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Wednesday, June 09, 2010

25 सालों से भोपाल जाग रहा है ?

2-3 दिसंबर की रात को जब जहरीली गैस ने पूरे भोपाल को मौत की नींद बांटनी शुरू की होगी, मेरी उम्र के लोग अपनी मां की गोद में छोटी-छोटी आंखे बंद किए निश्चिंत सो रहे होंगे....हमारी मांओं को भी तब सिर्फ अपने बेटों की तरक्की के सपने ही आते होंगे...फिर भी, अब जब 25 साल बाद इस घटना के पन्ने दोबारा देश भर में ज़हर फैला रहे हैं तो हमारा  खून भी खौल उठता है...ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही मुमकिन है कि एक कंपनी पूरे शहर को तबाह कर दे और कंपनी का गुनाह तय कर पाने में 25 साल गुज़र जाएं....इस पूरे मामले ने 19 जज देखे, करोड़ों रुपए बर्बाद हुए और फैसला क्या आया.....दो साल की सज़ा वो भी ज़मानत पर रिहाई के साथ.....सज़ा उसको नहीं जिसका दोष जगज़ाहिर था...सज़ा उन छोटी मछलियों को जो उस वक्त सिर्फ अपनी सैलरी लेकर इंक्रीमेंट और प्रोमोशन के लालच में अमेरिकी बॉस की गुलामी करने को मजबूर थे......25 हज़ार मौतों के बाद भी एक एंडरसन भारत नहीं लाया जा सका...अमेरिका की बेशर्मी की हद देखिए कि इस मौके पर जब पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता, वो कहता है कि इस फैसले के बाद आगे किसी जांच की गुंजाइश नहीं है और इस मुद्दे पर अब हर तरह से पर्दा गिर जाना चाहिए....अमेरिका इतनी बेहयाई से कह इसीलिए पा रहा है कि हम विदेशियों को सुनने और गुलामी करने के लिए ही बने हैं.....मनमोहन सिंह या फिर सुपर प्राइम मिनिस्टर सोनिया गांधी इस मुद्दे पर कोई सफाई नहीं दे रहे हैं.....वॉरेन एंडरसन 89 साल की उम्र में अमेरिका में मज़े ले रहा है और यहां उसकी लापरवाही की सज़ा भुगत रहे बेगुनाह अपने मुआवाज़े की रकम के लिए दर-दर भटक रहे हैं....मुमकिन है कि उनके मुआवज़े की रकम दलाल खा गए और अपने-अपने बंगले बनवा लिए.....वीरप्पा मोइली कहते हैं अभी एंडरसन का मामला बंद नहीं हुआ है.....वाह जी, अभी तो एंडरसन जी के गए 25 साल ही हुए हैं....कभी न कभी तो भारत आने का मन करेगा उनका....कभी न कभी तो मन होगा कि जवानी की यादें ताज़ा करें....तो जब भारत आएंगे फिर उन पर नए सिरे से सोचा जाएगा....अभी तो भारत की जनता 2 साल की सज़ा से ही खुश रहे..... जिस वक्त भोपाल हादसा हुआ, अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे....मगर, उन्हें इस घटना की प्रतिक्रिया देने से पहले दस बार राजीव गांधी से मशवरा करना पड़ा.....तब तक मुंह छिपाए फिरते रहे....इस बीच एक काम ये हो गया कि एंडरसन जिसे लोकल पुलिस ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया था, रात भर में ही ससम्मान जमानत दे दी गई और वो तभी अपने निजी विमान से अमेरिका उड़ गया...तब भोपाल अपने परिजनों के अंतिम संस्कार में व्यस्त था.....


