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Saturday, May 02, 2009

सोने का पिंजर (अंतिम अध्याय)

तेरहवां अध्याय

अमेरिका का उत्तरी छोर, बर्फीली ठण्डी हवाएं चलना प्रारम्भ हो गयी हैं, कुछ ही दिनों में यहाँ बर्फ ही बर्फ होगी। तब किसी भी पक्षी का यहाँ रहना सम्भव नहीं होगा। पक्षियों के एक दल का नेता आकाश को निहार रहा है, बर्फ का गिरना महसूस कर रहा है। अब मुझे दक्षिण छोर की ओर चले जाना चाहिए, मन में चिन्तन चल रहा है। कहीं तो नवीन आशियाना तलाशना ही होगा! क्या हम इस बार सुदूर देश की यात्रा कर लें? मन में अचानक प्रश्न कौंध गया। भारत का नाम सुना था, क्या हम सात समुद्र पार कर भारत जा सकेंगे, मन में संशय बना हुआ था। बुजुर्ग और युवा पक्षियों से सलाह-मशविरा किया गया।
युवाओं ने कहा कि जब हमारा सैनिक, ईराक पर युद्ध कर सकता है तो क्या हम भारत में आश्रय की तलाश नहीं कर सकते? हम में भी हवाईजहाज जितनी ताकत है, उड़ने की।
अचानक सिकन्दर याद आ गया, उसने कैसे भारत पर चढ़ाई की थी? वह भी तो आज से दो हजार वर्ष से भी पूर्व समुद्र और रेगिस्तान को पार करता हुआ भारत पहुँचा था, तो फिर हम क्यों नही? हमारे यहाँ भी 500 वर्ष पूर्व यूरोप से कोलम्बस आया था।
प्रश्न पूर्ण हुए, उत्तर केवल एक ही था कि पक्षियों में असीमित शक्ति होती है और वे पूर्ण आकाश को नापने की क्षमता रखते हैं। बस फिर क्या था, दल को संकेत मिल गए, उड़ने को तैयार हो जाओ। संकेत मिलते ही सारा दल पंक्तिबद्ध खड़ा हो गया। उन्हें कहाँ मनुष्यों की तरह सामान लादना था, बस उन्हें तो अपने दल के नेता के एक इशारे पर उड़ जाना था। वे सब उड़ चले, अपना लक्ष्य निर्धारित कर, अपनी मंजिल की ओर। युवा पक्षियों के मन में कौतुहल था, भारत को जानने की इच्छा थी, प्रश्न मन में कुलबुला रहे थे। आखिर पूछ ही लिया एक युवा पक्षी ने, कैसा है भारत?
प्रौढ़ पक्षियों के संक्षिप्त ज्ञान ने बाहर झाँकने की इच्छा जागृत की। वे बता रहे थे कि भारत एक प्राचीन देश हैं, वहाँ की जलवायु सभी प्रकृतिजन्य जीवों के अनुकूल हैं। वहाँ के पक्षियों को दूसरे देश की तलाश नहीं करनी होती। वहाँ के जंगल हरे-भरे हैं। बहुत प्रकार की वनस्पतियां वहाँ होती हैं। जंगलों में इतने फल होते हैं कि अधिकतर पक्षी वहाँ शाकाहारी हैं।
एक पक्षी ने प्रश्न कर लिया कि ये सब तुमको कैसे मालूम?
उसने कहा कि यहाँ चिड़ियाघर में भारत से पक्षी लाए जाते हैं। मुझे उनसे एकाध बार बात करने का अवसर मिला है।
फिर आपकी जानकारी ठीक ही होगी, वे सब खुश होकर बोले। यदि ऐसा अद्भुत देश हमारी धरती पर है तब तो उसे अवश्य देखना चाहिए।
सुना है कि वहाँ साइबेरिया आदि देशों से तो नियमित पक्षी जाते हैं। वो भारत से पास अवश्य हैं लेकिन हमारे हौंसले भी बुलन्द हैं। हम भी भारत की धरती को देखकर ही आएंगे। हमारे बच्चे भी हम पर गर्व करेंगे कि हमारे पूर्वज कभी भारत जाकर आए थे।
अब वे सब खुश होकर उड़ रहे थे और सम्वेत स्वरों में गा रहे थे।

एक पक्षी- जाना है उस देश जहाँ पंछी चहचाते
दूसरा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल मदमाते
तीसरा पक्षी- पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
चौथा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल बौराते।

एक पक्षी- हमने सुना है भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
दूसरा पक्षी- हमने सुना है भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
तीसरा पक्षी- जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
चौथा पक्षी- जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना है उस देश जहाँ जंगल इठलाते।

कई समुद्र पार करते हुए, आखिर एक दिन उनकी निगाहें मंदिर के गुम्बज पर पड़ी, जहाँ कतारबद्ध पक्षी बैठे थे।
शहर आ गया, भारत भूमि आ गयी, खुशी की लहर छा गयी।
एक सुंदर सी झील में, छोटा सा एक टापू, उसमें अनेक पेड़ लगे थे, उन्होंने वहीं अपना डेरा डाल दिया। झील में मछलियां भी खूब थी, तो भोजन की समस्या भी हल हो गयी। कई महिने यहाँ गुजारने थे, घौंसले बनाने शुरू हुए, कई अन्य भारतीय पक्षी भी उनके स्वागत में आ जुटे। भूरे और कृष्ण वर्ण के भारतीय पक्षी, उनके धवल स्वच्छ रंग को देख-देखकर आर्किर्षत होते, उनके साथ रहने का अवसर तलाशते। यहाँ के युवा पक्षियों ने उनकी आवाभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहाँ के स्वादिष्ट फलों को चखाया, जंगल की गंध से परिचित कराया। वे कभी बड़ के पेड़ से, कभी गूलर से, कभी आम से, कभी अमरूद से, कभी जामुन के पेड़ से फल तोड़कर लाते और उन फलों से उनको परिचित कराते। वे सब मछलियों पर निर्भर थे, उन्होंने कभी भी ये फल नहीं देखे थे। मीठे, खट्टे, तीखे फल उन्हें अच्छे लगने लगे थे। वे सारे ही इतने भांत-भांत के पेड़ों को देखकर आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कभी भी अपने जंगल में फलदार पेड़ देखे ही नहीं थे।
आखिर, एक दिन उनके वापस जाने का समय आ गया। भारत के कुछ पक्षियों ने उनसे निवेदन किया कि हम भी तुम्हारा देश देखना चाहते हैं, क्या हम तुम्हारे साथ चल सकते हैं? उन्होंने सहजता से स्वीकृति दे दी।
अमेरिकी पक्षियों के दल के पीछे-पीछे भारतीय दल मुक्त गगन में उड़ान भर रहा था। उनका मन बल्लियों उछल रहा था, वे बड़े खुश थे कि हम एक बेहद खूबसूरत देश को देखने जा रहे हैं। कुछ पक्षी कल्पना करते और सोचते कि क्यों न हम वहीं रह जाएं? हमारे यहाँ की गर्मी, पानी की समस्या से हमें निजात भी मिल जाएगी। सुना है कि वहाँ के जंगल बहुत विशाल हैं! वहाँ रेत के अंधड़ भी नहीं हैं।
लेकिन वहाँ बर्फिली आँधियां हैं।
अरे कौन सा हमें हमेशा के लिए वहाँ रहना है। फिर किसी का रहने को मन भी करेगा तो क्या हम वहाँ नहीं रह पाएंगे? वहाँ भी तो इतने पक्षी रहते हैं।
पक्षियों का दल उड़ रहा था, समुद्र की सीमा प्रारम्भ हुई। रात में विश्राम लेने के लिए एक पहाड़ी का सहारा लिया गया। अमेरिकी पक्षी समुद्र में गोता मारकर मछलियां पकड़ लाए। अब भारतीय पक्षियों के होश उड़ गए। वे मछली नहीं खाते, उनका भोजन तो फल होता था। पहाड़ के पेड़ों पर भी फल नहीं, आखिर समुद्री बेलों के फलों से ही जैसे-तैसे करके काम चलाया। लम्बी यात्रा और भोजन की समस्या उनके सामने मुँह-बाए खड़ी थी। रास्ते में शहर आने लगे और अब वे बगीचों से फल चुराने लगे, क्योंकि जंगल में ही उनका हक था और जंगल में फल नहीं थे। लम्बी थका देने वाली यात्रा, भूखे-प्यासे रहकर जैसे-तैसे कटी। सोचा अमेरिका पहुँचकर सब कुछ ठीक हो जाएगा।
आखिर एक दिन उनके सपनों का शहर अमेरिका आ ही गया। वहाँ बर्फ विदा ले चुकी थी, पेड़ों पर पीत पत्तियां, सुनहरी आभा का निर्माण कर रही थी। कहीं-कहीं कोपलें भी फूटने लगी थीं। आभास हो रहा था कि बसन्त शीघ्र ही हरितिमा को जन्म देगा। लम्बे रास्ते की थकान उनके चेहरों पर थी, भूख-प्यास से उनकी ताकत क्षीण हो गयी थी। लेकिन फिर यहाँ घने जंगलों को देखकर उनकी थकान फुर्र हो गयी और अपने छितराए जंगलों पर शर्म आने लगी। अमेरिकी पक्षी ने बताया कि बहुत जल्दी ही यहाँ हरीतिमा छा जाएगी, तब चारों तरफ केवल हरियाली होगी। तुम देखना हमारे यहाँ का जंगल, कितना विशाल है!
सभी ने पेड़ पर अपना ठिकाना बना लिया। अब भोजन की तलाश शुरू हुई। पेड़ों पर कहीं भी फल नहीं थे, एक पेड़ से दूसरे पेड़, एक जंगल से दूसरे जंगल जाते रहे, लेकिन खाने को कुछ नसीब नहीं हुआ। पत्तियां खाकर भला कितने दिन जिन्दा रहा जा सकता है? कभी चोरी-छिपे बगीचों में पहुँच जाते और वहाँ के फलों से अपना गुजारा चलाते। लेकिन वहाँ हमेशा खुद के ही शिकार होने का खतरा मंडराता रहता। एक दो बार मछली खाने का भी प्रयास किया, लेकिन भारतीय शरीर उन्हें पचा नहीं पाया। एक दिन जंगल में फलों की तलाश करते-करते उनकी आशा ने दम तोड़ दिया। आखिर समय से पहले ही उन्होंने वापस जाने का मन बना लिया।
वे आपस में बतिया रहे थे कि इतने घने जंगल, फिर भी एक भी फल नहीं! ऐसे जंगलों से तो हमारे जंगल ही अच्छे, जहाँ सारे पेड़ों पर ही फल लगा करते हैं। पंछी भी कितने कम है यहाँ, हमें भी अपने अस्तित्व का खतरा पैदा होता जा रहा है। बहेलिया यहाँ नहीं हैं, लेकिन शिकारी तो हैं, चिड़ियाघर तो हैं!
आज वे सब बहुत खुश थे, वापस जाने को कतारबद्ध खड़े थे। अपने दल के नेता के इशारे का इंतजार कर रहे थे। इशारा हुआ और वे उड़ चले भारत के आकाश की ओर। वे सब गा रहे थे, वही गीत, जो विदेशी पक्षियों ने बनाया था। एक-एक पक्षी अपने स्वर में गीत गा रहा था और एक लम्बी यात्रा पर इस उत्साह से उड़ा जा रहा था कि मैं अपने देश में वापस लौट रहा हूँ।

पक्षी गा रहे थे -
जाना अपने देश जहाँ हम मिलजुल गाते
जाना अपने देश जहाँ जंगल चहचाते
पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
जाना अपने देश जहाँ जंगल मदमाते।

भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना अपने देश जहाँ जंगल इठलाते।

भारत में तो जंगल में भी भँवर उड़ा करते हैं
भारत में तो पेड़ों से भी गंध बहा करती है
मद झरते, गदराए, बौराए पेड़ों से
उड़ते प्रतिपल, कण पराग के रहते हैं
देखो मधुमक्खी भी शहद बनाया करती
जाना अपने देश जहाँ जंगल बौराते।



नोट- हमें यह बताते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि डॉ॰ अजित गुप्ता की इस यात्रा-संस्मरण की यह शृंखला जल्द ही मुद्रित संस्करण के रूप में उपलब्ध होगी, जिसे हिन्द-युग्म अपने आने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम में लोकार्पित करेगा।

Saturday, April 25, 2009

सोने का पिंजर (12)

बारहवां अध्याय

मैंने पचास दिन तक अमेरिका तुझे देखा है, तेरे यहाँ की मानसिकता को अनुभव किया है। लेकिन केवल पचास दिनों की ही मैं बात नहीं कर रही है। मैंने तो तुम्हें तभी से जानना शुरू कर दिया था तब बेटा तुम्हारे आकर्षण से बँधा तुम्हारे यहाँ पढ़ने गया था। सितम्बर 2001 से तुम्हें मैंने जाना और धीरे-धीरे पहचाना। तभी से अपने आसपास, घर-बार में देखती रही हूँ तुम्हारे विभिन्न रूप और साथ ही भारतीय युवा-पीढ़ी का एक नवीन रूप। जो तुम पर आसक्त है। तुम पर मोहित है। भारत के बंधनों से दूर वे खुली हवा में सांस ले रहे हैं। हमारे यहाँ तो ठेठ गाँव से निकल कर आप कितनी ही दूर किसी भी महानगर में जाकर बस जाओ, आपके घरवाले और रिश्तेदार घूमते हुए आ ही जाएँगे। यदि आप दर्शनीय स्थानों पर रह रहे हैं तब फिर तो एक बहाना ही रहता है कि अरे अब तो अपना बेटा, भाई, भतीजा वहाँ रहता है, चलो उससे मिल भी आएँगे और जगह देख भी आएँगो। लेकिन अमेरिका जाना इतना आसान नहीं!
लेकिन अब अमेरिका भी तो कहाँ दूर रह गया है? अब तो माता-पिता और रिश्तेदार वहाँ भी पहुँचने लगे हैं। मुझे एक कहानी याद आ रही है। राजस्थान के एक राजा, युद्ध में हार जाते हैं। मरने के भय से वापस अपने शहर लौट आते हैं। लेकिन रानी इस कायरता को बर्दास्त नहीं कर पाती। वे शहर के दरवाजे बन्द करवा देती है। राजा सहित सारी फौज कई दिनों तक शहर के बाहर ही पड़ी रहती है।
आखिर एक दिन राजा की माँ आदेश देती है कि नगर के दरवाजे खोल दिए जाएं और मेरे बेटे को सम्मान सहित राजमहल में प्रवेश दिया जाए।
दरवाजे खुल गए और राजा रनिवास में आ गए।
माँ ने बहु से कहा कि बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद युद्ध से लौटा है, जाओ इसके लिए हलुवा बनाकर लाओ।
रानी हलुवा बनाने लगी। वह गुस्से में तो थी ही। कढ़ाई में हलुवे को जोर-जोर से पलटे से हिला रही थी।
माँ वहीं से चिल्लाई, बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद घर लौटा है। वहाँ लोहे से लोहे के टकराने की आवाज सुनकर माँ के आँचल में छिपने चला आया था, यहाँ भी तू लोहे से लोहा टकरायेगी तो फिर बेचारा अब छिपने के लिए कहाँ जाएँगा?
राजा तत्काल अपनी फौज लेकर रण के लिए चला गया।
हमारी नवीन पीढ़ी भी गृह-युद्ध से बचने के लिए तुम्हारे आँचल में शरण ली है, यदि अब पुनः उनके परिवारजन वहाँ भी जा पहुँचे तो फिर बेचारे किसकी शरण में जाएँगे? मेरा तो तुम से यही कहना है कि तुम हमारी राजमाता की तरह मन बनना। उन्हें कभी अपना कर्तव्य याद मत दिलाना। नहीं तो बेचारे वे कहाँ जाएँगे? उन्होंने यहाँ एक धारणा बना रखी है कि वे बहुत खुश है, खुशहाल भी हैं बस इसे बनाए रखना। भारत तो वैसे भी बूढ़ा हो चुका है। हजारों वर्षों से जी रहा है। आखिर कब तक और जीएगा? कभी तो इसका भी अन्त होना ही चाहिए न! तुम अभी जवान हो, अतः दुनिया के जवानों को अपने यहाँ एकत्र करो। अपना उत्थान करो। भारत के बूढ़ों का क्या है, उन्हें तो वैसे भी एक दिन मरना ही है।
भारत में राजस्थान ऐसा प्रदेश है जहाँ रेत के गुबार थे। पानी का नामोनिशान नहीं। फिर भी सेठाना था, लोग बड़ी-बड़ी हवेलियाँ बनाते थे। 10-20 कमरे तो आम बात थी, बड़े लोगों की हवेली में 100-100 कमरे हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे युवा-पीढ़ी को लगा कि यदि हम इन रेत के धोरों से बाहर निकलेंगे तो ज्यादा रईस हो जाएँगे और वे निकल गए, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास आदि बड़े महानगरों में। घर में बड़ी-बड़ी हवेली और मुम्बई में एक छोटी सी चाल! लेकिन जब गाँव लौटकर आते तो उनके लिए बग्गी लगती, ड्रेस वाला कोचवान सजता। धीरे-धीरे आकर्षण बढ़ा और राजस्थान के ये रेतीले धोरे रिक्त हो गए युवा-पीढ़ी से। रह गयी सुनसान, बाट जोहती हवेलियाँ। हवेलियों में उनके बूढ़े। शुरू-शुरू में तो बेचारा अकेले ही जाता था, अपनी नई नवेली दुल्हन को भी हवेली में ही छोड़कर जाता था। लेकिन फिर दुल्हन भी साथ ही जाने लगी। हवेली छोड़कर वो भी एक या दो कमरे के फ्‍लेट में रहने लगी।
मैं एक बार ऐसे ही एक सेठाने में गयी। मेरी एक सहेली वहाँ ब्याह करके गयी थी। देखा बड़ी सी हवेली है, बड़े-बड़े कमरे हैं। एक बैठक खाने में मोटे-मोटे गद्दे बिछे हैं, उनपर सफेद दूधिया चादरे बिछी हैं। दूसरे बैठक खाने में सोफे लगे हैं, गलीचे बिछे हैं। हमारे लिए बड़े से थाल में नाश्ता आया। जिसमें नाना प्रकार के व्यंजन थे। हवेली के पीछे धोबीखाना था, बड़ी सी गाड़ी का गेराज था। नौकरों के रहने की जगह थी। दिन में बहु-बेटियाँ बाजार में नहीं निकलती, रात होगी तब गाड़ी में पर्दे लगेंगे और फिर बहु-बेटियाँ शहर देखेंगी। हम अभिभूत थे, वो सेठाना देखकर। फिर महानगरों में भी इन्हीं सेठों का जीवन देखने का अवसर मिला। कोई चाल में रह रहा था और कोई दो कमरों के लेट में। ऐसी कोठियाँ तो शायद वहाँ टाटा-बिरला के पास भी न हो!
लेकिन अब वे हवेलियाँ उजड़ गयी हैं। रह गए हैं चैकीदार या किराएदार। मालिक कभी-कभार आते हैं। घर में जब विवाह का प्रसंग उपस्थित होता है तब ही गाँव की हवेली याद आती है। महानगर में तो शादी करें तो कहाँ करें? फिर दादा लोग अपना टेक्स वसूलने भी आ जाते हैं। इसलिए ये हवेलियाँ तभी सजती हैं और तभी इनमें चहल-पहल होती है। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो सेठों के बच्चे नहीं गए, वे तो हमारे जैसे आम आदमी के बच्चे हैं। लेकिन अब वे आम घर भी सूने हो गए हैं। पहले राजस्थान में ही हवेलियाँ सूनी पड़ी थी लेकिन अब तो पूरे भारत के ही घर सूने हो रहे हैं।
बूढ़ों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। वे बेचारे नौकरों के भरोसे रह रहे हैं और नौकर भी मौका देखकर उनका गला काट लेते हैं। रोज ही की खबर है, बूढ़ों की हत्या। सरकार भी क्या तो करे? कोई भी नहीं समझ पा रहा कि जिस देश ने दुनिया को ही एक परिवार के रूप में माना आज वहीं परिवार संस्था टूटती जा रही है। अब भारत की सरकारें भी कानून बना रही है, उनके पालन-पोषण का। कैसा जमाना आ गया है, पहले मेरे घर में भी ताले नहीं हुआ करते थे। अब तो मुझे रोज ही नए ताले खरीदने पड़ते हैं। वे हवेलियां कम से कम वार-त्यौहार, शादी-ब्याह के अवसर पर तो गूँजती हैं, लेकिन यहाँ तो सारे घर ही सूने हो गए। किसी के भी घर चले जाओ, एकेले बूढ़े माता-पिता बाहर बराण्डे में बैठे मिलेंगे। वे खोज रहे हैं उस आवाज को जो उन्हें पुकार ले। उनसे बतिया ले।
अमेरिका तुम वो अप्सरा हो, जिसके पीछे हमारी नौजवान पीढ़ी भाग रही है। वे तुम्हें पाना चाहती है, तुम में रमना चाहती है। हमारे यहाँ से श्रवण कुमार, राम, भीष्म जैसे पुत्रों की परम्परा समाप्त हो गयी है। अब उन्हें वे भी मिथक मानने लगे हैं। उन्हें तो बस याद है केवल तुम्हारा भौतिक स्वरूप। वे उसे पाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन फिर भी मेरा तुझको सलाम! कम से कम तुमने हमारी पीढ़ी को अहंकार से तो निजात दिला दी। पुरुष और महिला के अन्तर को तुमने इक सीमा तक समाप्त भी कर दिया। मुझे तो गर्व है कि अब हमारी महिलाएं भी वहाँ पति की तरह रहती हैं।
अमेरिका तुझे मेरा नमन! तेरे भौतिक स्वरूप को नमन! तेरे यहाँ बसी हमारी भारतीय पीढ़ी को नमन! नमन! किसलिए?
नमन इसलिए कि भारत अब भारत नहीं रहा। लेकिन वहाँ बसे भारतीयों के मन में भारत जन्म ले रहा है। हमारे त्यौहार बस एक परम्परा बनकर रह गये हैं जबकि तुम्हारे यहाँ वे उत्सव बने हुए हैं। युवा-पीढ़ी के आकर्षण के कारण बड़े लोगों का आकर्षण भी तुम्हारे प्रति बढ़ा है। अतः वे भी अब तुम्हें देखने जाने लगे हैं और तुम्हारा सच बाहर आने लगा है। जो कल तक तुमने हमारे अन्दर हीन भावना भरी थी अब वो मिटने लगी है। तुम्हारे यहाँ से आए माता-पिता अब कहने लगे हैं कि नहीं सुख तो भारत में ही है। जुबान का स्वाद तो भारत में ही है। तब मैं अपनी नवी पीढ़ी से कहती हूँ कि जब तुम्हें वहाँ अपनी खुशबू, अपने स्वाद की याद आए तब तुम भारत में आना। हमारे लिए नहीं आना। जब भी आओ स्वयं के लिए ही आना, तभी तुम भारत की कद्र कर सकोंगे। मेरी ये चंद पंक्तियां उन सभी को समर्पित हैं -

पीर गंध की जगने पर
हूक उठे तब तुम आना
मन के डगमग होने पर
अपने देश में तुम आना।

सन्नाटा पसरे मन में
दस्तक कोई दे न सके
चींचीं चिड़िया की सुनने
अपने देश में तुम आना।

घर के गलियारे सूने
ना ही गाड़ी की पींपीं
याद जगे कोलाहल की
अपने देश में तुम आना।

शोख रंगों की चाहत हो
फीके रंग से मन धापे
रंगबिरंगी चूंदड़ पाने
अपने देश में तुम आना।

सौंधी मिट्टी, मीठी रोटी
अपना गन्ना, खट्टी इमली
मांगे जीभ तुम्हारी जब
अपने देश में तुम आना।

बेगानापन खल जाए
याद सताए अपनों की
सबकुछ छोड़ छाड़कर तब
अपने देश में तुम आना।

कोई सैनिक दिख जाए
मौल पूछना धरती का
मिट्टी का कर्ज चुकाने तब
अपने देश में तुम आना।

वीराना पसरे घर में
दिख जाए बूढ़ी आँखें
अपनी ठोर ढूंढने तब
अपने देश में तुम आना।

तेरे वैभव से लौटने के बाद मेरी निगाहें पक्षियों पर चले गयी। यहाँ की गुलाबी सर्दियों में हजारों पक्षी विदेश से भारत चले आते हैं। उन्हें किसने बताया कि भारत स्वर्ग है? लेकिन उन्होंने खोज लिया। मुझे लगा कि हमारे पक्षी भी तो कभी चाहते होंगे, तेरे जैसे देशों का वैभव देखना। तो मैंने एक कल्पना की। तू देख कितना सच है और कितनी कल्पना है?

