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Wednesday, December 09, 2009

सवाल मानसिकता बदलने का है

बड़ी अजीब बात है। जलवायु परिवर्तन पर पूरी दुनिया की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। परेशानी ये है कि पहली बार एक ऐसी बात पर लोगों को अपना पैसा, समय और दिमाग़ ख़र्च करना पड़ रहा है जिससे कोई फ़ायदा नहीं उठाया जा सकता। वरना हर चिंता और हर फ़िक्र को धंधे में बदल देना हमारे बाएं हाथ का खेल है। बीमारी, लाचारी, धर्म, मजबूरी और सुकून की चाह, हर चीज़ का कारोबार करना और उससे मुनाफ़ा कमा लेना हमें अच्छी तरह आता है। लेकिन दुनिया का गर्म होना एक ऐसा मुद्दा है जो कारोबर नहीं बन पा रहा है, उल्टे संयम बरतने पर मजबूर कर रहा है।
हमारे देश की संसद भी बेवक़्त थोपी गई लिब्राहन रिपोर्ट से कुछ वक़्त निकालकर अगर दुनिया बचाने की इस मुहिम में शामिल होती है तो महज़ इतना कर पाती है कि हमारे सांसद और सियासी पार्टियों का विरोध दर्ज कर ले। दुनिया के मंच पर हम जैसे ही इस बात का ऐलान करते हैं कि 2020 तक हम कार्बन उत्सर्जन में 20-25 प्रतिशत की कमी लाने की कोशिश करेंगे, एक कोहराम मच जाता है। राज्य सभा में हंगामा और वॉक-आउट करके नाराज़गी जताई जाती है। विपक्ष का इल्ज़ाम है कि सरकार अमरीकी दबाव में झुक कर ये बयान देने पर मजबूर हुई है।
सवाल ये है कि क्या हमारे पास इतना वक़्त है कि हम इस घोषणा को सियासी चश्में से देखें। कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर हो रहे सम्मेलन के मौक़े पर एक एतिहासिक क़दम उठाते हुए 45 देशों के 56 अख़बारों ने एक संयुक्त संपादकीय लिखा है। ज़ाहिर है कि इस संपादकीय में गर्म होती दुनिया के ख़तरे और उससे वक़्त रहते निपटने के लिए पूरी मानवता द्वारा क़दम उठाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है। आजतक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पूरी दुनिया के अख़बार किसी एक विषय पर इस तरह से एक आवाज़ बने हों। इस संपादकीय को जलवायु परिवर्तन से उपजी आशंकाओं पर एक सार्थक दस्तावेज़ माना जा सकता है। वक्त बहस और मुबाहिसे का नहीं है। इस संपादकीय की शुरूआत में ही ये कह दिया गया है कि “इस विषय पर वैज्ञानिक-पत्रिकाओं में पहले भी चर्चा होती रही है कि सारी गड़बड़ी इंसानों की ही की हुई है यह शताब्दियों की गड़बड़ी का नतीजा है और इसके अपने आप ख़त्म होने की संभावना बिलकुल नहीं है। लेकिन अब मुद्दा यह नहीं है। अब चर्चा का विषय यह है कि हमारे पास अब इस मुसीबत से बचने के लिए कितना वक़्त रह गया है।”
ऐसे हालात में हमारी संसद में नेता प्रतिपक्ष का ये कहना कि कार्बन कटौती का हमारा एक तरफा फैसला गलत है “हमने अपने पत्ते खोलकर गलत किया है...”, निराशाजनक है। एक तरह से ये चिंता ठीक भी है कि हमें अंतर्राष्ट्रीय मंच पर किसी दबाव में आकर वो फैसले नहीं करने चाहिए जो देश के विकास में बाधा डालते हों, क्योंकि विकासशील देशों की अपेक्षा विकसित देशों ने ज्यादा खतरनाक माहौल बनाया है और उन्हें अब इस असुरक्षा से दुनिया को बचाने में भी ज्यादा बड़ी भूमिका भी निभानी चाहिए। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर पिछली तमाम कोशिशों में ये भी देखने को मिला है कि विकसित देश किसी न किसी बहाने के आधार पर अंकुश की बाध्यता से बच निकलने में कामयाब होते रहे हैं, लेकिन अब गर्म होती दुनिया किस ख़तरनाक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है इसका अंदाज़ा अमरीकी सरकार के उस बयान से लगाया जा सकता है जिसमें पहली बार आधिकारिक तौर पर ये मान गया है कि ग्रीन हाउस गैसें इंसान की सेहत के लिए बेहद ख़तरनाक हैं। ये भी माना जा रहा है कि इस घोषणा के बाद बराक ओबामा बिना सीनेट की मंज़ूरी लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती का निर्देश जारी कर सकते हैं।
सोचिये अगर अमरीकी सीनेट में भी कोई यही कहकर ओबामा का रास्ता रोक लेता कि इस तरह अपने पत्ते खोलकर अमरीका ठीक नहीं कर रहा है क्योंकि अब इसी आधार पर उसे आगे बढ़ना होगा लिहाज़ा अमरीका को इस बाध्यकारी समझौते से बचना चाहिये था।
लेकिन हालात के मद्देनज़र अमरीकी सरकार ने ये पहल की है और उसका ये क़दम स्वागत के क़ाबिल है। 56 अख़बारों के संयुक्त संपादकीय में आगे लिखा गया है कि “दिक्क़त यह है कि विकसित या संपन्न देश जलवायु परिवर्तन पर होने वाली बहसों में वर्तमान आंकड़े पेश करने लगते हैं और कहते हैं कि विकासशील देशों को चाहिए कि वे अपना गैस उत्सर्जन कम करें, या एक बहस ये होने लगती है कि अमरीका और चीन आज की तारीख में सबसे ज्यादा प्रदूषण कर रहे हैं, उन्हें इस पर रोक लगाना चाहिए। सबको मालूम है कि इनमें से कोई भी बात स्वीकार नहीं होने वाली है। ये भी सबको मालूम है कि १८५० से अब तक जितना भी कार्बन डाई आक्साइड वातावरण में छोड़ा गया है उसका तीन चौथाई विकसित और औद्योगिक देशों की वजह से है। इसलिये विकसित देशों को पहल करनी पड़ेगी कि वे ऐसे उपाय करें कि अगले १० वर्षों में गैसों का उत्सर्जन स्तर ऐसा हो जाए जो १९९० तक था”।
हमारे नेताओं को और वार्ताकारों को ये समझना चाहिये कि जलवायु पर उठी चिंताएं अब बहस से आगे निकलकर यथार्थ के धरातल पर खड़ी हैं। इसके लिए पूरी दुनिया के साथ-साथ हमें भी संयम बरतना पड़ेगा। अगर भारत 20-25 फीसदी कटौती की अपनी तरफ़ से पेशकश कर रहा है तो ये भी अमरीकी सरकार की घोषणा की ही तरह स्वागत येग्य है। इस पहल को सियासी रंग नहीं दिया जाना चाहिए। एक सुनामी का कहर हम देख चुके हैं। वो जब आयेगी तो बस फिर आयेगी, दुनिया की कोई भी ताकत उसे नहीं रोक पायेगी, इसलिए हम सिर्फ यही कर सकते हैं कि उन लक्षणों को कम कर दें जो सुनामी जैसी स्थितियों के लिए मददगार होते हैं। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता फैलानी होगी। व्यक्तिगत तौर पर भी बहुत सी ऐसी सावधानियां बरती जा सकती हैं जो कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कटौती कर सकती हैं। एडस और कैंसर जैसी बीमारियां सिर्फ उनके लिए घातक हैं जिन्हें ये बीमारियां घेर लेती है लेकिन जलवायु में फैल रही गंदगी किसी को भी, कहीं भी चपेट में ले सकती है। इसलिए कोपेनहेगन में बिताए जा रहे 14 दिनों के बाद नतीजे अगर सकारात्मक न भी निकलें तो भी हमें अपने तौर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की अपनी प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटना चाहिए। सवाल मानसिकता बदलने का है।

--नाज़िम नक़वी

Thursday, October 29, 2009

जंगल में फंसी राजधानी

जंगल में ट्रेन रोकी गई, ख़बर मिली, टीवी स्क्रीन रौशन हुए, 800 सौ यात्री बंधक, ड्राइवर का अपहरण, अब क्या होगा? क्या देश में एक नया देश बन गया है? कुछ दिन पहले छूटे पुलिस ऑफिसर के सीने पर ‘प्रिज़नर ऑफ वार’ का पट्टी लिखा ये संकेत फिर से उभर आया। कुल मिलाकर जो कुछ सुनाई और दिखाई पड़ रहा था वो शाम तक इस सुकून के साथ खत्म हुआ कि ड्राइवर को छोड़ दिया गया, यात्रियों को जाने दिया गया पांच घंटे बाद ट्रेन फिर से अपने गंतव्य को चल पड़ी। लेकिन ये संदेश लेकर कि जंगलों में भी एक आबादी रहती है जो मूलभूत सुविधाओं के लिये पिछले तीन दशकों से राजधानी की राह देख रही है। इस बीच माओवादियों की एक मांग भी देश की सरकार के सामने रखी गयी ‘छत्रधर महतो, कबाड़ और जेल में बंद उनके एक और समर्थक/ हिमायती को रिहा कर दिया जाए’। शाम तक टीवी चैनलों का रुख थोड़ा नरम हुआ और हजारों यात्रियों समेत ट्रेन के अपहरण की खबर माओवादी समर्थित पीसीपीए की अगुवाई में सैकड़ों गांव वालों द्वारा किये गये चक्का जाम में बदल गयी। मीडिया के कैमरे लोगों के बयान दर्ज कर रहे थे लेकिन यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ, वो तो भला हो एक बच्चे का जिसने बताया कि उसने गाड़ी रोकने वाले लोगों को सबके साथ, अपने साथ अच्छा सुलूक करते हुए पाया, “वो हम सबको पानी भी पिला रहे थे”।