कानून अंधा होता है, झूठी बात है...कानून देखता है कि फैसला किसके खिलाफ लेना है, ये देखने के बाद अंधा होने का ढोंग करता है.....हमें अफसोस है कि हमने उस पीढ़ी में होश संभाला जब हम पहले ही किसी और देश को बिक चुके हैं.....अभी न्यूक्लियर डील के तहत सिविल लियाबिलिटी बिल आना बाक़ी है...तब देश में कम से कम 18 परमाणु संयंत्र लगने हैं और वो भी रिहाइशी इलाकों में....कहीं एक भी चूक हुई तो पूरा देश ऊर्जारहित हो जाएगा.....मैं तो कहूंगा कि अदालतों के फैसले के कागज़ जांचे जाएं....कहीं ऐसा न हो कि नया खुलासा हो कि भारत की अदालतों के फैसलों पर आखिरी मुहर अमेरिका ही लगाता है....हम अपनी अगली पीढ़ी को एक सच की विरासत देना चाहते हैं....

एक और बात जो आज ही कहीं पढ़ रहा था......भोपाल में फैक्ट्री लगाए जाने के वक्त जब भारत ने अमेरिका से नुकसान के बारे में रिपोर्ट मांगी गई थी तो लिखा आया था कि भोपाल के उस इलाके में फैक्ट्री लगाना उतना ही नुकसानरहित है जितना चॉकलेट की फैक्ट्री लगाना....इस अमेरिका का झूठ तो हम तब से बर्दाश्त करते आ रहे हैं...और ये सब सरकारें करती आई हैं.....बीजेपी ने ही अपनी सत्ता के सात साल में क्या उखाड़ लिया....और हमारे इस लेख से भी क्या हो जाएगा....हम तो आज भी चैन की नींद सो ही लेंगे, भोपाल की आंखों में 25 सालों से नींद नहीं है....वो जाग रहा है क्योंकि उसकी पहचान पर अमेरिका के कुछ दलालों ने गैस की कालिख पोत दी है.....

शर्म...शर्म...शर्म.....
 
निखिल आनंद गिरि

Monday, August 24, 2009

हिन्दुत्व शब्द ही साम्प्रदायिक हो गया है

पंथ, धर्म व रिलीजन

इस देश में एक बहुत ही ज्वलंत मुद्दा है धर्म। हमारा देश सेक्युलर है। हम एक हैं। और न जाने ऐसे कितने ही झूठे वादे हम अपने आपसे व विदेश में करते रहते हैं। पर अभी उस झूठ पर बात नहीं करेंगे। इस विश्व में जितने भी धर्म या यूँ कहूँ कि पंथ स्थापित हुए हैं वे सभी किसी न किसी व्यक्ति विशेष द्वारा ही शुरु किये गये। चाहें इस्लाम लें, जिसका पालन करने वाले पैगम्बर मोहम्मद के अनुयायी हुए। चाहें ईसा मसीह के अनुयायी हों, जिन्हें हम ईसाई कहते हैं। और चाहें ही बौद्ध धर्म व सिख धर्म या अन्य कोई भी धर्म हुआ हो उसकी उत्पत्ति किसी न कैसी महापुरुष ने ही की है। इसमें किसी को भी संशय नहीं होना चाहिये। धर्म संस्कृत की "धृ" धातु से बना शब्द है जिसका अर्थ होता है-धारण करना अथवा पालन करना। ऊपर के सभी धर्म (?) इंसान के बनाये हुए हैं। दूसरी तरफ़ पिता धर्म, पुत्र धर्म, शिष्य-गुरु का धर्म और हर रिश्ते का अपना धर्म होता है जिसका हम पालन करते हैं जो ईश्वर ने बनाये हैं।

