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Monday, August 31, 2009

ये....स्वाईन फ्लू नहीं है !!

30 साल...
10 हज़ार बच्चों की मौत...
साल 2009 ...150 बच्चों की मौत....
साल 2009....180 लोगों की मौत....
अभी मौत से लड़ते लोग....750 से ज्यादा


मरने वालों का ये टेबल अफ्रीका के किसी ग़रीब देश का नहीं है..हमारे अपने देश के आंकड़े है...वैसे ये आंकड़े पूरी तरह से सही हों मै दावा नहीं कर सकता ..पर इतना दावा कर सकता हूं ..कि ये संख्या ज्यादा हो सकती है कम नहीं..कहां मर गये इतने सारे बच्चे हमारे देश में इस साल..तो जवाब है गोरखपुर, उत्तर प्रदेश....लेकिन ये स्वाईन फ्लू नहीं है....ये बाताना ज़रूरी है..नहीं तो सरकार डर जायेगी...इंटरनेशनल बीमारियों से सरकारें ज्यादा ख़ौफज़दा रहती हैं...ये सारे लोग शिकार बने हैं...इंसेफेलाईटिस से...पिछले तीस सालों में हज़ारों लोगों को निगल लिया..जिसमें सिर्फ बच्चों की संख्या 10 हज़ार है..यहां हमारे चैनल में रोज रिपोर्ट्स आ रही है..हर दूसरे दिन कुछ बच्चों की मौत की ख़बर आ जाती है यहां से ...लेकिन बता दूं कि ये स्वाईन फ्लू नहीं है....ये जुमला मै बार-बार लिखूंगा ...समझने की कोशिश कीजिये..गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल(बीआरडी) कॉलेज में अभी कई बच्चे मौत से लड़ाई लड़ रहे है...हो सकता है कि किसी ने लड़ना भी बंद कर दिया हो ..जब मै ये सबकुछ लिख रहा हूं..या जब आप ये सबकुछ पढ़ रहे हों...इस मेडिकल कॉलेज में बिहार के चंपारण, सीमावर्ती नेपाल से भी मरीज़ पहुंचते है..साथ ही यूपी के ही देवरिया, महाराजगंज और कुशीनगर जैसे ज़िलों से भी मरीज़ पहुंचते हैं...तो इतनी बड़ी देसी समस्या को छोड़ नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे स्वाईन फ्लू में लगा हुआ है..पूर्वी उत्तर प्रदेश में जो लोग इस बीमारी से लड़ रहे हैं..कुछ दिनों पहले उन्होने अपने ख़ून से लिखी चिट्ठी राहुल गांधी और केंद्र सरकार को लिखी..लोकिन उन नासमझ लोगों को भी बताना पड़ेगा कि ये स्वाईन फ्लू नहीं है....गोरखपुर बाढ़ से लड़ रहा है..इसके पहले सूखा था..बाढ़ का पानी जब लौट रहा है तो बीमारियों की अतिरिक्त खेप यहां के लोगों को दिये जा रहा है..खाने की दिक्कत , रहने की दिक्कत , ईलाज की दिक्कत. पर सूखा हर साल तो नहीं आता...बाढ़ आती है तो चली जाती है..पर ये बीमारी यहां पिछले 30 सालों से मौत का क्रूर खेल खेल रही है..10 हज़ार बच्चों की मौत का आंकड़ा सरकार को इस लिए कम लग रहा होगा..क्योंकि ये स्वाईन फ्लू नहीं है...सरकार का दावा है कि यहां इंसेफेलाईटिस से लड़ने के लिए टीकाकरण का काम पूरा कर लिया गया है..फिर तो बच्चों के मां-बाप बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में जरूर पिकनिक मनाने आये होंगे....और पिकनिक ख़त्म हो जाने के बाद ये ग़रीब मां-बाप गिफ्ट भी ले जाते है..अपने दोनों हाथों से उठा कर..देखने में छोटा ..लेकिन ज़िन्दगी भर न भूलने वाला...लखनउ में पत्थर के हाथियों को खड़ा करने वाली सरकार कितनी अंधी है ...समझना मुश्किल नही है..रायबरेली और अमेठी का चक्कर मारने वाले कांग्रेस के राहुल बाबा और सोनिया गांधी की दौड़ भी अपनी-अपनी मस्जिदों तक ही है..कहां आयेंगे यूपी के इस अफ्रूटफुल बेल्ट में..फिर चाहे ये लोग खून से लिखे अपने व्यथा पत्र ही उन तक क्यों न भेजें...एक तो इन इलाकों की जनता ग़रीब है....दूसरे बेहतर चिकित्सा सुविधायें भी नहीं हैं..ऐसे में कई मां-बाप पैसे खत्म होने पर घर वापसी के लिए भी मजबूर हो जाते हैं...कोई है जो तीस साल से पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस मातमी चीत्कार को सुन सके? ...पिछले तीस सालों में यूपी में बहुत सी बातें बदली..सरकारें बदली..मस्जिद गिरीं...दंगे हुए...कल्याण बदले..मुलायम बदले...माया बदलीं....बहुत कुछ बदल गया...लेकिन मौत का ये सिलसिला पूर्वी उत्तर प्रदेश में बदस्तूर जारी है...10 हज़ार लाशें सरकारी फाईलों में दफ़न हैं..असल में बाबू लोग जो नहीं लिख पाये वो आंकड़ा कहीं आगे होगा...जसवंत को मरे जिन्ना की चिंता है..भाजपा मरे जिन्ना के भूत से डरती है..उधर स्वाईन फ्लू का चेहरा ज़रूरत से ज्यादा डरावना लग रहा है...सभी व्यस्त हैं..हम टीवी वाले भी..लेकिन लगा कि कुछ बच्चे की जिंदगी मरे जिन्ना से कहीं क़ीमती है..सो लोगों का ध्यान खींचा जाये..शायद कोई फर्क पड़ जाये..वैसे एक बात फिर से दुहरा दूं..कि ये ....स्वाईन फ्लू नहीं है...

