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Tuesday, March 10, 2009

होली पर युग्मियों के कार्टून

हर जगह रंगों भरी पिचकारी डाली जा रही है। कार्टूनिस्ट मनु बेतख्लुस ने इस बार अपनी कूची का रंग कुछ हिन्द-युग्म से जुड़े हिन्दी कर्मियों पर लगाया है। देखें और सराहें--









Saturday, January 24, 2009

एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए

पेशे से पत्रकार सुनील डोगरा ज़ालिम 'नारी की कहानी' नाम से ब्लॉग चलाते हैं, जिसपर बहुत लम्बे समय ये नारियों के पक्ष, उनके अधिकारों के पक्ष में खड़े होते रहे हैं। गाँधीवाद सोच रखने वाले जालिम हिन्द-युग्म के यूनिपाठक भी रह चुके हैं। आज राष्ट्रीय बालिका दिवस पर अपनी बात इन कतरनों में कह रहे हैं॰॰॰


आज फिर बालिका दिवस है। मतलब आज फिर लोग चिल्लायेंगे.. नारे लगेंगे और टीवी पर फोटो खींचेंगे. हाँ ब्लॉग भी खूब चमकेंगे... लेकिन....

कार्टून- मनु बेतखल्लुस
बहुत दिन नहीं हुए... शायद १५ दिन.. मैं अपने दोस्त के घर में था . तभी एक फ़ोन आया.. मेरे दोस्त के पिताजी को. उनके किसी साथी को यहाँ बच्चे का जन्म हुआ था...
क्या हुआ लड़का..? उन्होंने पूछा..
स्पीकर बंद था.. दूसरी तरफ की आवाज़ मैं न सुन सका..
अंकल के चेहरे से ख़ुशी गायब हो गयी.. वो जोर से बोले ...क्या करते हो गुप्ता जी फिर लड़की ....मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया... स्पीकर अभी भी बंद था..लेकिन दूसरी तरफ से आवाज सुनाई दी... ऐसा नहीं होता अंकल जी... लड़कियां बहुत अच्छी होती हैं.. मुझे लड़की ही चाहिए थी.

टीवी पर चर्चा हो रही थी. एक लड़की का बलात्कार हो गया था. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए... लेकिन क्यों.....
कई प्रश्न उठते हैं.. सबसे पहला कि क्या कम फैशन करने से ऐसे अपराध नहीं होंगे? इससे भी खतरनाक प्रश्न यह है कि ऐसे अपराध करने वाले लोग भेड़िये हैं... जो लड़कियों को देखते ही आप खो देते हैं.. अगर सचमुच ऐसा है तो पर्दा करने की जरूरत किसे है?.. ऐसे संदिग्ध लोगों की आखों पर पट्टियाँ बांध देनी चाहिए.. पर्दे की जरूरत उन लोगों को है न की मासूम लड़कियों को..
दूसरी बात क्या सचमुच फैशन ही जिम्मेदार है ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए? तो क्या कारण है की दूध पीती बच्चियों के बलात्कार हो जाते हैं? क्यों मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़कियों पर कहर टूटता है..
यह कैसी सोच है कि फैशन पर रोक लगा दो... रोक तो उन लोगों पर लगनी चाहिए जो ऐसे भयानक बयान देते हैं.. सोच बदलनी होगी ऐसी लोगों की.. अगर नहीं तो ऐसी सोच रखने वालों को ही बदल देना होगा..
सुनील डोगरा 'ज़ालिम'

इससे जुड़ी प्रविष्टियाँ-

1. बालिका दिवस का नारा
2. एक अज्ञात कन्या का मर्म
3. मेरी बगिया की नन्ही कली
4. अपराधबोध!!!
5. कठपुतलियां तो नारी हैं
6. कन्या भ्रूण हत्या
7. दोषी कौन?
8. क्या नारी शक्ति आवाज़ उठा पायेगी?

Monday, January 19, 2009

"बे-तक्ख्ल्लुस" पूछता है : कौन-सा साहित्य पढें भाई?

मनु "बे-तक्ख्ल्लुस" हिंदयुग्म के मंच पर लगातार टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें खींचते रहे हैं...हमारे यूनिपाठक भी हैं...कार्टूनों के ज़रिये कई बार उन्हॉने बेहद सहजता से महीन बातें कही हैं...इस बार उन्होंने कार्टून के साथ एक सवालनुमा ज़रूरी लेख भी भेजा है....साहित्य जगत में कथापाठ के आयोजन कम ही देखने-सुनने को मिलते हैं...15 जनवरी को गांधी प्रतिष्ठान भवन में जब हिंदयुग्म ने भी कथाकार तेजेंद्र शर्मा, गौरव सोलंकी का कथापाठ और असग़र वजाहत, अजय नावरिया और अभिषेक कश्यप को विमर्श करते सुना तो मनु के मन में एक सवाल बेचैन कर गया...ये सवाल उन्होंने अब सबसे पूछने का मन बनाया है...कोई जवाब हो तो बताएं....

