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Tuesday, July 06, 2010

धोनी संग साक्षी : DOGS & MEDIA NOT ALLOWED !

ज़रा सोचिए, अगर महेंद्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट में अपनी जगह नहीं बना पाते और झारखंड के ही मैदानों पर चौके-छक्के लगा रहे होते। फिर, उनकी उम्र 29 साल की होती और वो शादी कर रहे होते। तो एक कैमरामैन लड़केवालों की तरफ से और एक लड़कीवालों की तरफ से भाड़े पर मंगाया जाता। ये तो नहीं होता कि देश के सबसे अच्छे कैमरे और सबसे बुद्धिमान होने का भ्रम पाले मीडिया वाले मुफ्त में धोनी की शादी पर खर्च हो रहे होते। मगर, ऐसा हुआ और हमें ताज्जुब इसलिए नहीं हुआ कि मीडिया की ऐसी दीवानगी पहली बार नहीं थी....सानिया-शोएब की शादी भी मीडिया के लिए कूदने-फांदने का ऐतिहासिक दिन था...ऐसे जैसे भारत और पाकिस्तान दोस्ती के सात फेरे लेने जा रहे हों...इसी बीच दंतेवाड़ा में 76 जवान मारे गए, मगर सानिया-शोएब की खबर टीवी के पर्दों पर ज़्यादा ज़रूरी बनी रही....
खैर, धोनी की शादी पर लौटते हैं.... ज़ी न्यूज़(इसी के एक छोटे-से हिस्से में मैं भी नौकरी करता हूं...) भी बाक़ी चैनलों की तरह शादी के मंडप से कोसों दूर कैमरा टिकाए इंतज़ार में था कि कब क्या ब्रेकिंग न्यूज़ मिल जाए......देहरादून में हमारे रणबांकुरे साथी और नोएडा के न्यूज़रूम में हम....देहरादून से नोएडा सिग्नल पर मिल रहे वीडियो में कोई भी गाड़ी दिखती तो लगता ये साक्षी होगी, ये साक्षी की अम्मा होगी...और न जाने क्या-क्या....इतनी बारीकी से तो मैंने कभी किसी शादी में हिस्सा नहीं लिया....
खैर, हमारी एक रिपोर्टर ने तो उस घोड़ी का 'जायज़ा' ले लिया जिस पर धोनी सवार होने वाले थे....इतना उत्साह था रिपोर्टर में कि दर्शक अपने भोलेपन में ये तक समझ लें कि धोनी की शादी इसी घोड़ी से हो रही है! और तो और, हमारी एक एंकर ने शादी पर विशेष बुलेटिन के लिए खास तौर पर एक लाल रंग का लहंगा पहन लिया था ...ऐसा लग रहा था कि वहां देहरादून में बारात निकलेगी और यहां हम नाच उठेंगे...
सबसे मज़ेदार था पसीने से लथपथ घोड़ीवाले का 'एक्सक्लूज़िव' इंटरव्यू जो हर चैनल पर चल रहा था....घोड़ीवाला ही मीडियावालों के लिए सबसे विश्वस्त सूत्र था कि धोनी ने क्या पहना, भज्जी ने कितना नाचा और खाने में क्या-क्या था वगैरह-वगैरह....बेचारा घोड़ीवाला इतने सारे कैमरे एक साथ अपने मुंह पर देखकर राहत की सांस ज़रूर ले रहा होगा कि उसके सामने उससे भी 'बेचारे' कितने लोग हैं...
