Showing posts with label Aniruddha Sharma. Show all posts
Showing posts with label Aniruddha Sharma. Show all posts

Tuesday, August 17, 2010

देश का असली हीरो नत्था, जिसे हर हाल में मरना है...

अभी-अभी पीपली लाइव देखकर लौटा हूँ. मुझे लिखना तो थी समीक्षा लेकिन दिल नहीं करता कि इसकी एक फिल्म की तरह समीक्षा करूँ. क्योंकि सोचने वालों के लिए ये फिल्म एक फिल्म से कहीं ज्यादा है. ये सिर्फ एक तमाशा जिसमे कुछ कलाकार अपने जौहर का प्रदर्शन करते हैं, नहीं है. हालांकि फिल्म बनाने का तरीका ऐसा है कि हंसी-हंसी में बात हो जाए. आमिर खान ने फिर अपने आप को साबित किया...अपने आप को साबित करने से मेरा मतलब? कितने लोग हैं जो वो करते हैं जो वो करना चाहते हैं? बड़े-बड़ों से लेकर छोटे-छोटों तक हर कोई बाज़ार को देखकर चलता है, बड़ा आदमी उस चीज़ में पैसा लगाता है जिसके चलने की गारंटी हो और छोटा आदमी वो काम करता है जो चल रहा है. और फ़िल्मी दुनिया में ऐसे लकीर के फ़कीर भरे पड़े हैं. मैं खुद इस दुनिया में कुछ हद तक अन्दर जा चुका हूँ इसलिए मुझे पता है कि यहाँ एक कहानी फिल्म में तब्दील कैसे होती है. पैसे लगाने वाला सबसे पहला सवाल जो करेगा वो यही कि हीरो कौन है...अगर आपके पास एक चलता हुआ हीरो है तब तो आपकी कहानी किस्मतवाली है वरना आप कितने ही जूते रगड़ दीजिये कुछ नहीं होगा....तो ऐसे में नत्था को हीरो लेकर आपकी फिल्म कैसे बनेगी? फिर अगर हीरो आपके पास है भी तो गाँव की कहानी है सुनकर पहले तो लोग आप पर हँसेंगे और फिर आपकी कहानी कि ऐसी कि तैसी की जायेगी, उसमे आयटम सॉन्ग डाला जाएगा, कुछ गरमा-गरम डाला जाएगा और यो जेनेरेशन को ध्यान में रखकर धिन चक संगीत (?) बनाया जाएगा. ऐसे में अगर पीपली लाइव बनती है तो मैं कहूँगा कि निर्देशिका अनुषा रिज़वी की किस्मत ज़ोरदार है और आमिर खान को इस बात के लिए शाबाशी मिलनी ही चाहिए कि इस माहौल में रहते हुए भी वो ऐसी कहानियाँ चुनते हैं जो सचमुच कुछ कहती हैं. आप अगर पीपली लाइव देखें तो इसमें न तो कोई हीरो है, न कोई आयटम गर्ल है, न गरमा-गरम सीन हैं और न ही धिन चक संगीत है बल्कि ठेठ गावठी लोक संगीत है.
फिल्म की कहानी सभी को पता है, एक किसान अपनी ज़मीन को बिकने से बचने के लिए आत्महत्या की घोषणा करता है, करता क्या है उसका बड़ा भाई उससे ये करवाता है. फिर गन्दा खेल शुरू होता है मीडिया और राजनीति का. फिल्म को हास्य का रंग देकर बनाया गया है क्योंकि गंभीर बात न कोई करना चाहता है न सुनना चाहता है. और मैं तो कहूँगा कि हास्य का ये रंग भी सफल होगा इसमें संदेह ही है क्योंकि फिल्म देखने के बाद बाहर निकलने वाले संभ्रांत लोग बात को बिलकुल नहीं समझे, कुछ इसे आर्ट फिल्म कहकर खारिज करते पाए गए तो कुछ मुह बिगाड़ कर चले गए या फिर एक कॉमेडी फिल्म की रेटिंग दे कर चले गए. हो सकता है कुछ लोग उस बात को देख पाए हों जिसे फिल्मकार दिखाना चाहती थी, काश कि कुछ लोग तो हों ऐसे. कुछ लोगों की शिकायत है कि फिल्म मीडिया में उलझ कर रह गई लेकिन एक कहानी को आगे बढ़ने के लिए घटनाएं चाहिए और ये कहानी इसी तरह से आगे जा सकती थी जिस तरह इसे ले जाया गया है...मज़ाक-मज़ाक में गहरी बातें कही गई हैं क्योंकि सीधे-सीधे कोई बात कहना अब उपदेश कहलाता है. कुल मिलाकर फिल्म से जो उभर कर आता है वो एक ऐसे देश की सच्ची तस्वीर है जो हद दर्जे का भ्रष्ट है, संवेदनाहीन है और नकली है.
फिल्म में एक अंग्रेजी न्यूज़ चैनल की पत्रकार कहती है - "लोग डॉक्टर बनते हैं, इंजीनियर बनते हैं, हम जर्नलिस्ट हैं. ये हमारा पेशा है. और अगर तुम ये नहीं कर सकते तो तुम गलत पेशे में हो". ये बात वो कहती है एक ऐसे लोकल पत्रकार को जिसका ज़मीर उसे अन्दर से कचोट रहा है इस सब नाटक पर. ये इस देश की सबसे सच्ची तस्वीर है, यहाँ सब कुछ पेशा है....एक संगीतकार अगर संगीत के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है....एक कलाकार अगर कला के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है....एक डॉक्टर अगर मरीज़ के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है.....एक वकील अगर क़ानून और जुर्म के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है.......नेता अगर जनता के बारे में सोचता है तो वो गलत पेशे में है....हर किसी को वो माल बनाना है जो बिकता है...फिर चाहे उसके लिए उस मूल विचार की ही हत्या हो जाए जो उस काम के पीछे है. सब कुछ बाज़ार से चल रहा है....
और देश के महानगरों में रहने वाले लोगों को ये पता भी नहीं है कि उनके शायनिंग और २१वी सदी के इंडिया में ऐसी जगहें और ऐसे लोग और ऐसी जिंदगियां भी हैं. और मैं सचमुच ऐसे लोगों से मिला हूँ जिन्हें नहीं पता कि लोग इतने गरीब भी हो सकते हैं और इसी देश में रहते हैं. महीने के आखिर में जब मोटी-मोटी पगार उनकी जेबों में आती है तो उन्हें लगता है कि सभी की जेबों में ये पहुँच गई हैं. जबकि सच्चाई यही है कि असली इंडिया वही है जो इस फिल्म में दिखाया गया है. फिल्म के अंत में एक खेतिहर किसान आखिर में शहर पहुँच कर मजदूर हो जाता है और इस सन्देश के साथ कि १९९१ से २००१ के बीच ८० लाख किसान खेती छोड़कर मजदूर हो गए फिल्म ख़त्म हो जाती है. और आखिर वो आदमी क्या करे जिसका जीना मुश्किल हो जाए. खेती-किसानी की अगर बात करें तो अब तो ये हाल हैं कि खेती कोई करना नहीं चाहता. दूर क्यों जाएँ मैं अपनी खुद की कहूं तो मेरे पिताजी ने खेतों की ही बदौलत मुझे पढाया-लिखाया लेकिन मुझे हमेशा उससे दूर रखा...कोई भी आदमी जो खेती से जीवन बसर कर रहा है वो अपने बच्चों को ये कहकर डराता है कि पढ़ लो वरना खेती करना पड़ेगी जैसे खेती करना कोई बेहद गलीज काम हो. इस सब ने खेती को सबसे निचले स्तर पर ले जाकर पटक दिया है. ज्यादा से ज्यादा लोग खेत और गाँव छोड़कर शहर जाना और एक अदद नौकरी पाना चाहते हैं.....फिर यही दौड़ और चाह ऐसे लोग बनाती है जो बिना रीढ़ के हैं, जो तरक्की के लिए किसी के भी तलुवे चाट लेते हैं. सोचिये वो दिन जब सारे किसान खेती-किसानी छोड़ चुके होंगे और उनके बच्चे कहीं न कहीं नौकरी कर रहे होंगे....फिर उनके खाने के लिए अनाज कहाँ से आएगा...? और ऐसे बिना रीढ़ के नागरिक कैसा देश बनायेंगे?
बहुत सी बातें हैं....बातें ख़त्म नहीं हो सकती....सौ बातों कि एक बात ये कि मेरे ख़याल में ये देश तरक्की नहीं कर रहा है बल्कि ख़त्म हो रहा है. सब कुछ धीरे-धीरे नकली हो रहा है...अपनी सारी चीज़ें धिक्कारी जा रही हैं और एक अंधी दौड़ लगी हुई है. एक समय वो आएगा जब सब कुछ उधार होगा...अपना कुछ भी नहीं होगा. अब फिल्म की थोड़ी बातें करें तो एक बेहतरीन फिल्म है पीपली लाइव....अभिनय, निर्देशन, संगीत, संवाद...सब कुछ बेहतरीन. फिल्म में नत्था के बहुत थोड़े से संवाद हैं लेकिन वो अपने चेहरे और आँखों से वो सब कुछ कहता है. बहुत तकलीफ होती है ये देखकर कि किसान को हर किसी के पैर छूने पड़ते हैं, हर टटपुन्जिये के सामने गिडगिडाना पड़ता है. गरीब आदमी अपना स्वाभिमान कैसे बनाए रखे? अगर रखता है तो उसे आत्महत्या करनी ही पड़ेगी...नत्था तो हर तरह से मरेगा ही, या तो शर्म से या निराशा से या भूख से...समाज ऐसा ही बन गया है. नत्था की कहानी के बीच एक बहुत ही छोटी सी कहानी और भी है, हीरा महतो की...ऐसा किसान जिसकी ज़मीन नीलाम हो चुकी है और जो रोज़ बंजर ज़मीन से मिटटी खोदता है बेचने के लिए...उसके शरीर की हालत सब कुछ कहती है. और एक दिन उसी गड्ढे में वो मरा हुआ मिलता है...गाँव के लोकल पत्रकार का दिल दहल जाता है ये देखकर, उसे सब व्यर्थ लगने लगता है और किसी को भी चोट पहुंचेगी अगर उसके अन्दर भावनाएं हैं...ये एक छोटी सी कहानी उस सब नौटंकी की पोल खोलने के लिए जो मीडिया और नेता मचाये हुए हैं. फिल्म के हर कलाकार ने अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है. एक लम्बे समय के बाद राजपाल यादव को देखना बहुत अच्छा लगा. फिल्म में जो गाँव और जो घर दिखाया गया है वो बिलकुल असली है, इसी तरह के होते हैं गाँव और घर....कम से कम हमारे मध्यप्रदेश में तो हर तरफ यही तस्वीर है...गरीबी, गन्दगी और असुविधाएं...और फिल्म की शूटिंग भी मध्यप्रदेश के ही एक गाँव में हुई है. पहले उड़ान और अब पीपली लाइव...उम्मीद जगाती हैं कि कुछ अच्छे लोग पहुँच गए हैं फिल्म इंडस्ट्री में और हम और अच्छी फिल्मों की उम्मीद कर सकते हैं. अगर ४-५ भी आमिर के जैसे निर्माता हो जाएँ तो हमारी फिल्मों का कायापलट हो जाए. मैं ये सलाह दूंगा कि हर किसी को पीपली एक बार ज़रूर देखनी चाहिए क्योंकि जहां बाज़ार से सब कुछ तय होता है वहां अगर एक अच्छी चीज़ चल जाए तो आगे और अच्छी चीज़ मिलने की उम्मीद बढ जाती है.

अनिरुद्ध शर्मा

Saturday, August 14, 2010

स्वतंत्रता दिवस और मेरी पॉजिटिव सोच

स्वतंत्रता दिवस के लिए कुछ लिखने बैठा तो इस बार सोचा था कि कुछ पॉजिटिव ही लिखूंगा…बहुत सोचा, कुछ अच्छी बातें आईं भी दिमाग में लेकिन हर चीज़ घूम कर फिर नकारात्मक हो जाती है. फिर मैंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी सोच ही नकारात्मक है लेकिन ये विचार भी आगे जाकर वहीँ पहुँच गया. अगर मेरी सोच नकारात्मक है तो ये सोच कैसे बनी, किसने बनाई….किसी भी इंसान का व्यक्तित्व कौन सी चीज़ें मिलकर बनाती हैं? उसका परिवार…उसके आस-पास का माहौल, समाज…फिर अगर मेरी सोच नकारात्मक दिशा में जा रही है तो उसका गहरा कारण है और मेरी ही नहीं इस देश में रहने वाले ज़्यादातर लोगों की सोच नकारात्मक है. ऐसा क्यों है? अभी कुछ दिन पहले ही मैं एक सर्वे पढ़ रहा था जिसके अनुसार भारत का नाम रहने लायक देशों की फेहरिस्त में बहुत नीचे था, साथ ही किस देश के लोग सबसे ज्यादा खुश रहते हैं, इसमें भी भारत का नाम बहुत नीचे है और इसके लिए सर्वे करने की ज़रुरत नहीं, हम अगर अपने आस-पास नज़र दौडाएं तो साफ़ हो जाएगा…सभी लम्बे-लम्बे चेहरे दिखाई देंगे. जीवन की वो उर्जा बहुत कम लोगो में दिखाई पड़ती है. हर आदमी डरा-सहमा सा जी रहा है. हर कोई असुरक्षा की भावना से लबालब भरा हुआ है. जीने का एकमात्र मक़सद सिर्फ पैसा कमाना है…सब घिसट रहे हैं. प्रतिभा का कोई मोल नहीं है, जो चीज़ बाज़ार में गर्म है सब के सब उस तरफ दौड़ पड़ते हैं. हर कोई अपने साथ जबरदस्ती कर रहा है. ऐसे में कोई खुश रहे भी तो कैसे? हर वक़्त तलवार लटकी है. वो काम कर रहे हैं जिसमे बुध्धि नहीं चलती लेकिन अपनी जगह से ज़रा भी हिल-डुल नहीं सकते, पीछे असुरक्षित लोगों की लम्बी कतार लगी है और ये कतार हर जगह है, एक जगह गई तो दूसरी जगह के लिए फिर कतार में लगना. ऐसे में सब येन-केन-प्रकारेण कोई जगह हासिल करने की जुगत में रहते हैं…भ्रष्टाचार को गाली दो लेकिन अपना मौका आये तो चूको मत. हर किसी के मुह से यही तर्क सुनाई देता है कि हम नहीं करेंगे तो दूसरा करेगा, क्या करें ज़माना ही ऐसा है करना पड़ता है...हर तरफ भ्रष्ट लोग, दोमुहे लोग, दोगले लोग, मौकापरस्त लोग, गन्दगी से भरे लोग………………………………………..
अब बात करें उस भारत की जिसके बारे में कहानियाँ कही जाती हैं, जिसे हर स्वतंत्रता दिवस पर महान बताया जाता है, ऐसा देश जिसमें सभी लोग प्रेम से भरे हुए हैं, एक के दर्द में सारे शामिल हो जाते हैं, जहां दया है, करुणा है, सत्य है, स्वाभिमान है. अच्छा लगा ना?
मुझे भी अच्छा लगता है ये सोचकर कि मैं ऐसे लोगों के बीच में हूँ जहां मैं आँखें बंद करके किसी पर भरोसा कर सकता हूँ…जहाँ अगर मैं बाज़ार में कुछ लेने जाता हूँ तो यकीन होता है कि मुझे जो मिलेगा वो अच्छा ही होगा उसमे बेईमानी की कोई गुंजाइश नहीं होगी. मैं दूधवाले को दूध लाने को कहूँगा तो मुझे दूध ही मिलेगा पानी नहीं और मुझे उससे उसके दामों के लिए झिकझिक नहीं करनी पड़ेगी. मैं जब रिक्शा में बैठता हूँ तो पहले मुझे २० मिनट कितने पैसे लोगे के शीर्षक से बहस नहीं करनी पड़ती, वो चुपचाप मुझे पंहुचा देता है और जो वाजिब दाम हैं वो मैं दे देता हूँ. जिसका जो काम है वो उसे अच्छी तरह से करता है. मुझे रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों के लिए अपना खून नहीं जलाना पड़ता,…लेकिन ऐसा नहीं होता ना? सबका अनुभव इसका उल्टा ही होगा. आदमी को हर वक़्त चौकन्ना रहना पड़ता है कब कौन ठग ले कुछ नहीं कह सकते. इतना अविश्वास? अपने ही लोगों पर? लेकिन ऐसा है इसे कोई झुठला नहीं सकता. ये डर, ये असुरक्षा, ये तनाव, इन सबके साथ कोई खुल के कैसे जी सकता है? इंसान की आत्मा बंधी हुई रहती है, फडफडाती है…और ये आत्मा जब तक उड़ने के लिए खोल नहीं दी जाती तब तक किसी भी आजादी का क्या मतलब है?
अगर अंगरेजों की बात करें तो हम आज़ाद हैं लेकिन हमारी मानसिकता अब भी गुलामी में है. हर एक पीढ़ी के मन में पुरानी पीढ़ी इतना डर और असुरक्षा भर देती है कि आत्म सम्मान, उसूल वगैरह सब फ़ालतू लगने लगते हैं. ये ज़िन्दगी कोई गुलामों से बेहतर नहीं है…बात तो तब होगी कि हरेक आत्मा आज़ाद हो, वो जब चाहे पंख फैला कर आसमान में उड़ सके…….सब एक दूसरे के चेहरों से घबराए ना हो…
ये देश जो बातें अब तक दोहराता है (और सिर्फ दोहराता ही है, अमल में नहीं लाता), महानता की, उर्जा की, विद्वत्ता की ऐसा नहीं कि सब झूठ है, ऐसा एक ज़माना निश्चित रूप से था वरना ये वेद, ये उपनिषद क्या हैं? ऐसा संगीत जो आग जला दे या पानी बरसा दे...ये संगीत क्या है? वरना कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, रामकृष्ण, विवेकानंद..............आदि-आदि, ये इतनी सारी महान आत्माएं क्या हैं? ये ज़मीन ज़रूर ही उपजाऊ रही होगी. वेद, उपनिषद हमारे ज्ञान का बेहतरीन नमूना बेशक हैं लेकिन कब तक इन्ही नामों के सहारे अपने को महान मनवाएंगे….अब और नया उपनिषद कोई क्यों नहीं लिखता…..हज़ारों सालों से क्यों भारत कुछ रचनात्मक नहीं कर पाया? ज़रुरत है आगे आने वाली पीढ़ी को इस तरह तैयार करने की कि वो कुछ मौलिक कर सके. अभी तो सब कुछ उधार ही चल रहा है, शिक्षा, संगीत, कला, भाषा….सब कुछ नक़ल है. और तुर्रा ये है कि इस नक़ल को ही अब ऊँची नज़र से देखा जाता है, हर वो इंसान जिसे अपनी खुद की किसी ऐसी चीज़ से प्यार हो पिछड़ा समझा जाता है.
ये देश फिर से उस उंचाई पर जा सकता है….हालात पूरी तरह निराशाजनक नहीं है….ज्यादा पुरानी बात नहीं है, अभी, इसी सदी में कुछ बहुत महान आत्माएं हुई हैं ....शिर्डी के साईं बाबा, कृष्णमूर्ति और ओशो……इतने महापुरुष आते हैं और चले जाते हैं लेकिन क्यों हम लोग सोये ही रह जाते हैं? अब भी समय है स्वतंत्रता दिवस एक मौका है अवलोकन का और कमियों को दूर करने का…हम इस तरह मनाएं ये दिन कि अपने अन्दर की हर तरह की गुलामी से हम आज़ाद हो जाएँ….किसी और की फिक्र छोड़ दें….एक आदमी अगर बदलता है तो उसके आस-पास का माहौल अपने आप बदलने लगता है, बिना कुछ किये ….कभी ना कभी आस-पास के लोग भी बदल जायेंगे. किसी शायर ने क्या अच्छी बात कही है - "कौन कहता है कि आसमान मे सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों"
तो इसी कामना के साथ कि हम अपनी हर तरह की गुलामी से आज़ाद हों ….स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

