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Friday, July 30, 2010

सावन न सही, सावन की बतिया ही सही...

सावन आया बरसने को आँगन नहीं रहा
घटाओं में बरसने का पागलपन नहीं रहा
आती है बारिश, लोगों के दिल भीगते नहीं
नीम और पीपल के पेड़ों पे झूला नहीं रहा.
यही अब सच है...शायद. किसी ने डूबे-डूबे मन से बताया कि भारत में सावन के समय अब उतना मजा नहीं आता जितना पहले आता था...वो बरसाती मौसम..पानी बरसने के पहले वो मस्त बहकी हवायें..जो बारिश आने के पहले आँधी की तरह आकर हर चीज़ अस्त-व्यस्त कर जाती थीं..कहाँ हैं ? होंगी कहीं...पागल हो जाते थे हम सब उनके लिये...अब भी उनके आने का सब इंतज़ार करते हैं....उनका सब लोग मजा लेना चाहते हैं...और वो बादल कहाँ हैं जो सावन में बरसने के लिये पागल रहते थे...सुना है कि अब उनके बहुत नखरे हो गये हैं..बहुत सोच समझकर आते हैं बरसने के लिये...साथ में बदलते हुये समय के रहन-सहन के साथ सावन मनाने की समस्या भी सोचनीय हो गयी है...उन हवाओं की मस्ती का आनंद लेने को अब हर जगह खुली छतें नहीं...खुले आँगन नहीं..कहीं-कहीं तो बरामदे भी नहीं..घरों के पिछवाड़े नहीं जहाँ कोई नीम या पीपल जैसे पेड़ हों जिनपर झूला डाला जा सके. जहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें हैं वहाँ शहरों में बच्चे पार्क में खेलते हैं तो वहाँ खुले में स्टील के फ्रेम पर झूले होते हैं जिन पर प्लास्टिक की सीटें होती हैं...आजकल कई जगह टायर आदि को भी सीट की जगह बाँध देते हैं...सबकी अपनी-अपनी किस्मत...आज के बच्चे पहले मनाये जाने वाले सावन का हाल सुनकर आश्चर्य प्रकट करते हैं...और उन बातों को एक दिलचस्प कहानी की तरह सुनते हैं.
लो अब बचपन की बातें करते हुये अपना बचपन भी सजीव हो गया जिसमें..आँगन, जीना, छत, झूला, आम के बौर, और पेड़ों पर पत्तों के बीच छिपी कुहुकती हुई कोयलिया, नीम और पपीते के पेड़ ..जंगल जलेबियों के सफ़ेद गुलाबी गुच्छे..दीवारों या पेड़ों पर चढ़ती हुई गुलपेंचे की बेल जो अब भी मेरी यादों की दीवार पर लिपटी हुई है...हरसिंगार के पेड़ से झरते हुये उसके नारंगी-सफ़ेद महकते कोमल फूल...सबह-सुबह की मदहोश हवा में उनींदी आँखों को मलते हुये सूरज के निकलने से पहले जम्हाई लेकर उठना और अपने दादा जी के साथ बागों की तरफ घूमने जाना...पड़ोस के कुछ और बच्चे को भी साथ बटोर लेते थे...