एनडीटीवी के रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग पर पहले ही लिख दिया है कि उन्हें आदर्शवादी होकर टीवी के गिरते स्तर पर मर्सिया पढ़ने वाला पत्रकार न समझा जाए....नहीं समझेंगे जी, बस कुछ सलाह और दे दें ताकि आने वाले समय में शादियों की कवरेज में पत्रकारों को टीवी पर मंडप बनाने में और आसानी हो जाए.... सलाह नंबर एक... हो सकता है कि मीडिया चैनल कुछ बड़ी हस्तियों के शादी के ऑर्डर अभी से ही बुक कर लें....जैसे, राहुल गांधी, युवराज सिंह, भज्जी और 'प्रिंस' (गड्ढे में गिरने वाला महान बालक)....फिर इन्हीं चैनलों के ज़िम्मे कैटरिंग का सारा ज़िम्मा हो...पत्तलें बांटने से लेकर पत्तले उठाने तक का...शॉट्स की दिक्कत ही नहीं आएगी साहब...बड़े-बड़े एंकर बड़े-बड़े लोगों की पत्तले उठाएं...वाह! देश की सबसे बड़ी शादी....सबसे बड़ी कवरेज.....सबसे बड़ा पंडाल....हम सबसे बड़े युग में जी रहे हैं....वाह!
सलाह नं दो... शादी के सारे छोटे-बड़े काम छोटे-बड़े चैनल्स आपस में बांट लें...मसलन, पंडित जी को लाने-ले जाने का ज़िम्मा किसी एक चैनल को.....जनवासे (जहां बारात ठहरती है) का इंतज़ाम किसी और चैनल को....न्योता (वो लिफाफा या तहफा जो शादी में आने वाले मेहमान लेकर आते हैं) लिखने का काम किसी और चैनल को...हां, मंगल गीत वगैरह गाने का काम किसी एफएम चैनल को भी सौंपा जा सकता है.....
मेरी बड़ी दीदी की शादी हुई थी तो दस-पंद्रह दिन बाद शादी की कैसेट बनकर आई थी...अलग-अलग फिल्मी गानों और पहाड़-समुंदर वाले लोकेशन्स पर उड़-उड़कर दीदी और जीजाजी की तस्वीरें आती थीं और हम रोमांचित होते थे....मैं दसवीं में पढ़ता था तब....अब एमए पास हूं...नौकरी भी करने लगा हूं...मगर, काम वही शादी के वीडियो बनाने का ही रहा...देहरादून से दूर जहां ये शादी हो रही थी, दूर-दूर तक मीडिया के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी....कैमरे पर भूख-प्यास से बेहाल रिपोर्टर ऐसे जंगल में खड़े लग रहे थे कि दंतेवाड़ा से कवरेज कर रहे हों...फिर भी कवरेज किए जा रहे थे...कोई चैनल बता रहा था कि धोनी ने गोल्डन शेरवानी पहनी थी, किसी ने कहा भूरी शेरवानी पहनी थी...सबको रतौंधी हो गई थी...जिसे जो दिखा, अपने-अपने चैनल को बता दिया...देश अलग-अलग शेरवानी में धोनी की शादी देख रहा था...जैसे धोनी धोनी न रहे हों, धोनी शिव का अवतार हो गए हों....देहरादून की पहाड़ियां कैलाश हों और साक्षी साक्षात पार्वती....मीडिया वाले भूत-बेताल बनकर नाच रहे थे और कोई खाने तक को नहीं पूछ रहा था....
खाने से एक और खबर याद आई जो इस दिन हल्के में कहीं-कहीं चल रही थी....हमारे प्रधानमंत्री 3 जुलाई को आईआईटी कानपुर गए थे तो उनके खाने में 26 व्यंजनों में मिलावट पाई गई थी ! ऐसे-ऐसे ज़हरीले केमिकल पाए गए कि मुझे नाम ही समझ नहीं आ रहे थे....मगर, प्रधानमंत्री की किसी को फिक्र नहीं थी.....अजी, इस देश में खाने में मिलावट कोई खबर है क्या....पीएम ने पहली बार खाया तो क्या हो गया...धोनी रोज़-रोज़ थोड़े ही शादी करेगा....मीडिया को नहीं बुलाया, न सही....जाना तो ज़रूरी है...बिन बुलाए पहुंचने का मजा ही कुछ और है...