हिंद युग्म द्वारा आयोजित कहानी पाठ:एक विमर्श, मेरी नज़र में एक बहुत ही सफल और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम रहा मंच पर विराजमान कथाकारों के तालमेल से लेकर कथा-वाचन, लघु कथाएँ, तेजेंद्र जी का वो ड्रामाई अंदाज में किया कहानी पाठ जो कभी भी नहीं भूलेगा और उस पर सोने पे सुहागा ये के अंत में मंच पर बैठे माननीय लेखकों से कोई भी प्रश्न कहानी पर आप पूछ सकते हैं. एक बिंदास सा सवाल मन में कुलबुला तो रहा था काफ़ी देर से और पूछने की कोशिश भी की, मगर बस पूछा ही नहीं गया मंच पर कुछ तो ख़ुद का संकोच और कुछ दिल की लाचारी....के जाने किस को कैसा लग जाए...? ये "जाने किस को कैसा लग जाए" आमतौर पर सबके लिए नहीं सोचता अब... पर जब किसी के लिए सोचता हूँ तो पूरी शिद्दत से... खैर...छोडिये ..ये भी हो सकता है के ये सवाल वहाँ के बजाय यहाँ इस तरह तसल्ली से पूछा जाना होगादरअसल इस
कार्यक्रम के दौरान तेजेंद्र जी के लिए एक शब्द कहीं से कानों में उतरा था "प्रवासी लेखक" शुरू में कुछ अजीब सा लगा ..पर सोच कर देखा तो कुछ भी अजीब नहीं था अब भाई एक भारतीय जो विदेश में रह रहा है ..तो उसका तो
पूरा माहौल ही बदल गया न..? अब वहाँ का कल्चर अलग है..मान्यताएं अलग है..लोग अलग हैं ...सरकार अलग है...

कायदा...क़ानून...नेता..पुलिस...भ्रष्टाचार के तरीके...मौसम...मिजाज़ ...सब अलग हैं..वहाँ शायद ना तो राशन के लिए लम्बी लाइने हों और ना ये आदमखोर ब्लू लाइनें और भी जाने क्या क्या नेमतें आफतें हों जो यहाँ पर और विदेश में अलग अलग हों... सो लेखक का "प्रवासी लेखक " सुना जाना मुझे बड़े आराम से हज़म हो गया.. इसी महफ़िल में हालांकि शायद पुकारा ना गया हो पर एक नाम मुझे "महिला साहित्य जगत" से भी लगा इस महिला साहित्य पर झांकना वैसे तो मुझे कुछ अटपटा सा लगता है..कुछ झिझक सी महसूस करता हूँ कि जाने यहा पर क्या निकल आए, पर एक दिन सोचा कि यहाँ पर अचार और बड़ी-पापड की कोई बढिया रेसिपी भी तो हो सकती है...आख़िर महिलायें भी तो अच्छी कुक होती हैं...तो खान पान से सम्बंधित जानकारी महिला साहित्य में नहीं तो और कहाँ मिलेगी ...सो बड़ी-पापड की बड़ी
तमन्ना लेकर यहाँ भी ढूँढा ...पर ऐसा कुछ ना पाया ...बस साहित्य जैसा साहित्य था ..लेखन जैसा लेखन .....