और उन कच्ची धूल भरी सड़कों पर कभी-कभी चप्पलों को हाथ में पकड़ कर दौड़ते हुये चलना..आहा !! उस मिट्टी की शीतलता को याद करके मन रोमांचित हो उठता है...आँखों को ताज़ा कर देने वाली सुबह के समय की हरियाली व उन दृश्यों की बात ही निराली थी. जगह-जगह आम के पेड़ थे कभी जमीन पर गिरे हुये आम बटोरना और कभी आमों पर ढेला मारकर उन्हें गिराना...उसका आनंद ही अवर्णनीय है. अपने इस बचपन की कहानी में एक खुला आँगन भी था..बड़ी सी छत थी जहाँ बरसाती हवायें चलते ही उनका आनंद लेने को बच्चे एकत्र हो जाते थे. और बारिश होते ही उसमें भीगकर पानी में छपाछप करते हुए हाथों को फैलाकर घूमते हुए नाचते थे...एक दूसरे पर पानी उछालते थे...और उछलते-कूदते गाना गाते थे...बिजली चमकती थी या बादलों की गड़गड़ाहट होती थी तो भयभीत होकर अन्दर भागते थे और फिर कुछ देर में वापस बाहर भाग कर आ जाते थे...फिर भीगते थे कांपते हुये और पूरी तृप्ति होने पर ही या किसी से डांट खाने पर अपने को सुखाकर कपड़े बदलते थे...छाता लगाकर बड़े से आँगन में एक तरफ से दूसरी तरफ जाना...हवा की ठंडक से बदन का सिहर जाना....और मक्खियाँ भी बरसात की वजह से वरामदे व कमरों में ठिकाना ढूँढती फिरती थीं...अरे हाँ, भूल ही गयी बताना कि ऐसे मौसम में फिर गरम-गरम पकौड़ों का बनना जरूरी होता था...ये रिवाज़ भारत में हर जगह क्यों है...हा हा...क्या मजा आता था.
अब बच्चे उतना आनंद नहीं ले पाते..उनके तरीके बदल गये हैं, जगहें बदल गयी हैं ना घरों में वो बात रही और ना ही बच्चों में. ये भी सुना है कि सावन का तीज त्योहार भी उतने उत्साह से नहीं मनाया जाता जितना पहले होता था...लेकिन हम लोगों के पास मन लगाने को यही सिम्पल साधन थे मनोरंजन के..क्या आनंद था ! तीजों पर झूला पड़ता था तो उल्लास का ठिकाना नहीं रहता था...पेड़ की शीतल हवा में जमीन पर पड़ी कुचली निमकौरिओं की उड़ती गंध..वो पेड़ की फुनगी पर बैठ कर काँव-काँव करते कौये...और पास में कुआँ और पपीते का पेड़ जिस पर लगे हुये कच्चे-पक्के पपीते...काश मुझे वो सावन फिर से मिल जाये...नीम के पेड़ पर झूला झूलते हुये..ठंडी सर्र-सर्र चलती हवा में उँची-उँची पैंगे लेना..अपनी बारी का इंतजार करना..दूसरे को धक्का देना...गिर पड़ने पर झाड़-पूँछ कर फिर तैयार हो जाना झूलने को...आज भी सब लोग आनंद लेना चाहते इन सब बातों का पर अब वो बात कहाँ ..लोग बदले बातें बदलीं..रीति-रिवाजें बदलीं..बस बातों में ही सावन रह गया है.

