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Wednesday, November 04, 2009

यह केवल उत्सवधर्मी विश्विविद्यालय नहीं रहेगा- विभूति नारायण राय

पिछले दिनों हिन्द-युग्म के रामजी यादव और शैलेश भारतवासी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय से बात की। विभूति नारायण राय हिन्दी के चर्चित लेखक और साहित्यकार हैं जिनकी दंगों के दौरान पुलिस के सांप्रदायिक रवैये पर लिखी पुस्तक 'शहर में कर्फ़्यू' बहुत प्रसिद्ध रही। विभूति उ॰ प्र॰ में पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्य कर चुके हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय हिन्दी भाषा को समर्पित दुनिया का एक मात्र विश्वविद्यालय है। तो हमने जानने की कोशिश की कि हिन्दी भाषा-साहित्य की गाड़ी में गति लाने के लिए इनका विश्वविद्यालय क्या कुछ करने जा रहा है॰॰॰॰॰


(इंटरव्यू को उपर्युक्त प्लेयर से सुन भी सकते हैं)

रामजी यादव- महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 10-12 वर्ष पहले हुई थी। पूरी दुनिया में फैला हुआ जो हिन्दी समाज है, उसके प्रति हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यह उत्तरदायी है। लेकिन यह एक उत्सवधर्मी विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। और लगभग इसकी उत्सवधर्मिता इसके कुलपति की महात्वकांक्षाओं तक सीमित करके देखी जाती है। इस पूरी छवि को आप कैसे बदलेंगे?

वी एन राय- विश्वविद्यालय केवल उत्सवधर्मिता का केन्द्र न रहे, बल्कि गंभीर अध्ययन और शोध का क्षेत्र भी बने, और इसके साथ-साथ इस विश्वविद्यालय की हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में ज़रूरी उपकरण प्रदान करने की जो इसकी खास भूमिका है, उसे पूरा करने में भी इसका सक्रिय योगदान हो, इस समय दिशा में यह विश्वविद्यालय काम कर रहा है। इस वर्ष नये विभाग खुले हैं। मानवशास्त्र और फिल्म-थिएटर दो विभाग शुरू किये गये हैं। इसके अलावा डायस्पोरा स्ट्डीज का नया विभाग शुरू होने वाला है। ये तीनों नये विभाग महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की उस भूमिका को निभाने में भी मदद करेंगे, जिसकी कल्पना इस विश्ववविद्यालय के एक्ट में की गई है और प्रथम अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में इसकी निर्मिती के पीछे जो एक परिकल्पना रही है। इसे अंतरर्राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए, शायद आप अवगत हों, विश्वविद्यालय एक बहुत महात्वपकांक्षी योजना पर काम कर रहा है वो है कि हिन्दी में जो कुछ भी बहुत महत्वपूर्ण है, उसे ऑनलाइन किया जाये ताकि दुनिया के कोने-कोने में बैठे हिन्दी के पठक उन्हें पढ़ सके। हमारी कोशिश है कि दिसम्बर 2009 तक लगभग 100000 पृष्ठ ऑनलाइन कर दिये जायें। इसके अलावा हम इन सभी महत्वपूर्ण कृतियों को दुनिया की तमाम भाषाओं में जैसे चीनी, जापानी, अरबी, फ्रेंच इत्यादि में अनुवाद करके ऑनलाइन करना चाहते हैं।

रामजी यादव- एक चीज़ मानी जाती है कि हिन्दी एक बड़ी भाषा है जो तमाम तरह के संघर्षों से निकली है। लेकिन हिन्दी में विचारों की स्थिति बहुत दयनीय है। एक विश्वविद्यालय के रूप में आपका विश्वविद्यालय किस तरह का प्रयास कर रहा है कि हिन्दी में विचार मौलिक पैदा हों और दुनिया के दूसरे अनुशासनों से इनका संबंध बने?

वी एन राय- इसके लिए भी हमने कुछ महात्वकांक्षी योजनाएँ बनाई है। हमारे विश्वविद्यालय का जो पाठ्यक्रम है वो गैरपारम्परिक पाठ्यक्रम हैं। जो विषय हमारे यहाँ पढ़ाये जा रहे हैं वह भारत के बहुत कम विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं। जैसे स्त्री-अध्ययन है, शांति और अहिंसा है, हिन्दी माध्यम में मानव-शास्त्र है, फिल्म और थिएटर या डायस्पोरा स्ट्डीज की पढ़ाई है। अनुवाद भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें हमारे यहाँ पढ़ाई हो रही है। लेकिन ज्ञान के इन अनुशासनों में मौलिक पुस्तकों की कमी है, मौलिक तो छोड़ दीजिए जो एक आधार बन सकती हों, ऐसे पाठ्यपुस्तकों की कमी है। इसलिए हमने योजना बनाई है कि हम ज्ञान के इन सारे अनुशासनों में जो कुछ भी महत्वपूर्ण अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में उपलब्ध है, उसके कुछ चुनिंदा अंशों का अनुवाद हो और उसे छापें। और यह योजना शुरू भी हो गई है, हमने स्त्री-अध्ययन के लिए 10 पुस्तकों को चुना है जिसका साल भर में हम अनुवाद करा लेंगे। इसके बाद अन्य अनुशासनों में जायेंगे।

शैलेश भारतवासी- सवाल हमारा यह था कि जो हिन्दी का साहित्यिक या वैचारिक परिदृश्य हैं, वो पूर्णतया मौलिक नहीं है। विश्वविद्यालय की तरफ से ऐस कोई प्रयास है जिससे मौलिक विचार निकलकर आये?

उत्तर- मौलिक लेखन को भी हम प्रोत्साहन देंगे, लेकिन सवाल यह है कि मौलिक लेखन के लिए भी आधारभूत सामग्री उपलब्ध हो, जिन्हें पढ़कर आप अपनी बेसिक तैयारी कर सकें। दुर्भाग्य से गंभीर समाज शास्त्रीय विषयों पर हिन्दी में मौलिक सामग्री या तो बहुत कम है या ज्यादातर अनुवाद के माध्यम से मिल रही है। पर हमारा प्रयास यह होगा कि जब हम महत्वपूर्ण चीज़ों का अनुवाद करायेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें पढ़कर जो मौलिक सोचने वाले हैं, वे मौलिक लेखन करेंगे और उन्हें भी हम प्रकाशित करेंगे।

रामजी यादव- क्या दुनिया के अन्य देशों के विश्ववद्यालयों में जहाँ प्राच्य विद्या किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, उनके साथ विश्वविद्यालय का कोई अंतर्संबंध बन रहा है?

वी एन राय- जी, हम यह कोशिश कर रहे हैं कि बाहर के 100 विश्वविद्यालयों में जहाँ हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, भाषा के तौर पर, प्राच्य विद्या का एक अंग होकर या साउथ-एशिया पर विभाग हैं, उनमें हिन्दी का इनपुट है, इन सभी विश्वविद्यालयों के बीच में हम एक समन्वय सेतु का काम करें, उनमें जो अध्यापक हिन्दी पढ़ा रहे हैं, उनके लिए रिफ्रेशर कोर्सेस यहाँ पर हम संचालित करें, उनके लिए ज़रूरी पाठ्य-सामग्री का निर्माण करायें और सबसे बड़ी चीज़ है कि विदेशों से बहुत सारे लोग जो हिन्दी सीखने के लिए भारत आना चाहते हैं, उनके लिए हमारा विश्ववद्यालय एक बड़े केन्द्र की तरह काम करें, इस दिशा में भी काम चल रहा है।

शैलेश भारतवासी- जहाँ एक ओर आप विदेशी विश्वविद्यालयों से अंतर्संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं अपने ही देश के बहुत से लोग जो हिन्दी भाषा या साहित्य में ही अपनी पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं, उन्हें भी आपके विश्वविद्यालय के बारे में पता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए भी इस विश्वविद्यालय का नाम एक नई चीज़ है। तो क्या आप चाहते ही नहीं कि सभी लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचेया कोई और बात है?