रवि मिश्रा

Thursday, August 27, 2009

दाल-सब्जी के दर्शन दुर्लभ हैं यमराज !

कल एक बार फिर महंगाई का सताया खाली झोला थके कांधे पर डाले मुंह लटकाए बाजार से घर न चाहते हुए भी आ रहा था कि सामने वाले मोड़ पर पौराणिक भैंसे पर से उतर गिरते मकान के छज्जे के नीचे खड़े हो यमराज इधर-उधर कुछ देख रहे थे। उनका भैंसा वहीं पास खड़ा चर रहा था या कि विचर रहा था। उसके गले में मेड इन चाइना का सीडी प्लेयर जोश के साथ हनुमान चालीसा उगल रहा था....सब सुख लहे तुम्हारी सरना, तुम रच्छक काहू को डरना। आपन तेज सम्हारो आपै, तीनो लोक हांक ते कांपे। भूत पिसाच निकट नहीं आवै, महावीर जब नाम सुनावै... पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप....
पता नहीं क्यों मैं एकाएक उनकी ओर खिचा चला गया। मुझे उस वक्त न कोई डर न कोई विडर। महंगाई से बड़ा कोई और यमराज होता है क्या! भूख से भी बड़ा कोई और यमराज होता है भाई साहब... क्या भ्रष्टाचार से भी बढ़कर और कोई यमराज होता होगा भाई साहब... क्या बेरोजगारी से बढ़कर भी कोई यमराज होता है क्या! मुस्कराता उनके निकट पहुंचा तो वे डरे-डरे से, सहमे से। मुंह पर कपड़ा बांधे हुए। हद है महाराज! जिनकी वजह से यमराज के पद पर सुशोभित हो उन्हीं की सड़ांध से मुंह पर कपड़ा! देखो यमराज! अगर हम न हों तो आपको भी पूछने वाला यहां कोई न हो। फिर घूमते रहो जितना मन करे भैंसे पर बैठ कर, जहां मन करे। हम हैं, तो आप हैं। आपकी रोजी-रोटी का आधार हम ही तो हैं ,चाहे जैसे भी हों। अब ये शरीर है ही जब सड़ांध का तो क्या करें! जितना हो सकता है पचासियों अभावों के बीच भी इसे बनाकर रखते हैं। मुझे बहुत गुस्सा आ गया। वैसे भी आजकल हम जैसों के पास मंदी के दौर में आसमान छूते गुस्से के सिवाय और कुछ है भी नहीं।