निखिल आनंद गिरि
(फोटो : बीबीसी से साभार)

Saturday, September 12, 2009

फूहड़ चुटकलों से कितनी देर हंस पाएगा आम दर्शक?


कई दिन से इक अजीब-सी उधेड़बुन में हूँ, कि ये किस तरह कि फिल्में बन रही हैं, ना कहानी, ना पटकथा, ना ही कोई ढंग का संगीत, गीत के तो क्या कहने, फिर भी लोग देख रहे हैं, पसंद कर रहे हैं, और इक तरफ जो अच्छी फिल्में बन रही हैं उन्हें कोई घास भी नहीं डालता.. बल्कि अब तो इक नया चलन चला है, फिल्में सीधा डीवीडी से बाज़ार में उतरने का. चलो ये भी ठीक ही है, कम से कम फालतू के खर्चे से तो बचे, और जो कमाया, कुछ जरुरी खर्चों के बाद, सीधा जेब में, लेकिन इक बात जो इन सब की आपाधापी में समझ नहीं आती वो ये है कि आज दर्शक देखना क्या चाहता हैं.
चटपटी फिल्में, डेली सो़प, कॉमेडी या कुछ और.. और जैसे रियलिटी शो...
कमाल की बात है, लोग कहते हैं व्यस्तता बढ़ गई है, इस लिए डेली सो़प देखने का मन नहीं करता, कौन कहानी के चक्कर में पड़े, कॉमेडी भली है, इक बार में ख़त्म तो हो जाती है, पर कोई ये पूछे कि अगर इक बार में ख़त्म हो जाती है तो फिनाले के इन्तेज़ार में काहे को रहते हो भैया, और कॉमेडी भी किस तरह की, कॉमेडी के नाम पर बेहूदा मज़ाक हो रहा है, आज इक कॉमेडी शो चल रहा था, जिसमें मज़ाक हो रहा था की जनाब का पेट खराब है और वो अपनी प्रेमिका का दरवाजा खटका रहे हैं की प्रिय दरवाज़ा खोल दो वरना मेरी पतलून खराब हो जायेगी. अब कहिये ये किस तरह का बेहूदा मज़ाक है.
फिल्में भी तीन घंटे में ख़त्म हो जाती हैं, पर ऐसे कितने प्रतिशत लोग हैं, जो कि फिल्म को सच में देखने जाते हैं, इक सर्वे में बताया गया कि लगभग ४० प्रतिशत लोग तो यूँ ही घूमने के मकसद से पैसा बर्बाद करते हैं, २५ प्रतिशत पॉप कॉर्न का मज़ा लेने या दोस्तों के साथ चले जाते हैं, और जो बचे बाकी तीस प्रतिशत लोग, उनकी सुनता कौन है, बस धूम धड़ाका संगीत और हो गई पिक्चर हिट. कितने ही दिन हुए कोई गीत दिमाग पर नहीं छाया, वरना जब तक कोई फिल्म देखें और उसके गीत ज़हन में ना घूमें तो बात नहीं बनती, कोई बात, कोई सीन, कुछ भी तो याद नहीं रहता और फिल्म को मिलते हैं पांच स्टार, लोगो कि भीड़ को देख कर या जाने किस बात पर.
डेली सो़प लोग देखना पसंद नहीं करते पर फिर भी देखते उसी को हैं, कहने को सभी कहते हैं कि वही सास-बहू का ड्रामा, वाही रोज़ की चिकचिक. फिर भी 75 फीसदी घरों में सात बजते ही अगर कुछ चलता है तो वो हैं डेली सो़प और रात ग्यारह बजे से पहले तो ख़त्म होने वाले नहीं, अब श्रीमती जी का बहाना करें या और कुछ देखते तो सब वही हैं, वरना अगर ना देखें तो डेली सो़प का बाज़ार इतना गर्म कैसे हो.
रियलिटी शो की तो बात मत पूछिये. कोई पूछे कि क्या ये ड्रामा नहीं है. किसी को सोने नहीं दिया जाता तो किसी को अपशब्द सुनाये जा रहे हैं, खुलेआम, कहीं कोई स्वयंवर हुआ तो सभी को स्वयंवर का चस्का लग गया, फिर चाहे वो किसी का भी हो, चाहे लोग उसे पसंद ना करें पर बातें फिर भी उसी की करते हैं, देखा जाये तो रियलिटी शो भी किसी सास-बहू के ड्रामे से कहीं कम नहीं हैं, फर्क इतना है कि किरदार अलग हैं, और अब तो सास-बहू भी रियलिटी शो करेंगी, तो कहीं सासबहू ढूँढने निकली हैं रियलिटी शो के जरिये.
और इन सबसे बढ़कर सबसे बुरा हाल है, न्यूज़ चैनलों का, न्यूज़ यानि के समाचार.. देश-विदेश की खबरें.. देश में क्या चल रहा है इस बारे में जानकारी, लेकिन क्या ये सब हो रहा है चैनलों पर, नहीं.. बल्कि उनपर तो चल रहा है, कि एक-दूसरे कि टांग कैसे खीची जाए, किसी शो को पकड़ लिया तो उसे बंद करा के ही छोडेंगे, बस तीन तीन घंटे तक वही चलता रहता है, शो ने दर्शकों के घर बर्बाद कर दिए, कोई इनसे पूछे क्या दर्शक बेवकूफ हैं, कि इक शो से अपना घर बर्बाद कर लेंगे, और अगर ऐसा है तो मत देखो ना, किसी ने जबरदस्ती तो नहीं की आपके साथ, अजीब है हमारा दर्शक वर्ग भी, देखेगा और फिर बुरा भी कहेगा.
इक न्यूज़ चैनल पर इक कार्यक्रम देखा जिसमें इक घंटे की इक ख़ास कहानी दिखाई जाती है, कि हीरो अपनी प्रेमिका के कहीं और ब्याहे जाने पर सबका खून कर देता है, कहिये, क्या सीखेगा फिर हमारा समाज इस तरह के कार्यक्रमों से, और क्या ये खबर है, या चटपटा मसाला, सिर्फ अपने चैनल चलाने के लिए, यूँ ही तो इनकी टीआरपी बढती है !
कुल मिलकर, लोगो को कहानी, खबर, देश से कोई ख़ास सरोकार नहीं है, ना ही फर्क पड़ता है कि चल क्या रहा है, बस मसालेदार कुछ हो जाये.
मेरी नानी कहा करती थी अपनी ख़ास हरयाणवी शैली में "बस रोला रुक्का चाहिए" यही कुछ दीखता है आज के दर्शक वर्ग के साथ भी.
सबको मसाला चाहिए और वो भी शॉर्टकट में...

