Monday, September 21, 2009

कादम्बिनी के सरोकार और समकालीनता के सवाल (परिचर्चा)

पिछले दिनों मोहल्लालइव पर किसी प्रबुद्ध बेनामी लेखक ने लिखा कि 'कादम्बिनी क्या खाकर निकल रही है और क्यों निकल रही है'। किसी समय में कादम्बिनी की बहुत प्रतिष्ठा थी जो सांस्कृतिक और साहित्यिक जागरण के संस्कारों से सिंचित थी। हमें लगा कि हिन्द-युग्म भी एक साहित्यक-सांस्कृतिक पत्रिका है, ऐसे में इस बहस को आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रबुद्ध लोगों से राय ली जा सकती है कि क्या इस पत्रिका को छपते रहना चाहिए, इसी तरह के विषय वस्तु के साथ? इस संदर्भ में हमारी टीम ने राजेन्द्र यादव, पंकज बिष्ट, भारत भारद्वाज, मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, रामजी यादव, प्रमोद कुमार तिवारी, विमल चंद्र पान्डेय और गौरव सोलंकी से बातचीत की। मंगलेश डबराल ने कहा कि मैं हर विषय पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। बाकी लोगों ने जो कहा वह संपादित रूप में आपके सामने प्रस्तुत है। कुछ बातचीत की रिकॉर्डिंग भी सुनने के लिए उपलब्ध है॰॰॰


बड़े घरानों की पत्रिकाओं में तीखी बहसें नहीं हो पाती- राजेन्द्र यादव

ये कादम्बिनी नाम दिया था बालकृष्ण राव ने, उन्होंने यह पत्रिका निकाली थी। राजेन्द्र अवस्थी के पास आकर यह भूत-प्रेत, अंधविश्वास और ज्योतिष की पत्रिका हो गई, यानी लगभग अपठनीय हो गई। बाद में विष्णु नागर आये तो इन्होंने कुछ सम्हालने की कोशिश की, पठनीय बनाया और उपयोगी चीज़ें दी। और धीरे-धीरे लगा था कि इसका एक स्थान बनेगा। लेकिन हुआ ये कि विष्णु नागर चले गये और फिर से उसी तरह की मैगजीन हो गई जैसी सरिता ग्रुप की पत्रिकाएँ होती हैं। इनमें कोई सीरियस बात तो होती नहीं, बस पाठक होते हैं और उनका मनोरंजन होता है।

एक बात साफ कर दूँ कि बड़े घरानों की पत्रिकाओं में वो चाहे साप्ताहिक हिन्दुस्तान हो, चाहे धर्मयुग हो या चाहे कुछ तीखी बहसें नहीं हो पातीं। इन्होंने कभी नहीं की। ख़ासकर राजनीति को लेकर और सेक्स लेकर, इनमें तरह-तरह के बंधन हैं कि यह बहू-बेटियों की या परिवार की पत्रिका है। इसलिए यह उम्मीद कि यहाँ कोई बहस होगी, यह सोचना बेकार है।

हम समझते हैं कि बहुत निकल ली, काफी चल लीं। हम समझते हैं कि इसकी सामाजिक या पाठकीय उपयोगिता शून्य है। यदि प्रकाशकों को मुनाफा है तो निकाले नहीं तो नहीं।

विष्णू नागर के वक्त में मैं इसका रेगुलर पाठक था। नागर को यह पत्रिका जिस रूप में मिली थी, उससे उन्होंने बहुत बढ़िया स्थिति में ला खड़ा किया था। लेकिन जो भी थी, पठनीय हो गई थी पत्रिका। यदि विष्णू नागर जैसा कोई दूसरा संपादक इस पत्रिका को मिलता है तो इसे 1-2 सालों में फिर से पठनीय पत्रिका बनाया जा सकती है। जहाँ तक आवश्यक फेरबदल का सवाल है तो उसमें पहली बात तो मौलिक रचनाएँ छपनी चाहिएँ तथा इसे यह तय करना चाहिए कि यह कविता की पत्रिका है, कहानी की, बहस की, कला या फिर कुछ और।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰॰राजेन्द्र यादव(प्रख्यात साहित्यकार, संपादक- हंस)


कादम्बिनी एक दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है- पंकज बिष्ट

इस पत्रिका का पूरा इतिहास बहुत उतार-चढ़ाव भरा है। शुरू में जब यह इलाहाबाद से निकलनी शुरू हुई थी तो यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी, और इसमें सभी गंभीर लोग रुचि लेते थे। लेकिन जब यह हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के पास आई तो इन लोगों ने रीडर-डाइजेस्ट और नवनीत के तर्ज पर चलाना शुरू किया। इसके बाद जब राजेन्द्र अवस्थी इसके संपादक बने तो इन्होंने इसे तंत्र-मंत्र की पत्रिका बना दी। तबसे इसका पाठक-वर्ग बिलकुल बदल गया। यह एक पापुलर पत्रिका बन गई। जब विष्णु नागर जी आये तो उन्होंने सम्हालने की कोशिश की, एक गंभीर पत्रिका बनाने की कोशिश की। लेकिन दुर्भाग्यवश वे ज्यादा समय तक इसमें नहीं बने रह पाये, उसी का परिणाम है कि अब यह लगभग दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है। इसके संपादकों को यह नहीं समझ में आ पा रहा है कि उन्हें छापना क्या है, इसका टारगेट-रीडर्स कौन है।

एक बात मैं कहना चाहूँगा कि साप्ताहिक या मासिक पत्रिकाओं का संपादन बहुत मुश्किल है। दैनिक पत्रों में समाचार का फ्लो इतना तेज़ है और अलग-अलग पत्र एक ही ख़बर को इतने तरह से कवर कर देते हैं कि मासिक पत्रिका के संपादकों के सामने यह चुनौती होती है कि कैसे वह कुछ नया और सार्थक परोसे और अपना पाठक-वर्ग बचाये रखे।

अगर मालिक चाहे, उसमें इच्छाशक्ति हो तो एक समर्थ संपादक वह चुन सकता है जो बड़े आसानी से पत्रिका को बचा सकता है। हिन्दुस्तान में यह हालत नहीं है कि यह पत्रिका न चले, इस तरह के कंटेंट वाली कोई और मासिक पत्रिका है भी नहीं जिसे इतने बड़े घराने का समर्थन प्राप्त हो। वे चाहें तो इसे बहुत बढ़िया बना सकते हैं। लेकिन पता नहीं ऐसा क्यों है कि व्यवसायिक घराने अपनी हिन्दी पत्रिकाओं के लिए कभी भी बहुत अच्छे सम्पादक चुनते ही नहीं। यदि कोई पत्रिका जो टेलीविजन में दिखाया जाता है, उसी की प्रिंटेंड नकल हो तो उसका कोई भविष्य नहीं है।

मैं विष्णु नागर के समय में इस पत्रिका को स्थाई तौर पर देखता था। राजेन्द्र अवस्थी के समय में मैंने इसे देखना भी पसंद नहीं किया। अब मैं इसपर ध्यान नहीं देता।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰पंकज बिष्ट (वरिष्ठ कथाकार, संपादक- समयांतर)