इसी तरह एक और धर्म है हिन्दू धर्म। पर इस धर्म को मानने वाले किसके अनुयायी हैं? इस शब्द को लेकर तो साम्प्रदायिक दंगे हो जाते हैं। हिन्दुत्व शब्द ही साम्प्रदायिक हो गया है। ज्ञात हो कि हिन्दू उन लोगों को कहा गया जो सिन्धु नदी के किनारे रहा करते थे। वे किसके अनुयायी हैं, किस भगवान को मानते हैं, मानते हैं भी या नहीं, आस्तिक हैं या नास्तिक, हवन करते हैं या नहीं... इन सभी प्रश्नों से उस समय भारतवर्ष में रहने वाले हिन्दुओं का कोई लेनादेना नहीं था। वे कुछ भी हों, कहलाये गये हिन्दू ही। यानि उस समय के लोग जो आचरण, व्यवहार किया करते थे वो हिन्दू रीति रिवाज़ों में शामिल हो गया। कोई शैव हुए कोई वैष्णव। कोई वेदों को मानने हुए तो कोई नास्तिक हुए। सभी हिन्दू कहलाये गये और उनके वंशज भी। वे स्वयं को आर्य कहते थे। संस्कृत में आर्य शब्द का अर्थ है "भद्र पुरुष"। बाद में बाहर से मुगल व अंग्रेज़ आये जो साथ में इस्लाम व ईसाई धर्म लाये। कुछ धर्म भारत की भूमि से निकले जैसे बौद्ध, जैन, सिख व अन्य। लेकिन क्या हिन्दू कोई धर्म बन सकता है? और क्या ये अन्य धर्मों की तरह ही उत्पन्न हुआ? शायद नहीं..

अभी हाल ही में किसी न्यूज़ चैनल पर खबर देख रहा था-अमरीका में २४ फीसदी हिन्दू। इसका अर्थ ये कतई नहीं लगाइयेगा कि उन सब ने ईसा मसीह को मानना बंद कर दिया या वे चर्च नहीं जाते। वे मानते हैं लेकिन हिन्दू रीति रिवाज़ मनाते हुए। मसलन हवन आदि करते हैं। राम व कृष्ण को मानते हैं। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि काफी लोग अब हिन्दू रिवाज़ों से ही अंतिम संस्कार करते हैं।

लखनऊ में जारी एक शोध से पता चला है कि यज्ञ करने से हवा में फैले विषाणु खत्म हो जाते हैं व वायु को स्वच्छ रखने में सहायक होता है। सप्ताह में एक बार या महीने में एक बार हवन करने से भी फ़ायद होता है। हवन में प्रयोग होने वाली सामग्री को वैज्ञानिक दृष्टि से जाँचा गया तो ये बात सामने आई है। इसका उल्लेख कईं किताबों में होता आया है किन्तु अब वैज्ञानिकों ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी है। हजारों वर्षों से इस धरती पर रहने वाले लोग मंत्रों का प्रयोग करते आये हैं। विज्ञान से ये साबित हो चुका है कि मंत्रोच्चारण में जिन शब्दों का प्रयोग होता है उससे निकलने वाली ध्वनि व गले में हो रहे स्पंदन से ऊर्जा का संचार होता है। हिन्दू रिवाज़ों के अनुसार दिया जलाने व त्राटक करने का भी वैज्ञानिक आधार मौजूद है।

हिन्दुत्व या हिन्दुइज़्म कई मायनों में अलग हुआ। यहाँ निराकार भी पूजा जाता है और साकार भी। हिन्दू धर्म में कोई एक विशेष पुस्तक ही एकमात्र ग्रंथ नहीं है। अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार पुस्तकें हैं। कोई एक स्थापक नहीं। शायद हम पंथ शब्द को भूल गये हैं। धर्म का अंग्रेज़ी में अनुवाद करेंगे तो आप कहेंगे "रिलीजन"। अंग्रेज़ी में यही कहते है धर्म को..'रिलीजन शब्द लैटिन के 'री लीगारे' से आता है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'बाँधना' होता है। यहाँ इसका एक अर्थ मानव को ईश्वर से "जोड़ने" को लेकर किया जा सकता है। लेकिन अंग्रेजी के 'रिलीजन' शब्द का संस्कृत पर्यायवाची धर्म कतई नहीं हो सकता शायद धर्म को किसी और भाषा में समझना या अनुवाद करना कठिन है। पर इतना पक्का है कि हम "धर्म" को नहीं समझ पाये। हिन्दू शब्द उस परिभाषित "धर्म" की श्रेणी में नहीं आता जिसको आज का समाज जानता है। ये जीवन जीने के पद्धति है।

तपन शर्मा

Monday, August 17, 2009

किंग खान पर हंगामा है क्यूं बरपा ?

