अभी-अभी पीपली लाइव देखकर लौटा हूँ. मुझे लिखना तो थी समीक्षा लेकिन दिल नहीं करता कि इसकी एक फिल्म की तरह समीक्षा करूँ. क्योंकि सोचने वालों के लिए ये फिल्म एक फिल्म से कहीं ज्यादा है. ये सिर्फ एक तमाशा जिसमे कुछ कलाकार अपने जौहर का प्रदर्शन करते हैं, नहीं है. हालांकि फिल्म बनाने का तरीका ऐसा है कि हंसी-हंसी में बात हो जाए. आमिर खान ने फिर अपने आप को साबित किया...अपने आप को साबित करने से मेरा मतलब? कितने लोग हैं जो वो करते हैं जो वो करना चाहते हैं? बड़े-बड़ों से लेकर छोटे-छोटों तक हर कोई बाज़ार को देखकर चलता है, बड़ा आदमी उस चीज़ में पैसा लगाता है जिसके चलने की गारंटी हो और छोटा आदमी वो काम करता है जो चल रहा है. और फ़िल्मी दुनिया में ऐसे लकीर के फ़कीर भरे पड़े हैं. मैं खुद इस दुनिया में कुछ हद तक अन्दर जा चुका हूँ इसलिए मुझे पता है कि यहाँ एक कहानी फिल्म में तब्दील कैसे होती है. पैसे लगाने वाला सबसे पहला सवाल जो करेगा वो यही कि हीरो कौन है...अगर आपके पास एक चलता हुआ हीरो है तब तो आपकी कहानी किस्मतवाली है वरना आप कितने ही जूते रगड़ दीजिये कुछ नहीं होगा....तो ऐसे में नत्था को हीरो लेकर आपकी फिल्म कैसे बनेगी? फिर अगर हीरो आपके पास है भी तो गाँव की कहानी है सुनकर पहले तो लोग आप पर हँसेंगे और फिर आपकी कहानी कि ऐसी कि तैसी की जायेगी, उसमे आयटम सॉन्ग डाला जाएगा, कुछ गरमा-गरम डाला जाएगा और यो जेनेरेशन को ध्यान में रखकर धिन चक संगीत (?) बनाया जाएगा. ऐसे में अगर पीपली लाइव बनती है तो मैं कहूँगा कि निर्देशिका अनुषा रिज़वी की किस्मत ज़ोरदार है और आमिर खान को इस बात के लिए शाबाशी मिलनी ही चाहिए कि इस माहौल में रहते हुए भी वो ऐसी कहानियाँ चुनते हैं जो सचमुच कुछ कहती हैं. आप अगर पीपली लाइव देखें तो इसमें न तो कोई हीरो है, न कोई आयटम गर्ल है, न गरमा-गरम सीन हैं और न ही धिन चक संगीत है बल्कि ठेठ गावठी लोक संगीत है. फिल्म की कहानी सभी को पता है, एक किसान अपनी ज़मीन को बिकने से बचने के लिए आत्महत्या की घोषणा करता है, करता क्या है उसका बड़ा भाई उससे ये करवाता है. फिर गन्दा खेल शुरू होता है मीडिया और राजनीति का. फिल्म को हास्य का रंग देकर बनाया गया है क्योंकि गंभीर बात न कोई करना चाहता है न सुनना चाहता है. और मैं तो कहूँगा कि हास्य का ये रंग भी सफल होगा इसमें संदेह ही है क्योंकि फिल्म देखने के बाद बाहर निकलने वाले संभ्रांत लोग बात को बिलकुल नहीं समझे, कुछ इसे आर्ट फिल्म कहकर खारिज करते पाए गए तो कुछ मुह बिगाड़ कर चले गए या फिर एक कॉमेडी फिल्म की रेटिंग दे कर चले गए. हो सकता है कुछ लोग उस बात को देख पाए हों जिसे फिल्मकार दिखाना चाहती थी, काश कि कुछ लोग तो हों ऐसे. कुछ लोगों की शिकायत है कि फिल्म मीडिया में उलझ कर रह गई लेकिन एक कहानी को आगे बढ़ने के लिए घटनाएं चाहिए और ये कहानी इसी तरह से आगे जा सकती थी जिस तरह इसे ले जाया गया है...मज़ाक-मज़ाक में गहरी बातें कही गई हैं क्योंकि सीधे-सीधे कोई बात कहना अब उपदेश कहलाता है. कुल मिलाकर फिल्म से जो उभर कर आता है वो एक ऐसे देश की सच्ची तस्वीर है जो हद दर्जे का भ्रष्ट है, संवेदनाहीन है और नकली है.
