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Saturday, August 21, 2010

बारिश बहा ले गई कपास और दलहन के दुख...

इस वर्ष जून में भले ही वर्षा कम हुई हो लेकिन जुलाई की वर्षा और अधिक भाव के कारण देश में कपास की बिजाई रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार 6 अगस्त तक देश के विभिन्न राज्यों में 103.37 लाख हैक्टेयर पर कपास की बिजाई की जा चुकी है जबकि गत वर्ष पूरे वर्ष में 103.29 लाख हैक्टेयर पर की गई थी। अभी तमिलनाडु में बिजाई जारी है और जानकारों का कहना है कि इस वर्ष रकबा 105 लाख हैक्टेयर के स्तर को पार कर जाएगा।
देश में बीटी कपास का रकबा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इस वर्ष 103.37 लाख हैक्टेयर में से 91.10 लाख हैक्टेयर पर बीटी कपास की बिजाई की गई है। आंध्र प्रदेश में कपास का रकबा 10.26 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 15.96 लाख हैक्टेयर हो गया है जबकि महाराष्ट्र में 33.30 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 39.22 लाख हैक्टेयर हो गया है। इन दोनों ही राज्य में शानदार वर्षा हुई है और कपास का रिकार्ड उत्पादन होने का अनुमान है।
पंजाब और कर्नाटक में भी कपास की बिजाई अधिक क्षेत्र पर की गई है लेकिन गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में रकबा कम हुआ है। व्यापारियों का कहना है कि चालू वर्ष में अधिक निर्यात के कारण देश के किसानों को कपास के ऊंचे भाव मिलें हैं। विश्व बाजार में कपास के भाव लगभग 87 सेंट प्रति पौंड के आसपास चल रहे हैं जबकि गत वर्ष 64 सेंट चल
रहे थे। सरकार घोषणा कर चुकी है कि वह नए सीजन के आरंभ में निर्यात पर लगे प्रतिबंध को समाप्त कर देगी। इससे आगामी दिनों में देश में कपास के भाव में तेजी का अनुमान है। इसे देखते हुए देश में कपास का उत्पादन 300 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलो) से ऊपर पहुंच जाने का अनुमान है। वास्तव में बीटी काटन के कारण भारत विश्व में कपास का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश बन गया है। कुछ वर्ष पूर्व तक इसका स्थान तीसरा था, लेकिन अब अमेरिका तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। पहला स्थान चीन का है। जानकारी के लिए चीन विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक, आयातक और उपभोक्ता देश है। सूती कपड़े के निर्यात में भी चीन का स्थान पहला है।

दलहन अधिक

इस वर्ष देश में दलहनों की बिजाई भी किसानों ने अधिक की है। अनेक स्थानों पर किसानों ने तिलहन के स्थान पर दलहनों की बिजाई की है। इस वर्ष दलहनों की बिजाई 88.37 लाख हैक्टेयर पर की जा चुकी है। गत वर्ष की इसी अवधि की तुलना में यह लगभग 12 लाख हैक्टेयर अधिक है। अरहर की बिजाई 27.62 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 34.13 लाख हैक्टेयर पर हो गई
है। उड़द और मूंग का रकबा भी बढ़ा है लेकिन अरहर की तुलना में कम। तिलहन के क्षेत्रफल में केवल 3 लाख हैक्टेयर की वृद्धि हुई है और 153.20 लाख हैक्टेयर पर की गई है। मूंगफली का क्षेत्रफल 35.73 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 46 लाख हैक्टेयर पर
पहुंच गया है। इसका प्रमुख कारण समय पर वर्षा के कारण आंध्र प्रदेश में रकबा 8 लाख हैक्टेयर बढ़ कर 12.57 लाख हैक्टेयर हो गया है। अरंडी का रकबा भी कुछ बढ़ा हैट लेकिन सोयाबीन, तिल और सूरज मुखी की बिजाई गत वर्ष की तुलना में पीछे चल रही है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में सोयाबीन का रकबा कम है।