शन्नो अग्रवाल

(तस्वीर बैठक के पुराने साथी अबयज़ खान ने भेजी है)

Saturday, August 29, 2009

50 हज़ार पंडों के पेट में बादल की फैक्ट्री !


स्वाहा...

हमारे मध्यप्रदेश ने कमाल कर दिया और अब तक किसी को पता भी नहीं चला. देश भर में बारिश को लेकर चिंता फैल रही है, सब बादलों की ओर टकटकी लगाये हुए हैं. वैज्ञानिक चिंतित हैं कि कैसे बारिश होगी, पर्यावरणविद पर्यावरण के नष्ट होने की दुहाई दे देकर खुद मुरझा गए हैं, लेकिन हमारे प्रदेश के लोगों ने और सरकार ने रास्ता खोज लिया है. जब भी हमें बारिश करवानी होती है, हम बस एक यज्ञ या हवन करते हैं, किसी अफीमची पुजारी को घोड़े पर बैठाते हैं, डीजे वाली गाडी आगे चलाते हैं और फुरसती लड़कों को उसके आगे नचा-नचाकर जुलूस निकालते हैं. अगले दिन बहुत संभव है कि १०-१५ लीटर पानी बरस जाए. अगर बरस गया तो अफीमची अपने संत होने को खुद भी सच मानकर ख़ुशी में और अफीम पीता है और नहीं बरसा तो भगवान की मर्ज़ी.
क्या गाँव क्या शहर, हमारे प्रदेश के सारे निवासियों की समझ एक सी उर्वर है. और विकसित शहरों की तरह वे ट्रैफिक जाम आदि भौतिक समस्याओं को महत्त्वपूर्ण नहीं मानते, वे तो किसी भी व्यस्ततम मार्ग पर भजन-कीर्तन करने बैठ जाते हैं. सच है, भाई तुम्हारा ट्रैफिक बड़ा कि पानी...और हमारे भजन-कीर्तन से जो पानी बरसेगा उसका तुम उपयोग नहीं करोगे क्या? फिर खड़े रहो एक घंटे और भजन सुनो.
अभी आप देखेंगे तो प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में रोज़ यज्ञ होते हैं और यही वजह है कि कभी-कभी बूंदा-बंदी हो जाती है क्योंकि भगवान् को 'अपने वाले' का ध्यान तो रखना पड़ता है न? मैं तो कहता हूँ कि हमारे मुख्यमंत्रीजी को इस युक्ति का पेटेंट करवा लेना चाहिए वरना अगर अमेरिका को पता चला तो वो करवा लेगा. फिर वहां यज्ञ-हवन से बारिश होगी और आपको इसके लिए उनकी अनुमति लेनी होगी.
बात निकली है तो हमारे पूज्यनीय मुख्यमंत्रीजी का भी गुणगान कर ही लेता हूँ. बहुत भले पुरुष हैं, उनकी नाक के नीचे लोग करोडों का हेर-फेर कर देते हैं लेकिन वे प्राणी मात्र में ईश्वर को देखते हुए उसे उनका भोग समझ कर धन्य हो जाते हैं. वे भी जनता की ही फ्रीक्वेंसी के हैं, वे भी पेड़-पौधों इत्यादि के चक्कर में नहीं पड़ते, ग्रीन हाउस इफेक्ट और ग्लोबल वार्मिंग तो शब्द ही अंगरेजी हैं और उनकी तो पार्टी ही स्वदेशी वाली है इसलिए इस पर तो वो नज़र भी नहीं डालते. और वे बारिश ना होने से चिंतित भी हैं, हालांकि उनके फोटो देखकर आप उन्हें दुनिया का सबसे खुश इंसान समझने की भूल भी कर सकते हैं. वो तो उन्हें फोटो खिचवाने का बचपन से ही शौक है इसीलिये पूरे प्रदेश में उनके बड़े-बड़े पोस्टर दिखाई देंगे.