फिल्म में एक अंग्रेजी न्यूज़ चैनल की पत्रकार कहती है - "लोग डॉक्टर बनते हैं, इंजीनियर बनते हैं, हम जर्नलिस्ट हैं. ये हमारा पेशा है. और अगर तुम ये नहीं कर सकते तो तुम गलत पेशे में हो". ये बात वो कहती है एक ऐसे लोकल पत्रकार को जिसका ज़मीर उसे अन्दर से कचोट रहा है इस सब नाटक पर. ये इस देश की सबसे सच्ची तस्वीर है, यहाँ सब कुछ पेशा है....एक संगीतकार अगर संगीत के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है....एक कलाकार अगर कला के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है....एक डॉक्टर अगर मरीज़ के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है.....एक वकील अगर क़ानून और जुर्म के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है.......नेता अगर जनता के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है....हर किसी को वो माल बनाना है जो बिकता है...फिर चाहे उसके लिए उस मूल विचार की ही हत्या हो जाए जो उस काम के पीछे है. सब कुछ बाज़ार से चल रहा है....
और देश के महानगरों में रहने वाले लोगों को ये पता भी नहीं है कि उनके शायनिंग और २१वी सदी के इंडिया में ऐसी जगहें और ऐसे लोग और ऐसी जिंदगियां भी हैं. और मैं सचमुच ऐसे लोगों से मिला हूँ जिन्हें नहीं पता कि लोग इतने गरीब भी हो सकते हैं और इसी देश में रहते हैं. महीने के आखिर में जब मोटी-मोटी पगार उनकी जेबों में आती है तो उन्हें लगता है कि सभी की जेबों में ये पहुँच गई हैं. जबकि सच्चाई यही है कि असली इंडिया वही है जो इस फिल्म में दिखाया गया है. फिल्म के अंत में एक खेतिहर किसान आखिर में शहर पहुँच कर मजदूर हो जाता है और इस सन्देश के साथ कि १९९१ से २००१ के बीच ८० लाख किसान खेती छोड़कर मजदूर हो गए फिल्म ख़त्म हो जाती है. और आखिर वो आदमी क्या करे जिसका जीना मुश्किल हो जाए. खेती-किसानी की अगर बात करें तो अब तो ये हाल हैं कि खेती कोई करना नहीं चाहता. दूर क्यों जाएँ मैं अपनी खुद की कहूं तो मेरे पिताजी ने खेतों की ही बदौलत मुझे पढाया-लिखाया लेकिन मुझे हमेशा उससे दूर रखा...कोई भी आदमी जो खेती से जीवन बसर कर रहा है वो अपने बच्चों को ये कहकर डराता है कि पढ़ लो वरना खेती करना पड़ेगी जैसे खेती करना कोई बेहद गलीज काम हो. इस सब ने खेती को सबसे निचले स्तर पर ले जाकर पटक दिया है. ज्यादा से ज्यादा लोग खेत और गाँव छोड़कर शहर जाना और एक अदद नौकरी पाना चाहते हैं.....फिर यही दौड़ और चाह ऐसे लोग बनाती है जो बिना रीढ़ के हैं, जो तरक्की के लिए किसी के भी तलुवे चाट लेते हैं. सोचिये वो दिन जब सारे किसान खेती-किसानी छोड़ चुके होंगे और उनके बच्चे कहीं न कहीं नौकरी कर रहे होंगे....फिर उनके खाने के लिए अनाज कहाँ से आएगा...? और ऐसे बिना रीढ़ के नागरिक कैसा देश बनायेंगे?