जिस तरह से ट्रेन पर बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी में उनके द्वारा लिखा दिख रहा था वो साफ़ इशारा करता है कि ये सब इसलिये किया गया ताकि देश की सरकार के साथ-साथ (उसके साथ तो वार्तालाप का सिलसिला दशकों से जारी है) देश की जनता के सामने भी नक्सली / माओवादी / जिंदा रहने की लगभग अंतिम लड़ाई लड़ रहे हजारों लोग, अपना एजेंडा पहुँचाएँ। इन इलाकों के विकास को लोकर जो जमीनी कार्यकर्ताओं की मांग है और जिस विकास कार्य का प्रयत्न सरकार के द्वारा किया जा रहा है उसमें ज़मीन आसमान का अंतर है। सवाल ये नहीं है कि उन्हें किया मिल रहा है, उनके सवाल वो हैं जो उन्हें चाहिये।

इस घटना से जुड़ा एक पहलू ये भी है कि आंदोलन ज़रूर जंगल में रहने वालों का है लेकिन उनके हक़ के लिये लड़ने वाले अकेले जंगल के नहीं हैं बल्कि देश और दुनिया में रहने वाले समाज चिंतक और मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोग भी हैं (सरकार ऐसे लोगों से माओ वादियों और नक्सलियों का बौद्धिक समर्थन न करने की अपील भी कर रही है)। उधर जंगल में सड़कें, अस्पताल, स्कूल और बिजली-पानी भले न हों, सूचना तंत्र बहुत विकसित है। कुछ दिन पहले ही 20 गांववासियों को छुड़वाकर जो नया रक्त संचार आंदोलन की रगों में हुआ है उसके जोर पर कुछ ऐसा करने की चाहत बलवती हो गई जो मामले को गरम रखे। इंफोटेनमेंट के सहारे 24 घंटे दर्शक सेवा में मशगूल खबरिया चैनल ऐसी घटनाओं को हाथों हाथ लेंगे, राजधानी पर हमले के पीछे ये सोच भी जरूर रही होगी। ऐसे में जंगल को ये सुनहरा मौक़ा लगा अपने एजेंडे की लोकप्रियता हासिल करने का।

अब सारा दारोमदार सरकार के कंधों पर है कि वो देश को इस चुनौती से कैसे निकाले। गृहमंत्री जितने सभ्य दिखते हैं अगर वो उसी चश्में से समस्या को देखेंगे तो शायद आने वाले दिनों में ये हो कि सरकार और माओवादी चिंतक बैठकर कुछ ऐसा करते दिखें जिसे जंगल के लोग अपनी तरफ़ बढ़ा एक क़दम मानें। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ये कहते नहीं थकते कि सोनिया जी ने पिछली कई चुनौतियों में देश को संकट से निकालने का रास्ता हमवार करवाया है, देखना है कि इस समस्या से वो कैसे निपटती हैं। वो इस समय ताक़त के उस शिखर पर हैं कि मुख़ालिफ़ हवाओं का भी सामना बख़ूबी कर सकती हैं।

अगर ऐसा न हुआ तो सारा बोझ बंगाल की वाम सरकार पर आ जायेगा और वो इसके समर्थन में वही दर्दमंदी दिखायेगी जो उसने पिछले दिनों बीस जंगल निवासियों को रिहा करते हुए दिखाई थी कि “हमारे देश के संविधान और इज़्राइल के संविधान में फर्क है, दूसरे ये कि जब कंधार और रुबया सईद की रिहाई के लिये विदेशी आतंकियों को छोड़ा जा सकता है तो एक पुलिस अधिकारी जो देश वासी है और देश की कानून व्यवस्था की रक्षा करने का काम करता है, उसके लिये 20 गरीब जंगल वासियों को, जिनपर कोई इल्ज़ाम अभी साबित भी नहीं हुआ है, बेल पर क्यों नहीं छोड़ा जा सकता?”। इसके बाद जो बातें इस घटनाक्रम के मद्देनजर सामने हैं वो खिचड़ी जैसी हैं, मसलन घटना की जिम्मेदार पीसीपीए, वही है जिसका समर्थन ममता बैनर्जी एंड पार्टी करती है, तृणमूल का मानना है कि ये सब कुछ वाम सरकार वोट के लिये कर रही है। वाम मंथी इसे ममता की सियायत मानते हैं, “इसे कैसे ढूँढ़ लिया, जो दो साल से लापता हैं वो कहां हैं?”, “आपकी गल्ती ये है कि आपने कभी पीसीपीए जैसे संगठनों की सोच को खारिज नहीं किया, वो आपके पार्टी सहयोगी हैं” वगैरह वगैरह।

इसी बीच ये भी संयोग ही है कि पिछले सप्ताह नक्सली हकों के लिए काफी मुखर अरूंधति राय अचानक टीवी चैनल पर ये कहती हुई दिखाई पड़ी हैं कि छत्तीसगढ़ जैसी जगहों पर पिछले 30 साल से नक्सली रह रहे हैं लेकिन अभी ही क्यों युद्ध जैसे हालात बनाये जा रहे हैं? वो मानती हैं कि सरकार युद्ध चाहती है ताकि छत्तीसगढ़ और झारखंड के उन इलाकों को खाली कराया जा सके जिन्हें एमओयू के जरिये बंधित किया जा चुका है लेकिन वहां बसने वालों के आंदोलन/विरोध की वजह से उसपर खनन का काम नहीं शुरू किया जा सका है।” यानी सरकार को कभी न कभी इस इल्जाम का जवाब देना ही पड़ेगा कि क्या वो खनन माफियाओं के लिये सरकारी संगीने मुहय्या कर रही है? सूचना तंत्र और आर टीआई जैसे साधन जनता के पास मौजूद हैं इसलिए उसे सरकार के जवाब का इंतेजार रहेगा।

26/11 को छोड़ दें तो देश ने एक अर्से से अपने अंदरूनी हालात पर कोई बड़ी बहस नहीं की है। उससे ज़्यादा तो हम पाकिस्तान के अंदरूनी हालात पर बहस कर डालते हैं। और हमारी अंदरूनी हालत ये है कि हमारी चिंता आतंक, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्री लंका, गोते खाते शेयर मार्केट और दुनिया की अर्थव्यवस्था, सस्ते चीनी सामान की घुसपैठ से बच बचा कर जब घर लौटती है तो म्यूनिस्पिल कार्पोरेशन से लेकर अरुणाचल प्रदेश के रंगहीन चुनावी माहौल में रंग भरने में जुट जाती है, कुछ बहाने बनाकर देश-विदेश घूमने की व्यस्तताओं में ख़ुद को फंसा लेते हैं। विपक्ष के अपने मुद्दे इतने टर्मिनल स्टेज पर हैं कि सर्जरी और कीमियोथ्रेपी की सलाहें दी जा रही हैं। ऐसे में या तो राजधानी को जंगल में रोका जायेगा या फिर वीराने में बैठकर निदा फाजली के ये ताजातरीन शेर (ये भी एक तरीका है) गुनगुनाएगा-
तीन चौथाई से ज़ायद हैं जो आबादी में
उनके ही वास्ते हर भूख है, मंहगाई है
कोई हिंदू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सबने इंसान न बनने की कसम खाई है
सिंर्फ मंसूबों में मौसम के बदलते हैं मिजाज
सिर्फ तकरीरें बताती हैं बहार आई है

--नाज़िम नक़वी
बी-1/924 टॉवर न. 16
सिल्वर सिटी अपार्टमेंट
सेक्टर 93ए
नोएडा, गौतम बुद्ध नगर

Friday, August 28, 2009

बीजेपी : कॉट संघ बोल्ड जिन्ना

जसवंत सिंह से लेकर तमाम भाजपा नेताओं ने खुद या पार्टी के लिए ही नहीं तमाम न्यूज़ चैनल्स के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है...रोज़ बीजेपी का एक विकेट गिरता है और बीजेपी पर नया और पिछले बुलेटिन से ज़्यादा असरदार शीर्षक ढूंढने की मगजमारी शुरू हो जाती है....जसवंत सिंह की किताब कितने 'मीडियाकरों' ने पढ़ी होगी, इसमें संदेह है मगर ऐसा लगता है कि आधे घंटे के लिए टीवी में हर कोई विद्वान हो जाता है...हल्के में मत लीजिए टीवी के भद्रजनों को...सबको सब पता है...जिन्ना का नज़रिया, जसवंत का नज़रिया, (कौन जाने श्रीरामजी का नज़रिया भी)...बहरहाल, नाज़िम नक़वी क्या राय रखते है, गौर करने लायक हैं...
संपादक

ऐसा नहीं हो सकता कि जसवंत सिंह को इसका अंदाज़ा ही न हो कि उनकी किताब “जिन्ना-इंडिया-पार्टीशन-इंडिपेन्डेंस” जब बाज़ार में आयेगी तो क्या प्रतिक्रियाएं होंगी। आख़िर वो शख़्स इस बात को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता है जो देख चुका हो कि जिन्ना के इस जिन ने 2005 में लौह-पुरुष अडवाणी जी की कैसी फ़ज़ीहत की थी। सवाल है कि क्या उन्हें इस बात का अंदेशा था...? जी हां था। उन्होंने किताब के विमोचन समारोह में पहुंचे एक पत्रकार से अंग्रेज़ी में कहा भी था कि “आई हैव रिटेन द बुक एंड नाउ आई एम रेडी फार द नूज़” यानी अब मैं फांसी के फंदे के लिये तैयार हूं। साफ़ है कि ख़ुद जसवंत सिंह भी नकारात्मक प्रतिक्रियाओं के लिये दिमाग़ी तौर पर तैयार थे।

