीट दाखिल करवाकर चुनाव लड़ने देने से रोक सकती हैं।

उन्होंने कहा कि सबसे ज़रूरी है कि भारत की न्यायिक प्रणाली में सुधार हो। निर्णय जल्दी आयें। अभी जो 20 साल लगने वाला एक स्लो सिस्टम है वह भारत को आने नहीं बढ़ने दे रहा।

सहारा समूह प्रकाशन के प्रधान संपादक रणविजय सिंह के सबका धन्यवाद ज्ञापित किया। संगोष्ठी का संचालन जेएनयू के प्रो॰ आनंद कुमार ने किया। इन लोगों के अलावा गोष्ठी में दिल्ली विश्वविघालय के डिप्टी डीन (स्टूडेंट वेलफेयर) डा.गुरप्रीत टुटेजा, खालसा कालेज के प्रधानाचार्य डा.जसविंदर सिंह, दयाल सिंह कालेज के प्रधानाचार्य डा.दीपक मल्होत्रा, फेडकूटा के पूर्व अध्यक्ष प्रो.कपिल कुमार, आईआईएमसी के एसो.प्रो.आनंद प्रधान, डीयू के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीर पचौरी, प्रो.गोपेश्वर सिंह, जेएनयू के प्रो.देवेन्द्र चौबे, पूर्व मेयर आरती मेहरा, पदमश्री श्याम सिंह शशि, दिल्ली हिन्दी अकादमी के सचिव डा. ज्योतिष जोशी, एनएसडी के सुरेश शर्मा, दिल्ली कैथेलिक आर्चडाइज के निदेशक फादर डोमोनिक इमैनुअल, आईसीआई के सदस्य सहदेव कन्दोई, मौलाना आजाद दंत विज्ञान संस्थान के सहायक प्रोफेसर डा. ज्ञानेन्द्र कुमार, सर गंगाराम अस्पताल के सर्जन डा. विवेक कुमार, एम्स के हिन्दी विभाग के प्रमुख प्रेम सिंह, श्रीनीलम कटारा, वरिष्ठ पत्रकार तरूण विजय, प्रो. कपिल कुमार, लेखिका मैत्रेयी पुष्पा, सुप्रसिद्ध कवयित्री अनामिका, केन्द्र सरकार के एडवोकेट नवीन कुमार मारा, दिल्ली सरकार की मुख्य अधिवक्ता नजमी वजीरी, अधिवक्ता अशोक अग्रवाल, उपहार अग्निकांड पीड़ित एसोसिएशन के संयोजक नीलम कृष्णामूर्ति, शेखर कृष्णामूर्ति, गांधी शांति प्रिष्ठान के सचिव सुरेंद्र कुमार, दरस्गाह तफहीम कुरआन के संस्थापक अध्यक्ष हसन अमीर, मदरसा जीनतुल कुरआन के मोहतमिम मौलाना ताहिर, यूपीएससी के पूर्व चेयरमैन डा.एसआर हाशिम, पूर्व एयर मार्शल आरसी वाजपेयी, जेएनयू के प्रोफेसर तुलसी राम, कथक नृत्यांगन पुनीता शर्मा, युद्धरत आम आदमी पत्रिका की संपादक रमणिका गुप्ता, वाशिंगटन से आए टेक्नोक्रेट और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विदेश नीति सलाहकार रहे शेखर तिवारी, बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के पूर्व उपकुलपति और भीमराव अम्बेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ बायो मेडिकल साइंस के डाक्टर रमेश चंद्रा, पंजाब सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता रणजीत कपूर आदि उपस्थित थे।

Thursday, April 23, 2009

मुसलमान बेआवाज़ क्यों

यह देख कर अफसोस होता है कि केरल में तो मुसलमानों का राजनीतिक संगठन है, पर अन्य राज्यों में नहीं। चुनावों के दौरान हमेशा यह सवाल उठता है कि मुसलमान किधर जाएंगे। सबका अपना-अपना अनुमान होता है और अपने-अपने तर्क। खुद मुसलमान नहीं बोलते कि वे किस दल का साथ देंगे और क्यों। अपना संगठन होने का एक और फायदा यह है कि वे विभिन्न दलों से मुसलमानों के हित में मोलभाव भी कर सकते हैं। मोलभाव में कोई बुराई नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में तरह-तरह के दबाव समूह काम करते ही हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

केरल में मुस्लिम लीग है। वह आम तौर पर वाम मोर्चे के साथ होती है। केरल में मुस्लिम लीग के बने रहने तथा राजनीतिक सफलता प्राप्त करने के दो मुख्य कारण हैं। एक कारण यह है कि वहाँ कई चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ मुसलमान बहुमत में हैं या स्थनीय आबादी का बड़ा हिस्सा हैं। दूसरे, वाम मोर्चे का अंग होने के कारण वामपंथी दल यह खयाल रखते हैं कि मुस्लिम लीग कुछ सीटों पर विजय हासिल करे। एक तीसरा कारण यह भी है कि इस प्रगतिशील राज्य में मुस्लिम तबके के प्रति कोई असामान्य दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता। जैसे ईसाई समाज का सामान्य और स्वीकृत अंग हैं, वैसे ही मुसलमान भी। किसी भी अच्छे समाज में ऐसा ही होना चाहिए।

उत्तर भारत में ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि इसी क्षेत्र में मुसलमानों की सबसे ज्यादा सांसत है। वे न केवल अपेक्षया गरीब और कम पढ़े-लिखे हैं, बल्कि सामाजिक स्तर पर उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनका कोई राजनीतिक संगठन नहीं है। भाजपा को छोड़ कर सभी दल उन्हें अपनी ओर खींचने तथा उनका प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। लेकिन इससे उनकी किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। हाँ, यह जरूर होता है कुछ मुसलमान नेता मंत्री बन जाते हैं। जाहिर है, वे मंत्री पद अपने लिए ग्रहण करते हैं, न कि आम मुसलमानों के हित में।

राजनीतिक संगठन से कितना फर्क पड़ता है, यह बहुमत समाज पार्टी बनने के बाद दलितों में आए स्वाभिमान के उदाहरण से देखा जा सकता था। पहले उत्तर प्रदेश में दलितों की हालत बहुत खराब थी। अकसर उनके साथ सरकारी और गैरसरकारी हिंसा की जाती थी। समाज ही नहीं, प्रशासन भी उनका दमन और शोषण करता था। पर अब ऐसी स्थिति नहीं है। जाहिर है, अपना राजनीतिक संगठन हो, तो मुसलमानों की हालत में भी सुधार हो सकता है।

ऐसा क्यों नहीं हो पाता? इसका प्रमुख कारण यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में कोई चुनाव क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ से कोई उम्मीदवार सिर्फ मुसलमान मतदाताओं के भरोसे जीत सके। कुछ चुनाव क्षेत्रों में मुसलमान मतदाताओं का असर जरूर है, पर यह असर किसी मुसलमान उम्मीदवार को तभी जीता सकता है जब उसे अन्य समुदायों का भी समर्थन मिले। यह कोई कठिन बात नहीं है, बशर्ते मुसलमानों का जो राजनीतिक संगठन बने, वह अन्य समुदायों को अपना दुश्मन मान कर न चले। जब अन्य अनेक राजनीतिक संगठन मुसलमान को अपना दुश्मन या विरोधी मान कर नहीं चलते, तो मुस्लिम संगठन ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

