Showing posts with label export. Show all posts
Showing posts with label export. Show all posts

Thursday, July 15, 2010

सात समंदर पार फैली भारतीय मसालों की खुशबू

भारतीय मसालों का वैश्विक बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्व में मसालों के उत्पादन में भारत सबसे आगे है और यहां पर लगभग 3,000 मसालों का उत्पादन होता है। छोटी इलायची, काली मिर्च, हल्दी, लाल मिर्च आदि के उत्पादन ने विश्व में भारत पहले या दूसरे पासदान पर है।हाल ही में समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान देश से सभी प्रकार के मसालों के निर्यात में 7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई और यह बढ़ कर 5.02 लाख टन पर पहुंच गया। मूल्यानुसार निर्यात 53 बिलियन रुपए से बढ़ कर 55.61 बिलियन रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। अनेक वर्षों के बाद छोटी इलायची का निर्यात चार अंकों मं पहुंचा है। वर्ष 2009-10 के दौरान 1,975 टन छोटी इलायची का निर्यात किया गया जो पिछले 10 वर्षों का रिकार्ड है। गत वर्ष केवल 750 टन का ही निर्यात किया गया था।
ग्वाटेमाला में उत्पादन कम होने के कारण भारत से सऊदी अरबिया, यूएई, कुवैत, मिस्र आदि देशों को अधिक मात्रा में निर्यात किया गया। आलोच्य वर्ष में छोटी इलायची का निर्यात 839 रुपए प्रति किलो की दर पर किया गया जबकि गत 2008-09 में 630.20 रुपए प्रति किलो की दर पर किया गया था। लाल मिर्च का निर्यात भी 9 प्रतिशत बढ़ कर 2.04 लाख टन हो गया। बोर्ड के अनुसार मलेशिया, श्रीलंका, बांग्लादेश और इंडोनेशिया आदि को अधिक मात्रा में निर्यात किया गया लेकिन पाकिस्तान को निर्यात केवलन 175 टन का किया गया। वर्ष 2008-09 में निर्यात 22,375 टन का किया गया था।
कुल मसाला निर्यात में लाल मिर्च की हिस्सेदारी मात्रा अनुसार भी और मूल्यानुसार भी सबसे अधिक है। देश से बड़ी इलायची का निर्यात 1,875 टन से गिर कर 1,000 टन का रह गया। बहरहाल, निर्यात से प्राप्त औसत भाव 121.64 रुपए प्रति किलो से बढ़ कर 178.86 रुपए प्रति किलो हो गया। धनिया निर्यात 56 प्रतिशत बढ़ कर 47,250 टन हो गया। लहसुन का निर्यात भी गत वर्ष की तुलना में अधिक रहा।
प्राप्त आंकड़ों के अनुसार काली मिर्च का निर्यात 22 प्रतिशत गिर कर 19,750 टन रह गया। इसका प्रमुख कारण अमेरिका और यूरोपीय समुदाय की मांग कम होना है।
हल्दी और जीरे के निर्यात में मामूली कमी आई और घट की क्रमशः 50,750 टन और 49,750 टन रह गया। निर्यात की यह गति अप्रैल में भी बनी रही।

राजेश शर्मा
(लेखक बैठक पर बिज़नेस और अर्थव्यवस्था से जुड़े कॉलम लिखते रहे हैं...अगर आपके पास भी इस मुद्दे से जुड़ा कोई सवाल हो तो लेखक से rajeshsharma1953@gmail.com या baithak.hindyugm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )

Sunday, August 30, 2009

डेयरी उद्योग पर भी सूखे की मार

डेयरी उद्योग परेशानी मे
देश का डेयरी उद्योग इन दिनों परेशानी के दौर से गुजर रहा है। एक ओर जहां पशु आहार आदि की भाव वृद्वि से दूध की उत्पादन लागत बढ़ने से उससे तैयार पदार्थ महंगे हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर विदेशी निर्यातक भारत में सस्ते उत्पाद डम्प कर रहे हैं। इस वर्ष देश के अनेक हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति है। इससे पशु आहार और हरा चारा मंहगा हो गया है। सोयामील, राईस ब्रान खल, सरसों की खल, शीरा आदि पशु आहार तैयार करने में प्रमुख रुप से प्रयोग किए जाते हैं। पिछले कुछ महीनों में इन सबके भाव में एकतरफा बढ़ोतरी हुई है। पशु आहार महंगा होने से इसका असर दूध की उत्पादन लागत पर आ रहा है। दूध उत्पादों घी, मिल्क पावडर आदि के भाव भी बढ़ रहे हैं।