` ये मुंह पर कपड़ा क्यों बांध रखा है हजूर, क्या मौत से आपको भी डर लगने लगा है´ मैंने कहा तो उन्होंने मुंह पर बंधे कपड़े के बीच में से ही बुदबुदाते कहा,` स्वाइन फ्लू यार, प्रीकाशन ले रहा हूं।´

` आपने लाल किले से प्रधान मंत्री को नहीं सुना क्या´

` क्या कहा उन्होंने´

`कहा कि स्वाइन फ्लू से डरने की जरूरत नहीं। पर हम भी अब डरते भी कहां है महाराज! अब आप ही कहो, जिस देश में चारों ओर डर ही डर हो, उस देश में आकर किस किससे डरें अगर ऐसे ही डरते रहे फिर तो जी लिए महाराज! और एक आप हो कि अजर अमर होने के बाद भी स्वाइन फ्लू से इतना डर! जो होना है वह तो होकर ही रहेगा। इसलिए छोड़ो ये प्रीकाशन- प्रूकुशन। यहां तो जितने प्रीकाशन लिए उतने ही फंसे।
´ मैंने परिवार के पालन-पोषण की मार से टूटी कमर पर जरा हाथ रख तनिक सीधा हो कहा।

`तो´

`तो क्या! चलो सामने वाले ढाबे पर चाय पिलाता हूं। मंदी के दौर में अतिथि की इतनी ही सेवा कर सकता हूं। कहां जा रहे हो'

` तुम्हारे मुहल्ले के उस आखिरी ईमानदार को ले जाने आया था। बेचारा अब परेशान बहुत हो रहा है न! पर यार यहां तो...´

`डॉन्ट बी पैनिक महाराज! टेक इट इजी। ये इंडिया है। यहां तो कुछ न कुछ रोज ही चलता रहता है, कभी स्वाइन फ्लू तो कभी वाइन फ्लू तो कभी राइम फ्लू।´


`पर सरकार ने तो कहा है कि किसी सार्वजनिक स्थान पर... घर ले चलते तो वहीं बैठकर.´

` सॉरी! घर तो मैं आपको किसी भी कीमत पर नहीं ले जा सकता। महीनों से घर में चीनी खत्म है और अब कोई पड़ोसी ऐसा नहीं बचा है जिससे चीनी उधार न ले चुके हों। अब तो मैं सबकुछ छोड़ कई दिनों से आपकी बाट जोह रहा था, आपकी कसम! सच कहूं महाराज, अब तो महंगाई सिर से ऊपर हो गई है। लाला बाजार में दाल को दखने के भी दाम लेने लगा है। बिन पैसे वह दाल को हाथ भी नहीं लगाने देता। सब्जियों के दर्शन किए बिना महीनो हो गए हैं। सच कहूं भगवन! आप के दर्शन करना अब आसान हो गया है पर दाल सब्जियों के दर्शन अब बड़े भाग्यशाली को ही इस देश में नसीब हो रहे हैं। जिसके घर में शाम को दाल सब्जी पक जाए वह अपने को देश का सबसे खुशनसीब मान रहा है। मैं तो जैसे कैसे रोज, बाजार जाकर ही सही दाल सब्जियों के दर्शन कर आता हूं पर पत्नी को घर में बैठे महीनों हो गए दाल सब्जियों के दर्शन किए बिना। कल तो वह सारी लोक-लाज त्याग बिगड़ ही पड़ी,` देखो अगर तुम घर में दाल सब्जी नहीं ला सकते तो कम से कम बाजार ले जाकर मुझे उनके दर्शन ही करा दो तो मैं कुशल गृहणी होने का गर्व तो अनुभव कर सकूं। अगर तुम ये भी नहीं कर सकते तो मैं चली मायके।´ पर महाराज मैंने उसे बाजार ले जाने का वचन नहीं दिया तो नहीं दिया। सोचा, मायके ही चली जाए तो भला। इस बहाने इसके पीछे पीछे ससुराल जा वहां पर दाल सब्जी तो खा आऊंगा। मुझे पता है उनकी भी इतनी हिम्मत नहीं , पर घर में आए दामाद को वे अपनी झूठी हैसियत बताने की कोशिश करेंगे और मैं दाल सब्जी खा अमरत्व को प्राप्त हो जाऊंगा।´

`डॉन्ट बी पैनिक! टेक इट इजी।´
कह उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई, भैंसे के गले में बंधे इंपोर्टेड सीडी प्लेयर का वाल्यूम और भी ऊंचा कर मुहल्ले की ओर हो लिए।

डॉ. अशोक गौतम


गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक
सोलन-173212 हि.प्र.