-अनिरुद्ध शर्मा

Tuesday, June 29, 2010

पृथ्वी पर इस्लाम का समय अब पूरा हो चुका है ?

अमेरिका में कार बम विस्फोट के सिलसिले में पाक-अमेरिकी नागरिक गिरफ्तार. ये कुछ दिनों पहले की खबर है और इस तरह की खबरें अमूमन हर थोड़े दिन में सुनने में आती हैं. दुनिया धीरे-धीरे दो भागों में बंटती जा रही है - एक इस्लामिक और एक गैर-इस्लामिक. ये सच है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता और ये भी सच है कि दुनिया का 8० फीसदी आतंकवाद इस्लामिक आतंकवाद है. मेरी बात को अन्यथा कतई न लिया जाए, मैं एक धर्म के रूप में इस्लाम का सम्मान करता हूँ. मैं पैगम्बर मोहम्मद के जीवन से वाकिफ हूँ. मोहम्मद का पूरा जीवन लड़ाइयों में बीता लेकिन फिर भी उनका सन्देश शांति और भाईचारे का था. लडाइयां उनकी मजबूरी थी क्योंकि वो समय, वो परिस्थितियाँ कुछ और थी. आदमी जंगली था और आपसी लड़ाइयों में उलझा हुआ था, उसे एकजुट करने के लिए उन्होंने सबको जीता. लेकिन समय बदलने के साथ बहुत सी चीज़ें बेकार हो जाती हैं, सिर्फ वस्तुएं ही नहीं, विचार और क़ानून-कायदे भी बेकार हो जाते हैं. वो समय कब का बीत चुका. उस समय की दुनिया और आज की दुनिया में ज़मीन-आसमान का फर्क आ चुका है लेकिन इस्लाम के अनुयायी इसे स्वीकार करने से इनकार करते हैं, वे वक़्त के साथ चलने को अधर्म मानते हैं. वे आज भी वही जंगली और बर्बर जीवन शैली अपनाए रहना चाहते हैं. उनका समय, उनके विचार जड़ हो गए हैं, एक ही जगह रुक गए हैं और बहता पानी अगर रुक जाए तो वो सड़ जाता है. यही हुआ है. गैर-इस्लामिक लोग अगर इस्लाम को न समझ पायें तो बात समझ में आती है लेकिन इस्लाम का दुर्भाग्य ये है कि उसके अनुयायी ही उसे नहीं समझ पाए. आज क्या इस्लामिक और क्या गैर इस्लामिक सब उसे जिहाद का पर्याय ही मानते हैं मानो अगर क़त्ले-आम न हो तो वो इस्लाम ही नहीं है. मैं ऐसा नहीं कहता कि सभी मुस्लिम उसे जिहाद मानते हैं लेकिन ऐसा मानने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है और समझ वालों की कम वरना पढ़े-लिखे और अच्छे घरों के नौजवान क्यों आतंकवादी बनाते. इस्लाम अपने शुद्ध रूप में खूबसूरत है लेकिन उस शुद्ध रूप को समझने वाले लोग कब के ख़त्म हो चुके जिस तरह अब हिन्दू धर्म के शुद्ध रूप को समझने वाले लोग भी कम होते जा रहे हैं. आज जो संस्कृति का झंडा उठाये हुए हैं वे कपड़ों को ही धर्म समझते हैं। उन्हें उसके उच्च मूल्यों का ज्ञान तो दूर, आभास भी नहीं है. वे ठीक इस्लामिक आतंकवादियों की कार्बन-कॉपी होते जा रहे हैं. खैर, हमारा विषय ये नहीं है, बात हो रही है इस्लाम की. सोचने वाली बात ये है कि अब जब दुनिया आगे की ओर बढ़ रही है ऐसे में इस्लाम का ये पिछड़ापन उसके लिए चुनौती है. कोशिश की जा सकती है कि उन्हें इस्लाम का सही अर्थ समझ में आये लेकिन जड़ हो चुकी बुद्धि में कुछ भी उतरना लगभग असंभव हो जाता है. तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर इस्लाम का समय अब पूरा हो चुका है, उसे जो भलाई इंसान की करनी थी वो उसने कर दी और अब सिर्फ नुकसान ही उसकी झोली में बचा है जो उसके अपने ही लोगो ने डाला है.
इस्लामिक संस्कृति ने हमें बहुत सी खूबसूरत चीज़ें दी हैं इसमें कोई शक नहीं. बहुत सी समृद्ध कलाएं जैसे भवन निर्माण जिसका बेहतेरीन नमूना ताजमहल है. लेकिन ये सब इतिहास बन चुका है, मौजूदा स्थितियों में वो कुछ भी रचनात्मक नहीं दे रहा है बल्कि जो कुछ भी रचनात्मक है उसे ख़त्म कर रहा है.
इन परिस्थितियों में दो ही बातें हो सकती हैं, या तो मुस्लिम धर्म के कुछ ऐसे नुमाइंदे सामने आएं जो दुनिया को उसका सही मतलब समझाएं और उसे तरक्की के रास्ते पर ले जाएँ या फिर इस्लाम शांतिपूर्वक दुनिया से विदा हो जाए क्योंकि आखिर में जो बात मायने रखती है वो ये है कि इंसानियत बचनी चाहिए. मैं जानता हूँ कि मेरी बात व्यावहारिक नहीं है लेकिन फिर भी वो एक रास्ता तो है और एक बार बात सामने आ जाए तो पता नहीं कब वो जोर पकड़ ले. सारे फसाद की जड़ ये है कि धर्म को ज़रुरत से ज्यादा संजीदा बना दिया गया है. आखिर धर्म क्या है? वो जीने का एक तरीका है, या यूँ कहें कि शांतिपूर्वक जीने का तरीका है, अगर उसका ये बुनियादी उद्देश्य ही पूरा नहीं हो रहा है तो फिर वो क्यों है? एक बच्चा जब पैदा होता है तो वो किसी धर्म को साथ लेकर नहीं आता. सदियों पहले की दुनिया आज की तरह नहीं थी. तब लोग इस तरह जुड़े हुए नहीं थे. सबने अपनी-अपनी जगहों और परिस्थितियों के अनुसार अपने धर्म बनाए. आज पूरी दुनिया बहुत पास-पास आ गई है. ऐसे में बहुत सारे मतभेदों के साथ नहीं रहा जा सकता. जीने के नए रास्ते अपने आप सामने आते रहेंगे और ये इंसान को ही तय करना है कि कौन सा रास्ता इंसानियत के हक में है जिसे मंज़ूर किया जाए और किसे नकार दिया जाए. एक खूबसूरत सा ख़याल ये भी है कि सभी धर्मों की अच्छाइयों को लेकर एक विश्व-धर्म बने जिसे पूरी दुनिया के लोग माने तो दुनिया कितनी सुखी और सुन्दर हो.आखिर हर इंसान अदृश्य तारों से आपस में जुड़ा है, एक ही उर्जा ने सबको बाँध रखा है फिर अगर मनुष्यता का एक हिस्सा दूसरे को आहत करता है तो वो खुद भी चैन से कभी नहीं रह सकता.

अनिरुद्ध शर्मा

Monday, June 21, 2010

उम्मीद से कम, लेकिन देखने के काबिल है 'रावण'

फिल्म जब मणिरत्नम की हो तो उम्मीदों का बेताब होना लाज़मी है. कई दिनों के इंतज़ार और अटकलों के बाद 'रावण' रिलीज़ हुई. पिछली दो फिल्मों 'काइट्स' और 'राजनीति' से बेतरह खराब हुए ज़ायके को सुधारने के लिए 'रावण' का इंतज़ार था. बेशक़ निराशा नहीं हुई लेकिन फिर भी कुछ कमी रह गई. फिल्म अच्छी है लेकिन दिल तक नहीं पहुँचती. ऐसा लगता है जैसे मणिरत्नम के कहानी कहने में वो धार नहीं रही. ये मैं उनकी पिछली फिल्म गुरु को भी ध्यान में रखकर कह रहा हूँ. गुरु अपने आप में खराब फिल्म नहीं थी लेकिन वो कहानी इस लायक नहीं थी कि उसे मणिरत्नम जैसा फिल्मकार बनाए. एक भ्रष्ट आदमी के फर्श से अर्श तक पहुँचने कि कहानी लेकिन उसमे बड़ी बात क्या है? आजकल सभी लोग किसी न किसी तरह की जुगाड़ से ऊपर जाते हैं, हाँ, अगर अपने उसूलों पर कायम रहकर कोई वहां पहुंचे तो वो शख्स कहानी बन जाता है. और पीछे जाएँ तो याद आती है 'युवा', जिस पर मणिरत्नम के तगड़े दस्तखत थे. युवा की हर चीज़ मणिरत्नम के अद्वितीय होने को सिद्ध करती है. फिल्म में एक सशक्त सन्देश तो था ही मौजूद समस्या से निबटने का तरीका भी था. युवा दिलो-दिमाग को झकझोरती है. और भी पीछे जाएँ तो हर एक फिल्म चाहे वो 'रोजा' हो, 'बॉम्बे' हो या 'दिल से' हो, एक हूक सी पैदा करती है दिल में. और ये हूक ऐसी चीज़ है जो फिल्म को कला का दर्ज़ा देती है लेकिन आजकल दुर्लभ है. अब फिल्म का दर्ज़ा चने-चबैने के बराबर हो गया है, एक टाइम पास.
फिर से लौटते हैं रावण की तरफ. फिल्म की कहानी रामायण से प्रेरित है और वहां से शुरू होती है जहां रावण सीता का हरण करता है. यहाँ रावण उर्फ़ बीरा एक पिछड़े इलाक़े और पिछड़ी जाति का सरगना है जिससे लोग खौफ भी खाते हैं और मोहब्बत भी करते हैं. वो क्रूर है लेकिन उसका गुस्सा अन्याय के खिलाफ है और दिल की गहराइयों में कहीं कोमलता भी बरकरार है. राम उर्फ़ देव एक पुलिस अफसर है जो इलाके में नया है और बीरा को मिटाने का फैसला करता है. इसी कोशिश में बीरा की बहन को उठा कर थाने ले आया जाता है ठीक उस वक़्त जब उसके फेरे होने वाले हैं. उसे रात भर थाने में रखा जाता है और पूरा स्टाफ उसके साथ बलात्कार करता है. घर पहुँच कर बीरा को पूरी कहानी बताने के बाद वो आत्महत्या कर लेती है. यही वजह बनती है देव की पत्नी रागिनी के अपहरण की. बीरा उसे उठाता है जान से मारने के लिए लेकिन उसे बंदी बनाए रखने के दौरान वो उसके दिल की गहराइयों में उस नाज़ुकी को छू लेती है जो हमेशा छुपी रहती है और वो उसे मार नहीं पाता. जैसा कि मैंने कहा बीरा क्रूर है लेकिन शराफत उसके अन्दर मौजूद है, एक औरत को बंदी बनाता है लेकिन वासना से वो दूर है. उसे उसकी शुद्ध सुन्दरता दिखाई देती है. देव अपनी पत्नी की खोज करते हुए संजीवनी (हनुमान) से मिलता है जो इस काम में उसकी मदद करता है. आगे की कहानी बताकर मैं उनका मज़ा ख़राब नहीं करूँगा जो फिल्म देखने वाले हैं.
फिल्म की कहानी सामान्य ही है लेकिन फिर आखिर ज़्यादातर फिल्मों की कहानी सामान्य ही होती है, फर्क होता है उसे कहने के तरीके में, उसके भावों के उभार में. यहाँ कहानी सामान्य होते हुए भी फिल्म बोर नहीं करती लेकिन भावों के उभार में कमी रह गई. कुछ दोष स्क्रीनप्ले का है और कुछ अभिनय का. जैसा कि मणिरत्नम की फिल्मों में होता है, कहानी में किसी न किसी सामाजिक मुद्दे का एक तार जो आपको सोचने पर मजबूर करता है , वो यहाँ नहीं है. हालांकि उसका ज़िक्र ज़रूर है लेकिन वो इतना असरदार नहीं है कि ज़हन में उभर के आ सके. बीरा समाज के दबे-कुचले वर्ग का प्रतिनिधि है लेकिन इस तथ्य को लेकर यही छोड़ दिया गया है. इसी तरह कुछ और भाव हैं फिल्म में जो दिल को छू सकते थे लेकिन उन्हें भी शुरू करके बहुत आगे तक नहीं ले जाया गया जैसे बीरा के मन में धीरे-धीरे रागिनी के लिए प्रेम का जन्म होना और रागिनी का बीरा के बारे में नजरिया बदलना, ये सब समझ में आता है लेकिन उस शिद्दत से महसूस नहीं होता. बीरा के प्रेम की आग हम तक आंच नहीं पहुंचाती या रागिनी की करुणा हमारे अन्दर उथल-पुथल नहीं मचाती. ये सब नहीं होता इसकी एक बड़ी वजह संवाद हैं. संवादों में वो तीखापन, वो धार नहीं है जो सुनने वाले के कानों से दिल में उतर जाए. अभिनय की अगर बात करें तो सभी में कुछ कमी रह गई है. अभिषेक बच्चन बीरा के रूप में उतने खतरनाक नहीं लगे जितना उन्हें लगना चाहिए था, इससे ज्यादा खौफनाक वे युवा में लगे हैं. इसी तरह जब प्रेम मन में पैदा हुआ है तो उससे दर्द भी पैदा होता है क्योंकि वो ना हासिल होने के लिए है, वो दर्द उनके भावों में नहीं आ पाया. ऐश्वर्या आखिर कुछ अभिनय सीख गई हैं, हालांकि उसमे अब भी वो उंचाई नहीं है लेकिन उन्होंने अपने आप को इस फिल्म में पीछे छोड़ा है. देव के रूप में विक्रम के करने के लिए कुछ ख़ास था नहीं लेकिन उनके व्यक्तित्व में दम है और जितना किया है वो अच्छा है. गोविंदा एक ऐसे कलाकार है जिन्होंने अपनी प्रतिभा फूहड़ फिल्मों में बर्बाद कर दी वरना हमें अभिनय के कुछ बेहतरीन नमूने देखने को मिल सकते थे. गोविंदा बेशक एक बेहतरीन अभिनेता है और बिरले ही ऐसा हुआ है कि वे किसी अच्छे फिल्मकार के साथ किसी अच्छी फिल्म में नज़र आये हों. हनुमान के रूप में गोविंदा का अभिनय ज़रूर अच्छा है. इस दूसरी पारी में उनसे कुछ अच्छा करने की उम्मीद है. रवि किशन अच्छे अभिनेता हैं और उनके अभिनय में नज़र आता है कि ये दिल से किया गया है.
फिल्म का जो सबसे अच्छा और सबसे खूबसूरत पहलू है वो है सिनेमेटोग्राफी, फिल्म की हर एक फ्रेम बेहतरीन है. प्रकृति की खूबसूरती को पूरी तरह से परदे पर उतारा गया है. इस बात पर हम इसे एक ओरगेनिक फिल्म कह सकते हैं. पूरी फिल्म में पहाड़, नदी और बारिश की खूबसूरती फैली हुई है. फिल्म में प्रकृति खुद एक किरदार की तरह मौजूद है.
संगीत की क्या बात करें ए आर रहमान लिख देना ही काफी है. जैसा कि हमेशा होता है उनके गीत धीरे-धीरे असर करते हैं और ज़हन में घुलने लगते हैं. रहमान के गीत जितनी बार सुनें कुछ नया मिलता जाता है, कोई छुपा हुआ इंस्ट्रूमेंट, कोई धीमी सी मेलोडी. बड़ा दुःख हुआ ये देखकर कि एक गीत 'उड़ जा' जो रहमान की ही आवाज़ में है, फिल्म में तो है लेकिन फिल्म के ऑडियो में नहीं है. बैकग्राउंड म्यूजिक बेहतरीन है. हर एक सिचुएशन को रहमान का संगीत अलग ही प्रभाव दे देता है. वे ऐसे साज़ इस्तेमाल करते हैं जो किसी ने सोचे न हो और उनका असर जबरदस्त होता है.
ऊपर मैंने काफी खामियां गिनाई हैं लेकिन अगर फिल्म के सम्पूर्ण प्रभाव की बात करें तो फिल्म अच्छी कही जा सकती है और एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए. कुछ खामियां ज़रूर हैं लेकिन फिर भी देखने लायक है.