हां ये ज़रूर हो सकता है कि शायद उन्होंने ये नहीं सोचा होगा कि जिस पार्टी की उन्होंने तीस साल तक सेवा की वो इतनी बेरुखी से, बगैर उनका पक्ष जाने, महज़ एक फोन काल पर रिश्तों के सारे तार काट देगी। किताब के विमोचन (जिसमें भाजपा का कोई नेता शामिल नहीं था) के बाद से ही भाजपा और कांग्रेस की नाराज़गी किसी से छुपी नहीं है। उत्तर प्रदेश के एक कांग्रेसी नेता ने तो जल्दी से एक किताब खरीद कर टीवी कैमरे के सामने उसे जला कर अपनी पार्टी के आग-बबूला होने का मंचन कर दिया था।

कुल मिलाकर एक पक्ष रह गया है और वो है देश का मुसलमान। पता नहीं आम मुसलमान इसे कैसे देख रहा है लेकिन बरेली के एक पढ़े लिखे निवासी महमूद भाई ने विचारों को कहीं दूसरी तरफ़ ही मोड़ दिया। कहने लगे “जसवंत सिंह के साथ वही हुआ जो जिन्ना के साथ हुआ था... भई जिन्ना को भी उस वक्त पार्टी से तकरीबन बेदख़ल कर दिया गया था... जिन्ना लिबरल आदमी थे और नाराज होकर कम्यूनल पार्टी में चले गये। ये कम्यूनल पार्टी के आदमी हैं... ये सेक्यूलरिज्म में आ जायेंगे...।”

हालांकि आदमी विचारों से कभी बूढ़ा नहीं होता शायद इसीलिये जसवंत सिंह भी कह रहे हैं कि उनका राजनैतिक जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन सत्तर पार कर लेने के बाद उनमें कितनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा बची है ये अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है, और इसी बुनियाद पर कहा जा सकता है कि उनका पार्टी से निष्कासन कोई ख़ास मायने नहीं रखता। जो चीज़ मायने रखती है वो ये कि क्या पार्टी से जुड़ने के बाद व्यक्ति की सोच भी गुलाम हो जाती है? पार्टी अनुशासन और सेना अनुशासन में क्या कोई फ़र्क़ नहीं है? जसवंत जी के अफ़ीम प्रदर्शन को क़ानून की आंखों से बचा लिया जाता है लेकिन तथ्य प्रदर्शन की ये सज़ा दी जाती है।
बहरहाल जो भी हो इस किताब के आ जाने से सबसे ज्यादा हालत खराब है उन मौलवी हज़रात की जो कांग्रेस की चाटुकारिता में भाजपा को खरी खोटी सुनाते हैं और भाजपा के निवाले तोड़ते हुए कांग्रेस को मुसलमानों का दुश्मन बताते हैं, और इस बीच अपनी दुकान चलाते हैं। आज़ाद भारत में मुसलमानों की राजनैतिक समझ की शुरूआत ही विभाजन की सियासत से शुरू होती है और अब इस किताब के बाद उन्हें दिखाई दे रहा है कि दोनों पार्टियां तो इस विषय पर एक हो गई हैं, अब क्या किया जाए? रमजान के महीने में सियासी इफ़्तार पार्टियों में बातचीत का रुख क्या होगा इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

सच पूछिये तो जिन्ना किसी के हीरो नहीं हो सकते, न जमाते-इस्लामी के, न संघ के, न कांग्रेस के। पाकिस्तान के अंदर एक बहुत बड़ा तबक़ा उन्हें विलेन के रूप में देखता है। विदेशी सूट पहनने वाले जिन्ना, अंग्रेजी औरतों के साथ सैर-सपाटे करते जिन्ना, सिगार के कश लगाते जिन्ना, व्हिसकी से परहेज़ न करने वाले जिन्ना, सिर्फ ख़ुद को और अपने टाइप राइटर को “पाकिस्तान” बनाने का श्रेय देने वाले जिन्ना पाकिस्तान बनने के बाद पाकिस्तानियों से ये कहते हैं कि - अब पाकिस्तान बन गया अब आप गाइये बजाइये, खाइये पकाइये, मस्जिद जाइये, मंदिर जाइये, गिरजा जाइये तो कई दाढ़ियां नाराज होकर उनसे कहती हैं कि वाह! ये अच्छी कही आपने... इस्लाम के नाम पर मुल्क बनाया और अब ये कह रहे हैं कि मंदिर जाइये गिरजा जाइये...। असल बात तो ये है कि जिन्ना के सेक्यूलर बनते ही कई चेहरों का मुखौटा खुद-ब-खुद पिघलने लगता है।

लेकिन सवाल न जिन्ना का है, न जसवंत सिंह का है, सवाल है किताब लिखने की आज़ादी का। 1989 में सेनेटिक वर्सेस ने जो आग लगाई थी उसकी आंच में तपते हुए एक मौलाना साहब के पास मैं बेठा था। मौलाना अपने अनुयाइयों के बीच रश्दी पर लगे मौत के फ़रमान पर अपनी सहमति दर्ज कर रहे थे। मैं जानता था कि मौलाना ने किताब नहीं पढ़ी है, उनकी अंग्रेजी कमज़ोर है और अनुवाद बाजार में अभी आया नहीं है। मैंने सबके बीच उनसे सीधा सवाल कर डाला- मौलाना आपने किताब पढ़ी…? वो सकपकाये फिर संभलते हुए बोले ऐसी गंदी किताब मैं पढ़ भी कैसे सकता हूं...। मौलाना का दर्द मैं समझ सकता था, ईमान की रस्सी पर आस्था का बैलेंस रॉड लिये दूसरे किनारे तक पहुंचने को मजबूर लोग इधर-उधर देखने का ख़तरा मोल नहीं लेते क्योंकि हल्की सी डगमगाहट आसमान से जमीन पर ले आती है, चोट अलग लगती है। हां जो विचारों की स्वत्रंता की अहमियत को समझते हैं वो खिलाफ विचारधाराओं का स्वागत भी तहे दिल से करते हैं।
1990 में पाकिस्तान में एक फिल्म बनी “इंटरनैशनल गुरिल्ले” जान मुहम्मद निर्देशित इस फिल्म में रूसी फौजों के खिलाफ, इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए कुछ तालिबानी किरदार लड़ाई के लिये निकल पड़ते हैं। लेकिन तब तक रश्दी इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में उभारे जा चुके थे, इसलिये फ़िल्म की कहानी का विलेन उन्हें बना दिया गया। फिल्म में ये रोल अफजाल अहमद ने निभाया। फिल्म पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में जबरदस्त हिट रही लेकिन इत्तेफाक़ से यही पहली पाकिस्तानी फिल्म थी जिसके वीडियो ब्रिटेन में बैन कर दिये गये थे। और हुस्ने-इत्तेफ़ाक़ देखिये कि खुद सलमान रश्दी ने ब्रिटिश सेंसर बोर्ड से अनुरोध करके उसपर लगी रोक को हटवाया था।
सलमान रश्दी अपने खिलाफ उपजे रोष का स्वागत करने के लिये ज़िंदा थे सो ऐसा हो गया। मगर सरदार पटेल और नेहरू अब हमारे बीच नहीं हैं तो कौन है जो कहे कि सहमति और असहमति से परे, जसवंत जी ने जो लिखा वो स्वागत योग्य है। इतिहास के विद्यार्थी जब किसी काल-खंड में पीछे जाकर वापिस लौटते हैं तो हर बार हर कोई उनसे एक अनुरोध ज़रूर करता है कि “पुन: आगमन प्रार्थनीय है...।”

नाज़िम नक़वी

Wednesday, August 26, 2009

पत्रकारिता में गांव या गांव की पत्रकारिता...

पत्रकारिता में गांव, विषय का संदर्भ मन में एक उत्सुकता जगाने के लिये काफी है। किसी के सीने में लगी, आग तो लगी। दिल्ली जैसे शहरों में गांव का विचार नुमाइशी है। किसी महँगे से इलाक़े में मिट्टी से लिपी दीवारों और बांस की सजावट के साथ खाने-पीने की जगहों पर गांव की ख़ुश्बू सूंघते हुए लोग आते हैं और एक मोटे बिल की अदायगी के साथ चले जाते हैं, बस। अक्सर ऐसा भी होता है कि गांव की दूसरी जानकारियां, एक रुपये की बहस में दस पैसे के बराबर आ जाती हैं। शहर और इससे भी दो क़दम आगे मेट्रो-पोलिटिन शहर गांव को किस नज़र से देखते हैं इस पर घंटों बातें की जा सकती हैं, लेकिन क्यों?

मेरी समझ में नहीं आता कि शहर क्यों गांव पर बातें करते हैं? या फिर ये कि सूर्योदय और सूर्यास्त के साथ सोने जागने वाले गांव आख़िर क्यों शहर की और ताकते हैं, जहां रात और दिन का फ़र्क़ ही नहीं रह गया है? दोनों की ज़रूरतें अलग हैं। तौर तरीक़े जुदा हैं। उठना बैठना भिन्न है। “पत्रकारिता में गांव”, किस पत्रकारिता में गांव? शहरी पत्रकारिता क्यों गांव पर बात करके अपना वक़्त ख़राब करती है? उससे कहो शहर पर ही ठीक से कुछ लिख ले, वही बहुत है।