हाँ, तो मैं कह रहा था कि वे बारिश ना होने से चिंतित हैं और मुखिया होने के नाते उन्हें इस समस्या के हल के लिए कुछ करना था. उन्होंने अपने सहयोगियों से सलाह-मशविरा किया. सहयोगी भी एक से बढ़कर एक धार्मिक पुरुष. किसी ने कहा गौ माता की पूजा करनी चाहिए, किसी ने कहा किसी संत को पकड़कर तपस्या करवा दो जब तक बारिश ना हो, फिर किसी ने बताया कि प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में सिर्फ महात्मा ही निवास करते हैं और उन महात्माओं ने बारिश की खातिर एक साथ बैठकर भोजन करना स्वीकार किया है. सो मुख्यमंत्रीजी अपने व्यस्त जीवन में से समय निकालकर उज्जैन महाकाल मंदिर पहुचे जहाँ ५० हज़ार चिंतित पण्डे भोजन के इंतज़ार में थे क्योंकि शास्त्रों में लिखा है कि पण्डे के पेट से ही हर चीज़ बनती है. इतने पण्डे जब जीम लेंगे तो इस हलुवा, पूडी, खीर आदि से पंडों के पेट में बादल बनाने लगेंगे और अंततः वही बारिश करवाएंगे. ये खोज सच में विज्ञान की बड़ी से बड़ी खोज पर भारी है. तो हमारे मुखियाजी भी अपने पेट में बादल की फैक्ट्री बनवाने मंदिर जा पहुचे. वहां ५० हज़ार पंडों ने जम कर खाया ताकि बादल बनाने में कमी ना हो. फिर मुख्यामंत्रेजी इस समस्या के सुलझ जाने से प्रसन्न हो कर और भगवान् को धन्यवाद देकर घर चले गए. ये इस बीमारू प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि सारे पंडों को एक साथ कब्ज हो गई और पेट में बादल नहीं बन पाए, और बने भी तो बाहर नहीं निकल पाए.
वैसे हमारे मुख्यमंत्रीजी बहुत धार्मिक व्यक्ति हैं. उनका मानना है कि इंसान की क्या औकात है जो वो कोई समस्या सुलझा ले, जो करता है वो ईश्वर करता है. इसीलिए वे सारी समस्याएँ उसी को पास कर देते हैं, एक तरह से कह सकते हैं कि हमारे प्रदेश का मुख्यमंत्री ईश्वर है. एक और बात वे कहना नहीं भूलते जब भी उनके सामने कोई समस्या लाई जाए कि केंद्र हमारी मदद नहीं कर रहा, इस तरह से हम एक केंद्र शासित प्रदेश भी हैं.
स्कूलों में शिक्षा बद से बदतर हो गई है, वो दे या ना दें लेकिन भोजन के पहले की प्रार्थना अनिवार्य है क्योंकि असली ज्ञान तो उसी से मिलेगा बाकी सब तो टाइम पास है. प्रदेश में बिजली नहीं है, नहीं क्या है बिलकुल भी नहीं है लेकिन आप ही सोचिये अँधेरा तो भगवान् ने बनाया है और ट्यूबलाइट किसने बनाई??? इंसान ने... तो अब ये बताइये कि इंसान बड़ा या भगवान्?? अब जवाब तो एक ही हो सकता है...तो लो हो गई हल समस्या, तुम क्या भगवान् से बढ़कर हो? क्यों बिजली के लिए रोते हो? उसी ने अँधेरा दिया है वही रौशनी देगा.
कुछ लोग होते ही हैं विध्नसंतोषी और वे ही कभी-कभी सांसारिक बातों का रोना रोते रहते हैं, कहते हैं इंदौर में हर तरफ गन्दगी हो रही है, जिधर देखो सड़ा हुआ पानी, मच्छर, कचरा...अब बताइये कितने निम्न स्तर पर जी रहे हैं ये लोग... पानी भगवान् ने बनाया और उसी ने सड़ाया...और मच्छर क्या किसी कंपनी में बनाते हैं? कभी सुना रिलायंस के मच्छर टाटा के मच्छर...? मच्छर भी तो भगवान् की देन हैं. और कचरे का क्या है...पुराने ज़माने में ऋषि-मुनियों के ऊपर तपस्या करते-करते इतनी मिट्टी जम जाती थी कि वे दिखाई देना बंद हो जाते थे और तुम इतने से में हाय-तौबा मचाने लगे? सचमुच कलयुग है. अरे कभी रामानंद सागर की रामायण देखी है? भगवान् के हाथ में से एक रौशनी निकलेगी और सारा कचरा भस्म...तुम बस पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन करते रहो.
तो ऐसे हैं हमारे लोग और नेता. सबके सब महापुरुष. धन्य हैं वे लोग जो अब तक संसार को असार समझ कर, सब उसके भरोसे छोड़कर भजन-कीर्तन में मस्त हैं.
शत-शत नमन.