चावल व मोटे अनाज
चावल का रकबा 225.75 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 244.83 लाख हैक्टेयर हो गया। मक्का के रकबे में में लगभग 3 लाख हैक्टेयर की बिजाई हुई है। बाजरा का रकबा 64.14 लाख हैक्टेयर से बढ़ कर 75.90 लाख हैक्टेयर हो गया लेकिन ज्वार
का रकबा कुछ कम हुआ है।

राजेश शर्मा

Sunday, August 01, 2010

मौसम की मार से छोटी इलायची के बड़े भाव

छोटी इलायची के उत्पादन पर मौसम की मार पड़ चुकी है। हालांकि इस समय मौसम फसल के अनुकूल है लेकिन पहले काफी नुकसान हो चुका है। अधिक उत्पादन की आशा अब धूमिल पड़ चुकी है और छोटी इलायची का उत्पादन गत वर्ष के बराबर ही होने का अनुमान लगाया जा रहा है। केरल के इडुक्की जिले में गर्मियों के दौरान वर्षा नहीं होने से फसल प्रभावित हुई है। वर्षा के अभाव में फल का आकार बढ़ नहीं पाया है। इस जिले में छोटी इलायची का उत्पादन सबसे अधिक होता है। गर्मी अधिक समय तक रहने के कारण नई फसल की आवक में देरी भी हो रही है। इस समय वहां पर मौसम अनुकूल चल रहा है और जानकारों का कहना है कि आगामी माह से नई फसल की आवक गति पकड़ लेगी। अब 15 अगस्त के बाद आवक जोरों पर होने का अनुमान है।

आवक कम

खराब मौसम के कारण उत्पादन प्रभावित होने से गत सप्ताह 5 नीलामियों में केवल 41 टन की आवक हुई है। इसमें से कसीपीएमसी में 12 टन की आवक हुई और पूरी बिक गई। भाव ऊंचे होने के कारण निर्यातकों की खरीद बाजार में बिल्कुल भी नहीं है। भाव अधिक होने के अतिरिक्त क्वालिटी भी हल्की है। निर्यातक ऊंचे भाव और हल्की क्वालिटी के कारण वे इस वर्ष रमजान की निर्यात मांग पूरी करने में सक्षम नहीं हैं। नीलामी में उच्चतम भाव 1,796.50 रुपए और न्यूनतम भाव 1,304 रुपए रहा जबकि औसत भाव 1,639.51 रुपए प्रति किलो रहा। इसी बीच, एक अगस्त से आरंभ हुए वर्ष के दौरान 25 जुलाई तक कुल 9,815 टन छोटी इलायची की आवक हुई है जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 10,298 टन की आवक हुई थी।

उल्लेखनीय है कि विश्व में छोटी इलायची केवल दो ही प्रमुख उत्पादक देश हैं। पहला स्थान ग्वाटेमाला का है जबकि दूसरा भारत का है। क्वालिटी में भारतीय छोटी इलायची बेहतर और इसकी खुशबू के कारण खाड़ी के देशों में इसकी मांग अधिक रहती है और भाव भी अधिक होते हैं। दूसरी ओर, विश्व के लगभग प्रत्येक देश में इसकी खपत होती है लेकिन सबसे अधिक खपत खाड़ी के देशों, पाकिस्तान, अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन आदि में होती है।
वर्ष 2009-10 अगस्त-जुलाई के दौरान भारत में छोटी इलायची के भाव रिकार्ड स्तर को छू चुके हैं। अब भाव में कुछ कमी आ रही है लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि दीपावली तक इनमें कुछ खास कमी आ पाएगी क्योंकि सारे त्यौहार सिर पर हैं जबकि पुराना स्टाक नगण्य है।