मैं इसे ५ में से ३.५ अंक दूंगा.

अनिरुद्ध शर्मा
--

Friday, March 26, 2010

मध्य प्रदेश का दुर्भाग्य

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का नया कारनामा. अब स्कूल में बच्चों को गीता पढना ज़रूरी है. क्या बात है, ये फैसला करके उन्होंने भगवान् कृष्ण से अपने लिए बहुत कुछ डिमांड कर डाला होगा, आखिर हमारे यहाँ धर्म का मतलब आम तौर पर मन्नत मांगना ही तो होता है और हमारे मुख्यमंत्री तो 'सिर्फ धार्मिक' ही हैं. ये अपने आप में एक बड़ा विषय है जिसके बारे में बाद में बात करेंगे, फिलहाल हम वापस अपने प्रिय मुख्यमंत्रीजी पर वापस आते हैं. गीता तो आपने थोप दी लेकिन क्या आपको खबर है कि जो पढाई ज़रूरी है एक बच्चे को आगे बढ़ने के लिए वो भी हो रही है या नहीं? स्वाभाविकतः नहीं, वरना मध्यप्रदेश को देश के सबसे पिछड़े राज्यों में एक नहीं गिना जाता. ये तथ्य है कि मध्यप्रदेश के बच्चों को बाहर जाकर प्रतियोगिता करना भारी पड़ता है. लेकिन मुख्यमंत्रीजी को इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि उन्होंने इतना सोचा भी होगा मुझे नहीं लगता. उनके अब तक के कार्यकाल में उन्होंने जो भी काम किये हैं वे उनकी बेहद सतही सोच को ही दर्शाते हैं. वो एक मुख्यमंत्री की तरह नहीं बल्कि किसी मोहल्ले की गणेश मंडली के अध्यक्ष की तरह सोचते हैं और राज्य को गणेश मंडल की तरह चला रहे हैं. स्कूलों में गीता पढ़वाएंगे लेकिन शिक्षक की जो फटीचर हालत है वो नहीं देखेंगे. प्राथमिक स्कूल के शिक्षक को एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम मेहनताना मिलता है उसमे वो क्या शिक्षा देगा बच्चों को. सच्चाई तो ये है कि जो आदमी किसी भी काम के योग्य नहीं होता (शिक्षक बनने के भी ) वो शिक्षक बन जाता है. सभी हारे हुए और अयोग्य लोग शिक्षा देने के धंधे में लगे हुए हैं तो कोई आश्चर्य नहीं कि पूरे राज्य की तस्वीर भी ऐसी ही है. मुख्यमंत्री भी ऐसे ही शिक्षकों का परिणाम लगते हैं जिन्होंने शिक्षा में विचार को कभी जगह ही नहीं दी. वैसे तो मुख्यमंत्रीजी बहुत ही लचीले हैं जिन्होंने कभी कोई मजबूत फैसला नहीं लिया लेकिन अब तक जिन बातों पर वे कड़क हुए हैं वे उनकी सोच के दीवालियेपन को ही दिखाती हैं. बानगी देखिये - जब राज्य में १ महीने तक बारिश नहीं होती तो वे महांकाल के मंदिर में जाकर ५०००० पंडों के साथ भोजन करते हैं और भगवन को बारिश की अर्जी देते हैं. अब एक आम आदमी को इस तरह की हरकत के लिए मूर्ख होने का तमगा देकर माफ़ किया जा सकता है लेकिन एक राज्य के मुखिया को नहीं. लेकिन इस एक काम के सिवा मुख्यमंत्रीजी ने पानी के मुद्दे पर कोई विचार नहीं किया, उन्हें अब भी पानी का मेनेजमेंट पूरी तरह भगवन के हाथ में ही लगता है, उन्हें ये पता ही नहीं है कि हमें ही कुछ नियम बनाने होंगे, कुछ कदम उठाने होंगे ताकि सही समय पर बारिश हो और पर्याप्त हो. मालवा में भूमिगत जलस्तर भयावह स्थिति में है लेकिन वे बेखबर हैं उन्हें लगता है कि ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि भगवन विष्णु अपने नाग पर नीचे बैठे हैं जो पानी कम नहीं होने देंगे. राज्य में पेडों की कटाई कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि उन्हें लगता ही नहीं कि ये किसी काम के हैं. दूसरी ज़ोरदार आवाज़ उन्होंने उठाई थी एक मसाज सेंटर के बोर्ड के खिलाफ....?????....क्या कर रहे हैं ये आप? आपको राज्य की बागडोर इन ओछे कामों के लिए नहीं सौंपी गई है. आपका राज्य बहुत बहुत पिछड़ा हुआ है, कभी अपने कुए से बाहर निकल कर देखिये कि दुनिया बहुत बड़ी है. अपने आप को ऊपर उठाइये, अपने कुए को और गहरा मत खोदिये. लाडली लक्ष्मी योजना को क़ानून बनाने के लिए वे बहुत आक्रामक नज़र आये लेकिन राज्य में जो गुंडों का साम्राज्य फ़ैल गया है (जिसके आका उन्ही कि पार्टी और सरकार के लोग हैं) उस पर गौर करना उन्हें ज़रूरी नहीं लगता. जहाँ भी कोई सोच-समझ से सम्बंधित मुद्दा सामने आता है वे केंद्र सरकार के ऊपर पूरी जिम्मेदारी डाल कर सो जाते हैं. ८ साल हो गए हैं उनके शासन को लेकिन प्रदेश में बिजली की समस्या में रत्ती भर भी सुधार नहीं आया है बल्कि हालात और भी बदतर हुए हैं. पहले सर्दियों में तो बिजली मिल जाती थी अब तो पूरे साल बिजली मेहमान कि तरह आती है. लेकिन ये समस्या केंद्र सरकार कि है, हम तो बस मंदिर जायेंगे और धर्म बचायेंगे तो भाई पुजारी बन जाओ मुख्यमंत्री बन कर इतने लोगों की ज़िन्दगी क्यों खराब करते हो? कहने को तो उन्होंने अपनी एक वेब साईट भी बनाई है और उस पर नागरिक अपनी समस्याएँ बता सकते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता की कोई कभी उसे देखने की ज़हमत भी उठाता होगा क्योंकि उनके आस-पास के लोग भी तो उभी की तरह के होंगे न जो भगवन भरोसे काम कर रहे हैं. मैंने कई बार उस पर पत्र लिखे लेकिन मुझे आज तक कोई जवाब नहीं आया.
हाँ, एक काम ज़रूर हो रहा है कि इंदौर में सड़कें बन रही हैं लेकिन शासन ऐसे लोगों के हाथ में है जो दूर तक कुछ सोच ही नहीं पाते या यूँ कहें कि सोच ही नहीं पाते. जब सड़के बनाई जाती है तो हर एक पहलु पर विचार किया जाता है. यहाँ सड़कें बन रही हैं लेकिन बारिश का पानी कहाँ जाएगा ये किसी ने नहीं सोचा. पानी कि निकासी कि कोई व्यवस्था नहीं है. सब तरफ कंक्रीट बिछा दिया है लेकिन ज़मीन में पानी कैसे जाएगा ये नहीं सोचा. नतीजा बारिश का पानी ज़मीन के अन्दर नहीं जाता, ज़मीन में पानी का स्तर कम होता जा रहा है. सड़कें बनाने के लिए बेहिचक हज़ारों पेड़ काट दिए जाते हैं लेकिन वापस पौधे लगाने के बारे में कोई नहीं सोचता. आश्चर्य तो ये है कि लोग भी ऐसा नहीं मानते कि सड़कों के आस-पास पेड़ होने चाहिए.
लेकिन जनाब नेता भी कोई आसमान से नहीं उतरता, वो भी जनता के बीच का ही एक आदमी होता है और मोटे तौर पर उसी जनता का चेहरा होता है. यथा राजा तथा प्रजा या यथा प्रजा तथा राजा. मध्य प्रदेश के लिए दोनों ही उक्तियाँ सही हैं. यहाँ जनता भी उलटे-सीधे गोरखधंधों में ही अपना समय ख़राब करती है, जो मुद्दे वास्तव में मुद्दे हैं उनसे उन्हें कोई सरोकार नहीं, फिर चाहे वो उनके अपने ही हित में क्यों न हो.

-अनिरुद्ध शर्मा

Sunday, October 11, 2009

अमिताभ का सही उपयोग नहीं हो पाया

महानायक अमिताभ बच्चन के 67वें जन्मदिवस पर प्रस्तुत है अनिरुद्ध शर्मा का लेख....

अमिताभ बच्चन...बड़ा नाम, बड़ा कद, बड़ी शख्सियत. इतने सालों में कितना कुछ लिखा जा चुका है उनके बारे में लेकिन मेरा इस नाम के प्रति मोह मुझे लिखने के लिये बार-बार उकसाता है। सात हिन्दुस्तानी से लेकर भूतनाथ तक का सफर सभी जानते हैं। एक अभिनेता के तौर पर वे लाजवाब हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं। उनकी शख्सियत में जादू है। मैंने उनकी लगभग हर फिल्म देखी है और उनमें से कुछ ते कईं-कईं बार देखी हैं। लेकिन फिर भी एक बात मुझे महसूस होती है कि इस कमाल की शख्सियत और बेजोड़ अभिनेता का सही उपयोग नहीं हो पाया। जैसा कि मशहूर है कि अमिताभ एक सौम्य व्यक्ति हैं और रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, यही वजह है कि वे हमेशा कुछ निहायत ही अयोग्य व्यक्तियों के बीच फंसे रहे जिनमें फिल्म की सतही जानकारी थी। बिगबी की फिल्मों में से बहुत सी फिल्में ऐसी हैं कि उनमे से अगर उन्हें निकाल लिया जाये तो कुछ भी नहीं बचता, ना कहानी, ना निर्देशन, ना संवाद...लेकिन फिर भी लोग देखते हैं और खूब देखते हैं ये जादू सिर्फ और सिर्फ अमिताभ बच्चन का है। उनकी एक फिल्म जिसे मैं जब भी मौका मिलता है देख लेता हूं वो है ” अग्निपथ ”। मेरे हिसाब से (और श्रीमती जया बच्चन के हिसाब से भी :) ) अग्निपथ अमितजी के जीवन का सर्वश्रेश्ठ अभिनय है, ये उनकी अभिनय क्षमता का चरम है जिसने एक साधारण सी कहानी को असाधारण बना दिया। इस फिल्म में उनकी संवाद अदायगी अभिनय स्कूलों में पढ़ाये जाने योग्य है। एक-एक संवाद जबरदस्त है। वैसे अगर हम उनके जीवन की बेहतरीन फिल्में चुनें तो जो नाम सामने आएंगे वे हैं- जंज़ीर, अभिमान, शोले, दीवार, अग्निपथ, त्रिशूल, काला पत्थर, शक्ति, शराबी और मैं अक्स को भी शामिल करना चाहूँगा। चुपके-चुपके इसलिये छोड़ दी क्योंकि वो मुख्यतः धर्मेंद्र की फिल्म है और आनंद में भी बिगबी का छोटा सा ही रोल था, हालांकि इन दोनों फिल्मों में भी वे कमाल ही थे। परदे पर उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है खासकर पुरानी फिल्मों में। फिल्म त्रिशूल में उनका किरदार इस मायने में बेहतरीन था। “आज मेरी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं और मैं 5 लाख का सौदा करने आया हूँ“ इस डायलॉग की अदायगी पर तालियाँ और सीटियाँ बजना लाजमी है। यश चोपड़ा ने अपने जीवन की कुछ बेहतरीन फिल्में बिगबी के साथ बनाई हैं जैसे दीवार, काला पत्थर, त्रिशूल। कभी-कभी और सिलसिला भी यश चोपड़ा की ही फिल्में हैं लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर इन दोनों फिल्मों को पसन्द नहीं करता क्योंकि इनमें नौटंकी तत्व की प्रधानता थी जो आजकल यशराज बैनर की फिल्मों का स्थाई फार्मूला है, अविश्वसनीय तरीकों से रोना-धोना और भावनाओं का भौंडा प्रदर्शन। दूसरे फिल्मकार जिनके साथ बिगबी ने काफी फिल्में की हैं वे हैं मनमोहन देसाई। देसाई साहब एक बेहद सीमित प्रतिभा वाले फिल्मकार थे। उन्होंने एक ही कहानी में फेर बदल कर-कर कई-कईं फिल्में बनाईं। लेकिन वे किस्मत के धनी थे और उनकी फिल्में सफल रहीं लेकिन एक समय तक ही क्योंकि दर्शक को मूर्ख बनाकर लंबी पारी नहीं खेली जा सकती इसलिये बाद की उनकी फिल्में अमिताभ बच्चन के नाम के बावजूद पिट गईं। एक फिल्म जो वास्तव में हर मायने में अच्छी है वो है शक्ति सामंत की ”शक्ति”। अच्छी कहानी, अच्छी पटकथा, अच्छे संवाद और बेहतरीन अदाकारी अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार की। बाप-बेटे के रिश्तों पर बनी इस फिल्म का विषय उस समय के ट्रेंड को देखते हुए नया और अच्छा था। सबसे बड़ी बात कि इसमें भावनाओं को बिना लाउड हुए प्रदर्शित किया गया था जिसमें योगदान दिलीप कुमार और बिगबी के अभिनय का भी था। मेरी एक और पसंदीदा फिल्म है जिसमें बिगबी का अभिनय अपनी बुलंदी पर है, वो है ”शराबी”। शराबी प्रकाश मेहरा की फिल्म थी जिन्होंने अमिताभ कों पहली बार बतौर नायक जंज़ीर में पेश किया था। प्रकाश मेहरा ने व्यावसायिक फिल्में बनाईं लेकिन अपने स्तर पर अच्छी ही बनाई। ”मुक़द्दर का सिकंदर” भी उनकी अच्छी फिल्मों में एक है। अमिताभ हृषिकेश मुखर्जी के बहुत बड़े प्रसंशक हैं जिन्होंने सबसे पहले अपनी फिल्म आनंद में उन्हें एक महत्वपूर्ण किरदार दिया था और अमिताभ ने भी उस किरदार में जान डाल दी थी। आनंद मेरी सबसे प्रिय फिल्मों में से एक है। इसके अंत के उस दृश्य में जहां डॉक्टर को पता चलता है कि आनंद मर चुका है, अमिताभ ने वो रुदन किया था कि आज भी देखता हूँ तो आँखों में आँसू आ जाते हैं। इसके बाद उन्होंने हृशिदा के साथ अभिमान, नमक हराम, चुपके-चुपके आदि फिल्मों में काम किया। 80 के दशक के मध्य में अमिताभ का सितारा गर्दिश में था लेकिन इसमें उनका फिल्मों का चुनाव भी एक कारण था। उन्होंने संबंधों की खातिर ऐसी वाहियात फिल्में कीं कि उन्हें देखना किसी सज़ा से कम नहीं। ”मर्द, कुली, जादूगर, तूफान, अकेला...“ ये ऐसी फिल्में हैं जो आजकल किसी ना किसी चैनल पर रोज़ आ रहीं हैं लेकिन इन्हें देखना सहनशक्ति की कठोर परीक्षा है। एक बात मैं अक्सर सोचता हूँ कि जब अमिताभ खुद ये फिल्में कभी देख लेते होंगे तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा या कि उन्होंने ये फिल्में कभी देखी ही नहीं हैं। तूफान में एक विचित्र वेशभूषा पहने, जादूगर में फूहड़ हरकतें करते। शायद इस दौर में वे अति आत्मविश्वास से पीड़ित हुए थे। कुली में जब उनके साथ दुर्घटना हुई थी और पूरे देश में दुख की लहर फैल गई थी तब उन्हें अपने पर शायद ये भरोसा हो गया था कि वे कुछ भी करें चलेगा। उस दौर में एक फिल्म ज़रूर ऐसी आई थी जो बिल्कुल अलग थी, ”मैं आज़ाद हूँ”। ये फिल्म उस समय बनती कला फिल्मों की श्रेणी में है। मुझे याद है तब मैं ये सोचकर खुश हुआ था कि अब उनके अभिनय का बेहतरीन नमूना देखने को मिलेगा लेकिन उसके बाद ऐसी किसी फिल्म में उन्हें देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ लेकिन मैं एक सच्चे भक्त की तरह उनकी हर फिल्म देखता और उसकी तहेदिल से तारीफ भी करता था। फिर मुझ पर गाज गिरी जब उन्होंने 5 साल के लिये ब्रेक की घोषणा कर दी। मुझे बहुत गुस्सा भी आया लेकिन मैं बेचारा क्या कर सकता था? फिर 5 साल बाद उनकी वापसी की घोषणा हुई और मैं जितना खुश हुआ, मैं नहीं समझता कोई और उतना हुआ होगा। उनकी वापसी वाली फिल्म थी ”मृत्युदाता”। मैं बहुत उत्साहित था और पहले दिन ही मैंने फिल्म देखने का निश्चय किया था। मैंने अपने सभी साथियों से कहा लेकिन कोई भी फिल्म देखने के लिये राजी नहीं हुआ तो मैं अकेला ही चला पहला दिन, पहला शो। अंदर मेरी जो गत हुई मैं क्या कहूँ। ये फिल्म मेरे उत्साह के लिये सचमुच मृत्युदाता ही साबित हुई। दुनिया की सबसे बकवास फिल्मों में से एक थी ये फिल्म। मेरा मन खट्टा हो गया और ये फिल्म भी बुरी तरह पिट गई। फिल्म के निर्देशक मेहुल कुमार थे जिन्होंने और भी बहुत सी घटिया किस्म की फिल्में बनाई हैं। वे मनोज कुमार की नकली देशभक्ति के उत्तराधिकारी थे। इतना ही काफी नहीं था कि अमिताभ ने मेहुल कुमार के साथ एक और फिल्म "कोहराम” की जिसे आज तक मैं 10 मिनट से ज़्यादा नहीं देख पाया हूँ।