गीली लकड़ी की तरह धुँआने से बढ़िया है भभककर जल जाये- भारत भारद्वाज

कादम्बिनी हिन्दी में निकलने वाली कुछ पुरानी पत्रिकाओं में है। कादम्बिनी का संपादन 1961 में इलाहाबाद से बालकृष्ण राव ने किया था और उस समय इसका पूर्णतः साहित्यिक स्वरूप था। लेकिन बाद में संपादक बदलते-बदलते इसका स्वरूप धीरे-धीरे बदलते-बदलते पूरी तरह से बदल गया। पत्रिका की साहित्यिक प्रवृति नष्ट करने में सबसे बड़ा योगदान है राजेन्द्र अवस्थी का। यह भूत-प्रेत और तमाम धार्मिक अंधविश्वास से लदी पत्रिका तो थी ही विष्णु नागर में टाइम में सेलिब्रिटीज की पत्रिका हो गई। बाद में विजय किशोर मानव ने इसी में थोड़ा-बहुत बदलाव कर दिया।

कादम्बिनी के हर तरह के पाठक थे। साहित्य के तो थे ही, साहित्येत्तर अनुशासन की बहुत सी चीज़े इसमें होती थीं। आर्थिक अभाव के कारण यह पत्रिका बंद नहीं हो रही बल्कि नई अर्थनीति के कारण यह बंद हो सकती है। लगभग 50 साल से यह पत्रिका निकल रही है। मेरा अंदाज़ है वीणा के अलावा (जो 81 साल से निकल रही है) बाद हिन्दी की यह दूसरी पत्रिका है जो इतने लम्बे समय से निकल रही है। अब बहुत निकल ली।

इस पत्रिका के चरित्र में लगातार फेर-बदल हुए। ख़ास तरह की पत्रिका के ख़ास तरह के पाठक होते हैं। इस पत्रिका के हमेशा से ही पाठक बदलते रहे। राजेन्द्र अवस्थी ने इसे जहाँ पहुँचा दिया था उससे इसका जो पाठक-वर्ग तैयार हुआ था, उसे विष्णु नागर से बिलकुल बदल दिया।

हाँ, मैं इस पत्रिका को लम्बे समय से देखता रहा हूँ। 70 के दशक के भी मैंने इसे देखा है, विष्णु नागर के ज़माने में भी और मैंने इसका पिछला अंक भी देखा है। एक अच्छी पत्रिका थी अपने जमाने में, इसकी एक प्रतिष्ठा थी। मेरा कहना है कि गीली लकड़ी की तरह धूँ-धुँआने से बढ़िया है कि भभक कर जल जाये। जब किसी पत्रिका की भूमिका खत्म हो रही हो, उसका तात्पर्य ही न हो तो क्या मतलब है निकलने का! लेकिन बिना किसी सामाजिक भूमिका और हस्तक्षेप के बहुत सी पत्रिकाएँ निकलती रहती हैं। 41 साल से गोपाल राय का संबोधन उदाहरण है। किसी से पूछिए कि आप 'समीक्षा' देखते हो? इसी तरह मुझे लगा कि 'वीणा' बंद हो गई है।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰भारत भारद्वाज (आलोचक, संपादक-पुस्तक-वार्ता)


कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है- मदन कश्यप

सुनें-
कादम्बिनी तो इन दिनों मैं पढ़ भी नहीं रहा हूँ, पहले भी नहीं पढ़ता था। लेकिन नागर जी जब सम्पादक हुए, तो उन्होंने कुछ ऐसी चीजें छापी, जिसके कारण उसको पढ़ने और लिखने में हमारी रुचि हुई थी। जब से नागर जी हटे हैं, मैंने इसका कोई अंक नहीं देखा है। तो अब क्या छप रहा है, यह भी मुझे नहीं मालुम है।

लेकिन मुझे लगता है कि लगातार इसकी पाठक-संख्या घटने का एक बड़ा कारण यह रहा कि हमारे समय के सांस्कृतिक सवालों से जूझने की बात तो छोडिए, तालमेल मिलाकर चलने वाली भी पत्रिका नहीं रही। बिलकुल अपनी डफली-अपना राग की तरह। अगर नागर जी के पीरियड को आप छोड़ दीजिए तो इस पत्रिका में कुछ नहीं था।

हर पत्रिका का अपना एक चरित्र होता है। फिर भी नागर जी ने हर स्तम्भ को रोचक बनाने की कोशिश की। लेकिन जिस तरह से एक कवि की एक कविता और दो पेज़ पर 4,5-6 कवियों की कविताएँ छापते थे। इस शिल्प में इसका कोई स्वरूप बन ही नहीं सकता है। फिर भी कुछ बन रहा था, लेकिन लग रहा था कि कुछ बन रहा है।

कोई पत्रिका महत्वपूर्ण कब होती है, जब वो समय में हस्तक्षेप करे। कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। अगर उससे मुनाफ़ा हो रहा हो तो ओचित्य हो सकता है, लेकिन मालिकान के लिए।

शुरू में यह इतनी बुरी नही थी। लेकिन दिन-दिन प्रतिदिन बुरी होती चली गई। राजेन्द्र अवस्थी के टाइम में भूत-प्रेत की झूठी कहानियाँ छपती थीं, वो भी पैसे लेकर। एक बार कादम्बिनी में छपा कि पटना में बुद्ध मार्ग में एक मंदिर में बाबा है जिन्हें वनदुर्गा सिद्ध है। यह मंदिर तो मेरे कॉम्प्लेक्स के बगल में था। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं ऐसे किसी बाबा के बारे में नहीं जानता, जो मेरे बगल में रहते हैं। लेख भगवती शरण मिश्र का था। बहुत पता लगाया तो मालुम पड़ा कि वह बाबा भगवती शरण मिश्र के संबंधी हैं।

बाद में पता चला कि उसी बाबा ने एक पत्रिका निकाली। जब बाबा से पूछा गया कि आपने पत्रिका क्यों निकाली, तो उन्होंने बताया कि राजेन्द्र अवस्थी छापने के लिए 3 लाख रुपये माँग रहे थे, तो मैंने सोचा कि इतने में तो एक इस तरह की पत्रिका हम खुद निकाल सकते हैं।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

मदन कश्यप (कवि, संपादक- द पब्लिक एजेंडा)


एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो - रामजी यादव

सुनें-
किसी भी पत्रिका का महत्व इस बात में है कि वह समकालीन विमर्श में क्या भूमिका निभाती है। इस हिसाब से देखा जाये तो अलग-अलग दौर में, अलग-अलग पत्रिकाओं की अपनी जगह रही है और वे लगभग अनियतकालिन और साधनहीन स्थितियों में निकलती रही है। ढेरों अध्यापक और साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होनें उस पत्रिका को विकसित करना अपना एक महत्वपूर्ण सरोकार समझा और उन्होनें इसे निभाया भी, लेकिन 80 के दशक में कुछ पत्रिकाएँ ऐसी निकलीं जो बड़े घरानों की पत्रिकाएँ थी। मसलन टाइम्स ऑफ़ इंडिया का धर्मयुग और हिन्दुस्तान टाईम्स का साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बनी इत्यादि। इससे पहले इन्हीं दोनों घरानों में से किन्हीं का रविवार और दिनमान भी हुआ करता था, रविवार और दिनमान एक बहुत अच्छे सम्पादकीय टीम का बहुत अच्छा उदाहरण हैं। जिसमें एक साथ रघुवीर सराय और अज्ञेय जैसे लोग एक समय में काम करते थे।