फ़िर एक और चेहरा दिखा "दलित-लेखक"....अब ये क्या बला है..? यूँ तो वहाँ पर एक "बाल-लेखन" वाला चेहरा भी
मौजूद था ..पर उसकी छोडिये .....प्रवासी की तरह ही बच्चों की दुनिया भी एकदम अलग होती है...सो इस बाल-साहित्य को भी अलग ही रखा जाना चाहिए .....मगर ये बाकी के सब अलग अलग रास्ते क्यूं...? दलित या महिला क्या
किसी और परिवेश में रहते हैं..? क्या ये किसी और समाज का अंग है..? क्या इनकी सभी समस्यायें मुख्यधारा से अलग हैं..? अगर मैंने कुछ लिखा है तो क्या वो "पुरूष-लेखन" है....? क्या अपने लेखन में इन शब्दों का प्रयोग इतना ज़रूरी हो गया है....कि आपको इनके बगैर पहचाना ही ना जाए....? ये शब्द समय समय पर अपना रूप अवश्य बदलते रहे पर कभी भी हमारे अंतर्मन से विदा नहीं हुए क्या इन्हें विदा नहीं हो जाना चाहिए...? इनके प्रयोग से हम परस्पर जुडाव महसूस करते हैं या अलगाव...? अगर जुडाव महसूस करते हैं तो क्या सोचकर और अलगाव महसूस करते हैं तो इन शब्दों से मुक्त क्यूं नहीं हो जाते....? क्या लेखक वर्ग को इस तरह से बांटना ठीक है...? हम क्यूं रोते हैं अंग्रेजों को...नेताओं को......धरम वालों को...जात वालों को...और सरहदों को ...कि हाय हाय, इन्होने सब ने हमें बाँट रखा
है....वरना हम तो....!! जी नहीं , कोई किसी को नहीं बाँट सकता ...कोई मुझे बतायेगा के जो सवाल मैं उठा रहा हूँ उसके लिए नेता, धर्म, सांसद, पुलिस, क़ानून या सिस्टम ..... कौन जिम्मेवार है.........??? शायद कोई
नहीं न..? हाँ, कोई भी नहीं...हम ख़ुद ही बनते फिरते हैं बँटे हुए ..हमीं को स्वाद नहीं आता बगैर अलगाव के...हमें कुछ और बांटने को नहीं मिला तो यूँ ....अपनी कलम को ही आधार बनाकर हम ने एक दूसरे से ख़ुद को अलग अलग कर
लिया...बाँट लिया......! वाह री एकता और अखंडता के लिए चलने वाली कलम...वाह...क्या खूब...???

एक दिन इन शब्दों को कभी न कभी बहुत ही भयावह शक्ल अख्तियार करना लाजिम है तो क्यूं नहीं इस काम को आज ही कर लें...ज़रा सोचिये इन शब्दों को साहित्य के साथ चस्पां कर देने से क्या हो जाता है ...और हटा देने से क्या हो जायेगा...?क्या इस से कोई लाभ है... है तो क्या है...और अगर वाकई कुछ है भी तो शायद इसके बदले दूसरे को हानि भी होगी जब महिला, पुरूष,दलित,सवर्ण,युवा आदि सब एक ही ढाँचे में जी रहे हैं तो ऐसा क्यूं जरूरी है..अगर एक महिला को महिला होने के नाते कुछ अलग समस्या है भी तो पुरूष को भी तो है....यही बात बाकी सब जगह भी लागू होती है....और फ़िर भी आपको लगता है कि आपकी व्यक्तिगत समस्यायें ही समाज की या समूचे राष्ट्र की समस्या है तो माफ़ कीजिये कि आप देश को, समाज को जोड़ने का काम नहीं कर रहे.....और ज्यादा तोड़ रहे हैं, खोखला कर रहे हैं....जिसका आने वाला रूप मेरे हिसाब से ज्यादा घिनौना होगा ........

"क्यूं अलग ये राह पकड़ी, किसके बहकाए हो तुम,
"बे-तक्ख्ल्लुस" से ये क्यूं, मुंह फेर के बैठे हो तुम"


मनु

Saturday, January 03, 2009

एक और कार्टून राजेन्द्र यादव के नाम

हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2008 में राजन्द्र यादव द्वारा दिये गये वक्तव्यों पर प्रतिक्रियाओं के आने का दौर अभी थमा नहीं है। 30 दिसम्बर 2008 को बैठक पर ही मनु बे-तख्खल्लुस की प्रतिक्रिया कार्टून के माध्यम से लगाया था। आज प्रस्तुत है उनके दूसरे बयान पर एक और कार्टून॰॰॰

Tuesday, December 30, 2008

साहित्यकार राजेन्द्र यादव का कार्टून

हिन्द-युग्म के वार्षिकोत्सव जिसका आयोजन हिन्दी भवन में 28 दिसम्बर 2008 को हुआ, में कार्टूनिस्ट मनु बे-तख्खल्लुस भी उपस्थित थे। इन्होंने मुख्य-अतिथि देश के प्रख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव के ऊपर एक कार्टून बनाया। आप भी देखें।

Monday, December 29, 2008

आज का कार्टून 29 दिसम्बर 2008



कार्टूनिस्ट- मनु-बेतख्खल्लुस

Tuesday, December 09, 2008

क्या ये पहली बार हुआ है?