वी एन राय- नहीं-नहीं, आपकी बात सही है। विश्वविद्यालय को बने 11 साल से ज्यादा हो गये, लेकिन दुर्भाग्य से बहुत बड़ा हिन्दी समाज इससे परिचित नहीं है, या उसका बहुत रागात्मक संबंध नहीं बन पाया या कोई फ्रुटफुल इंटरेक्शन नहीं हो पाया। ऐसा नहीं है कि हम नहीं चाहते, और हम इसके लिए हम प्रयास भी कर रहे हैं। मसलन हमारी वेबसाइट ही देखिए। हालाँकि हिन्दी-समाज बहुत तकनीकी समाज नहीं है, बहुत कम लोग हिन्दी वेबसाइट देखते हैं। लेकिन मुझे देखकर बहुत खुशी होती है कि हमारी वेबसाइट को रोज़ाना 150-200 लोग आते हैं और वो भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। तो ऐसा नहीं है, धीरे-धीरे लोगों ने इसे जानना शुरू किया है।

शैलेश भारतवासी- लेकिन यहीं पर मैं रोकूँगा, आपने कहाँ कि आप 150-200 लोगों से संतुष्ट हैं (कुलपति ने यहीं रोककर इंकार किया), मेरा कहना है कि आपको 150 विजिटरों से आशा की एक किरण नज़र आती है। मैं एक साहित्यिक-सांस्कृतिक वेबसाइट चलाता हूँ, जिसे रोज़ाना 10,000 हिट्स मिलते हैं (यह दुनिया भर की वेबसाइटों के एस्टीमेटेड हिट्स निकालने वाली वेबसाइट का आँकड़ा है), फिर भी मैं संतुष्ट नहीं हूँ और इसे एक बहुत छोटी संख्या मानता हूँ। आपकी वेबसाइट पर मैं 2-3 बार गया भी हूँ। मेरा जो अनुभव है वह कहता है कि इसमें जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है वह बहुत प्रयोक्ता-मित्र नहीं है, वह समय के साथ नहीं चल रही है। क्या इस दिशा में कोई परिवर्तन हो रहा है?

वी एन राय- पिछले 5-6 महीनों में जो परिवर्तन हुए हैं, उसमें दो महत्वपूर्ण योजनाओं को शामिल किया जा रहा है। एक तो मैंने पहले भी बताया कि हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखन के 1 लाख पृष्ठ ऑनलाइन किये जायेंगे और हिन्दी के जो समकालीन रचनाकार हैं, लेखक है, उनकी प्रोफाइल, इनके पते वेबसाइट पर डाल रहे हैं ताकि दुनिया भर में फैले इनके प्रसंशक, इनके पाठक, प्रकाशक इनसे संपर्क कर सकें। तकनीक के स्तर पर भी हम परिवर्तन करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा विश्वविद्यालय कोई तकनीकी विश्वविद्यालय तो है नहीं, फिर भी हम सीख करके, दूसरों की सहायता लेकर अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।

रामजी यादव- भारत में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जिसमें गैर हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी का विकास हो रहा है, जिससे नये तरह के डायलेक्ट्स बन रहे हैं, भाषा जिस तरह से बन रही है, बाज़ार दूसरी तरह से इन चीज़ों को विकसित कर रहा है। इस पूरी पद्धति में भाषा का विश्वविद्यालय होने की वजह से, विश्वविद्यालय किस रूप से देशज और भदेस को मुख्यधारा का विषय बना सकता है?

वी एन राय- इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद हैं। आज हम जिसे हिन्दी भाषा कह रहे हैं, वह भी एक समय बोली थी। खड़ी बोली। जब आप 'हिन्दी' शब्द का उच्चारण करते हैं तो 'खड़ी बोली' दिमाग में आती है। आज से 130 साल पहले भारतेन्दु तक यह नहीं मानते थे कि 'खड़ी बोली' में कविता भी लिखी जा सकती है। गद्य की भाषा तो 'खड़ी बोली' थी, लेकिन पद्य की भाषा ब्रजभाषा रखते थे भारतेन्दु। छायावाद आते-आते लगभग यह स्पष्ट हुआ कि 'खड़ी बोली' ही 'हिन्दी' होगी। और एक मानकीकरण शुरू हुआ। 30-40 साल बहुत संघर्ष चला। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी होगी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी के शब्दों के साथ हम कैसा व्यवहार करेंगे, कैसे हम इस भाषा को पूरे देश के लिए एक मानक और एक स्वीकार्य भाषा बना पायेंगे, यह सारे संघर्ष चलते-चलते कमोबेश यह तय हो गया है कि 'खड़ी बोली' ही हिन्दी होगी और सभी बोलियाँ इसे मदद करेंगी, खाद का काम करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य से एक दूसरी प्रवृत्ति दिखलाई दे रही है, जो मेरे हिसाब से खतरनाक है। बहुत सारी बोलियाँ इस छटपटाहट में हैं कि वो हिन्दी को रिप्लेस करके एक स्वतंत्र भाषा जैसी स्थिति हासिल करें। विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भाग लेने अभी मैं मॉरिशस गया था,, वहाँ भी बहुत सारे लोग अतिरिक्त उत्साह में यह कह रहे थे कि हिन्दी क्या है, हमारी राष्ट्रभाषा तो भोजपुरी है, मातृभाषा भोजपुरी है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हुआ कि वहाँ के एक बड़े कार्यक्रम में जब एक राजनेता हिन्दी में बोलने लगे तो जनता में से कुछ लोग कहने लगे ये कौन सी भाषा इस्तेमाल कर रहे हो, छत्तीसगढ़ी हमारी राजभाषा है। यह एक डिवाइसिव, फूट डालने वाली स्थिति है, जिससे हमें बचना होगा। मतलब हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद भी बनें और हिन्दी का नुकसान भी न करें। हमारा विश्वविद्यालय चूँकि हिन्दी का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है, इसलिए इस दिशा में निश्चित ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। हमलोग फरवरी-मार्च में बोलियों को लेकर एक सम्मेलन करने जा रहे हैं। हिन्दी का लोक बहुत समृद्ध है, कई अर्थों में बहुत प्रगतिशील है। अगर आप देखें तो पूरी दुनिया में इतनी विविधता लिए हुए लोक दिखलाई नहीं देगा। हमें इस प्रवृत्ति पर नज़र रखनी पड़ेगी कि वो लोक आगे जाकर नुकसान न करे, यह खाद का काम करे न कि विषबेन बन जाय।

शैलेश भारतवासी- यह तो हमारी बोलियों की बात है। दक्षिण भारतीय जो गैर हिन्दी भाषी हैं, हालाँकि हिन्दी को वे सम्पूर्ण भारत की भाषा के तौर पर देखते हैं, लेकिन उनकी शिकायत रहती है कि हिन्दी हमारी राजभाषा है, चलो हम इसे सीख लेते हैं, लेकिन हिन्दीभाषी हमारी भाषा को नहीं सीखते। क्या विश्वविद्यालय कोई इस तरह का कार्यक्रम चलाया रहा है जिससे गैरहिन्दी भाषा को सीखने पर प्रोत्साहन मिले?

वी एन राय- देखिए यह तो सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। यह बात आपने बिल्कुल सही कही कि त्रिभाषा कार्यक्रम को लेकर सबसे अधिक बेईमानी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही हुई। हम यह तो चाहते थे कि जो अहिन्दी भाषी क्षेत्र हैं, वहाँ तो शुरू से बच्चे हिन्दी पढ़े, लेकिन जब हमारे यहाँ तीसरी भाषा की बात आई तो हमने संस्कृत को डाल दिया जो किसी भी जनसमूह की भाषा नहीं थी। हमें कोई जीवित भाषा सीखनी चाहिए थी। लेकिन विश्वविद्यालय का तो बहुत सीमित दायरा होता है। हम तो सरकार से बस अपील कर सकते हैं।

Monday, June 29, 2009

ठगी और दुनिया के महान ठग

हे ठग! तेरे कितने रूप

इन दिनों ठगी के चर्चे पूरे शबाब पर हैं। अभी मुश्किल से एक महीना भी नहीं गुजरा, जब लोगों से कई करोड़ों की ठगी करने का आरोपी डॉ॰ अशोक जडेजा पुलिस के हत्थे चढ़ा। खुद को सांसी समाज का देवीभक्त बताने वाले अशोक जडेजा ने अपने 18 एजेंटों की मदद से 12 राज्यों में अपना नेटवर्क फैला रखा था। जडेजा लोगों से 15 दिनों में उनके धन को तिगुना करने का लालच देकर करोड़ों रूपये जमा कर लेता था और 15 दिनों बाद आने का वादा कर हमेशा के लिए फरार हो जाता था। लगभग 15 दिन पहले दिल्ली पुलिस ने महाठग सुभाष अग्रवाल को गिरफ्तार कर लिया जिसने चीटफंड की कम्पनी खोल रखी थी और उसपर 1000 करोड़ रुपये की ठगी का आरोप था। सुभाष अग्रवाल भी अपने ग्राहकों को बहुत कम समय में उनके धन को दुगुना और तिगुना करने का वादा करता था।

ठगी का एक और मामला पिछले 2 वर्षों से प्रकाश में है जिसमें कीनिया और नाइजीरिया मूल के लोग इंटरनेट के माध्यम से लोगों को ठगने काम कर रहे हैं। इंटरनेट की दुनिया के ये महाठग बहुत ही लुभावने ऑफरों वाली ईमेल एक साथ कई इंटरनेट प्रयोक्ताओं को भेजते हैं, जिसमें अफ्रीकी देशों में कई लाख रुपये वेतन की नौकरी देने के झाँसे होते हैं, कोई अपनी मिलियन डॉलर की सम्पत्ति आपके नाम कर जाता है तो किसी किसी ईमेल में इस बात का ज़िक्र होता है कि आपकी ईमेल आईडी फलाँ लॉटरी में कई बिलियन डॉलर के इनाम के लिए चुनी गयी है। आपको उस ईमेल के उत्तर में बस अपना नाम-पता और बैंक डीटेल इत्यादि भेजने होते हैं, जिसके बाद उनकी तरफ से ईमेल आता है, दोस्ती होती है। फिर उनका गिरोह फोन द्वारा आपसे बात करता है। अंत में तथाकथित नौकरी या रक़म देने से पहले वे पंजीकरण शुल्क के रूप में 15-20 हज़ार रुपये (300-400 डॉलर) जमा करने की माँग करते हैं।