धर्मयुग ने स्वयं एक ज़माने में बहुत बड़े-बड़े लेखकों को एक बडा मंच दिया और वे लेखक मुख्य धारा के साहित्य में आये लेकिन आज शायद मुश्किल से ऐसे लोगों की गिनती की जा सकती है जो किसी ज़माने में धर्मयुग में छपते थे और हीरो हो जाते थे। आज उनकों हम नहीं जानते, किसी भी रुप में नहीं जानते। वे सारे दोयम दर्जे के कहानीकार-रचनाकार है जिनको दोहराना आज के सन्दर्भ में संभव नहीं है।

जहाँ तक कादम्बिनी की बात है, कादम्बिनी ने साहित्य के इतिहास में या समकालीन इतिहास में कोई मील का पत्थर रखा हो ऐसा कहना मुशिकल है और एक तरह से ज्यादती भी है क्योंकि उस पत्रिका की जो सीमायें थीं वह उसके सम्पादकों की भी अपनी सीमायें थीं। सम्पादक प्रायः नौकरियाँ करते थे और साहित्यकार थे इसलिये उन्होंने साहित्य को एक कैप्सूल की तरह अपने यहाँ से बेचने का काम किया।

एक ज़माने में इस कादिम्बनी में काफी साहित्यिक चीज़ें होती थीं, लोग समझते थे लेकिन जो भूमिका सामान्य जन के भीतर सरिता आदि ने निभाई, जैसे हिन्दू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास इत्यादि कालमों और दूसरे ऐसे अंधविश्वास विरोधी लेखों से समाज को जो रास्ता दिखाया, कादिम्बनी की ऐसी ज़गह कभी नहीं रही। कादिम्बनी मुख्यधारा से साहित्यकारों के प्रेम प्रसंगों, उनके कुछ चर्चित-कुचर्चित प्रसंगों और गैर ज़रूरी बहसों और साक्षात्कारों को छापती रही, जिसमें संवेदना में किसी किस्म का विचलन नहीं पैदा होता या विचार में किसी किस्म की दृढ़ता नहीं पैदा होती थी, लेकिन हम देखते हैं कि बाद में कादिम्बनी में आमूल-चूल परिवर्तन हुये, खासतौर पर विण्णु नागर के सम्पादकत्व में। जब इसको विष्णु नागर ने सम्पादित करना शुरू किया तो पहले तो इसका रूपाकार बदला। हम देखते हैं जिस तरह की सामग्री वह लगातार छापते रहे हैं, उस सामग्री में उस तरह की बात नहीं थी जिसे कहा जाये कि इन्होनें कोई नई बात कही है, वो बहुत पुरानी चीज़ें, बहुत पुरानी कहानियाँ, बहुत स्थापित किस्म के सेलिब्रिटीज और लेखक अभिनेता और गायक और दूसरे-दूसरे महफिलबाज़ किस्म के लोगों की आकांक्षाओं की पत्रिका रही है। इस पत्रिका का दाम तमाम लघुपत्रिकाओं के मुकाबले एक दुखदायी पक्ष रहा है। 25 या 30 रूपये दाम रखना भारत जैसे गरीब देश के, साधारण निम्नवर्गीय पाठक के साथ बड़ी ज्यादती है। चूँकि यह घराने की है और इसको पर्याप्त रूप से विज्ञापन भी मिलते हैं, इसके पास आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी बनी हुयी है तो यदि अपना सरोकार वो जनता और निम्न समाज से तय करती है तो उसे अपने दाम में कटौती कर देनी चाहिये और लगातार इस तरह की सामग्री देनी चाहिये जिससे कि लोगों को लगे कि कादिम्बनी पढ़ने से उनके विचारों में खूबी पैदा होगी या कादिम्बनी में ऐसी सूचना होगी जो दूसरी कहीं नहीं है या अभी तक नहीं मिली।

जहाँ तक उसके चलने या पढ़ने या बंद करने का सवाल है, इन हालात में उसके बंद होने से किसी को कोई हानि नहीं होगी और चलते रहने से किसी को कोई लाभ भी नहीं होगा। ये कहीं भी साहित्य के इतिहास में किसी मुकाम पर नहीं पहुँचती है। यह एक घराने की है और घराने के नौकर इसके संपादको की भूमिका निभाते हैं, जिनकी समझ बहुत कम है। इसलिये अगर लोगों का इरादा बिरला घराने, टाटा घराने या जैन-साहू घराने से या इस तरह से पैसे को लेकर है तो जैन साहू घराने, बिरला घराने को भी लोगों की आकांक्षओं का ध्यान रखना चाहिये, अगर वे नहीं रखते हैं तो उनकी पत्रिकाओं के बंद होने या चलने में किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

मैं कभी इस तरह की पत्रिका नहीं पढता। दूर दराज़ के छोटे शहरों और बाकि जगहों से प्रतिबद्ध और सरोकारों वाली पत्रिकाएँ ही पढ़ने की जरुरत पड़ती है और मैं कादिम्बनी इसलिये भी नहीं पढ़ता क्योंकि इसमें मेरे पढने लायक कोई सामग्री नहीं होती।

ऐसा नहीं है की कोई मैं अपनेआप को महान या बौद्धिक लेखक समझता हूँ बल्कि एक ऐसे बेचैन युवक के रूप में अपने आप को देखता हूँ जिसे बहुत कुछ जानना है और साहित्य उसके लिये बड़ा माध्यम है। मुझे दिखता है कि एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो जबकि उसके अभी के सभी अंक देख चुका हूँ।
(शैलेश भारतवासी से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰रामजी यादव (कवि-कथाकार, फिल्ममेकर, आलोचक)


कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है- प्रमोद कुमार तिवारी

कादम्बिनी पत्रिका बहुत से उतार-चढ़ाव से होकर गुजरी है। राजेन्द्र अवस्थी के समय यह काल-चिंतन और भूत-प्रेत की पत्रिका रही, वहीं विष्णु नागर जी के दौर में इसमें साहित्य और सरोकार की गूँज सुनाई देने लगी। और फिर से अपनी प्रतिष्ठा पाने लगी। आज की तारीख में यह साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका होने की बजाय आनंद, मस्ती, सैर-सपाटा आदि की एक पापुलर पत्रिका होने की तरफ अपने कदम बढ़ा रही है। पत्रिकाएँ दो तरह की होती हैं, एक वो जिन्हें पाठक खोजकर पढ़ता है, दूसरी वो जिससे पाठक टाइम पास करता है। कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है। मुझे याद है कि नागर जी के समय में इस पत्रिका में मेरे लिए कम से कम 30-35 मिनट की सामग्री होती थी, लेकिन आज 5 मिनट का कंटेंट भी नहीं होता।

अब हिन्दुस्तान समूह में मृणाल पाण्डेय के बाद शशि शेखर आये हैं। जब नया व्यक्ति आता है तो उसके अपने नये संस्कार होते हैं। लेकिन किसी चल रहे सिस्टम को समझने में वक्त तो लगता है। इनसे उम्मीदें हैं कि शायद कादम्बिनी फिर से अपना मुक़ाम हासिल करे। लेकिन इतनी जल्दी मैं कोई टिप्पणी नहीं करूँगा।