नाज़िम नक़वी की कलम से आप सब परिचित हैं....मुंबई की घटना के बाद इन्होंने हिंदयुग्म को फोन किया और कहा कि अवाम की ये आग इस बार बुझनी नहीं चाहिए.....उन्होंने हिंदयुग्म पर लगातार प्रकाशित हो रहे काव्यात्मक आक्रोशों को भी ख़ुद से जोड़ा.....चूंकि अब वो हमारे सदस्य भी हैं तो दैनिक भास्कर में छपा ये लेख हिंदयुग्म के पाठकों के लिए भी लाज़मी हो जाता है ताकि जो आतंक के खिलाफ जो अलख इस बार जगी है, उसकी लौ बुझने ना पाए....आमीन.....



कार्टूनः मनु बे-तक्खल्लुस
पहली बार मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद दर्द की जो लहर पूरे देश में है वो देशवासियों के लिये ख़ुशी का पर्याय बन गई है। क्योंकि पहली बार ऐसा हो रहा है कि देश की सुरक्षा में पैदा ख़ामियों पर ग़ुस्सा फूट रहा है। देश के नेताओं को गालियां पड़ रही हैं। ये गुस्सा और ये गालियां नई नहीं हैं। विदर्भ के किसानों की शव यात्राओं में भी ये दोनों बिंब हज़ारों बार दिखाई दिये। गुजरात के दंगों में भी इनसे हमारा साक्षात्कार हुआ लेकिन इनमें वो पैनापन नहीं था। बात भी ठीक है क्योंकि सबसे अहम तो ये है कि गालियां देने वाला है कौन? जी हां इसबार ये गालियां अति विशिष्ट लोगों के मुंह से निकल रही हैं। इस बार ग़ुस्सा उन चेहरों पर है जिन्हें नाराज़ होने का हक़ है। क्योंकि अब तो वो असुरक्षित महसूस कर रहे हैं जिन्हें सुबह से शाम तक सुरक्षा के घेरों में रहने की आदत हैं।
पहली बार ऐसा हुआ है कि आलीशान लोगों की शान में ग़ुस्ताख़ी हुई है। ये वो लोग हैं जिनके लिये संविधान बना, जिनके लिये जल, थल और वायुसेना का गठन हुआ, प्रशासन के तमाम महकमे जिनकी सुविधाओं के लिये पैदा किये गये। ग़ुस्सा इसी बात का है कि फिर इस पूरे ताम-झाम का क्या मतलब है? जब ये उसी चीज़ की गारंटी नहीं दे सकता जिसके लिये इसे पैदा किया गया। मौलिक लोगों के स्वाभाविक अधिकारों का हनन हुआ है इस बार। अब ये बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, ये एलान हो चुका है। हमारी ज़मीन का आसमान हिल गया है। सितारे गर्दिश में हैं। देश की अस्सी प्रतिशत जनता तो पहले भी महफ़ूज़ नहीं थी लेकिन इन हमलों के बाद पहली बार लग रहा है कि देश महफ़ूज़ नहीं है।
पहली बार देश में सार्थक बहस चल पड़ी है कि जिन लोगों को सत्ता सौंपी गई वो इस क़ाबिल ही नहीं हैं कि इसे चला सकें। कोई और मौक़ा होता तो आलीशान लोगों के इन विचारों को वर्तमान सरकार की अक्षमता से जोड़ दिया जाता लेकिन इस बार गालियों के दायरे में हर नेता खड़ा है, क्या माकपा और क्या आरएसएस। और मज़े की बात ये है कि अलग-अलग नस्ल के ये नेता भी अपने ऊपर होने वाले इन हमलों के बाद संगठित होकर अपनी सफ़ाई देने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। किसी को लगता है कि भावनाएं सही थीं लेकिन शब्दों का चयन ठीक नहीं था तो कोई अपने नेता को संयम बरतने की नाकाम सलाह दे रहा है। नेता लोग भी गालियों पर तिलमिला जाते हैं ये देशवासियों ने पहली बार महसूस किया है।