असल में गांव का विकास शहर की सोच से बाहर की बात है। वो नहीं बता सकता कि गांव की बेहतरी के लिए क्या किया जाए? गांव का विकास शहर की तर्ज़ पर न हो सकता है न किया जा सकता है। देश का हर भू-भाग शहर में तो तब्दील नहीं हो सकता। न जाने कब और कैसे शहर को ये ग़लतफ़हमी हो गई कि गांव की बेहतरी के लिए सोचने और कुछ करने का दायित्व उसका है। हो सकता है ये तब हुआ हो जब प्रशासन से बात करने के लिए गांव, शहर के चक्कर लगाने पर मजबूर हुए हों। देश की संसद अगर गांव में होती तो शायद उसे शहर का ये एहसान लेने की भी ज़रूरत न पड़ती। लेकिन वो क्या करें कि उनके नेता चुनाव में जीतते ही शहर भाग जाते हैं। हरिया की जमीन जमींदार ने दाब ली थी और कितने साल उसे अपने नेता के इन आश्वासनों पर ज़िंदा रहना पड़ा था कि “दिल्ली से बात की है, तुम्हारा काम हो जायेगा”, “दिल्ली के कामों में वक़्त तो लगता ही है हरिया..., तुम्हारी तरह बेकार तो बैठी नहीं है दिल्ली” या फिर ये कि “अभी दिल्ली अमरीका गई हुई है, जब लौटेगी तो देखेंगे”।
गांव का विकास ख़ुद गांव को ही करना होगा। आज के दौर में तो ये और भी आसान है। सूचना क्रांति ने जानकारियों पर से शहर की बपौती ख़त्म कर दी है। एक अच्छी बात ये है कि गांवों ने इस दिशा में क़दम उठा लिये हैं, शुरूआत है, है तो सही।

ये अब गांवों को ख़ुद सोचना होगा कि वो कब तक थर्मल पावर के पड़ोस में रहकर भी अंधेरे में टटोल-टटोल कर चलते रहेंगे। रायबरेली, देश की सबसे शक्तिशाली महिला के संसदीय क्षेत्र में लगे थर्मल पावर प्लांट के आस-पास के लगभग सौ गांवों में 19 घंटों की बिजली कटौती उनकी ज़िंदगी का हिस्सा है। सोचिये देश के दूसरे गांव समूहों का क्या हश्र होगा। गांवों के अनगिनत दर्दों में ये ये तो महज़ एक टीस है। घाव देखने और दिखाने की हिम्मत तो अभी आई ही नहीं है। “एक-दो ज़ख्म नहीं सारा बदन है छलनी, दर्द बेचारा परीशां है कहां से उट्ठे”।

पत्रकारिता और साहित्य में गांव नहीं, गांव में साहित्य और पत्रकारिता, विषय होना चाहिये था। गांव को अपना सूचना तंत्र ख़ुद खड़ा करना होगा और प्रशासन से सीधे तौर पर जुड़ना होगा। सरकार और गांव के बीच की हर दूरी स्वंय पाटनी होगी। तकनीक शहर से नहीं आती, पैसे से आती है, ये समझना होगा। अपनी ख़ुदी को ऊंचा कीजिये फिर देखिये दिल्ली में बैठे ज़िल्ले-इलाही कैसे झुक के आपसे पूछेंगे, बताओ हरिया, आप क्या चाहते हो?




अपनी पहली वर्षगांठ पर पाखी पत्रिका ने साहित्य और पत्रकारिता में गांव संगोष्ठी आयोजित करके गांव को याद किया तो सभा के सबसे नौजवान वक्ता पुण्य प्रसून बाजपेयी ने सभा को गांव के मर्म का एहसास कराया। शायद प्रसून ही ऐसा कर सकते थे, क्योंकि वो उस जमात से आते हैं जो कभी शहर आये ही नहीं। उनके गांव में दिल्ली महज़ एक बिंदु का नाम है। प्रस्तुत है पाखी की संगोष्ठी में जो उन्होंने बोला, स्वयं उनकी आवाज़ में –


(यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें)

हिंद युग्म अपनी बैठक में इस चर्चा को और आगे ले जाना चाहता है। क्योंकि हमारा मानना है कि हर दिल एक गांव का नक़्शा है।

Thursday, May 07, 2009

देव का पाकिस्तान

बड़ी मुश्किल से फोन मिला था... पहले बस हेलो... और फिर अगले ही पल “सलाम वाले कुम... भाई कैसे हैं... सब ख़ैरियत... तबियत अच्छी है” जो मैं पूछना चाह रहा था वो पहली ही सांस में दूसरी तरफ़ से पूछा जा रहा था। हम ठीक हैं भाई... मैं तो आपकी ख़ैरियत पूछना चाह रहा था। जो ख़बरें हम तक पहुंच रही हैं वो बेचैन करने वाली हैं। आपका फोन ही नहीं मिल रहा था तो चिंता और बढ़ रही थी। “ नहीं भाईजान मैं बिल्कुल ठीक हूं (हल्की हँसी के साथ) ऐसा कुछ नहीं है... सब सकून में है... सब मंगल कुशल है...”

हमारे सामने फरवरी 2006 का वो दिन आकर खड़ा हो गया जब पहली बार हम इस इंसान से पेशावर में मिले थे, तब हालात आज जैसे नहीं थे। वैसे तो पेशावर का हमारा ये सफर हमारे चैनल की तरफ से भारत-पाक एकदिवसीय मैच के लिये था लेकिन उस रोमांच में रहमान बाबा रोड पर स्थित कांटीनेंटल गेस्ट हाउस के रिसेप्शन काउंटर के पीछे खड़े शख़्स ने और रंग भर दिये थे।

ये वही सरज़मीन थी जहां 1923 में एक पठान बच्चे ने जन्म लिया था। बच्चा बड़ा हुआ तो हिंदुस्तान की धड़कन बन गया। लोग उसे ट्रेजडी किंग कहने लगे। पेशावर का यूसुफ ख़ान बंबई का दिलीप कुमार बन गया। लेकिन आसिफ जावेद की शक्ल में फिर एक ट्रेजडी हमारे सामने थी। आसिफ जावेद (विज़िटिंग कार्ड पर आसिफ कुमार का यही नाम छपा था) ने उस दिन पेशावर में हमारा इस्तेक़बाल नहीं स्वागत किया था। पाकिस्तान कई बार गया था मगर पहली बार एक हिंदू पाकिस्तानी से मुलाक़ात हुई थी, वो भी पेशावर में। अफगानिस्तान की सीमा से लगे इस शहर में हम चार दिन रहे और इन चारों दिनों में हमारे काम की व्यस्तताओं के बाद हमारे रहबर, दोस्त, गाइड, सब कुछ आसिफ भाई ही थे।

मगर इन तीन बरसों में पाकिस्तान ने बरबादियों का एक लंबा सफर तय किया है। आसिफ भाई लाख कहें सब मंगल कुशल है लेकिन हक़ीक़त से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता, और हक़ीक़त ये है कि पाकिस्तान की अवाम पर तालिबानी ख़तरा मौत की तरह मंडरा रहा है। जब वहां का बहुसंख्यक तबका महफूज़ नहीं है तो अल्पसंख्यकों के बारे में फ़िक्र कौन करेगा? पेशावर में सिंध के मुक़ाबले हिंदू परिवार बहुत कम हैं। आसिफ भाई के मुताबिक़ कोई हजार बारह सौ परिवार। और उनके समुदाय के एक एम॰पी॰ किशोर कुमार सहब भी है। “यहां शहर में तो हम ठीक हैं.... हाँ बाजोड़ के आगे जो सिख फैमलीज़ हैं उन्हें बड़ा टार्चर किया हुआ है... काफी लोग तो पंजा साहब आ गये हैं... काफी पंजाब की तरफ निकल आये हैं... हिंदू परिवारों के साथ ऐसा नहीं है न... सिखों का मामला दूसरा है... इनकी तो शिनाख़्त नज़र आ जाती है न...”

यानी ख़तरा है मगर शिनाख़्त न हो पाने की वजह से बचे हुए हैं। जैसे ही हमने ये कहा आसिफ कुमार की आवाज़ में दर्द पैदा हो गया “देखे जी बस... जहां इतने... 16-17 करोड़ अवाम पड़ी हुई हैं वहां हम भी एक कोने में पड़े हुए हैं...जो सबके साथ है वो हमारे साथ भी है...” आसिफ जिस जमात से आते हैं वो पाकिस्तान में सिर्फ तीन प्रतिशत है। इनमें हिंदुओं के साथ सिख और ईसाई भी शामिल हैं। पेशावर के मशहूर रेस्ट्रॉ “हेरिटेज” के खान साहब बताते हैं कि “अकेले पेशावर में सैकड़ों चर्च हैं, कई शहर की महत्वपूर्ण लोकेशंस पर बने हैं। दर्जनों मस्जिदें यहां बमों से उड़ा दी गईं लेकिन कभी किसी चर्च को नुकसान नहीं पहुँचाया गया। न ही किसी मंदिर के बारे में ऐसी खबर मिली। पता नहीं ये कौन लोग हैं जो मस्जिदों को निशाना बना रहे हैं।” ख़ान साहब के दर्द में गुस्सा भी शामिल है। उनका कहना है कि इन आतंकियों का संचालन भी अमरीका कर रहा है और उनके खिलाफ जंग भी अमरीका कर रहा है।

“भाईजान हम सब हैरान हैं यहाँ कि ये कौन लोग हैं। यहाँ की अवाम के सामने सवाल है कि क्या ये हमारी जंग है? ये लड़ाई हमारे शहरों गली-कूचों तक आ गई है। अगर फौजी ऑपरेशन इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब पूरा मुल्क तालिबानियों के कब्ज़े में होगा। हम तो चाहते हैं भाईजान कि हमारे सियासी रहनुमाओं, मज़हबी विद्वानों और समाजी हस्तियों की मदद से इन लड़ाकुओं को बेनक़ाब किया जाय ताकि पूरी कौम उनका चेहरा अच्छी तरह से देख ले। इसके बाद लोगों को भरोसे में लेकर एक भरपूर फौजी आपरेशन कर, दहशतपसंदों को सरेंडर करने पर मजबूर करके, समस्या का सियासी हल निकालने के लिये रास्ता हमवार किया जाय। और जंग में बरबाद हो चुके लोगों की बहाली यूँ की जाय कि वो आतंकी ताकतों की तरफ आकर्षित न हों।”