Saturday, April 04, 2009

सोने का पिंजर (11)

ग्यारहवां अध्याय
आम भारतीय के लिए सचमुच स्वर्ग है अमेरिका.....

पश्चिम और फैशन दोनों शब्द अपने आप में भारत में पूरक समझे जाते हैं। लेकिन अमेरिका में फैशन सड़कों पर दिखायी नहीं देता, हो सकता है फिल्मों तक ही सीमित हो। वहाँ की वेशभूषा हमसे अलग है लेकिन उसे फैशन का नाम नहीं दिया जा सकता। फिर अमेरिका में इतने देशों के बाशिंदे रहते हैं कि सभी कुछ गड्डमड्ड हो गया है। पैन्ट और टी-शर्ट एक कॉमन ड्रेस बन गयी है। उच्च स्तरीय अमेरिकी कुछ नफासत से रहता है जबकि आम अमेरिकी या अन्य नागरिक बहुत ही साधारण वेशभूषा में, जिसे कतई फैशन का नाम नहीं दिया जा सकता। हम भारत के गाँव में भी निकलते हैं तब भी कपड़ों के प्रति सावचेत रहते हैं लेकिन वहाँ कही भी जाना हो, जैसे बैठे हो, उठकर चले जाओ। एक दिन कुछ लोग सूटेड-बूटेड दिखायी दे गए, मालूम पड़ा कि कोई सेमिनार है। व्यक्तित्व को निखारना भी यहाँ की आदत नहीं। जैसी आवश्यकता है, वैसी वेशभूषा है। भारत में सोना, चाँदी, हीरे, मोती, अमूमन महिलाओं के शरीर पर लदे हुए दिखायी दे जाएँगे। लेकिन वहाँ तो इनके दर्शन कभी-कभार ही होते हैं। मैंने हाथों में सोने की चूड़ियां पहन रखी थी। मुझे समझ नहीं आया कि इनमें भी क्या कोई बम छिपा सकता है? एयरपोर्ट पर कहा गया कि इन्हें भी उतारिए और ट्रे में रखकर एक्सरे कराइए। वहाँ चूड़ी क्या होती है, शायद कोई जानता ही नहीं। कभी शाम पड़े घूमने जाते, तब लगता कि नहीं भारत की तरह बन-सँवरकर जाना चाहिए, लेकिन वहाँ कोई देखने वाला ही नहीं।

जब व्यक्तित्व की बात आ ही गयी है तब एक बात बताना चाहती हूँ कि वहाँ जाकर लगा कि हम जैसे लोग अपना व्यक्तित्व खो देते हैं। क्या कभी आपने जिन्दगी में ऐसे दिन बिताए हैं, जब आपकी पहचान मिट जाए या खो जाए। आप अपने आपको खोजते रहें कि मैं कौन हूँ? अमेरिका में रहकर पूरा एक महीना से भी अधिक समय ऐसे ही अपने आपसे रिक्त होकर बिताया है। कुछ लोग कहते हैं कि अरे आप इन दिनों में माँ के रूप में रहे, कुछ कहेंगे कि आप इन दिनों में दादी के रूप में रहीं, लेकिन सच क्या है? अमेरिका आने के बाद समझ आता है कि व्यक्ति केवल एक जीव है। चलता-फिरता, खाता-पीता, सोता-जागता। इसके शरीर का कोई शिकार नहीं करता लेकिन इसके मन का शिकार प्रतिपल होता है। लाखों भारतीय यहाँ बसे हैं और कभी न कभी उनके माता-पिता यहाँ आकर रहते हैं, कुछ ज्यादा दिन और कुछ महीने-दो महीने। कुछ ने यहाँ ही बसेरा बना लिया है और कुछ आते-जाते रहते हैं। गाँव में चाची होती थी, ताई होती थी, जो सारे गाँव पर हुकम चलाती थी, फिर शहर में अपने मोहल्ले में हम सिमट गए और महानगरों में अपनी सोसायटी तक। लेकिन यहाँ विदेश में आप केवल आप हैं, आपकी पहचान आपके घर में भी नहीं होती। आप अच्छे से अच्छा खा सकते हैं, घूम सकते हैं लेकिन अधिकार आपके पास कुछ नहीं होता। अपने अधिकारों के लिए हमने शिक्षा पायी थी, जैसे-जैसे हम शिक्षित हुए, हम अधिकार विहीन हो गए।

मेरी एक मित्र भी उन दिनों न्यूयार्क में ही थी। मैंने भारत आने के बाद उनसे पूछा कि आपके क्या अनुभव रहे?

वे बोली कि सबसे अच्छी बात यह थी कि मुझे अपने आपसे बात करने का अवसर मिला। हम अक्सर जीवन की आपाधापी में सभी से बात करते हैं लेकिन कभी अपने आपसे बात नहीं करते। मुझे वहाँ इतना समय था कि मैं स्वयं से बात कर सकूँ। बेटा-बहू नौकरी पर चले जाते थे और मैं अकेली रह जाती थी। उस खाली समय में मैंने या तो पुराने पत्र पढ़े या फिर स्वयं से बातें की।

ऐसे ही एक मेरे पड़ोसी हैं, उनसे भी मैंने कभी प्रश्न किया था कि आप वहाँ क्या करते हैं? आपका समय कैसे व्यतीत होता है?

उन्होंने बताया कि घर के नीचे ही एक किताबों की दुकान है, मैं वहाँ चले जाता हूँ। सारा दिन किताबें पढ़ता हूँ। लेकिन सर्दियों में कठिनाई आती है, जब बर्फ के कारण घर में ही रहना पड़ता है, तब हम भारत लौट आते हैं।

भारत में हमारा ध्यान व्यक्तित्व विकास की ओर रहता है, हम बाह्य और आन्तरिक व्यक्तित्व विकास के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं। बाहरी सौंदर्य के लिए हमारी वेशभूषा, सौंदर्य प्रसाधन के लिए हम चिंतित रहते हैं वहीं आन्तरिक विकास के लिए रोजगार प्रधान शिक्षा के अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त करने के लिए और अपनी सृजनात्मक क्षमता विकसित करने के लिए भी प्रयत्नरत रहते हैं। लेकिन अमेरिका में ऐसा नहीं है। यहाँ शारीरिक सुंदरता के लिए लोग चिंतित नहीं हैं। कुछ भी पहनो, कैसे भी घर से बाहर निकल जाओ, किसी को चिन्ता नहीं। कुछ उच्च वर्ग है जो सूटेड-बूटेड दिखायी देते हैं, बाकि देशी तो बस वार-त्यौहार ही सजते हैं। केवल कमाना और ऐश्वर्य भोगना जहाँ की संस्कृति का मूल मंत्र हो वहाँ व्यक्तित्व विकास के लिए कोई प्राथमिक स्थान नहीं है। बस पाँच दिन काम करो और दो दिन आनन्द। इसलिए मेरा यहाँ आना केवल आनन्द लेने तक ही सीमित होकर रह गया। मैंने अपने आप से पूछा कि बता तू कौन है? मन ने कहा कि एक लेखक, लेकिन वातावरण ने कहा कि एक नारी मात्र।

ऐसा नहीं है कि अमेरिका में भी लोग सृजन की ओर नहीं खिंचते। वे सारे हैरतअंगेज़ कार्य करते रहते हैं। लेकिन उनमें भारतीय नहीं हैं। भारतीयों का वहाँ पैसा कमाना ही जीवन का उद्देश्य है, इसी के लिए शिक्षा प्राप्त की जाती है और इसी के लिए व्यापार किया जाता है। इस कारण भारतीयों का ध्यान एक सूत्र तक ही सीमित होकर रह जाता है। अमेरिका में अर्थसंचय को प्रमुखता नहीं है। शिक्षा, मकान, गाड़ी सभी के लिए ऋण सुविधाएं हैं और शत-प्रतिशत लोग इसी का उपयोग करते हैं। सामाजिक बंधन नहीं के बराबर हैं और विवाह आदि पर खर्च भी न के बराबर ही है। वृद्धावस्था में सरकार अच्छी-खासी पेंशन देती है अर्थात वृद्धावस्था परिवार के अधीन न होकर सरकार के अधीन है। भारतीयों को सामाजिक बंधनों के कारण अर्थसंचय की मानसिकता है और यह हमारे खून में शामिल हो चुकी है। जो भारतीय वहाँ बसे हैं, वे अब सारे सामाजिक बंधनों से मुक्त हैं लेकिन फिर भी अर्थसंचय की मानसिकता समाप्त नहीं होती। यही कारण है कि वे केवल अर्थ की ही भाषा जानते हैं। वे किसी भी सृजन की ओर नहीं मुड़ पाते। हाँ, जब से वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर आक्रमण हुआ है तब से भारतीयों के मन में भी असुरक्षा का भाव आया है और उन्हें अपने देश की चिन्ता होने लगी है। क्योंकि वे जानते हैं कि हम अमेरिकी कभी नहीं कहला सकते। इसलिए इस दुनिया में हमारे लिए भी कहीं जमीन का टुकड़ा सुरक्षित रहना चाहिए। जैसे-जैसे दुनिया में लादेन का भय फैल रहा है और भारत में भी धार्मिक आतंकवाद दहशत पैदा करता है, वैसे-वैसे विदेश में बसा भारतीय भी अपने देश को सुरक्षित देखने के लिए प्रयासरत हो रहा है। इसलिए अब कुछ मात्रा में भारतीयों का ध्यान अपने देश की सुरक्षा की ओर भी जाने लगा है। वे भारतीय सामाजिक संस्थाओं को पैसा देने लगे हैं। इतना भर ही भारतीय जीवन शैली में बदलाव आया है।

जब सृजन की बात निकली है तो साहित्य की बात अछूती नहीं रह सकती। वहाँ साहित्य और लेखन के क्षेत्र में बहुत काम हो रहा है। उसका पता इसी बात से लगता है कि जहाँ भारत में पुस्तकों की दुकाने छोटी से छोटी होती जा रही हैं वहाँ पुस्तकों की विशाल दुकाने हैं। लोग वहाँ आते हैं और सारा दिन वहीं बैठकर पुस्तकें पढ़ते हैं। पुस्तकालयों में भी लोग आकर पढ़ते हैं और पुस्तकालयों से अधिक भीड़ पुस्तकों की दुकान पर होती है। क्योंकि वहाँ नयी से नयी पुस्तक उपलब्ध रहती है। अमेरिकन्स या यूँ कहूँ कि यूरोपियन्स मूलतः व्यापारी बुद्धि के होते हैं। अमेरिका में प्रमुख रूप से यूरोपियन्स ही आकर बसे हैं और आज वे ही अमेरिकन्स कहला रहे हैं। उन्हें मालूम है कि मुनाफा कैसे कमाया जाता है। हाल ही में हेरी पौटर की पुस्तक के नवीन खण्ड का विमोचन हुआ। मैं उस दिन वहीं थी। मालूम पड़ा कि उन्होंने सम्पूर्ण शहरों के विभिन्न केन्द्रों पर पुस्तक का विमोचन समारोह आयोजित किया। बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम रखे गए और उन्हें पुरस्कार भी दिए गए और फिर पुस्तक की बिक्री हुई। हम भारतीय साहित्यकार कहाँ ऐसी व्यापारी बुद्धि रखते हैं? तभी तो हमारे यहाँ 500 से एक हजार प्रतियां भी बिकना दूभर हो जाता है और उनकी पुस्तकें करोड़ों की संख्या में बिकती हैं। हम साहित्य के स्थान पर टेलीविजन से चिपक गए हैं लेकिन वे अभी भी साहित्य को महत्त्व देते हैं। उनका वीकेण्ड किसी जंगल में या समुद्र किनारे बीतता है और वे उन फुर्सत के क्षणों में साहित्य पढ़ते हैं। हम पर्यटन स्थानों में केवल पर्यटन करने ही जाते हैं, जबकि वे उन स्थानों में एकान्त ढूँढते हैं। लेकिन कुछ भारतीय भी अब अभिव्यक्ति के साधन ढूँढने लगे हैं और साहित्य की ओर मुड़ने लगे हैं। उन्हें समझ आने लगा है कि हमारी पहचान हिन्दी साहित्य से ही हो सकती है अतः वे हिन्दी की ओर लौट रहे हैं। वहाँ वे हिन्दी के पत्र निकाल रहे हैं, पत्रिकाएं निकाल रहे हैं और अपनी सोच को अभिव्यक्त कर रहे हैं। लेकिन उनकी सोच भी क्या? किसी भारतीय की सोच भारतीयता के अतिरिक्त क्या हो सकती है? वे भारत की बात लिखते हैं, भारतीय संस्कृति की बात लिखते हैं, लेकिन भारत को सम्पन्न बनाने के लिए प्रयत्न नहीं करते।

आम भारतीय सोचता है कि मैं अमेरिका में नहीं, स्वर्ग में रह रहा हूँ और भारत में लोग नरक में रह रहे हैं। वाकई अमेरिका स्वर्ग है। हमारे पुराणों में स्वर्ग की सारी कल्पना वहाँ साकार है। सुरा और सुन्दरी का भरपूर प्रयोग, कोई प्रतिबन्ध नहीं। अप्सराओं को बच्चे पैदा करने की छूट नहीं, उनका यौवन अक्षुण्ण रहना चाहिए। कभी भ्रमण के लिए निकली उर्वशी, पुरुरवा से मिलती है और मनुष्य के सुख और दुख, मिलन और विरह से परिचित होती है। एकरसता भंग होती है, सारे ही रसों को प्राप्त करने के लिए उर्वशी पृथ्वी पर रह जाती है। ऐसा ही है अमेरिका का स्वर्ग। वहाँ भी नारियां बच्चे नहीं चाहती, पुरुष को आनन्द समाप्त होने का भय सताता रहता है। किसी जीवन्त प्राणी को खिलाने का मन करे तो कुत्ता पाल लो। शायद युद्धिष्ठिर इसीलिए कुत्ते को अपने साथ स्वर्ग ले गए थे। सब कुछ साफ-सुथरा, एक सी बनावट, प्रकृति के साथ जीवन। केवल मनुष्य और मनुष्य की सत्ता। कोई किसी को रोकता नहीं, टोकता नहीं। कोई पारिवारिक बंधन नहीं, कोई मानसिक बंधन नहीं। लेकिन वास्तविक स्वर्ग में भी उर्वशी जैसी अप्सराएं कहाँ मानी थी? वे भी संतान के सुख को चखना चाहती थी, वहाँ भी एक दिन संतान की इच्छा अंकुरित हो ही जाती है और फिर संतान होने के बाद उस अद्भुत सुख के आगे स्वर्ग के सारे सुख फीके लगने लगते हैं।

अमेरिका में बच्चों के लिए विशेष मापदण्ड हैं। जैसे भारत में गाड़िये-लुहारों का जीवन गाड़ी से शुरू होता है और गाड़ी में ही समाप्त होता है वैसे ही अमेरिका में भी जीवन बिना गाड़ी के सम्भव नहीं है। बच्चे को गोद में बैठने की इजाज़त नहीं है, उसके लिए ‘कार-सीट’ का प्रबन्ध किया गया है। कार-सीट में बच्चे को बेल्ट से बाँधकर, उसका मुँह पीछे की तरफ रखो। बच्चे को चोट नहीं आनी चाहिए। लेकिन बच्चे तो मचलते रहते हैं, गोद में बैठने को, या फिर खिड़की से झाँकने को। बच्चा कब बंधन की भाषा समझता है? लेकिन उसे बंधन की भाषा तो समझनी ही पड़ेगी, यदि अमेरिका में रहना है तो। फिर अमेरिका में पैदा हुआ है तो वह अमेरिकी नागरिक बन गया है। वहाँ भारतीय बच्चे और अमेरिकी बच्चों में अन्तर दिखाई देता है। शायद यह अंतर हमारे जीन्स का ही होगा। वहाँ के बच्चे चुपचाप कार-सीट या स्ट्रोलर में बँधकर, चूसनी के सहारे पड़े रहते हैं, लेकिन भारतीय बच्चे बंधन पसन्द नहीं करते। हमारे यहाँ माँ की गोद चाहिए, सोते समय माँ की गर्मी चाहिए, लेकिन वहाँ पृथकता का सिद्धान्त ही लागू है। न गोद में बिठाओ और न बिस्तर में साथ सुलाओ। ममता का विस्तार नहीं होना चाहिए। बच्चे को दुनिया में संघर्ष करना है, उसे मजबूत होना है, तो अकेले रहने दो। बच्चा भी सोलह साल का होते-होते पंछी की तरह नीड़ से उड़ जाता है। तुम्हारी दुनिया अलग और मेरी दुनिया अलग। कुछ भी साँझा नहीं। न सुख साँझे और न दुख साँझे। जिन प्रश्नों को भारत में पूरा परिवार ही नहीं, पूरा समाज हल करता है, वे सारे प्रश्न वहाँ निजी हैं। यदि माता-पिता साथ भी रहते हैं तो परायों की तरह, क्योंकि उनके भविष्य के बारे में पूछने का अधिकार उन्हें नहीं हैं। माता-पिता अपने भविष्य के बारे में तो खैर बात कर ही नहीं सकते।

भगवान ने या प्रकृति ने ममता नामक एक भावना मनुष्यों में ऐसी भर दी है जिससे न तो वह निजात पा सकता है और न ही उसे धारण कर सकता है। इसलिए वहाँ का युवा ममता के इस अंकुर को अपने अंदर पनपने ही नहीं देना चाहते। वे जानते हैं कि हम कुछ दिन ही बच्चे के साथ रह सकेंगे और फिर जब हमारे हाथ धूजने लगेंगे, थर-थराने लगेंगे तब मन करेगा कि कोई मजबूत, जवान हाथ इन्हें आकर थाम ले। वे जानते हैं अपना भविष्य, इसलिए इस ममता को अंकुरित नहीं होने का प्रयास करते रहते हैं। फिर जिस देश की परम्परा में ही सहारा नहीं हो, वहाँ तो व्यक्ति परम्परा मानकर संतोष कर लेता है, लेकिन जिस देश में कूट-कूटकर एक ही भावना भरी गयी हो कि हम एक-दूसरे के सहारा हैं, वहाँ का व्यक्ति क्या करे? कैसे अपने मन को समझाए कि नहीं अब यह परम्परा भारत के बच्चों ने यहाँ आकर समाप्त कर दी है अतः तुम भी इसे भूलने का प्रयास करो। वहाँ जन्मे बच्चों का पालन-पोषण अमेरिकी बच्चों की तरह ही करना पड़ता है, क्योंकि अब वे अमेरिकी नागरिक बन गए हैं और उन्हें वैसे ही विकसित होना चाहिए। उनको वहीं के स्वाद का आस्वादन करना पड़ेगा। वहाँ बच्चों के लिए खिचड़ी, दलिया नहीं है। पैक फूड उपलब्ध है। कुछ अमेरिकी, बच्चे नहीं चाहते और कुत्ते-बिल्लियों से ही काम चलाते हैं, जबकि कुछ अमेरिकी ढेर सारे बच्चे चाहते हैं। वे बच्चों को जन्म भी देते हैं और गोद भी लेते हैं।

अमेरिका में सभी देशों के लोग रहते हैं अतः आपको कई घरों में कई देशों के बच्चे मिल जाएँगे, जिनको गोद लिया गया है। अमेरिका में ताकत की पूजा है अतः वे बच्चों को ताकतवर बनाना चाहते हैं। केवल उच्च शिक्षा में उनका विश्वास नहीं हैं। किताबी कीड़ा नहीं बनाना चाहते, वे जानते हैं कि दुनिया में जीवित रहना है तो अपने दम पर रहना पड़ेगा, अतः ताकतवर बनो।

मेरा मानना है कि भारत और अमेरिका की संस्कृति में रात-दिन का अन्तर है अतः अमेरिका देश अमेरिकन्स के लिए तो श्रेष्ठ स्थान है लेकिन भारतीयों के लिए संघर्ष करने का स्थान है। वहाँ प्रतिपल स्वयं से लड़ना पड़ता है। कभी जीभ के स्वाद को मारना पड़ता है, कभी पहनावे के साथ समझौता करना पड़ता है। सरकार को टेक्स दे-देकर कभी मन में अपने देश के उत्थान की बात को भी मन में ही दबाना पड़ता है। परिवार के प्रेम को मन में ही दफनाना पड़ता है। सबसे कठिन संघर्ष तो तब शुरू होता है, जब बच्चे 16 साल के हो जाते हैं। उनका नीड़ अलग बस जाता है, आप केवल अकेले होते हैं, केवल अकेले। तब तक भारत आने के रास्ते बन्द हो चुके होते हैं और वहाँ रहना एक मजबूरी बन जाती है। तब याद आती है, अपने देश की मिट्टी, अपनी बोली, अपने लोग। फिर हाथ में आ जाती है कलम, जो बिखेरने लगती है स्याही। फिर हम अपने देश पर लिखते हैं, भारतीय संस्कारों पर लिखते हैं और लिखते हैं अकेलेपन पर। भौतिक साधनों के आदि हुए हम, मन को मारते रहते हैं। भारत गरीब, पिछड़ा देश है, वहाँ कैसे सभ्य इंसान रह सकता है, यही सोच उन्हें वापस नहीं आने देती। इसलिए जब तक उनमें तड़प उत्पन्न न हो, तब तक भारतीयों को उस पारिवारिक-उष्माविहीन शीतल देश में रहने दो। एक दिन यही अपनेपन की उष्मा उन्हें भारत में खींच लाएगी, जब तक आप इंतजार कीजिए।

डॉ अजित गुप्ता

Saturday, March 28, 2009

सोने का पिंजर (10)

दसवां अध्याय

अमेरिका के कुत्ते बच्चों से ज़्यादा प्यार पाते हैं....