फौजिया रियाज़ दिल्ली के एफएम रेनबो में रेडियो जॉकी हैं.......बैठक पर इनका ये पहला लेख है....आप पढ़कर बताएं कि बैठक की ये नई सदस्य कैसा लिखती हैं....



हाल ही में अमेरिका के एक एयरपोर्ट पर शाहरुख़ खान "द सुपर स्टार" के साथ दो घंटों तक पूछताछ चली। इस पर इस कदर हंगामा बरपा कि भारतियों की इज्ज़त से खिलवाड़ हो रहा है और भी न जाने क्या क्या...कई लोगों का कहना है कि ये भारतीयों के साथ ज़्यादा होता है, मुसलमान के साथ ज़्यादा होता है,अमेरिका एक रेसिस्ट देश है, वहां नाम देख कर पूछताछ की जाती है, साथ ही कि ये हमारे मान की बात है, हमे भी अमेरिकियों से इसी तरह पेश आना चाहिए...या रब! हद हो गई!! हम ख़ुद कितने रेसिस्ट हैं, दोगले हैं, इसका एहसास ही नही है, ख़ुद हमारे यहाँ हर दाढ़ी वाले को शक की नज़र से देखा जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ नॉर्थ ईस्टर्न लोगों को अपना नही समझा जाता, ख़ुद हमारे यहाँ विदेशी पर्यटकों को तंग किया जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ लोगों को नीचा दिखाने के लिए बिहारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है...इतना हल्ला किसलिए क्यूँकि वो शाहरुख़ खान है? न जाने कितने कश्मीरी नौजवानों के सर पर आतंकवादी का लेबल लगा कर मार दिया जाता है, न जाने कितने मुसलमान नौजवानों को कॉलेज में एडमिशन के दौरान तिरछी नज़रों से देखा जाता है, न जाने कितने गरीब मासूम लोगों को माओवादी बताकर एनकाउंटर किया जाता है...तब कोई उफ़ भी नही करता, अपने देश में होता है तो सब चुप्पी साध लेते हैं और गैर मुल्क में हुआ तो हाय तौबा...क्यूँ? माना जो हुआ वो ग़लत हुआ लेकिन उससे ज़्यादा ग़लत तो पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के साथ हुआ...लेकिन तब न्यूज़ चैनल वाले ही चिल्लाये थे, अभी आम इंसान को भी चिल्लाता देख रही हूँ...अरे ज़्यादा जोश में आने की ज़रूरत नही है..इनका कोई भरोसा नही कल को इमरान हाश्मी की तरह कह देंगे "मेरे साथ कोई बदसलूकी नही हुई,मेरे बयां को तोड़-मरोड़ के पेश किया गया था"

फौजिया रियाज़

Saturday, May 02, 2009

सोने का पिंजर (अंतिम अध्याय)