जैसा कि मैंने कहा, अमिताभ की प्रतिभा का पूरा उपयोग नहीं हो पाया और वे हमेशा गलत लोगों के बीच फंस गये। उनकी तीसरी पारी जो चरित्र भूमिकओं के साथ शुरु हुई उसमें भी वे आदित्य चोपडा और करण जौहर जैसे लोगों से घिर गये जो फिल्मकार नहीं बिजनेसमैन हैं, जो फिल्मों में कहानी, पटकथा, चरित्र-चित्रण को महत्व नहीं देते बल्कि मार्केटिंग पर ज़्यादा विश्वास रखते हैं। इन्हीं लोगों के बीच रहकर शाहरुख खान ने एक दशक से अभिनय नहीं किया है। अमिताभ बच्चन के फिल्म मोहब्बतें में एक बेहद कमज़ोर और अपमानजनक किरदार दिया गया। फिर करण जौहर ने ”कभी खुशी कभी गम” में उन्हें अपमानित किया जिसमें सभी लोग पूरे वक्त बिना बात के रोते रहते हैं। इस पारी में एक बात और नज़र आती है कि अमिताभ को कहीं ये ग्रंथि मन में बैठ गई कि वे बिगबी हैं और जो सहजता दीवार के वक़्त उनके अभिनय में दिखाई देती थी वो गायब हो गई। ”ब्लैक” की चाहे जितनी भी तारीफ हुई हो लेकिन बिगबी ने फिल्म के अंत को छोड़कर पूरी फिल्म में ओवरएक्टिंग की है। ”कांटे” उनके कॅरियर पर एक धब्बा है जो कि बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म थी। लेकिन इस पारी में भी जब भी उनके लायक कोई किरदार और निर्देशक उन्हें मिला उन्होंने वही जौहर दिखाए हैं, जैसे ”अक़्स”। इस फिल्म में उनका अभिनय उनके जीवन के सर्वश्रेष्ठ में से एक है। ”आँखें” भी अच्छी फिल्म थी। एक फिल्म आई थी ”फैमिली” जिसमें बिगबी का जबर्दस्त किरदार था। इसमें फिर वे अपने पूरे फॉर्म में हैं। इस फिल्म के अंत का दृश्य ज़रूर देखना चाहिये जिसमें फिर उसी महान अभिनेता के दर्शन होते हैं हालांकि ये फिल्म चली नहीं क्योंकि फिल्म का नायक अभिनयशून्य था। पिछले वर्ष आई फिल्म ”द लास्ट लीयर” ने फिर से मैं आज़ाद हूँ वाली उम्मीद जगा दी। ये फिल्म कला का नमूना है।

अब बस करता हूँ क्योंकि ये विषय तो इतना बड़ा है कि मेरे हाथ रुक ही नहीं रहे हैं, बातें खत्म ही नहीं हो रहीं हैं। अंत में इस उम्मीद के साथ इतिश्री करता हूँ कि निकट भविष्य में बिगबी के अभिनय के विविध रंग अपनी पूरी छटाओं के साथ हमें देखने को मिलेंगे। उनकी जल्द ही आने वाली फिल्में हैं ”अलादीन” और ”पा”।

धन्यवाद!

--अनिरुद्ध शर्मा

Saturday, September 19, 2009

गुमराह- बी आर चोपड़ा की बेहतरीन फिल्मों से एक है

फिल्म चर्चा

गुमराह जो सन 1963 में आई थी, बी आर चोपड़ा की बेहतरीन फिल्मों में से एक है, और उनकी अन्य फिल्मों की तरह इसमें भी एक सामाजिक मुद्दे को उठाया गया था। फिल्म शुरू होती है रामायण के एक दृश्य से जिसमें रावण राम की कुटिया के सामने भिक्षा माँगने आता है। जब लक्ष्मन राम की पुकार सुन कर जंगल में गये हैं और सीता की सुरक्षा के लिये लक्षमण रेखा खींच कर गए हैं। सीता रावण की बातों में आकर उसे पार कर लेती हैं और रावण उनका अपहरण कर लेता है। बस यही फिल्म की थीम है। एक स्त्री के अपनी मर्यादा को लांघने का और उससे उपजी परिस्थितियों का।

मीना (माला सिन्हा) और कमला (निरुपा रॉय) नैनीताल के एक व्यापारी की दो बेटियाँ हैं। मीना राजेंद्र (सुनील दत्त) से प्रेम करती है जो कि एक चित्रकार और गायक है। कमला शादीशुदा है और उसके पति अशोक (अशोक कुमार) बंबई में एक वकील हैं। कमला के दो बच्चे हैं जो अपनी मौसी से बहुत प्रेम करते हैं। कमला अपने तीसरे बच्चे के प्रसव के लिये नैनीताल आती है जब उसे मीना के प्रेम प्रसंग के बारे में पता चलता है और वो उसकी और राजेंद्र की शादी की बात अपने पिता के सामने रखने की हामी भरती है लेकिन उससे पहले ही बच्चे को जन्म देते समय उसकी मौत हो जाती है। अशोक को गहरा सदमा लगता है। मीना के पिता कमला के बच्चों के लिये चिंतित हैं कि उन्हें माँ की ज़रूरत है और अगर उनकी सौतेली माँ आई तो पता नहीं उनके साथ कैसा व्यवहार करे। इसी सोच के चलते वे मीना को अशोक से शादी करने के लिये राजी कर लेते हैं क्योंकि बच्चे मीना को माँ की तरह मानते हैं। मीना अपने प्रेम की कुर्बानी देकर अशोक से शादी कर लेती है और बंबई चली जाती है। कुछ दिनों बाद अचानक उसे राजेंद्र वहाँ मिल जाता है जिसकी एक गायक के रूप में अशोक से भी जान-पहचान हो जाती है। राजेंद्र मीना के घर आने-जाने लगता है और इस तरह उनका छुप-छुप कर मिलना फिर शुरू हो जाता है। मीना का मन उसके काबू में नहीं रहता और मना करते-करते भी वो उससे नियमित रूप से मिलने लगती है। एक दिन अचानक मीना के राजेंद्र से मिलकर लौटते हुए एक औरत लीला (शशिकला) पकड़ लेती है जो खुद को राजेंद्र की पत्नी बताती है, लीला उसे ब्लैकमेल करने लगती है। मीना राजेंद्र के प्रेम और लीला के डर के बीच बुरी तरह फंस जाती है। इधर अशोक के सामने भी वो घबराई सी रहती है। अंत में भेद खुलता है, इसमें एक रहस्य है जो मैं उजागर नहीं करूँगा वरना आपका फिल्म देखने का मज़ा कम हो जायेगा। मीना को अंत में अपने कर्तव्य का अहसास होता है और वो राजेंद्र से संबंध तोड़ लेती है।

फिल्म एक संवेदनशील कहानी को बहुत प्रभावी तरीके से कहती है। फिल्म का प्रवाह औरर घटनाक्रम मानवीय भावनाओं पर निर्देशक की मजबूत पकड़ दर्शाता है। कैसे इंसान अपनी भावनाओं के प्रवाह में कमज़ोर बनकर अपने कर्तव्य की अनदेखी करता है। फिल्म एक शादीशुदा औरत के मन की उलझन को रेशा-रेशा दिखाती है जहां वह अपने प्रेमी के लिये अपनी भावनाओं और अपने प्रति के लिये अपने कर्तव्य के बीच फंसी हुई है। आज के युग में ये फिल्म और भी प्रासंगिक है जब मन ही सब कुछ है और मन के कहने पर इन्सान कुछ भी करने में संकोच नहीं करता है। अपने लिए कोई कठोर निर्णय लेना आज के समय में लोगों के लिए असंभव लगता है फिल्म का एक संवाद थोड़े से शब्दों मे बहुत बड़ा फलसफा बयान कर देता है जो अशोक मीना के बारे में पता चलने पर कहता है, मुझे पूरी तरह तो याद नहीं लेकिन उसका आशय कुछ यूँ था कि- “औरत ही घर बनाती है और घर से ही समाज बनता है, अगर औरत गलत रास्ते पर जाती है तो पूरा समाज भटक सकता है“। अशोक का पात्र बहुत ही समझदार दिखाया है जो अपनी पत्नी के बारे में पता चलने पर सीधे उससे झगड़ा नहीं करता बल्कि बहुत ही समझदारी से उसे सही रास्ते पर लाने की कोशिश करता है और अंत में भी उसे छूट देता है कि वो चाहे तो उसे छोड़कर जा सकती है।

निर्देशक के तौर पर बी आर चोपड़ा साहब को सलाम करना चाहिये। मैं उनका जबर्दस्त प्रसंशक बन गया हूँ। अशोक कुमार के बारे में तो मैं पहले भी कुछ नहीं कह पाया था, उनका अभिनय टिप्पणियों के परे है। वे महानतम हैं। माला सिन्हा उस ज़माने की ओवरएक्टिंग क्वीन थीं लेकिन इस फिल्म में शादी के बाद का हिस्सा उन्होंने बखूबी निभाया है। शादी के पहले बच्चों के साथ उनकी मस्ती कोफ्त पैदा करती है। इस रोल के लिये चोपड़ा साहब की पहली पसंद मीना कुमारी थी लेकिन किसी वजह से बात नहीं बनी। सुनील दत्त का मै बचपन से प्रसंशक हूँ लेकिन इस फिल्म में वे असहज लगे। शायद उनका व्यक्तित्व ऐसे कमज़ोर चरित्र के लिये उपयुक्त नहीं है, वे एक दबंग व्यक्तित्व के स्वामी थे। फिल्म का एक और मजबूत पक्ष संगीतकार रवि का मधुर संगीत है। चलो इक बार फिर से, आजा आजा जैसे मीठे गीत फिल्म देखने का मज़ा दोगुना कर देते हैं। बी आर चोपड़ा ने अपनी का संगीत हमेशा रवि से तैयार करवाया है और रवि ने हमेशा उन्हें अपना बेहतरीन दिया है।

फिल्म 5 में से 5 अंक पाने की हक़दार है।

--अनिरुद्ध शर्मा

Friday, September 11, 2009

उम्र की उल्टी गिनती पर बनी एक सीधी-सादी फिल्म


हॉलीवुड और बॉलीवुड की बहस बहुत पुरानी है और अक्सर लोग हॉलीवुड को हर तरह से बेहतर बताते हुए लम्बी-चौडी बहस करते हैं लेकिन यही लोग यहां पर बनी अच्छी फिल्म को सिरे से नकार देते हैं, ये कहकर कि यार फिल्म हल्की-फुल्की होनी चाहिये. दरअसल ये फर्क फिल्मों का नहीं, सोच का है और सोच से ही बनती है फिल्में. सिर्फ फिल्में ही नहीं ये फर्क जीवन के हर क्षेत्र में नज़र आता है चाहे वो खेल हों, विज्ञान हो या रोज़मर्रा के काम ही हों, हमारी जनता और उन्की जनता की सोच में बहुत अन्तर है. वहां लोग नये प्रयोगों के लिये हमेशा खुले होते है, और उसे प्रोत्साहित करते हैं जबकि हमारे यहां अधिकतर मानसिकता एक बंधी हुई लीक पर चलने की है, सदियों से जो निजाम चलता आया है वही चलेगा. उससे अलग जाने वाले को खामियाज़ा भुगतना पडता है. जीवन यापन के लिये अपना पेशा चुनने के वक्त भी आदमी इस लीक को छोड नहीं पाता है. यहां हर बच्चा डॉक्टर या इन्जीनियर बनने के लिये ही जन्म लेता है. यही कारण है कि हमारे यहां फैन्टेसी नही बनती हैं और वहां 'लॉर्ड ओफ द रिन्ग्स' के तीन सफल भाग बन जाते हैं.

खैर हम इस बहस में ज्यादा गहरे न उतरते हुए मुद्दे की बात पर आते हैं. मुद्दा है आज की फिल्म 'द क्यूरियस केस ऑफ बेन्जामिन बटन' जिसका विषय बिल्कुल नया है और साहसिक है. फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो बूढा ही पैदा होता है और समय के साथ उसकी उम्र घटती जाती है... फिल्म की शुरुआत होती है द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने के दिन से. उस रात एक बच्चा पैदा होता है जिसके पैदा होने के बाद उसकी मां की मौत हो जाती है. उसका पिता एक अमीर व्यवसायी है. वो जब उस बच्चे को देखता है तो उसे बेइन्तहां घृणा होती है, बच्चे के पूरे शरीर पर झुर्रियां हैं जैसे किसी 80 साल के बूढे के शरीर पर होती हैं. पिता उसे रात में एक वृद्धाश्रम में छोड देता है. वृद्धाश्रम की मालकिन एक बहुत ही सहृदय स्त्री है जो पहले ब्च्चे को देख कर घबराती है लेकिन फिर सहानुभूतिवश उसे अपने पास रख लेती है. सबको लगता है कि बच्चा मरने वाला है लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे वो बडा होता है उसकी झुर्रियां कम होती हैं और शरीर की सारी समस्याएं खत्म होती जाती हैं. वो आंख खोलने के बाद ही से वृद्धों के बीच ही रहता है और उनसे ही उसकी मित्रता होती है. अजीब अहसास से गुज़रता है वो जब एक-एक करके उसके दोस्त दुनिया से विदा होते जाते हैं और उसकी उम्र कम होने लगती है.