(सिनेमा हॉल की जगह मल्टीप्लेक्स लेते जा रहे हैं और आगे की सीट का दर्शक गायब होता जा रहा है....दीपाली की टीस के साथ इस वीडियो को देखना भी आपको शायद अच्छा लगे....)

दीपाली 'आब'
(दीपाली कविताएं भी लिखती हैं। हिंदयुग्म पर कविताएं भी भेजती रही हैं। बैठक पर ये इनका पहला लेख है)

Sunday, August 16, 2009

मंदी के दौर में एक और टीवी चैनल !

सभी वर्ग के कस्तूरों के लिए खुशखबरी- हमने तमाम कस्तूरों के हितार्थ टोटल संत चैनल शुरू किया है। यह चैनल फैशन चैनल की तरह चौबीसों घंटे भटके हुए कस्तूरों को मनचाही शांति मुहैया करवाएगा। वैसे भी आज के दौर में फैशन और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं। अर्थात् फैशन ही धर्म है और धर्म ही फैशन। मनोरोगी कस्तूरे अब चौबीसों घंटे आराम से कुर्सी पर पसर फास्ट फूड के साथ परमानन्द की प्राप्ति करेंगे,ऐसा हमारे चैनल द्वारा हायर किए संतों का विश्वास नहीं,दावा है।

हे भटके जीवो, जब कहीं भी न मिले आपकी स्वयं बुलाई समस्याओं का समाधान, तो शुरू होता है हमारे संत चैनल का काम। और चैनलिया संत परखे आपने हजार बार, हमारे चैनलिया संत परखें बस एक बार! हमारे चैनल के संत आपको स्वर्ग का टिकट, ऑटो टिकट के रेट में दिलवा सकते हैं। वे सज्जन जो ईमानदारी ,शांति से बहुत दूर जाना चाहते हों, हमारे चैनल के संतों के सामने एक बार,बस एक बार, मात्र एक पल के लिए बैठें और जिंदगी भर की अच्छाइयों से छुटकारा पाएं। हमारा संत चैनल सात समंदर पार तक पांव पसार चुका है। राजनेता से लेकर जाली वोटर तक को अपने चंगुल में फंसा चुका है। हमने अपने चैनली संतों के माध्यम से आजतक जिसका भी इलाज किया, वह अपनी पत्नी, प्रेमिका को छोड़ हमारे संतों का दीवाना हो गया, विदेशी दर्शक इस बात का सबूत हैं। कर्म क्षेत्र को छोड़ वह घोर भाग्य प्रेमी हो गया, हमारी बढ़ी टी आर पी इसका साक्षात् प्रमाण है ।