बहुत सी बातें हैं....बातें ख़त्म नहीं हो सकती....सौ बातों कि एक बात ये कि मेरे ख़याल में ये देश तरक्की नहीं कर रहा है बल्कि ख़त्म हो रहा है. सब कुछ धीरे-धीरे नकली हो रहा है...अपनी सारी चीज़ें धिक्कारी जा रही हैं और एक अंधी दौड़ लगी हुई है. एक समय वो आएगा जब सब कुछ उधार होगा...अपना कुछ भी नहीं होगा. अब फिल्म की थोड़ी बातें करें तो एक बेहतरीन फिल्म है पीपली लाइव....अभिनय, निर्देशन, संगीत, संवाद...सब कुछ बेहतरीन. फिल्म में नत्था के बहुत थोड़े से संवाद हैं लेकिन वो अपने चेहरे और आँखों से वो सब कुछ कहता है. बहुत तकलीफ होती है ये देखकर कि किसान को हर किसी के पैर छूने पड़ते हैं, हर टटपुन्जिये के सामने गिडगिडाना पड़ता है. गरीब आदमी अपना स्वाभिमान कैसे बनाए रखे? अगर रखता है तो उसे आत्महत्या करनी ही पड़ेगी...नत्था तो हर तरह से मरेगा ही, या तो शर्म से या निराशा से या भूख से...समाज ऐसा ही बन गया है. नत्था की कहानी के बीच एक बहुत ही छोटी सी कहानी और भी है, हीरा महतो की...ऐसा किसान जिसकी ज़मीन नीलाम हो चुकी है और जो रोज़ बंजर ज़मीन से मिटटी खोदता है बेचने के लिए...उसके शरीर की हालत सब कुछ कहती है. और एक दिन उसी गड्ढे में वो मरा हुआ मिलता है...गाँव के लोकल पत्रकार का दिल दहल जाता है ये देखकर, उसे सब व्यर्थ लगने लगता है और किसी को भी चोट पहुंचेगी अगर उसके अन्दर भावनाएं हैं...ये एक छोटी सी कहानी उस सब नौटंकी की पोल खोलने के लिए जो मीडिया और नेता मचाये हुए हैं. फिल्म के हर कलाकार ने अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है. एक लम्बे समय के बाद राजपाल यादव को देखना बहुत अच्छा लगा. फिल्म में जो गाँव और जो घर दिखाया गया है वो बिलकुल असली है, इसी तरह के होते हैं गाँव और घर....कम से कम हमारे मध्यप्रदेश में तो हर तरफ यही तस्वीर है...गरीबी, गन्दगी और असुविधाएं...और फिल्म की शूटिंग भी मध्यप्रदेश के ही एक गाँव में हुई है. पहले उड़ान और अब पीपली लाइव...उम्मीद जगाती हैं कि कुछ अच्छे लोग पहुँच गए हैं फिल्म इंडस्ट्री में और हम और अच्छी फिल्मों की उम्मीद कर सकते हैं. अगर ४-५ भी आमिर के जैसे निर्माता हो जाएँ तो हमारी फिल्मों का कायापलट हो जाए. मैं ये सलाह दूंगा कि हर किसी को पीपली एक बार ज़रूर देखनी चाहिए क्योंकि जहां बाज़ार से सब कुछ तय होता है वहां अगर एक अच्छी चीज़ चल जाए तो आगे और अच्छी चीज़ मिलने की उम्मीद बढ जाती है.
