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Sunday, August 01, 2010

मौसम की मार से छोटी इलायची के बड़े भाव

छोटी इलायची के उत्पादन पर मौसम की मार पड़ चुकी है। हालांकि इस समय मौसम फसल के अनुकूल है लेकिन पहले काफी नुकसान हो चुका है। अधिक उत्पादन की आशा अब धूमिल पड़ चुकी है और छोटी इलायची का उत्पादन गत वर्ष के बराबर ही होने का अनुमान लगाया जा रहा है। केरल के इडुक्की जिले में गर्मियों के दौरान वर्षा नहीं होने से फसल प्रभावित हुई है। वर्षा के अभाव में फल का आकार बढ़ नहीं पाया है। इस जिले में छोटी इलायची का उत्पादन सबसे अधिक होता है। गर्मी अधिक समय तक रहने के कारण नई फसल की आवक में देरी भी हो रही है। इस समय वहां पर मौसम अनुकूल चल रहा है और जानकारों का कहना है कि आगामी माह से नई फसल की आवक गति पकड़ लेगी। अब 15 अगस्त के बाद आवक जोरों पर होने का अनुमान है।

आवक कम

खराब मौसम के कारण उत्पादन प्रभावित होने से गत सप्ताह 5 नीलामियों में केवल 41 टन की आवक हुई है। इसमें से कसीपीएमसी में 12 टन की आवक हुई और पूरी बिक गई। भाव ऊंचे होने के कारण निर्यातकों की खरीद बाजार में बिल्कुल भी नहीं है। भाव अधिक होने के अतिरिक्त क्वालिटी भी हल्की है। निर्यातक ऊंचे भाव और हल्की क्वालिटी के कारण वे इस वर्ष रमजान की निर्यात मांग पूरी करने में सक्षम नहीं हैं। नीलामी में उच्चतम भाव 1,796.50 रुपए और न्यूनतम भाव 1,304 रुपए रहा जबकि औसत भाव 1,639.51 रुपए प्रति किलो रहा। इसी बीच, एक अगस्त से आरंभ हुए वर्ष के दौरान 25 जुलाई तक कुल 9,815 टन छोटी इलायची की आवक हुई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 10,298 टन की आवक हुई थी।

उल्लेखनीय है कि विश्व में छोटी इलायची केवल दो ही प्रमुख उत्पादक देश हैं। पहला स्थान ग्वाटेमाला का है जबकि दूसरा भारत का है। क्वालिटी में भारतीय छोटी इलायची बेहतर और इसकी खुशबू के कारण खाड़ी के देशों में इसकी मांग अधिक रहती है और भाव भी अधिक होते हैं। दूसरी ओर, विश्व के लगभग प्रत्येक देश में इसकी खपत होती है लेकिन सबसे अधिक खपत खाड़ी के देशों, पाकिस्तान, अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन आदि में होती है।
वर्ष 2009-10 अगस्त-जुलाई के दौरान भारत में छोटी इलायची के भाव रिकार्ड स्तर को छू चुके हैं। अब भाव में कुछ कमी आ रही है लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि दीपावली तक इनमें कुछ खास कमी आ पाएगी क्योंकि सारे त्यौहार सिर पर हैं जबकि पुराना स्टाक नगण्य है।

राजेश शर्मा

Thursday, September 24, 2009

भारत और चीनी कंपनियाँ सबसे भ्रष्ट

दुनियाभर में भ्रष्टाचार की नब्ज़ पर नज़र रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने कहा है कि भारत और चीन दुनिया के बड़े बाज़ार तो हैं लेकिन विदेशों में कारोबार के मामले में इन देशों की कंपनियों को बहुत भ्रष्ट समझा जाता है. भारत में जिन लोगों ने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वे में भाग लिया उनमें से 30 प्रतिशत का कहना था कि भारतीय कंपनियाँ अपना काम जल्दी करवाने के लिए निचले स्तर के अधिकारियों को रिश्वत देना पसंद करती हैं.एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार की वजह से बहुत बड़ा नुक़सान हो रहा है.