प्यारे सज्जनो और उनकी बहू-बेटियो! आप हमारे चैनल के संतों से ऑन लाइन भी संपर्क साध अपने वर्तमान और भविष्य का संपूर्ण बुरा हाल जान सकते हैं। हमारे चैनल की बीसियों लाइनें अपने भक्तों के लिए चौबीसों घंटे खुली रहती हैं। आप हमारे संतों से एसएमएस और एमएमएस द्वारा नरक जाने की विशुद्ध जानकारी कहीं भी बैठे हासिल कर सकते हैं।

घर में अशांति का निवास न हो पाना,व्यापार में अनुचित तरीके से भी लाभ न मिलना, औरों को पीड़ा न पहुंचा पाना, डट कर हरामीपना करने के बाद भी आत्मा को चैन न आना, बीसियों जुगाड़ों के बाद भी परधन न हड़प पाना, साहब की पत्नी के जूते पालिश करने के बाद भी प्रमोशन न मिलना, लाडलों का बार-बार नकल करने के बाद भी पास न हो पाना, मित्रों से
प्रसन्न रहना, एक पत्नी के होते दूसरी जगह मुंह मारने से डरना, विवाहेतर प्रेम भंग होना, पर पुरूष को लोक लाज के कारण अपना न सकना, विवाहेतर संबंधों में बच्चों की ओर से परेशान रहना, ईमानदारी से चाहकर भी छुटकारा न पाना, ग्रहों पर अंधविश्वास न होना, अहिंसा, देशभक्ति,राष्ट्रीयता जैसे बेइलाज रोगों से हरदम परेशान रहना, रात को सच से डरकर एकाएक जागकर फिर सो न पाना, भोगों से प्रेम में असफलता, झूठे मुकदमों में सफलता पाना, अपने जीवन को हर तरह से समाज दुरूपयोगी बनाने आदि-आदि लाखों रोगियों के असाध्य रोगों का सफल इलाज हमारे चैनल के संतों द्वारा अपने वचनों भर से ही शर्तिया किया जा चुका है, फुल्ल गारंटी के साथ, कोई वारंटी के साथ नहीं। जो भला चंगा आदमी हमारे चैनल के संतों की शरण में आकर बीमार न हो तो अपना संत चैनल तत्काल बंद, चैलेंज के साथ!

वे दुरात्माएं हमारे चैनल के संतों के वचन जरूर सुनें जिनका केवल कर्म पर विश्वास हो। घर में खुशहाली हो। जितना उनके पास हो और वे उसी में प्रसन्न हों, धंधे में ईमानदारी से भी लाभ हो रहा हो। जिन पति-पत्नी में स्वर्गिक प्रेम हो। जो मेहनत की खाने में अंधविश्वास रखते हों। कबूतरबाजों के थ्रू विदेश जाने के इच्छुक भी हमारे चैनलिया संतों का आशीर्वाद ले अपना भाग्य सुधारें। हमारे चैनल के संतों के पास ऐसे-ऐसे तंत्र हैं कि चींटी भी अपना घर-बार बेचकर कबूतर की तरह उड़ कर लंदन की नागरिकता पा जाएगी। जिनको लगे कि जादू-टोना कुछ नहीं होता, जो सब खिलाए-पिलाए को पचा गए हों, वशीकरण करने वाला खुद ही वशीकरण का शिकार हो गया हो तो ऐसे सब रोगी हमारे चैनल के संतों की शरण में सादर आएं, हमारे संत चैनल के दरवाजे चौबीसों घंटे ऐसी पीड़ित आत्माओं के लिए खुले हैं।