कायदे से तो जाति और धर्म के आधार पर कोई राजनीतिक संगठन नहीं बनना चाहिए। राजनीति का आदर्श रूप सर्व जनता की सेवा है। कोई भी सच्चा राजनीतिक संगठन यह दावा नहीं कर सकता कि वह किसी खास समुदाय के लोगों की सेवा करेगा, किसी अन्य समुदाय का नहीं। संत की तरह राजनेता का दरवाजा भी सभी समाजों और समूहों के लिए खुला रहना चाहिए। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता। जाति और धर्म राजनीतिक संरचना में बुरी तरह हावी हो गए हैं। इसी को वोट बैंक की राजनीति कहा जाता है। प्रत्येक दल को किसी खास समुदाय या समुदायों का समुच्चय माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी राजनीतिक दल पूरे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता, न करना चाहता है। इस स्थिति की मांग है कि मुस्लिम समाज के हितों की रक्षा के लिए एक या दो ऐसे राजनीतिक संगठन होने चाहिए जो मुसलमानों का सच्चा प्रतिनिधित्व कर सकें। जब पंजाब में अकाली दल हो सकता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का अपना दल क्यों नहीं हो सकता? यह प्रवृत्ति तभी समाप्त होगी जब राजनीति में जाति और धर्म का स्वर कम होता जाए और सभी राजनीतिक दल समाज के सामान्य हितों का संवर्धन करने के लिए प्रतिबद्ध हों। लेकिन हमारे भाग्य ऐसे कहां? अभी तो राजनीतिक और सामाजिक विखंडन का समय है।

चूंकि मुसलमानों का कोई दल अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकता, क्या इसलिए उनका राजनीतिक संगठन नहीं बनाया जा सकता? यह एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। ऐसा संगठन अन्य दलों से तालमेल कर अपने लिए कुछ सीटों की व्यवस्था कर सकता है। इस तरह विधान सभा और लोक सभा में मु्स्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। लेकिन किसी भी मुस्लिम दल की सामाजिक भूमिका ज्यादा विस्तृत होगी। वैसे जरूरत तो यह भी है कि अन्य दल भी समाज सुधार की भूमिका निभाएं, पर मुस्लिम संगठनों के लिए यह और भी आवश्यक है। दुर्भाग्य से मुस्लिम समाज का मार्गदर्शन करने के लिए सिर्फ उनके धार्मिक संगठन ही हैं और उनमें से किसी की भी भूमिका आधुनिक या प्रगतिशील नहीं है।

मुस्लिम समाज का हित इसी में है कि वह अपने अहितकर रीति-रिवाजों से बाहर निकले। यह काम उनके राजनीतिक संगठन बखूबी कर सकते हैं। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी यह काम किया करती थी। मुस्लिम लीग ने इस तरह के कामों की ओर ध्यान नहीं दिया। मिस्टर जिन्ना खुद आधुनिक थे, पर उन्होंने अपने अनुयायियों को आधुनिक बनाने की कोशिश नहीं की। उसका नतीजा आज का पाकिस्तान है। वहां कट्टरवाद ने लोगों का जीना हराम कर रखा है। आतंकवाद का जन्म भी उसी के पेट से हुआ है। हिन्दुस्तान का मुसलमान अपेक्षया ज्यादा लोकतांत्रिक है। पर उसका पारिवारिक और सामाजिक जीवन कई दृष्टियों से बाधित बना हुआ है। मुंबई के बम कांड के बाद मुस्लिम बुद्धिजीवियों में चेतना और उत्साह की लहर आई थी। पर वह जल्दी ही ठंडी पड़ गई। इसी के साथ भारत का मुसलमान बेआवाज भी हुआ है। यह जड़ता जल्द से जल्द टूटनी चाहिए। इसमें मुस्लिम समाज के साथ-साथ भारतीय समाज का भी हित है।

---राजकिशोर

Friday, April 17, 2009

भारत का आम आदमी कब महान होगा ?

अनिरुद्ध शर्मा हिंदयुग्म के पुराने पाठकों में से हैं.....पुणे की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी करते हैं...चुनाव के दौरान इनके भीतर का नागरिक जगा और इन्होंने हमें एक लेख भेज दिया....आप भी पढें इनके विचार.....

हाल की ख़बरों में एक निराली बात सुनने को मिली. समाजवादी पार्टी का मेनिफेस्टो जिसमे हमारे देश के महान(!) नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा है कि वो इंग्लिश स्कूल्स बंद करवाएंगे, ट्रैक्टर की जगह बैल चलवाएंगे, कंप्यूटर बंद करवाएंगे, मशीनें बंद करवाएंगे वगैरह वगैरह… मैं सदमे में हूँ... क्या कहा जाये इस आदमी को? क्या इसे समझाना संभव है?बिलकुल नहीं.जिस आदमी की सोच इतनी घटिया है वो कितने सालों से इतना बड़ा प्रदेश चला रहा है. शर्म की बात है जनता के लिए और यहाँ हद दर्जे के मूर्खों की भरमार है वरना क्यों नहीं इन सड़े हुए नेताओं के इस तरह की बातें करते ही मंच से नीचे खींचकर जूतमपैजार कर दी जाती ? और क्यों मुलायम, मायावती जैसे लोग बार-बार आ जाते हैं? कुंठितों का पूरा कुनबा है जो देश को डुबोने पर आमादा है. ये नेता कुंठित हैं इंग्लिश नहीं जानने से, कंप्यूटर के डर से और इन्ही के तरह की जनता है जो सिर्फ अपना मन समझाने के लिए ऐसे लोगों को अपना भविष्य सौंप देती है.मुझे गुस्सा आता है, असहनीय गुस्सा आता है लेकिन जब गहरे में जाता हूँ तो गुस्सा निराशा का रूप ले लेता है.मेरा भारत महान चिल्लाते हुए बरसों बीत गए लेकिन इमानदारी से कहूं तो मुझे कभी इसका कारण समझ में नहीं आया. अब तो मैंने मुद्दत हुई ये वाक्य नहीं दोहराया है लेकिन जब नारे लगाने पड़ते थे तब भी मुझे ये समझ में नहीं आया. किस बात के लिए हम महान हैं? आज जो हालत मैं देखता हूँ उसमें तो निहायत ही नामुमकिन सी बात है महानता को ढूंढ़ना. और अगर इतिहास की बात करें तो समय-समय पर हमारे यहाँ महान लोग हुए हैं इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन दुनिया में सभी जगह हुए हैं. देश उसमें रहने वाले सारे लोगों से मिलकर बनता है यानी कि आम आदमी से . अब देखिये न प्रजातंत्र में सरकार चलती है और सरकार कौन बनाता है? यही आम आदमी… लेकिन मैं जब इतिहास पर गौर करता हूँ तो महानता तो दूर की बात मुझे आम आदमी में किसी भी दौर में समझदारी भी नहीं दिखाई दी. ये हमेशा से उन लोगों का समूह रहा है जिसे जो जैसे चाहे वैसे हांक देता है और वो भी बहुत ओछी बातों से. वरना वरुण गाँधी को आज सफलता के लिए कोई और शॉर्ट कट ढूंढ़ना पड़तासबसे बड़ी चीज़ जो ऑब्ज़र्व करने जैसी है वो है हमारी कौम की हीन भावना. ये भावना हमेशा से रही है और आज भी है. एक दौर था जब राजा-महाराजा शोषण करते थे, आम आदमी शाही लोगों से हीन था और शाही लोग? विदेशियों से… कुछ सचमुच के महान राजाओं को छोड़ दिया जाये तो सभी आखिरकार चाटुकार ही साबित होते थे. जब मुग़ल यहाँ आये तो ये लोग उनके पैरों में गिर गए. कई सालों तक मुग़लों ने राज किया और आम आदमी तो कभी कुछ करता ही नहीं हैं न? समय-समय पर कुछ स्वाभिमानी राजाओं ने विरोध किया लेकिन उन्हें मुग़लों के साथ अपने लोगों का भी विरोध सहना पड़ा. धीरे-धीरे मुग़ल इसी देश का हिस्सा हो गए… ठीक है अगर अपनापन कहीं है तो वो ग़लत नहीं है लेकिन फिर आये अंग्रेज और इस बार हमारे लोगों की हीन भावना देखने के काबिल थी. अंग्रेजों की ठोकरों में रहकर भी उन्हें ऊँची नज़र से ही देखा जाता था. फिर से कुछ लोगों ने बड़ी मुश्किलों से लड़ाई लड़ी. यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि आज जो संगठन स्वाभिमान का झूठा झंडा उठा कर ज़हर फैलाने का काम कर रहे हैं वो तब भी थे और उन्होंने हमेशा की तरह असली समस्या को हटाने की बजाय नकली समस्याएँ पैदा करने का ही काम किया. खैर, जैसे-तैसे हम आज़ाद हो गए लेकिन हमारा स्वाभिमान आज भी धूल में पड़ा हुआ है. हम अपने देश के आदमी को कभी इज्ज़त नहीं देते लेकिन आज भी कोई विदेशी आ जाये तो मुस्कराहट 4 इंच से कम ही नहीं होती. मैं IT इंडस्ट्री से हूँ और मैंने बहुत करीब से इसे देखा है. अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ों को लेकर इतना क्रेज बाप रे! जहाँ अपनी भाषा में बोलना गवार होने की निशानी मन जाता है, जहाँ अमेरिका जाने के लिए आदमी मर जाता है… वहां किस तरह की महानता निवास करती है मैं नहीं जानता. ठीक है ये बिज़नेस है और हमारा ग्राहक और दुकानदार का रिश्ता है, IT की भाषा में कहें तो वो हमारे क्लाइंट हैं लेकिन क्या हमारे यहाँ के दुकानदार देसी ग्राहक को इतनी इज्ज़त बख्शते हैं? क्यों हम उनके पैरों की धूल चाटने को लालायित रहते हैं, क्यों अपने बच्चों के हिंदी बोलने पर शरमाते हैं, क्यों अपने ही लोगों की इज्ज़त करना हमें छोटी बात मालूम होता है?मैंने देखा है छोटे गाँव से लेकर, छोटा शहर और मेट्रो सब देखा है और ये हीन भावना मैंने सभी जगह पाई है. और अगर कहीं स्वाभिमान की बात भी होती है तो वो दरअसल कुंठा ही होती है जो आपस में ही दंगे करवाती है. स्वाभिमान का सबसे अच्छा उदाहरण हैं स्वामी विवेकानंद, अपने देश अपनी भाषा सबके लिए स्वाभिमान और दूसरे देश की भाषा, संस्कृति के लिए भी सम्मान. उन्हें अपनी भाषा से प्रेम था लेकिन दूसरी भाषाओँ से बैर नहीं था उन्हें भी वे समान आदर देते थे लेकिन प्राथमिकता हमेशा अपनी विरासत ही रही.कुछ लोग हैं, और हमेशा रहे हैं जो स्वाभिमान का सही मतलब समझते हैं लेकिन तादाद में कम ही हैं. मेरे ख़याल से एक राम, एक कृष्ण, एक गाँधी. सिर्फ इन नामों का सहारा लेकर हम आम तौर पर महानता का दावा नहीं कर सकते. ये देश तब तक महान नहीं है जब तक यहाँ का आम आदमी महान नहीं है, उसमें स्वाभिमान नहीं है.
जय हिंद