कादम्बिनी की अपनी एक सामाजिक उपयोगिता रही है। बहुत पुरानी पत्रिका है, जिसने सामाजिक जागरुकता फैलाने वाले कई स्तम्भ चलाये। एक समय में यह पत्रिका बाल पत्रिकाओं और गंभीर पत्रिकाओं की बीच की कड़ी थी। इसके वर्तमान रूप से मुझे निराशा हुई है, लेकिन हर पत्रिका का यह दौर आता है, मुझे लगता है कि यह परिस्थितियाँ बदल जायेंगी।

॰॰॰प्रमोद कुमार तिवारी (युवा लेखक व पत्रकार)


कादम्बिनी चर्चा करने लायक पत्रिका ही नहीं है- विमल चंद्र पाण्डेय

किसने कहा कि कादम्बिनी की रीडरशीप घट रही है! मुझे लगता है कि कादम्बिनी को स्यूडो-इंटलैक्चयूल तरह के बहुत से पाठक अभी भी इससे जुड़े हैं और अब तो यह पूरी तरह से बाज़ारू पत्रिका हो गई है। और इसपर हमारे बोलने न बोलने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे पिताजी इस पत्रिका को घर लाया करते थे। तब उनका उद्देश्य अलग था, इसमें बहुत सी ज्ञानवर्धक बातें होती थीं, लेकिन अब तो भूतों-प्रेतों पत्रिका बनकर रह गई है। यह पत्रिका कभी भी इतनी स्तरीय नहीं रही कि इसपर राजेन्द्र यादव जैसे लोगों को टिप्पणी करनी पड़े। मेरी कविताएँ भी इसमें 'पहचान' स्तम्भ के अंतर्गत छपी थी, जिसमें से एक कविता का सार जो कि उसके अंतिम पंक्तियों में था ही उड़ा दिया गया था। मेरा मानना है कि इसके बंद होने या चलने, पाठक संख्या घटने-बढ़ने पर कोई चर्चा ही नहीं होनी चाहिए।

॰॰॰विमल चंद्र पाण्डेय (नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत हिन्दी युवा कहानीकार)


कादम्बिनी ने अपने ही पाठकों को ठेंगा दिखलाया है- गौरव सोलंकी

मैं कभी कादम्बिनी का नियमित पाठक नहीं रहा लेकिन मैंने इसके बदलते हुए रूप पर ज़रूर ग़ौर किया है और इसके बारे में लोगों से बात भी करता रहा हूँ। छ:-सात महीने पहले का कोई अंक मैंने देखा था। मैं यदि कुछ साल पहले की स्थिति को याद करूँ तो यह प्रबुद्ध पाठकों की पत्रिका थी जिसे पढ़ने पर एक किस्म की बौद्धिक समृद्धि का अनुभव होता था। इसका पाठक वर्ग यदि कम हो रहा है तो कम होने का सीधा सा कारण है कि इसने अपने उन्हीं पाठकों को ठेंगा दिखलाते हुए अपना रूप बदल लिया है जो इसकी नींव से जुड़े हुए थे। बाज़ार के चक्कर में कादम्बिनी ने अपना स्तर बच्चों या किशोरों की पत्रिकाओं जैसा बना लिया है। मैंने हाल ही में कादम्बिनी देखी तो मुझे किशोरों की पत्रिका 'सुमन सौरभ' की याद आई। मैं तो बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूँ। इसे छापने वाले लोग भी शायद ठीक से नहीं जानते कि वे किसके लिए पत्रिका निकाल रहे हैं। यदि वे कम पढ़े लिखे आम पाठक की पसन्द तक आना चाहते हैं तो याद रहे कि उन पाठकों के पास इससे कहीं बेहतर विकल्प पहले से ही मौज़ूद हैं। कोई भी उस सामग्री से कैसे संतुष्ट हो सकता है जो दैनिक अख़बारों के बालमंच वाले पृष्ट जैसी हो या इंटरनेट से उठाई गई 'ज्ञानवर्द्धक' सामग्री। मैं कभी कादम्बिनी में प्रकाशित नहीं हुआ।

॰॰॰गौरव सोलंकी (चर्चित युवा कहानीकार व कवि)


आज यानी 25 सितम्बर 2009 को हमें कुछ और प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, जिसे हम प्रकाशित कर रहे हैं।


कादम्बिनी पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई- प्रियदर्शन

एक अरसे से कादंबिनी देख नहीं पाया हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल अखबारों और किताबों से फुर्सत नहीं मिल पाती। इत्तेफाक से कादंबिनी छूटती चली गई। सच कहूं तो कभी खरीद कर पढ़ने की ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई। इसकी कोई वैचारिक वजह भी नहीं। बस इसे पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई। विष्णु नागर जी संपादक थे तो ओलंपिक पर कवर स्टोरी लिखी थी। और भी थोड़ा-बहुत लिखना तभी हुआ था। तब थोड़ा अच्छी भी लगती थी कादंबिनी।
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰प्रियदर्शन (वरिष्ठ पत्रकार)


कादम्बिनी को बंद करने की बात एक अतिरेकी कथन है- पंकज सिंह

रामानंद दोषी के ज़माने से कादंबिनी को देख रहा हूं। उस वक्त इसका डाइजेस्ट वाला स्वरूप था, अच्छा भी लगता था। फिर राजेंद्र अवस्थी संपादक हुए तो कुछ परिवर्तन भी किए। उन्होंने परिचर्चाओं के ज़रिए कादंबिनी को समकालीन से जोड़ने की कोशिश भी की। कोई भी पत्रिका ये तो दिखाती ही है कि उसकी बौद्धिक तैयारी कैसी है। बाद में कादंबिनी राजेंद्र माथुर की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं (व्यापक अर्थ में) का शिकार हो गई। फिर विष्णु नागर ने पत्रिका का बड़ी विनम्रता (इतनी ज़रूरी भी नहीं थी) से कायांतरण किया। कई नए स्तंभ, कई नई परिकल्पनाएं दिखीं।

फिर भी किसी का ये कहना कि कादंबिनी जैसी पत्रिका को बंद हो जाना चाहिए, कोरी बकवास है। ये अतिरेकी कथन है। मैं तो कहता हूं कि हंस को बंद हो जाना चाहिए। हंस राजेंद्र यादव की मानसिक विकृतियों का आईना रहा है। पत्रिका सिर्फ संपादक की नहीं होती। कादंबिनी में हरेप्रकाश उपाध्याय जैसे युवा कवि भी शामिल हैं। कादंबिनी में लिखने वाले हंस में लिखने वालों से बेहतर हैं। ये हो सकता है कि पढ़नेवालों को कादंबिनी से अपेक्षाएं ज़्यादा हों।