हमारे चैनल के संतों ने अपनी अमृत वाणी से बड़ों-बड़ों के दिमाग में कीड़े डाल दिए हैं। जिनको नजर न लगती हो,जो औरों को नजर लगाते हों, जिनको हाय पर विश्वास न हो, जिन सास-बहू में झगड़ा न होता हो, जिनके बच्चों का मन पढ़ाई में लगता हो, जो अपने बच्चों से सदा असंतुष्ट रहना चाहते हों, जिस पति का मन बाहर मुंह मारने को न करता हो, ऐसों की सभी शारीरिक व मानसिक समस्याओं का समाधान हमारे चैनल के संतों के पास है, चुटकी में।

प्रिय दर्शको! पर पत्नी दोष, पर पति दोष,पड़ोसन कष्ट, प्रेमी उपासना में बाधा, और भी सैंकड़ों छोटी-मोटी अपनी अप्रत्यक्ष बाधाओं का हमारे सुधी दर्शक हमारे नामी संतों को बताएंगे, फोन पर सीधे बताएंगे और हमारे संत पलक झपकते करेंगे स्क्रीन पर से ही उनका इलाज। हमारे चैनल के संतों को सुनते ही आपके दिमाग के पिछले जन्मों के मरे कीड़े भी सक्रिय हो उठेंगे। और उनके सक्रिय होते ही आपकी और आपके पूरे परिवार की जिंदगी खुशियों से लबालब हो जाएगी। हमारे चैनल के संतों का सान्निध्य मिलते ही पड़ोसन का पति बस आपको टुकुर-टुकुर देखता रहेगा ,पर कुछ कह नहीं पाएगा,न आपका कुछ बिगाड़ पाएगा, और वह लोक-लाज छोड, सोलह श्रृंगार किए दौड़ी-दौड़ी आपके पास चली आएगी। हमारे संतों की वाणी का असर यह भी हो सकता है कि उसका पति ही उसे आपके घर छोड़ जाए, विदाई गीत गाता। हम अपने चैनल के संतों की ओर से आपको विश्वास दिलाते हैं कि हमारे संत अपनी भोग विद्या से आपको इतना सम्मोहित कर देंगे कि आपको चारों ओर हमारे ही संत शिरोमणि नजर आएंगे।

कुंआरी कन्याएं हमारे संतों को जरूर सुनें। जिनका सामाजिक संबंघों पर अगाध विश्वास हो, जो संबंधों के प्रति अधिक ही संवेदनशील हों, जिनको अपने पर पूरा विश्वास हो, ऐसों को हमारे चैनल के संत रामबाण हैं।

आज का जीव हवा,पानी, भोजन के बिना जी सकता है पर चैनल के संतों के बिना नहीं। झोलाछाप संतों की वाणी से निराश हुए एक बार हमारे संतों को जरूर सुनें। उनके भोग, उपभोग, संभोग के फार्मूलों से आप पलक झपकते भव सागर पार होंगे। अपने केबल आपरेटर से संत चैनल की मांग अवश्य करें । यह आपका जुनूनी हक है।

अशोक गौतम

गौतम निवास ,अप्पर सेरी रोड,
नजदीक मेन वाटर टैंक
सोलन-173212 हि.प्र.

Wednesday, July 08, 2009

हम ख़बर हैं, बाक़ी सारा भ्रम है...