अनिरुद्ध शर्मा

Wednesday, April 08, 2009

एक वेबसाइट ऐसी भी.....

मंगलवार की सुबह ही अखबार में पढ़ा कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने गूगल के सहयोग से एक नई वेबसाइट बनाई है http://www.google.co.in/intl/en/landing/loksabha2009/ या http://hindustantimes.com/loksabha2009 जो केवल लोकसभा चुनाव २००९ पर केंद्रित होगी। आजकर हर कोई चुनाव पर ही अपनी वेबसाइट, चैनल आदि बना रहा है। सोच कर देखिये कि अंग्रेजी पत्रकारिता में अग्रणी समाचारपत्रों में जिसका शुमार हो और वेबसाइट जगत की सबसे मशहूर वेबसाइट एक साथ हो तो वो साइट कितनी बढ़िया होगी। यही सोचकर मैं उस साइट पर गया। मैंने पाया कि उस साइट पर गूगल की सभी तकनीक लगी हुई है। बाईं ओर गूगल-मैप से नक्शे देखे जा सकते हैं। गूगल का खोजी-तन्त्र (सर्च-इंजिन) तो है ही। और भी काफी जानकारियाँ बेहद सरल तरीके से दी हुई हैं। यही तो गूगल की पहचान है। मैंने दो-चार लिंक देखना शुरु किया। पर ये क्या... मुझे कोई भी जानकारी ठीक नहीं लग रही थी। उदाहरण के तौर पर जगदीश टाइटलर के बारे में आप देखेंगे तो आपको उनके नाम के आगे " No Criminal Record" लिखा हुआ है। अब टाइटलर साहब के ऊपर कोई केस दर्ज नहीं हुआ हो, ऐसा मुझे तो नहीं लगता। इनके पास कोई सम्पत्ति भी नहीं है। लालू प्रसाद यादव जी का क्रिमिनल रिकार्ड तो है पर लोकसभा वे केवल ४ प्रतिशत दिनो के लिये ही आये हैं। मैंने इसके आगे और कुछ नहीं देखा क्योंकि मुझे यह समय की बर्बादी लगा। पुरानी और गलत जानकारियों की भरमार है इस साइट पर। आप जा कर देख सकते हैं। हँसहँस कर लोट-पोट हो जायेंगे। इतने बड़े दिग्गजों ऐसी साइट लेकर आयेंगे मैंने सोचा भी न था। हो सकता है आने वाले समय में इसमें कुछ सुधार हो पर अंग्रेजी में एक कहावत है "First Impression is the last impression"।

तपन शर्मा

Friday, April 03, 2009

जनता ने भर दी है हामी, एम एल ए होंगे गोस्वामी

जब मस्ती के दिन थे...
सन् 1969 की बात है. तब उत्तर प्रदेश में अचानक मध्यावधि चुनाव घोषित हो गए थे. एक तो हमारी पढ़ाई में खलल, ऊपर से बाज़ार जाओ तो कानों में बेइंतहा चुनावी शोर. मैं उन दिनों चूड़ियों के शहर फ़िरोज़ाबाद में एम.एस.सी (गणित) पढ़ रहा था.

वैसे शोर के बावजूद बाज़ार में घूमना रोचक भी लगता था. सदर बाज़ार तो था भी बहुत लंबा. कम से कम दो किलो मीटर तो होगा ही. संकरी और लगभग पथरीली सी सड़क, जिस पर आम दिनों में जाओ तो लोगों का एक अंतहीन रेला सा नदी की तरह बह रहा होता. उस पर रिक्शों का सैलाब. चूड़ियों वाले तो हर दस कदम पर. फ़िरोज़ाबाद में छोटे बड़े कई कारखाने थे.. चूड़ियों के जब बाज़ार जाते थे तो कांग्रेस का गीत ज़ोर ज़ोर से बज रहा होता-

भूल न जाना भारत वालो किसी की होड़ा-होड़ी में
देख भाल कर मोहर लगाना दो बैलों की जोड़ी में

यानी दो बैलों की जोड़ी तो कांग्रेस का चुनाव-चिह्न था. बाद के वर्षों में जब बाबू जगजीवन राम कांग्रेस से अलग हो गए, तो दो बैलों की जोड़ी का चुनाव चिन्ह ख़ुद हड़पना चाहते थे. ऐसे में दिल्ली के करोल बाग़ में अटल जी (वाजपेयी) ने अपनी एक सिंह गर्जना में कहकहों का तूफ़ान सा बर्पा करते कहा था- 'अरे दो बैल हैं. चुनाव चिह्न पर लड़ते क्यों हो. एक बैल इंदिरा जी ले लें, एक जगजीवन राम बाबू!'