राजेश शर्मा

Monday, July 26, 2010

गोरों की रसोई में हिंदुस्तानी मसालों का राज

जहाँ तक भारतीय मसालों की खुशबू विदेशों में फैलने का सवाल या जिक्र है तो वो विदेशों में अभी से नहीं बल्कि पता नहीं कितने बरसों से फैली हुई है...सभी बड़े-बड़े फूड और ग्रॉसरी स्टोर भरे पड़े हैं भारतीय मसालों और आटा, दाल, चावल, घी, तेल से...सभी गोरे और काले लोग भारतीय खाने के क्रेजी यानी दीवाने हुए जा रहे हैं। 'करी' उन सबकी फेवरट डिश है..और चिकेन टिक्का मसाला तो सरताज बना है भारतीय '' करी '' में उन सबके लिये..मसालेदार चिकेन कोरमा भी चावल के साथ बहुत खाते हैं.. काफी समय पहले इटैलियन खाना टॉप पर समझा जाता था ब्रिटेन में फिर चाइनीज खाना हुआ टॉप पर लेकिन अब सालों से भारतीय खाना ही टॉप पर है और छा गया है उन सबके दिल-दिमाग और पेट पर. गोरे लोग तो हैं ही दीवाने भारतीय खाने के..जिसे वह जमकर खाते हैं..साथ में अफ्रीकन, चाइनीज, इटैलियन भी अब हमारे देसी खाने के शौक़ीन होते जा रहे हैं...और जर्मन लोगों की तो पूछो ही ना...हर जर्मन चाहें किसी उम्र का भी हो उसे भारतीय खाना बहुत पसंद है...यहाँ पर कुछ गोरों के कुत्ते भी करी पसंद करते हैं...उनके संग खाते-खाते उनकी भी आदत पड़ गयी....ये मजाक की बात नहीं बल्कि सही है...और '' करी '' शब्द से उनका मतलब होता है..भारतीय मसाले वाली डिश...यानी दाल या सब्जी..चाहें वह '' मीट करी '' हो '' वेजिटेबिल करी '' या '' लेंटिल करी '' ( दाल ). लस्सी भी बड़े शौक से पीते हैं ये लोग. अधिकतर गोरों को कहते सुना हैं कि उन्हें उनका खाना अब अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह फीका होता है...यानि कि स्वादरहित...यहाँ हर तरह के मूड का फूड मिलता है और लोग अपने मूड के हिसाब से फूड खाते हैं...मतलब कि अब तो फ्यूजन फूड का भी कबसे फैशन चल पड़ा है...फ्रेंच फ्राइज ( french fries: आलुओं की तली हुई लम्बी फांके ) इन्हें यहाँ पोटैटो चिप्स भी कहते हैं...हाँ, तो इनके साथ करी भी खाते हैं अब लोग...पैकेट में जो बिकते हैं उन्हें क्रिस्प बोलते हैं...तो अब कुछ क्रिस्प या चिप्स भी यहाँ ब्रिटिश स्टोर्स में मसाला पड़े बिकने लगे हैं..पिज्जा के साथ फ्रेंच फ्राइज और आग में या ओवेन में भुने हुये आलू में सोया मिंस और राजमा की सूखी मसाले वाली सब्जी भर कर खाते हैं..जिसे जैकेट पोटैटो के नाम से बोलते हैं.