आयात

जहां एक ओर, पशु आहार महंगा होने और अन्य खर्च बढ़ने से दूध आदि की लागत बढ़ गई है वहीं दूसरी ओर विदेशों से सस्ता आयात किया जा रहा है। स्किम्ड मिल्क पावडर (एसएमपी) के अतिरिक्त बटर आयल आदि का आयात भारी मात्रा में
किया जा रहा है। सरकारी संगठन राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड यानि एनडीडीबी, टैरिफ रेट कोटा स्कीम के तहत 10,000 टन मिल्क पावडर का आयात करने की योजना बन रही है। यह आयात केवल 5 प्रतिशत के रियायती शुल्क दर पर किया जा रहा है। (कुछ समय पूर्व टैरिफ रेट कोटा स्कीम के तहत आयात शुल्क 15 प्रतिशत लगता था।) पूर्वी यूरोप के देशों में इस समय मिल्क पावडर के भाव लगभग 1,900 डालर प्रति टन चल रहे हैं। इस भाव पर आयात करने पर सभी खर्च मिलाने पर विदेशी
मिल्क पावडर की आयातित लागत लगभग 100 रुपए प्रति किलो आएगी। इसकी तुलना में घरेलू खुदरा बाजार में मिल्क पावडर के भाव लगभग 135 रुपए प्रति किलो चल रहे हैं। इसमें से डेयरी उद्योग को वास्तव में लगभग 115 रुपए प्रति किलो की ही प्राप्ति होती है।

बटर आयल
इसी प्रकार बटर आयल का आयात भी सस्ता पड़ रहा है। इसका आयात 30 प्रतिशत की दर पर किया जा रहा है। कुछ समय पूर्व आयात की दर 40 प्रतिशत थी। बटर आयल का आयात लगभग 1500 डालर प्रति टन के आयात पर न्यूजीलैंड से किया
जा रहा है। इसकी आयातित लागत भी लगभग 100 रुपए प्रति किलो ही आती है। इसे देश में देसी घी के रुप में बेचा रहा है।
घरेलू डेयरी उद्योग द्वारा जो घी तैयार किया जा रहा है उसकी लागत लगभग 200 रुपए प्रति किलो आती है। यदि इसी प्रकार डेयरी उत्पादों का सस्ता आयात जारी रहा तो निसंदेह देश के डेयरी उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और उसके बाद देश का दूध उत्पादक यानि किसान प्रभावित होगा। ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार कुछ ऐसे कदम उठाए कि किसानों के हितों की रक्षा हो सके।


राजेश शर्मा

Sunday, August 23, 2009

छोटी इलायची के बड़े भाव


नए सीजन की आवक आरंभ होने के बावजूद छोटी इलायची के भाव थमने का नाम नहीं ले रही है। उल्लेखनीय है कि आमतौर पर नई फसल के आने पर भाव में गिरावट आती है लेकिन छोटी इलायची के मामले में ऐसा नहीं है। छोटी इलायची का सीजन अगस्त से जुलाई होता है और एक अगस्त से ही केरल के तमिलनाडु के उत्पादक व नीलामी केंद्रों पर इसकी आवक आरंभ हो चुकी है। नवीनतम प्राप्त आंकड़ों के अनुसार एक अगस्त से आरंभ हुए चालू सीजन में अब तक लगभग 145 टन छोटी इलायची की आवक हुई जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 149 टन की आवक हुई थी। हालांकि आवक में मामूली ही कमी आई है, लेकिन इस वर्ष औसत भाव 680.71 रुपए प्रति किलो रहे जबकि गत वर्ष इसी अवधि मे 591.24 रुपए प्रति किलो थे। वास्तव में ऐसा नहीं लगता है कि जल्दी ही इसके भाव में कमी आ पाएगी। इसका कारण त्यौहारी मांग है व निर्यातकों की मांग है। खाड़ी के देशों को रमजान के महीने के लिए पिछले दिनों छोटी इलायची का निर्यात किया गया था। आगामी दिनों में इसकी निर्यात मांग में कुछ और वृद्वि का अनुमान है। उसके बाद दशहरा और दीपावली की मांग आरंभ हो जाएगी।