अमेरिका में रेस्ट्राज की भरमार आपको मिलेगी, सभी तरह के खाने आपको मिल जाएँगे। एक लाइन से रेस्ट्रा है, थाई, मलेशियायी, चीनी, इण्डियन, वियतनामी आदि आदि। लेकिन भारतीय स्वाद का जवाब नहीं। किसी भी भारतीय रेस्ट्रा में चले जाइए आपको ढेर सारे अमेरिकी मिल जाएँगे। समोसा और नान सबसे अधिक पसंदीदा खाद्य पदार्थ हैं। वहाँ ऐसा कुछ नहीं है जो नहीं मिलता, लेकिन स्वाद और साइज़ में बहुत अंतर। भारतीयों के लिए सबसे मुश्किल है रोटी। बाजार में बनी-बनाई भी खूब मिलती है लेकिन अपने यहाँ की मालपुए-सी रोटी वहाँ नसीब नहीं होती। आप ठीक सोच रहे हैं कि घर पर क्यों नहीं बना लेते? घर पर सभी बनाते हैं रोटी, लेकिन आटे में स्वाद हो तब तो बने अपने जैसी रोटी। एक घटना याद आ गई, उदयपुर के बहुत बड़े उद्योगपति का समाचार था कि वे जब भी यूरोप जाते हैं, अपने साथ आटा लेकर जाते हैं। एक बार कस्टम वालों ने पकड़ लिया और काफी कठिनाई का उन्हें सामना करना पड़ा। तब मन में प्रश्न आया था कि आटा जैसी चीज वे क्यों ले जाते हैं? फिर सोचा था कि शायद वहाँ भी बाजार में मैदे का आटा ही मिलता होगा। एक बात और मन में आयी कि भई बड़े लोग हैं, तो उनके चोंचले भी बड़े ही होंगे। ये पता नहीं था कि वहाँ अपने जैसा आटा नहीं मिलता। पहले दिन घर में रोटी खायी, स्वाद ही नहीं आया। तो बेटे से कहा कि आटा कुछ अजीब है, उसने उसे बदल दिया और बाजार से दूसरा ले आया। अब भी वही स्थिति। फिर हमने जुबान पर ताला लगा लिया। एक-दो जगह गए और धीरे से आटे के बारे में पूछ लिया तो मालूम पड़ा कि यह तो सभी की परेशानी का सबब है। फिर लगा कि उन उद्योगपति का चोंचला सही था। कृषि क्षेत्र में बहुत प्रयोग किए हैं अमेरिका ने। शायद ऐसा ही कोई प्रयोग गैंहू में किया हो, क्योंकि उन्हें रोटी का स्वाद पता नहीं, वे तो ब्रेड खाते हैं। अतः जो ब्रेड में अच्छा स्वाद दे, वैसा ही गैंहू बना दो, शायद।
सेब और आडू को मिलाकर कई फल तैयार हो गए, ऐसे ही अनेक संकर फल आपको वहाँ मिल जाएंगे। किसी में स्वाद है और किसी में नहीं। अब जब संकर प्रजातियों की बात ही आ गयी है तो एक और मजे़दार मानसिकता वहाँ दिखायी दी। कुत्तों को लेकर वे बहुत प्रयोगवादी हैं। कॉलोनी में अक्सर प्रत्येक व्यक्ति सुबह-शाम कुत्ते घुमाता हुआ दिखायी दे जाएगा। एक-एक व्यक्ति के पास तीन-तीन कुत्ते। मजेदार बात यह है कि सारे ही कुत्ते एक दूसरे से अलग। स्ट्रीट डॉग वहाँ नहीं हैं, लेकिन घरों में कुत्तों और बिल्लियों की भरमार है। बाज़ार में उनके लिए बड़े-बड़े मॉल है, जहाँ उनका खाना से लेकर बिस्तर तक उपलब्ध हैं। उनके सेलून भी हैं और अस्पताल भी।
कुछ घरों में तो केवल कुत्ते-बिल्ली ही हैं, बच्चे नहीं। वहाँ व्यक्ति पहले कुत्ता पालता है और उसके बाद उसके पास आर्थिक सामर्थ्‍य होता है तब बच्चे पैदा करता है। शायद सुरक्षित सुख इसी में है। जिम्मेदारी रहित सुख। किसी को दो दिन के लिए बाहर जाना है तो पड़ौस में कुत्ते को बाँध गए या फिर अपने परिचित से कह दिया कि ध्यान रख लेना। बच्चे के साथ तो ऐसा नहीं कर सकते न? कुत्ता दूसरे पर भौंकता है जबकि बच्चा अपनों पर। भौंकने की बात पर ध्यान आया कि हमारे यहाँ जब भाग्य से कभी-कभार रात को कुछ शोरगुल थमता है तब कुत्तों के भौंकने की आवाजे आप बड़े मनोयोग पूर्वक सुन सकते हैं। ये आवाज़ें जरूरी नहीं कि गली के कुत्तों की हो, वे पालतू कुत्तों की भी होती है। वैसे अमेरिका में लोग इतने प्यार से कुत्ते पालते हैं कि मुझे यहाँ उनके लिए कुत्ते शब्द का प्रयोग खल रहा है। तो वहाँ कुत्ते भी भौंकते नहीं है और दूसरे को देखकर झपटते नहीं हैं। यहाँ तो गोद मे चढ़ा पिल्ला भी दूसरे को देखकर गुर्रा लेता है और फिर मालिक उसे प्यार से थपथपाता है और चुप कराता है तब वह शान से अपनी अदा बिखेरता हुआ कूं-कूं कर देता है। मालिक की गर्दन भी गर्व से तन जाती है, कि देखो मेरा पिल्ला भी कैसा जागरूक है? लेकिन वहाँ ऐसा कुछ नहीं था, लोग चुपचाप अपने कुत्तों को घुमाते रहते हैं, आप पास से निकल जाएं कुत्ता कोई हरकत नहीं करता। जहाँ के कुत्ते तक इतने शान्त हो, वहाँ के व्यक्ति का क्या कहना? तभी तो वे एशियन्स को देखते ही घबरा जाते हैं, आ गए आतंकवादी। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का बहुत अन्तर नहीं है वहाँ, उनके लिए सब ही लड़ाका हैं।
एक मजे़दार किस्सा है, किस्सा क्या है सत्य घटना है। पोता अभी पाँच महिने का ही था, घुटनों के बल चलता था। बेटे का एक अमेरिकन दोस्त है-मार्टिन, उसने एक बिल्ली पाल रखी थी। एक दिन बेटा मार्टिन से मिलने गया, साथ में अपने नन्हें से बेटे को भी ले गया। मन में डर भी था कि कहीं बिल्ली से बच्चा डर नहीं जाए। घर पहुँचकर पोता खेलने लगा और दोनों दोस्त बातों में रम गए। कुछ देर बाद रोने की आवाज सुनाई दी, तब बेटे को होश आया। अरे कहीं चुन्नू को तो बिल्ली ने नहीं मारा है? लेकिन यह क्या बिल्ली एक कोने में दुबकी हुई चुन्नू को देखकर रो रही थी। हमारे यहाँ बिल्ली घाट-घाट का पानी पीती है, घर-घर जाकर दूध साफ करती है। लेकिन वहाँ घर में बंद रहती है। सुबह-शाम मालिक घुमाने ले जाता है, तब कोई भी सड़क पर घुटने चलता बच्चा नजर नहीं आता। बेचारी बिल्ली ने कभी बच्चों को घुटने चलते देखा ही नहीं तो उसने समझा कि कौन सा जानवर आ गया है, इतना बड़ा?
भारत की भूमि पर घर-घर में कृष्ण के बाल रूप के दर्शन हो जाते हैं। सुबह उन्हें नहलाया जाता है, भोग लगता है, झाँकी होती है और सारा दिन कहाँ बीत जाता है पता ही नहीं चलता। वहाँ सारा दिन कुत्तों और बिल्लियों के साथ कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। वहाँ कुत्तों-बिल्लियों तक ही लोग सीमित नहीं है, छिपकली तक पाल लेते हैं। शहरों में कहीं भी पशु-पक्षियों के दर्शन नहीं होते तो वीकेंड पर कैंप लगाकर जंगलों की खाक छानते रहते हैं, जानवरों को देखने के लिए। एक ऐसे ही जंगल में हम भी गए। घूमते-घूमते मालूम पड़ा कि यहाँ भालू है। बस फिर क्या था, हम भी घुस पड़े जंगल में। वहाँ देखा पहले से ही दसेक लोग भालू को निहारने के लिए खड़े हैं। भालू मजे से पेड़ पर चढ़कर सेव खा रहा था। हम और अंदर चले गए, हमें दो और भालू दिख गए। दो-तीन लोग तो ज्यादा ही अंदर चले गए। लेकिन हम समय पर बाहर आ गए, हमारे बाहर आते ही रेंजर काफिले सहित आ गया और सभी को ऐसा नहीं करने की हिदायत देने लगा। हम तो सबकुछ देखकर चुपचाप खिसक आए।
जंगलों में भी वहाँ जानवर दिखायी नहीं देते। वहाँ होटल परिसर में मोटी-ताजी गिलहरी घूम रही थी बस वे ही सब के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई थीं। जंगल भी जानवरों से रिक्त कैसे हैं, यह हमें समझ नहीं आया। शहर तो सारे ही कीड़े-मकोड़ों से रिक्त हैं ही। वहाँ लगा कि वास्तव में आदमी ने दुनिया में अपना प्रभुत्व जमा लिया है। अभी भारत इस बात में पिछड़ा हुआ है। यहाँ सारे ही जीव-जन्तु भी साथ-साथ पलते हैं। इस धरती पर मनुष्य ही स्वेच्छा से विचरण करे शायद इसे ही विकास कहते हैं। हमारे जंगलों में, शहरों में कितने जीव मिलते हैं? सुबह पेड़ों पर तोते अमरूद खाते मिल जाएंगे, बंदर छलांग लगाते, हूप-हूप बोलते हुए दिख जाएंगे। कौवा तो जैसे पाहुने का संदेशा लाने के लिए ही मुंडेर पर आकर बैठता है। कोयल सावन का संदेशा ले आती है। चिड़िया, कबूतर तो घर में घोंसला बनाने को तैयार ही रहते हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में चले जाइए, मोर नाचते आपको मिल जाएंगे।
हम मानते हैं कि देश का विकास दो प्रकार का होता है, एक सभ्यता का विकास और दूसरा संस्कृति का विकास। अमेरिकी भौतिक स्वरूप का विकास अर्थात सभ्यता का विकास पूर्ण रूप में है और भारत इस मायने में विकासशील देश कहलाता है। अमेरिका पूँजीवादी देश है और उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था इतनी सुदृढ़ कर ली है कि वे सारी दुनिया को पैसा उधार देते हैं और ब्याज के बदले में सारी जीवनोपयोगी वस्तुएं प्राप्त करते हैं। सारा बाजार एशिया की वस्तुओं से भरा हुआ है। 25 प्रतिशत एशियायी उनके भौतिक स्वरूप के विकास में भागीदार हैं। वहाँ का प्रत्येक व्यक्ति टैक्स देता है, जबकि हमारे यहाँ टैक्स देने वालों का प्रतिशत क्या है? एक सज्जन ने बताया कि यहाँ टैक्स की आमदनी ही इतनी है कि इन्हें समझ नहीं आता कि इस पैसे को कहाँ खर्च करें? परिणाम सारी दुनिया को खैरात बाँटना और फिर उनकी प्रकृति-प्रदत्त संसाधनों का उपयोग करना। अमेरिका के पास भी प्राकृतिक संसाधन की प्रचुरता है लेकिन वह इनका उपयोग नहीं करता। जब दुनिया के संसाधन समाप्त हो जाएँगे तब हम उनका उपभोग करेंगे, यह है उनकी मानसिकता। इसलिए ही खाड़ी के देशों से तैल की लड़ाई लड़ी जा रही है। उनकी सभ्यता के विकास के पीछे है उनका अर्थप्रधान सोच है। दुनिया के सारे संसाधन, बौद्धिक प्रतिभा सब कुछ एकत्र करो और अमेरिका के लिए प्रयोग करो। ऐसा कौन करने में समर्थ होता है, निःसंदेह ताकतवर इंसान। जैसा कि मैंने पहले कहा था कि वे विज्ञान के इस सिद्धान्त को वरीयता देते हैं कि जो भी ताकतवर हैं वे ही जीवित रहेगा। अतः उनकी जीवनपद्धति का मूल मंत्र ताकत एकत्र करना है।
प्रकृति सारे ही जीव-जन्तुओं के सहारे सुरक्षित रहती है, लेकिन अमेरिका में सभी के स्थान निश्चित हैं, जहाँ मनुष्य रहेंगे, वहाँ ये नहीं रहेंगे। अर्थात सारी प्रकृति को गुलाम बनाने की प्रवृत्ति। भोग-विलास के लिए एकत्रीकरण की प्रवृत्ति। त्याग और समर्पण के लिए कहीं स्थान नहीं। टेक्स के रूप में देने का अर्थ भी क्लब जैसी मानसिकता के रूप में परिलक्षित होता है। देश का मेनेजमेंट सरकार के रूप में तुम देखते हो तो टेक्स लो और हमें सुविधाएं दो। उसमें त्याग की भावना नहीं है। भारत में त्याग ही त्याग है। हम टेक्स के रूप में कुछ नहीं देना चाहते लेकिन दान के रूप में सबकुछ दे देते हैं। इसलिए हमारा सांस्कृतिक विकास पूर्ण हैं। भारत की जनसंख्या सौ करोड़ से भी अधिक है, यदि भारत में भी लोग अमेरिका की तरह टैक्स देने लग जाएं तो शायद सर्वाधिक टेक्स हमारे देश में आएगा। फिर विकास की कैसी गंगा बहेगी, इसकी शायद हमें कल्पना नहीं है? हम केवल दान देकर स्वयं को भगवान बनाने में लगे रहते हैं। हमारे यहाँ भौतिक विकास का कभी चिंतन हुआ ही नहीं, बस आध्यात्मिक विकास के लिए ही हम हमेशा चिंतित रहते हैं। हम केवल अपने लिए ही नहीं, प्राणी मात्र के लिए, चर-अचर जगत के लिए चिंतन करते हैं। शायद हमारा यही सांस्कृतिक सोच कभी विश्व को बचाने में समर्थ बनेगा। आज नवीन पीढ़ी को यह दकियानूसी लगता है लेकिन कल यही सिद्धान्त सभी को आकर्षित करेगा।

डॉ अजित गुप्ता

Saturday, March 21, 2009

सोने का पिंजर (9)

नौवां अध्याय

अमेरिका में हिंदुस्तानी शान से हिंदी बोलता है....

हम अमेरिका हिन्दी सम्मेलन के निमित्त गए थे तो हिन्दी की बात भी करनी होगी। सच तो यह है कि पूरा अमेरिका घूम आइए आपको हिन्दी ही हिन्दी दिखाई और सुनाई देगी। इतने हिन्दुस्तानी वहाँ बसे हुए हैं और सभी को अपनी पहचान भी स्थापित और सुरक्षित रखनी होती है तब हिन्दी का ही सहारा रहता है। फिर जहाँ भारतीय हों वहाँ भारतीय खाना तो अवश्य ही होगा। शहर में कई-कई भारतीय रेस्ट्रा, वहाँ खाना भी हिन्दुस्तानी और भाषा भी हिन्दी। भारतीय खाने का जवाब नहीं और इसी कारण क्या अमेरिकी और क्या अन्य सभी वहाँ आते हैं। जब खाना खाने आते हैं तब कुछ न कुछ तो हिन्दी के प्रति आकर्षण पैदा हो ही जाता है। हिन्दी वहाँ खाने और फिल्मों के कारण ही पसन्द नहीं की जाती है, उसका एक ठोस कारण भी है। युवा दंपति आकर बस गए अमेरिका, कुछ दिन मौज-मस्ती कर ली, फिर बच्चे हो गए। जैसे ही बच्चे बड़े होने लगे कि डर सताने लगता है। कहीं ये अपनी भाषा नहीं भूल जाएं, अपने संस्कार नहीं भूल जाएं? हम तो भारत में अपने घर-परिवार को छोड़कर यहाँ आकर बस गए लेकिन यदि हमारे बच्चे पूर्णतया अमेरिकी बन गए तो फिर हमारा भविष्य क्या होगा? जिस राम की कथा को उन्होंने भुला दिया था उसी राम की कथा को वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। पिता का स्वार्थ है कि बच्चे अपने संस्कारों से जुड़े रहें इसलिए हिन्दी सीखे और बच्चों का स्वार्थ है कि हिन्दी फिल्में और गाना सुनना है तो फिर हिन्दी तो सीखनी ही पड़ेगी। बिना हिन्दी सीखे हिन्दी फिल्मों का आनन्द कैसे लिया जा सकता है?
इण्डियन कम्यूनिटी सेंटर पर कार्यक्रम चल रहा था, एक बच्चा बड़ा अच्छा गाना गा रहा था। उससे पूछा गया कि क्या तुम्हें हिन्दी आती है, तो वह बोला कि नहीं गाना याद कर लिया है। जब गाना याद हो गया है तब हिन्दी भी दबे पाँव उसके अन्दर उतर ही जाएगी। वहाँ सारा दिन हिन्दी और भारतीय ज्ञान की कक्षाएं लगती हैं। कोई हिन्दी सीख रहा है, कोई भारतीय शैली के विभिन्न नृत्य। फिर भारतीय बाजार इतना बड़ा है कि सभी को व्यापार करना है। इसलिए ही अमेरिका के प्रेसीडेन्ट कह उठते हैं कि हिन्दी नहीं सीखोगे तो पीछे रह जाओगे। हमारा युवा भारत में रहकर हिन्दी की उपेक्षा करता है, लेकिन वहाँ हिन्दी उसके लिए गौरव का विषय है। क्योंकि वही उसकी पहचान है।
विश्व हिन्दी सम्मेलन में सारे विश्व के प्रतिनिधि थे। जब चीन और जापान के प्रतिनिधि बोलने को खडे हुए तब आश्चर्य हुआ। मैंने मजाक में कहा कि यहाँ तो पता ही नहीं चलता कि कौन हिन्दी नहीं जानता, हम यदि किसी को ऐसा वैसा हिन्दी में कह दें तो ये तो सभी हिन्दी जानते हैं, फिर क्या होगा? मेरे साथ ही सम्मानित होने वालों की सूची में कोरिया की एक सुन्‍दर सी महिला थीं। मुझे उनसे हिन्दी में बात करने में संकोच हो रहा था। बड़ा अजीब सा लग रहा था, एक विदेशी महिला को हिन्दी बोलते हुए देखते। वहाँ कोई भी प्रतिनिधि अंग्रेजी में बात नहीं कर रहा था, जबकि हमारे भारत में लोग अंग्रेजी में बात करना अपनी शान समझते हैं। भारत में सभी को हिन्दी आती है लेकिन क्या टी.वी, क्या संसद सभी ओर अंग्रेजी छायी रहती है। वह तो व्यापारीकरण के कारण टी.वी. चैनलों को समझ आ गया है कि हिन्दी में ही सफलता का सूत्र छिपा है तो वे अब हिन्दीकरण में लगे हैं।
सम्पूर्ण अमेरिका में घूम आइए, उनकी संस्कृति के मूल चिंतन का दिग्दर्शन प्रत्येक क्रियाकलाप में आपको मिलेगा। वे प्रकृति के सिद्धान्त ‘सर्ववाइवल आफ द फिटेस्ट’ के पोषक हैं। वहाँ व्यक्ति अकेला है। उसे स्वयं को ही सारे कार्य करने हैं। आपका कोई सहयोगी नहीं। यदि आप ताकतवर नहीं, आत्मविश्वासी नहीं तो फिर आप वहाँ रह नही सकते। वहाँ पब्लिक ट्रांस्पोर्ट न के बराबर हैं अतः जब तक आप गाड़ी चलाना नहीं जानते आप घर से बाहर भी नहीं निकल सकते। कमसिन सी लड़कियां, जो हवा के झोंके से भी लहरा जाए, बड़ी-बड़ी गाड़ियां चलाती हैं। चलाती ही नहीं सरपट दौड़ाती हैं। वहाँ की अमूमन स्पीड है 80 मील प्रति घण्टा, कि.मी. की भाषा में कहें तो वहाँ गाड़ियां लगभग 125 से 150 कि.मी. प्रति घण्टे की रफ्‍तार से चलती हैं। सड़कों पर केवल गाड़ियां दौड़ती हैं, पुलिस भी दिखायी नहीं देती। आप रास्ता किसी से पूछ नहीं सकते, या तो आपकी गाड़ी में नेवीगेटर लगा हो या फिर आप मैप लेकर बैठे। वहाँ 99 प्रतिशत लोग अपनी गाड़ी रखते हैं केवल एक प्रतिशत लोग पब्लिक ट्रांस्पोर्ट का उपयोग करते हैं।
हम कई दिनों तक वहाँ घूमते रहे और हमें रेल कहीं दिखायी नहीं दी, आखिर हमने बेटे से पूछ ही लिया कि यहाँ की रेल तो दिखा दो। कुछ देर बाद ही उसने पास जाती दो डिब्बों की बस जैसी रेल दिखा दी। जो हमारे साथ ही शहर की सड़कों पर दौड़ रही थी, पटरी समानान्तर बिछी थी और रेल भी ग्रीन-रेड लाइट से रुकती-चलती थी। शहरों को भी आपस में जोड़ने के लिए रेलमार्ग है लेकिन वह बहुत ही कम है। उनमें भी यात्री गिने-चुने ही होते हैं। यही हाल बस का है, पूरी खाली या फिर एकाध सवारी को ले जाती हुई आपको दिख जाएगी। हमारे जैसा नहीं है कि घर से बाहर निकलो और रिक्शा, टेम्पो, बस सभी कुछ तैयार।
हाँ तो मैं वहाँ की संस्कृति के बारे में कह रही थी, जैसे वहाँ स्वयं को ही गाड़ी हाँकनी होती है वैसे ही आपको अपने पेट भरने के लिए सारे काम करने होते हैं। बाजार में न कोई दर्जी, न कोई जूते सीने वाला और न कोई मेकेनिक। यूज एण्ड थ्रो बस। हमारे यहाँ एक-दूसरे के लिए कार्य करने की प्रवृत्ति है, कोई कमाता है, कोई घर देखता है। अमेरिकन्स का तो खाना अलग तरह का होता है, तो सारी खटपट हो जाती है और शायद उन्हें तो आदत भी है। लेकिन भारतीयों की मुश्किल होती है, जब वे भारत से चलते हैं तब तक नौकर-चाकर, ड्राईवर आदि सभी होते हैं। लेकिन यहाँ अपना हाथ-जगन्नाथ। बुढ़ापे की कद्र वहाँ भी है, उनके लिए सुविधाएं भी खूब हैं लेकिन वे बूढ़े हैं इसलिए सरकार सुविधाएं देती हैं, वे परिवार के सम्मानित सदस्य हैं यह सोच नहीं है। लेकिन वे सब प्रसन्न हैं क्योंकि उन्होंने भारत नहीं देखा है। वे जब भारत के बारे में पढ़ते हैं तो उन्हें भी उत्सुकता होती है कि देखें कैसे परिवार होते हैं, जहाँ घर का मुखिया एक बूढ़ा दादा होता है।
कल तक वे भी परिवार के साथ ही रहते थे, लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता और अर्थ ने अपने पैर जमाए हैं, वैसे-वैसे परिवार टूटकर बिखरते जा रहे हैं। वहाँ एक आम नागरिक के जीवन में संघर्ष नहीं है। सभी कुछ उपलब्ध है। जो बनना चाहते हो, उस पर भी पाबंदी नहीं है। पढ़ाई के प्रति इतना आग्रह नहीं है। वहाँ का समाज अधिक पढ़ाकू बच्चे को पसन्द नहीं करता। इसीलिए खेलों के प्रति अधिक रूझान है। बच्चा खेले, कूदे या फिर कोई साहस का कार्य करे, वह ज्यादा अच्छा माना जाता है। पैसा जमा करना उनका शौक नहीं। क्या करेंगे पैसा जमा करके? सामाजिक उत्तरदायित्व कुछ नहीं। सरकार ही बुढ़ापे का सहारा है। पढ़ने के लिए लोन मिल जाता है। बस पाँच दिन कमाओ और दो दिन खर्च कर दो। आम अमेरिकी सोमवार से लेकर शुक्रवार तक काम करता है, लेकिन शुक्रवार की रात से रविवार तक पूर्ण आराम। शुक्रवार की रात जश्न की रात होती है। सड़कों पर गाड़ियां दौड़ती रहती है, पीछे बड़ी-बड़ी नावें बंधी हैं, साइकिले बंधी हैं, समुद्र किनारे कैम्प करेंगे, किसी जंगल में जाकर कैम्प करेंगे या फिर किसी होटल में जाकर दूसरे शहर रहेंगे। मुख्य शहर वहाँ डाउन टाउन कहलाता है, वहाँ शुक्रवार और शनिवार की रात को चले जाइए, दीवाली जैसा माहौल मिलेगा। लोग बैठे हैं, नाच रहे हैं, सिगरेट पी रहे हैं और क्लब में जाने के लिए लम्बी-लम्बी कतारों में लगे हैं। उस दिन दो-तीन बजे तक जश्न रहेगा। लेकिन सोमवार से फिर खामोशी, जीवन रात को आठ बजे ही थम जाएगा।
वहाँ नौकरी पर जाना भी मनमाना है, कोई सुबह सात बजे जा रहा है और फिर दिन में तीन बजे वापस आ रहा है और कोई दस बजे जाकर पाँच बजे। अधिकतर ऑफिस चौबीस घण्टे खुले रहते हैं तो काम अपने हिसाब से ही करते हैं। एक दिन रात्रि को हम भी बेटे के साथ उसके ऑफिस पहुँच गए। गेट पर कोई संतरी नहीं, चौकीदार नहीं। बस अपना कार्ड निकालिए और स्क्रेच कीजिए और गेट खुल जाएगा। वह हमें अपना ऑफिस दिखा रहा था, उसका एक साथी देर रात तक केबिन में बैठा था। वह बोला कि यार घर पर कोई है नहीं तो यहाँ ही आराम से बैठा हूँ, किताब पढ़ रहा हूँ। वहाँ अधिकतर सभी के केबिन होते हैं। मैंने पूछा कि तुम्हें कमरा कब मिलता है? वह बोला कि मेरे वाइस-प्रेसीडेन्ट भी बगल वाली केबिन में ही बैठते हैं। कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं। बस वेतन में बहुत अन्तर है। किसी को कुछ हजार डॉलर वेतन है तो कुछ को लाखों में। एक ही पद पर काम करने वाले लोगों में भी वेतन का अन्तर है। जिसका जैसा काम, उसका वैसा वेतन। कोई किसी का वेतन पूछता भी नहीं, क्योंकि यह आउट ऑफ एटिकेट है। क्या पता पूछ ले तो हमारे जैसे हड़ताल हो जाए? खैर हम सारा ऑफिस देखकर बाहर आ गए। जैसे ही उसके कक्ष से निकलकर गैलेरी में बाहर आए, मालूम पड़ा कि उसका कार्ड अन्दर ही रह गया। अब क्या हो? बाहर तो निकल सकते हैं, लेकिन वापस अन्दर नहीं जा सकते। उसने कहा कोई बात नहीं सुबह किसी के साथ भी अन्दर चला जाऊँगा। नहीं तो इमरजेन्सी में दूसरा कार्ड बनवाना पड़ेगा। वहाँ आपके पास कार्ड नहीं है तो आप कहीं भी प्रवेश नहीं कर सकते।
रात्रि भोज का रिवाज नहीं, सब आठ बजे पहले-पहले खाना खा लेते हैं। अमेरिकन रेस्ट्रा आठ बजे बन्द। सूर्य छिपता है कहीं नौ बजे और कहीं साढ़े आठ बजे। यहाँ भी भारतीय अपनी चलाते हैं, उनके रेस्ट्रा बन्द होंगे रात्रि दस बजे। किसी भी अमेरिकन को रात्रि में आठ बजे बाद फोन करना अनुशासनहीनता कहलाती है। मन में प्रश्न उचक-उचक कर आता है, कि हम भारतीयों ने देर रात तक जागना किससे सीखा? क्यों हम कहते हैं कि पश्चिम की नकल कर रहे हैं? पश्चिम में केवल दो दिन देर रात तक जागने का रिवाज है, बाकि सब कुछ मर्यादित। हमारे यहाँ तो रोज ही रात्रि में दस बजे बाद दिन शुरू होता है। रोज ही हुल्लड़, वह भी सड़कों पर। वहाँ कहीं भी शोर नहीं। होर्न बजाना तो जैसे अपराध। न कोई लाउड-स्पीकर न कोई बैण्ड-बाजे। कॉलोनियों में तो सातों दिन ही सन्नाटा पसरा रहता है।
हम जैसे भारतीयों की तो जीभ ही सूख जाती है। आलोचना रस तो गोंद जैसे सूख कर हलक में अटक जाता है। किससे बात करें? सब आते-जाते केवल मुस्कराहट फेंकते हैं। ज्यादा से ज्यादा गुडमार्निग बस। भारतीय तो कुछ भी आदान-प्रदान नहीं करते। मैंने पूछ ही लिया इसका कारण कि अमेरिकन तो गुडमार्निंग करता है और भारतीय मुँह फेर कर क्यों चलता है? उत्तर बड़ा ही मजेदार था, यहाँ भारतीय एम.वे. वालो से बड़े डरे हुए हैं। जरा सा मुस्करा दो, एम.वे. वाला एजेन्ट आपको धर दबोचेगा। भई इनसे दूर ही रहो, अपनी नौकरी के लिए अपना देश छोड़कर आए हैं और यहाँ अपनी नौकरी छोड़कर इनके तैल-शैम्पू बेचो। एक पर्यटक स्थल है ‘येशूमिटी’ हम वहाँ गए। सुबह जल्दी उठकर पैदल ही पहाड़ पर चढ़ना था, रास्ते में अमेरिकन्स मिलते गए और गुडमार्निंग होती रही। हमने सोच लिया था कि भारतीय मिलने पर हम भी नमस्ते करेंगे। दो भारतीय लड़के मिल गए, हमने दूर से कहा कि ‘नमस्ते’। अब उनके चौंकने की बारी थी, उन्होंने भी बड़े गर्व से कहा नमस्ते। हिन्दी सुनकर लगा कि उनकी आत्मा तक खिल उठी है। मुझे लगा कि हमने नाहक ही संकोच बना लिया है और दूरियां भी। लेकिन पास लाने का काम मन्दिर और कम्यूनिटी सेन्टर कर रहे हैं। सारे भारतीय रोज ही एकत्र होते हैं और सब मिलकर सारे ही त्यौहार मनाते हैं। मज़ेदार बात तो यह है कि पाकिस्तानी भी वहाँ आ जाते हैं। एक दिन इण्डियन कम्यूनिटी सेंटर पर एक सज्जन गाना गाने खड़े हुए और गाना था ‘मेरा जूता है जापानी’ फिर परिचय दिया कि मैं पाकिस्तानी हूँ। वहाँ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान से अधिक एशियन ज्यादा प्रचलित नाम है।

डॉ अजित गुप्ता

Saturday, March 14, 2009

सोने का पिंजर (8)

आठवां अध्याय

अमेरिका में बच्चे खुद लोन लेते हैं,चुकाते हैं

अमेरिका का नारा है स्वतंत्रता - लिबर्टी। इसलिए ही स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी न्यूयार्क में बड़ी शान से खड़ी है। सेन फ्रांसिस्को के रेड-वुड फारेस्ट में एक जगह एक स्लोगन लिखा था जिसका भावार्थ यह है ‘स्वतंत्रता तभी प्राप्त होती है जब हम अपनी रेस्पोन्सबिलिटी पूरी करते हैं।’ यहाँ के वासियों ने अपनी जिम्मेदारी को भलीभांति समझा है और अपने देश के निर्माण में योगदान किया है। भारत में नारा दिया जाता है कि पोलीथीन छोड़ो, लेकिन यहाँ पोलीथीन का भरपूर प्रयोग होता है। क्या मजाल जो एक कतरन भी कहीं सड़क पर दिखाई दे जाए। यहाँ गन्दगी फैलाना अपराध है और इसे प्रत्येक नागरिक समझता है। दुनिया में यदि हम छोड़ने का ही नारा देते रहे तब हम किसी को भी नहीं छोड़ पाएंगे। किसी भी वस्तु का प्रयोग कैसे करें, उसको डिस्पोज कैसे करें? यह प्रबन्ध हमें सीखना चाहिए। यदि हम मानव देह का भी अंतिम संस्कार नहीं करेंगे तब वो भी हानिकारक सिद्ध होगी। अतः आवश्यकता है अपना उत्तरदायित्व समझने की।
भारत का व्यक्ति क्या देश के लिए या अपने समाज के लिए या अपने परिवार के लिए अपनी जिम्मेदारी समझता है? शायद नहीं। कुछ केवल अपना परिवार अपनी बीबी-बच्चों को ही मानते हैं और उनकी जिम्मेदारी में ही अपनी इतिश्री मान लेते हैं। कुछ समाज के नाम पर अपने दोस्तों को मानते हैं और उनके ही दुख और सुख के साझीदार बनते हैं। मेरा समाज जिसने मुझे पहचान दी है, वह आज कहाँ खड़ा है, इसके बिना मेरी पहचान क्या होगी? इसकी चिन्ता करना हम फिजूल और दकियानूसी समझते हैं। जिस देश के सुरक्षा चक्र से हम हर पल सुरक्षित रहते हैं, उस देश की उन्नति के बारे में हम कितना सोचते हैं? केवल हम अपनी स्वतंत्रता के बारे में सोचते हैं। हमें कैसे स्वतंत्रता मिले, अपने परिवार से, अपने समाज से, अपने देश से। शायद भारत के लोग स्वतंत्रता के मतलब भूल गए हैं। यहाँ जो भारतीय बसे हैं, वे भी नहीं जान पाए स्वतंत्रता का अर्थ। इसी कारण वे दो राहे पर खड़े हैं, अपने आप से जुड़े हुए और अपने आप से दूर। यहाँ आकर मैं भी स्वतंत्रता का अर्थ समझने की कोशिश कर रही हूँ और अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण करने का प्रयास भी।
जिनके बच्चे यहाँ आकर बस गए हैं या रह रहे हैं, उनकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी आज है। वे तो आज स्वतंत्रता के बारे में सोच भी नहीं सकते। भारत में वानप्रस्थ आश्रम में आते-आते व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी पूर्ण कर लेता है और स्वतंत्रता का अनुभव करता है। अपने व्यापार की, अपने परिवार का उत्तरदायित्व वे अपनी संतानों को सुपुर्द कर देते हैं। संन्यास आश्रम में वे पूर्ण स्वतंत्र हो जाते हैं। अर्थात् 75 वर्ष की आयु के बाद आम भारतीय केवल आध्यात्मिक उन्नति का ही चिंतन करते हैं। विगत काल में तो अक्सर वे वनवास ले लेते थे, वर्तमान में सामाजिक कार्य, धार्मिक कार्य करते हुए अपना जीवन बिताते हैं।
लेकिन अब चिंतन का विषय यह है कि क्या हमने अपनी जिम्मेदारी पूर्ण कर ली? क्या इतनी भर ही थी हमारी जिम्मेदारी कि हमारे बच्चे पढ़े, कमाएँ और घर बसा लें। क्या उन्हें भी स्वतंत्र होते देखना हमारी जिम्मेदारी नहीं है? अमेरिका का भारतीयकरण होते देखना ही सबसे बड़ी त्रासदी है। मेरे शब्दों से चौंकिए मत। जितने भी भारतीय यहाँ बसे हैं, वे मन से स्वतंत्र नहीं हो पा रहे हैं। क्योंकि अमेरिका के शब्दों में ही जिसने अपना उत्तरदायित्व पूर्ण किया है वे स्वतंत्र हैं। अपने देश से भाग आना कैसे उत्तरदायित्व पूर्ति का सुख दे सकता है? मन तो कचोटता ही रहता है, अपराध-बोध तो संग रहता ही है।
उनका रहन-सहन, खाना-पीना सब अमेरिका जैसा है, लेकिन फिर भी जिस मिट्टी से शरीर बना है, उसकी माँग रोज़ होती है और हम फिर जुट जाते हैं अमेरिका को भारत बनाने में। हम रोज़-रोज़ मन को मारते हैं, अपनी जीभ को नए स्वाद से परिचित कराते हैं, फिर अपने स्वाद के लिए तड़प उठते हैं और एक भारतीय रेस्ट्रा खोल लेते हैं। तो बताइए कि कैसे यहाँ के भारतीय स्वतंत्र हैं? जब यह संघर्ष देखते हैं तब लगता है कि हमारी ज़िम्मेदारी पूर्ण नहीं हुई। परन्तु फिर यक्ष प्रश्न निकल आता है कि कैसे इन्हें स्वतंत्रता का अर्थ समझाएं? हमने एक बार वाक्य पढ़ा और अमेरिका की फिलासफी समझ आ गयी और लोग यहाँ बरसों से रह रहे हैं और उन्हें ज़िम्मेदारी का अर्थ नहीं मालूम। एक कथा याद आ गई, श्रीकृष्ण जब संदीपनी आश्रम में विद्या-अध्ययन कर रहे थे तब उनके गुरु ने उन्हें भारत भ्रमण कराया और उसी के माध्यम से शिक्षा देने का प्रयास किया। एक समुद्र तट पर गुरु दुखी हो उठे, उन्हें अपने पुत्र का स्मरण हो आया। श्रीकृष्ण को मालूम पड़ता है कि उनके पुत्र पुनर्दत्त को यहीं पर समुद्री डाकू उठा ले गए थे। कृष्ण समुद्र में जाते हैं और एक द्वीप में उन्हें पुनर्दत्त मिलता है। वह राजशी ठाट-बाट से अपना जीवन निर्वाह कर रहा था, लेकिन उसका जीवन वहाँ की महारानी का गुलाम था। कृष्ण उसे आजादी का मार्ग बताते हैं लेकिन वह इंकार कर देता है। कहता है कि मुझे इस सुख की आदत हो चुकी है और मैं स्वतंत्रता के अर्थ भूल चुका हूँ। आज यही बात यहाँ बसे भारतीयों पर लागू होती है, वे सुख के अधीन होकर स्वतंत्रता का अर्थ भूल चुके हैं। हम सभी को कृष्ण बनना होगा और उन्हें स्वतंत्रता का अर्थ अमेरिका की भाषा में ही समझाना होगा। उन्हें समझाना होगा कि भारत का नागरिक ज्यादा स्वतंत्र है या फिर अमेरिका का?
अमेरिकन अपनी जिम्मेदारी पूर्ण करने को स्वतंत्रता कहता है और भारतीय किसी भी जिम्मेदारी को पूर्ण नहीं करने पर भी अपने देश में परतंत्र अनुभव करते हैं। शायद इस दुनिया में भारत जैसा देश नहीं मिलेगा। जहाँ के नागरिकों को देश से सब कुछ लेने की छूट है, लेकिन बदले में कुछ भी नहीं देने की भी छूट है। अमेरिका में बच्चे लोन लेकर पढ़ते हैं और स्वयं ही उसे चुकाते हैं। लेकिन भारत में बच्चे माता-पिता की दौलत से पढ़ते हैं और भारत सरकार उनके लिए सुविधाएं प्रदान करती है। पढ़ने के बाद विदेश गए बच्चे किस देश का टैक्स भरते हैं? भारत में ही इतनी स्वतंत्रता है कि आप सब कुछ लेकर, बिना कुछ वापस चुकाए कहीं भी जाकर बस जाओ। वास्तविक स्वतंत्रता किसे कहते हैं यह बात हमें अमेरिका से सीखनी चाहिए।
अमेरिका में पर्यटन के प्रति बहुत जागरूकता है। क्या दुनिया को दिखाना है और क्या नहीं दिखाना, यह वहाँ की सरकार तय करती है। अमेरिका में समुद्र और जंगल प्रकृति के उपहार हैं। हमारे यहाँ समुद्र किनारे गर्मी पड़ती है और वहाँ सर्दी। दर्शनीय स्थलों को प्रत्येक कोण से दिखाना यहाँ के उन्नत पर्यटन का नमूना है। समुद्र के एक तरफ पर्वत हैं, उसके लिए पृथक दर्शनीय स्थल है, दूसरी तरफ तट है, उसके लिए पृथक स्थल है। कहाँ से समुद्री जीव दिखायी देंगे और कहाँ से समुद्री पक्षी। वर्ष में दो महीने के लिए गर्मी पड़ती है बाक़ी समय सर्दी। कहीं बर्फ की भरमार है तो कहीं सामान्य तापक्रम। अमेरिका इतना बड़ा है कि उसे एकबारगी ही नापना सम्भव नहीं है। उत्तर की तरफ जाइए बर्फ मिलनी शुरू हो जाएगी और दक्षिण की तरफ केवल पानी। अमेरिका में धूल को दूब के आगोश में समेट रखा है। कुछ तो प्रकृति की मेहरबानी और कुछ वहाँ के बाशिंदों की मेहनत। साल में दो महीने ही नाम मात्र की जहाँ गर्मी पड़ती हो और पानी की प्रचुरता हो तब घास तो सर्वत्र उग ही आती है और टिक जाती है। धूल की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वो घास का सीना चीर कर बाहर निकल आए। उसे तो उनकी जड़ों को ही मजबूती देनी होती है। फिर नवीन अमेरिका की बसावट ही सौ-डेढ़ सौ साल की है। शहर अभी भी बस रहे हैं, तो आधुनिकता और पूर्ण रूप से खुले और सुविधाजनक शहर ही बसाए जाते हैं। सड़के इतनी चौड़ी कि छः और आठ लाइनों में गाड़ियां दौड़ सकती हैं। फिर भी और चौड़ा करने की गुंजाइश बनी हुई रहती है।
सुंदर और पूर्ण आधुनिक शहरों को देखकर जहाँ अच्छा लगता है वहीं कुछ ही दिनों में नीरसता भी पसर जाती है। एक से शहर, एक ही बनावट, घर भी एक से और बाजार भी एक से। एक शहर देखो या फिर दस शहर देखो सब बराबर। बस कुछ शहरों में अन्तर दिखायी पड़ता है, न्यूयार्क में गगनचुम्बी इमारते हैं और वे एक दूसरे से सटी हुई हैं। सेनफ्रांसिस्को शहर पहाड़ पर बसा है, उसके एक तरफ समुद्र है और दूसरी तरफ पहाड़। सीधी खड़ी चढ़ाई पर कॉलोनी बसी हुई है, वह तो अच्छा है कि वहाँ अधिकतर गाड़ियां बिना गीयर की हैं तो उसे खड़ी चढ़ाई पर जाने में कोई कठिनाई नहीं होती। भारत के लिए कहा जाता है कि पचास साल बाद भी भारत अमेरिका जैसा नहीं बन सकता। मैं कहती हूँ कि पचास क्या सौ साल बाद भी भारत अमेरिका जैसा नहीं बन सकता। कारण है, हमारी सभ्यता हजारों वर्ष पुरानी है, शहरों की बसावट भी हजारों वर्ष पुरानी है। उन्हें नस्तनाबूद तो नहीं किया जा सकता? वहाँ सुविधाएं पहले विकसित हुईं और किस भूखण्ड पर पानी, बिजली, टेलीफोन की सुविधाएं दी जा सकती हैं, वहाँ ही शहर बसाए जाते हैं। हमारे यहाँ शहर पहले बसे और सुविधाएं बाद में आयीं। बस हमें तो आवश्यकता है गन्दगी पर नियन्त्रण करने की।
यहाँ का एक बड़ा शहर है सेनडियागो। यहाँ दो दर्शनीय स्थल हैं-एक सी-वर्ल्‍ड और दूसरा वाइल्ड लाइफ एनीमल सफारी। समुद्री जीवों को साधकर उनको जनता के सामने प्रस्तुत करना, एक आश्चर्य है। वोलरस जैसी विशालकाय मछली, डोल्फिन, सी लोयन, किलर फिश और अन्य प्रजातियों की मछलियों के वहाँ बड़े-बड़े स्टेज शो आयोजित किए जाते हैं। एक डोल्फिन है शामू, हाँ उसका नाम है शामू। वह किसी स्टार से कम नहीं। वह दुनिया की दूसरे नम्बर की सबसे बड़ी डोल्फिन है। उसका शो देखने के लिए हजारों लोग जुटते हैं और शायद दस हजार की संख्या वाला स्टेडियम अक्सर छोटा पड़ता है। जब वह उछलती है तो सोलह फीट तक उछल जाती है और जब अठखेलियां करती हुई पानी में चलती है तब स्टेडियम की कई दर्शक दीर्घाओं को भिगा देती है। ट्रेनर उसके साथ पानी में कूदती है और गहराई में चली जाती है, कुछ ही देर में शामू उछलकर सोलह फीट तक जाती है और उसके मुँह के ऊपर सीधे खड़ी हुई, हाथ हिलाती हुई ट्रेनर नज़र आती है। सारा स्टेडियम शामू-शामू की आवाज से गूँज उठता है। लोगों में इतना उत्साह होता है जैसे फुटबाल का मैच चल रहा हो।
एक और शो की बात बताती हूँ, आपने ‘थ्री डी’ फिल्में तो देखी होगी, लेकिन क्या कभी ‘फोर डी’ फिल्म देखी है? ऐसा करतब हमने वहीं देखा। कवर्ड हॉल में फिल्म प्रारम्भ होती है, ‘थ्री-डी’ की कल्पना थी अतः कभी भाला हमारे शरीर को बेधता हुआ सा लगता और कभी समुद्री तूफान हमारे पास से गुजरता हुआ। लेकिन हद तो तब हुई कि एक बूढ़ा थूक मारता है और सारे ही हॉल को भिगो देता है। कुछ देर में चूहें निकलने लगते है, तो लगता है कि हमारे पैरों के नीचे से निकल रहे हों। ऐसे ही रोमांच से भरी रहती है पूरी फिल्म। बाद में पता लगा कि उन्होंने हॉल में ही पानी और हवा छोड़ने का इंतजाम कर रखा था।

डॉ अजित गुप्ता

Saturday, March 07, 2009

सोने का पिंजर (7)

सातवां अध्याय

ऐसा भी कौन हैं कि सब अच्छा कहें जिसे...

भारत की निन्दा स्तुति मेरे जेहन में उभर-उभर आती है कि भारतीय रेल और बस का कोई समय नहीं। देर से आना इनकी नियति है। लेकिन जब हमने न्यूयार्क से सेनफ्रांसिसको की हवाई उड़ान ली, तब पहले से ही एक घण्टे विलम्ब से चले. हवाईजहाज में बैठने के बाद अनाउन्स हुआ कि यात्रा में एक घण्टे का विलम्ब और होगा। क्योंकि हमारे आगे अभी चालीस विमान उड़ने की कतार में हैं। यहाँ कोई नहीं कहता कि अमेरिका में हवाई यात्राओं की ऐसी स्थिति क्यों हैं? प्रश्न करो भी तो कहेंगे कि ये तो हो जाता है, इसमें कोई क्या करे? अरे तो अपने देश में भी तो हो जाता है, फिर वहाँ को छोड़कर यहाँ क्यों भाग आया? भारत में दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है, यहाँ रेल के नाम पर नाम-मात्र का नेटवर्क है। बस-सर्विस तो नहीं के बराबर हैं, केवल हवाईजहाज ही इतने बड़े देश को जोड़ने में समर्थ हैं। जैसे हमारे यहाँ हर मिनट बस और रेल रवाना होती हैं, ऐसे ही यहाँ हवाईजहाज हैं। देर सभी जगह है, बस गालियां केवल भारत के लिए ही बनी हैं।
एक बार मुझे उदयपुर से मुम्बई जाना था, मैने एजेण्ट को फोन किया कि एक टिकट इण्डियन एयर लाइन्स की ले दो। वह बोला कि अरे आप भी कैसी फ्‍लाइट की बात करती हैं, यह तो रनवे पर आने के बाद भी रुक जाती है। यहाँ हम रनवे पर पूरा एक घण्टा धीरे-धीरे सरकते रहे, हम देखते रहे कि एक जहाज उड़ा, हम आगे खिसके, फिर दूसरा उड़ा, हम और खिसके। वास्तव में यह भौतिकता का एक हिस्सा है, हमें इसी प्रकार सारे ही देशों में स्वीकारना चाहिए। हम केवल भारत को ही गाली दें, यह ठीक नहीं है। हमारे यहाँ तो कभी-कभी ही रनवे पर जहाज रुकता है लेकिन वहाँ तो रोज़ ही ऐसा होता है।
धीरे काम करना वहाँ की आदत है, इसे हम सुस्ती का नाम भी दे सकते हैं। सबसे मजेदार बात तो यह है कि यहाँ बसे भारतीय भी इसी सुस्ती का हिस्सा हैं। उनकी फुर्ती केवल हिन्दुस्थान की निन्दा-स्तुति में दिखायी देती है। हिन्दुस्थान का नाम लेकर जिन्दा हैं, हिन्दू कहलाकर जिन्दा हैं, हिन्दी भाषा के साथ जिन्दा हैं फिर भी अपने देश को सम्मान दिलाने की बात नहीं है। उन्हें अमेरिका में भी अपना भारत दिखना चाहिए, जिसे वे छोड़ आए थे। उसको याद करके साहित्य लिखा जा रहा है, आँसू बहाए जा रहे हैं, लेकिन अपनी भारतमाता की दुर्दशा को ठीक करने के लिए आना कोई नहीं चाहता।
सम्मेलन में एक कविता सुनाई गयी, कि यहाँ बड़ी सारी कोठी बनाकर भी छोटे से मकान का भाई से बँटवारा कराकर, ताला ठोंककर आना हमारी मानसिकता है, और फिर आशा करना कि काश कोई अच्छा पड़ोसी मिल जाए, जो उस ताले की हिफाजत कर जाए। अरे तुमने भारत देश के करोड़ों घरों में ताले लगा दिए हैं, करोड़ो बूढ़े माँ-बापों की आशाओं को छीन लिया है, कम से कम उस छोटे से मकान का ताला तो अपने गरीब भाई के लिए खोल आओ। लेकिन अभी हम इतने विकसित नहीं हुए हैं, कि दूसरे के लिए कुछ त्याग कर दें!
तुम भारतीय केवल त्याग की ही बात करते हो और दुखी होते हो, इसलिए ही विकसित नहीं हो। जितना छीन सको छीन लो, जितना भोग सको भोग लो, विकसित हो तो त्याग की बात मत करो। यही है विकास का राज।
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की खोज जब कोलम्बस ने की थी तब यहाँ के निवासियों को नाम दिया था ‘रेड इंडियनस’। आज यहाँ रेड इन्डियन्स अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं और दुनिया जहान से आए व्यक्ति अमेरिकी नागरिक बनते जा रहे हैं। यहाँ बड़ी संख्या में यूरोप से लोग आए, उनका गोरा रंग यहाँ से मेल खाता था अतः वे सब स्वाभाविक अमेरिकी बन गए। यहाँ एशिया से भी लोग आए, लेकिन उनकी कद-काठी गोरे लोगों से नहीं मिलती थी तो वे आज भी एशिया मूल के ही कहलाते हैं। भारतीय भी यहाँ आकर बरसों से रह रहे हैं लेकिन अपने रंग के कारण कभी अमेरिकी नहीं कहला सकते, चाहे वे कितनी ही यहाँ की नागरिकता ले लें। लेकिन फिर भी एक होड़ मची है कि कौन यहाँ का नागरिक बन जाए। भारत से तीन गुणा जमीन और जनसंख्या केवल 30 करोड़, तो जमीन तो बहुत है न! फिर जो असली दावेदार है वे तो कुछ बोलते नहीं, बस जो यूरोप से आकर बसे हैं उनके चिल्लाने से क्या असर होगा? जब तुम यहाँ रह सकते हो तो हम क्यों नहीं? अभी यहाँ एशियायी 25 प्रतिशत हैं, भविष्य तो दिख ही रहा है। सारे ही बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय यहाँ है और उन सबमें एशियायी। भारत जिस प्रकार से तरक्की कर रहा है उससे लगता है कि या तो भारतीय सारे वापस चले जाएँगे या फिर वे सम्मान सहित अमेरिका में रहेंगे। उनकी आवश्यकता अमेरिका अनुभव करेगा।
अमेरिका एक पूर्ण विकसित देश कहलाता है, क्योंकि यहाँ व्यक्ति के लिए भौतिक संसाधनों की भरमार है। आम व्यक्ति के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की यहाँ कोई कमी नहीं है। पानी यहाँ भरपूर है। किसी भी देश के पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए तीस प्रतिशत जंगल होने अनिवार्य हैं और इस अनिवार्यता को यह महाद्वीप पूर्ण करता है। यहाँ इतने गहरे और बड़े जंगल सुरक्षित देखकर आश्चर्य होता है। यहाँ के सारे मकान लकड़ी से बनते हैं, लेकिन जंगल नहीं कटते। लकड़ी आती है अविकसित या विकासशील देशों से। प्रकृति यहाँ पूर्ण रूप से अटखेलियाँ करती है। एक तरफ विशाल पहाड़ों की दीवार से आरक्षित समुद्र, तो दूसरी तरफ सफेद बालू पर बल खाता, सफेद झाग उड़ाता, नीला समुद्र।
केलिफोर्निया में समुद्र के मुहाने पर एक गहरा जंगल है रेड-वुड फोरेस्ट। मीलों तक पसरा यह जंगल, दो हजार वर्ष पुराने पेड़ों का संरक्षक बना हुआ है। पेड़ के तने की चौड़ाई चार आदमियों के हाथ फैलाने से भी पकड़ में नहीं आए और लम्बाई तो 300 फीट से भी अधिक। कई पेड़ नीचे से खोल मात्र रह गये हैं लेकिन ऊपर से पुनः हरे हो गए हैं। भारत के जंगल और यहाँ के जंगलों में रात-दिन का अंतर है। भारत में जंगलों में कई प्रकार के पेड़ मिलते हैं, लेकिन यहाँ केवल रेडवुड। पशु और पक्षी भी आमतौर पर यहाँ नजर नहीं आते। शाम पड़ी तो सोचा की अपनी तरह ही पक्षियों का कलरव सुनने को मिलेगा, लेकिन नहीं, शाम को भी यहाँ शान्ति ही थी। फिर पेड़ों को देखा, देखा वहाँ फल नहीं थे, जब फल ही नहीं है तब पक्षी क्या करेंगे, यहाँ आकर?
शहर में भी ऐसे पेड़ नहीं हैं जहाँ पक्षी अपना बसेरा कर सके। बस कभी-कभी कबूतर दिखायी दे जाते हैं। दूसरे जानवरों का देखना तो दुर्लभ ही है। गाय और कुत्ते को रोटी देना तो यहाँ चाँद-सितारे तोड़ने के समान है। ताजा दूध के लिए मन मसोस कर रह गए और केन बन्द पुराने दूध को पीने के लिए मन को तैयार नहीं कर पाए। लेकिन फिर सेनफ्रांसिस्को के पास के समुद्री क्षेत्र जाते समय देखा कि दूर-दूर तक वीराना छाया हुआ है। दूर से देखा तो घास के इन वीरान पहाड़ों पर कुछ काले धब्बे चलते से दिखायी दिए। कार जैसे ही पास गयी और मुँह से खुशी की आह निकल गयी, अरे ये तो गायें हैं। फिर तो वहाँ बस गायें ही गायें थी। सोचा उनके फार्म हाउस में जाकर ताजे दूध की माँग कर ली जाए। मन ताजा दूध के स्वाद की कल्पना में खो गया, लगा कोई कहेगा कि बैठो और चाहे जितना दूध पीओ। लेकिन हमें निराशा ही हाथ लगी, ताजा दूध का रिवाज नहीं है तो नहीं है। एक बात और आश्चर्य में डालती है कि गाय शाकाहारी पशु है, लेकिन वे लोग पता नहीं क्यों गाय को मांसाहारी बनाने में जुट गए हैं? यूरोप में ‘मेड-काउ’ रोग हुआ था और हजारों गायों को मौत के घाट उतारा गया था। फिर भी क्यों नहीं समझ आ रहा है कि मनुष्य के अलावा शेष पशु-पक्षी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप ही जीवन जीते हैं। यदि वे मांसाहारी हैं तो मांसाहारी हैं और यदि वे शाकाहारी हैं तो शाकाहारी। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो सभी कुछ उदरस्थ कर लेता है।
पहली बार वहीं पहाड़ों में हिरण भी दिखायी दिए, लगा कि जंगल जीवन्त हो उठा है। अमेरिका में प्रकृति को न केवल सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है अपितु उसे दर्शनीय बनाने का भरपूर प्रयास भी किया है। समुद्र के हर कोने की सुन्दरता को विभिन्न कोणों से दिखाने का एक सफल प्रयोग है यहाँ।
रुको बाहर कोई आ गया है, अरे यह तो प्लम्बर है। कल से नल टपक रहा था। एक सवा छः फीट का आदमी अपना पूरा किट लिए आया और चुपचाप अपना काम करने लगा। हमारे यहाँ पाँच या सवा पाँच फीट का आदमी आता है और न जाने कितनी बाते करते हुए नल का टपकना बन्द करता है। घर की मालकिन चाय बना देती है। जब तक वह काम करता है, चाय तैयार हो जाती है। फिर वह सारे जगत की बातचीत के बीच चाय पीकर ही जाता है। लेकिन यहाँ सर्वत्र मौन है। कभी-कभी लगता है कि अमेरिका में सबकुछ है लेकिन सुख और दुख बाँटने वाला कोई नहीं। बतियाने वाला कोई नहीं। रास्ते चलते देखकर सब मुस्कान फेंक देंगे लेकिन बाते किससे करें, मन खोजता ही रहता है। जैसे आकाश में चिड़ियों का शोर नहीं, वैसे ही धरती पर मनुष्यों की आवाज नहीं। बस हैं तो कारों का काफिला, जो दौड़ रहा है बस दौड़ रहा है। अष्ट भुजाओं वाली काली-काली सड़कें, उनपर बने रावण के दस सिरों जैसे फ्‍लाई-ओवर और उन पर तेज रफ्‍तार से दौड़ती हुईं भांति-भांति की कारें। एक कार पास से निकली, अरे यह क्या? इसमें तो ड्राइवर ही नहीं! दिमाग ने झटका खाया, नहीं यहाँ लेट-हेण्ड ड्राइव है, ओह ड्राइवर तो दूसरी तरफ है।
लेकिन मैं बात समुद्र की कर रही थी। हमारी कार समुद्र किनारे घुमावदार सड़क पर सरपट दौड़ रही थी। जरा सा चूके नहीं कि कार पानी में। बार-बार डर के मारे पूछते ही रहे कि बेटा अब कितना रास्ता और है? वीराना क्षेत्र आने लगा, नंगे पहाड़, बस उनपर सूखी घास। केवल यहाँ गाय और घोड़ों के तबेले ही हैं। पूरा क्षेत्र सुरक्षित रख छोड़ा है। रास्ते में समुद्र की सुन्दरता निहारने का मन हो जाए तो रुकिए, रास्ते में विस्टा-पोइन्ट बने हुए हैं, यहाँ ही अपनी गाड़ी रोकिए और देखिए समुद्र को उफनते हुए, लहराते हुए, इठलाते हुए। हम अपनी मंजिल पर जल्दी से जल्दी पहुँचना चाहते थे, हवाएं तेज बहने लगी थीं और ठण्ड भी अपनी तासीर दिखाने को बेताब थी।
सेनफ्रांसिस्को में गोल्डन ब्रिज है। समुद्र के ऊपर बना हुआ। उसका नाम गोल्डन क्यूँ है, यह पता नहीं चला। क्योंकि न तो उसका रंग गोल्डन है और न ही वह गोल्ड से बना है। हो सकता है कि अमेरिका के गोल्ड युग की शुरुआत उसके निर्माण के साथ ही हुई हो। वैसे भी अमेरिका की प्रगति 1936 के बाद की ही वहाँ नजर आती है। जहाँ भी गए लगभग 1936 का निर्माण ही दिखायी दिया। खैर हम गोल्डन ब्रिज की बात कर रहे थे। वहाँ से समुद्र को निहारना ऐसा लगता है जैसे आप मसूरी की ठण्ड में बर्फीली पहाड़ियों के स्थान पर, ठहाका मारते हुए समुद्र को देखें। कभी कल्पना नहीं की थी कि समुद्र किनारे भी इतनी ठण्ड होगी? लेकिन यहाँ तो लग रहा था कि शीघ्रता नहीं की तो कुल्फी जम जाएगी। एक तरफ समुद्र था तो दूसरी तरफ पहाड़। आकाश से बादल आ-आकर पहाड़ों से टकरा रहे थे। कभी गोल्डन ब्रिज के दरवाजे की ऊँचाई एक मंजिला हो जाती और जैसे ही बादलों से लुका-छिपी खेलता हुआ सूरज हमें ‘....ता’ कह देता तो हमें दिखाई देता कि अरे यह ब्रिज तो बहुत ऊँचा है। सिर को पीछे करो, और करो, जितना कर सकते हो करो, तब आप उसकी ऊँचाई नाप सकेंगे। अरे मैं फिर कहाँ भटक रही हूँ, मैं तो समुद्र के उस दूसरे किनारे पर जाने के लिए निकली हूँ जहाँ से चालीस मील की दूरी पर चल रहे जहाज अपनी मंजिल को पा लेते हैं। समझ गए न, मैं लाइट हाउस की ही बात कर रही हूँ। मैं समुद्र किनारे, रास्ता दिखाते, आकाशदीपों को सर उठाकर खड़ा होते हुए देखती रही हूँ, लेकिन यह भी दर्शनीय महत्व का हो सकता है, इस पर कभी विचार नहीं किया था। लाइट हाउस की केयर टेकर ने जल्दी से कहा कि ‘गो सून, इट इज गोइंग टू बी क्लोज’। नीचे देखा, अरे बाप रे तीन सौ सीढ़ियों को पार करके नीचे जाना था, खैर उतर तो जाएँगे लेकिन क्या ये जंग खाए घुटने वापस चढ़ पाएँगे? चलो जो होगा देखा जाएगा। आकाशदीप हमें पुकार रहा था, हमेशा दूर से ही इसे देखा है, आज पास से देखने का मौका मिला है तो फिर घुटने को तो भूलना ही पड़ेगा। एक सुंदर सी गाइड दिखा रही थी पुराने लाइट-हाउस की नयी, साफ-सुथरी मशीन को। अब तो इलेक्ट्रोनिक का जमाना आ गया तो पास ही दूसरी लाइट लगा दी गयी थी और इसे पुराने वैज्ञानिकों को याद करने के लिए छोड़ दिया गया था। चालीस मील दूर से जहाज इन लाइटों को देख पाते हैं और शहर आ रहा है, इस बात की खुशी मना सकते हैं।
पहाड़ों पर कहीं-कहीं केसरिया रंग बिखरा हुआ था, अरे यहाँ हनुमानजी कहाँ से आ गये? नजदीक गए, हाथ लगाकर देखा, अरे ये तो एल्गी है। हमारे यहाँ हरे रंग की होती है और यहाँ केसरिया है। यहाँ समुद्र के पानी को हाथ लगाने की मनाही है, लगाएँगे भी तो कैसे? एक तरफ तो पहाड़ है, वहाँ से आप उतर नहीं सकते, और दूसरी तरफ मीलों तक फैली छोटी लेकिन वीरान पहाड़ियां। समुद्री किनारा भी है और यह किनारा तकरीबन तेरह मील लम्बा है। ऊपर से समुद्र का और न ही उसके किनारे का कोई छोर दिखाई दे रहा था। बस दिख रहा था तो सफेद बालू रेत पर सुनसान तट पर आँचल लहलहाता समुद्र। आँचल भी कैसा? सम्पूर्ण विस्तार नीले रंग का और जब आँचल लहराए तो सफेदी जगमगा उठे। दूर-दूर तक कोई जानवर नहीं। हमारी आँखे तलाश रही थी, पहाड़ पर छिपे किसी जंगल के जानवर को। तभी आँखों ने जंगल की जीवन्तता को पा ही लिया, एक नहीं पूरे पाँच हिरण वहाँ बड़े ही धैर्य से घास खा रहे थे। इन हिरणों में चौकन्नापन नहीं था, यहाँ शेर नहीं थे।
पहाड़ के दूसरी तरफ समुद्र की खाड़ी थी। यहाँ समुद्री पक्षी आकाश से सीधे ही समुद्र में छलांग लगाते और अपनी चोंच को समुद्र में पूरा डुबोकर अपना नन्हा सा शिकार खोज ही लेते। अपनी काली मूछे निकाले उदबिलाव भी उचकते हुए दिखायी दे गए। गोल्डन ब्रिज के समुद्र किनारे हजारों की तादाद में समुद्री पक्षी थे। उनका शोर शाम को, खामोश समुद्र को भी मदमस्त करने पर मजबूर कर रहा था। वे सब उड़ रहे थे, एक साथ हजारों। समुद्र खुश हो रहा था, अपनी बाहें फैलाकर आगे बढ़ रहा था, चाँद पूर्ण यौवन के साथ उन्हें देख रहा था। पक्षी समुद्र के अँग-अँग को प्रफुल्लित कर रहे थे, उसके विशाल सीने पर अठखेलियाँ करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। कभी इस छोर पर और कभी उस छोर पर, पक्षियों का कलरव गूँज रहा था। समुद्र खुशी से उछलता और अपने साथ ले आता समुद्री वनस्पतियाँ। भारत के समुद्री किनारों पर शंख मिलेंगे, सीप मिलेंगी लेकिन यहाँ टूट कर आयीं कुछ बेले ही मिलेंगी। हो सकता है किसी दूसरे किनारे पर शंख भी हों, सीपियाँ भी हों?
ठण्डी हवाएँ तन को लग रही थीं और मन कहीं चाय और पकौड़े वाले को ढूँढ रहा था। यहाँ कहाँ पकौड़े? किनारे पर खूब लम्बी वुड-वाक है, यहाँ खाने-पीने को बहुत कुछ है, लेकिन अपने पकौड़े नहीं। रेत पर टहलिए, पाँवों में मिट्टी लेकर घर बनाइए लेकिन चना-जोर-गर्म की आवाज लगाकर कोई लड़का आपको कुछ खाने पर मजबूर नहीं करेगा। रेत पर खोमचे वाले भी नहीं हैं, तो गंदगी भी नहीं है। लेकिन फिर भी जिधर देखो उधर डस्टबीन ही डस्टबीन रखे हैं। आदमी फेंकना चाहे तो भी न फेंक सके। कभी यहाँ आकर मन होता है कि मूँगफली खायी जाए और उनको छीलकर, फूँक मार कर छिलको को उड़ाया जाए। लेकिन सारे सुख कहाँ परायी धरती पर? एक दिन ऐसी ही एक यात्रा पर निकले थे, देखा रास्ते में फल-सब्जी की दुकान सजी है। हम भी कार को उधर ही मोड़ ले गए। चेरी, स्ट्राबेरी से लेकर कितने ही जाने-अनजाने फल और सब्जियाँ यहाँ थे। यहाँ कुछ पसन्द आया हो या नहीं लेकिन यहाँ की चेरियाँ लाजवाब हैं। ढेर सारी खरीदी गयी और घूमते-घूमते वहीं खाना शुरू किया गया। खाने के बाद पहली बार गुठली को हवा में मुँह से फेंकते हुए जो मन को आनन्द आया वह अनूठा था। लगा जैसे आज जंजीरे टूट गयी हों। समुद्र किनारे पहाड़ पर चढ़कर केला खाओ और केले के छिलके को हवा में नहीं उछालो तो फिर केले खाने का मजा ही क्या? लेकिन यहाँ तो डर इतना हावी है कि सुख लेने ही नहीं देता।
घुमावदार पहाड़ी रास्ता, अपने यहाँ लिखा मिलेगा ‘हार्न बजाएं’ और यहाँ हार्न बजाना तो जैसे रात को मंदिर में घण्टी बजाना। सभी को अपनी लेन में चलना है, ओवर-टेंकिग नहीं। सड़क पर पीली लाइन खींच दी गयी है, यदि दो लाइने हैं तो आप ओवर-टेंकिग नहीं कर सकते। हाँ डोटेड पीली लाइन है तब आप ओवर-टेंकिग कर सकते हैं। सड़क किनारे साइनबोर्ड लगे हैं स्पीड के लिए, कहीं तीस, कहीं पचास तो कहीं पेसठ। ज्यादा बढ़ाई नहीं कि कैमरे ने आपको पकड़ लिया और चालान की टिकट मिल गयी। न मंत्री पुत्र और न ही अफसर पुत्र। चढ़ाई वाले रास्ते पर जा रहे थे, तीस की स्पीड निर्धारित थी। आगे गाड़ियां उसी रफ्‍तार से चल रही थीं, हमें थोड़ी जल्दी थी, वैसे भी भारतीयों को जल्दी ही रहती है, उन्हें पता नहीं कहाँ जल्दी जाना होता है? यहाँ किसी को कोई जल्दी नहीं होती। चुपचाप लाइन में खड़े रहते हैं और काउण्टर वाला धीरे-धीरे, खरामा-खरामा काम करता रहता है। खैर हम जल्दी में थे और शायद हमें गाड़ियों के पीछे चलना सुहा नहीं रहा था। अरे होर्न दो न, लेकिन होर्न बजाना तो यहाँ वार-त्यौहार ही होता है, फिर? देखा आगे वाली गाड़ी, जगह देखकर किनारे हो गयी और हम शान से आगे निकल गए। यही है यहाँ आगे निकलने का तरीका। लेकिन यह तरीका केवल गाड़ियों के लिए ही है, आप वैसे आगे निकल कर दिखाएँ तब जाने।
हम सोचते थे कि हमारे पुरातन भारत में ही टेटू या गोदने का रिवाज है। हम कैसे उन्हें गँवार कहकर मजाक उड़ाते रहे हैं। कभी भी कोई गाँव से आता और उसके हाथों में या शरीर में गोदने का चिह्न देखते, उसे हिकारत की नजर से हम देखते आए हैं। लेकिन यहाँ देखा कि एक मोटी सी औरत कुछ छोटा सा पहने हुए घूम रही है। यहाँ छोटे की तो परवाह भी किसे है? लेकिन उसकी पीठ रंग-बिरंगी हो रखी थी। देखा अरे यह तो गोदना है। पूरी पीठ पर चित्रकारी करायी हुई थी। अब उसे दिखाना है तो फिर ठण्ड में भी छोटे कपड़े तो पहनने ही पड़ेंगे न! महिलाएँ ही नहीं पुरुष भी पूरी पीठ पर या शरीर पर गोदना करवाते हैं। मैं सोच रही थी कि सारे शरीर पर गोदने के लिए तो एनस्थिसीया का प्रयोग करते होंगे, लेकिन नहीं जी, फैशन के लिए इंसान सब बर्दाश्त करता है।
अमेरिका में विभिन्न देशों के लोग रहते हैं और सभी एक ही रंग में रंगे दिखायी देते हैं। कपड़े खरीदने के लिए एक मॉल में गए, यहाँ अपने जैसे कपड़ों का बाजार नहीं है। बस सिले-सिलाए कपड़े मिलते हैं। एक बार राजस्थान में अकाल पड़ा, जनजाति क्षेत्र में न तो खाने को और न ही पहनने को। भारत के महानगरों के सेठों ने ट्रक भरकर कपड़े भेज दिए। कुछ कपड़े नये और कुछ पुराने। लेकिन सभी गांठों में बँधे थे, इस कारण मुसे हुए थे। जब हमने इन्हें बाँटने के लिए निकाला तो मन किया कि सभी को प्रेस कराकर देने चाहिए। लेकिन वह सम्भव नहीं था, प्रेस कराने के ही हजारों रूपये लग जाते। लेकिन यहाँ मॉल में देखा कि बदरंगे, मुसे-तुसे, फटे हुए कपड़े, बड़े ही मँहगे दामों में मिल रहे थे। बेटे से पूछा कि कबाड़ी की दुकान है क्या? लेकिन उसने हँसकर कहा कि यही फैशन है। फिर यही फैशन हो भी क्यों नहीं, सारे ही कपड़े मशीन में धुलते हैं और प्रेस का किसी के पास समय नहीं तो एक धुलाई के बाद तो ऐसे ही पहनने हैं फिर नये ऐसे ही क्यों न खरीदे जाएं? कहाँ भारत के चटक रंग और कहाँ यहाँ के फीके रंग? राजस्थान तो देश ही रंगों का है। कितने चटकीले रंग हैं हमारे यहाँ? सात रंगों की चूंदड़ तो हमारी शान है। शादी में दुल्हन को इसीलिए चूंदड़ उढ़ाई जाती है कि उसमें विभिन्न रंग हैं और उसका चटकीला लाल रंग तो आपसी आकर्षण का प्रतीक। बच्चों के कपड़े भी सारे ही बदरंग। लगता जैसे पुराने हों, लेकिन पास जाने पर पता लगता कि नहीं ये तो नए ही हैं। हमारे यहाँ इतने रंग होते हैं कि कपड़ा हमेशा नया सा ही दिखता है लेकिन वहाँ इतने फीके रंग होते हैं कि नया भी पुराना सा ही दिखता है। इसलिए ही रोज नया खरीदने का मन करता है। शायद यह भी बिक्री का एक और फण्डा हो?
जब कोलम्बस यहाँ आया था तब उसने अमेरिका को ही इण्डिया समझ लिया था और इसी कारण उसने यहाँ के लोगों का नाम दिया था, रेड-इण्डियन। अब यहाँ से रेड शब्द हटता जा रहा है और सब जगह इण्डियन ही लिखा मिलता है। हम पहले तो खुश हुए कि अरे इण्डियन फूड यहाँ है फिर पता लगा कि ये सब रेड-इण्डियन्स के लिए लिखा है। हम जैसे नए लोगों के लिए अन्तर समझना कठिन हो जाता है। लेकिन भारत से आए लोगों ने यहाँ भारतीयों के खाने का पूरा इंतजाम कर रखा है। सभी कुछ उपलब्ध है, बस स्वाद में अन्तर है। यहाँ संकर प्रजाति बनाने का बड़ा शौक है तो सेव कई प्रकार के, आडू कई प्रकार के और दोनों को मिलाकर अलग से कई प्रकार के फल। तुरई एक-एक हाथ से भी अधिक लम्बी, शिमला मिर्च इतनी बड़ी की भरवा बनाने का उत्साह ही समाप्त हो जाए। किसी को बैंगन के भुर्ते का शौक हो तो अकेला एक बैंगन का भुर्ता नहीं खा सकता। एक ही बैंगन आधे किलो से अधिक का। प्याज इतने बड़े और मीठे, लगता है प्याज खा रहे है या फिर ककड़ी। लहसुन भी इतना मोटा कि एक ही गुली पर्याप्त है सब्जी के लिए। लेकिन जहाँ कुछ फलों में स्वाद की विचित्रता है वहीं कुछ फल निहायत ही स्वादिष्ट हैं। चेरी और स्ट्राबेरी की साइज भी बड़ी और स्वाद भी लाजवाब। आम भी अब बड़ी तादाद में आने लगा है, लेकिन मेक्सिको में भी आम होता है तो वहाँ से भी आम और केरी दोनों ही आती हैं। एक केरी आधा किलो से अधिक।
हमें बड़े-बड़े बाजार देखने की आदत है, लेकिन यहाँ बड़े-बड़े मॉल मिलेंगे। भारत में शाम को लोग बाजारों में घूमते हैं और यहाँ मॉल में। बाजार में ठेले वाले मिलते हैं और यहाँ मॉल में रेस्ट्रा। यहाँ रात को दस बजे बाद जन-जीवन थम जाता है, जबकि भारत में दस बजे बाद शुरू होता है। अमेरिकन्स तो रात आठ बजे ही घर को बन्द कर लेते हैं। उनके रेस्ट्रा भी शाम का खाना रात आठ बजे तक ही परोसते हैं। रात आठ बजे बाद किसी को भी फोन करना तहजीब नहीं है, मिलने जाना तो बहुत दूर की बात है। हमारे यहाँ रात को ग्यारह बजे भी घर की घण्टी बज सकती है। आपका कोई मित्र बाहर खड़ा हँसी बिखेर रहा होगा।
अरे यार इतनी जल्दी सो गए क्या? मैं तो इधर से निकला था, सोचा तुम्हारे साथ कॉफी पीता चलूँ।
बेचारा मेजबान मित्र सोने की तैयारी में हैं, लेकिन हँसकर स्वागत करता है। बोलेगा कि यार आ ना, बड़े दिन बाद तो आया है। चल आ, बाते करेंगे। फिर पत्नी को आवाज लगती है - अरे भागवान सो गयी क्या? देखो तो कौन आया है?
पत्नी भी गाउन सम्भालते हुए सकुचाते हुए आती है। अरे भाईसाहब आप? चलिए आप बैठिए मैं आपके लिए कॉफी बनाकर लाती हूँ। बस फिर शुरू हो जाती है दो दोस्तों की गपशप।
भारतीय तो वहाँ भी ऐसा ही करते है। लेकिन बहुत ही कम। क्या पता आपकी तेज आवाज से पड़ौस में डिस्टर्ब हो जाए और वे पुलिस को फोन कर दे?
यहाँ बेचारी महिलाएं साड़ी पहने रात ग्यारह बजे तक भी अपने शरीर को कसा हुआ रखती हैं। क्या पता कौन कब टपक जाए? लेकिन वहाँ जिसे आना है पूर्व सूचना के साथ, वो भी रात आठ बजे तक। फिर आप स्वतंत्र हैं चाहे तो बरमूडा पहने या गाउन।

डॉ. अजित गुप्ता

Saturday, February 28, 2009

सोने का पिंजर (6)

अमेरिका का नाश्ता और भारत की बूढी काकी

छठा अध्याय

हमने जब अमेरिका की धरती पर पैर रखा तो एक लम्बी लाईन इमीग्रेशन चेक की थी। यही लाईन भारत में होती तो हम उसे अव्यवस्था का नाम देते। काउण्टर बीस, लेकिन ओपेन दस भी नहीं। सभी मटरगश्ती कर रहे हैं, लेकिन किसी को भी यह चिन्ता नहीं कि बाइस घण्टे की यात्रा करने के बाद अविकसित देश का व्यक्ति विकसित देश में आया है तो उसे शीघ्र समाधान मिल जाए। ऊँचे पदों पर आसीन, बड़े-बूढ़े भी दो घण्टे विकसित देश की सुस्ती देखकर धन्य हुए जा रहे थे। बोलने की हिम्मत किसी में नहीं, कहीं ऐसा नहीं हो कि यहीं से वापस टिकट कटा दी जाए। विकसित देश इसी स्पीड से काम करते हैं। खैर दो घण्टे बाद हमारा भी नम्बर आया, अब घावों पर तहज़ीब का मरहम लगाया गया और यह बताया गया कि देखों हम कितने प्यार से बात करते हैं। ‘हाउ आर यू?’ एक मधुर सी मुस्कान उछाली गयी, हमने भी सोचा कि चलो दो घण्टे बाद ही सही खिड़की में कोई आकर बैठा तो सही और उसने शराफत से बात तो की। लेकिन फिर अधूरी कागज़ी कार्यवाही।
बाहर कस्टम वाले ने रोक लिया, अरे इसमें तारीख की छाप तो लगी ही नहीं! अब वापस वहीं, लेकिन जब तक तो वह अफसर जा चुके थे।
कहीं भला आधा घण्टे से अधिक विकसित देश वाले काम करते हैं क्या? अब कौन हमारी समस्या सुलझाए?
बस एक ही उत्तर ‘गो योर विन्डो’, अरे कहाँ से लाऊँ अपनी विन्डो?
आखिर एक काली अफसर दिखाई दी, सोचा कि एक काला आदमी दूसरे काले से ही मदद माँग सकता है, मैंने बड़ी आशा से उससे कहा कि ‘आई नीड योर हेल्प’।
उसने गोरे अधिकारी से कहा कि इनकी एंट्री देखो। मेरा और मेरे पति का नाम वहाँ था। अब स्टांप लगा दो, पर बन्दे ने नहीं माना। स्पष्ट मना कर दिया कि नो। आखिर वही महिला अधिकारी अपनी विन्डो पर गयी और उसने स्टांप लगाकर दी। कहते हैं कि काले बड़े खतरनाक हैं, इनसे बचकर रहो। साथ ही कहते हैं कि भारतीय भी खतरनाक हैं इनसे बचकर रहो। यह है बदनामी का प्रचार।
अभी हमें बहुत कुछ देखना था, होटल गए, पहले से ही सारा पैसा भेज दिया गया था, फिर भी लाइन में लगाकर वही घण्टों का इन्तजार। दो दिन हो गए थे सफर में, न्यूयार्क के एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही सोच रहे थे कि जाते ही होटल के अपने कमरे के बिस्तर पर पड़ जाएँगे। खाने की भी इच्छा नहीं थी, तो मन ने कहा कि अरे बेचारे आयोजकों ने हमारे लिए खाने का इंतजाम किया होगा, वे मनुहार करेंगे तब कैसे कमरे में बंद रहेंगे? न्यूयार्क की धरती पर पहुँचते ही बेटे को फोन करना था, हमें लेने आए आयोजक के पास फोन था। हमने उनसे लिया और बेटे को सूचना दे दी कि हम आ गए हैं, शेष बाते होटल पहुँचकर। लेकिन हमें क्या पता था कि पहले ग्रास में ही मक्षिकापात हो जाएगा? हमें कहा गया कि होटल के कमरे के लिए लाइन में लगें। हमारे साथी दूसरी उड़ान से हमसे पहले पहुँच गए थे और उनको कमरे मिल गए थे। हमने सोचा था कि उन्होंने हमारे कमरे की चाबी भी ले ली होगी। लेकिन यही हम गच्चा खा गए। हमारे यहाँ होटल में जाने का मतलब है साहब बनना। जाते ही कमरा मिलेगा और आपका सामान कमरे में पहुँच जाएगा। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। आपने पहले बुकिंग कराई है तो क्या, आप किसी कार्यक्रम में आएं हैं तो क्या, आप किसी के मेहमान हैं तो क्या? आपको लाइन में लगकर एक फार्म भरना पड़ेगा, तब कहीं जाकर चाबी मिलेगी।
यहाँ भी वही खरामा-खरामा काम करने की आदत, रात के बारह बज गए और लाइन न शुरू हो और न ही खत्म। किसी अपने से कहो कि भई यह क्या बात है? तो वह कहेगा कि यहाँ ऐसे ही काम होता है। मेरे मन में आया कि कहने वाले भारतीय को झिंझोड़कर पूछू कि यहाँ ऐसे ही काम होता है तो फिर भारत को गाली क्यों देता है? भारत में तो होटल के कमरे के लिए कभी लाइन नहीं लगानी पड़ी। सौ करोड़ की जनता को भी इतने घण्टों तक तो कोई इंतजार नहीं कराता। लेकिन फिर भी यह उनकी खुबसूरत अदा है। हम सम्मानित होने वाले साहित्यकारों में थे, फिर भी असम्मान के साथ लाइन में लगे थे। राजस्थान के प्रतिनिधि दल ने भी हमारा कमरा आरक्षित कराया था, लेकिन सब बेकार।
हम एक लाईन में लगे, लाईन थोड़ी लम्बी थी, दूसरा काउण्टर खाली था। हमारे साथ लगा एक गोरा व्यक्ति दूसरे काउण्टर पर चला गया, उसका काम हो गया। हम भी उसके पीछे-पीछे चले गए, बस त्यौरियां चढ़ गयी, ‘गो योर लेन’। हमारे साथियों ने कहा कि आप कब तक लाईन में खड़ी रहेंगी, हम ऐसा करते हैं कि एक कमरा आपके लिए खाली कर देते हैं, आप वहाँ आ जाएं। क्योंकि अभी रजिस्ट्रेशन का बिल्ला भी लेना था। हमारी लाईन में विदेश विभाग के अधिकारी भी खड़े थे, मैंने उनसे कहा कि बारह बज रहे हैं अब मैं और नहीं खड़ी रह सकती। पानी की प्यास के मारे गला सूख रहा है और मैं लाईन छोड़ कर चले गयी।
सामान अपने साथी के कमरे में पहुँचाया और आठवीं मंजिल पर रजिस्ट्रेशन के लिए जा पहुँचे। अभी तक हमने किसी भी आयोजक को नहीं देखा था, सिवाय एयरपोर्ट के। खाने की कल्पना तो उड़न-छू हो चुकी थी। भारत में हम कैसे मेहमानों के लिए बिछे जाते हैं? यदि मेहमान विदेशी हो तो फिर हम उसके स्वागत में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। लेकिन यहाँ तो कुछ भी नहीं! रजिस्ट्रेशन वाले कमरे में चार भारतीय प्रवासी अपनी सेवाएं दे रहे थे। रजिस्ट्रेशन का फार्म पहले ही भरा जा चुका था, पैसे भी दिए जा चुके थे, बस अब तो किट लेना था। लेकिन वह देसी बंदा हिलने को ही तैयार नहीं हो। वह निश्चल बैठा था, उससे एक ने कहा कि भाईसाहब किट दीजिए। वह उसकी तरफ पोज मारकर देखने लगा। पंद्रह मिनट का पोज! हम सबने निर्णय किया कि कुछ मत बोलो, बोलते ही यह पोज में चला जाता है। आखिर आधा घण्टा हो गया, एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अपना कुर्ता उठाया और बोला कि ‘भाईसाहब मेरी कमर का आपरेशन हुआ है, यह देखिए, ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता।’
मैंने कहा कि भाईसाहब कम से कम पानी ही पिला दीजिए।
वह अपनी टेबल के नीचे से एक आधा लीटर की बोतल निकालकर बोला कि देखिए सुबह से इस बोतल के सहारे यहाँ बैठा हूँ। मैंने सोचा कि अरे पानी तो इसके पास ही नहीं है, मुझे क्या पिलाएगा?
फिर वह बोला कि आपको पता है कि दो साल पहले मैं मरते-मरते बचा था, पूरा शरीर पेरेलाइज हो गया था। आप कहते हैं कि मेरे कमर का ऑपरेशन हुआ है।
भगवान ने उसे पुण्य का मौका दिया था और उसे वह पाप में बदल रहा था। लेकिन फिर वह कुछ हिल ही गया और उसने बुजुर्गवार को किट पकड़ा ही दिया। हम सबने कहा कि आपको कठिनाई हो रही है तो आप हमें बताए हम सब आपका हाथ बँटा देंगे।
वह अहंकार के साथ बोला कि हमारे पास यू.एन. हेडक्वार्टस से आर्डर हैं कि सारा काम व्यवस्थित हो। हमें स्वयं ही देखना है।
उसका काम इतना भर था कि हमें मिलने वाले बिल्ले पर हमारा नाम और देश का नाम लिखना था और तैयार किट पकड़ाना था। इसपर भी एक व्यक्ति के साथ आधा घण्टे का समय समझ से परे था। खैर अभी तो हमें बहुत कुछ देखना था। शायद भगवान ने हमें वहाँ भेजा ही इसलिए था कि भारतीयों का हीनबोध मैं कम कर सकूँ। मुझे ही सारे प्रकरणों से भगवान ने गुजारा था।
मैं अभी आधे घण्टे से लाईन में सबसे आगे लगी हुई ही थी कि एक महिला दौड़ती हुई आयी। उसकी नाक पर एक नली लगी थी। वह मुझसे बोली कि मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ। मैं बहुत खुश हुई, पहली बार यहाँ यह शब्द सुना था। लेकिन वह मुझसे क्यों क्षमा माँग रही थी? मन ने प्रश्न किया।
वह बोली कि मेरे ऑक्सीजन लगी है, अतः आप मुझे पहले आगे आने दें।
मैंने कहा कि शौक से, आप आगे आएं, यदि ये काम कर दें तो मुझे खुशी होगी। अब मैंने उन्हें कहा कि भई इनको तो दे दो।
खैर जैसे-तैसे एक घण्टे में काम हो ही गया। मैंने अपने साथ वालों के लिए भी कहा, वो बोला कि उन्हें स्वयं ही आना होगा। अब इस आपा-धापी में भला किसकी हिम्मत होगी जो अपने साथ आए पति का भी प्रवेश-पत्र ले ले। हम इतना टूट चुके थे कि अपने कमरे में जाकर बेसुध से पड़ गए। यह ध्यान भी नहीं रहा कि बेटे को फोन भी करना है। कमरे में न तो पानी था, और न ही दिन के बाद से पेट में कुछ पड़ा था। लेकिन थकान ने उन सबकी ओर ध्यान ही नहीं जाने दिया। बेटे ने पहले ही बता दिया था कि खबरदार जो होटल के कमरे में रखी पानी की बोतल को पीया। वह बोतल तीन डॉलर की है। होटल में जाने से पूर्व बाहर पूरा केरेट खरीद लेना तो वह तीन डॉलर का मिल जाएगा। हमने देखा हमारे कमरे को। 200 डॉलर प्रतिदिन का कमरा। फ्रिज नहीं था, तो पानी का तो सवाल ही कहाँ उठता है। बाथरूम में जाइए और उसी नल से पानी पी लीजिए। लेकिन हम इतने टूटे हुए थे कि न तो पानी दिखायी दे रहा था और न खाना। बस सामने पलंग था और हम उसके आगोश में जाने को बेताब।
रात के तीन बजे फोन की घण्टी बज उठी, एक बारगी तो समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है, फिर पतिदेव ने फोन उठाया। फोन पर बेटा था, बोल रहा था कि आप लोग कहाँ हैं? मैं कब से परेशान हो रहा हूँ, आपका फोन ही नहीं आया। मैंने होटल के काउण्टर पर पूछा तो बोले कि यहाँ तो लोग छः घण्टों से लाइन में लगे हैं। मैंने फिर दोबार फोन किया तो कहा कि नहीं कोई लाइन नहीं हैं। लेकिन अजित गुप्ता के नाम का कोई कमरा बुक नहीं है। उसने भारत फोन करके कैसे भी एक नाम हमारे साथी का ढूँढा और उसी के नाम से कमरे के बारे में जानकारी चाही। पहले तो उसी नाम के दूसरे कमरे में फोन लग गया फिर किस्मत से उन्हीं के नाम के कमरे में हम थे। हमने कहा कि हम ठीक हैं, नींद में हैं, सुबह बात करेंगे।
सुबह हो गयी, अब तो नाश्ते की बारी थी। हमने सोचा कि हो सकता है कि आयोजक आज मेहमान-नवाजी करें। लेकिन यह क्या होटल में ही नाश्ता लगा था और उस अमेरिकन नाश्ते को खाते कैसे हैं, बताने वाला कोई नहीं था। हिन्दी सम्मेलन का उदघाटन युनाइटेड नेशन के कार्यालय पर होना था तो बस भी नीचे लग चुकी थी। हमने चाय पीना ही ठीक समझा। हमने जैसे ही चाय के पानी में दूध डाला, चाय एकदम ठण्डी-टीप। वहाँ दूध एकदम ठण्डा फ्रीज का ही होता है। खैर नाश्ते की बात बाद में करेंगे। अभी तो बस जाने को तैयार थी। हम बस में बैठने के लिए तैयार थे। लेकिन अब समस्या खड़ी हो गयी, हमारे पतिदेव की। उनके पास तो बिल्ला नहीं। वहाँ समस्या समाधान के लिए भी कोई नहीं। फिर यही उचित समझा गया कि वे वहीं होटल पर रहें, नहीं तो वहाँ कहाँ जाएँगे? अब उनका तो मूड खराब, क्या इसी के लिए यहाँ आए थे? लेकिन समय नहीं था, बस एकदम से तैयार खड़ी थी।
एक घण्टा वहाँ पर भी लाइन में खड़े रहे। मुझे लगता है कि हम भारतीयों को लाइन में कैसे खड़ा रहना है, इसकी आदत वहाँ पड़ जाती है। खैर कैसे-तैसे हम हॉल तक जा ही पहुँचे। कार्यक्रम भी शुरू हुआ और खत्म भी। पेट के चूहे कुलबुला रहे थे। सोचा था कि यहाँ तो कुछ नाश्ता वगैरह होगा। लेकिन कुछ नहीं। पास ही दुकान थी, खरीदो और खाओ। हमने भी चाय से ही काम चलाया। कार्यक्रम खत्म हुआ और वापस बस की इंतजार प्रारम्भ। दो बजे तक सड़क पर खड़े रहे लेकिन बस का कहीं दूर-दूर तक पता नहीं। वहाँ जसदेव सिंह जी भी खड़े थे, थोड़ा गुस्से में थे। बोल रहे थे कि मुझे कमेण्ट्री के लिए बुलाया था और यहाँ किसी और से करा ली।
अरे भाई, तुम तो अपने देश में करते ही रहते हो, यहाँ बेचारों को कभी-कभी तो अवसर मिलता है, करने दो। क्यों नाराज होते हो।
जब सब्र का बाँध टूटने लगा तो आयोजकों को फोन खड़काया गया और तब कहीं आकर बस आयी। लेकिन बस वो ही समय था जब हम लोगों से मिल पाए। बाकि तो कोई किसी कार्यक्रम में और कोई किसी में। तीन बजते-बजते हम खाने की टेबल पर थे।
जब न्यूयार्क आने की बात चली थी, तब बेटे ने कहा था कि अरे कितना अच्छा खाना खिलाते हैं भारतीय, मैं भी तीन दिन आपके साथ ही रह लूँगा। अच्छे खाने का अवसर मिल जाएगा। मन में खाने की कल्पना का भण्डार था। मन बूढ़ी काकी की तरह ही सोच रहा था। एक टेबल पर ढेर सारा सलाद होगा, क्योंकि यहाँ के भोजन में सलाद ही मुख्य होता है। एक टेबल पर फल भी होंगे। गरम-गरम रोटी होगी, ढेर सारी सब्जियाँ होंगी। लेकिन हमारा हाल भी बूढ़ी काकी जैसा ही हो गया था। हमारे ख्वाब बेकार ही गए। बहुत ही गया गुजरा खाना था। जिसे हम भारतीय तो नहीं खा सकते थे।
एक रोटी जैसी थी, हमने वो ही खाने का मन बनाया। लेकिन वह हमसे खायी नहीं गयी।
जब बेटा आया और हमने अपना दुखड़ा रोया तो बोला कि अरे वो तो पीटा थी, उसे ऐसे नहीं खाया जाता। उसे रोटी की जगह कैसे परोस दिया?
अब हमें क्या पता कि कैसे परोस दिया? सोच रहे होंगे कि इन फूहड़ भारतीयों को क्या पता अमेरिकन रोटी क्या होती है?
हमारे साथ की साहित्यकार बोली कि दीदी मुझे तो उल्टी आ रही है। मैं तो इसे नहीं खा सकती। फिर अपने ही मिठाई के डिब्बे खुले। हम घर से पराठें बनाकर लाए थे। रास्ते में लंदन में डस्टबीन में डाल दिए। यह सोचकर कि अब तो पहुँच ही रहे हैं, गर्म खाना ही खाएँगे, भला ठण्डे परांठे क्यों खाएँ? लेकिन अब वे ही याद आ रहे थे। एक वहाँ साबूदाने के पापड़ की लाल-नीली कतरने थीं जो तीन दिन तक नहीं बदली गयी। सलाद का तो नाम ही नहीं था। बस एक अच्छी चीज थी, वह था पानी। पानी की हजारों बोतले वहाँ थीं। सारे ही भारतीय उन बोतलों पर टूट पड़े, क्योंकि किसी ने भी पानी कहाँ पीया था? सभी के हाथ में दो बोतले थी, होटल के लिए।
बस से उतरते ही हमें हमारे पतिदेव की चिन्ता सताने लगी। वे बाहर ही मिल गए, बोले कि मैंने तो बाहर भारतीय होटल में खाना खाया है। मुझे उनकी हिम्मत पर शक हुआ। मेरी आँखे आश्चर्य से फटी जा रही थीं। वे भारत में ही अकेले जाकर ऐसा कार्य सम्पादित नहीं कर सकते थे तो यहाँ परदेस में वे और अकेले जाकर?
फिर वे बोले कि बेटे का फोन आ गया था, उसे बहुत चिन्ता हो रही थी। उसने मेरी एक मित्र के बेटे को फोन किया जो न्यूयार्क में ही था। उसने बताया कि तू जाकर पापा को खाना खिला दे, नहीं तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी।
ओह तो ऐसे मेनेज हुआ आपका खाना। अब मैं निश्चिंत थी। कम से कम उन्होंने तो ढंग का खाना खा ही लिया था। मेरे लिए यही सबसे बड़ा संतोष था कि पतिदेव का पेट भर गया है। नहीं तो पता नहीं न्यूयार्क में क्या होता?
होटल से आयोजन स्थल का मार्ग पैदल मार्ग था। हम उसी पर चलते रहे थे, रास्ते में एक फलों की दुकान दिखायी दे गयी। बस मुझे तो समझ आ गया कि यदि कल भी यही खाना मिला तो बिना डॉलर गिने मैं फलों से ही पेट भरूँगी। आप आश्चर्य मत करिए, अभी तो नाश्ते का वर्णन भी बाकी है।
हम जब बेटे के साथ केलिफोर्निया के एक होटल में रुके थे तब समझ आया था कि यहाँ सुबह का नाश्ता होटल के किराए में शामिल होता है। ढेर सारा नाश्ता होता है, आपको कुछ तो पसन्द आ ही जाता है। गर्म दलिया भी, आमलेट भी, फल भी, सूखे मेवे भी, और भी बहुत कुछ। लेकिन हमारा प्रथम अनुभव तो बड़ा कटु था। हमारे न्यूयार्क के होटल में भी नाश्ता सजा था। हमे तब तक यह भी नहीं मालूम था कि यह होटल वालों की तरफ से ही है। हम तो सोच रहे थे कि गर्म-गर्म आलू बड़े, जलेबी, आलू के पराठें, सेण्डविच आदि होंगे। लेकिन वहाँ तो गोल-गोल रिंग सी पड़ी थी। सब लोग पूछ रहे थे कि इसे कैसे खाते हैं? कोई उसे काट रहा था, और फिर जैम भर रहा था, कोई वैसे ही चाय में डुबोकर खाने की कोशिश कर रहा था।
बाद में बेटे ने बताया कि यह ‘बेगल’ है इसे ऑवन में गर्म करके खाया जाता है, कच्चा तो कोई खा ही नहीं सकता। कच्चा मतलब आटा खाना।
लेकिन बेटा वहाँ तो ऑवन था ही नहीं। हम तो सभी ऐसे ही लगे थे, खाने में। फिर वही लड्डू और मठरी निकाले गए।
हमारे साथ वरिष्ठ साहित्यकार थे, वे एक गोल रिंग को उठा लाए। मैंने उनसे पूछा कि क्या करेंगे? वे बोले कि भारत लेकर जाऊँगा। दिखाऊँगा इस नायाब चीज को।
मैंने कहा कि बदबू आने लगेगी।
वे बोले कि जूते में डालकर ले जाऊँगा। लेकिन ले जरूर जाऊँगा।
दूसरे दिन का खाना भी पहले दिन जैसा ही था। एकसा मीनू, कोई बदलाव नहीं। हमने तो फलों की दुकान पकड़ ली। तीसरे दिन बेटा आ गया था। पद्मजा जी बोली कि अरे तेरे देश में भूखे मर गए। वह बेचारा दही लेकर आया, फल लाया, बोला कि पता नहीं इन्होंने कैसा खाना दिया है?
तीन दिन तक गुलजार भी वहीं थे, वे भी खाने की टेबल पर दिख ही जाते थे। पता नहीं कैसे खा रहे थे, या फिर घर जाकर खाते थे?
लेकिन समस्याएं अभी खत्म नहीं हुई थी। दूसरे दिन पतिदेव को बिल्ले के अभाव में बाहर ही रोक लिया गया। अब तो हमारी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गयी। अब क्या करें? अच्छा सम्मान कराने आए। हम अब कुछ आयोजकों से मिले। उन्हें अपनी समस्या बतायी, यह भी कहा कि हम सम्मानित होने वाले हैं तो साथ में पति भी हैं और बेटा भी आने वाला है। लेकिन फिर उन्होंने हमें दो कार्ड बनाकर दे दिए। अब कहीं हम जाकर शेर बने। मजेदार बात तो यह रहती है कि गेट पर आयोजक नहीं होते अपितु सिक्योरिटी वाले होते हैं। लम्बे-चैड़े, अधिकतर काले।
हम अपने साथ जोधपुर के दूध के लड्डू लेकर गए थे, हम क्या हमने पद्मजा जी को बोल दिया था कि वे जोधपुर से साथ लेकर आएं। हमने समापन वाले दिन एक डिब्बा लिया और सारे ही आयोजकों को लड्डू खिलाए। वे लड्डू देखकर एकदम खुश हो गये। हमने मन ही मन कहा कि तुमने तो हमें कुछ नहीं खिलाया, लेकिन तुम्हारे लिए तो हम देश से लड्डू लेकर आए हैं। सच वहाँ जाने के बाद ही समझ आता है भारत और भारत का लाजवाब खाना। हमारे यहाँ आतिथ्य करना सौभाग्य की बात समझी जाती है लेकिन वहाँ इसका अर्थ ही लोग भूल गए हैं। आज भी हमारे यहाँ विदेश से किसी के आने पर हम पलक-पाँवड़े बिछाते हैं लेकिन कैसा रूखा तो आतिथ्य था उनका?

डॉ. अजित गुप्ता

Saturday, February 21, 2009

सोने का पिंजर (5)

नौ गज साड़ी लपेटने में क्यूँ करें वक्त बरबाद....

पाँचवा अध्याय

मैं भारत की धरती से हजारों मील दूर अमेरिका की उन्नत धरा पर आयी हुई हूँ। यहाँ लाखों भारतीय बसे हुए हैं, उनकी आँखों में कहीं न कहीं भारत का पानी छलकता दिखाई देता है। पूर्ण विकसित देश, मनुष्य के लिए सारे साधनों की भरमार, किसी भी गरीब देश के बाशिंदे को यहाँ आकर्षित कर खींच ही लाएगी। चारों तरफ मकानों की कतारें और धरती पर बिछी दूब, धूल और गुबार के लिए कहीं जगह नहीं। भारत में झाडू और फटका मारते हाथ यहाँ आकर महिने में एकाध बार वेक्यूम क्लीनर तक पहुँचते हैं। वहाँ हाथों की मेंहदी और चूड़ी, कपड़ों में साबुन लगाने में ही अपनी रंगत भूल जाती हैं, ऐसे में यहाँ तीन-चार दिन में एक बार, कपड़े धो-सुखाकर मशीन आपको दे देती है। खाने में भी इतनी खट-पट नहीं, सभी कुछ तो शोपिंग मॉल में उपलब्ध है। सारी बाते करते समय कपड़ों की बात भला कैसे भूल सकती हूँ, भारत में नौ गज साड़ी लपेटते-लपेटते और अपना तन ढकते हुए न जाने कितना समय बर्बाद हो जाता है, लेकिन यहाँ तन की इतनी चिन्ता नहीं है। ऐसा कुछ पहनो, जो आसान हो, कुछ भी ढकने का प्रयास मत करो, सभी का शरीर एक है। यदि आप की वसा जगह-जगह से लटक रही है तो क्या? दिखने दो, क्यों साड़ी की परतों में छिपाते हो? ऐसा जीवन, खुला जीवन, स्वच्छन्द जीवन, भला कौन नहीं चाहेगा? तो लाखों युवा अपनी टिकट कटाकर चले आते हैं, इस स्वर्ग जैसे देश में।
हमारा तन कुछ माँगता है और हमारा मन कुछ और। सारे साधनों को, सारे ऐश्वर्य को, हमारा मन दिखाना चाहता है, अपनों को, अपने देश में बसे अपने छूटे हुओं को। पराये देश में सबकुछ है लेकिन इतनी आजादी तो नहीं मिल सकती कि अपनों को भी यहाँ बसा लिया जाए। इस देश का ऐश्वर्य दिखाने की छूट है, यहाँ बसने की छूट नहीं। सारी चाहतों को समेटे, इस स्वर्ग जैसी धरती पर अपना आशियाना बसाने निकले लाखों युवा, मन की एक परत भारत में छोड़ आते हैं। हमारा तन भौतिक सुखों की ओर भागता है और मन अपनों के पास। हर भारतीय, धरती की सुगंध को यहाँ बसाने में जुट जाता है, लेकिन मिट्टी की खुशबू तो अपनी-अपनी ही होती है। जैसे ही बादलों का फेरा लगता है, कोई न कोई झोंका आ ही जाता है और बरसा जाता है अपना देश का पानी। सूखे हुए उपवन में कोई न कोई अंकुर फूट ही जाता है। तब फोन पर अँगुलियां मचल उठती है और दूर देश से दो बूढ़ी आवाजें सारे सुख को एकबारगी में ही नेस्नाबूत कर जाती है। बस यहीं तन और मन में संघर्ष होने लगता है। एक मन के अंदर का सच है जो रह-रहकर पीछे धकेलता है और एक तन का निर्मम सत्य, जो सुख के सारे साधनों के बीच सबकुछ भुला देने में लगा रहता है।
बड़ी-बड़ी कोठी बनाकर भी अपने देश के मकान का एक छोटा सा दरवाजा अपने ताले से देखने का मन करता है। अपना हिस्सा अपने देश में होना चाहिए। डोर नहीं टूटती, यही तो आस है। दुनिया बचपन में अपने आपको तलाशती है, यहाँ बसे भारतीय भी उस छोटे से ताले लगे दरवाजे पर अपनी मन की खट-खट सुनते रहते हैं। सपनों में ही सही, लेकिन हर रोज ही अपनी धरती होती है।
विश्व हिन्दी सम्मेलन में ढेरों अप्रवासी भारतीय भी थे, एक शाम अपना लिखा पद्यमय मन सुनाने का दिन था। उन सभी के स्वर में भारत बसा हुआ था, कोई नहीं कह रहा था कि देखो हम जीते जी स्वर्ग चले आए हैं, हम कितने भाग्यशाली हैं! देखो हमारा सुख तुम भी देखो। मैं तो अपना दुख वहाँ छोड़ आयी थी लेकिन यह क्या यहाँ तो प्रवासियों के मन का दुख मेरे दुख को खटखटाने लगा। क्यों हो गयी मन की ऐसी हालत? क्यों नहीं मन की तलाश स्वर्ग में भी पूरी होती? क्या तलाशना चाहता है आखिर मन? मुझे अनायास ही एक तोता याद आ गया। राजमहलों के सोने के पिंजर में बन्द। खाने को भरपूर। लेकिन तोता कैसे कहे कि यह पिंजरा मेरा है। उसे तो अपना जंगल ही याद आता है, वह तो उसे ही कह सकेगा कि वह जंगल मेरा था, और आज भी वहीं मेरा जीवन है। यदि इस पिंजर से उड़ गया तो जंगल मेरा स्वागत करेगा, मैं अधिकार पूर्वक वहाँ रहूँगा लेकिन दोबारा इस पिंजरे में अधिकार पूर्वक नहीं आ पाऊँगा। यहाँ तो फिर कोई और होगा।
जब देश से चला था, तब सारे त्यौहार, सारी रश्में, सारे धर्म वहीं तो छोड़ आया था, लेकिन फिर यहाँ आकर खालीपन क्यों लगने लगा?
क्यों चिन डाले अपने हाथों से बड़े-बड़े मंदिर? क्यों वहाँ जाकर रोज पूजा करने का मन करता है?
जो मन वहाँ दीवाली पर केवल पटाखे, मिठाई और आतिशबाजी तक ही सिमट गया था, अब क्यों लक्ष्मी और गणेश का पाना लाकर पूजा करने लगता है? लेकिन पूजा तो आती नहीं, फिर क्या हो?
तब फिर देश की याद आ गयी, अरे वहाँ भी तो पण्डितजी आते थे, पूजा करने। फिर यहाँ क्यों नहीं?
नौकरी का विज्ञापन निकाला गया और एक पढ़े-लिखे पण्डित को वीजा और पासपोर्ट बनवा ही दिया। बस अब तो जब चाहो यज्ञ कराओ और जब चाहो पूजा।
मन मायूस नहीं है, मन बचपन में लौट आया है। दादी तुलसी की पूजा कर रही है, दादाजी मन्दिर में घण्टी बजा रहे हैं, तो यहाँ भी तुलसी का पेड़ लगा लिया है और घण्टी के लिए तो मंदिर है ही न!
हम भी घूमते-घूमते जा पहुँचे केलिफोर्निया के एक मंदिर में। भक्तों की भीड़ लगी थी, एक तरफ प्रसाद वितरण की तैयारी थी तो दूसरी तरफ यज्ञ हो रहा था। दो पण्डित लगे हुए थे यज्ञ कराने में। मंदिर दक्षिण भारतीयों ने बनवाया था, मुख्य संरक्षकों के नाम दीवार पर जड़े थे। मंदिर में कार्तिकेय, गणेश, शिव, पार्वती सभी विराजे थे। साफ सुथरा मंदिर, पूर्णतया वातानुकूलित, सारे ही संसाधनों से युक्त। एक दूसरे मंदिर में जाने का और अवसर मिला, वह जैन मंदिर था। दोनों ही पद्धतियों की पूजा और मूर्तियां वहाँ थी, श्वेताम्बर और दिगम्बर। देश से बाहर निकल कर आने पर सम्प्रदायवाद कम होने लगता है। मंदिर अर्थात हिन्दू मंदिर और सभी अपने मतों का भूलकर भगवान के दर्शन और अपनी आस्था की जड़े तलाशने चले आते हैं।
भारत से आकर दो प्रकार के लोग यहाँ बसे हैं, एक नौकरीपेशा और दूसरे व्यापारी। व्यापारी अपनी आस्थाओं के साथ रहते हैं लेकिन नौकरीपेशा लोग अपनी आस्थाओं को मन के किसी कोने में दफनाने की कोशिश करते रहते हैं। जब भी उन्हें मंदिर दिखायी दे जाते हैं, उनकी आस्था सर निकाल ही लेती है। लाखों भारतीय यहाँ बसे हैं और यहाँ अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन एक प्रश्न मन में उभर आता है, क्या उनकी सेवाओं की यहाँ किसी को कद्र है? क्या कोई अमेरिकी यह कहता है कि भारतीयों के कारण यहाँ उन्नति हुई है?
उनके लिए तो आज भी भारत अविकसित देश ही है और जहाँ शोषण ही शोषण है। जब विवेकानन्द यहाँ आए थे, तब एक ही प्रश्न उनसे किया गया था, कि भारत में महिलाओं की स्थिति क्या है? मुझे लगता है कि आज भी यह प्रश्न वहीं उपस्थित है। मेरा भांजा वहीं है, वह वहाँ मेडिकल की उच्च शिक्षा के लिए गया है। तब एडमिशन की दौड़ में दर-दर भटक रहा था। ऐसे ही भटकते हुए एक बार बस से यात्रा कर रहा था। वहाँ बस में सवारियाँ नाम मात्र की होती हैं। दो-चार होने पर तो बस फुल कहलाती है।
ड्राईवर ने उससे पूछा कि क्या करते हो?
उसने बताया कि डॉक्टर हूँ।
उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि एक डॉक्टर और बस में? वहाँ सबसे अधिक डॉक्टर ही कमाते हैं। फिर उसका दूसरा प्रश्न था कि कहाँ से हो?
भारत से, उत्तर था।
बस-ड्राईवर ने कहा कि वही भारत जहाँ शादी में दहेज लिया जाता है?
भानजा अभी-अभी शादी करके ही गया था, बोला कि अरे नहीं वह तो बहुत पुरानी बात हो गयी। कैसे बताए कि अभी भी उसका सूटकेस ससुराल के कपड़ों से भरा है। ऐसे कितने ही प्रश्न हमारे युवापीढ़ी के पास आते हैं और वे अक्सर झूठ का सहारा लेते हैं। भारत ने कितनी ही उन्नति की हो लेकिन यहाँ आकर एक बात समझ आती है कि हमने आत्मसम्मान नहीं कमाया। हम हीन-भावना से आज भी ग्रसित हैं। इसी कारण प्रतिपल अपने देश को हम दुत्कारते हैं, उसपर शर्मिंदा होते हैं। अपनी पहचान छिपाते हैं। हमें अपने आपको गाली देने में आत्मिक सुख मिलता है। लाखों भारतीय यहाँ रहते हैं लेकिन वे सब अपने आपको अमेरिकी कहलाने में ही सुख खोज रहे हैं, वे कभी भी गर्व से नहीं कहते कि हम भारतीय हैं। भारत का गौरव या तो उन्हें पता नहीं या फिर वे बताने में संकोच करते हैं कि कहीं ऐसे प्रश्नों का सामना नहीं करना पड़े जिनके उत्तर उनके पास नहीं हैं।
हम किसी भी देश का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन पीढ़ियां गुजर जाने के बाद भी हम उस देश के मूल नागरिक नहीं कहलाते। जब अंग्रेज भारत में आए थे तब यहाँ के मजदूरों को उन्होंने गिरमिटियां बनाकर कई देशों को बसाया था। उन देशों को बसाने के लिए वहाँ के बाशिंदों के पास न तो तन की शक्ति थी और न ही मन की, इसलिए भारतीय मजदूरों ने ही उन देशों को बसाया। लेकिन आज भी वे सब भारतीय मूल के नागरिक ही कहलाते हैं। जिस देश में विकास की असीम सम्भावनाएँ हो और वहाँ का युवा दूसरे देश को अपना कहने के लिए लालायित रहे, तब कैसे उस देश का विकास सम्भव है? दूसरे देशों में हमने अपनी जरूरत पैदा नहीं की, अपितु हम उनके लिए बोझ बन गए हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय कार्य कर रहा है लेकिन वे अमेरिका का निर्माण कर रहे हैं, ऐसा सम्मान दिखायी नहीं देता।
दूसरे देश में खुशहाली अधिक है, इसलिए हम चले आए, अपने देश को अकेला छोड़कर?
यहाँ आने पर एक प्रश्न हवा में तैरता रहता है, यहाँ कैसा लग रहा है?
अरे भई पराये देश में आए हैं, सुंदर देश है, तो अच्छा ही लगेगा। लेकिन इसमें प्रश्न की बात क्या है? प्रश्न तो यह होना चाहिए कि अपने देश को क्या हम ऐसा बनाने में अपना योगदान करेंगे? क्या यहाँ से कुछ सीख कर जाएँगे? परायी चूपड़ी पर क्यों मन ललचाता है?
यहाँ आकर एक बात समझ आ रही है कि भारत क्या है? हमने इसे दुनिया के सामने किस प्रकार से प्रस्तुत किया है? हम अपने आस-पास भारत बनाकर रहना चाहते हैं, मंदिर भी चाहिए, वैसा खाना भी चाहिए लेकिन भारत में कुछ अच्छा भी है इसकी चर्चा करना नहीं चाहते। दुनिया कहती है कि भारत पुरातनपंथी है, वहाँ शोषण है, तो हम भी स्वीकार करते हैं। स्वीकार नहीं करें तो चारा भी नहीं, क्योंकि यदि कहेंगे कि नहीं भारत बहुत अच्छा है, तो फिर प्रश्न आएगा कि यदि तुम्हारा देश इतना ही अच्छा है तो फिर सब कुछ छोड़-छाड़कर यहाँ क्यों चले आए हो?