पहली बार ऐसा हुआ है कि आतंक का हमला उन ऐवानों पर हुआ है जिनके दरो-दीवार से देवानंदों, फ़रीद ज़करियाओं और राजदीप सरदेसाईयों की यादें चस्पां हैं तो इसके मायनें भी अलग हैं। खैरलांजी के आदिवासियों और विदर्भ के किसानों की यादों में और इन ख़ास लोगों की यादों में कोई न कोई तो फ़र्क़ है ही। साउथ मुंबई और कोलाबा जैसे सुरक्षित इलाक़े भी अब ख़ौफ़ की बाहों में हैं। आतंकवाद जबतक देश में था और सीरियल ब्लास्ट के शक्ल में, ट्रेन ब्लास्ट की सूरत में, हैदराबाद और अक्षरधाम के रूप में, दिल्ली – जयपुर – मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस के चेहरों से झलक रहा था तब तक ये सिर्फ़ अफ़सोसनाक था, एक बुरी ख़बर था, मसरूफ़ लोगों के विशिष्ठ कामों में ख़लल डालने जैसा था लेकिन अब देश के असरदार लोगों को पहली बार महसूस हो रहा है कि आतंकवाद तो उनके घर तक पहुंच गया है।
अब ये ख़ास लोग देश के नेताओं से, हुक्मरानों से ये पूछते हुए दिखाई दे रहे हैं कि–
क्या है हमारे सब्र की मंज़िल बताइये।
वो लोग तो हमारे मकां तक पहुंच गये।।
सिर्फ़ मुंबई ही नहीं, पहले भी हादसों से देश के कई हिस्से लहूलुहान हुए हैं, लेकिन पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि हमारे नेताओं की क़ाबिलियत पर, नौकरशाही पर और पुलिसिया निज़ाम पर इतने तीखे प्रहार किये गये हों। देश के हुक्मरान और नोकरशाही तो पहले भी अक्षम थे, अपनी याददाश्त पर जोर डालिये तो पूर्व में हुए हर हमले के बाद ज़ख़्मी शहरों के दोबारा उठ खड़े होने की हिम्मत को सलाम किया जाता रहा है और इसी बुनियाद पर ये बताने की पुरज़ोर कोशिश होती रही है कि आतंकवादी अपने नापाक हौसलों में कभी भी कामयाब नहीं हो पायेंगे। लेकिन 26/11 की बात ही कुछ और है, इस हमले में पहली बार आतंकवादी अपने मंसूबों में न सिर्फ़ कामयाब हो गये हैं बल्कि नेता नाक़ाबिल, नौकरशाही बेढंगी और पुलिस तंत्र अशक्त हो चुका है।
ये बात अलग है कि मुंबई हादसे में बांबे वीटी और चौपाटी पर कीड़ों की तरह गोलियों का शिकार हुए लोग सुर्ख़ियों में नहीं हैं फिर भी देशवासियों के लिये ये सुकून की बात है कि पहली बार ज़ख़्म छुपाये नहीं जा रहे हैं, चीख़ें घोंटी नहीं जा रही हैं, आंसू रोके नहीं जा रहे हैं।
ज़ख़्म अभी गहरा है, मुंबई के नारीमन हाउस, ताज और ओबरॉय होटल्स का ख़ून अभी ताज़ा है इसलिये इनसे जुड़ा हुआ ग़म और ग़ुस्सा भी अभी थमा नहीं है। जो लोग पहले से ही असुरक्षित थे वो इन नये असुरक्षितों के साथ तो स्वाभाविक रूप से शामिल हैं ही और उन्हें लग भी रहा है कि शायद (यक़ीन नहीं है) इस बार देश आतंक की इस महामारी से निपटने के लिये कोई पुख़्ता और कारगर क़दम उठाये। एक फेडेरल एजेंसी बनाने की बात भी हो रही है। हर उस देशवासी के लिये ये ख़बरें ख़ुशी की सौग़ात हैं जिनकी आंखों के आंसू भी अब सूख चुके हैं।
मुंबई हादसे के बाद देश कई चीज़ें पहली बार महसूस कर रहा है। और पहली बार उसे ये समझने में भी कोई दिक़्क़त नहीं हो रही है कि हर ख़ून एक जैसा नहीं होता, दर्द की भी अलग-अलग मर्यादाएं होती हैं, हर चीख़ का पैमाना एक नहीं होता, हर आंख से निकलने वाले पानी को आंसू की संज्ञा नहीं दी जा सकती। 24 साल पहले जब किस ने कहा था कि " जब कोई कद्दावर पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है" तो हमने एक स्वर में उसे नकारा था। लेकिन अब पहली बार उसकी प्रधानता को मानना पड़ेगा और इसी बुनियाद पर पहली बार ये संभावनाएं भी ताक़त पा रही हैं कि देर सवेर हमारा ग़म और तुम्हारा ग़म की सरहदें भी खिंचेंगी।


नाज़िम नक़वी
naqvinazim@yahoo.com

दैनिक भास्कर से साभार