मैंने नागपुर के पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में सत्ता प्रतिष्ठान के विरोध में युवाओं के बड़े समूह का नेतृत्व किया था। कादंबिनी ने फोटो के साथ इंटरव्यू छापा था। विष्णु नागर ने भी कुछ कविताएं छापीं, फिर पति-पत्नी का संयुक्त लेख भी छपा। नियमित लेखक कभी नहीं रहा, पाठक अभी भी हूं। मेरे अनुसार जीवन में सिर्फ साहित्य ही महत्वपूर्ण नहीं है। मैंने बीए किया इतिहास में, जेएनयू से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर शोध किया, साहित्य से जुड़ाव भी है। मतलब, कादंबिनी ज़िंदगी के पूरे विस्तार को समेटने की कोशिश करती है, तो ये सराहनीय कदम है। वर्तमान संपादक ने कम से कम कोई क्षरण किया हो, ऐसा नहीं लगता।
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰पंकज सिंह (कवि, आलोचक)


जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसका तो सम्मान करें- पूर्णिमा वर्मन

अबकी बार अगस्त में जब मैं भारत से इमारात लौटी तब इकोनॉमी क्लास का टिकट नहीं मिला मजबूरन बिजनेस क्लास में बैठना पड़ा। एअर होस्टेस पत्रिकाओं वाली ट्रे लेकर आयी तो एक दो पत्रिकाएँ हटाकर देखा कि क्या कोई हिंदी पत्रिका है। मुझे कादंबिनी दिखी तो उठा ली। रूप रंग अलग, आकार अलग, पहला पन्ना खोलते ही ऐसा तमाचा पड़ा कि यात्रा का स्वाद ही खराब हो गया। लेख था- "हिंदी जेहादियों से डर लगता है।" लेख में सिद्ध किया गया था कि हिंगलिश ही बोलनी चाहिए। लिखने पढ़ने वाली हिंदी बोलना जेहाद है।

इस प्रकार के लेख प्रकाशित करने वाली हिंदी पत्रिका का प्रकाशित होना हिंदी लिखने, पढ़ने, बोलने वालों के लिए कलंक की बात है। हम जैसे लोग जो दिन-रात विदेशों में हिन्दी के प्रसार के लिए प्रयत्न कर रहे हैं भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में ऐसा कुछ देखें तो दिल टूटना स्वाभाविक ही है। एक समय था जब घर में इसकी प्रतियाँ डाइजेस्ट की तरह संभाल कर रखी जाती थीं। सब पुरानी पत्रिकाएँ अखबारों के साथ रद्दी में बिकती थीं लेकिन यह नहीं बेची जाती थी। रुपरंग बदलना स्वाभाविक है लेकिन जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसके प्रति सम्मान तो होना चाहिए।

कुल मिलाकर यह कि गलती पत्रिका की नहीं क्लास की है। बिजनेस क्लास का टिकट लिया तो भुगतना तो था ही। आराम से इकोनॉमी में बैठती। वहाँ एअर होस्टेस पत्रिकाओं के लिए परेशान नहीं करती। दो घंटे सोती और चैन से घर पहुँचती।
(ईमेल द्वारा प्राप्त)

॰॰॰पूर्णिमा वर्मन (बहुतचर्चित ऑनलाइन हिन्दी पत्रिकाएँ अनुभूति और अभिव्यक्ति की संपादिका)


~पढ़ें और अपने मित्रों को पढ़ायें। यह परिचर्चा ईमेल से अपने मित्रों को भेजें~

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25 बैठकबाजों का कहना है :

काजल कुमार Kajal Kumar का कहना है कि -

छपने दो भाई कूड़ा ही सही, कुछ तो छप रहा है..कूड़े के बीच ही सही, वर्ना हिंदी पत्रिकाओं की हालत बुज्रुर्गों के मोहल्ले की सी हो चुकी है... आए दिन किसी न किसी पत्रिका के बंद होने की ही ख़बर आती है.. और बाक़ी तथाकथित बड़ी पत्रिकाऐं एक दूसरे पर कीचड़ उछालने व ख़ुद को महान सावित करने से ही फुर्सत नहीं पातीं...

Manju Gupta का कहना है कि -

१९७० के दशक में इसे पढ़ती थी ese तो साहित्यिक ख्याति प्राप्त थी .अब तो विवादों में है .सभी विद्वानों के विचार पढे .ऐसी किताबें उपयोगी हैं .

Nirmla Kapila का कहना है कि -

बहुत पहले पढा करते थे मगर फिर छोड दी कीमत के हिसाब से भी पाठक को उतनी सामग्री नहीं मिलती जितनी वो किसी साधारण पत्रिका से भी ले लेता है। बकी काजल जी सही कह रहे हैं बडी पत्रिकायें बडे लोगों के महिमामंडन के लिये ही होती हैं

श्याम त्रिपाठी का कहना है कि -

श्रद्धेय सम्पादक जी नमस्कार ,
कुछ दिन हुए मेरे एक हिंदी प्रेमी मेरे लिए ' कादम्बिनी' का एक अंक भारत से ले आये | मैंने उसे बहुत ध्यान से देखा और कई बार देखा | लेकिन कुछ असमंजस में पड़ गया | पत्रिका इतनी पुरानी होकर उसमे कोई दम नहीं दिखा | यह पत्रिका किसके लिए ? और इसमें कोई आकर्षण नज़र नहीं आया और मैंने कादम्बरी को अपने दोस्त को वापस कर दिया | मै खुद एक सम्पादक हूँ , और पिछले १३ साल से कनाडा से ' हिंदी चेतना ' नामक पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन कर रहा हूँ | पत्रिका को कैसे चला रहा हूँ यह मेरा दिल जनता है , कैसे उसके लिए पैसा माँगता हूँ और फिर पाठकों तक नियमित रूप से निकालता हूँ | मेरा यह जोश है , मेरे साथ मेरी एक टीम है जो मुझे रास्ता दिखाती है और मै बहुत खुश हूँ कि यह यों ही निकलती रहे | कादम्बिनी बंद करने से पहले आप लोग सोंचे और इसे एक नया रूप दे। नए लेखक नया सम्पादक मंडल बनाएं और कुछ अच्छे काम करने वाले लोगों को लें तो कुछ बात बन सकती है | अगर यह ५० साल तक चल सकती है तो यह ५० साल और चल सकती है।

श्याम त्रिपाठी, संपदाक- हिन्दी चेतना

rajabhai kaushik का कहना है कि -

नम्स्कार ! शैलेश जी
अच्छा प्रयास कर रहें है मार दिया जाय कि छोड दिया जाय वो भी सब को पूछ्कर निरंकुश शासक की तरह जी में आया ओर कर दिया आपकी हमारी विचारधारा नही रही है लेकिन कादम्बिनी ने पाठ्कों के साथ कुछ एसा ही किया जब जी मे आया पाठ्को को अधर में छोड अपना रूप बदलती रही मैने सन 88 में एक रद्दीवाले की टाल में इसे पढा तो उस्से प्रभावित होकर रद्दी वाले के पास आई हुई सन 1961 से1984 तक की सभी पत्रिकायें खरीद ली आज भी वो सब मेरे पास है लेकिन उनमें मुझे कुछ खास नही मिला इसकी स्वतंत्र विचारधारा नही है