तेरहवां अध्याय

अमेरिका का उत्तरी छोर, बर्फीली ठण्डी हवाएं चलना प्रारम्भ हो गयी हैं, कुछ ही दिनों में यहाँ बर्फ ही बर्फ होगी। तब किसी भी पक्षी का यहाँ रहना सम्भव नहीं होगा। पक्षियों के एक दल का नेता आकाश को निहार रहा है, बर्फ का गिरना महसूस कर रहा है। अब मुझे दक्षिण छोर की ओर चले जाना चाहिए, मन में चिन्तन चल रहा है। कहीं तो नवीन आशियाना तलाशना ही होगा! क्या हम इस बार सुदूर देश की यात्रा कर लें? मन में अचानक प्रश्न कौंध गया। भारत का नाम सुना था, क्या हम सात समुद्र पार कर भारत जा सकेंगे, मन में संशय बना हुआ था। बुजुर्ग और युवा पक्षियों से सलाह-मशविरा किया गया।
युवाओं ने कहा कि जब हमारा सैनिक, ईराक पर युद्ध कर सकता है तो क्या हम भारत में आश्रय की तलाश नहीं कर सकते? हम में भी हवाईजहाज जितनी ताकत है, उड़ने की।
अचानक सिकन्दर याद आ गया, उसने कैसे भारत पर चढ़ाई की थी? वह भी तो आज से दो हजार वर्ष से भी पूर्व समुद्र और रेगिस्तान को पार करता हुआ भारत पहुँचा था, तो फिर हम क्यों नही? हमारे यहाँ भी 500 वर्ष पूर्व यूरोप से कोलम्बस आया था।
प्रश्न पूर्ण हुए, उत्तर केवल एक ही था कि पक्षियों में असीमित शक्ति होती है और वे पूर्ण आकाश को नापने की क्षमता रखते हैं। बस फिर क्या था, दल को संकेत मिल गए, उड़ने को तैयार हो जाओ। संकेत मिलते ही सारा दल पंक्तिबद्ध खड़ा हो गया। उन्हें कहाँ मनुष्यों की तरह सामान लादना था, बस उन्हें तो अपने दल के नेता के एक इशारे पर उड़ जाना था। वे सब उड़ चले, अपना लक्ष्य निर्धारित कर, अपनी मंजिल की ओर। युवा पक्षियों के मन में कौतुहल था, भारत को जानने की इच्छा थी, प्रश्न मन में कुलबुला रहे थे। आखिर पूछ ही लिया एक युवा पक्षी ने, कैसा है भारत?
प्रौढ़ पक्षियों के संक्षिप्त ज्ञान ने बाहर झाँकने की इच्छा जागृत की। वे बता रहे थे कि भारत एक प्राचीन देश हैं, वहाँ की जलवायु सभी प्रकृतिजन्य जीवों के अनुकूल हैं। वहाँ के पक्षियों को दूसरे देश की तलाश नहीं करनी होती। वहाँ के जंगल हरे-भरे हैं। बहुत प्रकार की वनस्पतियां वहाँ होती हैं। जंगलों में इतने फल होते हैं कि अधिकतर पक्षी वहाँ शाकाहारी हैं।
एक पक्षी ने प्रश्न कर लिया कि ये सब तुमको कैसे मालूम?
उसने कहा कि यहाँ चिड़ियाघर में भारत से पक्षी लाए जाते हैं। मुझे उनसे एकाध बार बात करने का अवसर मिला है।
फिर आपकी जानकारी ठीक ही होगी, वे सब खुश होकर बोले। यदि ऐसा अद्भुत देश हमारी धरती पर है तब तो उसे अवश्य देखना चाहिए।
सुना है कि वहाँ साइबेरिया आदि देशों से तो नियमित पक्षी जाते हैं। वो भारत से पास अवश्य हैं लेकिन हमारे हौंसले भी बुलन्द हैं। हम भी भारत की धरती को देखकर ही आएंगे। हमारे बच्चे भी हम पर गर्व करेंगे कि हमारे पूर्वज कभी भारत जाकर आए थे।
अब वे सब खुश होकर उड़ रहे थे और सम्वेत स्वरों में गा रहे थे।

एक पक्षी- जाना है उस देश जहाँ पंछी चहचाते
दूसरा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल मदमाते
तीसरा पक्षी- पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
चौथा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल बौराते।

एक पक्षी- हमने सुना है भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
दूसरा पक्षी- हमने सुना है भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
तीसरा पक्षी- जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
चौथा पक्षी- जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना है उस देश जहाँ जंगल इठलाते।