यहाँ भारतीय लोग तो हैं ही अपने खाने के शौक़ीन..घर में भी बनाते हैं और बाहर भी खाते हैं रेस्टोरेंट में. जो लोग भारत के जिस ख़ास क्षेत्र से आये हैं और जिन मसालों का इस्तेमाल उन क्षेत्रों में होता है भारत में वह सभी मसाले यहाँ भारतीय ग्रासरी या फूड स्टोर्स में उपलब्ध हैं. और कई सालों से यहाँ के अपने भी बड़े-बड़े नामी स्टोर्स जैसे कि: Asda,Tesco, Sainsbury, Waitrose, Marks & Spencer, Iceland, Co Op, Lidl (जर्मन) आदि ग्रासरी स्टोर्स या कहो फूड स्टोर भी तमाम भारतीय मसाले बेचने लगे हैं...कुछ मसाले तो जैसे काली मिर्च, तेजपत्ता, इलायची आदि और कुछ अन्य भी मसाले भारतीय दुकानों की तुलना में अब इन स्टोर्स में सस्ते मिलते हैं...साथ में इन स्टोर्स में स्वाद में बहुत ही उम्दा तरीके का दही मिलता है. जिन इलाकों में भारतीय लोगों की तादाद अधिक है वहाँ के ग्रासरी स्टोर्स में अब इंडियन कुल्फी जिसमे सभी तरह की जैसे केसर, बादाम, पिस्ता, आम से बनी हुई और साथ में गुलाबजामुन और गाजर का हलवा इत्यादि भी बिकने लगे हैं. उत्तर भारत, दक्षिण भारत, गुजरात और पंजाब सब तरह के खानों के रेस्टोरेंट हैं जहाँ मिठाइयाँ भी मिलती हैं...और ब्रिटिश लोग भी भारतीय मिठाइयों के शौक़ीन हो रहे हैं वह चाहें काले लोग हों अफ्रीका के या गोरे किसी भी देश के...समोसा और पकौड़े तो बड़े ही शौक से खाते हैं जैसे कि हम लोग...और उनमें अगर मिर्च कम लगे तो कहते हैं कि जितना अधिक चटपटा हो उतना मजा आता है खाने में.. हर बिदेशी के घर में यहाँ कई तरह के भारतीय मसाले मिलेंगे..ये बात और है कि सभी प्रकार के नहीं क्योंकि अब तक उन लोगों को सब तरह के मसालों का खाने में उपयोग करना नहीं आता..लेकिन उनका उपयोग जानने के लिये बहुत उत्सुक रहते हैं...मेक्सिकन और मोरक्कन लोग अपने खाने में जीरा का प्रयोग काफी करते हैं, मोरक्कन लोग हरीसा सौस बहुत खाते हैं अपने खाने में..जिसमे मुख्य रूप से सूखी लाल मिर्च होती हैं जिन्हें तेल, धनिया पाउडर व नीबू का रस डालकर पीस कर बनाते हैं और यह एक लाल रंग के पेस्ट की तरह दिखती है, ग्रीक लोग मसालों को अधिक इस्तेमाल नहीं करते बस जीरा, काली मिर्च पाउडर और मिर्च पाउडर का इस्तेमाल करते हैं, चाइनीज लोग जब करी बनाते हैं तो उसमें फाइव स्पाइस यानि कि पंच पूरन पिसे मसाले का प्रयोग करते हैं जो मेथी, सौंफ, कालीमिर्च, दालचीनी, लौंग और सोंठ ( सूखी अदरक ) का मिश्रण होता है...और इटैलियन लोग जब tomato sauce बनाते हैं pizza या pasta के लिये तो कभी-कभी उसमे bayleaf यानि तेजपत्ता डालकर बनाते हैं उससे sauce का flavour कुछ बढ़ जाता है. और वह लोग लाल सूखी मिरचों का इस्तेमाल उसे पीसकर भी करते हैं और साबुत मिरचों का इस्तेमाल हर्ब और चिली आयल बनाने में भी करते हैं...