ठगी का यह पेशा कोई नया नहीं है। भारतीय इतिहास महान ठगों की महागाथा से पटा पड़ा है। भगवान श्रीकृष्ण को ठगों का राजा कहा जाता है। मध्यकालीन भारत में तो यह धंधा एक प्रथा के रूप में प्रचलित था, जिसमें ठग लोग भोले-भाले यात्रियों को विष आदि के प्रभाव से मूर्छित करके अथवा उनकी हत्या करके उनका धन छीन लेते थे। ठगी प्रथा का समय मुख्य रूप से 17वीं शताब्दी के शुरू से 19वीं शताब्दी अंत तक माना जाता है। मध्य भारत में प्रकोप की तरह फैले- रुमाल में सिक्कों की गांठ लगा कर रुपये-पैसे और धन के लिए निरीह यात्रियों के सिर पर चोट करके लूटने वाले ठग और पिंडारियों का आतंक 19वीं सदी के प्रारंभ तक इतना बढ़ गया कि ब्रिटिश सरकार को इसके लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ी। ठगी प्रथा के कारण मुग़ल काल में नागपुर से उत्तर प्रदेश के शहर मिर्ज़ापुर तक बनी सड़क पर यात्रियों का चलना मुश्किल हो गया था। इस सदी के ये महान ठग खुद को काली का भक्त बताते थे, फिर वे चाहे हिन्दू-ठग हों, सिख-ठग हों या फिर मुसलमान-ठग।

मध्य भारत के ठगों द्वारा ठगी की घटना को अंजाम देना कुशल संचालन, बेहतर समय-प्रबंधन और उत्तम टीम-वर्क के बेहतरीन उदाहरण के तौर पर भी याद किया जाता है। उस जमाने के ये ठग चार चरणों में ठगी को अंजाम देते थे। पहले चरण में ठगों की एक टोली जंगलों में छिपकर यात्रियों के समूहों का जायजा लेने की कोशिश करती थी कि किन यात्रियों के पास माल है। यह सुनिश्चित होने के बाद ये जानवारों की आवाज़ में (जिसे ये अपना कोड-वर्ड या ठगी जुबान कहते थे) अपनी दूसरी टोली को इसकी सूचना देते थे। दूसरे टोली यात्रियों के साथ उनके सहयात्रियों की तरह घुल-मिल जाते थे। साथ में भोजन पकाते थे, सोते थे और यात्रा करते थे। दूसरी टोली उन यात्रियों की एक अलग टोली बना लेती थी जिनके पास धन, सोने-चाँदी होते थे। फिर वे धोखे से उन्हें ज़हर खिलाकर या तो मार देते थे या बेहोश कर देते थे। लेकिन ये टोली उनसे धन लूटने का काम न करके अपनी तीसरी टोली को अपनी जुबान में बताकर अन्य यात्रियों के साथ लग जाती थी। तीसरी टोली आकर उन यात्रियों को पूरी तरह से लूट लेती थी। इस टोली के ठग साथ में खाकी या पीले रंग का रुमाल रखते थे, जिससे ये यात्रियों का गरौटा (गला) भी दबाते थे और सोने-चाँदी बाँध ले जाते थे। जाते-जाते ये अपनी चौथी टीम को सूचना दे जाते थे जो यात्रियों की लाशों को या तो कुएँ में फेंक देती थी या पहले से तैयार क़ब्रों में दफ़न कर देती थी। 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' के अनुसार सन् 1790–1840 के बीच महाठग बेहरम ने 931 सिरीयल किलिंग की जो कि विश्च रिकॉर्ड है। इस समस्या के उन्मूलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक विशेष पुलिस दस्ता तैयार किया जिसकी कमान कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन को सौंपी गयी। उन्होंने जबलपुर में अपनी छावनी स्थापित की और एक दस्ता इसी जगह छोड़ा जो आज स्लीमनाबाद कहलाता है।

मशहूर अंग्रेजी लेखक फिलीप एम॰ टेलर ने सन 1839 में एक अंग्रेजी उपन्यास लिखा 'कन्फेशन्स ऑफ ठग' जो कि ठग अमीर अली की जीवनी पर आधारित था। माना जाता है कि यह वास्तविक ठग सैयद अमीर अली की कहानी है। यह पुस्तक 19वीं शताब्दी में ब्रिटेन की बेस्ट-सेलर क़िताब रही।

ठगों का यह संसार केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के लगभग सभी देशों में महान ठग हुए है। विदेशों में ठगों को स्मार्ट, बुद्धिमान और मास्टर-माइंड के रूप में पहचाना जाता है। ठगों के किस्से सुनकर कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। ये ठग खुद की बुद्धि और हिम्मत पर बहुत भरोसा रखते हैं और बहुत चालाकी से लोगों को बेवकूफ बनाते हैं।

मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव ऊर्फ नटवरलाल ऊर्फ मुहावरा-ए-ठगी

नटवरलाल की गिनती भारत के प्रमुख ठगों में से होती है। बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गाँव में जन्में नटवरलाल ने बहुत से ठगी की घटनाओं से बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली की सरकारों को वर्षों परेशान रखा। उसके शिकारों में ज्यादातर या तो मध्यम दर्जे के सरकारी कर्मचारी होते थे या फिर छोटे शहरों के बड़े इरादों वाले व्यापारी, जिन्हें ठगी का मुहावरा बन चुका नटवर लाल ताजमहल बेचने का वायदा भी कर देता था। वायदा करने की शैली कुछ ऐसी होती थी कि उस वायदे पर लोग ऐतबार भी कर लेते थे। खुद नटवर लाल ने एक बार भरी अदालत में कहा था कि सर अपनी बात करने की स्टाइल ही कुछ ऐसी है कि अगर 10 मिनट आप बात करने दें तो आप वही फैसला देंगे जो मैं कहूंगा। वह अपने आपको रॉबिन हुड मानता था, कहता था कि मैं अमीरों से लूट कर गरीबों को देता हूं। नटवरलाल पर अमिताभ बच्चन अभिनित फिल्म भी बनी 'मिस्टर नटवरलाल'। उसे ठगी के जिन मामलों में सजा हो चुकी थी, वह अगर पूरी काटता तो 117 साल की थी। 30 मामलों में तो सजा हो ही नहीं पाई थी।

बिकनी किलर बनाम सर्पेंट किलर

भारतीय उद्योगपति बाप और एक वियतनामी माँ के बेटे चार्ल्स गुरमुख शोभराज के पास फ्रांस की नागरिकता है और बिकनी किलर के नाम से भी विख्यात है। 67 वर्षीय सर्पेंट किलर शोभराज 60 और 70 के दशक में विदेशी पर्यटकों को ठगने, उनकी हत्या करने और नकली पासपोर्ट के सहारे एक देश से दूसरे देश में फरार होने में प्रसिद्ध हुआ। उस जमाने में तिहाड़ जेल से भाग पाने में सफल शोभराज के हिप्पी कट बालों से नौजवान समुदाय बहुत प्रभावित था। 1997 में शोभराज 10 साल की सजा काटने के बाद जब मुम्बई से फ्रांस पहुँचा तो उसने वहाँ अपनी बहादुरी और चालाकी के झूठे किस्से मीडिया वालों को सुनायें। अपना इंटरव्यू देने के लिए टीवी वालों से पैसे लिया, खुद के ऊपर किताब लिखने के लिए प्रकाशकों से एडवांस रॉयल्टी ली और फिल्म बनाने के लिए भी निर्माताओं से पैसे ऐठा। चार्ल्स शोभराज पर 12 हत्याओं का आरोप था, नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने इसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यही इसने एक 20 साल की लड़की निहिता से ब्याह भी रचाया।

जिसने एफिल टॉवर ही बेच दिया

चेक में जन्मे विक्टर लस्टिग का नाम एफिल टॉवर बेचने वाले ठग के रूप में लिया जाता है। विक्टर ने ठगी की शुरूआत 'नोट छापने वाली मशीन' बेचने से की। यह लोगों को एक छोटा सा बॉक्स दिखाकर कहता कि यह हर 6 घंटे में 100 डॉलर छापता है। ग्राहक ये सोचकर कि इससे बहुत बड़ा मुनाफ़ा होगा, इसकी चाल में फँस जाते थे और इसकी वह मशीन 30,000 डॉलर तक की रक़म में भी खरीद लेते थे। जब तक लोगों को पता चलता, यह फरार हो जाता था। 1925 में जब पहला विश्व युद्ध चल रहा था, लस्टिग ने अख़बार में पढ़ा कि एफिल टॉवर की पुताई और रख-रखाव का काम सरकार के लिए बहुत महँगा पड़ रहा है। पेरिस अधिकारी का यूनिफॉर्म जुगाड़कर इसने 6 व्यापारियों के साथ शहर के सबसे बड़े होटेल में एक मीटिंग की और उनको डाक मंत्रालय का सबसे बड़े अधिकारी के रूप में अपना परिचय दिया। उसने कहा कि एफिल टॉवर इस शहर के लिए फिट नहीं हो रहा है, इसे दूसरे शहर में शिफ्ट किया जायेगा, आपलोगों को ईमानदार व्यापारी मानकर एफिल टॉवर को नीलाम करने का जिम्मा सरकार ने मुझे सौंपा है। लस्टिग ने नीलामी की रक़म तो ली ही, साथ-साथ बहुत सारा घूस भी खा लिया।

कैच मी इफ यू कैन

जी हाँ, यह एक हॉलीवुड की मशहूर फिल्म है, जो अमेरिका के एक मशहूर ठग फ्रैंक एबेगनेल पर बनी थी। फ्रैंक एबेगनेल ने 60 के दशक में 5 वर्षों के भीतर 26 देशों में 2॰5 मिलीयन डॉलर के फर्जी चेक जारी किये। इसने इस काम को अंजाम देने के लिए 8 अलग-अलग नामों का इस्तेमाल किया। यह अपने निजी खाते से क्षमता से अधिक राशि का चेक निकालता था, बैंक जब तक उससे उस पैसे के बारे में पड़ताल करती, वह किसी और बैंक में किसी और नाम से एकाउँट खोलकर पैसे जमा कर देता था। फ्रैंक एबेगनेल ने बचपन से ही ठगी का काम शुरू कर दिया था। छुटपन से ही इसे गर्लफ्रेंड बनाने का शौक था। इसके पिता इसे उतना जेब-खर्च नहीं देते थे, जितना कि इसे ज़रूरत थी। इसने पिता की क्रेडिट पर न्यूयॉर्क और उसके आस-पास के गैस स्टेशनों से पहियों के बहुत से सेट, बैटरियाँ और भारी मात्रा में पेट्रोल खरीदा। उसने विक्रेताओं को दाम का मात्र 1 भाग दिया। वह उनसे सामान लेकर दूसरे लोगों से पूरी कीमत पर ये सामान बेच देता था। एक ऋण वसूलने वाला अधिकारी इसके पिता से 3400 डॉलर के उधार की वसूली के लिए मिला तब उनको अपने बेटे के कारनामे के बारे में पता चला।

साबून स्मिथ यानी सॉपी स्मिथ

सॉपी स्मिथ एक अमेरिकन ठग था जिसने 1879 से 1898 के दरमियान अमेरिका के बहुत से शहरों में साबून बेचकर अपना उल्लू सीधा किया। स्मिथ शहर के व्यस्त चौराहों पर साबून की ढेर सारी टोकरियाँ लेकर खड़ा हो जाता था। साबून के रैपर के ऊपर यह 1 से 100 डॉलर के नोट लपेट देता था, उसके ऊपर एक पेपर। वह डॉलर के नोटों को लोगों के सामने ही लपेटता था और साबून के उन ढेरों में मिला देता था, जिसमें डॉलर नहीं लपेटे होते थे। लोगों का विश्वास जीतने के लिए अपने परिचित ठग से वह उस साबून को निकलवाता था जिसमें नोट लपेटा होता था। इसका सहयोगी चिल्ला-चिल्लाकर कहता कि मुझे नोट मिला है। उसके बाद वह अपनी चालाकी से नोट लपेटे साबूनों को ढेरों से या तो अलग कर देता था या यह पक्का कर लेता था कि लोट लपेटे साबून इसके ठग-गैंग 'सोप गैंग' के ठगों को ही मिले। फिर वह साबून का पूरा ढेर बेच कर चला जाता। यह प्रथा बाद में पूरे दुनिया में मशहूर हो गई। सॉपी स्मिथ का नाम पश्चिम में सबसे प्रसिद्ध ठग के रूप में लिया जाता है जिसने ठगी के तीन साम्राज्यों को खड़ा किया। पहला डेनवेर, कोलोराडो (1886-1895) में, दूसरा क्रीडे, कोलोराडो (1892) में और तीसरा स्कैगवे, अलास्का (1897-1898) में। प्रतिवर्ष 8 जुलाई को स्कैगवे, अलास्का में सॉपी स्मिथ के कब्र के पास 'सॉपी स्मिथ जागरण' आयोजन होता है। हॉलीवुड में 8 जुलाई को सॉपी स्मिथ की याद में जादू के खेल, जुआ, चालाकी इत्यादि प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन किया जाता है।

बॉन लेवी ठग प्रा॰ लि॰

बॉन लेवी ऑस्ट्रेलिया का प्रसिद्ध ठग था जिसने फ्रेंचाइज़ व्यवसाय के माध्यम से हज़ारों व्यापारियों को ठगा। इसने हल्के अनुयान (ट्रेलर) निर्माण कं॰, अनुरक्षण एजेंसी, ऑटो रेकर (स्व-विनाशक), परिवहन कं॰, दुर्घटना राहत कं॰, खानपान (केटरिंग) और डिस्पोजेबल कैमरा आपूर्ति जैसे कई फर्जी उपक्रमों का निर्माण किया। यह अपने ग्राहकों को 10 हज़ार डॉलर में इन कम्पनियों में से किसी एक में शेयर होल्डर होने का झाँसा देता था। लेवी 1997 में अमेरिका आ गया और यहाँ के सभी शहरों में अपनी दो फर्जीं कम्पनियों के दफ्तर खोल दिया। यहाँ इसको 50 से अधिक व्यापारियों ने 30 हज़ार से 68 हज़ार डॉलर तक धन दिया, जिनसे इसने 500 से 2000 डॉलर प्रति सप्ताह मुनाफे का वादा किया। बाद में यह अमेरिकन पुलिस के हाथों दबोच लिया गया।

जासूस ठग

रॉबर्ट हेंडी फ्रीगैर्ड ब्रिटानी ठग है जिसने बहुत ही अनोखे ढंग से लोगों को ठगा। एक बारबॉय और कार-विक्रेता के रूप में काम करने वाला रॉबर्ट हेंडी खुद को ब्रिटानी गुप्तचर एजेंसी एमआई5 का अधिकारी बताता था, और कहता कि वह आईरिश रिपब्लिकन आर्मी के खिलाफ काम कर रहा है। यह लोगों से किसी सार्वजनिक जलसे में मिलता और उन्हें डराता कि यदि वे खुद को बचाना चाहते हैं तो अपने सभी दोस्तों और रिश्तेदारों से नाता तोड़ अंडरग्राउंड हो जायें। वह यह भी कहता कि आपलोगों की सुरक्षा के लिए मुझे पैसों की ज़रूरत है। वह किसी से कहता कि गुप्तचर एजेंसी उसे उसके काम के लिए पैसे नहीं देती, बल्कि कहती है कि वह अपने लिए पैसे का इंतज़ाम खुद करे तो किसी से कहता कि मुझे अगले महीने कई लाख पॉण्ड का चेक मिलनेवाला है। इस तरह से इसने कई मिलियन पॉण्ड की ठगी की। इसने लड़कियों को डराकार उनके साथ व्यभिचार भी किया। इसने बहुत से भोले बाले ब्रिटिश लोगों को जासूसी विद्या में पारंगत बनाने के लिए पैसे ऐंठा। हेंडी-फ्रीगार्ड ने जासूसी के कुछ कैसे नायाब तरीके ढूँढ़े थे, जिससे सीखनेवाले को भी यह शक नहीं होता था कि वह ठगा जा रहा है। वह जासूसी सीखनेवालों को बसों, ट्रेनों में, सार्वजनिक स्थलों पर कुछ बेचने को भेजता और कहता कि किसी को अपना परिचय मत बताओ बस जासूसी करते रहो। शुरू में 10,000-15,000 पॉण्ड फीस लेता था, फिर यह कहकर कि उसके जासूसी स्कूल को और पैसों की ज़रूरत है, उनसे फीस की दूसरी किश्त वसूल कर लेता था। सन 2005 में इसे पुलिस ने पकड़ लिया, जहाँ किडनैपिंग के आरोप में इसे आजीवन कारावास की सज़ा हुई। इसके अलावा यदि सुनवाई होती तो इसपर 18 तरह के जालसाज़ी के आरोप और भी थे।

----- शैलेश भारतवासी

Monday, April 27, 2009

चुनाव से पहले इम्तिहान देंगे नेता तब वोट करेगी जनता

"इस लोकसभा चुनाव में अब तक दो चरणों में औसतन 55 प्रतिशत मतदान हुआ। यदि देश भर की मीडिया 'वोट दो, वोट दो' नहीं चिल्लाती, तब शायद यह मतदान 35 प्रतिशत तक भी पहुँच सकता था। मतलब लोगों का इन चुनावों के ऊपर से विश्वास उठ रहा है। यह चिंता का विषय है।"