अनिरुद्ध शर्मा

स्वतंत्रता दिवस के लिए कुछ लिखने बैठा तो इस बार सोचा था कि कुछ पॉजिटिव ही लिखूंगा…बहुत सोचा, कुछ अच्छी बातें आईं भी दिमाग में लेकिन हर चीज़ घूम कर फिर नकारात्मक हो जाती है. फिर मैंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी सोच ही नकारात्मक है लेकिन ये विचार भी आगे जाकर वहीँ पहुँच गया. अगर मेरी सोच नकारात्मक है तो ये सोच कैसे बनी, किसने बनाई….किसी भी इंसान का व्यक्तित्व कौन सी चीज़ें मिलकर बनाती हैं? उसका परिवार…उसके आस-पास का माहौल, समाज…फिर अगर मेरी सोच नकारात्मक दिशा में जा रही है तो उसका गहरा कारण है और मेरी ही नहीं इस देश में रहने वाले ज़्यादातर लोगों की सोच नकारात्मक है. ऐसा क्यों है? अभी कुछ दिन पहले ही मैं एक सर्वे पढ़ रहा था जिसके अनुसार भारत का नाम रहने लायक देशों की फेहरिस्त में बहुत नीचे था, साथ ही किस देश के लोग सबसे ज्यादा खुश रहते हैं, इसमें भी भारत का नाम बहुत नीचे है और इसके लिए सर्वे करने की ज़रुरत नहीं, हम अगर अपने आस-पास नज़र दौडाएं तो साफ़ हो जाएगा…सभी लम्बे-लम्बे चेहरे दिखाई देंगे. जीवन की वो उर्जा बहुत कम लोगो में दिखाई पड़ती है. हर आदमी डरा-सहमा सा जी रहा है. हर कोई असुरक्षा की भावना से लबालब भरा हुआ है. जीने का एकमात्र मक़सद सिर्फ पैसा कमाना है…सब घिसट रहे हैं. प्रतिभा का कोई मोल नहीं है, जो चीज़ बाज़ार में गर्म है सब के सब उस तरफ दौड़ पड़ते हैं. हर कोई अपने साथ जबरदस्ती कर रहा है. ऐसे में कोई खुश रहे भी तो कैसे? हर वक़्त तलवार लटकी है. वो काम कर रहे हैं जिसमे बुध्धि नहीं चलती लेकिन अपनी जगह से ज़रा भी हिल-डुल नहीं सकते, पीछे असुरक्षित लोगों की लम्बी कतार लगी है और ये कतार हर जगह है, एक जगह गई तो दूसरी जगह के लिए फिर कतार में लगना. ऐसे में सब येन-केन-प्रकारेण कोई जगह हासिल करने की जुगत में रहते हैं…भ्रष्टाचार को गाली दो लेकिन अपना मौका आये तो चूको मत. हर किसी के मुह से यही तर्क सुनाई देता है कि हम नहीं करेंगे तो दूसरा करेगा, क्या करें ज़माना ही ऐसा है करना पड़ता है...हर तरफ भ्रष्ट लोग, दोमुहे लोग, दोगले लोग, मौकापरस्त लोग, गन्दगी से भरे लोग………………………………………..

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का नया कारनामा. अब स्कूल में बच्चों को गीता पढना ज़रूरी है. क्या बात है, ये फैसला करके उन्होंने भगवान् कृष्ण से अपने लिए बहुत कुछ डिमांड कर डाला होगा, आखिर हमारे यहाँ धर्म का मतलब आम तौर पर मन्नत मांगना ही तो होता है और हमारे मुख्यमंत्री तो 'सिर्फ धार्मिक' ही हैं. ये अपने आप में एक बड़ा विषय है जिसके बारे में बाद में बात करेंगे, फिलहाल हम वापस अपने प्रिय मुख्यमंत्रीजी पर वापस आते हैं. गीता तो आपने थोप दी लेकिन क्या आपको खबर है कि जो पढाई ज़रूरी है एक बच्चे को आगे बढ़ने के लिए वो भी हो रही है या नहीं? स्वाभाविकतः नहीं, वरना मध्यप्रदेश को देश के सबसे पिछड़े राज्यों में एक नहीं गिना जाता. ये तथ्य है कि मध्यप्रदेश के बच्चों को बाहर जाकर प्रतियोगिता करना भारी पड़ता है. लेकिन मुख्यमंत्रीजी को इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि उन्होंने इतना सोचा भी होगा मुझे नहीं लगता. उनके अब तक के कार्यकाल में उन्होंने जो भी काम किये हैं वे उनकी बेहद सतही सोच को ही दर्शाते हैं. वो एक मुख्यमंत्री की तरह नहीं बल्कि किसी मोहल्ले की गणेश मंडली के अध्यक्ष की तरह सोचते हैं और राज्य को गणेश मंडल की तरह चला