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Friday, July 17, 2009

बजट पर बहस : आम आदमी के लिए क्या?



विगत दिनों संसद में पेश किए गए 2009-10 के बजट को सत्तारुढ़ दल के नेताओं के अलावा अनेक उद्योगपतियों और कुछ अर्थशास्त्रियों ने आम आदमी के बजट की संज्ञा दी है। हर किसी ने इस बजट को आम आदमी का बजट कहा था। वित्त मंत्री प्रणब दा ने खूब वाहवाही बटोरी थी।
अब देखिए आम आदमी के इस बजट में उसके लिए क्या है?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि वित्त मंत्री ने आम आदमी के लिए आयकर छूट की सीमा बढ़ा दी है। इस सीमा को बढ़ाने की मांग हर वर्ष की जाती है।
वित्त मंत्री ने इस सीमा को बढ़ाया है और सरचार्ज भी समाप्त कर दिया है लेकिन इससे आम आदमी को जो राहत मिली है वह ऊंट के मुहं में जीरा ही है। जिस व्यक्ति की सालाना आय 5 लाख रुपए तक है उसे लगभग 1100 रुपए का लाभ मिला है, यानि हर माह 100 रुपए का लाभ भी नहीं।
सरकार ने `आम आदमी´ के लिए बड़ी कारों पर शुल्क घटा दिया है और एलसीडी पर शुल्क में कमी कर दी है। यह वास्तव में सराहनीय है।
आम आदमी को राहत का एक और नमूना:
सरकार ने कमोडिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (सीटीटी) को वापिस ले लिया है। इस टैक्स को गत वर्ष के बजट में लगाया गया था लेकिन व्यापारियों के विरोध कारण इसे लागू ही नहीं किया गया था। अब वित्त मंत्री ने इसे वापिस ही ले लिया था।
सीटीटी उन व्यापरियों या कारोबारियों पर लगना था जो प्रमुख कमोडिटी एक्सचेंजों में जिंसों में वायदा कारोबार करते हैं। इन एक्सचेंजों में रोजाना कागजों में करोड़ों का कारोबार होता है और केवल चंद व्यापारियों को लाखों का मुनाफा होता है। सरकार को इस मद से कई हजार करोड़ रुपए प्राप्त हो सकते थे और वह भी बिना आम आदमी को छूए बिना।
ब्रांडेड ज्यूलरी से उत्पाद शुल्क समाप्त कर दिया गया है। जूतों और स्पोर्टस के बनाने के कच्चे माल पर आयात शुल्क हटाया जा रहा है।
इससे आम आदमी को कितना लाभ होगा यह हो आने वाले समय ही बताएगा।
वास्तव में वित्त मंत्री ने अनेक वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी की है। उसका पता फिलहाल उपभोक्ता को नहीं चला है। बहरहाल, गैस स्टोव निर्माताओं ने अवश्य कहा है कि अब गैस से चूल्हे महंगे हो जाएंगे क्योंकि बजट में शुल्क बढ़ गया है।
देखिए कराधान की बात
अब कुछ वर्ष पूर्व तक वित्त विधेयक के भाग-दो में वित्त मंत्री द्वारा लगाए गए प्रस्तावों का विवरण होता था। वास्तव में बजट का लेखा-जोखा कहा जा सकता है क्योंकि उसमें इस बात का खुलासा होता था कि कौन से प्रस्ताव से सरकार को कितना नुकसान होगा या फायदा होगा। मसलन यदि किसी वस्तु पर एक्साईज शुल्क कम किया है तो सरकार को कितना अधिक राजस्व प्राप्त होगा। यही स्थिति नए शुल्क या शुल्क में बढ़ोतरी के बारे में होती थी।
इससे तुरंत मालूम हो जाता था कि सरकार ने किसी मद पर कितना अधिक राजस्व जुटाने का प्रस्ताव रखा है। बहरहाल, अब इस चैप्टर को ही समाप्त कर दिया है।
इस बजट में वित्त मंत्री ने अपने भाषण में कहा है कि अप्रत्यक्ष करों के प्रस्ताव से पूरे वर्ष में सरकार को 2000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा।
इसका सीधा अर्थ कि जनता पर 2000 करोड़ रुपए का कर बोझ लादा गया है। यह किन-किन आईटमों पर लादा गया है, यह समय बताएगा।

राजेश शर्मा

Thursday, July 09, 2009

प्रणब दा चले गांव की ओर लेकिन.......