चुनाव के वो दिन सचमुच बहुत रोचक होते थे. आज की तरह दूरदर्शन नहीं था, इस लिए सब नेता करीब से दर्शन देने नज़दीक नज़दीक आते थे. यानी मोहल्लों या बाज़ारों में जन-सभाएं होती थी. बाज़ार से गुज़रो तो दुकानों के काउंटरों पर मुक्के पड़ रहे होते, क्यों कि गर्मजोशी से बहुत लोग आपा खो कर बहस कर रहे होते थे - 'जनसंघ ख्वामख्वाह टांग अड़ाता है'.

दूसरा चीख पड़ता- 'यहाँ निर्दलीय का निर्वाचन क्षेत्र है. पर कांग्रेस-जनसंघ मिल कर चलें तो निर्दलीय जो बिकाऊ होते है, सब की मिट्टी पलीत हो जाए'

-'ये तो बेवकूफों वाली बात हो गई. कांग्रेस-जनसंघ कब मिले थे कब मिलेंगे भला? इस जनम में तो नहीं'.
भारतीय जनता पार्टी का पहला अवतार भारतीय जनसंघ होता था, जो डॉ श्यामाप्रसाद मुख़र्जी ने बनाया था. जगह जगह डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के पोस्टर लगे होते. साथ में चुनाव चिह्न छापा होता. दीपक. पर सचमुच, फ़िरोज़ाबाद तो निर्दलीय का निर्वाचन क्षेत्र था. चूड़ियों के तीन कारखाने चलाने वाले एक राजाराम चुनाव लड़ते थे, जिन का चुनाव चिन्ह था शेर. राजाराम को अपने कारखानों के मज़दूरों व मज़दूर-परिवारों का ज़बरदस्त समर्थन हासिल रहता था.

अक्सर रात 11 बजे तक पढ़ते पढ़ते बाज़ार घूमने निकल जाओ तो कभी पता चलता था वहां, अन्नपूर्णा होटल के नीचे अटल जी आ रहे हैं. तेज़ तेज़ दौड़ कर उत्तेजना में लोग वहां पहुँचते थे. वाजपेयी का भाषण 'मिस' कर गए तो बाकी ज़िन्दगी में बचा क्या. जा के जहर खाएं और क्या. वाजपेयी उस संकरी सी सड़क की जन-सभा में अक्सर मुस्करा कर लोगों से बतिया से रहे होते. कहते - 'भई, चन्द्रभानु गुप्त कहते हैं कि मेरी 295 सीटें आएंगी विधान-सभा में! अगर शेखियां ही बघारनी हैं तो चन्द्रभानु जी कहो कम से कम चार सौ सीटें आएंगी मेरी! यह क्या कि जैसे 'बाटा' के जूते के भीतर कीमत छपी होती है - चौंतीस रूपए पच्चानवे पैसे'!

लोगों का हँस हँस कर बुरा हाल होता.

सिनेमा के बहाने चुनाव प्रचार...

पर यह लेख तो मैं एक अन्य, निर्दलीय प्रत्याशी पर लिखने जा रहा था. वैसे कुछेक अपवादों को छोड़ कर देखा जाए, तो एक बार जनसंघ नेता बलराज मधोक ने दिल्ली की एक जनसभा में जो कहा था, वह अक्षरशः सत्य है. निर्दलीय तो होते ही नीलामी की चीज़ हैं. फ़िरोज़ाबाद में भी जब पढ़ पढ़ कर थक जाओ तो जा कर कुछ मित्र लोग सिनेमा-हॉल में बैठते थे. कोई कोई रिक्शे वाला मज़ाक करता था - 'बाबूजी विजय टाकीज़ में आग लग गई'!

-'हैं! मैं चीख पड़ता, विजय टाकीज़ में आग लग गई? कब? कब'?

रिक्शे वाला हंस पड़ता. उसके पीले दांतों वाली बतीसी को मैं पीछे, रिक्शे की सीट पर बैठे बैठे ही महसूस कर लेता. वह रिक्शा खींचता खींचता खींईं खींईं कर के हँसता और कहता- 'बाबूजी 'आग' तो फ़िल्म का नाम है. फिरोज़ खान की. विजय टाकीज़ में 'आग' फ़िल्म लग गई'!

मुझे लगता कि अब वह ऐसे खींईं खींईं करेगा कि मुंह से झाग निकलने लगेगी.

सिनेमा शुरू होने से पहले चुनावी स्लाइड्स देखो जी!

कोई हाथ जोड़ कर बगुला -भक्ति करता वोट मांग रहा है, कोई गरजने वाले पोज़ में खड़ा भाषण झाड़ रहा है, जैसे फ़िल्म का मज़ा किरकिरा करने आया है. एक प्रत्याशी ने तो गज़ब कर दिया. पहले हफ्ते स्लाइड आई, हाथ जोड़ कर कह रहा है - 'मैंने जनसंघ के पक्ष में नाम वापस ले लिया है. कृपया मुझे वोट न दे कर जनसंघ को दें'. कुछ दिन बाद उसी प्रत्याशी का एक और स्लाइड. हाथ जोड़ कर बगुला-भक्ति - 'मैंने नाम वापस लेने का निर्णय वापस ले लिया है. कृपया मुझे ही वोट दें'. फ़िर कुछ दिन बाद वही बगुला भगत सामने- 'मैंने कांग्रेस के पक्ष में अपना नाम वापस ले लिया है. कृपया मेरे मतदाता कांग्रेस को वोट दें'!

पता चला कि उस का तो मकान गिरवी रखा हुआ था. ऐसे बार बार कलाबाज़ियां करते करते गिरवी मकान छूट गया! वाह भई वाह! जय हो...

अथ श्री गोस्वामी कथा....

एक श्रीमान गोस्वामी पर यह संस्मरण लिखने चला था. जाने कितनी बातें और लिख गया. पर अब बस केवल गोस्वामी जी की बातें. पूरे फ़िरोज़ाबाद में तहलका मचा रखा था. जितनी हँसी उन के बारे में सोच कर आती, किसी भी प्रत्याशी के बारे में सोच कर न आती. उन का चुनाव चिह्न था साइकिल. खासे मोटे थे. चुनाव जीत गए तो विधान सभा में अच्छा खासा नमूना भी बन जाएंगे. कोई कहता- 'ये चुनाव जीत गया तो सब इसे कांग्रेसी ही समझेंगे, क्यों कि कांग्रेसी बहुत खाते पीते हैं न'! कोई कहता 'क्या बात करते हो भई? क्या जनसंघियों के खाने के दांत नहीं हैं? या उनकी पत्तल में कोई कुछ डालता नहीं. वो तो और भूखे हैं. पॉवर नहीं है न'!

- 'सब के सब एक ही थैली के हैं स्साले...'

बहरहाल. गोस्वामी जी कहीं भी चुनाव प्रचार करने नहीं जाते थे. जिस अन्नपूर्णा होटल का ज़िक्र ऊपर आया है, उस के साथ वाली तीन-मंज़िला इमारत में सब से ऊपर वाली मंज़िल गोस्वामी जी का घर. उस के ऊपर घर की छत. वहां एक बड़े से तख्त पर गोस्वामी जी ने खूबसूरत सा एक मंच बना रखा था. रंगीन डिज़ाइन-दार चद्दरों से ढका हुआ. मंच पर हर समय गोस्वामी जी हाथ में माइक लिए पल्थी मार कर विराजमान रहते. उन के पीछे एक और ऊंचे तख्त पर उन की सुंदर सी साइकिल रखी रहती, जो चुनाव में नामांकन भरते ही शायाद नई नई ख़रीदी गई थी. साइकिल बड़ी शानदार सी लगती. साइकिल के पीछे रंगीन कपड़े का एक विशाल सा बैनर होता, जिस पर लिखा होता-

जनता ने भर दी है हामी, एम एल ए होंगे गोस्वामी
जनता ने भर दी है हामी, एम एल ए होंगे गोस्वामी!