अनिरुद्ध शर्मा

Monday, June 22, 2009

अल्लाह मेघ दे, पानी दे.....

बज़्मी नकवी को आप पहले भी हिंदयुग्म पर पढ़ चुके हैं...एक बार कविता प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, पहले दस कवियों में भी रहे और फिर हमारी पहुंच से दूर हो गए...इतने दिनों बाद अचानक बैठक पर इनका मेल देखकर ताज्जुब तो हुआ पर संतोष भी हुआ कि हिंदयुग्म से जुड़ने के जो वादे ये कर के गए थे, अभी भूले नहीं हैं....फिलहाल, इन्होंने एक तस्वीर हमें भेजी है और उन पलों का संक्षेप में ज़िक्र भी किया है जब इन्हें तस्वीर खींचने को मजबूर होना पड़ा....बैठक पर विचर रहे पाठक भी ऐसी जीवंत तस्वीरों के साथ बेहिचक हाज़िर हो सकते हैं....ब्लॉगिंग को घर-घर पहुंचाकर सरोकारों से जोड़ना ही तो हिंदयुग्म का मिशन है.....

ये फोटो बुंदेलखंड (बांदा) की है....सूखे की मार झेल रहे इस इलाके में ये एक किसान का बच्चा बेयकीन आँखों से बादल की गरज को पानी की बूंदों में बदलते देखना चाहता है... बज्मी नकवी

Sunday, June 21, 2009

पिछड़ी खरीफ फसलों की बुआई, फिर महंगाई की आशंका

गत 6 जून को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान महंगाई की दर घट कर मायनस 1.61 प्रतिशत पहुंच जाना भले ही सरकार के लिए संतोष की बात हो लेकिन वर्षा की वर्तमान स्थिति आगामी महीनों में स्थिति को बदल सकती है और उपभोक्ता की परेशानियों को और बढ़ा सकती है।

शुरूआत अच्छी होने के बाद अब मानसून की स्थिति अच्छी नहीं बनी हुई है। हालांकि इस वर्ष दक्षिणी तट पर मानसून ने 23 मई को ही दस्तक दे दी थी और मौसम विभाग ने समय से पूर्व इसके आने की घोषणा कर दी है लेकिन अब मानसून की गति ठहर सी गई है। देश के अधिकांश भागों में वर्षा की कमी अनुभव की जा रही है।
मौसम विभाग के अनुसार अब तक देश में वर्षा की स्थिति अच्छी नहीं है। देश के कुल 36 मौसमीय उप-खंडों में से केवल 8 उप-खंडों में ही वर्षा सामान्य या सामान्य से अधिक हुई है। बाकी उप-खंडों में वर्षा की कमी है।
इस सीजन में देश भर में अब तक केवल 39.5 मिली मीटर वर्षा ही दर्ज की गई है जबकि आमतौर पर 72.5 मिली मीटर होती है।

बुआई
मानसून में देरी और वर्षा की कमी का असर खरीफ फसलों की बुआई पर पड़ रहा है। कृषि भवन से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक तिलहनों की बुआई 4.14 लाख हैक्टेयर पर की गई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 5.02 लाख हैक्टेयर पर की गई थी। इसी प्रकार आलोच्य अवधि में दलहनों का रकबा 1.88 लाख हैक्टेयर से घट कर 1.81 लाख हैक्टेयर रह गया है।

हालांकि सोयाबीन, तिल और सूरजमुखी की बुआई गत वर्ष की तुलना में कुछ अधिक हुई है लेकिन प्रमुख तिलहन मूंगफली का रकबा 2.39 लाख हैक्टेयर से घट कर 1.08 लाख हैक्टेयर रह गया।
दहलनों मूंग का रकबा 87,000 हैक्टेयर से घट कर 57,000 हैक्टेयर रह गया है जबकि उड़द और मूंग की बुआई गत वर्ष की तुलना में क्रमश: 7,000 हैक्टेयर औ 11,000 हैक्टेयर अधिक क्षेत्रफल पर हुई है।
दूसरी ओर, धान की बुआई 7.15 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 8.01 लाख हैक्टेयर, मक्का की 57,000 हैक्टेयर की तुलना में 1.05 लाख हैक्टेयर, ज्वार की 76,000 हैक्टेयर से बढ़ कर 91,000 हैक्टेयर और बाजरा की 5,000 हैक्टेयर से बढ़ कर 39,000 हैक्टेयर पर की जा चुकी है। कपास का रकबा भी 17.30 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 18.51 लाख हैक्टेयर हो गया है।

गिरता जल स्तर
वर्षा की कमी के कारण देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर भी लगातार कम होता जा रहा है। गत 18 जून को 81 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर केवल 15.068 बिलियन क्यूबिक मीटर रह गया जो क्षमता का केवल 10 प्रतिशत ही है।
गत वर्ष की तुलना में इस समय पानी का स्तर आधा ही रह गया है।
हालांकि मौसम विभाग जल्दी ही मानसून के सक्रिय होने की बात कर रहा है लेकिन यदि कुछ देरी हो जाती है तो खरीफ की बुआई तो कम होगी ही उत्पादकता कम होने से कुल उत्पादन में भी गिरावट आएगी।
खरीफ के दौरान मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी आदि तिहलनों, गन्ना, कपास, धान, अरहर आदि का उत्पादन प्रमुखता से होता है। अरहर के भाव पहले ही आसमान को छू रहे हैं। गन्ने की कमी से चीनी के उत्पादन में आई गिरावट के कारण उपभोक्ता को चीनी के लिए अधिक दाम चुकाने पड़ रहे हैं।
ऐसे मे मानसून की देरी या वर्षा की कमी उपभोक्ता की परेशानी को और बढ़ा सकती है।