भारत और चीन के बारे में कहा गया है कि दोनों ही देश बड़े-बड़े बाज़ार उपलब्ध कराते हैं और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन इन दोनों देशोंकी कंपनियों को ख़ासतौर से अंतरराष्ट्रीय कारोबार करते हुए बहुत भ्रष्ट समझा जाता है. पाकिस्तान में इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले साठ प्रतिशत कंपनी अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों को रिश्वत दी थी. रिपोर्ट में भारत की यह कहते हुए प्रशंसा भी की गई है कि प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार से निबटने के लिए ठोस क़दम उठा रहा है, कंपनियों को वित्तीय अपराधों के लिए जुर्माना अदा करने का विकल्प दिया जा रहा है.

अरबों का नुकसान
वर्ष 2009 की वैश्विक भ्रष्टाचार रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में फैले भ्रष्टाचार, घूसखोरी, फिक्सिंग और सार्वजनिक नीतियों को निजी स्वार्थों के लिए प्रभावित करने की वजह से अरबों का नुक़सान हो रहा है और इससे टिकाऊ आर्थिक प्रगति का रास्ता भी बाधित हो रहा है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि भ्रष्ट चाल-चलन से ऐसा माहौल बनता है जिसमें साफ़-सुथरी प्रतिस्पर्धा के लिए जगह नहीं बचती है, आर्थिक प्रगति अवरुद्ध होती है और अंततः भारी नुक़सान होता है.

पिछले सिर्फ़ दो वर्षों में ही बहुत की कंपनियों को भ्रष्ट चाल-चलन की वजह से अरबों का जुर्माना भी अदा करना पड़ा है. इतना ही नहीं, इस तरह की सज़ाएं मिलने से कर्मचारियों के मनोबल पर असर पड़ता है और ऐसी कंपनियों का विश्वास ग्राहकों में भी कम होता है और संभावित भागीदारों में भी उसकी साख गिरती है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशलन के अध्यक्ष ह्यूगेट लाबेले का कहना है, "निवेश की सुरक्षा बढ़ाने, व्यावसायिक सफलता सुनिश्चित करने और ग़रीब और धनी देशों द्वारा वांछित स्थायित्व लाने के लिए यह ज़रूरी है कि एक ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें व्यावसायिक साख को बढ़ावा दिया जाए. आर्थिक संकट से उबरने के लिए यह ख़ासतौर से बहुत आवश्यक है."
इस रिपोर्ट में बड़ी कंपनियों में बहुत से ऐसे प्रबंधकों, शेयरधारकों और अन्य महत्वपूर्ण अधिकारियों के मामलों का ज़िक्र किया गया है जिन्होंने अपने निजी फ़ायदों के लिए अपने पदों और अधिकारों का दुरुपयोग किया. इससे न सिर्फ़ कंपनी, ग्राहकों और शेयरधारकों को ही नुक़सान हुआ बल्कि व्यापक तौर पर पूरे समाज को नुक़सान हुआ.
रिपोर्ट कहती है कि विकासशील देशों में बहुत सी कंपनियों ने भ्रष्ट राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से एक वर्ष में लगभग 40 अरब डॉलर की घूसखोरी की है.

रिपोर्ट के लिए किए गए शोध में बताया गया है कि भ्रष्ट नीतियों की वजह से लागत में भी लगभग दस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जाती है और इसका ख़ामियाजा अंततः आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है क्योंकि बढ़ी हुई लागत उन्हीं से तो वसूल की जाती है. रिपोर्ट में एक ख़ास बिंदू की तरफ़ ध्यान दिलाते हुए कहा गया है कि दुनिया भर में कुछ गिनी-चुनी कंपनियाँ हैं जिनकी ताक़त बहुत बढ़ चुकी है और वो इस ताक़त के ज़रिए विभिन्न देशों की सरकारों को अपने हित साधने के लिए प्रभावित करती हैं. इनमें अपने क़ानूनों को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करवाना भी शामिल है.

बीबीसी

Sunday, September 06, 2009

चालीस रुपए की चीनी क्या मीठी लगेगी 'सरकार' ?