और केवल लिखे रहने से क्या होता है! गोस्वामी जी के हाथ में माइक जो है. सुबह सात बजे से रात ग्यारह बजे तक वे एक ही राग आलापते-

जनता ने भर दी है हामी, एम एल ए होंगे गोस्वामी!
जनता ने भर दी है हामी, एम एल ए होंगे गोस्वामी!

अब आप कल्पना करें ज़रा. सुबह नौ बजे के बाद ही सदर बाज़ार की पतली सी सड़क की हालत कुछ और पतली होनी शुरू हो जाती. सड़क पर लोगों का, रिक्शों का और रिक्शों में घूमते पोस्टरों का एक सैलाब सा. उस पर कई आवाज़ें एक साथ आती हैं:

जीतेगा भाई जीतेगा
दीपक वाला जीतेगा!

दीपक के बिल्ले भी बच्चे -बच्चे की कमीज़ पर होते, और दो बैलों की जोड़ी के भी. कांग्रेस का चलता फिरता ग्रामोफोन ज़ोर ज़ोर से बज रहा होता-

भूल न जाना भारत वालो किसी की होड़ा-होड़ी में
देख भाल कर मोहर लगाना दो बैलों की जोड़ी में
कांग्रेस ही पार करेगी इस भारत की नैया को
भूल न जाना भूल के देश की नैया के खेवैया को


इतने में एक लंबे से टेंपो को चारों तरफ़ से ढकते चार खूंखार शेर पहियों पर धीरे धीरे आगे बढ़ रहे होते. ये राजाराम चूड़ियों वाले के होते. शेरों के जबड़े इतने खूंखार तरीके से खुले होते, जैसे ये जनसंघ-कांग्रेस, दोनों को निगल जाएंगे. यह सारा सैलाब मानो इन शेरों को ही समर्पित है...

और इस सब के बीच लोगों के कानों में रस घोलता सा एक चुनावी भजन-

जनता ने भर दी है हामी, एम एल ए होंगे गोस्वामी!
लोग गर्दन में दर्द के बावजूद मुस्कराते और ऊपर देखते, क्यों कि केवल भजन की आवाज़ से ही पूरा मज़ा कहाँ आता है भला. गोस्वामी जी देखो तो, कितनी लय में आगे पीछे झूमते भी रहते हैं. जैसे विधान-सभा की बैकुंठ में पहुँच ही गए हों... जैसे ठुमरी में भाव बदल-बदल कर एक ही पंक्ति गई जाती है, 'पिया तोरी मुरली की धुन्न लागे प्यारी', 'पिया तोरी मुरली की धुन्न लागे प्यारी' कभी उलाहना तो कभी चुनौती. गोस्वामी जी भी सुर बदल बदल कर गाते-

जनता ने भर दी है हामी एम एल ए होंगे गोस्वामी...



कभी कभी तो कई लोग रुक कर खूब हँसते. जितने मोटे गोस्वामी जी, उतनी ही, उनसे मुकाबला सा करती उन की घरवाली. हालांकि जब वह छत पर प्रकट होती, तो हाथ में चाय का कप या पानी का गिलास लिए होती. पति की तरफ़ बढ़ते बढ़ते उसे भी ज़ोरों की हँसी आ रही होती. वह पति से माइक ले कर मोटी लेकिन बेहतर आवाज़ में गाती-

जनता ने भर दी है हामी एम एल ए होंगे गोस्वामी...
जनता ने भर दी है हामी एम एल ए होंगे गोस्वामी...


इस बीच गोस्वामी जी या तो चाय पी लेते या पानी-वानी. या थोड़े से अदृश्य हो कर खाना खा लेते. कभी उन की, कॉलेज में पढ़ने वाली, सांवली और अच्छे हाव-भाव वाली, आकर्षक, लम्बी सी बिटिया भी आ जाती. उसे तो और अधिक हँसी आती रहती, जिसे देख गोस्वामी भी मुस्करा देते. बेटी खड़े खड़े ही माइक ले कर सुरीली आवाज़ में गुनगुनाती सी, जैसे केवल साथ दे रही हो-

जनता ने...
चुनाव से दो दिन पहले ही शाम साढ़े चार बजे प्रचार बंद. सारा शोर-गुल थम गया. केवल दुकानों पर चिल्लाते लोग. और काउंटरों पर पड़ते मुक्के. या तेज़ तेज़ बहस कर के जाते लोग. गालियाँ भी उछलती. संवेदनाएं भी उमड़ती. शर्तें भी लगती. किसी किसी का रक्त-चाप भी 'हाई' हो जाता. और बस, इंतज़ार की घड़ी ख़त्म. चुनाव की सुबह आ गई. लोग सुबह से ही तैयार हो कर जाने लगे हैं. पार्टियों के कार्यकर्ताओं की साइकिलें दौड़ रही हैं. कैसे भी, दोपहर से पहले ही काफ़ी ऊंची-प्रतिशत में मतदाता मतदान केन्द्र पर पहुँच जाने चाहियें. बस, अधिक से अधिक मोहरें हमारी पार्टी के नाम लगें... नहीं तो... राजा राम का श्श्शेर ही गरजता रहेगा इस शहर में स्साला...

इस बीच गोस्वामी जी के क्या हाल हैं? क्या वे घर में आराम कर रहे हैं? अजी नहीं. जनता इतनी बड़ी हामी भर दे, और गोस्वामी जी आज के दिन भी घर बैठे रहें! गोस्वामी जी तो अपने उसी आसन पर विराजमान हैं. गोल-गोल से तकिये पर पीठ टिकाए. आज हाथ में माइक नहीं है, क्यों कि आज तो अनुमति ही नहीं है न!...

पर गोस्वामी जी अब लोगों के सैलाब को बढ़ते देख यह आभास देने लगे हैं कि सारी जनता उन से आशीर्वाद ले कर जा रही है. सो वे अच्छी तरह पल्थी मार कर हाथ जोड़ कर बैठ जाते हैं. जब उन्हें लगता है कि कुछ लोग ऊपर देख मुस्करा रहे हैं, तो वे मुस्करा कर दाहिनी हथेली से उन्हें आगे बढ़ने का इशारा कर देते हैं, जैसे सैलाब की लहर को आगे उलीच रहे हों. जब वे अदृश्य होते हैं तो उनके स्थान पर विराजमान है उन की घर वाली! बेटी आस-पास ही खड़ी-खड़ी नीचे की रौनक देख रही है, और मुस्कराती ऐसे है, जैसे न जाने किस हसरत से सब को जाता देख मुस्करा रही है. जैसे वह ख़ुद, उन का हिस्सा बन कर कहीं जाना चाहती है. लोग यहाँ से गुज़रते हुए खींईं खींईं करते अपने आगे बढ़ कर जाते हुए साथियों को रोक कर कहते जा हैं-

जनता ने भर दी है हामी!

और अब क्लाईमैक्स...

शाम चार बजे ही गोस्वामी जी ख़ुद हरकत में आ जाते हैं. उन की जो साइकिल उन के पीछे रखी रही इतने दिन, वह उतर जाती है. देखते देखते वह साइकिल तिमंज़िले मकान की छत से उतर कर नीचे सड़क पर आ जाती है. वोट देने को बाकी आधा घंटा लगभग बचा है. गोस्वामी जी तड़कती-भड़कती धोती व कमीज़ पहने, जिस पर सोने के बटन चमकते हुए दूर से नज़र आ रहे हैं, नीचे अपनी साइकिल पर सवार नज़र आ रहे हैं. एक पत्रकार ने क्डिच कर के उन की एक तस्वीर ले ली. बहुत प्रसन्न हुए गोस्वामी जी. साथ में खड़ा है एक रिक्शा जिस का चालक अपेक्षाकृत कुछ कम तड़कते -भड़कते कमीज़-पाजामे में है. रिक्शे में विराजमान हैं उन की पत्नी और बेटी. अब ये तीनों ख़ुद वोट देने जाएंगे.