ऐसी ही एक वृद्ध दोस्त की 5 साल की पोती कुछ दिनों के लिये वहां रहने आती है. उसकी दोस्ती बेन्जामिन से होती है, पहले ये दोस्ती एक बुजुर्ग व्यक्ति की दोस्ती होती है लेकिन यही दोस्ती आगे चलकर प्रेम बन जाती है. प्रेम कहानी को बहुत ही सुंदर ढंग से कहानी में गूंथा गया है. लडकी की उम्र बढती है और बेन्जामिन की उम्र घटती है. इस दौरान बेन्जामिन एक बोट पर नौकरी कर लेता है और कईं बरस बोट पर ही बिताता है जीवन के बहुत से उतार-चढावों से गुज़र कर वापस अपने घर, उसी वृद्धाश्रम में जाता है. ये वो वक्त है जब उसका बुढापा पूरी तरह से जा चुका है और वो एक खूबसूरत नौजवान है. यहां वो फिर से उसी लडकी से मिलता है जिसे वो हमेशा याद करता रहा है. दोनों शादी कर लेते हैं और उन्हें एक बच्ची भी होती है लेकिन बेन्जामिन अपनी घटती हुई उम्र से चिन्तित है, उसे लगता है कि जब उसकी बच्ची को एक पिता की छाया की ज़रूरत होगी, वो खुद इस हालत में होगा कि उसकी देखभाल के लिये किसी की ज़रूरत हो और उसकी पत्नी को 2 बच्चे पालने पडेंगे. वो अपनी पत्नी को बच्ची की सही परवरिश के लिये दूसरी शादी करने की सलाह देता है और एक दिन अपना सब कुछ बच्ची के नाम करके कहीं चला जाता है. कई साल इधर-उधर भटकने के बाद अन्त में वो फिर अपने घर पहुंचता है और अपनी पत्नी की गोद में दम तोडता है.

फिल्म फैन्टेसी ना होते हुए एक भावनात्मक कहानी है. निर्देशक ने बडी ही खूबी से एक असामान्य आदमी और उससे जुडे लोगों की भावनाओं को प्रदर्शित किया है. फिल्म दिल को छूती है. बेन्जामिन के रूप में ब्राड पिट ने दिल जीत लिया. उनकी पहचान एक स्टाइलिश हीरो की है लेकिन उन्होने बेन्जामिन के गहरे मनोभावों को जिया है. दाद दी जानी चाहिये मेक-अप मैन को जिसने बेन्जामिन की हर उम्र को इतनी स्वाभाविकता से दिखाया है. फिल्म का विषय बहुत बडा था जिसकी वजह से ऐसा लगता है, अन्त में इसे बहुत जल्दी समेट लिया गया. फिल्म एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिये.

मैं इसे 5 में से 4 दूंगा

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, September 04, 2009

क्या आपने 'संकट सिटी' देखी है?


अक्सर ऐसा होता है कि बड़ी फिल्मों के शोर में कम बजट की अच्छी फिल्में दब जाती हैं. ऐसी ही एक फिल्म पिछले दिनों आई थी जो लव आजकल के बेजा शोर में कब आई और चली गई पता ही नहीं चला. ये फिल्म थी 'संकट सिटी', शायद ज़्यादातर लोगों ने इसे नोटिस भी नहीं किया होगा लेकिन आज हम बात करेंगे उसी के बारे में क्योंकि ऐसी इमानदार कोशिशें व्यर्थ नहीं जानी चाहिए. मल्टीप्लेक्स ज़माने का एक फायदा तो ज़रूर हुआ है कि कम लागत की अच्छी फिल्मों को मौका भी मिलता है, दर्शक भी मिलते हैं और कभी-कभी बड़ी सफलता भी मिलती है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण है - 'भेजा फ्राई'. संकट सिटी भी फिल्मों के भेजा फ्राय तबके से ही ताल्लुक रखती है. फिल्म में कोई बड़ा स्टार नहीं है, बहुत अच्छा संगीत नहीं है बल्कि गीत इसमें हैं ही नहीं, लेकिन फिल्म दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब है.
फिल्म का प्रमुख किरदार है गुरु(के के मेनन)जो कारें चुराता है. गनपत(दिलीप प्रभावलकर) का एक टूटा-फूटा कार गैरेज है जहाँ ये दोनों मिलकर चुराई हुई कार को नया रंग-रोगन दे कर बेच देते हैं. एक बार गुरु को एक मर्सिडीज कार मिलती है जिसमे चाबी लगी हुई है लेकिन उसके आस-पास कोई नहीं है. वो उसे चुरा लेता है. गैरेज में पता चलता है कि कार में एक करोड़ रुपये रखे हैं. गुरु और गनपत ख़ुशी से पागल हो जाते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता है कि ये बुरे दिनों की शुरुआत है क्योंकि कार और पैसा दोनों एक डॉन फौजदार(अनुपम खेर)के हैं. फिर शुरू होता है चूहे-बिल्ली का खेल. फौजदार लोगों को ब्याज पर पैसा उधार देता है. वो गुरु को पकड़ लेता है और पैसा लौटाने के लिए 1 हफ्ते की मोहलत देता है. इस बीच गनपत उस पैसे को कहीं छुपा देता है और गुरु को बताने के पहले ही सर में चोट लगने से उसकी याददाश्त चली जाती है. अब गुरु को खुद ही कहीं से पैसों का इंतज़ाम करना है. दूसरी तरफ एक बिल्डर(यशपाल शर्मा) है जिसे फौजदार के 2 करोड़ रुपये लौटाने हैं. वो अपनी ज़मीन एक फिल्म प्रोड्यूसर(मनोज पाहवा) को बेच देता है. ज़मीन खरीदने के लिए प्रोड्यूसर फौजदार से ही पैसे उधार लेता है जिसे गुरु चुरा लेता है. इस तरह तीन कहानियां आपस में जुड़ जाती हैं. एक घटना से दूसरी पैदा होती है, दूसरी से तीसरी…यूँ लगता है जैसे फिल्म खुद-बा-खुद आगे बढ़ रही है. निर्देशक पंकज आडवाणी की ये पहली ही फिल्म है लेकिन उनका निर्देशन प्रभावित करता है.
के के मेनन आज के समय के एक बेहतरीन अभिनेता है, उनका स्क्रीन प्रेजेंस ज़ोरदार है. इस फिल्म में पहली बार उन्हें कॉमेडी करते हुए देखा और कहना होगा कि इस बार भी उन्होंने कमाल ही किया है. अनुपम खेर अपने नाम को हमेशा सार्थक करते हैं, एक बार फिर उन्होंने मैदान मार लिया. रीमा सेन एक अच्छी अभिनेत्री है लेकिन उसे इंडस्ट्री में वो मुकाम नहीं मिला है जिसकी वो हक़दार है. फिल्म के सभी कलाकार अपने-अपने किरदार में फिट हैं, ऐसा लगता है जैसे हरे एक किरदार ने खुद ही अभिनेता को चुना है.
बारी आती है संवाद की जो एक हास्य फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण अंग है. संवाद अच्छे हैं और चुटकियाँ दर्शक को हसाने में कामयाब है लेकिन कहीं-कहीं दर्शक को जबरदस्ती गुदगुदी करने की कोशिश की गई है जो हास्य फिल्म लिखने का सबसे बड़ा खतरा होता है क्योंकि ऐसे संवाद हसाने की बजाय चिढ पैदा करते हैं.हालांकि ऐसे संवाद बहुत नहीं हैं इसलिए उन पर ध्यान नहीं जाता.
हास्य फिल्में दो तरह की होती हैं एक, बिना दिमाग वाली(जो मेरे ख़याल से तो हास्य फिल्में होती ही नहीं हैं लेकिन लोग ऐसा मानते हैं) और दूसरी दिमाग वाली….पहली तरह की फिल्मों पर आजकल अक्षय कुमार का एकाधिकार है जो ऐसी वाहियात फिल्में करने के बाद भी सबसे मंहगे अभिनेता हैं…ये फिल्म दूसरे वर्ग में आती है. विषय अच्छा है और उसका प्रस्तुतीकरण भी अच्छा है. बेशक फिल्म भेजा फ्राय के स्तर तक नहीं पहुच पाई लेकिन फिर भी एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए.

5 में से 3 अंक दिए जाने चाहिए

अनिरुद्ध शर्मा

Saturday, August 29, 2009

50 हज़ार पंडों के पेट में बादल की फैक्ट्री !


स्वाहा...

हमारे मध्यप्रदेश ने कमाल कर दिया और अब तक किसी को पता भी नहीं चला. देश भर में बारिश को लेकर चिंता फैल रही है, सब बादलों की ओर टकटकी लगाये हुए हैं. वैज्ञानिक चिंतित हैं कि कैसे बारिश होगी, पर्यावरणविद पर्यावरण के नष्ट होने की दुहाई दे देकर खुद मुरझा गए हैं, लेकिन हमारे प्रदेश के लोगों ने और सरकार ने रास्ता खोज लिया है. जब भी हमें बारिश करवानी होती है, हम बस एक यज्ञ या हवन करते हैं, किसी अफीमची पुजारी को घोड़े पर बैठाते हैं, डीजे वाली गाडी आगे चलाते हैं और फुरसती लड़कों को उसके आगे नचा-नचाकर जुलूस निकालते हैं. अगले दिन बहुत संभव है कि १०-१५ लीटर पानी बरस जाए. अगर बरस गया तो अफीमची अपने संत होने को खुद भी सच मानकर ख़ुशी में और अफीम पीता है और नहीं बरसा तो भगवान की मर्ज़ी.
क्या गाँव क्या शहर, हमारे प्रदेश के सारे निवासियों की समझ एक सी उर्वर है. और विकसित शहरों की तरह वे ट्रैफिक जाम आदि भौतिक समस्याओं को महत्त्वपूर्ण नहीं मानते, वे तो किसी भी व्यस्ततम मार्ग पर भजन-कीर्तन करने बैठ जाते हैं. सच है, भाई तुम्हारा ट्रैफिक बड़ा कि पानी...और हमारे भजन-कीर्तन से जो पानी बरसेगा उसका तुम उपयोग नहीं करोगे क्या? फिर खड़े रहो एक घंटे और भजन सुनो.
अभी आप देखेंगे तो प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में रोज़ यज्ञ होते हैं और यही वजह है कि कभी-कभी बूंदा-बंदी हो जाती है क्योंकि भगवान् को 'अपने वाले' का ध्यान तो रखना पड़ता है न? मैं तो कहता हूँ कि हमारे मुख्यमंत्रीजी को इस युक्ति का पेटेंट करवा लेना चाहिए वरना अगर अमेरिका को पता चला तो वो करवा लेगा. फिर वहां यज्ञ-हवन से बारिश होगी और आपको इसके लिए उनकी अनुमति लेनी होगी.
बात निकली है तो हमारे पूज्यनीय मुख्यमंत्रीजी का भी गुणगान कर ही लेता हूँ. बहुत भले पुरुष हैं, उनकी नाक के नीचे लोग करोडों का हेर-फेर कर देते हैं लेकिन वे प्राणी मात्र में ईश्वर को देखते हुए उसे उनका भोग समझ कर धन्य हो जाते हैं. वे भी जनता की ही फ्रीक्वेंसी के हैं, वे भी पेड़-पौधों इत्यादि के चक्कर में नहीं पड़ते, ग्रीन हाउस इफेक्ट और ग्लोबल वार्मिंग तो शब्द ही अंगरेजी हैं और उनकी तो पार्टी ही स्वदेशी वाली है इसलिए इस पर तो वो नज़र भी नहीं डालते. और वे बारिश ना होने से चिंतित भी हैं, हालांकि उनके फोटो देखकर आप उन्हें दुनिया का सबसे खुश इंसान समझने की भूल भी कर सकते हैं. वो तो उन्हें फोटो खिचवाने का बचपन से ही शौक है इसीलिये पूरे प्रदेश में उनके बड़े-बड़े पोस्टर दिखाई देंगे.
हाँ, तो मैं कह रहा था कि वे बारिश ना होने से चिंतित हैं और मुखिया होने के नाते उन्हें इस समस्या के हल के लिए कुछ करना था. उन्होंने अपने सहयोगियों से सलाह-मशविरा किया. सहयोगी भी एक से बढ़कर एक धार्मिक पुरुष. किसी ने कहा गौ माता की पूजा करनी चाहिए, किसी ने कहा किसी संत को पकड़कर तपस्या करवा दो जब तक बारिश ना हो, फिर किसी ने बताया कि प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में सिर्फ महात्मा ही निवास करते हैं और उन महात्माओं ने बारिश की खातिर एक साथ बैठकर भोजन करना स्वीकार किया है. सो मुख्यमंत्रीजी अपने व्यस्त जीवन में से समय निकालकर उज्जैन महाकाल मंदिर पहुचे जहाँ ५० हज़ार चिंतित पण्डे भोजन के इंतज़ार में थे क्योंकि शास्त्रों में लिखा है कि पण्डे के पेट से ही हर चीज़ बनती है. इतने पण्डे जब जीम लेंगे तो इस हलुवा, पूडी, खीर आदि से पंडों के पेट में बादल बनाने लगेंगे और अंततः वही बारिश करवाएंगे. ये खोज सच में विज्ञान की बड़ी से बड़ी खोज पर भारी है. तो हमारे मुखियाजी भी अपने पेट में बादल की फैक्ट्री बनवाने मंदिर जा पहुचे. वहां ५० हज़ार पंडों ने जम कर खाया ताकि बादल बनाने में कमी ना हो. फिर मुख्यामंत्रेजी इस समस्या के सुलझ जाने से प्रसन्न हो कर और भगवान् को धन्यवाद देकर घर चले गए. ये इस बीमारू प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि सारे पंडों को एक साथ कब्ज हो गई और पेट में बादल नहीं बन पाए, और बने भी तो बाहर नहीं निकल पाए.
वैसे हमारे मुख्यमंत्रीजी बहुत धार्मिक व्यक्ति हैं. उनका मानना है कि इंसान की क्या औकात है जो वो कोई समस्या सुलझा ले, जो करता है वो ईश्वर करता है. इसीलिए वे सारी समस्याएँ उसी को पास कर देते हैं, एक तरह से कह सकते हैं कि हमारे प्रदेश का मुख्यमंत्री ईश्वर है. एक और बात वे कहना नहीं भूलते जब भी उनके सामने कोई समस्या लाई जाए कि केंद्र हमारी मदद नहीं कर रहा, इस तरह से हम एक केंद्र शासित प्रदेश भी हैं.
स्कूलों में शिक्षा बद से बदतर हो गई है, वो दे या ना दें लेकिन भोजन के पहले की प्रार्थना अनिवार्य है क्योंकि असली ज्ञान तो उसी से मिलेगा बाकी सब तो टाइम पास है. प्रदेश में बिजली नहीं है, नहीं क्या है बिलकुल भी नहीं है लेकिन आप ही सोचिये अँधेरा तो भगवान् ने बनाया है और ट्यूबलाइट किसने बनाई??? इंसान ने... तो अब ये बताइये कि इंसान बड़ा या भगवान्?? अब जवाब तो एक ही हो सकता है...तो लो हो गई हल समस्या, तुम क्या भगवान् से बढ़कर हो? क्यों बिजली के लिए रोते हो? उसी ने अँधेरा दिया है वही रौशनी देगा.
कुछ लोग होते ही हैं विध्नसंतोषी और वे ही कभी-कभी सांसारिक बातों का रोना रोते रहते हैं, कहते हैं इंदौर में हर तरफ गन्दगी हो रही है, जिधर देखो सड़ा हुआ पानी, मच्छर, कचरा...अब बताइये कितने निम्न स्तर पर जी रहे हैं ये लोग... पानी भगवान् ने बनाया और उसी ने सड़ाया...और मच्छर क्या किसी कंपनी में बनाते हैं? कभी सुना रिलायंस के मच्छर टाटा के मच्छर...? मच्छर भी तो भगवान् की देन हैं. और कचरे का क्या है...पुराने ज़माने में ऋषि-मुनियों के ऊपर तपस्या करते-करते इतनी मिट्टी जम जाती थी कि वे दिखाई देना बंद हो जाते थे और तुम इतने से में हाय-तौबा मचाने लगे? सचमुच कलयुग है. अरे कभी रामानंद सागर की रामायण देखी है? भगवान् के हाथ में से एक रौशनी निकलेगी और सारा कचरा भस्म...तुम बस पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन करते रहो.
तो ऐसे हैं हमारे लोग और नेता. सबके सब महापुरुष. धन्य हैं वे लोग जो अब तक संसार को असार समझ कर, सब उसके भरोसे छोड़कर भजन-कीर्तन में मस्त हैं.
शत-शत नमन.

