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Thursday, July 09, 2009

प्रणब दा चले गांव की ओर लेकिन.......



देश की अधिकांश जनता गांवों में बसती है और ऐसा प्रतीत होता है कि यूपीए सरकार ने अपनी दूसरी पारी में पहला बजट पूरी तरह से ग्रामीण जनता को समर्पित कर दिया है क्योंकि इसमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जारी लगभग सभी योजनाओं के लिए आंबटन में बढ़ोतरी की है।
श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रहा है। हमारी 60 प्रतिशत जनसंख्या इससे अपना आहार प्राप्त करती है। उन्होंने कहा कि 2008-09 में कृषि ऋण प्रवाह 2,87,000 करोड़ रुपए था जबकि 2009-10 के लिए लक्ष्य 3,25,000 करोड़ रुपए तय किया गया है। किसानों को ऋण 7 प्रतिशत की दर से दिया जाएगा और जो किसान अपने अल्पावधि ऋण का भुगतान समय पर कर देंगे, उन्हें एक प्रतिशत की दर से सहायता देगी।
वित्त मंत्री ने ग्रामीण जनता को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी थैली खोल दी है।
उन्होंने कहा कि 2009-01 में राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन के लिए 2057 करोड़ रुपए की वृद्वि की जाएगी। अंतरिम बजट में इस मद में 12,070 करोड़ रुपए का प्रावधान था। उन्होंने कहा कि इस योजना को गत वर्ष ही लागू किया गया है और इसके परिणाम अच्छे मिल रहे हैं।

अंतर
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर को कम करने के लिए वित्त मंत्री ने भारत निर्माण योजना के बजट में गत वर्ष की तुलना में 45 प्रतिशत अधिक आबंटन किया है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युत्तीकरण योजना के तहत 7,000 करोड़ रुपए का प्रस्ताव है। यह गत वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत भी आबंटन की राशि बढ़ाई गई है।
ग्रामीण आवास निर्माण में गति लाने के लिए भी सरकार विशेष प्रयास कर रही है।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के लिए सरकार ने आबंटन में जोरदार वृद्वि की है। वर्ष 2009-10 के लिए सरकार ने 39,100 करोड़ रुपए का आबंटन किया है जो गत वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना में 144 प्रतिशत अधिक है। यह योजना 2006 में आरंभ की गई थी और इसे भारी सफलता मिली है।

आदर्श ग्राम
श्री मुखर्जी के अनुसार इस समय देश में लगभग 44,000 ऐसे गांव हैं जिनमें अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। इन ग्रामों के विकास के लिए प्रधान मंत्री आदर्श योजना नामक एक नई योजना आरंभ की जा रही है।

अच्छी बात?
यह एक अच्छी बात है कि सरकार ने ग्रामीण विकास की ओर अधिक ध्यान दिया है और ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है।
लेकिन क्या यह पूरी राशि ग्रामीण जनता तक पहुंच पाएगी। उल्लेखनीय है कि एक बार स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि सरकार जो फंड ग्रामीण जनता के लिए आबंटित करती है उसमें से लगभग 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। बाकी रकम कहां जाती है यह किसी से छुपा नहीं है।
कुछ समय पूर्व यही बात उनके सुपुत्र और युवा नेता श्री राहुल गांधी ने भी कही थी।
ऐसे में प्रश्न फिर यही उठता है कि इस बात की क्या गारंटी है कि यह पूरी रकम जनता तक पहुंच पाएगी। बेहतर होता कि प्रणब दा इस बात की भी कोई ठोस व्यवस्था करते।

--राजेश शर्मा

Wednesday, May 20, 2009

....क्योंकि कोई विकल्प नहीं था !

लोक सभा के चुनाव परिणामों से सिर्फ एक राहत महसूस की जा सकती है और वह यह है कि केंद्र में अस्थिरता का डर नहीं रहा। लेकिन यह राहत भी सिर्फ उनके लिए हैं जो किसी भी कीमत पर स्थिरता को तरजीह देते हैं। सरकार या शासन की स्थिरता अपने आपमें कोई काम्य चीज नहीं है। स्थिरता तब अच्छी होती है जब वह देश को बेहतर ढंग से चलाने का माध्यम बने। अगर बकवास नीतियों और बकवास नेतृत्व के बावजूद स्थिरता बनी रहती है, जैसा नरसिंह राव के जमाने में था, तो वह देश के लिए नुकसानदेह और कभी-कभी खतरनाक भी होती है। मनमोहन सिंह सरकार की उपलब्धियां ऐसी नहीं रही हैं कि उन्हें एक महान प्रधानमंत्री माना जा सके। इसी तरह, सोनिया गांधी दूसरे नेताओं की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली साबित हुई हैं, पर यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि उनके नेतृत्व में हम एक महान भारत का सृजन करने जा रहे हैं। न ही कांग्रेस के बारे में यह दावा किया जा सकता है कि उसका कायाकल्प हो चुका है और अब वह राष्ट्र निर्माण की ऐसिहासिक भूमिका का निर्वाह करने जा रही है।