वास्तव में छोटी इलायची में तेजी का कारण गत वर्ष का बकाया स्टाक कम होना है। यही कारण है कि भाव में तेजी आ रही है। तेजी का एक अन्य कारण इस वर्ष केरल और तमिलनाडु के उत्पादक केंद्रों पर वर्षा की कमी होना भी है। इस
वर्ष मानसून के दौरान वहां पर वर्षा कम होने से पौधे पूरी तरह पनप नहीं पाए हैं और उत्पादन कम होने का अनुमान है।
गत वर्ष भी यानि 2008-09 के दौरान भी देश में छोटी इलायची के भाव में तेजी रही थी, हालांकि उत्पादन 15,000 टन के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया था लेकिन नीलामी केंद्रों पर औसत भाव भी 539.62 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गए थे। इसका कारण जहां देश में पिछला स्टाक कम होना था वहीं ग्वाटेमाला में उत्पादन प्रभावित होने से देश से निर्यात में बढ़ोतरी भी
था। इससे पूर्व वर्ष यानि 2007-08 में उत्पादन लगभग 9,000 टन था और औसत भाव 507.84 रुपए प्रति किलो रहे थे।

निर्यात

इसी बीच, चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-जून के दौरान देश से 12.80 करोड़ रुपए मूल्य की 200 टन छोटी इलायची का निर्यात किया गया जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 7.77 करोड़ रुपए मूल्य की 120 टन का निर्यात किया गया था। इस
वर्ष औसत भाव 640 रुपए प्रति किलो रहे।

राजेश शर्मा

Sunday, June 14, 2009

गोदाम अनाज से फिर हुए लबालब

अनेक वर्षों के बाद अब फिर सरकारी गोदाम अनाज यानी गेहूं और चावल के स्टाक से लबालब हो चुके हैं और इसका कारण सरकारी एजेंसियों द्वारा दोनों ही अनाजों की रिकार्ड खरीद किया जाना है। इस वर्ष गेहूं और चावल की रिकार्ड खरीद की गई है।

उल्लेखनीय है कि चार वर्ष पूर्व देश में गेहूं की कमी हो गई थी, आवश्यकता को पूरा करने के लिए आयात का सहारा लेना पड़ा था। अनेक वर्षो के बाद गेहूँ का आयात किया गया था।

अदूरदर्शिता
वास्तव में सरकारी अनाज के भंडार के बारे में कोई दूरदर्शितापूर्ण नीति नहीं होने के कारण ही हमें आयात का सहारा लेना पड़ा था। हालांकि सरकार ने गेहूं व चावल के न्यूनतम बफर स्टाक की सीमा तय की हुई है लेकिन कुछ वर्ष उसका भी कोई लाभ नहीं मिला था और आयात करना ही पड़ा था।

वर्ष 2000 में भी एक बार ऐसी ही स्थिति आई थी जब देश में गेहूं और चावल की भरमार हो गई थी और इन्हें रखना एक समस्या बन गई थी। तत्कालीन सरकार ने उस समय स्टाक से निजात पाने के लिए निर्यात का सहारा लिया और निर्यात की पूरी छूट दे दी। देश में गेहूं व चावल के भाव ऊंचे थे और विदेशों में नीचे। निर्यातकों के लिए निर्यात को लाभकारी बनाने के लिए सरकार ने उन्हें रियायती दरों पर गेहूं और चावल की सप्लाई दी। सरकार ने निर्यातकों को उस समय घरेलू बाजार में प्रचलित भाव से भी नीचे पर चावल दिया। निर्यातकों ने सरकार की इस नीति का भरपूर लाभ उठावा और सरकारी गोदामों से जी भर कर अनाज उठाया। हालांकि बीच में यह चर्चा भी रही कि कुछ निर्यातक चावल को केवल कागजों पर ही निर्यात कर रहे थे और उसे घरेलू बाजार में ही बेच कर लाभ कमा रहे थे। सरकार ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। हालांकि सरकारी गोदामों में स्टाक काफी कम हो गया था लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों से निर्यात जारी रहा।