रास्ते में भीड़ है. संकरी सड़क पर कुछ ट्रैफिक जाम सा है. रिक्शा धीरे धीरे ही बढ़ पा रहा है. 'Polling Station' आ गया है. पर लगता है, देर हो गई है. वो देखो...

-'अरे ए! रुको न!' गोस्वामी जी की घरवाली चिल्लाती है.

'Polling Station' का फाटक बंद किया जा रहा है. गोस्वामी जी जैसे Olympian की तरह तेज़ी से साइकिल बढ़ा कर बंद होते फाटक में घुस जाते हैं. पत्नी और बेटी वाला रिक्शा भी आधे बंद हो चुके फाटक में घुसते घुसते लड़खड़ा सा जाता है. पत्नी फ़िर चिल्लाई- 'क्या कर रहे हो? रुको...

पर शुक्र, तीनों अन्दर पहुँच गए. और लो, तीनों वोट देने वाले कमरे में से हाज़िर हैं अब. मतदान अधिकारी नाम पूछ कर अपनी अंगुली मतदाता सूची पर दौड़ाते हैं, और सहसा चौंक से जाते हैं.

- 'गोस्वामी जी...आप ही हैं'?

- 'हाँ हाँ, मैंने अभी कहा न, मैं भी प्रत्याशी हूँ और यहाँ मेरा वोट भी है'!

- 'ये...ये...कैसे हो गया'?


- 'क्या कैसे हो गया? क्या कहना चाहते हो तुम'?...

- 'आप के नाम का वोट तो पहले ही दिया जा चुका है'!

- 'क्या बात करते हो. तुम लोग यहाँ बैठे बैठे करते क्या हो? मैं अभी 'चीफ मिनिस्टर' को फ़ोन करता हूँ. यहाँ एक इतने बड़े 'कैंडीडेट' का वोट ही कोई और दे गया! और आप लोग चुपचाप देखते रहे? आप को पता ही नहीं चला'!

- 'हम कोई यहाँ के लोगों को जानते थोड़ेई हैं'! मतदान अधिकारी लाचार.

- 'जानते नहीं हैं! लेकिन यहाँ पार्टियों के इतने लोग बैठे हैं'?


गोस्वामी जी को लगा कि ज़रूर, यह इन पार्टियों के कार्यकर्ताओं की ही शरारत होगी.

अधिकारी बोला - 'आप भी बिठाते किसी को'!

पर मूड ख़राब हो चुका था. गोस्वामी जी की घरवाली क्या करने लगी कि मतदान अधिकारी को अपना नाम बोल कर धमाके से कहने लगी- 'मेरा ढूँढिये. अंगुली पर निशान कहाँ पर लगाओगे'?
अधिकारी ने गोस्वामी जी की घरवाली और बिटिया के नाम ढूंढ लिए. मूड ख़राब सही, गोस्वामी जी चले आए. माँ-बेटी ने बारी-बारी कोने में जा कर छुप कर वोट दे दिए और मत-पेटी में डाल दिए. जब तीनों फाटक से बहार निकले तो कोई शरारती सा वर्कर पीछे से गुनगुनाने लगा- 'जनता ने भर दी है...' गोस्वामी जी की बिटिया ने पीछे पलट कर देखा. न जाने क्या सोच कर कभी गंभीरता से अपनी मुस्कराहट ढक देती, कभी मुस्कराहट से गंभीरता ढक देती. जैसे समझ न आ रहा हो, उसे अब कैसे भाव चेहरे पर लाने चाहियें. लड़का लपक कर कहीं दुबक गया.

अब तीसरा दिन है. मतगणना ज़ोर शोर से हो रही है. राजाराम शेर वाला जीत गया भईई... अरे अभी नतीजा कहाँ आया है यार, अफवाह तो न फैलाओ... वोही जीतेगा और किस में दम है भईई, राजाराम से पंगा ले ले...

शाम तक रिक्शों से कार्यकर्त्ता लौटने लगे. राजाराम का जीतना तो चुनाव से पहले ही निश्चित था. मतगणना कभी भी ख़त्म हो. रात एक बजे, या उस से भी बाद. पर जीतेगा राजाराम शेर वाला ही. राजाराम चूड़ियों वाला. सब को चूड़ियाँ पहना दी उसने. परिणाम तो अगली सुबह आया, पर रात भर राजाराम के कार्यकर्ता देसी ठर्रे पी पी कर गलियों में या इधर उधर लुढ़के रहे...

...पार्टियों के कार्यकर्त्ता एक दूसरे को दोष देने लगे. 'तुम्हारी पार्टी ने टांग अड़ाई'. 'तुम्हारी पार्टी ने अड़ाई'...

पर अगली शाम शहर में एक अफवाह कैसी फ़ैली है! सच ही होगी न! कहते हैं, गोस्वामी जी के घर में झगड़ा मचा हुआ है. अखबार में किस को कितने वोट पड़े, सब आया है. 'अमर उजाला' में तो पूरे आंकड़े आए हैं. फिरोज़ाबाद के भी...राजाराम इतने लाख इतने हज़ार. जनसंघ इतने हज़ार. कांग्रेस इतने हज़ार... 'और... और वो गोस्वामी? गोस्वामी का भी तो बताओ'...

-'अरे यार वही तो झगड़ा पड़ा है उस के घर में'.


-'भई बताओ न, उसे कितने वोट पड़े! बेचारे ने भजन कर कर के गला बिठा दिया अपना!

-'गला-वाला ना बिठाया. जलेबी खाता रहा वो तो. इलेक्शन लड़ के अपनी ठरक पूरी कर रहा था. मोटा उतना ही रहा. जनसंघी देख कितने पतले हो गए. चिल्ला चिल्ला कर पागल हो गए. पर जित्ते फ़िर भी ना...हा हा'...

-'और कांग्रेसी स्साले'!

- 'कांग्रेसी तो इतना खावें इतना खावें कि आख्खा देश पतला हो जावे, कांग्रेसी ना होवें'!

- 'ही ही... पर प्यारे, गोस्वामी को कितने वोट पड़े'?

- 'जानते हो कितने'?

- 'पच्चीस? तीस'?
- 'अरे नहीं भईई, गोस्वामी को पड़ा सिर्फ़ एक वोट'!

- 'एक वोट! पर वोट तो उस की बीबी और बेटी दोनों ने दिया था! गोस्वामी का अपना वोट तो जनसंघी खा गए थे न'?


-'जनसंघी खा गए तुझे कैसे पता स्साले'?


- 'वो तो बताया ना, ज़्यादा भूखे हैं. पॉवर में जो नहीं हैं'!

- 'पर गोस्वामी के नाम सारे फ़िरोज़ाबाद में सिर्फ़ एक वोट पड़ा! गज़ब हो गया यार'!


- 'यही तो झगड़ा है. तुम लोग समझ नहीं पा रहे हो. गोस्वामी ने घर में झगड़ा खड़ा कर रखा है कि या तो मेरी बीबी या फ़िर बेटी, दोनो में से एक ने मेरे साथ गद्दारी की है. बेटी ज़िद पर कि 'बाप्पू मैन्ने तो आप को ही वोट दिया'. और बीबी भी बोल्ये 'मुन्नी के बापू मैंने साइकिल पर ही मोहर लगाई थी'...
अजीब सस्पेंस में फंस गया था सारा शहर...