मतलब साबुत सूखी मिरचें ओलिव आयल में कुछ दिन डालकर रखते हैं फिर उस चटपटे तेल को pizza पर छिड़क कर खाते हैं या उसे अन्य प्रकार से भी इस्तेमाल करते हैं अपने खाने में ( हर्ब कई प्रकार के होते हैं जो इटैलियन खानों में ऐसे इस्तेमाल करते हैं जैसे हम लोग अगर धनिया या पोदीना का इस्तेमाल अपने खाने में डालकर करें ) और ब्रिटिश गोरे लोग कुछ मसाले जैसे हल्दी, मिर्च, धनिया और जीरा पाउडर, गरम मसाला, कालीमिर्च पाउडर का और जायफल पाउडर का इस्तमाल ही अधिक करना जानते हैं...मेथी व सौंफ का इस्तेमाल करना वह लोग नहीं जानते...जायफल के पाउडर को सेव की चटनी, कुछ ख़ास प्रकार के केक व पालक की सब्जी में बहुत इस्तेमाल करते हैं. अमरीकन लोग apple यानि सेब से और pumpkin यानि कद्दू से मीठी डिश pie जिसे आप पेस्ट्री भी कह सकते हैं खूब बनाते हैं और जिसमे दालचीनी पाउडर का खूब प्रयोग होता है.
कई बार ऐसा हुआ कि जब सुपरमार्केट में कुछ खरीदने गयी तो किसी गोरी या गोरा ने मुझसे पूछा कि मैं उस मसाले का इस्तेमाल कैसे और किस तरह के खाने में करूँगी और वह फिर मेरे बताने पर बड़े कौतूहल से सुनते हैं...और कई बार सब्जियाँ खरीदते हुये वो लोग पूछते हैं कि मैं उस सब्जी को किस मसाले से बनाउँगी...बैंगन का उपयोग करना यहाँ के बहुत लोग नहीं जानते और एक बार जब मैं बैंगन खरीद रही थी तो एक लेडी को जिज्ञासा हुई कि उसका कैसे इस्तेमाल होता है..तो मैंने उसे बैगन से बनने वाली तमाम तरह की चीजें बतायीं और उनमें पड़ने वाले मसालों के नाम भी..अक्सर इसी तरह ये लोग नये मसालों का इस्तेमाल करना भी जानते रहते हैं..और हाँ, ये लोग रोटी, पराठा, पूरी, और नान बगैरा बनाने को झंझट समझते हैं और बचते रहते हैं...उन चीजों को रेडीमेड ही खरीदते हैं...इन लोगों को इलायची, नारियल और केसर का उपयोग भी करना नहीं आता..क्यों कि इनके खाने में ये नहीं पड़ती और मिठाइयों में वैनिला व अन्य प्रकार के एसेन्स पड़ते हैं...लन्दन में न जाने कितने भारतीय रेस्टोरेंट हैं जहाँ खाने वाले गोरों की संख्या उतनी ही मिलेगी जितनी कि भारतीय लोगों की..बल्कि कई बार उनसे भी ज्यादा..कुछ भारतीय रेस्टोरेंट सारा दिन खुलते हैं..कुछ केवल दोपहर और शाम को यानि कि लंच व डिनर के लिये और कुछ शाम को ही जो Take Away फूड कहलाते हैं जहाँ लोग खाना खरीदकर घर ले जाकर खाते हैं..और ऐसी जगहों पर अधिकतर अंग्रेज ही खरीदते हुये देखे जाते हैं जो भारतीय खाने के शौक़ीन हैं. आम की भी इन दिनों भरमार है हालांकि इस साल अभी लंगड़ा आम नहीं आया है..लेकिन चौंसा आम आ रहा है..और भी प्रकार के आम जैसे हनी पाकिस्तान से आ रहा है...एक आम करीब ५० रूपए का मिलता है यहाँ.