सरकारी नीति के कारण स्थिति यह गई कि एक अप्रैल 2006 को सरकारी गोदामों में केवल 20 लाख टन गेहूं का ही स्टाक रह गया जबकि बफर नार्म के अनुसार स्टाक 40 लाख टन होना चाहिए था।

आयात का सहारा
देश में गेहूं की कमी हुई और भाव बढ़ गए। इन्हें रोकने के लिए सरकार को आयात का सहारा लेना पड़ा। सरकार ने निर्यात सस्ते भाव पर किया और बाद में आयात महंगे भाव पर।
चावल के बारे में स्थिति बदतर होने से बच गई क्योंकि सरकार ने समय रहते निर्यात पर अंकुश लगा दिया था।

फिर रिकार्ड
अब सात वर्ष के बाद गेहूं और चावल की खरीद के फिर रिकार्ड बन गए हैं क्योंकि सरकार ने प्राईवेट सेक्टर पर शिकंजा कस दिया और वे बाजार से बाहर ही रहे और गेहूं व चावल की अधिकांश मात्रा सरकारी एजेंसियों को खरीदनी पड़ी।

खरीफ वर्ष 2008-09 (अक्टूबर-सितम्बर) में अब तक सरकारी एजेंसिया 300 लाख टन से अधिक चावल की खरीद कर चुकी हैं जबकि 2007-08 के पूरे वर्ष में कुल खरीद केवल 284.93 लाख टन ही थी।

इसी प्रकार रबी विपणन वर्ष 2009-10 (अप्रैल-मार्च) में अब तक 243 लाख टन गेहूं की खरीद की जा चुकी है जबकि गत पूरे वर्ष में 226.89 लाख टन की खरीद की गई थी।
इस प्रकार गेहूं व चावल दोनों ही रिकार्ड खरीद की जा चुकी है।

रिकार्ड खरीद के कारण एक मई को सरकारी गोदामों में 298.2 लाख टन गेहूं और 214 लाख टन चावल का स्टाक जमा हो चुका था। इससे पूर्व एक अप्रैल 2002 को सरकारी गोदामों में 260.39 लाख टन गेहूं और 249.12 लाख टन चावल का रिकार्ड स्टाक था।

सरकारी गोदामों में स्टाक रखना भी महंगा सौदा है। एक मोटे अनुमान के अनुसार सरकार को गोदामों में रखे स्टाक के भंडारण और रख-रखाव के लिए ही लगभग 36 रुपए प्रति टन प्रति माह खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा पूंजी पर ब्याज, प्रशासनिक व्यय, अनाज का नष्ट होना अलग से है।

ठोस नीति
सरकार कोई ठोस नीति अपना कर अधिकता या कमी की स्थिति से बच सकती है। उदाहरण के लिए यदि सरकार इस वर्ष सीमित मात्रा में गैर-बासमती चावल के निर्यात की अनुमति दे देती तो निर्यातक बाजार में खरीद करते और सरकार पर बोझ कम होता। इसी प्रकार यदि सरकार गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में तीव्र वृद्वि करती और गत वर्ष खुले बाजार में भाव कुछ सुधरने देती तो इस वर्ष व्यापारी व स्टाकिस्ट मुनाफा कमाने के लिए इसकी खरीद करते और सरकार को कम मात्रा में गेहूं की खरीद करनी पड़ती।

--राजेश शर्मा

Monday, May 25, 2009

काली मिर्च रहेगी तेज

पिछले कुछ दिनों से कोची बाजार में काली मिर्च के भाव में तेजी चल रही है। यदि आंकड़ों का गणित देखें तो आगामी महीनों में इसके भाव और तेजी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