रहे हैं. स्कूलों में गीता पढ़वाएंगे लेकिन शिक्षक की जो फटीचर हालत है वो नहीं देखेंगे. प्राथमिक स्कूल के शिक्षक को एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम मेहनताना मिलता है उसमे वो क्या शिक्षा देगा बच्चों को. सच्चाई तो ये है कि जो आदमी किसी भी काम के योग्य नहीं होता (शिक्षक बनने के भी ) वो शिक्षक बन जाता है. सभी हारे हुए और अयोग्य लोग शिक्षा देने के धंधे में लगे हुए हैं तो कोई आश्चर्य नहीं कि पूरे राज्य की तस्वीर भी ऐसी ही है. मुख्यमंत्री भी ऐसे ही शिक्षकों का परिणाम लगते हैं जिन्होंने शिक्षा में विचार को कभी जगह ही नहीं दी. वैसे तो मुख्यमंत्रीजी बहुत ही लचीले हैं जिन्होंने कभी कोई मजबूत फैसला नहीं लिया लेकिन अब तक जिन बातों पर वे कड़क हुए हैं वे उनकी सोच के दीवालियेपन को ही दिखाती हैं. बानगी देखिये - जब राज्य में १ महीने तक बारिश नहीं होती तो वे महांकाल के मंदिर में जाकर ५०००० पंडों के साथ भोजन करते हैं और भगवन को बारिश की अर्जी देते हैं. अब एक आम आदमी को इस तरह की हरकत के लिए मूर्ख होने का तमगा देकर माफ़ किया जा सकता है लेकिन एक राज्य के मुखिया को नहीं. लेकिन इस एक काम के सिवा मुख्यमंत्रीजी ने पानी के मुद्दे पर कोई विचार नहीं किया, उन्हें अब भी पानी का मेनेजमेंट पूरी तरह भगवन के हाथ में ही लगता है, उन्हें ये पता ही नहीं है कि हमें ही कुछ नियम बनाने होंगे, कुछ कदम उठाने होंगे ताकि सही समय पर बारिश हो और पर्याप्त हो. मालवा में भूमिगत जलस्तर भयावह स्थिति में है लेकिन वे बेखबर हैं उन्हें लगता है कि ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि भगवन विष्णु अपने नाग पर नीचे बैठे हैं जो पानी कम नहीं होने देंगे. राज्य में पेडों की कटाई कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि उन्हें लगता ही नहीं कि ये किसी काम के हैं. दूसरी ज़ोरदार आवाज़ उन्होंने उठाई थी एक मसाज सेंटर के बोर्ड के खिलाफ....?????....क्या कर रहे हैं ये आप? आपको राज्य की बागडोर इन ओछे कामों के लिए नहीं सौंपी गई है. आपका राज्य बहुत बहुत पिछड़ा हुआ है, कभी अपने कुए से बाहर निकल कर देखिये कि दुनिया बहुत बड़ी है. अपने आप को ऊपर उठाइये, अपने कुए को और गहरा मत खोदिये. लाडली लक्ष्मी योजना को क़ानून बनाने के लिए वे बहुत आक्रामक नज़र आये लेकिन राज्य में जो गुंडों का साम्राज्य फ़ैल गया है (जिसके आका उन्ही कि पार्टी और सरकार के लोग हैं) उस पर गौर करना उन्हें ज़रूरी नहीं लगता. जहाँ भी कोई सोच-समझ से सम्बंधित मुद्दा सामने आता है वे केंद्र सरकार के ऊपर पूरी जिम्मेदारी डाल कर सो जाते हैं. ८ साल हो गए हैं उनके शासन को लेकिन प्रदेश में बिजली की समस्या में रत्ती भर भी सुधार नहीं आया है बल्कि हालात और भी बदतर हुए हैं. पहले सर्दियों में तो बिजली मिल जाती थी अब तो पूरे साल बिजली मेहमान कि तरह आती है. लेकिन ये समस्या केंद्र सरकार कि है, हम तो बस मंदिर जायेंगे और धर्म बचायेंगे तो भाई पुजारी बन जाओ मुख्यमंत्री बन कर इतने लोगों की ज़िन्दगी क्यों खराब करते हो? कहने को तो उन्होंने अपनी एक वेब साईट भी बनाई है और उस पर नागरिक अपनी समस्याएँ बता सकते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता की कोई कभी उसे देखने की ज़हमत भी उठाता होगा क्योंकि उनके आस-पास के लोग भी तो उभी की तरह के होंगे न जो भगवन भरोसे काम कर रहे हैं. मैंने कई बार उस पर पत्र लिखे लेकिन मुझे आज तक कोई जवाब नहीं आया.