मैं सोच रहा था कि कितना फर्क़ है अवाम की सोच में, अल्पसंखयकों की सोच में और अमरीकी-पाकिस्तानी हुक्मरानों की सोच में। अवाम के पास जो हल है उसका कोई खरीदार नहीं है, दूसरी तरफ अमरीकी इंस्टीट्यूट ऑफ पीस के रिसर्च फेलो इम्तियाज़ अली के अनुसार पाकिस्तान के टूटने-बिखरने की बातें हो रही हैं। अलक़ायदा, तालिबान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे विषयों के पंडित भविष्यवाणियां कर रहे हैं कि पाकिस्तान टूटने की कगार पर है। यहां तक कि एक नक़्शा भी प्रकाशित किया जा चुका है, जिसमें दिखया गया है कि बलूचिस्तान तथा अफगानिस्तान से लगे पाकिस्तानी इलाकों के निकल जाने के बाद भविष्य का पाकिस्तान कैसा दिखेगा।

पाकिस्तान में तालिबानी ताक़त इस्लामाबाद से सिर्फ़ 60 किलोमीटर पर मौजूद है और ये दूरी लगातार कम होती जा रही है। वाशिंगटन में हिलैरी क्लिंटन पाकिस्तान पर इल्ज़ाम लगा रही हैं कि उसकी सरकार तालिबानियों के लिये रास्ता साफ कर रही है कि वो पूरे मुल्क की हुकूमत अपने हाथ में ले लें। पाकिस्तान के एक वरिष्ठ राजनायिक वाजिद शम्सउल हसन जो ब्रिटेन में राजदूत भी रह चुके हैं, राष्ट्रीय खूफिया परिषद की वैश्विक भविष्य आंकलन की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि 2005 में ही पाकिस्तान पर पड़ने वाले काले साय की पेशिनगोई की जा चुकी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सिविल वार, खूनखराबा, प्रांतीय झगड़े और न्यूक्लियर हथियारों पर कब्ज़ा करने के लिये संघर्ष के चलते, 2015 तक पाकिस्तान एक नाकाम देश की श्रेणी में आ जायगा।

2006 में आसिफ भाई से हमने जानना चाहा था कि क्या आमतौर पर हिंदुओं के नाम ऐसे ही होते हैं जैसा उनका नाम है? उन्होंने हामी भरी थी कि हाँ ऐसे ही नाम हम लोग रखते हैं। “पिछले साल मेरे यहाँ बेटा हुआ है और हमने उसका नाम देव रखा है। ये हमारे परिवार में पहला हिंदू नाम है।” आसिफ भाई का गर्व से फूलता सीना और आंखों की चमक हमारी याद्दाश्त में अभी तक उतनी ही ताज़गी के साथ बसी हैं।

हमारी हिम्मत नहीं हुई कि हम आसिफ कुमार से देव के बारे में कुछ पूछें। हमें इसका एहसास है कि ऐसे सवाल न चाहते हुए भी डर पैदा करते हैं। फिर भी हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका देव अब स्कूल जाने लगा होगा। गुजरता वक़्त उसे बड़ा कर देगा लेकिन ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि किस पाकिस्तान के नक्शे में उसका घर होगा। और शायद ये भी कि कैसा होगा देव के भविष्य का पाकिस्तान?

--नाज़िम नक़वी

Thursday, March 26, 2009

लोकतंत्र से ज़्यादा अहम आईपीएल ???

सवाल ये है कि हम क्यों लिखें और आप क्यों पढ़ें क्योंकि न तो हमारे लिखने से कोई फायदा होने वाला है, न ही आपके पढ़ने से। फिर भी हम लिख रहे हैं और आप पढ़ रहे हैं। इस छोटी सी उम्मीद के साथ कि क्या पता, शायद कुछ बदल जाय।
देश में पहले चरण के इंतेखाबात के लिये अधिसूचना जारी हो चुकी है। यानी होना तो ये चाहिये था कि देश में आम चुनाव का ख़ुमार पूरी तरह से छा जाय लेकिन क्या कीजियेगा इन आईपीएल वालों का कि ये सियासत के खेल में खेल की सियासत को लेकर आ गये हैं। आईपीएल की नुमाइश देश में होगी या देश से बाहर क्या फर्क पड़ता है। अभी तक इस नुमाइश के होने या न होने पर सुरक्षा कारणों को वजह बनाया जा रहा है लेकिन क्या कोई ये बहस भी कर रहा है कि सुरक्षा कारणों के अलावा भी क्या ऐसे समय में आईपीएल होना चाहिये जब देश आम-चुनाव की ज़िम्मेदारियां पूरी करने में लगा हो। चुनाव की तारीखें तय करते वक़्त हमारा चुनाव आयोग भी ये ध्यान रखता कि व्यापक तौर पर न तो परिक्षाएं हो रही हों और न ही हमारा किसान खेती-बाड़ी जैसे न टाले जाने वाले कामों में में लगा हो। तो क्या आईपीएल के आयोजकों को इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये?

सोचिये जो समय राजनीति की सार्थक बहसें करने का है उस वक़्त हमारी जबान पर राजस्थान रॉयल्स, डेयर डेविल्स या शाहरुख़ ख़ान की नाइट राइडर्स की बातें होंगी। आईपीएल देश में हो या देश से बाहर, इससे जो फ़र्ख पड़ेगा उससे भी ज़्यादा गंभीर ये है कि इन सबके बावजूद वो घर-घर में मौजूद रहेगा। रोज़ दो शो होंगे पहला आठ बजे रात और दूसरा दस बजे से। ये वही समय है जब देश की जनता दिनभर की ख़बरें देखती है। जो नये सवाल देश के सामने होते हैं उनपर बहस करने के लिये या राय जानने के लिये हमारे तमाम टीवी चैनल्स नेताओं और संबंधित लोगों को पकड़ कर हमारे सामने लाते हैं। आने वाले दिनों में चुनाव के मद्देनज़र जब इन कार्यक्रमों की हमें बेहद ज़रूरत होगी उस वक़्त हमारे मतदाता जिनमें युवा ज़्यादा हैं, क्रिकेट मैच की रंगीनियों में खोये होंगे। क्रिकेट, ग्लैमर और पैसे की चकाचौंध के बलबूते विज्ञापनों का कारोबार और विज्ञापनों के आधार पर इस नुमाइश की कामयाबी के आगे आम-चुनाव के मुद्दे खो जायेंगे, ऐसी संभावनाओं से इंकार कैसे किया जा सकता है। जो कुछ तय हो रहा है, अगर होगा तो हमारे लोकतंत्र के साथ एक भद्दा मज़ाक होगा जिसके ज़िम्मेदार सितारा हैसियत रखने वाले आईपीएल के यही दावेदार होंगे जो हर कीमत पर इस नुमाइश को आयोजन करवाना चाहते हैं।

होना तो ये चाहिये कि जब देश आम-चुनाव के लिये तैयार हो रहा है, ऐसा कोई आयोजन न हो जो इसकी गंभीरता के साथ खिलवाड़ करे, लेकिन नुमायशी क्रिकेट के कारोबारियों को इन सबसे क्या लेना-देना वो तो कह रहे हैं कि इसबार अगर उन्हें धनलाभ नहीं भी होता है, तो भी वो इसमें अपना पसीना बहायेंगे और हर कीमत पर अपना खेल खेलेंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर आईपीएल के मैच नहीं हो पाते हैं तो करीब एक हजार करोड़ का घाटा होगा।

न्यूज़ चैनल जो पहले ही कटौती के इस माहौल में कम से कम खर्च करने की नीतियां अपनाये हुए हैं, बजाय जमीनी हकीकत पर उतरने के, स्टूडियोज़ में बैठे-बैठे ही चुनावी रस्में अदा करेंगे। चुनावों में क्या हो रहा है और क्या होगा? जैसे सवालों के बजाय दिनभर ये दिखाते रहेंगे कि आईपीएल में क्या हो चुका है और क्या होने जा रहा है। क्योंकि जिन विज्ञापनों के दम पर वो पैसा खर्च करने समाचार जुटाते हैं वो विज्ञापन तो नुमायशी क्रिकेट की चकाचौंध में शामिल होगें। टीआरपी तो वहीं से आयेगी।

हर चीज़ में राजनीति देखने वाले गृह-मंत्रालय की चिंताओं को भी सियासी चश्में से देख रहे हैं। इंडियन प्रीमियर लीग बनाम इंडियन पॉलिटिकल लीग का नया खेल सियासी रंग लेता जा रहा है। लगता है कि आईपीएल, सत्ता और विपक्ष के बीच राजनैतिक लड़ाई का माहौल बनायेगा क्योंकि करीब करीब सभी कांग्रेसी सत्ता वाले राज्य आईपीएल की सुरक्षा से मुंह मोड़ रहे हैं और सारे भाजपा शासित प्रदेश आईपीएल और चुनाव की सुरक्षा एक साथ करने के संकेत दे चुके हैं। “जो सरकार अपने यहां होने वाले खेलों की रक्षा नहीं कर सकती वो देश की रक्षा कैसे करेगी ”, अब इस तरह के भाषण किसी एक मंच के मोहताज नहीं रह जायेंगे। देश के लोकतंत्र से ज़्यादा फ़िक्र लोगों को इस बात की है कि आईपीएल का क्या होगा? सारी दुनिया हम पर थू-थू करेगी कि हम कितने डरपोक हैं। ललित मोदी जो कह रहे थे कि आईपीएल को देश की सुरक्षा एजेंसियों की कोई ज़रूरत नहीं है और वो अपने आयोजन की हिफाज़त ख़ुद कर सकती है, वो अब क्यों दूसरा देश ढूंढ़ रहे हैं, समझ में नहीं आता।