सरकार चीनी के भाव बढ़ा रही है। जी हां, यह सुनने में यह विचित्र लगता है लेकिन सच है। इस समय चीनी के भाव में जो तेजी आ रही है वह सरकार की शह पर है। यह बात आज वह हर व्यक्ति कह रहा है जो चीनी के गणित को जानता है।
चीनी के भाव में तेजी के बीज तो गत वर्ष ही बो दिए गए थे जब देश में गन्ने का उत्पादन कम होने के कारण चीनी के उत्पादन में कमी की आशंका पैदा हो गई थी। बहरहाल, सरकार ने उस समय कहा कि उत्पादन 220 लाख टन
होगा। बाद में इसे घटा कर 200 लाख, फिर 180 लाख टन और अंत में 160 लाख टन पर आकर रुक गई। लेकिन आज वास्तविक उत्पादन 150 लाख टन से नीचे पर सिमट गया है।
सरकार चाहती तो अब भी तेजी को रोक सकती थी जिस प्रकार मई में मिलों पर साप्ताहिक बिक्री सम्बंधी आदेश लगाकर किया था। न मालूम किस कारण से सरकार ने इस नियम को बाद में निरस्त कर दिया। यह सब जानते हैं कि इस वर्ष भी देश में गन्ने की बिजाई गत वर्ष की तुलना में कम हुई और इसका उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। पहले यह अनुमान था कि एक अक्टूबर से आरंभ होने वाले सीजन 2009-10 के दौरान चीनी का उत्पादन 200 लाख टन तक पहुंच जाएगा लेकिन अब अनुमान है कि यह 170 लाख टन से ऊपर नहीं पहुंच पाएगा।
हालांकि यह बात चीनी उद्योग जानता है लेकिन जब सरकार यह कहे कि उत्पादन कम होगा और भारत को फिर चीनी का आयात करना पड़ेगा तो इसका संदेश विश्व बाजार में अलग ही जाता है। जिस दिन भारत सरकार की ओर से कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने यह बयान दिया कि विश्व बाजार में चीनी के भाव बढ़ गए, इसका अर्थ है कि चीनी का आयात और महंगा होगा।

40 रुपए के संकेत

सरकार की ओर से बयानबाजी की बात यहीं पर समाप्त नहीं होती है। गत सप्ताह चीनी पर आयोजित एक सम्मेलन में शरद पवार ने फिर एक सुर्रा छोड़ दिया कि विश्व बाजार में चीनी के भाव बढ़ रहे हैं, इससे अक्टूबर में जो चीनी आयात होगी वह 40रुपए प्रति किलो के आसपास पड़ेगी। अर्थात वह संकेत दे रहे हैं कि मिलों को आयातित चीनी के भाव 40 रुपए प्रति किलो पड़ेंगे और उपभोक्ता अधिक भाव चुकाने के लिए तैयार रहें। साथ ही मिलों को शह भी दे दी कि वे 40 रुपए तक चीनी बेच सकती हैं। उनके इस बयान के बाद ही दिल्ली सहित देश के लगभग सभी भागों में थोक बाजार में चीनी के भाव 3350 रुपए रुपए प्रति क्विंटल के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि खुदरा बाजार में चीनी के भाव 36 रुपए प्रति
किलो के पार चले गए हैं। ब्रांडेड चीनी तो अब भी 40 रुपए प्रति किलो के आसपास चल रहे हैं।

खो जाएगी मिठास
ऐसा नहीं लगता कि उपभोक्ता के लिए चीनी में अब मिठास रह पाएगा। गत वर्ष की तुलना में भाव लगभग डबल हो चुके हैं और आगामी सीजन में भी भाव में किसी भारी कमी का अनुमान नहीं है। देश में उत्पादन तो कम होगा ही विश्व बाजार में भी उत्पादन कम होने से आयात महंगा होगा और इसका असर देश में उपभोक्ता मूल्यों पर पड़ेगा। दूसरी ओर, चीनी मिलों के मजे हैं। मुनाफा अधिक होने के संभावनाओं के कारण लगभग सभी मिलों के शेयरों में निवेशों की खरीद हैं और भाव बढ़ रहे हैं।
हालांकि सरकार ने चीनी के भाव पर अंकुश लगाने के लिए कुछ कदम उठाएं हैं, लेकिन वे नाकाफी हैं। थोक उपभोक्ताओं पर स्टाक सम्बंधी पाबंदी का कोई असर होने वाला नहीं है। थोक व खुदरा व्यापारियों पर स्टाक व बिक्री की समय की सीमा पहले से ही लागू है। हां, यदि सरकार मिलों पर अंकुश लगाए और उन्हें एक तय भाव पर चीनी बेचने के लिए कहे तो बाजार
में भाव पर कुछ काबू पाया जा सकता है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि वास्तव में सरकार को चीनी के भाव
में तेजी रोकने में कोई दिलचस्पी है ही नहीं, ऐसा उसके द्वारा उत्पादन व भाव सम्बंधी बयानों से स्पष्ट है।