अमिताभ बच्चन...बड़ा नाम, बड़ा कद, बड़ी शख्सियत. इतने सालों में कितना कुछ लिखा जा चुका है उनके बारे में लेकिन मेरा इस नाम के प्रति मोह मुझे लिखने के लिये बार-बार उकसाता है। सात हिन्दुस्तानी से लेकर भूतनाथ तक का सफर सभी जानते हैं। एक अभिनेता के तौर पर वे लाजवाब हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं। उनकी शख्सियत में जादू है। मैंने उनकी लगभग हर फिल्म देखी है और उनमें से कुछ ते कईं-कईं बार देखी हैं। लेकिन फिर भी एक बात मुझे महसूस होती है कि इस कमाल की शख्सियत और बेजोड़ अभिनेता का सही उपयोग नहीं हो पाया। जैसा कि मशहूर है कि अमिताभ एक सौम्य व्यक्ति हैं और रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, यही वजह है कि वे हमेशा कुछ निहायत ही अयोग्य व्यक्तियों के बीच फंसे रहे जिनमें फिल्म की सतही जानकारी थी। बिगबी की फिल्मों में से बहुत सी फिल्में ऐसी हैं कि उनमे से अगर उन्हें निकाल लिया जाये तो कुछ भी नहीं बचता, ना कहानी, ना निर्देशन, ना संवाद...लेकिन फिर भी लोग देखते हैं और खूब देखते हैं ये जादू सिर्फ और सिर्फ अमिताभ बच्चन का है। उनकी एक फिल्म जिसे मैं जब भी मौका मिलता है देख लेता हूं वो है ” अग्निपथ ”। मेरे हिसाब से (और श्रीमती जया बच्चन के हिसाब से भी :) ) अग्निपथ अमितजी के जीवन का सर्वश्रेश्ठ अभिनय है, ये उनकी अभिनय क्षमता का चरम है जिसने एक साधारण सी कहानी को असाधारण बना दिया। इस फिल्म में उनकी संवाद अदायगी अभिनय स्कूलों में पढ़ाये जाने योग्य है। एक-एक संवाद जबरदस्त है। वैसे अगर हम उनके जीवन की बेहतरीन फिल्में चुनें तो जो नाम सामने आएंगे वे हैं- जंज़ीर, अभिमान, शोले, दीवार, अग्निपथ, त्रिशूल, काला पत्थर, शक्ति, शराबी और मैं अक्स को भी शामिल करना चाहूँगा। चुपके-चुपके इसलिये छोड़ दी क्योंकि वो मुख्यतः धर्मेंद्र की फिल्म है और आनंद में भी बिगबी का छोटा सा ही रोल था, हालांकि इन दोनों फिल्मों में भी वे कमाल ही थे। परदे पर उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है खासकर पुरानी फिल्मों में। फिल्म त्रिशूल में उनका किरदार इस मायने में बेहतरीन था। “आज मेरी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं और मैं 5 लाख का सौदा करने आया हूँ“ इस डायलॉग की अदायगी पर तालियाँ और सीटियाँ बजना लाजमी है। यश चोपड़ा ने अपने जीवन की कुछ बेहतरीन फिल्में बिगबी के साथ बनाई हैं जैसे दीवार, काला पत्थर, त्रिशूल। कभी-कभी और सिलसिला भी यश चोपड़ा की ही फिल्में हैं लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर इन दोनों फिल्मों को पसन्द नहीं करता क्योंकि इनमें नौटंकी तत्व की प्रधानता थी जो आजकल यशराज