मुर्गी ने आदमी के बच्चे को जन्म दिया है। सुनने में आपको थोड़ा अटपटा ज़रूर लगेगा, लेकिन ये ख़बर आई है मध्य-प्रदेश के रायसेन शहर से। एक टीवी चैनल पर ये ख़बर चलने के बाद दूसरे चैनलों के पत्रकार भी इसे कवर करने दौड़ पड़े। बिना ये जांच-पड़ताल किये, कि क्या एक मुर्गी भी इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। मज़े की बात ये है कि इस पर किसी ने अपना दिमाग लगाने की ज़रूरत भी नहीं समझी। मामला मध्य प्रदेश में रायसेन के एक गांव बाड़ीकला का है। जहां से ख़बर आई कि यहां रहने वाले पतिराम नाम के शख्स के घर मुर्गी ने एक इंसान के बच्चे को जन्म दिया है। इस ख़बर के आने के बाद मीडिया वाले दौड़ पड़े। लेकिन डॉक्टरों के साथ ही आम लोगों का दिमाग भी चकरा गया। हर कोई ये सोच रहा था कि ऐसा भला कैसे हो सकता है। मेरे चैनल में भी ये ख़बर आई, तो मैं भी इसे सुनकर चौंक गया। पहले तो ख़बर की आपा-धापी में यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन जब इसकी तस्वीरें देखीं, तो माजरा समझते देर नहीं लगी। मुर्गी के साथ एक इंसान का चार इंच का भ्रूण दिख रहा था। जिसको लेकर ये दावा किया जा रहा था कि इंसान के इस बच्चे को मुर्गी ने ही जन्म दिया है। लेकिन मुर्गी को देखकर तरस आ रहा था, बेचारी अपने हाल पर बेबस थी, कैमरे की निगाहों के साथ ही उसे ज़माने की नज़रों का सामना भी करना पड़ रहा था। बेज़ुबान परेशान थी, अपनी सफ़ाई में क्या कहे, किससे कहे और कैसे कहे। कैसे लोगों को बताए कि इसमें उसका कोई कसूर नहीं है, बल्कि इसका पापी तो कोई और है, जो अपने गुनाहों पर पर्दा ढकने के लिए मेरे दड़बे में इस भ्रूण को रखकर चला गया है। लेकिन जैसे लोग नासमझ थे, वैसे ही मुर्गी भी लाचार थी। उसका मासूम चेहरा देखकर उस बेचारी पर तरस आ रहा था। जो ख़ता उसने की ही नहीं उसका इल्ज़ाम उसके मत्थे मढ़ दिया गया था। और तो और उसका मालिक भी इस ख़बर को कैश कराने में लगा था। मुर्गी बेचारी के हर एंगल से शॉट्स बनाए जा रहे थे। वो तो बस नहीं चला, अगर मुर्गी बोल पाती, तो शायद उससे तमाम तरह के बेतुके सवाल भी पूछ लिए होते। हो सकता है कोई ये भी पूछ लेता, कि इस बच्चे का बाप कौन है? डॉक्टर भी बेचारे बोल-बोलकर परेशान थे, कि कुदरत के नियम में इस तरह का कोई खिलवाड़ नहीं हो सकता। भला मुर्गी भी कहीं इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। लेकिन सुनने को कोई तैयार ही नहीं था। ये किस्सा बिल्कुल ऐसा ही था, जैसे हमने जर्नलिज्म में पढ़ा था कि अगर कुत्ता आदमी को काटे तो ख़बर नहीं है, लेकिन अगर आदमी कुत्ते को काटे तो ख़बर बन जाती है।

अबयज़ खान

Monday, March 02, 2009

टी आर पी के युग में शो-पीस बनते बच्चे....