ये सब ऐसी खामखयालियां हैं जो कांग्रेस को इतनी अधिक सीटें मिलने से पैदा हुई हैं। वैसे, इन सीटों की संख्या इतनी भी नहीं है कि बहुमत के लिए उसे अन्य दलों का सहारा न लेना पड़े। इसलिए सीटों की संख्या पर इतराने का कोई वास्तविक कारण दिखाई नहीं देता। राजीव गांधी को 1984 में तीन-चौथाई बहुमत मिला था। लेकिन उनके शासन की कौन-सी उपलब्धियां आज याद आती हैं? बोफोर्स का दाग अभी तक नहीं मिट पाया है। इसी तरह, नरसिंहराव को बहुमत तो नहीं मिल पाया था, पर धीरे-धीरे तोड़-फोड़ की अपनी कुशलता के कारण उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए बहुमत का प्रबंध कर लिया था। लेकिन अंत में हुआ क्या? आज उन्हें देश के सबसे निस्तेज प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है। बाबरी मस्जिद कांड उन्हीं के समय में घटित हुआ था।

फिर कांग्रेस की इस अप्रत्याशित जीत की व्याख्या कैसे की जाए? इस व्याख्या पर ही निर्भर है कि हम वर्तमान राजनीति से क्या उम्मीद करते हैं। अगर कोई यह कहता है कि अब क्षेत्रीय दलों की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है तथा यह उनके पराभव का समय है, तो यह मिथक है। बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, बिहार का जनता दल (यूनाइटेड), उत्तर प्रदेश का समाजवादी दल, बहुजन समाज पार्टी आदि क्षेत्रीय दल नहीं तो और क्या हैं? यह जरूर है कि जिन क्षेत्रीय दलों की उपयोगिता बची हुई है, वे दल ही बचे हैं; जिन्होंने अपनी उपयोगिता का खुद ही भक्षण कर डाला है, वे ढलाव के शिकार हुए हैं। लेकिन यह तो राष्ट्रीय दलों के साथ भी होता रहा है। कांग्रेस और भाजपा, दोनों कई-कई बार नीचे जा चुकी हैं और फिर उभरी हैं। इसी तरह, क्षेत्रीय दल भी नीचे-ऊपर आते-जाते रहे हैं। इस राजनीतिक चक्र को भूल कर किसी एक चुनाव के आधार पर कोई बड़ा निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी राजनीतिक विश्लेषण के बचकानेपन के अलावा कुछ नहीं है।

सवाल यह भी है : अगर राष्ट्रीय दलों का जमाना सचमुच लौट आया है, तो यह सिर्फ कांग्रेस के लिए ही क्यों लौटा? भाजपा को भी तो राष्ट्रीय दल माना जाता है। सच पूछिए तो दोनों में से कोई भी व्यापक और सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय दल नहीं है। इसीलिए जिस अर्थ में कांग्रेस राष्ट्रीय दल है, उसी अर्थ में भाजपा भी राष्ट्रीय दल है। उसी अर्थ में बसपा भी राष्ट्रीय दल बनने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय दलों की वापसी का समय आ गया है, तो इसका लाभ कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी दलों को भी मिलना चाहिए था, जो नहीं हुआ है। इसलिए यह स्थापना भी निराधार प्रतीत होता है।

फिर कांग्रेस की जीत को कैसे समझा जाए? इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि कांग्रेस का कोई ऐसा विकल्प चुनाव मैदान में नहीं था जिसे कांग्रेस से बेहतर कहा जा सके। चुनाव की घोषणा के पहले ही लालकृष्ण आडवाणी ने अपने को भावी प्रधानमंत्री घोषित कर दिया था। इस नाते भाजपा ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी थी। भाजपा अपने सांप्रदायिक चेहरे के साथ-साथ हर अर्थ में दक्षिणपंथी पार्टी है। कांग्रेस को मध्यमार्गी दल माना जाता है, पर उसकी आर्थिक नीतियां भी पूरी तरह से दक्षिणपंथी हैं। अमेरिका से नजदीकी कांग्रेस भी चाहती है और भाजपा भी। यह जरूर है कि कांग्रेस का एक इतिहास, भले ही वह मुखौटा ही हो, गरीबी हटाओ का भी है, जो भाजपा का नहीं है। भाजपा उद्योगपतियों और व्यापारियों की ही नहीं, सवर्ण जातियों की भी पार्टी मानी जाती है। दूसरी ओर, कांग्रेस भी उद्योगपतियों और व्यापारियों की पार्टी है, पर वह गरीबों का नाम भी लेती रहती है और उनके लिए समय-समय पर कुछ कार्यक्रम भी बनाती रहती है। राष्ट्रीय ग्रामीण राजगार गारंटी योजना उसी ने लागू की थी, जिसका कुछ इलाकों में अच्छा असर पड़ा है। इस दृष्टि से देखा जाए, तो मतदाताओं ने कांग्रेस को चुन कर कुछ भी गलत नहीं किया।