यह शब्द मेरे नहीं हैं, बल्कि देश के सबसे प्रसिद्ध बाबा स्वामी रामदेव के हैं, जो कल राष्ट्रीय सहारा द्वारा आयोजित 'चुनावः चिंता, चुनौती और समाधान' में मुख्य-अतिथि के तौर पर पधारे थे। मैं वहा उपस्थित था। बाबा ने इस बात की हिमायत की कि हमें वोट ज़रूर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग मुझसे पूछते हैं कि 100 में 99 बेईमान हैं, बाबा हम किसे वोट दें। मैं कहता हूँ, हालाँकि नहीं कहना चाहिए कि कम बेईमान को वोट दो।

बाबा ने बताया कि मैं आरोग्य विषय से हूँ लेकिन देश के आरोग्य को सर्वोपरि मानता हूँ। देश बीमार हो गया है, जिससे हम सब ग्रसित हैं। देश का प्रतिनिधित्व युवा करे या बुजुर्ग, इस विषय पर बोलते हुए रामदेव ने कहा कि बुजुर्ग कमजोर हो सकता, बीमार हो सकता है लेकिन युवा भी शराबखोर, चरित्रहीन, बेइमान, मक्कार हो सकता है।

एक बहुत ही रोचक और चौकाने वाले तथ्य की ओर बाबा ने इशारा किया। उन्होंने बताया कि एक पोलिंग बूथ पर कम से कम 700-800 मतदान करने की व्यवस्था होती है। इस कार्यक्रम में पूर्व चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति भी सम्मिलित थे, उनसे रामदेव ने पूछा कि एक मतदाता को वोट करने में औसतन कितना समय लगया है? 4-5 मिनट। मतलब कि चुनाव आयोग ही एक पोलिंग बूथ से 200-250 मतों की ही उम्मीद करता है? यानी बाकि वोट फर्जी पड़ते हैं।

बहुत से चुनाव सुधारों की बात भी बाबा ने कही। जैसे-राजनेताओं की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित हो, अदालत में प्रथम दृष्ट्या अपराधी चुनाव लड़ने से वंचित हों, व्यापारियों को देश नहीं चलाना चाहिए, उन्हें व्यापार करना चाहिए। चुनाव कराये जाने का समय निर्धारित होना चाहिए। गर्मी का मौसम है। पोलिंग बूथ पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। बुजुर्गों के लिए बैठने के लिए जगह नहीं है।

बाबा रामदेव के बाद जे॰एन॰यू॰ के कुलपति प्रो॰ बी॰बी॰ भट्टाचार्य ने अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों का पैन कार्ड बनना व आयकर रिटर्न भरना आवश्यक होना चाहिए ताकि यह पता तो चले कि उम्मीदवारों कहाँ से कितना कमाया है। मैं यह मानता हूँ कि वह सीए से हेर-फेर करके गड़बड़ रिटर्न बनवा लेगा, लेकिन फिर भी एक दबाव बनेगा।

भट्टाचार्य ने राजनेताओं की उदासीनता का उदाहरण देते हुए बताया कि हर बार बजट या किसी आर्थिक मुद्दे पर बहस के लिए टीवी वाले मुझे कार्यक्रम में बुलाते हैं। एक तरफ सत्तापक्ष का नेता और दूसरी तरफ विपक्ष का नेता और बीच में मैं। अपने देश की आर्थिक नीतियाँ बनाने वालों के बीच मैं बैठा हूँ। जैसे ही ब्रेक होगा, एक नेता पूछेगा, भट्टाचार्या जी इस बजट में जो-जो अच्छा है हमें बता दीजिए बोलना है, और दूसरा है वो पूछेगा जो-जो बुरा है वो बता दीजिए।

प्रो॰ भट्टाचार्य ने बताया कि इतने उदासीन लोग, इतने अनपढ़, गाँवार लोग हमारी लोकतंत्र की दिशा तय करते हैं, यह शर्म की बात है। उन्होंने नेता बनने के लिए न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने की बात को दुबारा उठाते हुए कहा कि चुनाव लड़ने से पूर्व उम्मीदवारों की ऐसा परीक्षा अनिवार्य हो जिसमें भारतीय संविधान, देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था व नीतियों से संबधित सवाल पूछे जाएं।

भट्टाचार्य ने कहा कि यदि सर्वे किया जाय तो शायद 15 प्रतिशत भी एसे पी॰ एम नहीं निकलेंगे जो आम बजट पढ़ते हों।

एक और महत्वपूर्ण बात भट्टाचार्य जी ने कही कि अभी तक किसी ने यह नहीं कहा कि भारत में चुनाव नहीं होने चाहिए, यह आशा की किरण है कि लोगों का लोकतंत्र से विश्वास नहीं उठा है।

इसके बाद पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति माइक पर आये। उन्होंने कहा कि चुनाव सुधार के लिए भारतीय संविधान में परिवर्तन के साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 और कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल 1961 में भी व्यापक संशोधन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग संविधान के अनुसार ही चलता है। इसलिए संविधान को बदलना जरूरी है।

कंस्सीट्यूशन क्लब (दिल्ली) में आयोजित इस संगोष्ठी के दो सत्र थे। पहले सत्र में सहारा परिवार के उपाध्यक्ष ओ॰ पी श्रीवास्तव भी बोले। उन्होंने बताया कि सहारा परिवार देश की स्थितियों को लेकर बहुत पहले से ही सजग है। यह चुनाव अभियान उस बीज-सजगता का विस्तार है।

गोष्ठी के दूसरे सत्र में सुप्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे के उद्‍बोधन से गोष्ठी आगे बढ़ी। अन्ना ने बताया कि व्यक्ति यदि ठान ले तो बहुत कुछ कर सकता है। मैंने 26 वर्ष की उम्र में ही ठान लिया था कि मुझे शादी नहीं करनी, मुझे छोटा परिवार नहीं बसाना, बड़ा परिवार बनाना है। और मुझे बहुत खुशी है कि आज मेरे लाखो-करोड़ों बच्चे हैं। आज 72 वर्ष का होने के बाद भी दिल में समाज के लिए कुछ करने का जज्बा कम नहीं हुआ है। हमने ठान लिया था गाँव-गाँव में पर्यावरण (जमीन-पानी) के प्रति लोगों को जागरूक करना है। मुझे खुशी है पूरे महाराष्ट्र के किसी भी गाँव में पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता का अभाव नहीं है। गाँव के विकास से ग्रामीणों का शहर की तरफ पलायन घटता है।

अन्ना ने यह भी बताया कि वे लगातार आंदोलन करते रहे। सरकार तब तक आपकी बात नहीं मनाती जब तक उसे अपनी कुर्सी का खतरा ना हो। जब महाराष्ट्र सरकार को कुर्सी छूटने का खतरा महसूस हुआ तो 2001 में 'सूचना का अधिकार' कानून बना। बाद में 2005 में ये पूरे देश में लागू हुआ।

अन्ना ने कहा कि कि चुनाव सुधार के लिए जरूरी है कि जनता को ‘राइट टू रिकॉल’ मिले और बैलेट पर एक निशान मतदाता की नापसंदी का भी हो, अगर नापसंदी पर ज्यादा वोट मिलते हैं तो चुनाव निरस्त कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि चुनाव में मतदान न करने वालों की सभी सुविधाएं बंद कर दी जानी चाहिए। मैं इसके लिए लड़ाई लड़ रहा हूँ।

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिन्दर सच्चर ने कहा कि इन दिनों राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा प्रमुख है लेकिन असल में यह अपराधियों का राजनीतिकरण है। पहले केवल राजनीतिज्ञ ही चुनाव जीतने के लिए अपराधियों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब बाहुबलि जान गये कि जब हमारे ही बल पर चुनाव जीते जा रहे हैं तो हम ही क्यों जीतें? अन्ना हजारे के विचारों से ये भी सहमत दिखे।

भारतीय चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार केजे राव ने कहा देश को इस स्थिति से उबारने के लिए गंभीर लोगों को एक मंच पर आना होगा और लड़कर चुनाव सुधार करना होगा। आंध प्रदेश में उनकी संस्था ने बहुत से आशचर्यजनक परिवर्तन किये हैं।

सबसे अंत में बोलने के लिए पधारे उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण। इन्होंने बोला कि भारत की डेमोक्रेसी को रिप्रेजेंटेटिव (प्रतिनिधित्व) की जगह पार्टीसिपेटरी (भागीदारी) या डायरेक्ट (सीधा) होना चाहिए। कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर पूरे देश का विचार लेना आवश्यक है। आज का युग इंटरनेट का युग है। गाँव-गाँव से इंटरनेट के माध्यम से जनता का मत जाना जा सकता है। इन्होंने शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की बात कही। प्रशांत भूषण ने कहा कि जनता लोकसभा चुनाव में जनता उम्मीदवार को वोट नहीं देती, बल्कि उसे वोट देती है जो सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। अगर यह सोचा जाय कि आज एक अच्छा और ईमानदार आदमी चुनाव में खड़ा होता है तो क्या वो जीत पायेगा?

