आकाशवाणी से मोह लगभग 10 साल पुराना है....जमशेदपुर में था जब पहली दफा युववाणी कार्यक्रम के ज़रिये अपनी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी....देश के हर शहर में युववाणी ही है, जिसकी कृपा से युवा लोग अपनी आवाज़ पर खुश हुआ करते हैं...माने, युववाणी मुझ जैसे हज़ारों मुंगेरीलालों के हसीन सपने की तरह हुआ करता है...
बहरहाल, युववाणी से आगे आवाज़ का सफ़र बहुत आगे बढ़ चुका है मगर दिल्ली में जब भी मौका मिलता है, युववाणी के कार्यक्रमों में शिरकत ज़रूर करता हूं.....आज भी जब युववाणी से गणतंत्र दिवस पर आयोजित काव्य गोष्ठी में अपनी कविता पढने का निमंत्रण मिला तो खुशी-खुशी गया....
स्टूडियो में बैठना बहुत पुराना अनुभव है, मगर बतौर कवि कम ही मौके मिले हैं.....रिकॉर्डिंग रूम के सामने हमारा ऑडियो लेवल वगैरह सेट करने बैठी थीं युवववाणी की प्रोग्राम अधिकारी रंगोली श्रीवास्तव.....दिल्ली में युववाणी से परिचित हर कोई इस नाम से परिचित ज़रूर होगा....रिकॉर्डिंग रूम में तीन युवा कवि बैठे थे...पंडित प्रेम बरेलवी, जितेंद्र प्रीतम और मैं...संचालक प्रेम ने जितेंद्र को अपनी कविता पढ़ने को कहा तो जितेंद्र मंचीय कवि की तरह आलाप भरकर कुछ गाने लगे....कविता में एक आशावादी पंक्ति ऐसी थी जिसमें कोई हिंदू नाम कुरान पढे और मुसलमान पात्र गीता तो अमन फैले....बस, इतना पढ़ते ही रिकॉर्डिंग रोक दी गयी...रंगोली जी को लगा कि यहां जो भी पढ़ा जा रहा है, वो भावनाओं को भड़का देगा....उनके चेहरे पर चिंताएं तो थीं, मगर वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी....उन्होंने कहा कि मुझसे ग़लती हो गयी कि मैंने सभी कवियों की कविताएं पहले से पढ़ी नहीं....
फिर, जो कविताएं मुझे पढनी थीं, वो भी उन्हें पेश की गयीं...उस कागज़ पर भी रंगोली जी ने कलम चला दी थी....कुछ पंक्तियों को उनकी कलम ने काट खाया था....
एक देश जहां शौचालयों से वाचनालयों तक,
व्यर्थ ही होती दिखी है ऊर्जा....
(पूरी कविता यहां है- ....एक ख़ास पल)
मतलब, मुझे कविताएं पढनी थीं, मगर उन पंक्तियों के बग़ैर....मैंने हंसते हुए कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि ये पंक्तियां अच्छी हैं, मगर "अश्लील" हैं...शौचालय जैसा शब्द कविता में आना ही नहीं चाहिए....इसे ग़लत संदेश जायेगा...उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर कविता पढने आये हैं तो कुछ देशभक्ति की रचनाएं पढिए, क्यूं ये सब पढ रहे हैं....
मेरे पास दो और कविताएं थीं जिनपर रंगोली जी ने अपनी कलम चलायी थी...ये हैं वो पंक्तियां..आप भी ये अश्लील पंक्तियां पढें....(पूरी कविता यहां पढ सकते हैं..."हम ख़बर हैं,बाक़ी सारा भ्रम है")
मुझको तो हर एक क़दम पर डर लगता है,
कहां-कहां तक तुमको मैं बतलाऊं पापा...
चार दवाओं की पुर्जी भर लिख देने के,
डॉक्टर पूरे दिन की कमाई ले लेता है,
धरती के भगवान अगर ऐसे होते हैं,
वो भगवान नहीं दिखता है, मुझे सुकूं है....
(अथ रंगोली उवाच- आप डॉक्टर जैसे महान पेशे के बारे में ऐसा कैसे लिख सकते हैं...लोग सुनेंगे तो बुरा असर पड़ेगा...आप अपने अनुभव के बल पर सबको बुरा नहीं कह सकते...)....
डर लगता है दूध के पैकेट में ना जाने,
बनिए ने कोई जादू-वादू घोल रखा है,
ताकि अगली बार उसी दुकान पे आऊं,
ना आया तो “पेट बिगड़ जाए ससुरे का”
(अथ रंगोली उवाच- बनिया एक जातिसूचक शब्द है, इसका प्रयोग अश्लील लग रहा है..... इसके बदले दूधिये वगैरह जैसा शब्द इस्तेमाल किया सकता है....वैसे पंक्ति ही हटी दी जाये, तो बेहतर)
एक और कविता थी, मॉल पर....उसकी अश्लील पंक्तियां ये रहीं-
(पूरी कविता यहां है- "मॉल है या कि अजायबघर है")
रोज़ परफ्यूम छिड़ककर किसी अजीज़ के साथ,
लोग पहुचते हैं उस बियाबां तक...
ख़ैर, जैसे-तैसे वहां से लौटा और मुझे लगा कि गणतंत्र दिवस पर ये ज़रूरी है कि हम बैठक में इस पर गहनता से सोचें कि आखिर देश के अनगिनत लोगों तक पहुंचने वाला सरकारी भोंपू आकाशवाणी कब अपनी परिभाषाएं बदलेगा....हो सकता है, आकाशवाणी में ऐसी दायित्व भरी कुर्सी पर बैठने वाला हर अधिकारी रंगोली जी जैसा आलोचक व काव्य प्रेमी न हो, मगर सरकारी महकमे में ऐसे किस्से आज से 60 साल बाद भी मिलेंगे, ये मुझे पूरा विश्वास हो गया....आदरणीय रंगोली जी, ठीक है कि बेहद ऊंची कुर्सी पर आसीन हैं, मगर विनम्र निवेदन है कि हम स्लमडॉगनुमा कवियों को अश्लील रचनाएं पढने दी जाएं, कैंची चलाने का काम उन्हीं को करने दीजिए, जो इसकी काबिलियत रखता हो....जय हो....
ग़ालिब का एक शेर भी याद आ रहा है, कहता चलूं-
न सताइश की तमन्ना, न सिले की परवाह,
ग़र नहीं हैं मेरे अशआर में मानी, न सही....
निखिल आनंद गिरि

मार्कण्डेय