बैनर की फिल्मों का स्थाई फार्मूला है, अविश्वसनीय तरीकों से रोना-धोना और भावनाओं का भौंडा प्रदर्शन। दूसरे फिल्मकार जिनके साथ बिगबी ने काफी फिल्में की हैं वे हैं मनमोहन देसाई। देसाई साहब एक बेहद सीमित प्रतिभा वाले फिल्मकार थे। उन्होंने एक ही कहानी में फेर बदल कर-कर कई-कईं फिल्में बनाईं। लेकिन वे किस्मत के धनी थे और उनकी फिल्में सफल रहीं लेकिन एक समय तक ही क्योंकि दर्शक को मूर्ख बनाकर लंबी पारी नहीं खेली जा सकती इसलिये बाद की उनकी फिल्में अमिताभ बच्चन के नाम के बावजूद पिट गईं। एक फिल्म जो वास्तव में हर मायने में अच्छी है वो है शक्ति सामंत की ”शक्ति”। अच्छी कहानी, अच्छी पटकथा, अच्छे संवाद और बेहतरीन अदाकारी अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार की। बाप-बेटे के रिश्तों पर बनी इस फिल्म का विषय उस समय के ट्रेंड को देखते हुए नया और अच्छा था। सबसे बड़ी बात कि इसमें भावनाओं को बिना लाउड हुए प्रदर्शित किया गया था जिसमें योगदान दिलीप कुमार और बिगबी के अभिनय का भी था। मेरी एक और पसंदीदा फिल्म है जिसमें बिगबी का अभिनय अपनी बुलंदी पर है, वो है ”शराबी”। शराबी प्रकाश मेहरा की फिल्म थी जिन्होंने अमिताभ कों पहली बार बतौर नायक जंज़ीर में पेश किया था। प्रकाश मेहरा ने व्यावसायिक फिल्में बनाईं लेकिन अपने स्तर पर अच्छी ही बनाई। ”मुक़द्दर का सिकंदर” भी उनकी अच्छी फिल्मों में एक है। अमिताभ हृषिकेश मुखर्जी के बहुत बड़े प्रसंशक हैं जिन्होंने सबसे पहले अपनी फिल्म आनंद में उन्हें एक महत्वपूर्ण किरदार दिया था और अमिताभ ने भी उस किरदार में जान डाल दी थी। आनंद मेरी सबसे प्रिय फिल्मों में से एक है। इसके अंत के उस दृश्य में जहां डॉक्टर को पता चलता है कि आनंद मर चुका है, अमिताभ ने वो रुदन किया था कि आज भी देखता हूँ तो आँखों में आँसू आ जाते हैं। इसके बाद उन्होंने हृशिदा के साथ अभिमान, नमक हराम, चुपके-चुपके आदि फिल्मों में काम किया। 80 के दशक के मध्य में अमिताभ का सितारा गर्दिश में था लेकिन इसमें उनका फिल्मों का चुनाव भी एक कारण था। उन्होंने संबंधों की खातिर ऐसी वाहियात फिल्में कीं कि उन्हें देखना किसी सज़ा से कम नहीं। ”मर्द, कुली, जादूगर, तूफान, अकेला...“ ये ऐसी फिल्में हैं जो आजकल किसी ना किसी चैनल पर रोज़ आ रहीं हैं लेकिन इन्हें देखना सहनशक्ति की कठोर परीक्षा है। एक बात मैं अक्सर सोचता हूँ कि जब अमिताभ खुद ये फिल्में कभी देख लेते होंगे तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा या कि उन्होंने ये फिल्में कभी देखी ही नहीं हैं। तूफान में एक विचित्र वेशभूषा पहने, जादूगर में फूहड़ हरकतें करते। शायद इस दौर में वे अति