वैश्विक उत्पादन
पहले विश्व बाजार की स्थिति की बात करें। विश्व में काली मिर्च का उत्पादन पिछले कुछ वर्षों से लगातार कम होता जा रहा है। वर्ष 2003 विश्व में काली मिर्च का कुल उत्पादन 3 लाख टन था के आसपास था जो 2008 में गिर कर 2.30 लाख टन के करीब आ गया।

विश्व में काली मिर्च के प्रमुख उत्पादक देश हैं: वियतनाम, ब्राजील, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका और भारत। कोई समय था जब काली मिर्च के निर्यात में भारत सबसे ऊपर होता था लेकिन पिछले कुछ वर्ष मेंं स्थिति बदल गई है। अब काली मिर्च के उत्पादन और निर्यात में पहला स्थान वियतनाम का है।

विश्व के प्रमुख उत्पादक देशों में इस समय काली मिर्च का स्टाक कम ही बचा हुआ है। केवल ब्राजील व वियतनाम में ही कुछ स्टाक है।

भारत
अन्य देशों की भांति भारत में भी 2008-09 (नवम्बर-अक्टूबर) के दौरान काली मिर्च का उत्पादन कम हुआ है। वर्ष 2001-02 में भारत मे काली मिर्च का उत्पादन 79,000 टन के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया था लेकिन उसके बाद इसमें गिरावट ही आ रही है। अब तो इसका औसत उत्पादन गिरकर 50,000 टन के आसपास आ गया है लेकिन चालू वर्ष में तो गिर कर लगभग 42,000 टन ही रह गया। देश में सबसे अधिक उत्पादन केरल में होता है और उसके बाद तमिलनाडु और कर्नाटक का स्थान आता है।
उत्पादन में गिरावट का कारण प्रतिकूल मौसम के अलावा किसानों द्वारा खाद का कम मात्रा में प्रयोग करना और नई झाड़ियों की संख्या में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं होना है।
उत्पादन ही नहीं देश से काली मिर्च के निर्यात भी कम हो रहा है। वित्त वर्ष 1999-2000 में देश से 42,000 टन काली मिर्च का निर्यात किया गया था जो एक रिकार्ड था। उसके बाद इसका निर्यात घटता ही जा रहा है।
वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान अप्रैल से फरवरी के दौरान 23,350 टन काली मिर्च का निर्यात किया गया जो पूर्व वर्ष की इसी अवधि के निर्यात-31,760 टन-की तुलना में 26.5 प्रतिशत कम है।

चालू वर्ष में भी इसके निर्यात में सुधार की संभावना नहीं है क्योंकि भारतीय काली मिर्च के भाव अन्य देशों की तुलना में लगभग 400 डालर प्रति टन अधिक चल रहे हैैं। यह ठीक है कि अन्य देशों की तुलना में भारतीय काली मिर्च की क्वालिटी बेहतर है लेकिन आयातक देश इसके लिए 250/300 डालर प्रति टन तक ही अधिक भाव चुका सकते हैं। भाव में अधिक अंतर होने पर वे अन्य देशों की ओर रुख कर लेते हैं।

आयात
भाव में अधिक अंतर होने के कारण अब कुछ निर्यात काली मिर्च का आयात भी करते हैं। यह आयात एडवांस लाईसेंस के तहत किया जाता है और आयातित काली मिर्च को एक निश्चित अधिक के भीतर वैल्यू एडीशन करके निर्यात करना होता है। हालांकि इस स्कीम का उद्देश्य विदेशी मुद्रा कमाना होता है लेकिन कुछ आयातक व व्यापारी कथित रुप से इस स्कीम का दुरुपयोग भी करते हैं।

भाव
पिछले कुछ महीनों तक मंदे रहने के बाद भारतीय बाजारों में काली मिर्च के भाव सुधार हुआ है लेकिन अब कुछ सप्ताहों से भाव बढ़ रहे हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि आने वाले महीनों में इसके भाव में और सुधार होगा। संभव है कि एडवांस लाईसेंस के तहत वियतनाम आदि से सस्ता आयात होने के कारण काली मिर्च के भाव में कुछ गिरावट आ जाए लेकिन वह केवल कुछ समय के लिए ही होगी।