इन्होंने न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता पर अपनी असहमति जताई और बताया कि अनपढ़ लोगों में, इलीटरेट लोगों में पोलिटिकल अंडरस्टैंडिंग (राजनैतिक समझ) पढ़े-लिखे लोगों से भी ज्यादा होती है। के॰जे॰ राव सबसा अनूठा उदाहरण हैं। उनमें लो लीडरशिप क्षमता थी, वह किसी पढ़े-लिखे लोगों में भी नहीं देखने को मिली। प्रशांत भूषण ने उम्मीदवार के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के चुनाव न लड़ने देने वाले विचार पर भी असहमति जताई। कहा कि मजिस्ट्रैड पुलिस के एफ आई आर के विना पर ही चार्जशीट तैयार करता है। विपक्षी पार्टियाँ किसी भी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करवा कर, चार्ज शीट दाखिल करवाकर चुनाव लड़ने देने से रोक सकती हैं।

उन्होंने कहा कि सबसे ज़रूरी है कि भारत की न्यायिक प्रणाली में सुधार हो। निर्णय जल्दी आयें। अभी जो 20 साल लगने वाला एक स्लो सिस्टम है वह भारत को आने नहीं बढ़ने दे रहा।

सहारा समूह प्रकाशन के प्रधान संपादक रणविजय सिंह के सबका धन्यवाद ज्ञापित किया। संगोष्ठी का संचालन जेएनयू के प्रो॰ आनंद कुमार ने किया। इन लोगों के अलावा गोष्ठी में दिल्ली विश्वविघालय के डिप्टी डीन (स्टूडेंट वेलफेयर) डा.गुरप्रीत टुटेजा, खालसा कालेज के प्रधानाचार्य डा.जसविंदर सिंह, दयाल सिंह कालेज के प्रधानाचार्य डा.दीपक मल्होत्रा, फेडकूटा के पूर्व अध्यक्ष प्रो.कपिल कुमार, आईआईएमसी के एसो.प्रो.आनंद प्रधान, डीयू के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीर पचौरी, प्रो.गोपेश्वर सिंह, जेएनयू के प्रो.देवेन्द्र चौबे, पूर्व मेयर आरती मेहरा, पदमश्री श्याम सिंह शशि, दिल्ली हिन्दी अकादमी के सचिव डा. ज्योतिष जोशी, एनएसडी के सुरेश शर्मा, दिल्ली कैथेलिक आर्चडाइज के निदेशक फादर डोमोनिक इमैनुअल, आईसीआई के सदस्य सहदेव कन्दोई, मौलाना आजाद दंत विज्ञान संस्थान के सहायक प्रोफेसर डा. ज्ञानेन्द्र कुमार, सर गंगाराम अस्पताल के सर्जन डा. विवेक कुमार, एम्स के हिन्दी विभाग के प्रमुख प्रेम सिंह, श्रीनीलम कटारा, वरिष्ठ पत्रकार तरूण विजय, प्रो. कपिल कुमार, लेखिका मैत्रेयी पुष्पा, सुप्रसिद्ध कवयित्री अनामिका, केन्द्र सरकार के एडवोकेट नवीन कुमार मारा, दिल्ली सरकार की मुख्य अधिवक्ता नजमी वजीरी, अधिवक्ता अशोक अग्रवाल, उपहार अग्निकांड पीड़ित एसोसिएशन के संयोजक नीलम कृष्णामूर्ति, शेखर कृष्णामूर्ति, गांधी शांति प्रिष्ठान के सचिव सुरेंद्र कुमार, दरस्गाह तफहीम कुरआन के संस्थापक अध्यक्ष हसन अमीर, मदरसा जीनतुल कुरआन के मोहतमिम मौलाना ताहिर, यूपीएससी के पूर्व चेयरमैन डा.एसआर हाशिम, पूर्व एयर मार्शल आरसी वाजपेयी, जेएनयू के प्रोफेसर तुलसी राम, कथक नृत्यांगन पुनीता शर्मा, युद्धरत आम आदमी पत्रिका की संपादक रमणिका गुप्ता, वाशिंगटन से आए टेक्नोक्रेट और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विदेश नीति सलाहकार रहे शेखर तिवारी, बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के पूर्व उपकुलपति और भीमराव अम्बेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ बायो मेडिकल साइंस के डाक्टर रमेश चंद्रा, पंजाब सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता रणजीत कपूर आदि उपस्थित थे।

Saturday, April 11, 2009

जो खुद आवारा नहीं था, शायद मसीहा भी नहीं


सुबह-सुबह सोकर उठा तो राजेश चेतन का एसएमएस था- विष्णु प्रभाकर नहीं रहे। देह दान दोपहर २ बजे होगा। ऐसा लगा कि जैसे सुबह ने ठग लिया हो। अजीब संयोग है सितम्बर २००८ की ११ तारीख को ही साहित्यकारों का १५ सदस्यीय समूह विष्णु प्रभाकर की खैरियत लेने गया था। और अप्रैल महीने की ११ तारीख को उन्होंने इस लोक से विदा ले ली।

मैंने प्रेमचंद सहजवाला जी से बलदेव वंशी का नं॰ लिया और उनसे बात की। उन्होंने कहा कि -"विष्णु प्रभाकर सबसे बड़े साहित्यकार थे। बड़े ऐसे कि उन्होंने समाज की निम्नत्तम से निम्नत्तम वर्ग की पीड़ा को शब्द दिये और उच्च सामाजिक आदर्शों को स्थापित करने की कोशिश की। वे एक ऐसे साहित्यकार थे जो खेमेबाज़ी से बचते थे, सभी वरिष्ठ-कनिष्ठ लेखकों के वे घनिष्ठ थे। मेरे दोनों बेटों की शादियों में परिवार के सदस्य की भाँति आये। आज से २३ दिन पहले ४० वर्षीय मेरे छोटे बेटे का देहांत हो गया। मेरा दुःख दुगुना हो गया है। प्रभाकर ने आवारा मसीहा और अर्धनारीश्वर जैसी रचनाएँ कर खुद को अमर कर दिया। विष्णु ऐसे लेखक थे जिन्होंने दक्षिण-उत्तर भारत की मौसिक रेखा को पार किया था। वे दक्षिण में भी उतनी ही इज्जत पाते थे, जितनी की उत्तर में। विष्णु प्रभाकर प्रेमचंद, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, भवानी प्रसाद मिश्र, नागार्जुन आदि की साहित्यिक परम्परा के अंतिम स्तम्भ थे। आज हम साहित्यप्रेमी खुद को बहुत निर्धन महसूस कर रहे हैं।"

बलदेव वंशी लगभग हर महीने विष्णु प्रभाकर के घर जाते रहे और उनके बेटे अतुल प्रभाकर से विष्णु जी के स्वास्थ्य-समाचार लेते रहे।

NCERT के लिए पहले ही मर चुके थे प्रभाकर

फिर पता चला कि वरिष्ठ साहित्यकार केदार सिंह की बेटी संध्या सिंह (जोकि NCERT में हिन्दी-रीडर हैं) ने विष्णु प्रभाकर पर हिन्दी को दूसरी भाषा के तौर पर पढ़ने वालों NCERT के १०वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए एक पुस्तक (संवाद-२) पर काम किया है। मैंने उनका भी नं॰ जुगाड़ा और उनसे बात की। उन्होंने बताया- "मैं विष्णु प्रभाकर से अधिक नहीं मिली हूँ। शायद १ या दो बार मिलना हुआ है। लेकिन जितना जाना है, उससे यह कह सकती हूँ कि वे साहित्यिक राजनीति से सर्वथा दूर रहने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने साहित्य सेवा बहुत चुपचाप तरीके से और पूरी लगन से की।"

संध्या सिंह ने आगे बताया कि एक बार NCERT की किसी पुस्तक में यह प्रकाशित कर दिया गया था कि विष्णु प्रभाकर नहीं रहे (लोगों ने सोचा होगा कि शायद ९५ वर्ष के बाद कहाँ कोई जीवित रहता है)। इस पर विष्णु प्रभाकर जी ने NCERT को पत्र लिखा था कि आपलोगों को ऐसा नहीं प्रकाशित करना चाहिए।