वैसे भी जो खेल हो रहा है उससे क्रिकेट का कितना लेना देना है ये तो उन तस्वीरों से पता चल जाता है जो इन दिनों सुर्खियों में हैं। इनमें क्रिकेटर के बजाय शाहरुख खान, प्रिटि जिंटा, शिल्पा शेट्टी, विजय मालया, ललित मोदी और मिसेज़ मुकेश अंबानी दिखायी पड़ते हैं। इनको देखकर रोमन शासकों की याद आ जाती है जिनके पास ग्लैडिएटर्स होते थे जो अपने मास्टर के लिये जान की बाजी लगा देते थे। यहां गुलामी का अंदाज़ चाहे वैसा न हो लेकिन निलामी तो इनकी भी लगती है। पिछली बार सबसे मंहगी बोली के साथ धोनी 6 करोड़ में बिके थे। इस बार फिंलटाफ और पीटरसन उससे भी ज्यादा, आठ करोड़ में खरीदे गये हैं। 2008 में इस बात से बड़ी राहत मिली थी जब पांच क्रिकेटर्स को आइकॉन कहकर निलाम होने से बचा लिया गया था। इनमें सरताज खिलाड़ी सचिन के साथ-साथ सहवाग, युवराज, गांगुली और द्रविड़ भी थे। शायद इन खिलाड़ियों को इस तरह बिकना मंज़ूर नहीं रहा होगा। आगे ये निलामी क्या-क्या शक्लें बदलेगी, क्या कहा जा सकता है।

ये बहस क्यों नहीं की जा रही है कि देश का लोकतंत्र ज्याद महत्वपूर्ण है या आईपीएल? अगर आईपीएल बाहर भी आयोजित हुआ तो समस्या सिर्फ सुरक्षा की दूर होगी, चुनाव पर जो उसका असर पड़ेगा उसको क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जानबूझकर आईपीएल की तारीखों को चुनाव के समय से टकराया गया है? सवाल ये नहीं है कि कितनी संजीदगी से आम-चुनाव में लोग हिस्सा लेंगे, सवाल ये है कि हम इसके लिये कितना गंभीर माहौल बना रहे हैं?

नाज़िम नक़वी
9811400468

Tuesday, January 13, 2009

वक़्त का तक़ाज़ा भी यही है....

नाज़िम नक़वी फिर हाज़िर हैं...इस बार उन्होंने देश की व्यवस्था पर अपनी कलम चलायी है...वो व्यवस्था जो आज भी सरहदों
पर सियासत करने से बाज़ नहीं आती....अपने देश में दशकों से बस रहे बांग्लादेशियों की दुर्दशा पर पढिए उनका ये आलेख...




“वो बांग्लादेशी हैं और उन्हें बांग्लादेश में रहना चाहिये, इस समस्या को धर्म के आधार पर देखने की कोई ज़रूरत नहीं है...” क़रीब तीस दिन पुराने हमारे नये गृहमंत्री ने दो टूक ये कह दिया तो यकबयक कानों पर यक़ीन नहीं हुआ। सही भी तो है, वक़्त का तक़ाज़ा भी तो यही है। जब अपना घर आफ़तों का परकाला हो गया है तो परोपकार की किसको सूझती है। इतिहास में जाने की ज़रूरत नहीं कि बांग्लादेशी हमारे देश में लगभग तीन दशक पहले कैसे और किन परिस्थितियों में आये। लेकिन आज जब ये पता लगाना मुश्किल होता जा रहा है कि हमपर ख़तरनाक हमलावर हमारे अपने हैं या पड़ोसी तो ऐसे में पहला क़दम यही होना चाहिये कि उन लोगों को देश से निकाल दिया जाय जिनके पास न वीज़ा है न वर्क परमिट। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये काम एक बयान जितना आसान है? पिछले तीन दशकों में अगर एक बांग्लादेशी अवैध रूप से यहां बसा तो आज वो परिवार वाला हो चुका है। इन अवैध लोगों की वैध संतानें किस देश की कहलायेंगी? ये एक दो दिन की बात नहीं है। ये वो अवधि है जब व्यक्ति परिवार में परिवार ख़ानदान में और ख़ानदान जन समूह में बदल जाते हैं।

हैरत इस बात पर है कि आज कांग्रेसी सरकार का गृह मंत्रालय जिसे समस्या मान रहा है उसका जन्म ख़ुद उसकी ही नीतियों की कोख से हुआ है। 1983 में इंदिरा गांधी द्वारा एक क़ानून (आईएमडीटी एक्ट) की स्थापना की गई ताकि बांग्लादेशी प्रवासियों को असमी विद्रोह से बचाया जा सके। इस क़ानू के तहत शिकायतकर्ता को 10 रपये का एक फ़ार्म भरकर शिकायत दर्ज करानी होती थी। फिर वो शिकायत अगर सही पाई गई तो अवकाश प्राप्त जजों के उस ट्रिब्यूनल के पास जाती थी जो ये फ़ैसला कर सकते थे कि अमुक व्यक्ति को वापिस भेजा जाय या नहीं। दूसरी तरफ़ जिसके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज की गई है उसे सिर्फ़ अपने नाम का राशन कार्ड दिखाना होता था। इस कानून के बाद वही हुआ, राशन कार्ड बनाने वाले भगवान हो गये। इससे भी रोचक ये कि 2005 में इस कानून पर देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि “अवैध प्रवासी नागरिकों को पहचानने और उन्हें उनके देश भेजने की प्रक्रिया में ये कानून सबसे बड़ी अड़चन है।” इस देश में किसी भी चीज़, यहां तक की क़ानून, को सही और ग़लत साबित करने में 22 साल लग जाते हैं। जैसा कि इस एक्ट के साथ हुआ। इन बाइस वर्षों में क्या से क्या हो जाता है इसे बताने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिये।

अगर इस दशकों पुरानी समस्या का सामधान इतना आसान नहीं है तो फिर एक कांग्रेसी गृहमंत्री का ये बयान कैसे गैर-सियासी हो सकता है। सियासी तौर पर तो ये भाजपा का मुद्दा रहा है और उसने जब-तब इसे उठाया भी। 2003 के पहले सप्ताह में आंतरिक सुरक्षा के लिये ख़तरा बन चुके लगभग दो करोड़ बांग्लादेशियों को वापिस उनके देश भेजने की घोषणा करते हुए अडवाणी जी ने तो इस अभियान की तारीख भी अप्रैल 2003, तय कर दी थी। फिर पता नहीं क्यों ये अभियान शुरू नहीं हो सका। शायद फ़ील गुड के फ़ील बैड में बदल जाने का अंदेशा रहा हो। उस समय अडवाणी ने भी यही कहा था कि इतनी बड़ी तादाद में ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से रह रहे लोग दुश्मन देशों के एजेंट भी हो सकते हैं और आज यही ख़तरा चिदंबरम को भी है। उस समय के उप प्रधानमंत्री ने भी भारत के नागरिकों के लिए पहचान पत्र जारी किए जाने की बात कही थी, आज नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) बनाने की वही बात गृहमंत्री भी कर रहे हैं।

अब ये सवाल उठाना बेमानी है कि आख़िर अभी तक हम इस समस्या से क्यों नहीं निपट पाये। किसे नहीं मालूम कि हूजी जैसे आतंकवादी संगठन बनाने वाले कौन हैं, आईएसआई, हूजी और असम के अलगाववादी गुटों का तालमेल किससे छुपा हुआ है, ये बांग्लादेशी किसका वोट बैंक हैं। ऐसे में क्या नहीं हो पाया इसपर कोई सवाल कैसे किया जा सकता है। हां ये सवाल ज़रूर उठता है कि आज इस सवाल के पीछे कौन सा गणित काम कर रहा है। आ़ज कांग्रेस को ये वोट बैंक बेमानी लग रहा है तो क्यों? गृहमंत्री पूरी लगन के साथ अपने पांच महीनों के इस छोटे से टारगेट पर काम कर रहे हैं ये सबको नज़र आ रहा है। मंत्रालय में बड़े बड़े अफ़सर देर रात तक फ़ाइलों से घिरे हुए देखे जा सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियां हों या ख़ूफ़िया तंत्र सबको ज़िम्मेदारी ओढ़ने वाले सिस्टम के अंतर्गत लाया जा रहा है। फलां काम 15 जनवरी तक और फलां काम 20 जनवरी तक पूरा हो जाना चाहिये, ऐसे निर्देश आम हो गये हैं। लेकिन ये भी सच है कि चुनाव के नज़दीक चुनाव की तैय्यारियां भी इसी समय ही करनी हैं। सहयोगियों को साथ लाना है लेकिन राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को भी ठिकाने लगाना है। हम जनप्रतिनिधि हैं और जनता के प्रति हमारी जवाबदेही है ये जुम्ले चुनावी मौसम के जुम्ले हैं जो इधर-उधर सुनाई पड़ने लगे हैं।

अगले चुनाव की रणनीति कांग्रेसी आंखों से देखिये तो असम से उसे ज़्यादा उम्मीद नहीं है। त्रिपुरा और वेस्ट बंगाल में उसका जनाधार पहले से ही खिसका हुआ है। यही वो इलाक़े हैं जहां बांग्लादेशी वोट बैंक के मायने हैं। कल तक वामपंथी उसके साथ थे तो उसे बांग्लादेशी घुसपैठ को नज़रअंदाज़ करना पड़ता था। आज वामपंथी हर मोड़ पर उसके ख़िलाफ़ खड़े हैं। संसद में उनके परम विरोधी तो वही हैं, भजपा से भी ज़्यादा। दूसरी अहम बात ये कि आंतरिक सुरक्षा की बात उठाते हुए भाजपा सरकार का घेराव इन्हीं बांग्लादेशियों के नाम पर कर सकती थी तो उसे पहले ही उठाकर कांग्रेस ने उसका ये कार्ड एक तरह से छीनने का प्रयास किया है। वैसे भी विरोध के लिये मुद्दों की तलाश में भाजपा हाथ-पैर मार रही है।

हम जैसे हैं सब कुछ वैसा होता है। हमारे देश में किसी समस्या से निपटने का हमारा तरीका क्या है इसे बांग्लादेशी समस्या के आइने में देखा जाना चाहिये। ये उसी देश में संभव है जहां “देर आये- दुरुस्त आये” या “भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है”
जैसे मुहावरे जीने का आधार हों। हमें भगवान के न्याय पर भरोसा है तो हमारे सारे प्रश्न भी उसी के दरबार में जाते हैं। हम जब चाहते हैं उसे कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और उसके ख़िलाफ़ उसी के फ़ैसले का इंतेज़ार करते हैं। ऐसे में मिनिस्टर फिनिस्टर, मंत्रालय-वंत्रालय या कानून फानून की क्या औकात जो हमारे दर्द को कम कर सके।

-नाज़िम नक़वी

Sunday, January 04, 2009

यक़ीन पर कैसे यक़ीन करें...