Thursday, June 18, 2009

जब फ्लू महाराज मेरे घर पधारे !

सच कहूं तो मैं किसी अशोक गौतम को नहीं जानता...ख़ुद-ब-ख़ुद व्यंग्य लेकर बैठक में दाखिल हो गए....बिना दस्तक दिए...हिमाचल प्रदेश जैसे दूर राज्य से चलकर आए हैं, मना कैसे करते....बताते हैं कि 20 साल पहले से ही व्यंग्य और कहानी लेखन में कलम तोड़ रहे हैं....फिलहाल, शिमला स्थित राजकीय महाविद्यालय शिमला में हिंदी संकाय में वरिष्ठ प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं....टिकने को तो जगह दे दी है, बाक़ी आप लोग तय करें कि इनसे पिंड छुड़ाना चाहते हैं कि आगे भी बर्दाश्त करते रहेंगे.....इनकी तस्वीर भी आपको दिखाए देते हैं....

जिंदगी के टंटों से बचने के लिए रोज सुबह की तरह तब भी गुणगान चालीसा पढ़ने में मग्न था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। पहले तो सोचा कि शायद मेरी भक्ति से हनुमान जी प्रसन्न होकर टंटों से रक्षा करने के लिए आ पहुंचे हों। मैं गुणगान चालीसा और भी जोर से पढ़ता हुआ फटी पैंटलून धारण किए दरवाजे की ओर लपका। दरवाजा खोला तो सामने एक निहायत अपरिचित। वह अपरिचित किसी भी कोण से परिचित नहीं लग रहा था। चाहे कितना ही मान लेता कि गुणगान अपने भक्तों को वेश बदल कर दर्शन देते हों। बचपन में दादी मां से सुना था कि न जाने किस वेश में आ जाएं गुणगान, सो न चाहकर भी उस अपरिचित के स्वागत के लिए बाहें खोलने का नाटक करना पड़ा, `आओ गुणगान! धन भाग हमारे! हमारी कुटिया में जो आप मंहगाई के दौर में पधारे।´
मैंने मुस्कराने का सफल अभिनय किया। अपने दोस्तों के बीच निरंतर उठने बैठने से मैं अभिनय में विद्या वाचस्पति हो गया हूं।
` और भक्त कैसे हो?´
कह उस अपरिचित आगंतुक ने मेरी आंखों में झांकते हुए पूछा तो लगा अपने सारे कष्ट कट गए हरिद्वार।
` ठीक हूं प्रभु! पर आप इतनी गर्मी में।´
`हम गर्मी-सर्दी से ऊपर उठे हुए बंदे हैं।´
उसने यों कहा जैसे मुझसे मजाक कर रहा हो तो उसमें मेरी जिज्ञासा और भी बढ़ी।
` आओ भीतर आओ! पर माफ कीजिएगा मैंने आपको पहचाना नहीं। अपने असली रूप में आओ तो मैं धन्य होऊं।´
कह मैंने दोनों हाथ सविनय जोड़े तो उस आगंतुक की सांसों में सांस आई।
`यार, मैं तो डरा था कि तुम दरवाजा खोलोगे ही नहीं।पर तुमने तो मेरी पहली ही दस्तक में घर का तो घर का, दिल का द्वार भी बड़ी आत्मीयता से मेरे लिए खोल दिया। सच्चाई को जितना किताबों में पढ़ा था तुम भारतीयों का हृदय आज भी उससे हजारों गुणा विशाल है।´
`प्रभु, आज के आपाधापी के दौर में बस कम्बख्त एक यह दिल ही तो हमारे पास बचा है। बाकी तो मंहगाई मार गई। अब देखो न! मंदी के इस दौर में भगवान को जलाने वाले धूप को खरीदने के भी लाले पड़ने लगे हैं। ऊपर से साहब है कि रोज शिकायत करता है कि मेरे लिए जलाने वाले धूप की क्वालिटी सुधारो वरन् छंटनी कर दूंगा। बस, अब अपने से न तो जीते बन पड़ रहा है न मरते। समझ नहीं आ रहा कि जिआ जाए या मरा जाए। बस इसी दुविधा में जी रहा हूं।´
`यही दुविधा तो हम तुम्हारी खत्म करने के लिए आए हैं। बस, अब कुछ दिनों की बात है। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।´
उसने कहा तो मन किया उसके पांव में ऐसे लोटूं जैसे पड़ोसी का कुत्ता मेरे पांव में लोटता है एक टुकड़ा रोटी के लिए।
` तो अंदर पधारिए न प्रभु! हमारे लिए आज भी अतिथि देवो भव ही है। वह चाहे आतंकी ही क्यों न हो।´
`सच!! अगर मैं कहूं कि मैं भी आतंकी ही हूं तो?´
` पचास का हो गया अतिथि! इतना तो आज का बच्चा भी जानता है कि जो आदमी कहता है असल में वो होता नहीं और जो वह कहता नहीं असल में वह वह ही होता है।´
कह मैं उस अपरिचित को मुस्कराते हुए भीतर ले आया।
पत्नी को ठंडा लाने के लिए कहा तो वह गर्म ले आई। अपरिचित ने मुस्कराते हुए गर्म ही ठंडा समझ पीना शुरू करते कहा,` डांट वरी! वैवाहिक जीवन की एक उम्र पार करने के बाद सबके साथ ऐसा ही होता है। और गृहस्थी कैसी चली है?´
`चली क्या बस खींच रहे हैं जनाब छाले पड़े पैरों पर। मां को चार साल से लकवा हो गया है। बापू सरकारी अस्पताल के हो कर रह गए हैं। जितने दिन सरकारी अस्पताल में रहते हैं, ठीक रहते हैं, घर आते ही फिर वही हाल हो जाते हैं। पहला बेटा एमबीए कर फैक्टरी फैक्टरी की धूल फांक रहा है। दूसरा एमए कर रहा है। बेटी विवाह लायक हो गई है, पर कहीं सुयोग्य तो छोड़िए योग्य वर दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रहा। ऊपर से पत्नी है कि दिन पर दिन ढलती जा रही है। ´