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, August 21, 2009

ढेन टणन....हॉलीवुड की अच्छी नकल है कमीने



बहुत हल्ला है साहब - 'कमीने...कमीने...कमीने'. आखिर हम देख ही आये. दरअसल मुझे इंतज़ार भी था इसके प्रदर्शन का. विशाल भारद्वाज का नाम उम्मीदें जगाने के लिए काफी है लेकिन...लेकिन...मुझे बहुत दुःख हुआ कि उम्मीदें पूरी नहीं हुई.....नहीं, मैं ये नहीं कह रहा कि फिल्म बुरी है. अपने तल पर फिल्म बहुत अच्छी बनी है और मुझे मज़ा आया देखने में लेकिन खुद विशाल से ही तुलना करें तो ये उनके स्तर की फिल्म नहीं है. मकबूल, मकड़ी, ब्लू अम्ब्रेला और ओमकारा बनाने वाले फिल्मकार को मैं फिल्म के उस कलात्मक स्वरुप का झंडाबरदार मानता हूँ जो सीधे दिल की रगों को छू लेती है. याद कीजिये ब्लू अम्ब्रेला में पंकज कपूर के किरदार का बारीक मनोवैज्ञानिक चित्रण, ओमकारा का अंत जहाँ अपनी निर्दोष पत्नी को सुहागरात पर नायक मार देता है और फिर उसका पश्चाताप जो आपको हिला देता है. उनकी अब तक की फिल्में किसी न किसी रूप में आपकी संवेदनाओं को हिलाती-डुलाती है लेकिन कमीने शुद्ध व्यावसायिक विषय पर बनी विशुद्ध व्यावसायिक फिल्म है. हालांकि फिल्म का प्रस्तुतीकरण काबिले-तारीफ़ है. फिल्म पर निश्चित रूप से हॉलीवुड फिल्मकार Quentin Tarantino का प्रभाव है.
फिल्म की कहानी चिर-परिचित फार्मूले पर आधारित है(विशाल के लिए घिसे-पिटे कहना बुरा लगेगा..) . दो जुड़वाँ भाई हैं गुड्डू(शाहिद कपूर), जो हकलाता है और चार्ली(फिर शाहिद कपूर) जो तोतला है और स को फ बोलता है. गुड्डू सीधा-सादा है और चार्ली जुआरी है. एक लोकल मराठी गैंगस्टर भोपे(अमोल गुप्ते) है जो उत्तर भारतीयों से नफरत करता है और चुनाव लड़ने वाला है. गुड्डू से गलती ये होती है कि वो भोपे की बहन स्वीटी(प्रियंका चोपडा) से प्रेम करता है और शादी से पहले ही उनकी सुहागरात हो जाती है, उस पर गुड्डू उत्तरप्रदेश का मूल निवासी है. भोपे को जब पता चलता है तो वो अपने आदमियों को गुड्डू को मारने के लिए भेजता है.
दूसरी तरफ अपने पैसों की वसूली करके भागता चार्ली एक पुलिस अफसर की कार लेकर भाग जाता है. पुलिस अफसर एक गैंगस्टर ताशी के लिए काम करता है. कार में रखे गिटार केस में १० करोड़ की कोकीन है जो पुलिस अफसर ताशी के लिए ले जा रहा था. गुड्डू भोपे के आदमियों से बचकर भागता है और चार्ली गिटार लेकर...गुड्डू उस पुलिस अफसर के हाथ लग जाता है जो चार्ली को ढूंढ रहा है और चार्ली भोपे के हाथ लग जाता है. बस यहीं से आप घटनाओं का झूला झूलने लगते हैं. सब लोग गिटार के पीछे लग जाते हैं और आपस में गुत्थम-गुत्था होते हैं. घटनाओं को निर्देशक ने विश्वसनीय तरीके से एक सूत्र में पिरोया है. फिल्म दर्शक की उत्तेजना को अंत तक बरकरार रखती है बशर्ते कि दर्शक पूरी तरह एलर्ट है. किरदार फिल्मी होते हुए भी विश्वसनीय हैं. कुल मिलाकर कमीने एक रोमांचक फिल्म है. फिल्म की शुरुआत में आपको लग सकता है कि मज़ा नहीं आ रहा है लेकिन फिल्म धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत बना लेती है.
सब कुछ होते हुए भी मैं ये कहूँगा कि विशाल भारद्वाज व्यावसायिकता के लालच में पड़ गए हैं लेकिन कभी-कभी स्वाद बदलने के लिए फिल्मकार को इतनी छूट मिलनी चाहिए. फिल्म के अंत में एक संवाद है गुड्डू और स्वीटी के बीच जहाँ गुड्डू कहता है- 'मेरे पास तो ढंग के कपडे भी नहीं हैं' जिसके जवाब में स्वीटी कहती है- 'आइ लाइक यू विदाउट क्लोद्स'. इस संवाद के लिए वहां कोई सिचुएशन नहीं थी. बस बिना किसी बात के गुड्डू यूँ कहता है और स्वीटी यूँ जवाब देती है जो ये बताता है कि फिल्मकार ने ये संवाद सिर्फ इसलिए डाला है कि सड़कों पर बाद में इसके बारे में बातें हों.
अभिनय के मैदान में मुझे उम्मीद थी कि जैसे सैफ अली खान ने ओमकारा में चकित कर दिया था वैसा ही कुछ शाहिद के साथ होगा लेकिन अफ़सोस शाहिद औसत ही रहे, इतनी तरक्की उन्होंने ज़रूर की है कि शाहरुख खान की नक़ल बंद कर दी है फिर भी कहीं-कहीं अन्दर का शाहरुख बाहर आ जाता है. मुल्क के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक अभिनेता के पुत्र होने के बाद भी शाहरुख़ की नक़ल उन्हें शोभा नहीं देती जो खुद अपने किरदार में कभी उतर नहीं पाए. फिर भी शाहिद दो अलग-अलग चरित्रों को प्रर्दशित करने में सफल रहे हैं. प्रियंका चोपडा के अभिनय में पिछले कुछ समय में बहुत सुधार आया है. अमोल गुप्ते ने कमाल का अभिनय किया है. 'तारे ज़मीन पर' जैसी स्तरीय फिल्म का लेखक उतना ही स्तरीय अभिनेता भी है. सभी कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया है जिसमे कई नए चेहरे शामिल हैं. निर्देशन और संवाद उम्दा हैं. संगीत का तो कहना ही क्या, उस क्षेत्र में विशाल ने अब तक कोई समझौता नहीं किया है. बहुत दिनों के बाद वाकई अच्छे गीत किसी फिल्म में आये हैं. गुलज़ार साहब को सलाम कर-करके मेरी कमर दुःख गई है, वे किसी भी शब्द को हाथ लगाकर जादुई बना देते हैं फिर चाहे वो 'कमीने' हो या धेला, टका, पाई हो जो यूँ तो चलना बंद हो गए हैं लेकिन गुलज़ार साहब ने ऐसा चलाया कि बेशकीमती हो गए. स्क्रीनप्ले बहुत दिलचस्प और कसा हुआ है.
अंगरेजी अखबारों में समीक्षक इस बात से बेहद खुश हैं कि विशाल ने टोरेंतिनो की तरह की फिल्म बनाई है और इसकी तुलना वे बहुत सी अंगरेजी फिल्मों से कर रहे हैं लेकिन शायद वे ये भूल जाते हैं कि एक अंगरेजी अखबार में समीक्षक होने पर भी वे भारतीय ही हैं. टोरेंतिनो की फिल्में मनोरंजक होती हैं लेकिन उन्हें महान नहीं कहा जा सकता और मेरे हिसाब से विशाल उनसे ज्यादा प्रतिभाशाली हैं. वे लोग इसलिए भी खुश है कि फिल्म की नायिका जो मध्यमवर्गीय प्रष्ठभूमि से है, सेक्स के बारे में खुल कर बातें करती है और वे इसे नारी स्वतंत्रता मानते हैं. अफ़सोस ये है कि नारी स्वतंत्रता सिर्फ शराब, सिगरेट और सेक्स के इर्द-गिर्द ही घूमकर रह गई है. पुरुष तो ठीक है खुद नारी भी अपनी स्वतंत्रता इन्ही चीज़ों में खोज रही है. उन्हें ये समझना ज़रूरी है कि स्वतंत्रता पुरुष की बुरी आदतों की नक़ल में नहीं है बल्कि अपने स्वभाव की गरिमा को स्थापित करने में है.
फिल्म में एक अच्छा मुद्दा उठाया गया है लेकिन वो उठा ही रह गया. मुद्दा आजकल की नफरत की राजनीति का जहाँ महाराष्ट्र के कुछ नेता दूसरे प्रांत के लोगों के लिए नफरत फैलाकर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं. वास्तव में इन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं है, इन्हें चुनाव जीतना है बस यही इनका एकमात्र धर्म है. मेरे हिसाब से इन्हें भी आतंकवादियों में शुमार किया जाना चाहिए पर करेगा कौन? नेता खुद ऐसा करेंगे नहीं और अवाम तो कब का सो गया.
ये अलग से एक लम्बी बहस का विषय है, हम फिर से फिल्म पर आते हैं. कुछ कमियां होते हुए भी फिल्म बहुत अच्छी है. मेरा आशय इतना ही है कि पिछली फिल्मों के मुकाबले इस बार विशाल भारद्वाज थोड़े से कमज़ोर रहे.
एक बात और साबित होती है कि फिल्म की कहानी लीक से हटकर न होते हुए पुराने ढर्रे की ही हो लेकिन निर्देशक में अगर कूवत है तो वो उस पर एक बेहतरीन फिल्म बना सकता है.

मेरी तरफ से ५ में से ३.८ और आप मोल-भाव करेंगे तो ४ तक दे दूंगा लेकिन उससे ज्यादा नहीं :)

अनिरुद्ध शर्मा

Wednesday, August 19, 2009

बिना गानों वाली पहली फिल्म थी 'कानून'


क्या एक ही जुर्म के लिए किसी इंसान को २ बार सजा हो सकती है? इसी सवाल के साथ शुरू होती है बी आर चोपडा की फिल्म 'कानून' |
घटनाक्रम कुछ यूँ होता है कि कालिया (जीवन) किसी आदमी का क़त्ल कर देता है और पकडा जाता है | अदालत में पेश होने पर पता चलता है कि कालिया इसी आदमी के क़त्ल के जुर्म में २० साल की सजा काट चुका है | बस, आपका दिल यहीं दहल जाता है ये सोचकर कि कैसा अहसास होगा वो जब आदमी भगवान की दी हुई ज़िन्दगी पूरी की पूरी बिना वजह जेल में काट दे |
कालिया जज से सवाल करता है कि कानून को किसी इंसान से वो चीज़ छीन लेने का क्या हक है जिसे वो वापस नहीं कर सकता ? अद्भुत फिल्म और अद्भुत अभिनय दादा मुनि का |
बी आर चोपडा सदा से सामाजिक सन्देश देने वाली फिल्में बनाते रहे हैं | इस फिल्म में एक बेहद संवेदनशील और अहम् मुद्दा उठाया गया था जो इतने साल गुज़र जाने के बाद, आज भी मौजूं है | सवाल यह है कि क्या कानून को उन गवाहों की गवाही के आधार पर एक इंसान की कीमती ज़िन्दगी छीन लेने का हक है, जो थोड़े से लालच से बहक सकते हैं या जिनसे देखने सुनने में गलती होने की पूरी संभावना है | मनुष्य गलतियों का पुतला है, फिर उसी की बात को पूरी
तरह सच मानकर किसी की ज़िन्दगी का फैसला कैसे किया जा सकता है?
फिल्म में अशोक कुमार ने एक जज बद्री प्रसाद की भूमिका की है जो एक संवेदनशील और विचारवान व्यक्ति है | इस जज ने कभी किसी को फांसी की सजा नहीं दी | जज की एक बेटी मीना(नंदा) है जो एक वकील कैलाश(राजेंद्र कुमार) से प्रेम करती है और एक बेटा विजय(महमूद) है जो अपनी अय्याशियों के चलते एक साहूकार(ओमप्रकाश)के जाल में फंस जाता है | विजय कुछ पैसों के बदले साहूकार को एक कोरे काग़ज़ पर दस्तखत करके दे देता है | काफी समय तक पैसा नहीं चुकाने पर साहूकार उसे उसके पिता की जायदाद अपने नाम कर लेने की धमकी देता है | विजय अपनी बहन मीना से मदद मांगता है और मीना कैलाश से | कैलाश अपने काम से फुर्सत पाकर रात को साहूकार के घर जाता है और उसे कानून का डर दिखाकर वो काग़ज़ वापस ले लेता है | बातें करते हुए कैलाश को जज बद्री प्रसाद वहां पर आते हुए दिखाई देते हैं, वो पास वाले कमरे में छुप जाता है | बद्री प्रसाद अन्दर आते ही साहूकार को जान से मार कर वापस चले जाते हैं | कैलाश वहां से भागकर अपने घर चला जाता है | थोडी ही देर के बाद एक चोर खिड़की खुली देख साहूकार के घर में घुस जाता है, वहां अँधेरे में वो लाश के ऊपर गिरता है और छुरे पर उसकी उँगलियों के निशान बन जाते हैं | चोर डर कर खिड़की से वापस भागता है लेकिन गश्त मारती पुलिस के हाथ लग जाता है | उस पर मुक़दमा चलता है| कैलाश जानता है कि वो बेगुनाह है, उसकी अंतरात्मा उसे चैन से नहीं रहने देती और वो उस चोर का वकील हो जाता है | दिलचस्प बात ये है कि फैसला खुद बद्री प्रसाद को करना है क्योंकि वही इस मुक़दमे की सुनवाई कर रहे हैं | कैलाश एक बेगुनाह को सजा से बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है और आखिर बद्री प्रसाद पर उंगली उठा देता है | अब जज खुद कठघरे में खडा होता है | लेकिन इस पूरी कहानी में एक पेंच है जो अंत में खुलता है और एक ज्वलंत प्रश्न खडा कर देता है कि अगर सच्चाई का संयोग से पता नहीं लगता तो एक बेगुनाह को सजा होना तय थी क्योंकि परिस्थितिवश गवाह से भी चूक हो जाती है |
फिल्म की गति उस ज़माने को देखते हुए तेज़ है और फिल्म कहीं भी अपनी पकड़ ढीली नहीं करती | आज के ज़माने में भी जब दर्शक को घटनाओं के हाई डोज़ की आदत हो चुकी है, फिल्म अपना असर छोड़ने में कामयाब है | ये कमाल निर्देशन का है | अभिनय का श्रेष्ठतम उदाहरण देखना हो तो दादा मुनि को देखना चाहिए | नंदा की भूमिका में कुछ विशेष नहीं है | महमूद अपने चिर परिचित अंदाज़ में है | कमी है तो बस एक, राजेन्द्र कुमार...वो ऐसे अभिनेताओं में से एक हैं जिन्हें सिर्फ किस्मत के दम पर सफलता मिली है वरना इस फिल्म में चेहरे पर एक-एक भाव लाने के लिए उन्हें कितनी जद्दोजहद करनी पड़ी है वो साफ़ दिखाई देता है | चेहरे बनाने की उनकी मेहनत देखकर हमें थकान होने लगती है |
फिल्म एक और मायने में विशेष है, ये भारत की पहली बिना गीतों वाली फिल्म थी | इसके पीछे भी एक कहानी है - बी आर चोपडा साहब एक विदेशी फिल्म फेस्टिवल में शिरकत कर रहे थे तब किसी ने कहा कि भारतीय फिल्मे सिर्फ नाच-गानों का प्रदर्शन होती हैं | भारतीय नाच-गानों के बिना फिल्म नहीं बना सकते | बी आर चोपडा ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और बिना गीतों वाली कुछ बेहतरीन फिल्में बनाई |
इस फिल्म ने जो सवाल उठाया वो आज तक अपनी जगह कायम है, उस पर अब भी बहस की ज़रुरत है लेकिन एक और सवाल साथ खडा हो गया है कि ये बहस करेगा कौन और उस बहस के नतीजों को अमल में कौन लाएगा क्योंकि अब तो बौद्धिकता भी ग्लैमर की चकाचौंध की शिकार हो गई है |

फिल्म ५ में से ४.५ अंक पाने की हक़दार है |

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, August 07, 2009

एक उदास आदमी की कविता ''फॉरेस्ट गंप'