लेखक- प्रेमचंद सहजवाला

Monday, March 30, 2009

....सबको ये फिक्र है कि सरदार कौन हो ??

कहा जाता है कि वह राजनेता उतना ही बड़ा होता है जो जितना बड़ा ख्वाब देखता है। जवाहरलाल नेहरू से ले कर राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण तक की पीढ़ी ख्वाब देखते-देखते गुजर गई। पता नहीं इनमें कौन कितना बड़ा राजनेता था। जब कोई नेता अपने जीवन काल में अपना ख्वाब पूरा नहीं कर पाता, तो उसका कर्तव्य होता है कि वह उस ख्वाब को अगली पीढ़ी में ट्रांसफर कर दे। इनमें सबसे ज्यादा सफल नेहरू ही हुए। लोहिया और जयप्रकाश के उत्तराधिकारी लुंपेन बन गए। कुछ का कहना है कि वे शुरू से ही ऐसे थे, पर अपने को साबित करने का पूरा मौका उन्हें बाद में मिला। पर नेहरू का ख्वाब आज भी देश पर राज कर रहा है। नेहरू ने आधुनिक भारत का निर्माण किया था। हम आधुनिकतम भारत का निर्माण कर रहे हैं। सुनते हैं, इस बार के चुनाव का प्रमुख मुद्दा है, विकास। नेहरू का मुद्दा भी यही था। इसी मुद्दे पर चलते-चलते कांग्रेस के घुटने टूट गए। अब फिर वह दौड़ लगाने को तैयार है।

इस देश के सबसे बड़े और संगठित ख्वाब देखनेवाले कम्युनिस्ट थे। उनका ख्वाब एक अंतरराष्ट्रीय ख्वाब से जुड़ा हुआ था। इसलिए वह वास्तव में जितना बड़ा था, देखने में उससे काफी बड़ा लगता था। यह ख्वाब कई देशों में यथार्थ बन चुका था, इसलिए इसकी काफी इज्जत थी। लेकिन जब तेलंगाना में असली आजादी के लिए संघर्ष शुरू हुआ, तो नेहरू के ख्वाब ने उसे कुचल दिया। तब का दर्द आज तक कम्युनिस्ट ख्वाब को दबोचे हुए है। किताब में कुछ लिख रखा है, पर मुंह से निकलता कुछ और है। कम्युनिस्टों के दो बड़े नेता -- एक प. बंगाल में और दूसरा केरल में -- एक नया ख्वाब देख रहे हैं। समानता के ख्वाब को परे हटा कर वे संपन्नता का ख्वाब देखने में लगे हुए हैं। ईश्वर उनकी सहायता करे, क्योंकि जनता का सहयोग उन्हें नहीं मिल पा रहा है।

बाबा साहब अंबेडकर ने भी एक ख्वाब देखा था। यह ख्वाब अभी भी फैशन में है। पर सिर्फ बुद्धिजीवियों में। राजनीति में इस ख्वाब ने एक ऐसी जिद्दी महिला को जन्म दिया है जिसका अपना ख्वाब कुछ और है। वे अंबेडकर की मूर्तियां लगवाती हैं, गांवों के साथ उनका नाम जोड़ देती हैं, उनके नाम पर तरह-तरह के आयोजन करती रहती हैं। पर उन्होंने कसम खाई हुई है कि आंबेडकर वास्तव में क्या चाहते थे, यह पता लगाने की कोशिश कभी नहीं करेंगे। इसके लिए अंबेडकर साहित्य पढ़ना होगा और आजकल किस नेता के पास साहित्य पढ़ने का समय है? फिर इस जिद्दी महिला का ख्वाब क्या है? इस बारे में क्या लिखना! बच्चों से ले कर बड़ों तक सभी जानते हैं। सबसे ज्यादा वे जानते हैं जो तीसरा मोर्चा नाम का चिड़ियाघर बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

हिन्दू राष्ट्र के दावेदारों ने भी एक ख्वाब देखा था। उनका ख्वाब काफी पुराना है। जब बाकी लोग आजादी के लिए लड़ रहे थे, तब वे एक छोटा-सा घर बना कर अपने ख्वाब के भ्रूण का पालन-पोषण कर रहे थे। उनकी रुचि स्वतंत्र भारत में नहीं, हिन्दू भारत में थी। वैसे ही जैसे लीगियों की दिलचस्पी आजाद हिन्दुस्तान में नहीं, मुस्लिम पाकिस्तान में थी। लीगियों को कटा-फटा ही सही, अपना पाकिस्तान मिल गया, पर संघियों को इतिहास ने ठेंगा दिखा दिया। तब से वे स्वतंत्र भारत के संविधान को ठेंगा दिखाने में लगे हुए हैं। लीगियों ने आजादी के पहले खून बहाया था, संघियों ने आजादी के बाद खून बहाया। शुरू में उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। वे सिर्फ अपना विचार फैला सके। बाद में जब भारतवाद कमजोर पड़ने लगा, तब हिन्दूवाद के खूनी पंजे भगवा दस्तानों से निकल आए। कोई-कोई अब भी दस्तानों का इस्तेमाल करते हैं,पर उनके भीतर छिपे हाथों का रंग दूर से ही दिखाई देता है।

अब कोई बड़ा ख्वाब देखने का समय नहीं रहा। कुछ विद्वानों का कहना है कि महास्वप्नों का युग विदा हुआ, यह लघु आख्यानों का समय है। भारत में इस समय लघु आख्यान का एक ही मतलब है, प्रधानमंत्री का पद। मंत्री तो गधे भी बन जाते हैं, घोड़े प्रधानमंत्री पद के लिए दौड़ लगाते हैं। अभी तक हम इस पद के लिए दो ही गंभीर उम्मीदवारों को जानते थे। अब महाराष्ट्र से, बिहार से, उड़ीसा से, उत्तर प्रदेश से -- जिधर देखो, उधर से उम्मीदवार उचक-उचक कर सामने आने लगे हैं। यह देख कर मुझे लालकृष्ण आडवाणी से बहुत सहानुभूति होने लगी है। बेचारे कब से नई धोती और नया कुरता ड्राइंग रूम में सजा कर बैठे हुए हैं। इस बार तो उनके इस्तेमाल का मौका नजदीक आते दिखाई नहीं देता। बल्कि रोज एकाध किलोमीटर दूर चला जाता है। चूंकि मैं सभी का और इस नाते उनका भी शुभचिंतक हूं, इसलिए आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने का आसान नुस्खा बता देना चाहता हूं। इसके लिए सिर्फ दो शब्द काफी हैं -- पीछे मुड़ (अबाउट टर्न)। सर, संप्रदायवाद, हिन्दू राष्ट्र वगैरह खोटे सिक्कों को सबसे नजदीक के नाले में फेंक दीजिए। आम जनता की भलाई की राजनीति कीजिए। अगली बार आपको प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक नहीं सकेगा।

राजकिशोर
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं...)

Thursday, March 26, 2009

लोकतंत्र से ज़्यादा अहम आईपीएल ???