आत्मविश्वास से पीड़ित हुए थे। कुली में जब उनके साथ दुर्घटना हुई थी और पूरे देश में दुख की लहर फैल गई थी तब उन्हें अपने पर शायद ये भरोसा हो गया था कि वे कुछ भी करें चलेगा। उस दौर में एक फिल्म ज़रूर ऐसी आई थी जो बिल्कुल अलग थी, ”मैं आज़ाद हूँ”। ये फिल्म उस समय बनती कला फिल्मों की श्रेणी में है। मुझे याद है तब मैं ये सोचकर खुश हुआ था कि अब उनके अभिनय का बेहतरीन नमूना देखने को मिलेगा लेकिन उसके बाद ऐसी किसी फिल्म में उन्हें देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ लेकिन मैं एक सच्चे भक्त की तरह उनकी हर फिल्म देखता और उसकी तहेदिल से तारीफ भी करता था। फिर मुझ पर गाज गिरी जब उन्होंने 5 साल के लिये ब्रेक की घोषणा कर दी। मुझे बहुत गुस्सा भी आया लेकिन मैं बेचारा क्या कर सकता था? फिर 5 साल बाद उनकी वापसी की घोषणा हुई और मैं जितना खुश हुआ, मैं नहीं समझता कोई और उतना हुआ होगा। उनकी वापसी वाली फिल्म थी ”मृत्युदाता”। मैं बहुत उत्साहित था और पहले दिन ही मैंने फिल्म देखने का निश्चय किया था। मैंने अपने सभी साथियों से कहा लेकिन कोई भी फिल्म देखने के लिये राजी नहीं हुआ तो मैं अकेला ही चला पहला दिन, पहला शो। अंदर मेरी जो गत हुई मैं क्या कहूँ। ये फिल्म मेरे उत्साह के लिये सचमुच मृत्युदाता ही साबित हुई। दुनिया की सबसे बकवास फिल्मों में से एक थी ये फिल्म। मेरा मन खट्टा हो गया और ये फिल्म भी बुरी तरह पिट गई। फिल्म के निर्देशक मेहुल कुमार थे जिन्होंने और भी बहुत सी घटिया किस्म की फिल्में बनाई हैं। वे मनोज कुमार की नकली देशभक्ति के उत्तराधिकारी थे। इतना ही काफी नहीं था कि अमिताभ ने मेहुल कुमार के साथ एक और फिल्म "कोहराम” की जिसे आज तक मैं 10 मिनट से ज़्यादा नहीं देख पाया हूँ।
गुमराह जो सन 1963 में आई थी, बी आर चोपड़ा की बेहतरीन फिल्मों में से एक है, और उनकी अन्य फिल्मों की तरह इसमें भी एक सामाजिक मुद्दे को उठाया गया था। फिल्म शुरू होती है रामायण के एक दृश्य से जिसमें रावण राम की कुटिया के सामने भिक्षा माँगने आता है। जब लक्ष्मन राम की पुकार सुन कर जंगल में गये हैं और सीता की सुरक्षा के लिये लक्षमण रेखा खींच कर गए हैं। सीता रावण की बातों में आकर उसे पार कर लेती हैं और रावण उनका अपहरण कर लेता है। बस यही फिल्म की थीम है। एक स्त्री के अपनी मर्यादा को लांघने का और उससे उपजी परिस्थितियों का।








अनिरुद्ध शर्मा हिंदयुग्म के पुराने पाठकों में से हैं.....पुणे की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी करते हैं...चुनाव के दौरान इनके भीतर का नागरिक जगा और इन्होंने हमें एक लेख भेज दिया....आप भी पढें इनके विचार.....
मार्कण्डेय