रन फॉरेस्ट रन...
पिछले कुछ दिनों से जब भी मैं किसी फिल्म के बारे में लिखने की बात सोचता हूँ, ये जुमला फुदक कर मेरे जेहन में सबसे ऊपर आ जाता है |
ये फिल्म मुझसे कह रही है कि मेरे बारे में लिखो...| और सही मायने में फिल्म वही है जो देखने के कई दिनों बाद तक आपके जेहन में घूमती रहे, जिसका स्वाद आप महसूस करने लगें |
ये फिल्म है सन १९९४ में बनी "फॉरेस्ट गंप" जिसके मुख्य भूमिका निभाई है टॉम हैंक्स ने, इतना जीवंत अभिनय कि आपको और कुछ याद ही नहीं रहता | फिल्म में टॉम हैंक्स ने एक मंदबुद्धि इंसान की भूमिका की है और इतनी कमाल की है कि अब अगर मैं सचमुच में टॉम हैंक्स को देखूं तो उनसे उसी तरह बात करने की उम्मीद करूँगा |
इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर पुरस्कार मिला था | इसके अलावा फिल्म का ऑस्कर में १३ श्रेणियों में नामांकन हुआ था जिसमे से इसे ६ पुरस्कार मिले | अन्य पुरस्कार जो मिले वो हैं - सर्वश्रेष्ठ फिल्म, निर्देशक, सम्पादन, विजुअल इफेक्ट्स, अडॉपटेड स्क्रीनप्ले | फिल्म १९८६ में इसी नाम से लिखे एक उपन्यास पर आधारित है |
फॉरेस्ट गंप आपको अपने साथ अपनी जीवन-यात्रा पर ले जाता है और उसके साथ आप कभी हसते हैं, कभी उदास होते हैं | सामान्य से कम I.Q. के साथ फॉरेस्ट अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त करता है | एक बच्चा जिसके एक पैर में लोहे की छड़ है जब भागने लगता है तो बन्दूक की गोली की तरह भागता है | अपने इसी भागने की क्षमता की वजह से उसे फुटबॉल टीम में ले लिया जाता है | उसे खेल की भी कोई समझ नहीं है, उसे किसी चीज़ की कोई समझ नहीं है. हाँ, लेकिन उसे जब कोई कुछ करने को कहता है तो वो पूरी एकाग्रता के साथ उसे करता है |
फॉरेस्ट का जीवन बहुत से संयोगों के साथ आगे बढ़ता है | वो जो भी काम करता है उसमे उसे अधिकतम सफलता मिलती है| कॉलेज के वक़्त वो फुटबाल स्टार बन जाता है, वहां से उसे आर्मी में जगह मिल जाती है जहां उसकी आज्ञाकारिता की वजह से तरक्की मिलती है | वो आज्ञाकारी है क्योंकि उसे खुद समझ में नहीं आता कि उसे क्या करना चाहिए इसीलिए वो वही करता है जो उसे करने को कहा जाए | उसकी ज़िन्दगी उसकी माँ के द्बारा सिखाये गए सिद्धांतों पर चलती है | उसे विएतनाम युद्ध में भेजा जाता है जहाँ उसकी दोस्ती बुब्बा से होती है जो एक फिशिंग कंपनी खोलना चाहता है और फॉरेस्ट को अपने साथ पार्टनरशिप के लिए राज़ी कर लेता है | एक हमले में फॉरेस्ट अपने बहुत से साथियों की जान बचाता है, अपने अफसर सहित लेकिन बुब्बा उस हमले में मारा जाता है | विएतनाम में किये कारनामे के लिए उसे बहुत से पदक मिलते हैं उसे नितम्ब पर गोली लगी होती है जिसके लिए उसे कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ता है| वहां कोई उसे पिंग-पोंग खेलना सिखाता है जिसका वो चैम्पियन हो जाता है और कई अन्तराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करता है| बाद में बुब्बा से किये वादे को निभाने के लिए वो फिशिंग कंपनी शुरू करता है जिसमे बाद में उसके साथ उसका वो अफसर भी आ जाता है जिसकी उसने जान बचाई थी, उसमे भी उसे बेहिसाब फायदा होता है और वो अरबपति हो जाता है लेकिन उसे किसी चीज़ से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, जिस तरह बिना समझे वो कोई काम शुरू करता है उसी तरह छोड़ भी देता है | अपनी सारी सफलताओं के बीच वो कई बार राष्ट्रपति से भी मिलता है लेकिन इसका भी उसे कोई महत्त्व समझ नहीं आता, जीवन उसे जैसा चलाता है वैसे ही वो चलने लगता है |
इस सारी कहानी के पार्श्व में एक प्रेम कहानी चलती है, फॉरेस्ट अपनी बचपन की दोस्त जेनी, जो कि स्कूल में उसकी एकमात्र दोस्त थी, से प्रेम करता है | वो जहाँ भी होता है, हमेशा उसे याद करता है | जेनी उसे बीच-बीच में कहीं न कहीं मिलती रहती है और फिर चली जाती है | जेनी का बचपन अच्छा नहीं गुज़रा जिसकी वजह से वो ड्रग्स और गलत लोगों से घिर जाती है और यहाँ-वहां घूमती रहती है | अंत में वो फॉरेस्ट की इच्छा पूरी होती है और जेनी उसे मिलती है लेकिन कुछ ही समय में उसकी मौत हो जाती है |
फिल्म एक कविता की तरह चलती है | आप उसके बहाव में गोते खाते रहते हैं | संवाद बेहतरीन हैं और टॉम हैंक्स की संवाद अदायगी तो माशा अल्लाह है | अभिनय सभी कलाकारों ने अच्छा किया है | फिल्म में विजुअल इफेक्ट्स भी बहुत ही अच्छे हैं जहाँ फॉरेस्ट को अमेरिका के तीन राष्ट्रपतियों के साथ हाथ मिलाते हुए दिखाया गया है, उसे एल्विस प्रेस्ले से बात करते हुए भी दिखाया गया है और हमें बिलकुल पता नहीं चलता कि ये तकनीक का कमाल है | कैमरा, संगीत और बाकी सभी विभाग फिल्म के स्तर को बनाए रखने में बराबर का योगदान देते हैं |
फिल्म कई जगहों पर ज़िन्दगी की फिलॉसफी को बताती हुई लगती है | फॉरेस्ट के साथ जो भी होता है वो उसे स्वीकार करके आगे बढ़ जाता है और जीवन में कई कामों को सफलतापूर्वक अंजाम देता है | असल में जीवन जीने कि कला भी तो यही है कि जो बीत गया उसे छोड़कर निर्विकार भाव से आगे बढ़ते जाएँ, न सुख उत्तेजना दे, ना दुःख हताश करे...

एक बेहतरीन फिल्म जिसे एक बार ज़रूर देखा जाना चाहिए...
५ में से ४.५ अंक |

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, July 31, 2009

मुट्ठियां भींचो कि कहीं पंजे निकल आएं....



मैं आज बार-बार अपने हाथों की मुट्ठियाँ बना-बना कर देख रहा हूँ कि शायद वोल्वरीन जैसे पंजे निकल आयें हा हा.. ऐसा जादू होता है फिल्मों में कि इंसान उसे हकीकत में देखने की ख्वाहिश करने लगता है जी हाँ, आज ही 'X Men Origins - Wolverine' फिल्म देखी है मेरे एक मित्र की धर्मपत्नी एक्स मेन श्रंखला से इतनी प्रभावित है मेरे मित्र को कहती है- "तुम अपने हाथों में वोल्वरीन की तरह पंजे लगवा लो न"
बहरहाल बात करते हैं फिल्म के बारे में... फिल्म की कहानी बदले पर आधारित है और जैसा कि बदले के लिए ज़रूरी है कि हीरो के परिवार या फिर प्रेमिका के साथ कोई हादसा होना चाहिए और फिर उसे करने वाले को गायब हो जाना चाहिए जिससे हीरो फिल्म में उसे ढूंढता रहे... इस दौरान उसे कुछ साथी भी मिलते हैं जो इस राह में शहीद हो जाते हैं...यही सब कुछ इस फिल्म में भी है....वैसे इस थीम पर आधारित फिल्मों की स्टोरीलाइन लगभग एक जैसी ही होती है लेकिन जो चीज़ मायने रखती है वो है प्रस्तुतिकरण, और इस क्षेत्र में एक्स मेन ओरिजिंस को पूरे-पूरे अंक मिलेंगे.. बेहद दिलचस्प प्रस्तुतीकरण, रोमांचक घटनाक्रम, कुल मिलाकर फिल्म दर्शक को अपने सामने बैठाए रहती है....
ये फिल्म इस श्रृंख्ला की पहली ३ फिल्मों के आगे की कहानी ना होकर उसके पहले की कहानी है....पहली 3 फिल्मों में हीरो पूरी कहानी अकेले आगे नहीं बढाता लेकिन इस फिल्म में वोल्वरीन अकेला हीरो है....ह्यू जैकमैन ने वोल्वरीन को इस तरह जिया है कि मुझे शक है कहीं उनके सच में पंजे ना निकलने लगे हों... कहानी १८४५ से शुरू होती है जब वोल्वरीन जेम्स लोगन नाम का बच्चा है जो अनजाने में अपने पिता को क़त्ल करके घर से भागता है और उसका भाई विक्टर उसके साथ जाता है.....दोनों आर्मी में भर्ती हो जाते हैं और बहुत साड़ी लड़ाईयां लड़ते हैं... दोनों ही भाई म्यूटेंट हैं... विक्टर स्वभाव से खूंखार है और उसके विपरीत लोगन एक इंसाफपसंद और नरमदिल इंसान है....सेना का एक कर्नल विलियम स्ट्राइकर एक म्यूटेंट सेना बना रहा है और इन दोनों को अपने साथ ले जाता है लेकिन वो अपने स्वार्थ के लिए इनसे बेगुनाह लोगों की ह्त्या करवाता है जो लोगन को पसंद नहीं आता और वो इन्हें छोड़कर चला जाता है.... 6 साल गुज़र जाते हैं, लोगन शाति से अपनी प्रेमिका के साथ अपनी जिन्दगी जी रहा है, तभी स्ट्राइकर एक षड्यंत्र रचता है जिसके तहत विक्टर लोगन की प्रेमिका को मार देता है...बस यहीं से बदले की कहानी शुरू होती है जिसमें धोखे से लोगन की हड्डियों में admantiam नामक धातु भर दी जाती है, लोगन विक्टर को ढूंढता है, स्ट्राइकर से टकराता है और उसके गुप्त ठिकाने को तहस-नहस कर देता है लेकिन आखिर में अपनी याददाश्त खो देता है....फिल्म एक रोमांचक यात्रा है जिसमें कई क्षण ऐसे आते हैं जब आप अपने शरीर की नसों में तनाव महसूस करते हैं.... फाइट सीक्वेंस बहुत अच्छे हैं, फिल्म की गति तेज़ है... अभिनय सभी कलाकारों ने अच्छा किया है जिसमे सबसे ऊपर है ह्यू जैकमैन उर्फ़ लोगन... फिर लीव स्क्रैबर, जिन्होंने विक्टर का किरदार स्वाभाविक तरीके से निभाया है.....ग्राफिक्स पिछली तीनों फिल्मों की तरह ही अच्छे हैं...
अब कुछ कमियों की बात करें....सबसे बड़ी कमी अगर देखें तो कहानी ही है, जिसमे नया कुछ नहीं है जबकि पिछली तीनों फिल्मों में बहुत कुछ था...कहानी हजारों बार दोहराई जा चुकी है, हॉलीवुड में भी और बॉलीवुड में भी बहुत से दृश्य यूँ लगे जैसे कोई हिंदी मसाला फिल्म देख रहें हैं जैसे भाई-भाई का अंत में दुश्मन से एक साथ लड़ना, नायक-नायिका का लड़ाई के मैदान में प्यार भरी बातें करना आदि कुछ बातें हजम नहीं होती... जैसे विक्टर कहाँ चला जाता है? अंत में चार्ल्स कहाँ से आ जाता है? लेकिन कुल मिलाकर फिल्म अच्छी है और एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए
मैं अपनी तरफ से इसे ५ में से ३.५ अंक दूंगा

अनिरुद्ध शर्मा

Thursday, July 23, 2009

शतरंज के खिलाड़ी

अनिरुद्ध शर्मा यूं तो इंजीनियर हैं मगर फिल्मों का शौक इतना है कि हर रोज़ नहाने-खाने की तरह फिल्म देखना ज़रूरी मानते हैं.....अनिरुद्ध ने बैठक पर हर शुक्रवार को किसी एक फिल्म के बारे में अपनी राय लेकर हाज़िर होने का वायदा किया है....(ज़रूरी नहीं कि शुक्रवार को ये वायदा सिर्फ अनिरुद्ध ही पूरा करें...आप भी ये मोर्चा संभाल सकते हैं..) इस नई सीरीज़ की बोहनी करते है सत्यजीत रे की 'शतरंज के खिलाड़ी' से....



महान जापानी फिल्मकार अकीरो कुरुसावा ने कभी कहा था - "सत्यजीत रॉय का सिनेमा नहीं देखा होना ऐसा है जैसे दुनिया में रहते हुए कभी चाँद और सूरज ना देखा हो"
एक अरसे से मैं इस तलाश में था कि ये फिल्म देखने को मिल जाए कहीं और आखिर मुझे मिल ही गई | सत्यजीत राय का निर्देशन, मुंशी प्रेमचंद की कहानी और संजीव कुमार का अभिनय, ये एक बहुत ही दुर्लभ संयोग है और मैं अपने को खुशनसीब मानता हूँ कि मैंने ये फिल्म देखी |
फिल्म की कहानी दो दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है मिर्जा साजिद अली (संजीव कुमार) और मीर रोशन अली(सईद जाफरी), जो शतरंज के बेहद शौकीन हैं, इस हद तक कि उन्हें ना दुनिया कि कोई खबर होती है ना ही अपने घर की | चूंकि पुरखे काफी दौलत छोड़ गए हैं इसलिए इन्हें कोई काम करने की ज़रुरत नहीं होती | सुबह होते ही दोनों हजरात शतरंज लेकर बैठ जाते हैं और देर रात तक उसी में डूबे रहते हैं |
फिल्म की प्रष्ठभूमि सन १८५६ की है जब नवाब वाजिद अली शाह अवध के बादशाह थे | बादशाह को राजकाज चलाने के अलावा बाकी सभी कामों में रूचि है जिससे राज्य में अव्यवस्था फ़ैली हुई है | वाजिद अली कभी बादशाह बनना नहीं चाहते थे लेकिन विरासत के चलते उन्हें ताज दे दिया गया, ठीक वैसे ही जैसे आजकल ज़्यादातर लोग "caught in wrong job" की तरह काम करते हैं, करना कुछ चाहते हैं और करना कुछ पड़ता है | तो एक तरफ दोनों दोस्त अपने घर में शतरंज की चालें चलते हैं, दूसरी तरफ अंग्रेज राजनीति की बिसात पर अपनी चालें चल रहे हैं और अवध पर कब्जा करने की फिराक में हैं | नवाब वाजिद अली की अयोग्यता का बहाना करके अंग्रेज उसे गद्दी से उतारने का नोटिस दे देते हैं | ये असल में वो समय था जब अंग्रेज भारत में सत्ता हथियाने में लगे हुए थे |
फिल्म में उस समय और परिस्थितियों को बहुत ही बारीकी से दिखाया गया है, वो भी बहुत थोड़े से घटनाक्रम के ज़रिये | एक तरफ लड़ाई छिड़ने के आसार हैं तो दूसरी तरफ दोनों दोस्त इन सब चीज़ों से बेखबर शतरंज में मसरूफ रहते हैं | मिर्जा साहब की बीवी किसी तरह उनका इस खेल से पीछा छुड़वाने की कोशिश में रहती हैं | रोज़ रात वो मिर्जा का इंतज़ार करती हैं लेकिन मिर्जा कि सोहबत उन्हें नसीब नहीं हो पाती, ना जिस्मानी, ना रूहानी | इसी को लेकर वो दुखी रहा करती है | दूसरी तरफ मीर साहब की बीवी का अपने भांजे के साथ रिश्ता होता है जिसकी वजह से वो चाहती है कि मीर साहब को शतरंज से कभी फुर्सत ना मिले |
जब अंग्रेज फौज लखनऊ पर हमला कर देती है तो दोनों दोस्त लड़ाई में बुला लिए जाने से डर कर घर से दूर भाग जाते हैं और एक सुनसान सी जगह पर फिर खेलने लगते हैं |
फिल्म में अमिताभ बच्चन ने सूत्रधार के रूप में अपनी आवाज़ दी है | संजीव कुमार और सईद जाफरी के अलावा अमज़द खान वाजिद अली के किरदार में हैं | शबाना आज़मी मिर्जा की बेगम हैं और फरीदा जलाल मीर साहब की | फारूख शेख का बहुत छोटा सा किरदार मीर साहब की बेगम के प्रेमी के रूप में है |
संजीव कुमार के अभिनय पर टिप्पणी करना गुस्ताखी ही होगी | वो हमारे फिल्म इतिहास के अब तक के सबसे अच्छे अभिनेता हैं, किसी भी किरदार में जितनी पूर्णता से संजीव कुमार उतर जाते थे, शायद ही किसी और के लिए संभव हो | सईद जाफरी को देखना हमेशा ही एक अच्छा अनुभव होता है | अमज़द खान ने एक कमज़ोर बादशाह के किरदार में जान डाल दी है, उन्होंने अपने पूरे शरीर और आँखों से अभिनय किया है | उन्हें परदे पर देखकर ही आपको समझ में आ जाता है कि ये एक कमज़ोर बादशाह है | बादशाद के मन की दुविधा को वे अपने चेहरे के भावों से बता देते हैं | अब तक अंग्रेजों के बारे में जितनी फिल्में बनी हैं लगभग सभी में टॉम आल्टर कि उपस्थिति रही है और वे एक बेहतरीन अभिनेता भी हैं |
फिल्म में चटख रंगों को प्रयोग किया गया है जो फिल्म के बारे में आपकी यादों को भी रंगीन बना देते हैं और एक अच्छे फीलिंग देते हैं | वैसे शोख रंग उस ज़माने को दिखाने के लिए किया गया है जब शाही दरबार हर तरह से रंगीन होता था |
सत्यजीत रॉय की ये मैंने पहली ही फिल्म देखी है और मैं नतमस्तक हूँ उनकी निर्देशन क्षमता के आगे | फिल्म इतने स्वाभाविक तरीके से बहती है कि आप उसके साथ ही बहने लगते हैं, बाहरी दुनिया से एकदम कटकर |
और सबसे ऊपर आपको ये अहसास भी दिलाती है कि हमारे देश के राजा और प्रजा के किस निकम्मेपन और अपने अतीत से चिपके रहने कि प्रवृत्ति के कारण देश गुलाम हुआ था |