अनिरुद्ध जैन का कहना है कि -

माननीय दुख तो यह है कि कौन सी पत्रिका कूडा नही हो गयी है? क्या हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय जैसी पत्रिकायें भी अब छपने का अधिकार रखती हैं? लेखक ही कहाँ तमीज के रह गये हैं और संपादक भी माशा अल्ला हैं। बहस से भी यही समझ आता है कि संपादक बदलो तो पत्रिका ठीक हो जायेगी? कोई जुगत है कि सारे मठाधीश संपादक एक साथ वोलेण्टरी रिटायरमेंट लें ले? पर फिर नये से भी क्या उम्मीद कर सकेंगे बिना पत्रिका पढे पत्रिका पर बहस करने वाले भी कम नहीं हैं तो साहब भैंस गयी है पानी में।

shanno का कहना है कि -

कादम्बिनी को मैं भी अपने समय में, जब मैं भारत में थी, तो पढ़ती थी कभी-कभार. इसका मुख्य पृष्ठ तो आकर्षित करता ही था साथ में लेख वगैरा भी अच्छे होते थे. इसी तरह से माया, मनोरमा, मनोहर कहानियां, सरिता, सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि भी तमाम किताबें घर में मंगाई जाती थीं. इतने अरसे बाद आज अचानक कादम्बिनी का नाम सुना और इसके बारे में, जिससे मैं बिलकुल अनभिज्ञ थी, सबके बिचार-विमर्श सुने तो मुझे अचानक उन पलों की याद आ गयी जब मैं इसे पढ़ते हुए इसमें खो जाती थी.....और अन्य उन सब किताबों की भी याद आ गई. अब इसके साहित्यक रूप में यदि कुछ विकार आ गया है तो लोगों में मतभेद होना बाजिब है.वैसे मुझे तो श्याम त्रिपाठी जी की बात कुछ जँच रही है की.... क्यों न नया संपादक मंडल बनाया जाए और नये लेखकों को इसमें शामिल किया जाये....

रविकान्त का कहना है कि -

किसी भी पत्रिका का बंद होना वैसे तो अफ़सोसनाक होना ही चाहिए. पर यहाँ उद्धृत ख़यालात से
लगता है कि कादंबिनी कुछ सही नहीं जा रही थी, और उसका चले जाना ही बेहतर है. मैंने भी काफ़ी
समय से उसको पढ़ने की ज़रूरत नहीं समझी. एकाध बार ललक कर उठाया भी तो एकाध चीज़ पढ़ कर
पटक देने के लिए ही. मेरा अपना बचपन धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादंबिनी और नवनीत की
संगति में बीता है. एक समय था जब राजेन्द्र अवस्थी बहुत बड़े काल-चिंतक लगते थे, क्योंकि वो चौंका
देने वाली बातों की पूरी क़तार खड़ी कर देते थे. पर बाद में तो हमें लगने लगा कि कोरा बकवास कर
रहे हैं. ख़ास तौर पर जब भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र के विशेषांक अबाध रूप से छपने लगे तो निराशा होने
लगी थी. बहरहाल कोई भी पत्रिका अगर लाखों की तादाद में बिकती थी तो ज़रूर कोई न कोई
तबक़ा उसे काम की चीज़ मानता होगा. मत भूलिए कि कई शहरों में कादंबिनी क्लब थे, लोग उसके
मँड़वे तले नाना प्रकार के साहित्यिक आयोजन करते थे, और कादंबिनी का स्तर बनाए रखने की
अपनी तरफ़ से काफ़ी कोशिश करते थे. और कई नए कवियों ने तो अपने हस्ताक्षर
पहले-पहल वहीं किए होंगे.

अगर आप इसे नॉस्टैल्जिया मानकर ख़ारिज न कर दें तो मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि डॉ. सरोजनी
प्रीतम की हँसिकाएँ मैं बड़े चाव से पढ़ता था. यह एक बिल्कुल नई विधा थी, हास्य-व्यंग्य से लबरेज़
चुटीली और बाक़ायदा गेय. बुद्धि विलास नामक स्तंभ कभी-कभी अच्छा होता था, पारिभाषिक शब्दा
वली वाला स्तंभ तो वाक़ई उपयोगी होता था. पर सबसे मज़ा मुझे उसके सबसे बड़े
स्तंभ - सार-संक्षेप - को पढ़ने में आता था. दुनिया भर की कई शास्त्रीय साहित्यिक कृतियों से मेरी
पहली मुलाक़ात इसी स्तंभ के ज़रिए हुई. उनको मूल से तो मिलाने का कभी मौक़ा नहीं मिला पर
लगता था कि उस स्तंभ पर काफ़ी मेहनत किया जाता था, वह हिन्दी पाठकों के लिए शेष
विश्व साहित्य का झरोखा सा था. और उसमें प्रवाह भी अद्भुत होता था, यानी उल्था करने वाले की
प्रतिभा की आपको तारीफ़ करनी पड़ेगी.

पर घर से हाॉस्टल आने पर कादंबिनी का साथ जैसे छूट गया. कोई ढंग का संपादक उठाकर चला ले तो
शायद अच्छा होगा. या वक़्त बदल गया है, और कादंबिनी टाइप के पाठक क्या अहा ज़िन्दगी पढ़ने
लगे हैं, जैसे कि मैं?

रविकान्त (सराय)

मनोज कुमार का कहना है कि -

इतने बड़े लोगों के इतने बुरे विचार एक पत्रिका के प्रति या उससे जुड़े व्यक्ति के प्रति है? मैं इसे सत्तर के दशक से पढ़ रहा हूं। यदि पढ़ने में मन नहीं भी लगा तो खरीद तो रहा ही हूं। हिंदी की प्रत्रिकाएं वैसे ही साल-दर-साल कम होती जा रहीं हैं। अब ऐसे विचारवान लोग वर्षों से जी रही पत्रिका को क्या मारना चाहते हैं ? इनमें से कुछ लोग अपनी भी पत्रिका निकाल रहें हैं। उनकी कौन सी सारी रचानाएं, सारे विचार सभी को भाते हैं। अपना-अपना विचार है, अपनी-अपनी विचारधारा। कोई इस खेमा से जुड़ा है तो कोई उस खेमा से। हिंदी को खेमों में मत बांटो। भूत-प्रेत भी हमारे साहित्य और संस्कृति के अंग हैं।

Vivek Ranjan Shrivastava का कहना है कि -

प्रश्न है कि कादम्बिनी की यह दशा क्यो हुई ? और उसकी व्यवसायिक दिशा जिस पर वह वर्तमान में चल पड़ी है ..इसके कारण क्या हैं ? उत्तर स्पष्ट है कादम्बिनी को कोई साहित्य सेवा समिति नही चला रही .न ही यह अनियतकालीन लघु पत्रिका है ..जिसे निकालने वाले के व्यक्तिगत साहित्यिक सुख अनुभव के चलते वह हिन्दी सेवा भाव से चलती रहे . पठनीयता की कमी ही सबसे बड़ी समस्या है ....जहां महिला पत्रिकाओ की हल्की फुल्की सामग्री , सेक्स , रेसिपी , वगैरह वगैरह के कारण वे बिक रही है वही , अंग्रेजी माध्यम के स्कूलो की संख्या में बेतहाशा वृद्धि के कारण कादम्बिनी के मूल स्वरूप के नये पाठक दिन ब दिन कम हो रहे हैं .. हम जो लोग ५स विषय पर ५तनी चिता कर रहे हैं उनमे से कितनो को ..दूसरो को गंभीरता से पढ़ने का समय है ? .. मैं समझता हू कि इन बिंदुओ पर सोचे तो हम स्वतः ही कादम्बिनी व उस जैसी पत्रिकाओ की वर्तमान दशा का उत्तर पा सकेगे ... मुझे स्मरण है कि कादम्बिनी के लगभग समानांतर आख्यायनी प्रारंभ हुई थी ..और चंद अंको के साथ ही उसे बंद करना पड़ा था.. दुआ करे कि कादम्बिनी निकलती बनी रहे ..स्वरूप तो हमारी मांग पर बदला ही जा सकेगा .