--राजेश शर्मा

Sunday, May 17, 2009

गेहूं निर्यात नहीं है संभव

भारतीय खाद्य निगम द्वारा चालू वर्ष में अधिक खरीद और सरकारी गोदामों में गेहूं का स्टाक लबालब होने के कारण ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि जल्दी ही सरकार गेहूं के निर्यात की अनुमति प्रदान कर देगी। लेकिन वास्तव में विश्व बाजार को देखते हुए देश से गेहूं के निर्यात की संभावना नजर नहीं आ रही है।

उल्लेखनीय है कि देश में गेहूं की कमी और बाजारों में बढ़ते भाव को देखते हुए सरकार ने फरवरी 2007 में गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। यही नहीं कमी को दूर करने के लिए सरकार ने प्राईवेट व सरकारी स्तर पर इसके आयात अनुमति देने के साथ ही आयात शुल्क भी समाप्त कर दिया था।

खरीद
बहरहाल, अब स्थिति बदली हुई है। गत रबी विपणन वर्ष यानी अप्रैल 2008-मार्च 2009 के दौरान सरकार ने 226.89 लाख टन गेहूं की खरीद की। एक अप्रैल से चालू हुए वर्ष के दौरान अब तक सरकारी एजेंसियां लगभग 224 लाख टन गेहूं की खरीद करक चुकी हैं और अनुमान है कि खरीद गत वर्ष के स्तर को पार कर जाएगी।

स्टाक
रिकार्ड खरीद के कारण अब सरकारी गोदामों में गेहूं की बोरियों के अम्बार लग चुके हैं। यही नहीं कुछ गेहूं खुले में भी रखी हुई है। एक अप्रैल को सरकारी गोदामों में 134 लाख टन गेहूं का स्टाक था जबकि बफर नार्म के तहत स्टाक केवल 40 लाख टन ही होन चाहिए था। अब इस सीजन की खरीद आरंभ होने के बाद एक मई को सरकारी गोदामों में गेहूं का स्टाक बढ़ कर 298.2 लाख टन हो गया है।

बढ़ते स्टाक से निजात पाने के लिए सरकार जल्दी ही 20 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दे सकती है लेकिन विश्व बाजार की स्थिति को देखते हुए भारत से गेहूं निर्यात की संभावना नजर नहीं आ रही है। अन्य देशों की तुलना में भारतीय गेहूं महंगी है जबकि क्वालिटी में कुछ हल्की ही पड़ती है।

यदि 1080 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर उत्पादक मंडियों से गेहूं की खरीद की जाए तो स्थानीय कर, मंडी शुल्क, बोरी, ट्रांसपोर्ट, बंदरगाह पर लदान आदि सभी खर्च मिला कर कांडला या मुंद्रा बंदरगाह (जहां से गेहूं का निर्यात होगा) गेहूं के भाव लगभग 14000 रुपए प्रति टन यानि लगभग 280 डालर प्रति टन पड़ेंगे। यदि यह माना जाए कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर गेहूं मिल सकती है तो भी बंदरगाह पहुंचने पर इसकी लागत लगभग 250 डालर प्रति टन आएगी।
इसकी तुलना में रशिया या यूक्रेन से जून-जुलाई शिपमेंट के सौदे 185 डालर प्रति टन पर किए जाने के समाचार हैं।
फ्रांस, जर्मनी, कनाडा आदि देशों से गेहूं लगभग 200 डालर पर मिल रही है।

आस्ट्रेलिया की बढ़िया क्वालिटी की गेहूं के सौदे लगभग 220 डालर प्रति टन पर किए जाने के समाचार हैं।
ऐसे में कौन देश भारत से गेहूं का आयात करेगा? यह सोचने का विषय है।

गेहूं उत्पाद
बहरहाल, देश से गेहूं उत्पाद यानि आटा, मैदा, सूजी आदि का निर्यात पड़ोसी देशों को अवश्य किया सकता है। सरकार निर्यात पर प्रोत्साहन देकर गेहूं के स्टाक से कुछ निजात पा सकती है।