मेरे पास रिश्वत खिलाने के लिये पैसे नहीं हैं और इस पर से अब मेरा यक़ीन उठ चुका है कि बग़ैर रिश्वत खिलाये मेरा काम हो पायेगा। दिल्ली में नेताओं के चक्कर काट रहे मेरे गांव से आये एक क़रीबी मिलने वाले ने जब मुझसे ये कहा तो मैं सोच में पड़ गया। वो देश की राजधानी में खड़ा था। एक ऐसे ज़िले से आया हुआ था जिसे फ़िलहाल बहुत असरदार ज़िला माना जा सकता है, रायबरेली। फिर भी उसका भरोसा हिला हुआ था।

अमरीकी वित्तीय संकट पर प्रेज़ीडेंट इन वेटिंग ओबामा ने पिछले दिनों एनबीसी के कार्यक्रम – मीट द प्रेस – में बोलते हुए कहा कि “अमरीकियों को एक बेहतर कल से पहले अभी और मुश्किलों से गुज़रना होगा और हमें यक़ीन है कि हम ऐसा ज़रूर कर पाएंगे क्योंकि इतिहास गवाह है कि मुश्किलों से उबरना हमारा राष्ट्रीय चरित्र रहा है, वो राष्ट्रीय चरित्र जो हमेशा आशावादी जज़्बे से भरा रहता है, जो हमेशा आगे देखना चाहता है इस यक़ीन के साथ कि बेहतर दिन ज़रूर आयेंगे।”

दरअसल कोई देश हो या व्यक्ति विशेष, भविष्य का आधार वो किसी न किसी यक़ीन पर ही रखता है और उसी के सहारे वर्तमान को भोगता है। ये एहसास तब और ज़रूरी हो जाता है जब किसी मुश्किल के दौर से गुज़रना हो। लेकिन जब हम ख़ुद यही सवाल करते हैं कि क्या भरोसा है? तो जवाब में एक न ख़त्म होने वाली ख़ामोशी से सामना करना पड़ता है और जब अपने चारों तरफ़ देखते हैं तो ये ख़ामोशी सन्नाटे में बदल जाती है। शायद हमारी सबसे बड़ी मुश्किल ही ये है कि हमारे यक़ीन की मौत हो गई है। हमें अब किसी चीज़ पर यक़ीन नहीं आता। कभी यक़ीन था, अब नहीं है। नौकरी रह पायेगी? मालूम नहीं। नौकरी मिल जायेगी? कौन जाने। वक़्त बदलेगा? किसे ख़बर। दर्द कम होगा? क्या पता।

टूट चुके भरोसे की ये मिसालें तो आम-आदमी से जुड़ी हुई हैं। अब आइये देश के दीवाने ख़ास में शिकस्ता यक़ीन का चेहरा कैसा है, ये देखते हैं। 26/11 को ताज में आतंकवादियों के घुस जाने के बाद जिस तेज़ी से कार्यवाही होनी चाहिये थी वो नहीं हो पाई जिसकी वजह से सुरक्षा व्यवस्था पर से समूह के प्रमुख रातन टाटा का भरोसा उठ चुका है और उन्होंने घोषणा कर दी है कि अब वो बाहरी विशेषज्ञों की मदद से अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ख़ुद उठायेंगे। रतन टाटा की मजबूरियों को समझा जा सकता है क्योंकि सेवा उद्योग तो भरोसे पर ही फलता फूलता है।

दूर क्यों जाते हैं ख़ुद से पूछिये, आपको अपनी पुलिस पर भरोसा है? रिश्वत लेते बाबुओं पर भरोसा है? दुकान बन चुके अस्पतालों और दवाओं पर भरोसा है? खाने-पीने के सामानों पर भरोसा है? अपने नेताओं पर भरोसा है? धर्म के ठेकेदारों पर भरोसा है? आपको क्या जवाब मिला? अब ये हमारी आदत का हिस्सा बन चुका है कि जो कुछ हमारे सामने है उसके पीछे देखने की कोशिश हम पहले करते हैं क्योंकि हमें भरोसा नहीं है कि हम जो कुछ देख रहे हैं वो वही है जो हम देख रहे हैं। हो सकता है कि सामने जो कुछ है वो सच हो लेकिन यक़ीन के साथ ये कह पाना नामुमकिन सा हो गया है।

जवाबदारी लोग भूल चुके हैं। लगाव की ज़बान उन्हें बेतुक की लगती है। चकर-मकर इस दुनिया में लोग जानते ही नहीं कि किसी चीज़ में पूरी तरह डूब जाने का अर्थ क्या होता है। और जब ऐसे हालत में किसी संकट से दो-चार होना पड़ता है तो बस जो कुछ सामने पड़ता है उसी पर इल्ज़ामों का ठीकरा फोड़ डालना ही एक अदद चारा नज़र आता है। दुनिया की बातें छोड़िये आपको अपने किये पर यक़ीन है? बड़ी संभावनाएं हैं कि आप “नहीं” कह दें। और इस नहीं पर आपको शर्मिंदा होने की भी कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि आप जो कुछ करते हैं उसमें आपका वो परिवेश भी हिस्सेदार है जिसके बीच आप रहते हैं, चारों तरफ़ से आपके भरोसे का अपहरण हो रहा है, ऐसे में ख़ुद पर यक़ीन कर पाना आपके बस में भी तो नहीं है।

जो कुछ दिख रहा है उसे ख़ारिज करते चलो। ख़ारिज करने के इस दौर में जब हम नेताओं को, नौकरशाही को और देश की सुरक्षा व्यवस्था को सिरे से ख़ारिज कर रहे हैं हमें ये भी देखना चाहिये कि हमारे पास विकल्प क्या है। इसलिये की ख़ारिज करना तो हमेशा बहुत आसान होता है लेकिन ख़ारिज कर देने के बाद बचे हुए शून्य में ख़ुद को खड़ा करना और भी ख़तरनाक है अगर ये महज़ लफ़्फ़ाज़ी नहीं है तो। “द सेवन हैबिट्स ऑफ़ हायली इफ़ेक्टिव पीपुल” के लेखक स्टीफ़न कवी का कहना है कि जब भरोसा ज़्यादा होता है तो रफ़्तार और उत्पादकता बढ़ जाती है। जब भरोसा कम हो तो उन्हीं चीज़ों में ख़तरनाक गिरावट आ जाती है। आपके सामने एक दान पात्र रखा है। उसपे लिखी इबारत आपसे अंशदान का अनुरोध कर रही है। इस दान से यतीम बच्चों का या रोगियों का भला होगा। आपके पास दल रुपये का नोट भी है जिसके न होने से आपका कोई नुक़सान नहीं होने वाला। लेकिन हज़ारों रुपये फूंककर शापिंग का मज़ा लेने वालों को यक़ीन ही नहीं है कि उनके मात्र दस रुपये सही काम में लगेंगे। और इस बेयक़ीनी की वजह से दानपात्र भीड़ में अकेला पड़ा रहता है। अगर यक़ीन आ जाय तो फिर एसे अनुरोधों को कहीं और भटकने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। यक़ीन इस अंशदान को अरबों खरबों में बदल सकता है लेकिन क्या करें कमबख़्त यक़ीन नहीं है।
समय की अक्कासी करते हुए बिहार के शहंशाह आलम की कविता ‘डराता है ये समय’ कितनी तर्कसंगत लगती है - आग का दरिया है मेरे यार, अपना यह समय, सपने में आते हैं भयानक डायनासोर , नहीं पढ़ा हमने कोई ऐसा विज्ञापन न देखा, जिसमें गारंटी दी गई हो पुरसुकून समय की… कुछ समय पहले महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रेनुका चौधरी ने ये कहकर कि भारतीय पुरुष भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं एक नये अविश्वास का उदधाटन कर दिया था। ज़ाहिर है कि रेनुका जी औरतों के हक़ में ये बात कह रही थीं और विषय था एचआईवी संक्रमण की रोकथाम। लेकिन बात तो उसी बे-यक़ीनी की है जिसपर हम आंसू बहा रहे हैं।
लेकिन यही बे-यक़ीनी ही एक नये यक़ीन की शुरूआत भी हुआ करती है। हमारे हरदिल अज़ीज़ ज़मीर भाई ने हमारे इन आसुओं को पोछते हुए कहा। कहने लगे राजस्थान के बलवंतपुरा चेलासी के लोगों की चरफ़ देखो। उन्हें जब ये यक़ीन हो गया कि उनकी कोई सुध नही लेगा तो गांववालों ने ख़ुद ही रेलवे स्टेशन बना लिया। बे-यक़ीनी ने सामुहिकता का जो जज़्बा एक गांव को दिया वो अपने देश में आ जाय तो क्या बात है।
लेकिन फ़िलहाल हालात ये हैं कि चारों तरफ़ माहौल बेयक़ीनी का है। और इंतेहा तो ये है कि आतंकवाद के इस दौर में मौत पर से भी लोगों का यक़ीन उठता जा रहा है। और अगर कभी ज़िदा दिखने वाले इंसान से पूछ बैठिये कि भाई साहब जीना तो बस इसे ही कहते हैं तो जवाब मिलता है ये भी कोई जीना है लल्लू।

---नाज़िम नक़वी

Thursday, January 01, 2009

एक जनवरी ऐसी भी....