Sumita का कहना है कि -

लगभग सभी हिन्दी पत्रिकाओं का हाल ऐसा ही है। कुछ पत्रिकाएं को जबरन चलाया जा रहा है तो कुछ पत्रिका चलाने के लिए कुछ भी परोसे चले जा रहे हैं। दुसरी बात यह भी है आज की पडाई भी ईग्लिश माध्यम से ही हो रही है जाहिर है हिन्दी के बजाय ईग्लिश के प्रति झुकाव का होना और हिन्दी पाट्कों का आभाव होना। पहले लोगों के पास खाली वक्त हुआ करता था। लोग खाली वक्त में किताबें पडा करते थे लेकिन आज लोगबाग कमाने की जद्दोजह्द में लगे हुए हैं कि उन्हें वक्त ही नहीं मिलता और जो वक्त मिलता भी है तो उसे टेलीविजन ने खा लिया है। टी.वी का प्रकोप तो इतना बड गया है कि हमें अपने बच्चों से भी बात करने की फ़ुर्सत नहीं। इसके लिए केवल सम्पादक या पत्रिका से जुडे लोगों को अकेले जिम्मेदार कहना उचित नहीं। क्योंकि यदि संपादक पत्रिका में कुछ बद्लाव भी करता है तो पाट्कों को आकर्शित करने के लिए ही।

aahuti का कहना है कि -

रामानन्द जोशी के समय से पत्रिका संग्रहनीय थी.राजेंद्र अवस्थी ने पठनीय रक्खा .किन्तु अब साहित्य की जगह बाजारू हो गयी है. बंद करने के बजाये बदलाव लाने का प्रयास हो.

Rama का कहना है कि -

कादम्बिनी पत्रिका के बारे में सभी के विचार पढ़े..सबके अपने-अपने अनुभव हैं जो किसी हद तक सही भी हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पचास के दशक में कादम्बिनी पर्याप्त चर्चित पत्रिका रही विशेषकर नारियों के लिए यह स्तरीय पत्रिका मानी जाती थी। कालान्तर में इसमें कई बदलाव आए फिर भी इसके पाठक बने रहे जिसका श्रेय इसके पूर्व स्वरूप को ही जाता है। हम हैदराबाद में कादम्बिनी क्लब चलाते हैं और इसके सैकड़ों पाठक हैं जो कादम्बिनी के आजीवन सदस्य हैं। यह कहते हुए बहुत दु:ख हो रहा है कि जो आजीवन सदस्य है उनके पैसे तो डूब गए समझिए। मैं भी इसकी आजीवन सदस्य हूँ ।कई दशकों का इतिहास संजोए किसी भी प्रचलित पत्रिका का बंद होना ही अपनेआप में शर्मनाक है।पत्रिका निकलती रहे तो सैकड़ों आम पाठकों को राहत मिलेगी।

डा.रमा द्विवेदी (कवयित्री एवं आम पाठक) r

मनोज कुमार का कहना है कि -

बैठक में फिर से शामिल हो रहा हूं।
पंकज सिंह से टेलीफोन पर हुई बातचीत के आधार पर ऊपर उद्धृत विचार पढ़े। उनकी कुछ बातें मुझे सही और काफी अच्छी लगी।
1. ‘कोई भी पत्रिका ये तो दिखाती ही है कि उसकी बौद्धिक तैयारी कैसी है।’ बिलकुल सही। इसलिए बैठक में शामिल सभी लोगों से मेरा निवेदन है कि सिर्फ कादंबिनी को कठघड़े में मत लाइए – इसमें उन्हें भी लाइए जो ऊपर, बहुत ऊपर, इसी पृष्ठ पर सबसे ऊपर बैठे हैं, बहुत बड़ी-बड़ी बातें कर आए हैं। आजके ही देश के एक बड़े अखबार में देश के एक बहुत बड़े साहित्यकार, आलोचक, के उनके और उनकी पत्रिका के बारे में विचार छपे हैं। हो सके तो उन वाक्यों को पढ़ें और इसी बैठक में उस पर भी बहस हो।
2. ‘कादंबिनी का बंद हो जाना कोरी बकवास है’। -- और इस बकवास में हम सब शामिल हैं, - मैं भी। अब ये बकवास बंद होनी चाहिए।
3. ‘पत्रिका सिर्फ संपादक की नहीं होती’। इस परिचर्चा की शुरुआत जिन महाशय से हुई है, वे शायद ऐसा नहीं मानते।
4. ‘कादंबिनी में लिखने वाले … (सफेद पक्षी की तरह की पत्रिका) में लिखने वाले से बेहतर हैं’ यह सौ टके की बात है। और ‘ये हो सकता है कि पढ़ने वालों को कादंबिनी से अपेक्षाएं ज़्यादा हैं’। ये है सवा सौ टके की बात।

Anonymous का कहना है कि -

विजय किशोर मानव के बाद कौन

kadambini ko lekar chal rahi charcha ke bad ab hindustan times ke sotro ke anusar charcha yah hai hai ki vijay kishor manav ke bad koun? kynoki sotro ke अनुसार विजय किशोर मानव अब खुद इस्तीफा देने का मन बना चुके हैं अगर वे इस्तीफा नहीं देते तो संभव है की उनसे इस्तीफा ले लिया jaye . ऐसे में सवाल यह है की उनके बाद कादम्बिनी की कमान कौन संभालेगा? yon तो sochi में कई nam हैं लेकिन sabase prabal davedar bataye जाते हैं कादम्बिनी के sahayak sampadak श्री arun कुमार jaimini. श्री जैमिनी का मनेजमेंट में भी काफी दखल बताया जाता है. वे पिचले पंद्रह bees वर्षो से कादम्बिनी की athak seva कर रहे हैं. उनका एक कविता संग्रह भी है. भूतपूर्व संपादक राजेंद्र अवश्थी उन्हें अपना हनुमान मानते थे. उन्होंने तीन तीन संपादको के साथ सफल पारी खेली है. वे बहुत मेहनती व्यक्ति बताये जाते हैं. ve bahut achche jyotishi bhi hain. unke jyotish gyan ka loha manejment me bhi bahut log mante hain. इन दिनों वे कादम्बिनी में ये जो दुनिया है नाम से charchit tippaniyan लिखते हैं. dekhana है की क्या कादम्बिनी के pachasve varsh में श्री jamini कादम्बिनी को कोई नया रूप देते हैं.
prabhudha pathak