राजेश शर्मा

Sunday, August 09, 2009

सोना हुआ रे बड़ा महंगा....


सोने के भाव एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं क्योंकि विश्व बाजार में इसके
भाव चार अंकों में पहुंचने जा रहे हैं। इस समय विश्व बाजार में सोने के
भाव 950 डालर प्रति औस (31.100 ग्राम) के आसपास चल रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व गत वर्ष मार्च में विश्व बाजार में सोने के
भाव 1000 डालर का स्तर पार करके 1034 डालर प्रति औंस का रिकार्ड स्तर छू
चुके हैं।
हालांकि हाल के कुछ महीनों में विश्व बाजार में सोने की मांग कुछ कमी आई
है और भारत में भी इसका आयात कम हुआ है लेकिन इसके बावजूद विश्व बाजार
में सोने के भाव बढ़ रहे है।
सोने में तेजी का कारण निवेशकों की दिलचस्पी है। इसके अलावा विश्व में
सोने के उत्पादन में भी कमी आई है और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी होना भी
है।
आस्ट्रेलिया का विश्व में सोने के उत्पादन में तीसरा स्थान है लेकिन गत
वर्ष वहां पर उत्पादन में कमी आई है। वर्ष 2008 में आस्ट्रेलिया में सोने
का उत्पादन 219 टन हुआ था जो पिछले 20 वर्षों में सबसे कम है। वर्ष 2007
में वहां पर 248 टन का उत्पादन हुआ था। वहां पर न केवल सोने के उत्पादन
में ही कमी आई है अपितु लागत भी बढ़ गई है क्योंकि खान पुरानी होने के
कारण काफी गहराई पर जाकर खनन करना पड़ रहा है और अयस्क की क्वालिटी भी
बेहतर नहीं है। अयस्क में सोने की मात्रा कम होती जा रही है।
सोने के उत्पादन में पहला स्थान चीन और दूसरा स्थान दक्षिणी अफ्रीका का है।
अमेरिका अर्थ-व्यवस्था की स्थिति, कच्चे तेल के मूल्य, उत्पादन लागत और
घटते उत्पादन लागत को देखते हुए विश्व बाजार में सोने के भाव बढ़ना
स्वाभाविक ही है।

भारत की स्थिति

विश्व बाजार में सोने के भाव बढ़ने का असर भारतीय बाजारों पर भी तेजी का आ
रहा है लेकिन तुलनात्मक कम। इसका कारण रुपए की तुलना में डालर का कमजोर होना
है।
विश्व बाजार में भारत सोने की खरीद कम कर रहा है और इस वर्ष की पहली
तिमाही में सोने का आयात 83 प्रतिशत लुढ़क कर केवल 17.7 टन ही रह गया है।
गत वर्ष इसी अवधि में 107.2 टन सोने का आयात किया गया था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में सोने की मांग कम हो गई है। वास्तव में
सोने की मांग में हर वर्ष बढ़ोतरी ही हो रही है लेकिन इसकी पूर्ति पुराने
सोने की सप्लाई से हो रही है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों ने निवेश के लिए
जेवर के बजाए ठोस सोने यानि बिस्कुट के रुप में खरीद की है वे भी मुनाफा
वसूली के लिए बाजार में इसकी बिकवाली करते रहते हैं। इससे आयात में कमी
के बावजूद घरेलू बाजार में सोने की आपूर्ति बराबर बनी रहती है।
जहां भारत के सोने के आयात में कमी आई है चीन का सोने का आयात कुछ बढ़ा है।

राजेश शर्मा