मैंने अपनी व्यथा कही तो वह आगंतुक गंभीर होने के बदले मुस्कराने लगा। काफी देर तक मुस्कराने के बाद बोला,
`और?´
` और क्या! ऊपर से साहब की रोज़-रोज़ की किच किच!´ कहते कहते रोना निकलन को आ गया पर उम्र का ख्याल आते ही हिम्मत कर दांत कस लिए।
`बस, अब मैं आ गया न, अब चिंता की कोई बात नहीं। अब पूरे देश में सब ठीक हो जाएगा।´
`पर हे आगंतुक आप हो कौन? आप तो ऐसे कह रहे हो जैसे इन दिनों यूपीए सरकार बोलती है।´
` बंधु, मैं स्वाइन फ्लू हूं। सरकार से बड़ा, बहुत बड़ा।´
कह उसने गिलास किनारे रख ठहाका लगाया।
`तो?´
`तो क्या! कहीं भी मुझे शरण नहीं मिली। सोचा भारत में तो कम से कम मुझे शरण मिलेगी ही। इतिहास गवाह है । वर्तमान गवाह है। इसलिए सब छोड़ चला आया। और देखो! तुमने मेरा किस गर्मजोशी से भी स्वागत किया।´
`पर यहां तुम करोगे क्या?´
`सबको बेहाल कर कर मारूंगा।´
`यहां तो सभी पहले से ही बेहाल होकर मर रहे हैं। बेकारी से भी बड़ी बेहाली और कोई होती है क्या? भुखमरी से भी बड़ी बेहाली और कोई होती है क्या? गरीबी से भी बड़ी और कोई बेहाली होती है क्या? पल पल के भय से बड़ी बेहाली और होती है क्या?ऐसे में तुम हमें क्या बेहाल करोगे, देख लेना चार दिन बाद खुद ही बेहाल होकर यहां से चले न गए तो तुम्हारे जूते पानी पीऊं।´


मैंने कहा तो उसने मेरे पांव छुए और सिर झुकाए उदास चेहरा लटकाए चला गया। उसे जाते देख पत्नी के चेहरे की रौनक देखने लायक थी।..... जो कोई अपनी व्यथा सुनावै...


डा. अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,सोलन-173212 हि.प्र.