देश की अधिकांश जनता गांवों में बसती है और ऐसा प्रतीत होता है कि यूपीए सरकार ने अपनी दूसरी पारी में पहला बजट पूरी तरह से ग्रामीण जनता को समर्पित कर दिया है क्योंकि इसमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जारी लगभग सभी योजनाओं के लिए आंबटन में बढ़ोतरी की है।
श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रहा है। हमारी 60 प्रतिशत जनसंख्या इससे अपना आहार प्राप्त करती है। उन्होंने कहा कि 2008-09 में कृषि ऋण प्रवाह 2,87,000 करोड़ रुपए था जबकि 2009-10 के लिए लक्ष्य 3,25,000 करोड़ रुपए तय किया गया है। किसानों को ऋण 7 प्रतिशत की दर से दिया जाएगा और जो किसान अपने अल्पावधि ऋण का भुगतान समय पर कर देंगे, उन्हें एक प्रतिशत की दर से सहायता देगी।
वित्त मंत्री ने ग्रामीण जनता को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी थैली खोल दी है।
उन्होंने कहा कि 2009-01 में राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन के लिए 2057 करोड़ रुपए की वृद्वि की जाएगी। अंतरिम बजट में इस मद में 12,070 करोड़ रुपए का प्रावधान था। उन्होंने कहा कि इस योजना को गत वर्ष ही लागू किया गया है और इसके परिणाम अच्छे मिल रहे हैं।

अंतर
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर को कम करने के लिए वित्त मंत्री ने भारत निर्माण योजना के बजट में गत वर्ष की तुलना में 45 प्रतिशत अधिक आबंटन किया है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युत्तीकरण योजना के तहत 7,000 करोड़ रुपए का प्रस्ताव है। यह गत वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत भी आबंटन की राशि बढ़ाई गई है।
ग्रामीण आवास निर्माण में गति लाने के लिए भी सरकार विशेष प्रयास कर रही है।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के लिए सरकार ने आबंटन में जोरदार वृद्वि की है। वर्ष 2009-10 के लिए सरकार ने 39,100 करोड़ रुपए का आबंटन किया है जो गत वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना में 144 प्रतिशत अधिक है। यह योजना 2006 में आरंभ की गई थी और इसे भारी सफलता मिली है।

आदर्श ग्राम
श्री मुखर्जी के अनुसार इस समय देश में लगभग 44,000 ऐसे गांव हैं जिनमें अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। इन ग्रामों के विकास के लिए प्रधान मंत्री आदर्श योजना नामक एक नई योजना आरंभ की जा रही है।

अच्छी बात?
यह एक अच्छी बात है कि सरकार ने ग्रामीण विकास की ओर अधिक ध्यान दिया है और ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है।
लेकिन क्या यह पूरी राशि ग्रामीण जनता तक पहुंच पाएगी। उल्लेखनीय है कि एक बार स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि सरकार जो फंड ग्रामीण जनता के लिए आबंटित करती है उसमें से लगभग 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। बाकी रकम कहां जाती है यह किसी से छुपा नहीं है।
कुछ समय पूर्व यही बात उनके सुपुत्र और युवा नेता श्री राहुल गांधी ने भी कही थी।
ऐसे में प्रश्न फिर यही उठता है कि इस बात की क्या गारंटी है कि यह पूरी रकम जनता तक पहुंच पाएगी। बेहतर होता कि प्रणब दा इस बात की भी कोई ठोस व्यवस्था करते।

--राजेश शर्मा