स्ट्राबेरी, सेव, नाशपाती, प्लम, रास्पबेरी , ब्लैकबेरी, रेड करेंट और आड़ू यहाँ ब्रिटेन में खूब उगाये जाते हैं. यूरोप के अन्य देशों से व अफ्रीकन देशों से भी तमाम खाने की चीजें आती हैं...स्पेन से तरबूज, खरबूजा, कई प्रकार के संतरे, वेस्ट इंडीज से केले, साइप्रस से भी तरबूज और खरबूजा, इटली से अँगूर, पीचेज, टमाटर, संतरे और अफ्रीका से तमाम तरह की सब्जियाँ जिनमे जमीन के अन्दर उगने वाली भी होती हैं, कद्दू व कच्चे केले...भारत से तो तमाम फल और सब्जियाँ आती हैं...उनकी तारीफ में क्या और कितना कहूँ...कई सालों पहले न इतने स्टोर थे और ना ही इतनी विविध प्रकार के फल व सब्जियाँ..लेकिन अब अन्य सभी चीजों के साथ मसालों की भी हर जगह भरमार है...
मसालों ने बनाया हर देश में मुकाम, हिंदुस्तान का ऊँचा कर दिया नाम...है ना कमाल की बात..? जय हिंद !!!!!

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका लंदन में रहती हैं)

Thursday, July 15, 2010

सात समंदर पार फैली भारतीय मसालों की खुशबू

भारतीय मसालों का वैश्विक बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्व में मसालों के उत्पादन में भारत सबसे आगे है और यहां पर लगभग 3,000 मसालों का उत्पादन होता है। छोटी इलायची, काली मिर्च, हल्दी, लाल मिर्च आदि के उत्पादन ने विश्व में भारत पहले या दूसरे पासदान पर है।हाल ही में समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान देश से सभी प्रकार के मसालों के निर्यात में 7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई और यह बढ़ कर 5.02 लाख टन पर पहुंच गया। मूल्यानुसार निर्यात 53 बिलियन रुपए से बढ़ कर 55.61 बिलियन रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। अनेक वर्षों के बाद छोटी इलायची का निर्यात चार अंकों मं पहुंचा है। वर्ष 2009-10 के दौरान 1,975 टन छोटी इलायची का निर्यात किया गया जो पिछले 10 वर्षों का रिकार्ड है। गत वर्ष केवल 750 टन का ही निर्यात किया गया था।
ग्वाटेमाला में उत्पादन कम होने के कारण भारत से सऊदी अरबिया, यूएई, कुवैत, मिस्र आदि देशों को अधिक मात्रा में निर्यात किया गया। आलोच्य वर्ष में छोटी इलायची का निर्यात 839 रुपए प्रति किलो की दर पर किया गया जबकि गत 2008-09 में 630.20 रुपए प्रति किलो की दर पर किया गया था। लाल मिर्च का निर्यात भी 9 प्रतिशत बढ़ कर 2.04 लाख टन हो गया। बोर्ड के अनुसार मलेशिया, श्रीलंका, बांग्लादेश और इंडोनेशिया आदि को अधिक मात्रा में निर्यात किया गया लेकिन पाकिस्तान को निर्यात केवलन 175 टन का किया गया। वर्ष 2008-09 में निर्यात 22,375 टन का किया गया था।
कुल मसाला निर्यात में लाल मिर्च की हिस्सेदारी मात्रा अनुसार भी और मूल्यानुसार भी सबसे अधिक है। देश से बड़ी इलायची का निर्यात 1,875 टन से गिर कर 1,000 टन का रह गया। बहरहाल, निर्यात से प्राप्त औसत भाव 121.64 रुपए प्रति किलो से बढ़ कर 178.86 रुपए प्रति किलो हो गया। धनिया निर्यात 56 प्रतिशत बढ़ कर 47,250 टन हो गया। लहसुन का निर्यात भी गत वर्ष की तुलना में अधिक रहा।
प्राप्त आंकड़ों के अनुसार काली मिर्च का निर्यात 22 प्रतिशत गिर कर 19,750 टन रह गया। इसका प्रमुख कारण अमेरिका और यूरोपीय समुदाय की मांग कम होना है।
हल्दी और जीरे के निर्यात में मामूली कमी आई और घट की क्रमशः 50,750 टन और 49,750 टन रह गया। निर्यात की यह गति अप्रैल में भी बनी रही।

राजेश शर्मा
(लेखक बैठक पर बिज़नेस और अर्थव्यवस्था से जुड़े कॉलम लिखते रहे हैं...अगर आपके पास भी इस मुद्दे से जुड़ा कोई सवाल हो तो लेखक से rajeshsharma1953@gmail.com या baithak.hindyugm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )