Thursday, March 26, 2009

लोकतंत्र से ज़्यादा अहम आईपीएल ???

सवाल ये है कि हम क्यों लिखें और आप क्यों पढ़ें क्योंकि न तो हमारे लिखने से कोई फायदा होने वाला है, न ही आपके पढ़ने से। फिर भी हम लिख रहे हैं और आप पढ़ रहे हैं। इस छोटी सी उम्मीद के साथ कि क्या पता, शायद कुछ बदल जाय।
देश में पहले चरण के इंतेखाबात के लिये अधिसूचना जारी हो चुकी है। यानी होना तो ये चाहिये था कि देश में आम चुनाव का ख़ुमार पूरी तरह से छा जाय लेकिन क्या कीजियेगा इन आईपीएल वालों का कि ये सियासत के खेल में खेल की सियासत को लेकर आ गये हैं। आईपीएल की नुमाइश देश में होगी या देश से बाहर क्या फर्क पड़ता है। अभी तक इस नुमाइश के होने या न होने पर सुरक्षा कारणों को वजह बनाया जा रहा है लेकिन क्या कोई ये बहस भी कर रहा है कि सुरक्षा कारणों के अलावा भी क्या ऐसे समय में आईपीएल होना चाहिये जब देश आम-चुनाव की ज़िम्मेदारियां पूरी करने में लगा हो। चुनाव की तारीखें तय करते वक़्त हमारा चुनाव आयोग भी ये ध्यान रखता कि व्यापक तौर पर न तो परिक्षाएं हो रही हों और न ही हमारा किसान खेती-बाड़ी जैसे न टाले जाने वाले कामों में में लगा हो। तो क्या आईपीएल के आयोजकों को इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये?

सोचिये जो समय राजनीति की सार्थक बहसें करने का है उस वक़्त हमारी जबान पर राजस्थान रॉयल्स, डेयर डेविल्स या शाहरुख़ ख़ान की नाइट राइडर्स की बातें होंगी। आईपीएल देश में हो या देश से बाहर, इससे जो फ़र्ख पड़ेगा उससे भी ज़्यादा गंभीर ये है कि इन सबके बावजूद वो घर-घर में मौजूद रहेगा। रोज़ दो शो होंगे पहला आठ बजे रात और दूसरा दस बजे से। ये वही समय है जब देश की जनता दिनभर की ख़बरें देखती है। जो नये सवाल देश के सामने होते हैं उनपर बहस करने के लिये या राय जानने के लिये हमारे तमाम टीवी चैनल्स नेताओं और संबंधित लोगों को पकड़ कर हमारे सामने लाते हैं। आने वाले दिनों में चुनाव के मद्देनज़र जब इन कार्यक्रमों की हमें बेहद ज़रूरत होगी उस वक़्त हमारे मतदाता जिनमें युवा ज़्यादा हैं, क्रिकेट मैच की रंगीनियों में खोये होंगे। क्रिकेट, ग्लैमर और पैसे की चकाचौंध के बलबूते विज्ञापनों का कारोबार और विज्ञापनों के आधार पर इस नुमाइश की कामयाबी के आगे आम-चुनाव के मुद्दे खो जायेंगे, ऐसी संभावनाओं से इंकार कैसे किया जा सकता है। जो कुछ तय हो रहा है, अगर होगा तो हमारे लोकतंत्र के साथ एक भद्दा मज़ाक होगा जिसके ज़िम्मेदार सितारा हैसियत रखने वाले आईपीएल के यही दावेदार होंगे जो हर कीमत पर इस नुमाइश को आयोजन करवाना चाहते हैं।

होना तो ये चाहिये कि जब देश आम-चुनाव के लिये तैयार हो रहा है, ऐसा कोई आयोजन न हो जो इसकी गंभीरता के साथ खिलवाड़ करे, लेकिन नुमायशी क्रिकेट के कारोबारियों को इन सबसे क्या लेना-देना वो तो कह रहे हैं कि इसबार अगर उन्हें धनलाभ नहीं भी होता है, तो भी वो इसमें अपना पसीना बहायेंगे और हर कीमत पर अपना खेल खेलेंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर आईपीएल के मैच नहीं हो पाते हैं तो करीब एक हजार करोड़ का घाटा होगा।

न्यूज़ चैनल जो पहले ही कटौती के इस माहौल में कम से कम खर्च करने की नीतियां अपनाये हुए हैं, बजाय जमीनी हकीकत पर उतरने के, स्टूडियोज़ में बैठे-बैठे ही चुनावी रस्में अदा करेंगे। चुनावों में क्या हो रहा है और क्या होगा? जैसे सवालों के बजाय दिनभर ये दिखाते रहेंगे कि आईपीएल में क्या हो चुका है और क्या होने जा रहा है। क्योंकि जिन विज्ञापनों के दम पर वो पैसा खर्च करने समाचार जुटाते हैं वो विज्ञापन तो नुमायशी क्रिकेट की चकाचौंध में शामिल होगें। टीआरपी तो वहीं से आयेगी।

हर चीज़ में राजनीति देखने वाले गृह-मंत्रालय की चिंताओं को भी सियासी चश्में से देख रहे हैं। इंडियन प्रीमियर लीग बनाम इंडियन पॉलिटिकल लीग का नया खेल सियासी रंग लेता जा रहा है। लगता है कि आईपीएल, सत्ता और विपक्ष के बीच राजनैतिक लड़ाई का माहौल बनायेगा क्योंकि करीब करीब सभी कांग्रेसी सत्ता वाले राज्य आईपीएल की सुरक्षा से मुंह मोड़ रहे हैं और सारे भाजपा शासित प्रदेश आईपीएल और चुनाव की सुरक्षा एक साथ करने के संकेत दे चुके हैं। “जो सरकार अपने यहां होने वाले खेलों की रक्षा नहीं कर सकती वो देश की रक्षा कैसे करेगी ”, अब इस तरह के भाषण किसी एक मंच के मोहताज नहीं रह जायेंगे। देश के लोकतंत्र से ज़्यादा फ़िक्र लोगों को इस बात की है कि आईपीएल का क्या होगा? सारी दुनिया हम पर थू-थू करेगी कि हम कितने डरपोक हैं। ललित मोदी जो कह रहे थे कि आईपीएल को देश की सुरक्षा एजेंसियों की कोई ज़रूरत नहीं है और वो अपने आयोजन की हिफाज़त ख़ुद कर सकती है, वो अब क्यों दूसरा देश ढूंढ़ रहे हैं, समझ में नहीं आता।

वैसे भी जो खेल हो रहा है उससे क्रिकेट का कितना लेना देना है ये तो उन तस्वीरों से पता चल जाता है जो इन दिनों सुर्खियों में हैं। इनमें क्रिकेटर के बजाय शाहरुख खान, प्रिटि जिंटा, शिल्पा शेट्टी, विजय मालया, ललित मोदी और मिसेज़ मुकेश अंबानी दिखायी पड़ते हैं। इनको देखकर रोमन शासकों की याद आ जाती है जिनके पास ग्लैडिएटर्स होते थे जो अपने मास्टर के लिये जान की बाजी लगा देते थे। यहां गुलामी का अंदाज़ चाहे वैसा न हो लेकिन निलामी तो इनकी भी लगती है। पिछली बार सबसे मंहगी बोली के साथ धोनी 6 करोड़ में बिके थे। इस बार फिंलटाफ और पीटरसन उससे भी ज्यादा, आठ करोड़ में खरीदे गये हैं। 2008 में इस बात से बड़ी राहत मिली थी जब पांच क्रिकेटर्स को आइकॉन कहकर निलाम होने से बचा लिया गया था। इनमें सरताज खिलाड़ी सचिन के साथ-साथ सहवाग, युवराज, गांगुली और द्रविड़ भी थे। शायद इन खिलाड़ियों को इस तरह बिकना मंज़ूर नहीं रहा होगा। आगे ये निलामी क्या-क्या शक्लें बदलेगी, क्या कहा जा सकता है।

ये बहस क्यों नहीं की जा रही है कि देश का लोकतंत्र ज्याद महत्वपूर्ण है या आईपीएल? अगर आईपीएल बाहर भी आयोजित हुआ तो समस्या सिर्फ सुरक्षा की दूर होगी, चुनाव पर जो उसका असर पड़ेगा उसको क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जानबूझकर आईपीएल की तारीखों को चुनाव के समय से टकराया गया है? सवाल ये नहीं है कि कितनी संजीदगी से आम-चुनाव में लोग हिस्सा लेंगे, सवाल ये है कि हम इसके लिये कितना गंभीर माहौल बना रहे हैं?

नाज़िम नक़वी
9811400468

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5 बैठकबाजों का कहना है :

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

मुद्दे-वुद्दे छोड़कर, जगह खोजता देस
ग्यारह के खेल में, सौ करोड़ को ठेस...
जोगीरा सारारारा....

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

जब लोक तंत्र को लोभ तंत्र में बदल देंगे, सर्वाधिक पुरानी सभ्यता के देश को सबसे बड़ा बाज़ार बना देंगे तो यही होगा. आई. पी. एल. में लोग रूचि न लें, चुनाव में लें...कोइ रोक तो नहीं रहा...देश लोगों से बनता है...लोग जो चाहे करेंगे. हम आप कुछ लोग नक्कारखाने में तूती की आवाज करें भी तो कौन सुनेगा? देश तरक्की कर रहा है...वक़्त पड़े पर गधे को बाप कहने के दिन गए...अब तो वक़्त निकल जाने के बाद बाप को गधा कहने का दौर है...

neeti sagar का कहना है कि -

मानती हूँ की आईपीएल से जरुरी देश के चुनाव है,,पर मेरी नज़र से देखें, तो देश की जनता अच्छी तरह जानती है की नेता कोई भी बने,पार्टी कोई भी हो,कुछ नहीं फर्क पड़ने बाला,, होना तो वही है जो हमेशा होता आया,,क्या हुआ अभी हम चार दिन आतंकवाद पर चिल्लाये ,,चार दिन शहीदों की याद में आंसू बहाए,,आखिर सब गया ठंडे बस्ते में,,,,कोई भी नई क्रांति की आवाज़ बुलंद करने वाला नेता मुझे नहीं दिखता,,,,लिखना तो बहुत कुछ चाहती थी पर शायद अभी लिखना ठीक नहीं ,,,, फिर भी मेरी नज़र में राष्ट्र सबसे ऊपर है और उसका सम्मान हम सब को करना चाहिए,,,

तपन शर्मा का कहना है कि -

नाज़िम जी, बात पते की उठाई है। आई.पी एल और चुनाव में टकराव तो होगा ही और नुकसान लोकतंत्र का ही होगा।

खेलों का समय और चुनाव का संयोग ही ऐसा बन बैठा था.. अगर अभी खेल नहीं होंगे तो इस साल हो ही नहीं सकते... सारी टीम पूरे साल व्यस्त रहेंगी। हाँ ये मुद्दा जरूर है कि खेल चुनाव से ज्यादा जरूरी हो गये हैं!!

Rajesh Sharma का कहना है कि -

यह खेल की राजनीति है या राजनीति का खेल। बात समझ से परे है।

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