Anonymous का कहना है कि -

विजय किशोर मानव के बाद कौन

kadambini ko lekar chal rahi charcha ke bad ab hindustan times ke sotro ke anusar charcha yah hai hai ki vijay kishor manav ke bad koun? kynoki sotro ke अनुसार विजय किशोर मानव अब खुद इस्तीफा देने का मन बना चुके हैं अगर वे इस्तीफा नहीं देते तो संभव है की उनसे इस्तीफा ले लिया jaye . ऐसे में सवाल यह है की उनके बाद कादम्बिनी की कमान कौन संभालेगा? yon तो sochi में कई nam हैं लेकिन sabase prabal davedar bataye जाते हैं कादम्बिनी के sahayak sampadak श्री arun कुमार jaimini. श्री जैमिनी का मनेजमेंट में भी काफी दखल बताया जाता है. वे पिचले पंद्रह bees वर्षो से कादम्बिनी की athak seva कर रहे हैं. उनका एक कविता संग्रह भी है. भूतपूर्व संपादक राजेंद्र अवश्थी उन्हें अपना हनुमान मानते थे. उन्होंने तीन तीन संपादको के साथ सफल पारी खेली है. वे बहुत मेहनती व्यक्ति बताये जाते हैं. ve bahut achche jyotishi bhi hain. unke jyotish gyan ka loha manejment me bhi bahut log mante hain. इन दिनों वे कादम्बिनी में ये जो दुनिया है नाम से charchit tippaniyan लिखते हैं. dekhana है की क्या कादम्बिनी के pachasve varsh में श्री jamini कादम्बिनी को कोई नया रूप देते हैं.
prabhudha pathak

Gufran का कहना है कि -

कादम्बिनी एक बहुत अच्छी पत्रिका थी , लेकिन अफ्सोस कभी पढने का मौका नहीं मिला, मैं चाहता हूँ पत्रिका छपे जिससे मुझे पढने का मौका मिले.

jenny shabnam का कहना है कि -

कादम्बिनी मेरी पसंदीदा पत्रिकाओं में से एक होती थी कभी| छात्र जीवन में कादम्बिनी, सारिका, मनोरमा, गृहशोभा जैसी पत्रिकाएं बहुत पढ़ती थी| बाद में धीरे धीरे समय की कमी के कारण महज एक दो पत्रिकाओं तक अब मैं सीमित रह गई हूँ जो सबसे पसंद के हैं और वो है ''ओशो टाइम्स''| कादम्बिनी के एक-दो अंक पढ़ पाई हूँ शायद २० वर्षों में, इसलिए कादम्बिनी के गिरते स्तर की जानकारी नहीं है| परन्तु आज जब इस सन्देश को पढ़ कर इसकी पूरी परिचर्चा पढ़ी तो मुझे आत्मीय पीड़ा दे गई| यूँ लगा जैसे किसी पुराने मित्र के दुखद जीवन के अंतिम पड़ाव की सूचना मिली हो| किसी तरह से यह पत्रिका वापस अपने शीर्ष पर पहुँच जाये यही शुभकामना है|

Shamikh Faraz का कहना है कि -

कादम्बिनी पत्रिका के बारे में सभी के विचार पढ़े..सबके अपने-अपने अनुभव हैं जो किसी हद तक सही भी हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पचास के दशक में कादम्बिनी पर्याप्त चर्चित पत्रिका रही विशेषकर नारियों के लिए यह स्तरीय पत्रिका मानी जाती थी।किसी भी पत्रिका का बंद होना वैसे तो अफ़सोसनाक होना ही चाहिए. पर यहाँ ख़यालात से लगता है कि कादंबिनी कुछ सही नहीं जा रही थी, और उसका चले जाना ही बेहतर है. मैंने भी काफ़ी समय से उसको पढ़ने की ज़रूरत नहीं समझी

KISHORE KALA का कहना है कि -

is bat se katai inkar nahin kar sakata ki kadambani me ab wo bat nahi rahi jo pahale hua karat the. ek samay bekarari se intejar raha karata tha har naya ank padhane ka. kadambani ko ek yug ke nam se jana ja sakta hai. samay aur parishtati ke karan bahut kuch badlaw aaya hai. lekin pahale jaosi pakad bana pana ab mushkil hai. aaj kal jab kabhi bahar jata hoon,station par kadambani lekar time pass kar leta hoon pahale jaisi prerana nahi milati. phir bhi bhid bahri bahut sari patrikaon me kadambani ka ek sthan to hahi.aise sankatkalin samay me bhi pathak ise le rahe hai ye ek achi bat hai.
kishore kumar jain. guwahati assam.

umesh chandra upadhyaya का कहना है कि -

please aaplok Kadambini ko band karne ki wakalat naa karen, hindi ki itni saari patrikayen band ho chuki hain ki ab yeh sun kar hi dar lagta hai ki ek aur band hone jaa rahi hai..... koi bhi patrika padhne waalon ke hisab se hi chalti hai...aap salah den ki likhnewaalen kahan se laaye jaayen....vo kya likhen ya sampadak khud lekhak ban jaayen....?


Umesh chandra Upadhyay,Mumbai

Lord Alexander का कहना है कि -

ध्यान हर कोई, Illuminati शामिल हों अमीर होने के लिए और
प्रसिद्ध .... मेरा नाम सिकंदर है। के एक सदस्य हूँ
ILLUMINANTY पुजारी MACANS एवेन्यू लंदन। इस का उपयोग कर रहा
इस महान करने के लिए पृथ्वी के सदस्यों का परिचय मध्यम
ब्रदरहुड समाज। हम अब रक्त का हिस्सा है या पर सौदा
मांस या मौत। इसके बहुत अगर केवल एक सदस्य बनने के लिए आसान
आप गंभीर हैं। क्या कभी दुनिया का हिस्सा आप कर रहे हैं, मैं
भगवान अलेक्जेंडर के माध्यम से डाल दिया है और मदद करने के लिए सक्षम हो जाएगा
आप एक सदस्य तनाव के बिना आप सभी को यह करना है बन जाते हैं
मेरे इनबॉक्स या ईमेल भेजने के लिए (alexlive109@gmail.com)

Nirupama Varma का कहना है कि -

कादम्बिनी मेरी सबसे पसन्द की पत्रिका थी । वर्ष 1977 जे अप्रेल अंक (युवा अंक ) में मेरी पहली कहानी छपी थी । किन्नरों पर । क्या कुसी सुधि पाठक के पास यह अंक मुझे प्राप्त हो सकता । बड़ी मेहरबानी होगी ।
मेरा email _drnirupama.varma@mail.com
My whatsapp no. 9412282390
कृपया मेरी सहायता करें

Nirupama Varma का कहना है कि -

कादम्बिनी मेरी सबसे पसन्द की पत्रिका थी । वर्ष 1977 जे अप्रेल अंक (युवा अंक ) में मेरी पहली कहानी छपी थी । किन्नरों पर । क्या कुसी सुधि पाठक के पास यह अंक मुझे प्राप्त हो सकता । बड़ी मेहरबानी होगी ।
मेरा email _drnirupama.varma@mail.com
My whatsapp no. 9412282390
कृपया मेरी सहायता करें

priti rai का कहना है कि -

Sir/mam aanand kadmbini patrika ka prakashan kha se hota hai plz ans me

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