कई समुद्र पार करते हुए, आखिर एक दिन उनकी निगाहें मंदिर के गुम्बज पर पड़ी, जहाँ कतारबद्ध पक्षी बैठे थे।
शहर आ गया, भारत भूमि आ गयी, खुशी की लहर छा गयी।
एक सुंदर सी झील में, छोटा सा एक टापू, उसमें अनेक पेड़ लगे थे, उन्होंने वहीं अपना डेरा डाल दिया। झील में मछलियां भी खूब थी, तो भोजन की समस्या भी हल हो गयी। कई महिने यहाँ गुजारने थे, घौंसले बनाने शुरू हुए, कई अन्य भारतीय पक्षी भी उनके स्वागत में आ जुटे। भूरे और कृष्ण वर्ण के भारतीय पक्षी, उनके धवल स्वच्छ रंग को देख-देखकर आर्किर्षत होते, उनके साथ रहने का अवसर तलाशते। यहाँ के युवा पक्षियों ने उनकी आवाभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहाँ के स्वादिष्ट फलों को चखाया, जंगल की गंध से परिचित कराया। वे कभी बड़ के पेड़ से, कभी गूलर से, कभी आम से, कभी अमरूद से, कभी जामुन के पेड़ से फल तोड़कर लाते और उन फलों से उनको परिचित कराते। वे सब मछलियों पर निर्भर थे, उन्होंने कभी भी ये फल नहीं देखे थे। मीठे, खट्टे, तीखे फल उन्हें अच्छे लगने लगे थे। वे सारे ही इतने भांत-भांत के पेड़ों को देखकर आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कभी भी अपने जंगल में फलदार पेड़ देखे ही नहीं थे।
आखिर, एक दिन उनके वापस जाने का समय आ गया। भारत के कुछ पक्षियों ने उनसे निवेदन किया कि हम भी तुम्हारा देश देखना चाहते हैं, क्या हम तुम्हारे साथ चल सकते हैं? उन्होंने सहजता से स्वीकृति दे दी।
अमेरिकी पक्षियों के दल के पीछे-पीछे भारतीय दल मुक्त गगन में उड़ान भर रहा था। उनका मन बल्लियों उछल रहा था, वे बड़े खुश थे कि हम एक बेहद खूबसूरत देश को देखने जा रहे हैं। कुछ पक्षी कल्पना करते और सोचते कि क्यों न हम वहीं रह जाएं? हमारे यहाँ की गर्मी, पानी की समस्या से हमें निजात भी मिल जाएगी। सुना है कि वहाँ के जंगल बहुत विशाल हैं! वहाँ रेत के अंधड़ भी नहीं हैं।
लेकिन वहाँ बर्फिली आँधियां हैं।
अरे कौन सा हमें हमेशा के लिए वहाँ रहना है। फिर किसी का रहने को मन भी करेगा तो क्या हम वहाँ नहीं रह पाएंगे? वहाँ भी तो इतने पक्षी रहते हैं।
पक्षियों का दल उड़ रहा था, समुद्र की सीमा प्रारम्भ हुई। रात में विश्राम लेने के लिए एक पहाड़ी का सहारा लिया गया। अमेरिकी पक्षी समुद्र में गोता मारकर मछलियां पकड़ लाए। अब भारतीय पक्षियों के होश उड़ गए। वे मछली नहीं खाते, उनका भोजन तो फल होता था। पहाड़ के पेड़ों पर भी फल नहीं, आखिर समुद्री बेलों के फलों से ही जैसे-तैसे करके काम चलाया। लम्बी यात्रा और भोजन की समस्या उनके सामने मुँह-बाए खड़ी थी। रास्ते में शहर आने लगे और अब वे बगीचों से फल चुराने लगे, क्योंकि जंगल में ही उनका हक था और जंगल में फल नहीं थे। लम्बी थका देने वाली यात्रा, भूखे-प्यासे रहकर जैसे-तैसे कटी। सोचा अमेरिका पहुँचकर सब कुछ ठीक हो जाएगा।