--राजेश शर्मा

Sunday, March 22, 2009

केरल में वर्षा से छोटी इलायची स्टाकिस्टों में घबराहट

पिछले दो दिनों से केरल के अनेक उत्पादक क्षेत्रों में हुई वर्षा ने छोटी इलायची स्टाकिस्टों में घबराहट पैदा कर दी है। स्टाकिस्ट फिलहाल भाव तो पूर्व स्तर पर बोल रहे हैं लेकिन मोल-भाव करने पर 5/10 रुपए प्रति किलो तक घटा कर बेचने को तैयार हैं।
व्यापारियों का कहना है कि यदि वर्षा एक सप्ताह जारी रहती है तो छोटी इलायची के भाव में 20/25 रुपए प्रति किलो तक की गिरावट आ सकती है लेकिन उसके बाद भाव फिर सुधर जाएंगे।
जानकारों का कहना है कि केरल के कुछ उत्पादक केंद्रों पर पिछले दो दिनों से वर्षा हो रही है। इससे पौधों को पानी मिलेगा और आगामी सीजन में छोटी इलायची का उत्पादन अधिक होने की आशा है। इससे स्टाकिस्टों में घबराहट है और वे भाव घटाकर भी माल बेचने को इच्छुक हैं। लेकिन धन की तंगी के कारण लेवाल सामने नहीं आ रहा है।
जानकारों का कहना है कि इस वर्षा से फसल को तो लाभ होगा लेकिन आवक प्रभावित हो जाएगी। इससे अगले माह भाव में फिर सुधार होने का अनुमान है क्योंकि स्टाक कम है।
व्यापारियों का कहना है कि इस समय दिल्ली बाजार में छोटी इलायची का स्टाक लगभग 4000 बोरी (एक बोरी 50 किलो) का स्टाक है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में लगभग 6000 बोरी का स्टाक था। व्यापारियों के अनुसार नागपुर, पूणे, कानपुर, जयपुर, ग्वालियर आदि में छोटी इलायची का स्टाक गत वर्ष की तुलना में कम है।
इसी बीच, चालू वर्ष अगस्त 2008-जुलाई 2009 के दौरान छोटी इलायची का उत्पादन 1.10 करोड़ किलो होने का अनुमान है जबकि गत वर्ष यह 95 लाख किलो था।
चालू सीजन में अब तक नीलामी केंद्रों पर 74.75 लाख किलो छोटी इलायची की आवक हो चुकी है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 39.36 लाख किलो की आवक हुई थी। आवक अधिक होने के बावजूद इस वर्ष अब तक औसत भाव 517.04 रुपए प्रति किलो रहे जबकि गत वर्ष इसी अवधि मे भाव 488.76 रुपए प्रति किलो थे।
यही नहीं इस वर्ष छोटी इलायची का निर्यात भी अधिक हो रहा है। चालू वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों यानि अप्रैल-जनवरी के दौरान 3025 लाख रुपए मूल्य कीर 475 टन छोटी इलायची का निर्यात किया गया जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 1868.53 लाख रुपए मूल्य की 400 टन छोटी इलायची का निर्यात किया गया था। इस वर्ष निर्यात से प्रति किलो मूल्य 636.84 रुपए प्राप्त हुआ जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 467.26 रुपए प्राप्त हुआ था।
जानकारों का कहना है कि इस वर्ष ग्वाटेमाला की छोटी इलायची के भाव ऊंचे होने के कारण भारत से अधिक मात्रा में इसका निर्यात किया गया।

राजेश शर्मा