कांग्रेस को असली चुनौती तब मिलती जब उसके मुकाबले कोई सचमुच का वामपंथी दल या दल समूह खड़ा होता। वामपंथी दलों ने यही सोच कर तीसरा मोर्चा बनाया था। लेकिन क्या यह वास्तव में तीसरा मोर्चा था? सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि इसका नेतृत्व कर रहे सीपीएम और अन्य वामपंथी दल स्वयं केरल और प. बंगाल में अपनी वामपंथी साख लुटा चुके थे। गरीब किसानों का दमन करने के मामले में वे किसी भी अन्य दल के मुकाबले ज्यादा क्रूर साबित हुए हैं। केरल के सीपीएम में घमासान चल रहा था। तीसरा मोर्चा बनाने के लिए जिन दलों का साथ लिया गया, वे अपने-अपने राज्य में राजनीतिक रूप से दिवालिया हो चुके थे। गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा होने का ऑटोमेटिक मतलब प्रगतिशील या जनवादी नहीं होता। फिर इनमें से अनेक दल ऐसे भी हैं जो अतीत में भाजपा के साथ रह चुके हैं। इसलिए उनकी विश्वसनीयता भी खटाई में थी। सच पूछा जाए तो तीसरा मोर्चा इतना बोगस था कि उसे वोट देने के बारे में कोई गंभीरता से सोच ही नहीं सकता था। इस तरह, बिना कुछ ज्यादा किए-कराए सत्ता एक तरह से मुफ्त में कांग्रेस की झोली में आ गिरी।

यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी की जीत स्वयं उसके लिए भी अविश्सनीय है। जब मीडिया के लोग अनुमान लगा रहे थे कि किसी भी दल समूह को बहुमत नहीं मिलेगा, तो वे हवा में कबड्डी नहीं खेल रहे थे। यही आकलन स्वयं राजनीतिक दलों का भी था। राहुल गांधी तो विपक्ष में बैठने के लिए भी तैयार थे। लालकृष्ण आडवाणी की आशाएं भी धीरे-धीरे धूमिल हो रही थीं, क्योंकि तमाम प्रयासों के बावजूद भाजपा की कोई लहर नहीं बन पा रही थीष्। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का खयाल आसमान से नहीं टपका था। इससे भी आडवाणी का भविष्य कुछ धूमिल हुआ।

बहरहाल, जो होना था, हो चुका। एक मान्यता है कि जो हुआ, वही हो सकता था। अगर कुछ और हो सकता था, तो वह हुआ क्यों नहीं? इसलिए कांग्रेस के जीतने को एक ऐसिहासिक घटना मान कर चलना ही उचित है। सवाल अब यह है कि आगे क्या? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि फिलहाल कांग्रेस का कोई प्रगतिशील विकल्प उभरता दिखाई नहीं देता। वामपंथियों में आत्मपरीक्षण के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। कायदे से प्रकाश करात को सीपीएम की शोचनीय पराजय के बाद अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए था। पर इसकी हलकी-सी आहट भी सुनाई नहीं देती। प. बंगाल की हार तो इतनी जबरदस्त है कि वहां के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को एक दिन के लिए भी अपने पद पर रहने का नैतिक हक नहीं है। इसी तरह, तीसरा मोर्चा में शामिल अन्य दलों में भी अंत:परीक्षण का कोई साक्ष्य दिखाई नहीं देता। यानी, भविष्य का परिदृश्य अत्यधिक धूमिल जान पड़ता है।

क्या यह चिंता की बात नहीं है कि इतने बड़े देश में कोई राजनीतिक विकल्प न हो जो जरूरत पड़ने पर वर्तमान सत्तारूढ़ दल का स्थान ग्रहण कर सके? कांग्रेस सफल होती है तो और नहीं सफल होती है तो भी, अच्छा लोकतंत्र वही होता है जिसमें वर्तमान का विकल्प हमेशा मौजूद रहे। इसे ही असली विपक्ष कहा जाता है। मौजूदा लोक सभा का सबसे दैन्यपूर्ण पक्ष यह दिखाई देता है कि इसमें कोई मजबूत विपक्ष नहीं है। यह सत्ता को निरंकुश बनाने के लिए काफी है। चूंकि वर्तमान राजनीति में कांग्रेस का कोई ठीक-ठाक विकल्प उभरता दिखाई नहीं देता, इसलिए कम से कम जनतंत्र के हित में आवश्यक है कि इसके लिए ठोस प्रयास किया जाए। ऐसा न हो कि पांच साल बाद फिर चुनाव की घड़ी आए और हम हाथ पर हाथ धरे पछताते रहें कि हाय, हमारे पास कोई सार्थक विकल्प नहीं हैं। विकल्प दो-चार महीनों में खड़ा नहीं होता। इसके लिए पांच वर्ष भी कम हैं। पर पांच वर्ष की अवधि इतनी छोटी भी नहीं है कि कुछ हो ही न सके। सवाल सिर्फ इतना है कि देश की तकदीर बदलने की कोई राजनीतिक इच्छा हमारे मनों में खदबदा रही है या नहीं।

राजकिशोर