नाज़िम नक़वी ने बैठक पर एक मेल किया...लगा, नये साल का संदेश होगा....मगर मेल में एक तसवीर थी...मोबाईल से ली गयी है....थोड़ी धुंधली है..मगर,नये साल को अलग ढंग से मनाने के लिए बैठक पर हमें ये तसवीर छापना मुनासिब लगा....आप भी देखें
संपादक




पूरी दुनिया नये साल की तैयारियों में मस्त
कंपकंपा देने वाली ठंड में
कोट, स्वेटर और मफलरों में समाये हुए लोग
उसी शाम राजधानी का एक सड़क पर
धूल भरी ज़िंदगी को खिलौना बनाने में व्यस्त
ये भी हमारा ही भविष्य है...
नाज़िम

अगर आप भी तसवीरों के ज़रिये बैठक से जुड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है.....अपने कैमरे से कोई भी तसवीर कैद करें और भेज दें baithak.hindyugm@gmail.com पर....ध्यान रखें, तसवीरें समाज के किसी भी पहलू पर कुछ बोलती भी हों....
संपादक

Tuesday, December 09, 2008

क्या ये पहली बार हुआ है?

नाज़िम नक़वी की कलम से आप सब परिचित हैं....मुंबई की घटना के बाद इन्होंने हिंदयुग्म को फोन किया और कहा कि अवाम की ये आग इस बार बुझनी नहीं चाहिए.....उन्होंने हिंदयुग्म पर लगातार प्रकाशित हो रहे काव्यात्मक आक्रोशों को भी ख़ुद से जोड़ा.....चूंकि अब वो हमारे सदस्य भी हैं तो दैनिक भास्कर में छपा ये लेख हिंदयुग्म के पाठकों के लिए भी लाज़मी हो जाता है ताकि जो आतंक के खिलाफ जो अलख इस बार जगी है, उसकी लौ बुझने ना पाए....आमीन.....



कार्टूनः मनु बे-तक्खल्लुस
पहली बार मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद दर्द की जो लहर पूरे देश में है वो देशवासियों के लिये ख़ुशी का पर्याय बन गई है। क्योंकि पहली बार ऐसा हो रहा है कि देश की सुरक्षा में पैदा ख़ामियों पर ग़ुस्सा फूट रहा है। देश के नेताओं को गालियां पड़ रही हैं। ये गुस्सा और ये गालियां नई नहीं हैं। विदर्भ के किसानों की शव यात्राओं में भी ये दोनों बिंब हज़ारों बार दिखाई दिये। गुजरात के दंगों में भी इनसे हमारा साक्षात्कार हुआ लेकिन इनमें वो पैनापन नहीं था। बात भी ठीक है क्योंकि सबसे अहम तो ये है कि गालियां देने वाला है कौन? जी हां इसबार ये गालियां अति विशिष्ट लोगों के मुंह से निकल रही हैं। इस बार ग़ुस्सा उन चेहरों पर है जिन्हें नाराज़ होने का हक़ है। क्योंकि अब तो वो असुरक्षित महसूस कर रहे हैं जिन्हें सुबह से शाम तक सुरक्षा के घेरों में रहने की आदत हैं।
पहली बार ऐसा हुआ है कि आलीशान लोगों की शान में ग़ुस्ताख़ी हुई है। ये वो लोग हैं जिनके लिये संविधान बना, जिनके लिये जल, थल और वायुसेना का गठन हुआ, प्रशासन के तमाम महकमे जिनकी सुविधाओं के लिये पैदा किये गये। ग़ुस्सा इसी बात का है कि फिर इस पूरे ताम-झाम का क्या मतलब है? जब ये उसी चीज़ की गारंटी नहीं दे सकता जिसके लिये इसे पैदा किया गया। मौलिक लोगों के स्वाभाविक अधिकारों का हनन हुआ है इस बार। अब ये बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, ये एलान हो चुका है। हमारी ज़मीन का आसमान हिल गया है। सितारे गर्दिश में हैं। देश की अस्सी प्रतिशत जनता तो पहले भी महफ़ूज़ नहीं थी लेकिन इन हमलों के बाद पहली बार लग रहा है कि देश महफ़ूज़ नहीं है।
पहली बार देश में सार्थक बहस चल पड़ी है कि जिन लोगों को सत्ता सौंपी गई वो इस क़ाबिल ही नहीं हैं कि इसे चला सकें। कोई और मौक़ा होता तो आलीशान लोगों के इन विचारों को वर्तमान सरकार की अक्षमता से जोड़ दिया जाता लेकिन इस बार गालियों के दायरे में हर नेता खड़ा है, क्या माकपा और क्या आरएसएस। और मज़े की बात ये है कि अलग-अलग नस्ल के ये नेता भी अपने ऊपर होने वाले इन हमलों के बाद संगठित होकर अपनी सफ़ाई देने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। किसी को लगता है कि भावनाएं सही थीं लेकिन शब्दों का चयन ठीक नहीं था तो कोई अपने नेता को संयम बरतने की नाकाम सलाह दे रहा है। नेता लोग भी गालियों पर तिलमिला जाते हैं ये देशवासियों ने पहली बार महसूस किया है।
पहली बार ऐसा हुआ है कि आतंक का हमला उन ऐवानों पर हुआ है जिनके दरो-दीवार से देवानंदों, फ़रीद ज़करियाओं और राजदीप सरदेसाईयों की यादें चस्पां हैं तो इसके मायनें भी अलग हैं। खैरलांजी के आदिवासियों और विदर्भ के किसानों की यादों में और इन ख़ास लोगों की यादों में कोई न कोई तो फ़र्क़ है ही। साउथ मुंबई और कोलाबा जैसे सुरक्षित इलाक़े भी अब ख़ौफ़ की बाहों में हैं। आतंकवाद जबतक देश में था और सीरियल ब्लास्ट के शक्ल में, ट्रेन ब्लास्ट की सूरत में, हैदराबाद और अक्षरधाम के रूप में, दिल्ली – जयपुर – मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस के चेहरों से झलक रहा था तब तक ये सिर्फ़ अफ़सोसनाक था, एक बुरी ख़बर था, मसरूफ़ लोगों के विशिष्ठ कामों में ख़लल डालने जैसा था लेकिन अब देश के असरदार लोगों को पहली बार महसूस हो रहा है कि आतंकवाद तो उनके घर तक पहुंच गया है।
अब ये ख़ास लोग देश के नेताओं से, हुक्मरानों से ये पूछते हुए दिखाई दे रहे हैं कि–
क्या है हमारे सब्र की मंज़िल बताइये।
वो लोग तो हमारे मकां तक पहुंच गये।।
सिर्फ़ मुंबई ही नहीं, पहले भी हादसों से देश के कई हिस्से लहूलुहान हुए हैं, लेकिन पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि हमारे नेताओं की क़ाबिलियत पर, नौकरशाही पर और पुलिसिया निज़ाम पर इतने तीखे प्रहार किये गये हों। देश के हुक्मरान और नोकरशाही तो पहले भी अक्षम थे, अपनी याददाश्त पर जोर डालिये तो पूर्व में हुए हर हमले के बाद ज़ख़्मी शहरों के दोबारा उठ खड़े होने की हिम्मत को सलाम किया जाता रहा है और इसी बुनियाद पर ये बताने की पुरज़ोर कोशिश होती रही है कि आतंकवादी अपने नापाक हौसलों में कभी भी कामयाब नहीं हो पायेंगे। लेकिन 26/11 की बात ही कुछ और है, इस हमले में पहली बार आतंकवादी अपने मंसूबों में न सिर्फ़ कामयाब हो गये हैं बल्कि नेता नाक़ाबिल, नौकरशाही बेढंगी और पुलिस तंत्र अशक्त हो चुका है।
ये बात अलग है कि मुंबई हादसे में बांबे वीटी और चौपाटी पर कीड़ों की तरह गोलियों का शिकार हुए लोग सुर्ख़ियों में नहीं हैं फिर भी देशवासियों के लिये ये सुकून की बात है कि पहली बार ज़ख़्म छुपाये नहीं जा रहे हैं, चीख़ें घोंटी नहीं जा रही हैं, आंसू रोके नहीं जा रहे हैं।
ज़ख़्म अभी गहरा है, मुंबई के नारीमन हाउस, ताज और ओबरॉय होटल्स का ख़ून अभी ताज़ा है इसलिये इनसे जुड़ा हुआ ग़म और ग़ुस्सा भी अभी थमा नहीं है। जो लोग पहले से ही असुरक्षित थे वो इन नये असुरक्षितों के साथ तो स्वाभाविक रूप से शामिल हैं ही और उन्हें लग भी रहा है कि शायद (यक़ीन नहीं है) इस बार देश आतंक की इस महामारी से निपटने के लिये कोई पुख़्ता और कारगर क़दम उठाये। एक फेडेरल एजेंसी बनाने की बात भी हो रही है। हर उस देशवासी के लिये ये ख़बरें ख़ुशी की सौग़ात हैं जिनकी आंखों के आंसू भी अब सूख चुके हैं।
मुंबई हादसे के बाद देश कई चीज़ें पहली बार महसूस कर रहा है। और पहली बार उसे ये समझने में भी कोई दिक़्क़त नहीं हो रही है कि हर ख़ून एक जैसा नहीं होता, दर्द की भी अलग-अलग मर्यादाएं होती हैं, हर चीख़ का पैमाना एक नहीं होता, हर आंख से निकलने वाले पानी को आंसू की संज्ञा नहीं दी जा सकती। 24 साल पहले जब किस ने कहा था कि " जब कोई कद्दावर पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है" तो हमने एक स्वर में उसे नकारा था। लेकिन अब पहली बार उसकी प्रधानता को मानना पड़ेगा और इसी बुनियाद पर पहली बार ये संभावनाएं भी ताक़त पा रही हैं कि देर सवेर हमारा ग़म और तुम्हारा ग़म की सरहदें भी खिंचेंगी।


नाज़िम नक़वी
naqvinazim@yahoo.com

दैनिक भास्कर से साभार