अभी पिछले हफ्ते ही टीवी पर एक नया विज्ञापन आया। इसमें एक बच्चे को दिखाया गया है जो बाहर जाकर अपने दोस्तों के साथ खेलना चाहता है पर उसकी माँ उसे बाहर जाने से मना कर देती है। वो दुखी हो जाता है। तभी वो अलमारी से खिलौने का फोन निकालता है और चुपचाप छत पर चला जाता है जहाँ उसे कोई देख न पाये। वो अपने खिलौने से अपने पापा को फोन करता है और कहता है कि माँ खेलने नहीं जाने दे रही तो आप डाँट लगाओ।ये बच्चे की मासूमियत दिखाई गई है। एक... उसे असली और नकली में भेद नहीं पता...दो उसको ये पता है कि फोन से बात कैसे करते हैं और वो मानता है कि पापा का कहना मम्मी मान जायेगी। थोड़ी देर बाद ही उसकी माँ आकर उसको कहती है कि वो पढ़ाई के बाद खेलने जा सकता है और वो भोला बच्चा सोचता है कि उसकी बात पापा तक पहुँच गई है। और उसके बाद उसके चेहरे पर जो खुशी होती है वो देखते ही बनती है। वो खुशी से झूम उठता है।
इसी तरह की एक मासूम कहानी पिछले सप्ताह ही बाल-उद्यान में प्रकाशित हुई। रचना श्रीवास्तव की कलम से निकली मासूम बच्ची की एक मार्मिक कहानी मेरी माँ सिर्फ़ अच्छी है ,सबसे अच्छी नही । इस कहानी को पढ़कर आप बाल-मन को पढ़ सकेंगे। जान सकेंगे कि छोटे से बच्चे के मन में जो भाव होते हैं वो कितने शुद्ध होते हैं। कोई छल कपट नहीं होता। दीन-दुनिया से दूर उनकी अपनी अलग ही दुनिया होती है। इस कहानी ने मुझे भी मन के भीतर तक झकझोर दिया और मैं सोचने लगा कि यदि ये बचपन है तो एक दूसरा बचपन भी पैदा हो रहा है जो आज की हकीकत भी है...
ये दूसरा बचपन है लॉफ्टर शो का.. ये बचपन है नाचने का...ये बचपन है गाने का...ये बचपन है करोड़पति बनने का...एक ऐसा बचपन जिसमें माँ-बाप अपनी इच्छा को बच्चों पर लादते हैं। छोटे-छोटे बच्चे कम्पीटीशन की इस निर्दयी दुनिया में समय से पहले ही पहुँच जाते हैं। कम्पीटीशन की वो दुनिया जिसमें अच्छे से अच्छा खिलाड़ी भी बाहर हो सकता है। उनके ऊपर बोझ होता है अच्छे गाने का वरना जज से डाँट पड़ेगी। उन्हें चाहिये कि वे लोगों को ज्यादा से ज्यादा हँसायें ताकि न्यूज़ चैनलों की खबर बन सकें। उन्हें अच्छा नाचना होता है ताकि सामने बैठे तीन जज ताली पीट सकें और सीटी बजा सकें। उनके आस-पास होते हैं दर्जनों कैमरे, चारों ओर होती है लाइटें, लोग, बोझ... रीयलिटी शो की एक ऐसी "अनरीयल" दुनिया जो खत्म कर देती है मासूमियत को। एक ऐसी झूठी और दिखावटी दुनिया ..जिसमें छल भी होता है... कपट भी होता है... माता-पिता द्वारा किये गये झूठे एस.एम.एस होते हैं...इंटेरनेट पर जाली वोट होते हैं...नाटक होता..ड्रामा होता है...एक ऐसी दलदल होती है जिसमें बचपन फँस जाता है..ऊँच-नीच का पापड़ा...छुपन-छुपाई..आँख-मिचौली खेलने की उम्र में उन्होंने पकड़ रखे होते हैं माइक..क्योंकि वही हैं जो दिलायेंगे माता-पिता को संट्रो कार...और बनायेंगे लखपति..।
आजकल जब ये शो-पीस बच्चे फूहड़ चुटकुले सुनाते हैं तो सचिन और राहुल महाजन उन्हें जज करते है और उन पर हँसते भी हैं। राहुल महाजन॥एक ऐसा शख्स जो शुरु से अब तक विवादास्पद रहा है। ड्रग्स लेते हुए पकड़े जाना, बिगबॉस में अजीब हरकतें करना और अब यहाँ बच्चों के सामने उसको बैठा देना... मुझे हैरानी होती है देख कर और ये सोचकर कि हमारा भविष्य क्या होने जा रहा है... बच्चे गाते हैं और फिल्मी हस्तियों से मिलते हैं तो बहुत खुश होते हैं। पर क्या ये बच्चे भारत का इतिहास और वर्तमान भी जान पाते हैं? क्या पढ़ाई अब गौण होती जा रही है? हाशिये पर फेंक दिया गया है बचपन के खेलों को? क्यों अब कोई पकड़म-पकड़ाई खेलते नहीं दिखता? क्या टी।वी. प्रोग्राम्स के अलावा नहीं हो सकता है बच्चों का मनोरंजन? क्या ये बच्चे सामान्य बचपन व्यतीत कर पायेंगे? इनका भविष्य केवल अलग अलग रीयलिटी शो में आने-जाने और स्टेज पर नाच-गाने में बीत जायेगा? भारत के लिये संगीत-नृत्य के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को ढूँढने के लिये शुरु किये गये इन शोज़ से ये ये नईं कोंपलें कहीं खिलने से पहले ही मुरझा न जायें? क्योंकि इन सबसे चैनल तो फायदा निकाल ले जायेंगे पर पैरों तले रौंद दिया जायेगा बचपन... कैरम, लूडो और साँप-सीढ़ी वाला बचपन...

तपन शर्मा