विष्णु से प्रभाकर

विष्णु के नाम में प्रभाकर कैसे जुड़ा, उसकी एक बेहद रुचिपूर्ण कहानी है। अपने पैतृक गाँव मीरापुर के स्कूल में इनके पिता ने इनका नाम लिखवाया था विष्णु दयाल। जब आर्य समाज स्कूल में इनसे इनका वर्ण पूछा गया तो इन्होंने बताया-वैश्य। वहाँ के अध्यापन ने इनका नाम रख दिया विष्णु गुप्ता। जब इन्होंने सरकारी नौकरी ज्वाइन की तो इनके ऑफिसर ने इनका नाम विष्णु धर्मदत्त रख दिया क्योंकि उस दफ़्तर में कई गुप्ता थे और लोग कंफ्यूज्ड होते थे। वे 'विष्णु' नाम से लिखते रहे। एक बार इनके संपादक ने पूछा कि आप इतने छोटे नाम से क्यों लिखते हैं? तुमने कोई परीक्षा पास की है? इन्होंने कहा कि हाँ, इन्होंने हिन्दी में प्रभाकर की परीक्षा पास की है। उस संपादक इनका नाम बदलकर रख दिया विष्णु प्रभाकर।

विष्णु प्रभाकर- एक परिचय

चूँकि मैंने प्रभाकर को बहुत अधिक नहीं पढ़ा है, इसलिए इनके लेखन पर अपने विचार नहीं दे सकता। नये पाठकों के लिए इनका परिचय दे रहा हूँ।

२९ जनवरी १९१२ को उ॰प्र॰ के मुज़फ़्फरनगर जिले के एक छोटे से गाँव मीरापुर में जन्मे विष्णु प्रभाकर के पिता दुर्गा प्रसाद एक धार्मिक व्यक्ति थे और अपने बेटे आधुनिक दुनिया से लम्बे समय तक दूर रखे। इनकी माँ महादेवी इनके परिवार की पहली साक्षर महिला थी जिन्होंने हिन्दुओं में पर्दा प्रथा का विरोध किया। १२ वर्ष के बाद, अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, प्रभाकर आगे की पढ़ाई करने के लिए अपने मामा के पास हिसार (उस समय पंजाब का हिस्सा, अब हरियाणा का) चले गये, जहाँ इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। यह १९२९ की बात है। वे आगे भी पढ़ना चाहते थे, लेकिन आर्थिक हालत इसकी इजाजत नहीं देते थे, अतः इन्होंने एक दफ़्तर में चतुर्थ श्रेणी की एक नौकरी की और हिन्दी में प्रभाकर, विभूषण की डिग्री, संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में बीए की डिग्री हासिल की।

चूँकि पढ़ाई के साथ-साथ इनकी साहित्य में भी रुचि थी, अतः इन्होंने हिसार की ही एक नाटक कम्पनी ज्वाइन कर ली और १९३९ में अपना पहला नाटक लिखा हत्या के बाद। कुछ समय के लिए इन्होंने लेखन को अपना फुलटाइम पेशा भी बनाया। २७ वर्ष की अवस्था तक ये अपने मामा के ही परिवार के साथ रहते रहे, वहीं इनका विवाह १९३८ में सुशीला प्रभाकर से हुआ।

आज़ादी के बाद १९५५-५७ के बीच इन्होंने आकाशवाणी, नई दिल्ली में नाट्य-निर्देशक के तौर पर काम किया। ये ख़बरों में तब छाये रहे, जब २००५ में इन्होंने राष्ट्रपति भवन में हुए दुर्व्यवहार के कारण पद्यभूषण का सम्मान लौटा दिया।

इनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियाँ

उपन्यास- छलती रात, स्वप्नमयी, अर्धनारीश्वर
ड्रामा- नव प्रभात, डॉक्टर
कहानी-संग्रह- संघर्ष के बाद
नाटक- प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक
जीवनी- आवारा मसीहा
अन्य- जाने-अनजाने
विशेष- आवार मसीहा के लिए पद्मभूषण और अर्धानारीश्चर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार ।

स्रोत- वीकिपीडिया

विष्णु प्रभाकर के अन्य चित्र और उनके वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

Wednesday, March 04, 2009

हिन्दी ब्लॉगों की संख्या यूँ ही बढ़ती रहेगी

२२ फरवरी २००९ की ब्लॉगर-मीट का निष्कर्ष

वैसे जब कहीं भी और कभी भी २-४ ब्लॉगर मिलते हैं, हम उसे ब्लॉगर-मीट की ही संज्ञा देते रहे हैं। इस तरह से तो कम से कम १० ब्लॉगर मीट रोज़ाना होती होंगी। ज़रा सोचिए जिस परिवार का १ से अधिक सदस्य ब्लॉगर हों, वहाँ क्या हालत होती होगी। लेकिन २२ फरवरी २००९ को राँची में हुआ हिन्दी चिट्ठाकारों का सम्मेलन कई मायनों में एक औपचारिक और बड़ा आयोजन था।

बहुत सी रपटों में आपने पढ़ा कि इस आयोजन को लेकर जो-जो योजनाएँ बनाई गई थीं, वो सभी पूरी नहीं हो पाईं, फिर भी हिन्दी का इंटरनेट पर मिजाज समझने का अवसर ज़रूर मिल गया। अमिताभ मीत के साथ मिलकर जब मैं इस आयोजन की रूपरेखा खींच रहा था तब मैंने मात्र कोलकाता से हजारीबाग की भौगोलिक सीमाओं में रहने वाले ब्लॉगरों को पकड़ने का निश्चय किया था। हमें यह डर था कि दूरी अधिक होने से शायद लोग कम रुचि लेंगे। ईमेल/फोन से संपर्क स्थापित करने के तुरंत बाद कम से कम हमारा अंदाज़ा ठीक ही सिद्ध हो रहा था। लेकिन जब कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल, राँची की निदेशक भारती कश्यप ने आयोजन के खर्च का भार उठाने की बात की और इसे ब्लॉगरों ने सुना तब रेस्पॉन्स अच्छे मिलने लगे।

मनीष कुमार ने फोन पर कहा भी कि हमें वाराणसी (यह शहर भी राँची के क़रीब है) और बिहार के भी ब्लॉगरों को बुलाना चाहिए। जैसे लवली कुमारी के माध्यम से वाराणसी से अभिषेक मिश्र कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आ सकते हैं, उसी तरह से वहाँ के अन्य ब्लॉगर भी आ सकते हैं। जब कोलकाता तक से कुछ ब्लॉगर (शिवकुमार मिश्रा और अमिताभ मीत) राँची आने की बात सोच सकते हैं, फिर पटना, दरभंगा से क्यों नहीं। आखिर यह भी वन नाइट जर्नी ही तो है। फिर मुझे भी ऐसा लगा कि इस पर पहले से काम किया गया होता तो यह जमावाड़ा और विराट हो सकता था।

जुलाई २००७ से मैंने टेलीफोन के द्वारा कम्प्यूटर पर 'यूनिकोड (हिन्दी) का इस्तेमाल और ब्लॉग बनाने की विधि' के संदर्भ में लोगों की मदद करनी शुरू की थी (यूनिप्रशिक्षण)। बाद में सार्वजनिक रूप से क्लॉसरूमों में पहुँचा। उस समय से लेकर अब तक इतनी ही कोशिश रही कि सामने वाला हिन्दी और ब्लॉगिंग से जुड़ जाये, आगे वह अपने रास्ते और ब्लॉग का चरित्र खुद बना लेगा। मैंने भी यही मानकर किसी भी सामान्य मुलाक़ात में ब्लॉग के अनुप्रयोग के बड़े फलक की बात नहीं की।

लेकिन हाँ, जहाँ-जहाँ मैंने पत्रकारिता के विद्यार्थियों को इसके बारे में बताया, वहाँ खूब बताया। इसका जितना और जिस तरह का इस्तेमाल मैंने किया, वह भी और बाकी दुनिया में जहाँ-जहाँ जितने बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल हो रहा है, वह भी। और मुझे खुशी है सबसे अधिक उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ भी मुझे झारखण्ड से ही मिलीं। १४ फरवरी २००९ को करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर के पत्रकारिता के बच्चों की ब्लॉगिंग पर कक्षा लेने का अवसर मिला। एक तो वैलेन्टाइन डे का दिन, फिर भी शत-प्रतिशत उपस्थिति ने मुझे गदगद किया और कक्षा के दौरान उनकी प्रतिक्रियाओं ने भी।

पर इससे उलट प्रतिक्रिया पत्रकार बन चुके ब्लॉगरों में देखने को मिली। २२ फरवरी की मुलाकात में अधिकतम पत्रकार और पत्रकार-ब्लॉगरों को ब्लॉगिंग मात्र आलेख जमा करने का बक्सा नज़र आई। इस सम्मेलन में भी सेंट जेवियर्स कॉलेज के पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने इस विधा को अच्छे तरह से समझने की इच्छा जताई और व्यक्तिगत रूप से मुझे मिला और कहा कि सर हमारे यहाँ भी कक्षा लीजिए। वहीं मुझे एक HRD के इंजीनियर अरूण चक्रवर्ती भी मिलें जिन्होंने अपने ज्योतिष ज्ञान सम्बंधी कार्य को ब्लॉगिंग से कैसे प्रचारित-प्रसारित कर पायें?-इसपर मेरे विचार जानना चाहे। मुझे अगले दिन भी राँची में रुकना था। ज्योतिषी-इंजीनियर अरूण को ब्लॉगिंग ने इतना प्रभावित किया कि अगले दिन उन्होंने फोन करके मुझसे समय माँगा, मुझे अपने घर ले गये और ब्लॉग बनवाया, बहुत से सवाल किये।

