Thursday, July 23, 2009

दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ, लेकिन कैसे खाएं दाल?



बचपन में एक गाना सुना था- दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। शायद उस समय दाल सस्ती होती होगी जो यह कहा जाता था।
इसी प्रकार एक अन्य मुहावरा दालों पर होता था-यह मुहं और मसूर की दाल।
यानि मसूर की दाल महंगी होती होगी जो यह कहा जाता था। (अगर गलत हो तो पाठक सुधार कर दें।)
लेकिन आज के समय में यह दोनों की पुरानी कहावतें या मुहावरे पुराने पड़ चुके हैं।
दालों के भाव आसमान छू रहे हैं और दाल-रोटी पाकर संतोष कर पाना एक कठिन कार्य हो चुका है।
नया मुहावरा है यह मुहं और अरहर की दाल क्योंकि अरहर की दाल अब 88 रुपए प्रति किलो हो गई है।

महंगाई मार गई

जहां अरहर की दाल 88 रुपए प्रति किलो है वहीं साबुत मसूर का भाव 66 रुपए, साबुत उड़द 60 रुपए और दाल उड़द 66 रुपए, मूंग साबुत और दाल मूंग दोनो ही 66 रुपए प्रति किलो हैं। चना 40 रुपए और चना दाल 56 रुपए प्रति बिक रही हैं।
दालें हमारे दैनिक आहार की प्रमुख खाद्य वस्तु है और मानव शरीर के लिए आवश्यक भी है क्योंकि इनमें प्रोटीन की मात्रा सबसे अधिक होती है। प्रोटीन प्राप्ति का दूसरा स्त्रोत मांस है जिसे शाकाहारी खा नहीं सकते हैं।
देश में दालों की कमी कोई नई बात नहीं है क्योंकि उत्पादन की तुलना में खपत अधिक होती है। एक अनुमान के अनुसार देश में दालों की वार्षिक खपत लगभग 180 लाख टन है जबकि उत्पादन 130 से 148 लाख टन के बीच घूम रहा है। अपनी खपत को पूरा करने के लिए दालों का आयात करना पड़ता है। हर वर्ष दलहनों का आयात किया जा रहा है जो 25 से 30 लाख टन के बीच होता है।
गत वर्ष भी देश में दालों के भाव में बढ़ोतरी हुई थी लेकिन आयात के कारण भाव अधिक नहीं बढ़ पाए। सरकार ने दालों के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

बेकाबू अरहर

बहरहाल, इस वर्ष अरहर के बारे में हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं। इसका कारण इस वर्ष वर्षा की कमी या सूखे जैसी स्थिति है। अरहर खरीफ की प्रमुख दलहन है। देश में 2005-06 के दौरान अरहर का उत्पादन 27.38 लाख टन हुआ था जो 2006-07 में गिर कर 23.14 लाख टन होने के बाद अगले ही वर्ष सुधर कर 30.75 लाख टन हो गया था। गत वर्ष उत्पादन 25 लाख टन ही होने का अनुमान है। और चालू वर्ष यानि 2009-10 का मानसून ही मालिक है।
जहां तक विदेशों का प्रश्न है वहां पर भी अरहर के भाव में तेजी आ रही है। गत माह तक अरहर का आयात लगभग 800 डालर प्रति टन की दर पर किया जा रहा था लेकिन अब आयात 1100 डालर से ऊपर के भाव पर किया जा रहा है।

घटती उपलब्धता
देश में दालों का उत्पादन मांग की तुलना में नहीं बढ़ रहा है। इससे बढ़ती जनसंख्या के कारण दलहनों की प्रति व्यक्ति खपत कम होती जा रही है।
वर्ष 2005-06 के दौरान देश में दलहनों का कुल उत्पादन 134 लाख टन था जो 2006-07 में बढ़ कर 142 लाख टन और 2007-08 में बढ़कर 148 लाख टन हो गया। बहरहाल, गत वर्ष यह गिर कर लगभग 142 लाख टन पर आ गया है। इससे सारा संतुलन बिगड़ गया।

खपत
देश में दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी कम होती जा रही है। वर्ष 1990 में देश में प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता 41 ग्राम थी जो अब गिर कर 30 ग्राम के आसपास आ गई जबकि अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए।

उत्पादन कम क्यों?
देश में दलहनों का अधिकांश उत्पादन सिंचित क्षेत्र में होता है और वर्षा की जरा सी भी कमी उत्पादन का सारा गणित बिगाड़ देती है। दूसरा कारण अन्य देशों की तुलना में प्रति हैक्टेयर उत्पादन कम होना है क्योंकि बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध नहीं है।
यदि सरकार बेहतर किस्म व रोग तथा कीट रोधक कम समय में पक कर तैयार होने वाले बीज किसानों को उपलब्ध कराए तो किसी सीमा तक देश में दालों की कमी को पूरा किया जा सकता है।

राजेश शर्मा

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8 बैठकबाजों का कहना है :

Vivek Rastogi का कहना है कि -

कहावत बदल देनी चाहिये ..
"ब्रेड जेम खाओ प्रभु के गुण गाओ"

Disha का कहना है कि -

बहुत ही सही कहा आपने. जिस तरह से खाने पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं ,ऐसा लगता है कि "हवा खाओ पानी पियो,योग कर कर के जियो" वाली हालत हो जायेगी. लेकिन अब तो हवा-पानी भी मुहाल है.अक्सर सोचती हूँ कि जब हमारी यह हालत है तो वो लोग जो दाल-रोटी भी मुश्किल से जुटा पाते थे कैसे अपना पेट भरते होंगे.

Nirmla Kapila का कहना है कि -

एक दम् सही आभार्

Manju Gupta का कहना है कि -

कार्टून आज की हकीकत है. दाल के भाव ने तो सिर के साथ गला भी पकड़ रहा है!
उत्पादन की नयी जानकारी मिली. धन्यवाद.

manu का कहना है कि -

पर दोस्त........
दाल न खाएं....
तो क्या खाएं........???????

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

विवेक जी,
सही कहावत गढ़ी आपने..मुझे तो बहुत भाई..

मनु जी,
कुछ मत खाइए...आप तो बस दो घूंट पीजिए और निठल्ले पड़े रहिए......

Shamikh Faraz का कहना है कि -

मनु जी मुर्गी जाइए क्योंकि वो इन दिनों दाल के रेट में मिल रही है.
घर की मुर्गी दाल बराबर.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

राजेश शर्मा जी हमेशा की तरह इस बार भी लाजवाब. आपका ये तरीका नायब लगता है की आलेख बहुत ही रिसर्च के बाद लिखते हैं. विश्लेषण अच्छा किया है.
वाकई ये एक सोचनिए प्रश्न है की दाल जैसी चीज़ पर इतनी मंहगाई है. तो फिर आम आदमी खायेगा क्या. ये कोई चिंता की बात न होती अगर प्रति व्यक्ति आये भी बढ़ रही होती.
मुझे एक बात बड़ी ही अजीब लगती है कि जिन लोगो के उपर इस चीज़ कि ज़िम्मेदारी होती है वही इस तरफ ध्यान नहीं देते.

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