सवाल ये है कि हम क्यों लिखें और आप क्यों पढ़ें क्योंकि न तो हमारे लिखने से कोई फायदा होने वाला है, न ही आपके पढ़ने से। फिर भी हम लिख रहे हैं और आप पढ़ रहे हैं। इस छोटी सी उम्मीद के साथ कि क्या पता, शायद कुछ बदल जाय।
देश में पहले चरण के इंतेखाबात के लिये अधिसूचना जारी हो चुकी है। यानी होना तो ये चाहिये था कि देश में आम चुनाव का ख़ुमार पूरी तरह से छा जाय लेकिन क्या कीजियेगा इन आईपीएल वालों का कि ये सियासत के खेल में खेल की सियासत को लेकर आ गये हैं। आईपीएल की नुमाइश देश में होगी या देश से बाहर क्या फर्क पड़ता है। अभी तक इस नुमाइश के होने या न होने पर सुरक्षा कारणों को वजह बनाया जा रहा है लेकिन क्या कोई ये बहस भी कर रहा है कि सुरक्षा कारणों के अलावा भी क्या ऐसे समय में आईपीएल होना चाहिये जब देश आम-चुनाव की ज़िम्मेदारियां पूरी करने में लगा हो। चुनाव की तारीखें तय करते वक़्त हमारा चुनाव आयोग भी ये ध्यान रखता कि व्यापक तौर पर न तो परिक्षाएं हो रही हों और न ही हमारा किसान खेती-बाड़ी जैसे न टाले जाने वाले कामों में में लगा हो। तो क्या आईपीएल के आयोजकों को इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये?

सोचिये जो समय राजनीति की सार्थक बहसें करने का है उस वक़्त हमारी जबान पर राजस्थान रॉयल्स, डेयर डेविल्स या शाहरुख़ ख़ान की नाइट राइडर्स की बातें होंगी। आईपीएल देश में हो या देश से बाहर, इससे जो फ़र्ख पड़ेगा उससे भी ज़्यादा गंभीर ये है कि इन सबके बावजूद वो घर-घर में मौजूद रहेगा। रोज़ दो शो होंगे पहला आठ बजे रात और दूसरा दस बजे से। ये वही समय है जब देश की जनता दिनभर की ख़बरें देखती है। जो नये सवाल देश के सामने होते हैं उनपर बहस करने के लिये या राय जानने के लिये हमारे तमाम टीवी चैनल्स नेताओं और संबंधित लोगों को पकड़ कर हमारे सामने लाते हैं। आने वाले दिनों में चुनाव के मद्देनज़र जब इन कार्यक्रमों की हमें बेहद ज़रूरत होगी उस वक़्त हमारे मतदाता जिनमें युवा ज़्यादा हैं, क्रिकेट मैच की रंगीनियों में खोये होंगे। क्रिकेट, ग्लैमर और पैसे की चकाचौंध के बलबूते विज्ञापनों का कारोबार और विज्ञापनों के आधार पर इस नुमाइश की कामयाबी के आगे आम-चुनाव के मुद्दे खो जायेंगे, ऐसी संभावनाओं से इंकार कैसे किया जा सकता है। जो कुछ तय हो रहा है, अगर होगा तो हमारे लोकतंत्र के साथ एक भद्दा मज़ाक होगा जिसके ज़िम्मेदार सितारा हैसियत रखने वाले आईपीएल के यही दावेदार होंगे जो हर कीमत पर इस नुमाइश को आयोजन करवाना चाहते हैं।

होना तो ये चाहिये कि जब देश आम-चुनाव के लिये तैयार हो रहा है, ऐसा कोई आयोजन न हो जो इसकी गंभीरता के साथ खिलवाड़ करे, लेकिन नुमायशी क्रिकेट के कारोबारियों को इन सबसे क्या लेना-देना वो तो कह रहे हैं कि इसबार अगर उन्हें धनलाभ नहीं भी होता है, तो भी वो इसमें अपना पसीना बहायेंगे और हर कीमत पर अपना खेल खेलेंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर आईपीएल के मैच नहीं हो पाते हैं तो करीब एक हजार करोड़ का घाटा होगा।

न्यूज़ चैनल जो पहले ही कटौती के इस माहौल में कम से कम खर्च करने की नीतियां अपनाये हुए हैं, बजाय जमीनी हकीकत पर उतरने के, स्टूडियोज़ में बैठे-बैठे ही चुनावी रस्में अदा करेंगे। चुनावों में क्या हो रहा है और क्या होगा? जैसे सवालों के बजाय दिनभर ये दिखाते रहेंगे कि आईपीएल में क्या हो चुका है और क्या होने जा रहा है। क्योंकि जिन विज्ञापनों के दम पर वो पैसा खर्च करने समाचार जुटाते हैं वो विज्ञापन तो नुमायशी क्रिकेट की चकाचौंध में शामिल होगें। टीआरपी तो वहीं से आयेगी।

हर चीज़ में राजनीति देखने वाले गृह-मंत्रालय की चिंताओं को भी सियासी चश्में से देख रहे हैं। इंडियन प्रीमियर लीग बनाम इंडियन पॉलिटिकल लीग का नया खेल सियासी रंग लेता जा रहा है। लगता है कि आईपीएल, सत्ता और विपक्ष के बीच राजनैतिक लड़ाई का माहौल बनायेगा क्योंकि करीब करीब सभी कांग्रेसी सत्ता वाले राज्य आईपीएल की सुरक्षा से मुंह मोड़ रहे हैं और सारे भाजपा शासित प्रदेश आईपीएल और चुनाव की सुरक्षा एक साथ करने के संकेत दे चुके हैं। “जो सरकार अपने यहां होने वाले खेलों की रक्षा नहीं कर सकती वो देश की रक्षा कैसे करेगी ”, अब इस तरह के भाषण किसी एक मंच के मोहताज नहीं रह जायेंगे। देश के लोकतंत्र से ज़्यादा फ़िक्र लोगों को इस बात की है कि आईपीएल का क्या होगा? सारी दुनिया हम पर थू-थू करेगी कि हम कितने डरपोक हैं। ललित मोदी जो कह रहे थे कि आईपीएल को देश की सुरक्षा एजेंसियों की कोई ज़रूरत नहीं है और वो अपने आयोजन की हिफाज़त ख़ुद कर सकती है, वो अब क्यों दूसरा देश ढूंढ़ रहे हैं, समझ में नहीं आता।

वैसे भी जो खेल हो रहा है उससे क्रिकेट का कितना लेना देना है ये तो उन तस्वीरों से पता चल जाता है जो इन दिनों सुर्खियों में हैं। इनमें क्रिकेटर के बजाय शाहरुख खान, प्रिटि जिंटा, शिल्पा शेट्टी, विजय मालया, ललित मोदी और मिसेज़ मुकेश अंबानी दिखायी पड़ते हैं। इनको देखकर रोमन शासकों की याद आ जाती है जिनके पास ग्लैडिएटर्स होते थे जो अपने मास्टर के लिये जान की बाजी लगा देते थे। यहां गुलामी का अंदाज़ चाहे वैसा न हो लेकिन निलामी तो इनकी भी लगती है। पिछली बार सबसे मंहगी बोली के साथ धोनी 6 करोड़ में बिके थे। इस बार फिंलटाफ और पीटरसन उससे भी ज्यादा, आठ करोड़ में खरीदे गये हैं। 2008 में इस बात से बड़ी राहत मिली थी जब पांच क्रिकेटर्स को आइकॉन कहकर निलाम होने से बचा लिया गया था। इनमें सरताज खिलाड़ी सचिन के साथ-साथ सहवाग, युवराज, गांगुली और द्रविड़ भी थे। शायद इन खिलाड़ियों को इस तरह बिकना मंज़ूर नहीं रहा होगा। आगे ये निलामी क्या-क्या शक्लें बदलेगी, क्या कहा जा सकता है।

ये बहस क्यों नहीं की जा रही है कि देश का लोकतंत्र ज्याद महत्वपूर्ण है या आईपीएल? अगर आईपीएल बाहर भी आयोजित हुआ तो समस्या सिर्फ सुरक्षा की दूर होगी, चुनाव पर जो उसका असर पड़ेगा उसको क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जानबूझकर आईपीएल की तारीखों को चुनाव के समय से टकराया गया है? सवाल ये नहीं है कि कितनी संजीदगी से आम-चुनाव में लोग हिस्सा लेंगे, सवाल ये है कि हम इसके लिये कितना गंभीर माहौल बना रहे हैं?

नाज़िम नक़वी
9811400468