ब्लॉगिंग से कमाई की बात टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार संजीव शेखर ने जाननी चाही। मैंने यही कहा कि हिन्दी के ९९% से अधिक ब्लॉग अभी इसपर न ही सोंचे क्योंकि उनके ब्लॉग का ट्रैफिक इतना भी नहीं है कि भारतीय विज्ञापन नेटवर्कों के विज्ञापन से रु १००० प्रतिवर्ष भी कमा पायें (क्योंकि गूगल हिन्दी कंटेंट को विज्ञापन नहीं दे रहा)। मैंने उनसे ज़रूर कहा कि हिन्दी के कमाने वाले ब्लॉगों की संख्या एक आदमी के हाथों की उँगलियों से भी कम हैं। मैंने हिन्द-युग्म की विज्ञापन की कुल कमाई का लेखा-जोखा भी उन्हें दिया।

यह बात ग़ौर करने वाली है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की शुरूआत से (यानी की अक्टूबर २००२ से) लेकर अब तक प्रत्येक ब्लॉगर अपने ब्लॉग में मात्र निवेश कर रहा है, वह चाहे धन के रूप में हो या समय के रूप में या फिर दोनों रूपों में। यह स्थिति चिंताजनक है और जैसाकि वरिष्ठ ब्लॉगर देबाशीष चक्रवर्ती ने अपने साक्षात्कार में यह कहा था कि आने वाले पाँच वर्षों में हिन्दी ब्लॉगिंग से कमाई की गुँजाइश नहीं है, वैसे में हिन्दी में प्रोफैशनल ब्लॉगरों की संख्या खूब बढ़ेगी यह कहना मुश्किल है। हाँ यह ज़रूर कहा जा सकता है कि जिस तरह से ब्लॉगों की संख्या पिछले २ वर्षों में बढ़ी है, उसकी वृद्धि दर में लगातार वृद्धि होगी।

मैं आने वाले समय में छोटे और बड़े शहरों में ब्लॉगिंग पर ऐसे आयोजन करने के बारे में विचार कर रहा हूँ जिसमें ब्लॉगर के साथ-साथ नॉन-ब्लॉगर की संख्या भी अच्छी खासी हो।

Monday, February 09, 2009

22 फरवरी को राँची में जमा होंगे कलकतिया और झारखण्डी ब्लॉगर

कल मुझे एक ईमेल-निमंत्रण मिला, जिसमें लिखा था कि १० फरवरी २००९ को मेरठ विश्वविद्यालय में रवि पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित हिन्दी ब्लॉगिंग की पुस्तक 'एटूजेड ब्लॉगिंग' का विमोचन होना है। किसी भी तरह की जानकारी और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में पॉकेट बुक्स ने अहम भूमिका निभाई है। याद कीजिए 'कौन सी ऐसी मछली है जो हवा में उड़ती है, पानी में तैरती है और जमीन पर चलती है?, कौन सा पेड़ है जो लोगों को खा जाता है? कौन सा ऐसा पहाड़ है जो रोज़ रंग बदलता है?' जैसे रसदार सवालों का पुलिंदा बस से लेकर ट्रेन में बिकता है। हर आम-खास इससे परिचित हैं।

हिन्दी ब्लॉगिंग जो कि २००२ में शुरू हुई, २००९ के शुरू में ही पॉकेट बुक्स में घुस गई, तो निश्चित रूप से सफलता का स्वाद इसने बहुत जल्दी चख लिया। एक पॉकेट बुक्स से इस तरह की पुस्तक आने का फायदा यह होगा कि इसे लगभग हर पॉकेट बुक्स वाला प्रकाशित करेगा। यह भी कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले २-३ महीनों में आप दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगर घूमने आये तों बसों-ट्रेनों में देखें कि ब्लॉगिंग की यह किताब रु १० में बिक रही है और साथ में चुटकुलों और देवर-भाभी की शायरियों की २-३ किताबें मुफ्त हैं।

अभी २८ दिसम्बर २००८ को हिन्द-युग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया। हिन्द-युग्म ब्लॉगिंग को लेकर गंभीर है, भाषा को लेकर गंभीर है, इसका उद्घोष तो यह २००८ के विश्व पुस्तक मेले में अपना स्टैंड लगाकर ही दे चुका था। लेकिन २८ दिसम्बर के कार्यक्रम में साहित्यशिखर राजेन्द्र यादव आये तो लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ। हम इसके जो सकारात्मक परिणाम आँक रहे थे, वह हुए।

चोखेरबालियों ने ६ फरवरी २००९ को अपना सालाना जलसा मनाया। राजकिशोर, अनामिका जैसे विद्वजन आये और ब्लॉगिंग से जुड़े लोगों का जज्बा देखा और महसूस किया। इसी तरह से जमीनी और वर्चुयल दुनिया में बराबर दखल रखने वाली एनजीओ 'सफ़र' ने भी राजेन्द्र यादव द्वारा उन्हीं की लघुकथाओं के पाठ के माध्यम से इंटरनीय दुनिया की सजीव उपस्थिति को मुखरित किया।

हिन्दी ब्लॉगिंग से मेरा जुड़ाव ३२ महीना पुराना है। इस दौरान इस माध्यम के झंडारोपण के लिए मैं शहरो-कस्बों तक गया हूँ। लेकिन कभी झारखण्ड-बिहार जाने का मौका नहीं मिला। दिसम्बर में कोलकाता के ब्लॉगर अमिताभ मीत से जब मुलाक़ात हुई, उन्होंने मुझे कोसा कि यार कोलकाता और हजारीबाग के बीच सैकड़ों ब्लॉगर रहते हैं, हिन्दी-प्रेमियों का इलाका है, कभी उधर मिलने-मिलाने का प्रोग्राम करो तो बात बने।

मैंने गूगल किया तो पाया कि बात सही है। कुछ को पहले से जानता था, कुछ को नहीं। कुछ को फोन सेतो कुछ को ईमेले से पकड़ा और आखिरकार कश्यप मेमोरियल आई हास्पिटल, राँची की निदेशिका डॉ॰ भारती कश्यप ने कार्यक्रम के आयोजन का जिम्मा लिया। साथ में वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखण्डी ने संयोजन की बागडौर सम्हाली।

यह कार्यक्रम में रविवार २२ फरवरी २००९ को राँची में सुबह ११ बजे से आयोजित होने जा रहा है, जिसमें ब्लॉगर साथी तो एक-दूसरे से मिलेंगे ही साथ में दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, आई-नेक्सट के प्रधान सम्पादकों (जैसे संत शरण अवस्थी, हरिनारायाण, हरिवंश॰॰॰॰) के इस विधा पर विचार आयेंगे, मैं ब्लॉगिंग से कम परिचित या न परिचित लोगों को पॉवर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से इस दुनिया की सैर कराऊँगा, पारूल चाँद पुखराज गायेंगी, तो शिव कुमार मिश्रा ब्लॉगिंग का इतिहास बतायेंगे। पत्रकार ब्लॉगर इसे वैकल्पिक पत्रकारिता की नज़रिये से देखेगा तो वहीं अनुभवी ब्लॉगर मनीष कुमार की अपने अलग अनुभव शेयर करेंगे। पहली पाँत से अंतिम पाँत के विद्वानों की बातें होंगी। अभी यह अंतिम रूपरेखा नहीं है, कुछ और ब्लॉगर-वक्ता भी जुड़ेंगे।

झारखण्ड के ब्लॉगरों की यह शिकायत रही है कि वहाँ ब्लॉगिंग-स्लॉगिंग की फालतू की चीज माना जाता है। शायद यह पहल इसे ज़रूरी मानने का बीज रोप दे।

बहुत से ब्लॉगरों ने अभी तक ईमेल का जवाब भी नहीं दिया है। अब पोस्ट पढ़कर सम्मिलित होने का कंफर्मेशन तो दे दें। जिन ब्लॉगरों ने आने की पुष्टि की है, वे हैं-

अमिताभ मीत (कोलकाता)
शिव कुमार मिश्रा (कोलकाता)
बालकिशन (कोलकाता)
शम्भू चौधरी (कोलकाता)
रंजना सिंह (जमशेदपुर)
श्यामल सुमन (जमशेदपुर)
पारूल चाँद पुखराज (बोकारो)
संगीता पुरी (बोकारो)
मनीष कुमार (राँची)
नदीम अख्तर (राँची)
घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखंडी (राँची)
डॉ॰ भारती कश्यप (राँची)
निराला तिवारी (राँची)
संध्या गुप्ता (दुमका)
सुशील कुमार (चाईंबासा)
शैलेश भारतवासी (दिल्ली)
लवली कुमारी (धनबाद)
अभिषेक मिश्र (वाराणसी)

अब न कहना इसे अंट-शंट, न कहना आलतू-फालतू।