डॉ. अजित गुप्ता

Saturday, February 07, 2009

सोने का पिंजर (4)

चौथा अध्याय

"बेटा कमाता है डॉलर और मां-बाप रुपैया..."

ख़ैर, हम भी लाखों माँ-बापों की तरह दौबारा भी असफल हो गए। कहते हैं भारत में व्यक्ति के पास पैसा हो या न हो लेकिन स्वाभिमान पूरा होता है। ग़रीब आदमी के पास तो कुछ ज्यादा ही होता है। धनवान तो स्वाभिमान बेचकर ही धनवान बना है तब उसके पास तो यह नहीं होता लेकिन बेचारा ग़रीब तो ग़रीब ही इसलिए है कि उसने कभी अपने लिए किसी से नहीं माँगा। जो भी मिला उसे भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार किया। अतः हमारे स्वाभिमान ने भी हमें प्रताड़ित किया और कहा कि बस अब बहुत हो गया, अमेरिका जाने का चाव। बार-बार जाकर अपना अपमान कराने से तो अच्छा है कि अपनी ममता का ही गला घोंट लो। बच्चों से कह दो कि यदि तुम्हें भारत की और वहाँ बसे माता-पिता की याद आ जाए तब तुम्हीं आ जाना। लेकिन परिस्थितियां कब किसके रोके रुकी हैं? वे तो कभी भी एक-दूसरे की आवश्यकता अनुभव करा ही देती है। किसका मन नहीं होता कि बेटे की गृहस्थी जाकर देखें या बेटी का सुख। लेकिन जब रिश्तों पर पहरे बिठा दिए गए हों तब तो आदमी मन मसोसकर ही रहेगा न? बेचारा इंसान कर भी क्या सकता है।
मुझे बचपन में माँ के द्वारा सुनी कहानी याद आती है। जब बहन की शादी दूर-दराज के गाँव में हो जाती थी और भाई उससे मिलने जाता था तब कितने पापड़ बेलने पड़ते थे? लेकिन वो दूरी तो दस-बीस कोस की ही थी अतः सारे संघर्षों के बाद भी मिलना सम्भव हो ही जाता था। लेकिन सात समुन्दर पार ऐसे ही तो नहीं पहुँचा जा सकता? फिर कोलम्बस वाला जमाना भी गया कि स्वयं का जहाज लेकर निकल पड़े दुनिया नापने, या खोजने। अब तो सारी व्यवस्था ही चाक-चौबंद हैं।
हमारे एक मित्र ने एक ताना मारा, बोले कि अरे अमेरिका नहीं गए? फिर स्वतः ही बोले कि अरे अभी तुम्हारा वहाँ क्या काम? जब बाल-बच्चा होता है तब जाते हैं भारतीय माता-पिता तो। हम जानते हैं कि तुम्हारे यहाँ तब भी जरूरत नहीं होती हमारी। हमारे जैसे नहीं कि घर में जापा होने वाला है तो कम से कम दो-तीन औरते तो चाहिए हीं। एक अस्पताल जाएगी, एक घर देखेगी और एक बारी-बारी से उनका सहयोग करेगी। हमारे यहाँ कितनी निकटता आ जाती है, सास-बहू के रिश्तों में। जब बहू दर्द से छटपटा रही होती है तब सास उसके सर पर हाथ फिराती है, भगवान से प्रार्थना करती है। जापे में कैसे तो खुशी-खुशी सारे ही काम करती है। तभी तो प्यार बढ़ता है। लेकिन तुमने इन सारे सुखों को भी छीन लिया है। हमारे यहाँ से बहुत सी सास और बहुत सी माँ वहाँ जाती हैं लेकिन फिर कहती हैं कि अरे मेरा तो यहाँ कोई काम ही नहीं है। लेबर रूम तक में पति ही जाता है, बेचारी महिला तो बाहर ही बैठी रहती है। पोतड़े धोने और सुखाने का सुख भी नहीं। सब कुछ डिस्पोज़ेबल है, पति ही सबकुछ कर देता है। लेकिन फिर भी लगता है कि कोई न कोई तो पास रहना ही चाहिए। भारतीय मन मानता ही नहीं। कैसे अकेला छोड़ दे? हमारे यहाँ तो कहा जाता है कि औरत का दूसरा जन्म होता है। सचमुच में होता भी है, उस एक मिनट में एक नवीन जीव जन्म लेता है तो दूसरा अपना अस्तित्व बचाता है। ऐसे में कैसे छोड़ दें अकेला?
तुमने परिवार की जरूरतों को समाप्त किया है, लेकिन हमने नहीं किया। हमें तो आज भी लगता है कि हमारी जरूरत है। मेरे साथ तो कैसा संयोग था कि जब पोता आने वाला था तब वह स्वयं ही आकर मुझे न्यौता दे गया था कि दादी मैं आ रहा हूँ। बहू भारत आयी थी, जैसे ही उसने भारत की धरती पर कदम रखा, पोते के आने के संकेत मिलने लगे। मेरा खून सबसे पहले मुझे बताने चला आया कि मैं आ रहा हूँ। अब हमारी चिन्ताएं बढ़ गयी। तुम्हारे पहरे को कैसे तोड़ेंगे? मैंने पहले गुस्से में भगवान से कह दिया था कि अब मैं मेरे स्वाभिमान को नहीं गिरवी रखूँगी। अब तू ही मुझे ससम्मान अमेरिका भेजेगा तभी वहाँ जाऊँगी। अब मेरा धर्म-संकट पैदा हो गया। एक तरफ पोता खुद न्यौत गया था तो दूसरी तरफ मेरी प्रतिज्ञा। क्या करूँ और क्या न करूँ? लोग कहते हैं कि भगवान नहीं होता, मैं कहती हूँ कि होता है। मैंने प्रतिज्ञा की, भगवान ने सुनी और मुझे मौका दे दिया। तभी मेरे पास सूचना आयी कि विश्व हिन्दी सम्मेलन इस बार अमेरिका में हो रहा है। मेरे लिए भगवान ने पुल बना दिया था, जैसे राम ने रामसेतु बनाया था। लेकिन फिर कठिनाई वीज़ा की ही थी। भगवान ने फिर मदद की। एक दिन संदेशा आया कि भारत सरकार तुम्हें सम्मानित कर रही है। मुझे वीज़ा की कार्यवाही नहीं करनी पड़ी। बस भारत सरकार का कागज़ लिया और चले गये तुम्हारे चित्रगुप्त के कार्यालय। साथ में पति भी थे, जिनकी डॉक्टरी के कारण हमारे पर प्रतिबंध लगा हुआ था। अब वे बोले कि मुझे तुम्हारे साथ जाने देंगे? मैंने कहा कि जब भगवान ने इतना किया है तो यह भी करेंगे। जीत गया हमारा भगवान और हार गए तुम। जीत गया हमारे खून का प्यार और धरे रह गए तुम्हारे पहरे। कृष्ण ने जब जन्म लिया था तब सारे पहरे तोड़कर वह यशोदा मैया की गोद में चले ही गए थे। कंस देखता ही रह गया था। ऐसे ही आखिर में ससम्मान तुम्हें हमें बुलाना ही पड़ा।
हम तुम्हारी धरती पर आ रहे थे, इसलिए नहीं कि तुम्हारी धरती को छूने में कोई गर्व था। बस हमारा रक्त हमें पुकार रहा था, सारा प्रयोजन बस यही था। मेरे स्वाभिमान की जीत हुई थी, मेरे प्रेम की जीत हुई थी। मैं जान गयी थी कि प्रेम में कितनी ताकत होती है? तुम हमारे रक्त को कितना ही हमसे दूर कर दो लेकिन संसार की कोई ताकत नहीं जो तुम्हारे मंसूबों को पूरा कर दे। हम भारतीय प्रेम को सबसे बड़ा मानते हैं, हम परिवार को अपने दिल में बसाकर चलते हैं, हम से परिवार छूट नहीं सकता। तुम एक पीढ़ी को हमसे दूर ले जा सकते हो, लेकिन दूसरी पीढ़ी स्वतः ही हमारी ओर खिंची चले आती है। मेरे इस उदाहरण से तो तुम भी मानने पर मजबूर हो जाओगे। तुम्हारा भौतिक सुख केवल चार दिनों की चाँदनी हैं, बस तुम देखते रहो, कुछ दिनों में ही हमारे भारतीय प्रेम की जीत होगी।
लेकिन जो कुछ भगवान ने किया, इसलिए नहीं कि मुझे साहित्यकारों के मध्य सम्मानित करवाना था अपितु इसलिए कि इस माध्यम से मुझे ससम्मान अमेरिका भेजना था। मेरे साथ राजस्थान का दल भी था। मैं उस दल की नेत्री भी थी, लेकिन भगवान चाहता था कि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो, मैं सम्मान सहित वहाँ जाऊँ। तुमने मेरे अंदर जो हीनता लाने का सकंल्प किया था उसे मेरे भगवान ने समाप्त कर दिया।
तुमने सिद्ध करने का प्रयास किया था कि तुम मेरे वैभव के समक्ष कुछ भी नहीं हो। मैं तुम जैसे नाचीज़ों को अपनी धरती पर पैर भी नहीं रखने दूँगा। तुमने हमारी संतानों में भी यही भाव भरने का प्रयास किया कि तुम्हारे माँ-बाप तुच्छ हैं, तुम डॉलर में कमाते हो और तुम्हारे माँ-बाप रूपयों में?
कहाँ तुम्हारा वैभव और कहाँ उनका?
तुम्हारे यहाँ बसे भारतीय हमें कहते हैं कि तुम डर्टी फैलो हो, तुम्हारे यहाँ क्या है? आओ हमारा वैभव देखो। हमारे घरों में गलीचे बिछे हैं, और तुम्हारे घरों में?
हमारी सड़कें काँच-सी चमकती हैं और तुम्हारी?
हम कहते कि वो तुम्हारा कैसे हो गया और यह केवल हमारा कैसे हो गया? चलो अच्छा है कि तुम्हारा वैभव बड़ा है तो थोड़ा हमें भी सुख दे दो।
वहाँ से गुर्राहट आती है कि यह सुख हमने अर्जित किया है, भला तुम्हें कैसे दे दें? तुम्हारा और हमारा स्टेटस बराबर कैसे हो सकता है? भले ही तुम हमारे माँ-बाप हो लेकिन अन्तर दिखायी देना चाहिए दो पीढ़ियों में।
बेचारा भारतीय पूछता है कि तुम जब छोटे थे तब हमने तो अन्तर नहीं रखा था, हमने सारे ही अपने सुख त्याग दिए थे जिससे तुम्हारा भविष्य सुखी हो सके। फिर आज क्या हुआ? हम भारतीय मानते हैं कि पच्चीस वर्ष हम संतान के लिए सुख तलाशते हैं और आने वाले पच्चीस वर्ष संतान तलाशे सुख माँ-बापों के लिए।
लेकिन तुमने ऐसी पट्टी आँखों पर बाँधी है कि उन्हें अब माता-पिता दिखायी ही नहीं देते। बेचारे वे भी क्या करें, यहाँ भारतीयों को लगता है कि डॉलर में बहुत ताकत है, लेकिन जब वहाँ देखते हैं कि अरे इनकी स्थिति तो हम से बहुत ही खराब है। भला दो-तीन हजार डॉलर में होता ही क्या है? हमारे यहाँ जिसे पाँच हजार रूपया मिलता है, वह भी पेट ही भरता है और वार-त्योहार मिठाई खा लेता है, मेले में जा आता है। तुम्हारे यहाँ भी पाँच हजार डॉलर वाला इंसान यही कर पाता है। कैसे बताए वह अपने माँ-बापों को कि केवल मुँह पर चिकनाई लगाकर घी खाना दिखा रहा हूँ।
खैर हमें भी अब अपने आप पर गर्व होने लगा। हमें भी लगा कि हम भी इंसानों की बिरादरी में शामिल हो गए हैं। शायद अब हमें भी हमारी संतानें इज्ज़त के साथ देख लें? मैंने देखे हैं भारत में ऐसे-ऐसे बागबां कि अमिताभ बच्चन जो अपने आप में सेलेब्रिटी थे, उनकी संताने तुम्हारे यहाँ चली गयीं और वे बेचारे रातो-रात बौने हो गए। उनका अस्तित्व नगण्य हो गया। सारी दुनिया उन्हें सम्मान से बात करती है लेकिन उनकी संताने उन्हें दो कौड़ी का समझती हैं। यह है तुम्हारा प्रभाव। क्या कोई सुंदर पिंजरे में रहने से श्रेष्ठ हो जाता है? हम भारत में पढ़ाते हैं कि जो दूसरों को श्रेष्ठ समझे वो श्रेष्ठ होता है। हमारे यहाँ माता-पिता भगवान सदृश्य होते हैं। उनकी सेवा करना ही सबसे बड़ा पुण्य होता है। लेकिन तुमने सभी कुछ तो छीन लिया है। जो कभी भगवान थे आज वे तुम्हारे दर पर भिखारियों की तरह तुम्हारे रहमो-करम पर पड़े हैं। हमारे गाँव का व्यक्ति पूरे गाँव का चाचा, ताऊ बनकर राज करता है लेकिन तुम्हारे यहाँ ममता के लिए, दो रोटी खाकर वक्त बिताता है।
कितने हैं जो ममता को परास्त कर पाते हैं? कितने हैं जो दूसरों में अपनी ममता तलाशते हैं? शायद मुट्ठीभर होंगे हम जैसे स्वाभिमानी लोग जो दुनिया को अपना परिवार मानते हैं और भारत के प्रत्येक बच्चे को अपना बच्चा। हम ममता का विस्तार करते हैं इसलिए तुम्हारे द्वारा दिए हीनबोध को स्वीकार नहीं करते। हमारा भगवान भी नहीं करता, हमें वह भी कहता है कि मत स्वीकार करो हीनबोध, अपने स्वाभिमान से रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।
आखिर 12 जुलाई 2007 को मेरे हाथ में टिकट था। मैं तुम्हारी धरती पर आ रही थी। मेरा खून मुझे पुकार रहा था। उसे तुम्हारा नागरिक बने पाँच माह हो चुके थे और मैंने उसे अभी तक केवल कम्प्यूटर के सहारे ही देखा था। मेरे सामने केवल उसकी सूरत थी, और था एक काँच का पर्दा। मैं उसे देख सकती थी, बात कर सकती थी लेकिन उसे छू नहीं सकती थी। मेरी ममता कसमसा रही थी। मैंने उसे संसार में आते हुए नहीं देखा था, उस पारिवारिक अनुभव से मैं दूर रह गयी थी लेकिन अब मुझे उसके पास जाने से कोई नहीं रोक सकता था, तुम भी नहीं। मेरा मन कह रहा था कि मैं ज़ोर से चिल्लाऊँ और कहूँ कि ‘मैं आ रही हूँ अमेरिका’। तेरा सुख देखने, तेरा वजूद देखने, तेरा अभिमान देखने। मैं भी तो देखूँ कि तू कितना बड़ा है? ऐसा तेरा वैभव कितना बड़ा है? जो तू ममता को ही विस्मृत करा देता है? ऐसा क्या है तुझमें, जो मेरे भारत में नहीं है? मैंने तुझ पर विश्वास किया और अपने सारे दुखों को, अभावों को भारत में ही छोड़ दिया, केवल अब तो मुझे सुख ही सुख जो देखना था। मेरा तन और मन यहाँ तक की आत्मा भी आप्लावित होने वाली थी तेरे सुख से। देखूँ कितना सुख है तेरी धरती पर?

डॉ अजित गुप्ता