कुल मिलाकर एक बेहतरीन फिल्म |
मेरी तरफ से ५ में से ५ अंक |


अनिरुद्ध शर्मा

Thursday, July 02, 2009

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा…

दिल्ली में हम मानसून का मज़ा ले रहे हैं तो पुणे में बारिश अब भी मारकाट करवा रही है.....अनिरुद्ध शर्मा ने हमें ये दुख भरा मेल भेजा है..आइए, उनका दुख साझा करें....

कभी ये गाना एक कविता की तरह सुनते थे और आज हकीकत की तरह इसे याद कर रहा हूँ क्योंकि ऐसा लगता है कुछ दिनों में सचमुच मैं पानी का रंग भूल जाऊंगा आज ४ दिन हो गए घर में पानी नहीं है अभी बैठ कर यही सोच रहा था की २ दिन हो गए नहाये हुए, किस दोस्त के घर पानी होगा की हम सपरिवार वहां जा धमकें नहाने के लिए
पूना की जिस चीज़ ने मेरा मन मोह लिया था वही गायब हो गई है और इस बुरी तरह कि लोग त्राहि-त्राहि कर उठे हैं जितनी खूबसूरत यहाँ की बारिश होती है उतना ही बदसूरत सूखा पड़ गया है मैंने पिछले ४ सालों में यहाँ पानी की कमी कभी नहीं देखी लेकिन अब लगता है कि जल्द ही पानी के लिए क़त्ले-आम हो जायेगा कारपोरेशन से २ दिन में एक बार पानी आता है, वो भी बहुत थोडा सा और १-२ दिनौ में कटौती और बढ़ जायेगी कल ही पानी को लेकर सोसाइटी के लोगों में गरमा-गरम बहस हुई
सारे बाँध सूख गए हैं और ख़बरों के अनुसार पानी का स्तर पिछले ५० सालों में सबसे कम है
पानी की कमी के दूसरे साइड इफ्फेक्ट्स भी झेलने पड़ रहे हैं जैसे बिजली कटौती पॉवर प्लांट में सिर्फ २०% पानी बचा है जो कि अब तक का सबसे कम है यही हाल रहा तो इंशाअल्लाह अगले कुछ दिनों में आदिम युग का मज़ा लिया जा सकता है बिना बिजली के, बाहर के जो भी महानुभाव आदिम युग का अनुभव लेना चाहें उनका स्वागत है, बस टैक्स के रूप में वे हमारे लिए पानी ले आयें
मौसम विभाग हर २ दिन में भविष्यवाणी करता है और मानसून उनके मज़े ले रहा है पहली भविष्यवाणी थी कि इस बार बारिश बहुत अच्छी होगी और उनके देखे हमारे ज्योतिषियों ने भी सारे ग्रहों को ऐसे बिठा दिया था कि सब पानी देने लगे थे लेकिन जून का महीना आधा होते-होते ज्योतिषी महाराज तो अपनी पोथियाँ बंद करके बैठ गए पर मौसम विभाग अभी डाटा हुआ है आज उन्होंने फिर १-२ दिन का आश्वासन दिया है देखते हैं इस बार क्या होता है तब तक मैं वही गाता रहूँगा जो पिछले १ महीने से गा रहा हूँ - "अल्लाह मेघ दे पानी दे पानी दे पानी दे पानी दे... "
चलिए अभी पास में कहीं नल चल रहा है और मुझे पानी भरने जाना है, १-२ दिन में फिर से अपडेट देता हूँ तब तक आप भी दुआ कीजिये भगवन से, शायद आपकी दुआ रंग ले आये (पानी का :))

अनिरुद्ध शर्मा

Tuesday, May 12, 2009

मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और भारतीय मतदाता

मैं जब कभी लोगों से राजनीति के बारे में बात करता हूँ या किसी फोरम में लोगों के कमेंट्स पढता हूँ तो एक बात बहुत ही शिद्दत से उभर कर आती है, लोगों का पार्टी प्रेम। मैं हैरान हूँ, यहाँ तक कि हैरानगी की हद तक चला गया हूँ। इन लोगों के लिए समझ क्या बाहर से आयात करनी पड़ेगी?
जब किसी का ध्यान किसी क्षेत्र विशेष की समस्याओं पर दिलाया जाये तो वो उस पार्टी को गालियाँ देने लगता है जिसके खिलाफ वो आज तक वोट करता आया है। कल ही मैं एक वेबसाइट पर एक लेख पढ़ रहा था जिसमें मध्यप्रदेश की बदहाली का ज़िक्र और सीएम साहब से कुछ सवालात किये गए थे। उसमें नीचे पाठकों की टिप्पणियाँ थीं। सिर्फ ३ या ४ लोगों ने समझदारी की बात कही थी बाकी सारे लोग वाहियात सी बातें कर रहे थे। चूंकि मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है, वहां पर लोग लेखक को कांग्रेस का एजेंट साबित करने पर तुले हुए थे। उस बेचारे ने जो हाल देखा वो लिख दिया और इन लोगों को बिना बात की मिर्ची लग गई। एक महाशय लिखते हैं कि आप कांग्रेस शासित राज्यों में जाकर देखिये वहां क्या हुआ है? अरे मेरे भाई, तेरे घर में खाना नहीं होगा तो क्या तेरा पेट इसलिए भर जायेगा कि दूसरे के घर में भी खाना नहीं है? अजीब बातें करते हैं लोग, पता नहीं क्यों इस लोकतंत्र में लोक ही किसी काम का नहीं है, शायद इसीलिए लोकतंत्र भी किसी काम का नहीं रहा। मैं मध्यप्रदेश के एक छोटे कस्बे से हूँ। इतना छोटा भी नहीं, तहसील है। मैंने वहां अपने बचपन से लेकर आज तक हमेशा अँधेरा ही देखा है, बिजली थोड़ी देर ही आती है, सड़कें हमेशा ख़राब ही रहीं हैं लेकिन ये कांग्रेस बीजेपी के पिट्ठू अपनी वफादारी साबित करने में लगे रहते हैं। अरे यार तू ये देख न कि तेरी समस्या कौन हल करता है, नहीं लेकिन, मर जायेंगे पर पार्टी को वोट देंगे। यहाँ तक कहते हैं लोग कि फलां पार्टी से अगर कोई कुत्ता भी खड़ा होता है तो हम उसी को वोट देंगे और ऐसी बेशर्मी की बातें ये लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं। बताइये अब कहाँ जायेगा ये देश ऐसे बेवकूफों के हुजूम के साथ? यही वजह है कि कोई नेता कुछ नहीं करता, पता है कि ये बेवकूफ ऐसे ही मुट्ठी में है, और नहीं होंगे तो एक-आध मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और पकड़ा देंगे। बिजली नहीं है, पानी नहीं है, सड़कें नहीं हैं, ज़माने भर की समस्याएँ हैं लेकिन पार्टी का पट्टा गले में डाले रहते हैं। ६० साल से ज्यादा हो गएँ हैं जब अँगरेज़ हमें छोड़ गए थे लेकिन हमारे लोग बड़े ही नहीं हो रहे ... | क्या आप बता सकते हैं कोई हल... ?

--अनिरूद्ध शर्मा

Friday, April 17, 2009

भारत का आम आदमी कब महान होगा ?

अनिरुद्ध शर्मा हिंदयुग्म के पुराने पाठकों में से हैं.....पुणे की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी करते हैं...चुनाव के दौरान इनके भीतर का नागरिक जगा और इन्होंने हमें एक लेख भेज दिया....आप भी पढें इनके विचार.....

हाल की ख़बरों में एक निराली बात सुनने को मिली. समाजवादी पार्टी का मेनिफेस्टो जिसमे हमारे देश के महान(!) नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा है कि वो इंग्लिश स्कूल्स बंद करवाएंगे, ट्रैक्टर की जगह बैल चलवाएंगे, कंप्यूटर बंद करवाएंगे, मशीनें बंद करवाएंगे वगैरह वगैरह… मैं सदमे में हूँ... क्या कहा जाये इस आदमी को? क्या इसे समझाना संभव है?बिलकुल नहीं.जिस आदमी की सोच इतनी घटिया है वो कितने सालों से इतना बड़ा प्रदेश चला रहा है. शर्म की बात है जनता के लिए और यहाँ हद दर्जे के मूर्खों की भरमार है वरना क्यों नहीं इन सड़े हुए नेताओं के इस तरह की बातें करते ही मंच से नीचे खींचकर जूतमपैजार कर दी जाती ? और क्यों मुलायम, मायावती जैसे लोग बार-बार आ जाते हैं? कुंठितों का पूरा कुनबा है जो देश को डुबोने पर आमादा है. ये नेता कुंठित हैं इंग्लिश नहीं जानने से, कंप्यूटर के डर से और इन्ही के तरह की जनता है जो सिर्फ अपना मन समझाने के लिए ऐसे लोगों को अपना भविष्य सौंप देती है.मुझे गुस्सा आता है, असहनीय गुस्सा आता है लेकिन जब गहरे में जाता हूँ तो गुस्सा निराशा का रूप ले लेता है.मेरा भारत महान चिल्लाते हुए बरसों बीत गए लेकिन इमानदारी से कहूं तो मुझे कभी इसका कारण समझ में नहीं आया. अब तो मैंने मुद्दत हुई ये वाक्य नहीं दोहराया है लेकिन जब नारे लगाने पड़ते थे तब भी मुझे ये समझ में नहीं आया. किस बात के लिए हम महान हैं? आज जो हालत मैं देखता हूँ उसमें तो निहायत ही नामुमकिन सी बात है महानता को ढूंढ़ना. और अगर इतिहास की बात करें तो समय-समय पर हमारे यहाँ महान लोग हुए हैं इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन दुनिया में सभी जगह हुए हैं. देश उसमें रहने वाले सारे लोगों से मिलकर बनता है यानी कि आम आदमी से . अब देखिये न प्रजातंत्र में सरकार चलती है और सरकार कौन बनाता है? यही आम आदमी… लेकिन मैं जब इतिहास पर गौर करता हूँ तो महानता तो दूर की बात मुझे आम आदमी में किसी भी दौर में समझदारी भी नहीं दिखाई दी. ये हमेशा से उन लोगों का समूह रहा है जिसे जो जैसे चाहे वैसे हांक देता है और वो भी बहुत ओछी बातों से. वरना वरुण गाँधी को आज सफलता के लिए कोई और शॉर्ट कट ढूंढ़ना पड़तासबसे बड़ी चीज़ जो ऑब्ज़र्व करने जैसी है वो है हमारी कौम की हीन भावना. ये भावना हमेशा से रही है और आज भी है. एक दौर था जब राजा-महाराजा शोषण करते थे, आम आदमी शाही लोगों से हीन था और शाही लोग? विदेशियों से… कुछ सचमुच के महान राजाओं को छोड़ दिया जाये तो सभी आखिरकार चाटुकार ही साबित होते थे. जब मुग़ल यहाँ आये तो ये लोग उनके पैरों में गिर गए. कई सालों तक मुग़लों ने राज किया और आम आदमी तो कभी कुछ करता ही नहीं हैं न? समय-समय पर कुछ स्वाभिमानी राजाओं ने विरोध किया लेकिन उन्हें मुग़लों के साथ अपने लोगों का भी विरोध सहना पड़ा. धीरे-धीरे मुग़ल इसी देश का हिस्सा हो गए… ठीक है अगर अपनापन कहीं है तो वो ग़लत नहीं है लेकिन फिर आये अंग्रेज और इस बार हमारे लोगों की हीन भावना देखने के काबिल थी. अंग्रेजों की ठोकरों में रहकर भी उन्हें ऊँची नज़र से ही देखा जाता था. फिर से कुछ लोगों ने बड़ी मुश्किलों से लड़ाई लड़ी. यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि आज जो संगठन स्वाभिमान का झूठा झंडा उठा कर ज़हर फैलाने का काम कर रहे हैं वो तब भी थे और उन्होंने हमेशा की तरह असली समस्या को हटाने की बजाय नकली समस्याएँ पैदा करने का ही काम किया. खैर, जैसे-तैसे हम आज़ाद हो गए लेकिन हमारा स्वाभिमान आज भी धूल में पड़ा हुआ है. हम अपने देश के आदमी को कभी इज्ज़त नहीं देते लेकिन आज भी कोई विदेशी आ जाये तो मुस्कराहट 4 इंच से कम ही नहीं होती. मैं IT इंडस्ट्री से हूँ और मैंने बहुत करीब से इसे देखा है. अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ों को लेकर इतना क्रेज बाप रे! जहाँ अपनी भाषा में बोलना गवार होने की निशानी मन जाता है, जहाँ अमेरिका जाने के लिए आदमी मर जाता है… वहां किस तरह की महानता निवास करती है मैं नहीं जानता. ठीक है ये बिज़नेस है और हमारा ग्राहक और दुकानदार का रिश्ता है, IT की भाषा में कहें तो वो हमारे क्लाइंट हैं लेकिन क्या हमारे यहाँ के दुकानदार देसी ग्राहक को इतनी इज्ज़त बख्शते हैं? क्यों हम उनके पैरों की धूल चाटने को लालायित रहते हैं, क्यों अपने बच्चों के हिंदी बोलने पर शरमाते हैं, क्यों अपने ही लोगों की इज्ज़त करना हमें छोटी बात मालूम होता है?मैंने देखा है छोटे गाँव से लेकर, छोटा शहर और मेट्रो सब देखा है और ये हीन भावना मैंने सभी जगह पाई है. और अगर कहीं स्वाभिमान की बात भी होती है तो वो दरअसल कुंठा ही होती है जो आपस में ही दंगे करवाती है. स्वाभिमान का सबसे अच्छा उदाहरण हैं स्वामी विवेकानंद, अपने देश अपनी भाषा सबके लिए स्वाभिमान और दूसरे देश की भाषा, संस्कृति के लिए भी सम्मान. उन्हें अपनी भाषा से प्रेम था लेकिन दूसरी भाषाओँ से बैर नहीं था उन्हें भी वे समान आदर देते थे लेकिन प्राथमिकता हमेशा अपनी विरासत ही रही.कुछ लोग हैं, और हमेशा रहे हैं जो स्वाभिमान का सही मतलब समझते हैं लेकिन तादाद में कम ही हैं. मेरे ख़याल से एक राम, एक कृष्ण, एक गाँधी. सिर्फ इन नामों का सहारा लेकर हम आम तौर पर महानता का दावा नहीं कर सकते. ये देश तब तक महान नहीं है जब तक यहाँ का आम आदमी महान नहीं है, उसमें स्वाभिमान नहीं है.
जय हिंद

अनिरुद्ध शर्मा