आखिर एक दिन उनके सपनों का शहर अमेरिका आ ही गया। वहाँ बर्फ विदा ले चुकी थी, पेड़ों पर पीत पत्तियां, सुनहरी आभा का निर्माण कर रही थी। कहीं-कहीं कोपलें भी फूटने लगी थीं। आभास हो रहा था कि बसन्त शीघ्र ही हरितिमा को जन्म देगा। लम्बे रास्ते की थकान उनके चेहरों पर थी, भूख-प्यास से उनकी ताकत क्षीण हो गयी थी। लेकिन फिर यहाँ घने जंगलों को देखकर उनकी थकान फुर्र हो गयी और अपने छितराए जंगलों पर शर्म आने लगी। अमेरिकी पक्षी ने बताया कि बहुत जल्दी ही यहाँ हरीतिमा छा जाएगी, तब चारों तरफ केवल हरियाली होगी। तुम देखना हमारे यहाँ का जंगल, कितना विशाल है!
सभी ने पेड़ पर अपना ठिकाना बना लिया। अब भोजन की तलाश शुरू हुई। पेड़ों पर कहीं भी फल नहीं थे, एक पेड़ से दूसरे पेड़, एक जंगल से दूसरे जंगल जाते रहे, लेकिन खाने को कुछ नसीब नहीं हुआ। पत्तियां खाकर भला कितने दिन जिन्दा रहा जा सकता है? कभी चोरी-छिपे बगीचों में पहुँच जाते और वहाँ के फलों से अपना गुजारा चलाते। लेकिन वहाँ हमेशा खुद के ही शिकार होने का खतरा मंडराता रहता। एक दो बार मछली खाने का भी प्रयास किया, लेकिन भारतीय शरीर उन्हें पचा नहीं पाया। एक दिन जंगल में फलों की तलाश करते-करते उनकी आशा ने दम तोड़ दिया। आखिर समय से पहले ही उन्होंने वापस जाने का मन बना लिया।
वे आपस में बतिया रहे थे कि इतने घने जंगल, फिर भी एक भी फल नहीं! ऐसे जंगलों से तो हमारे जंगल ही अच्छे, जहाँ सारे पेड़ों पर ही फल लगा करते हैं। पंछी भी कितने कम है यहाँ, हमें भी अपने अस्तित्व का खतरा पैदा होता जा रहा है। बहेलिया यहाँ नहीं हैं, लेकिन शिकारी तो हैं, चिड़ियाघर तो हैं!
आज वे सब बहुत खुश थे, वापस जाने को कतारबद्ध खड़े थे। अपने दल के नेता के इशारे का इंतजार कर रहे थे। इशारा हुआ और वे उड़ चले भारत के आकाश की ओर। वे सब गा रहे थे, वही गीत, जो विदेशी पक्षियों ने बनाया था। एक-एक पक्षी अपने स्वर में गीत गा रहा था और एक लम्बी यात्रा पर इस उत्साह से उड़ा जा रहा था कि मैं अपने देश में वापस लौट रहा हूँ।

पक्षी गा रहे थे -
जाना अपने देश जहाँ हम मिलजुल गाते
जाना अपने देश जहाँ जंगल चहचाते
पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
जाना अपने देश जहाँ जंगल मदमाते।

भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना अपने देश जहाँ जंगल इठलाते।

भारत में तो जंगल में भी भँवर उड़ा करते हैं
भारत में तो पेड़ों से भी गंध बहा करती है
मद झरते, गदराए, बौराए पेड़ों से
उड़ते प्रतिपल, कण पराग के रहते हैं
देखो मधुमक्खी भी शहद बनाया करती
जाना अपने देश जहाँ जंगल बौराते।



नोट- हमें यह बताते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि डॉ॰ अजित गुप्ता की इस यात्रा-संस्मरण की यह शृंखला जल्द ही मुद्रित संस्करण के रूप में उपलब्ध होगी, जिसे हिन्द-युग्म अपने आने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम में लोकार्पित करेगा।

Saturday, March 07, 2009

सोने का पिंजर (7)

सातवां अध्याय

ऐसा भी कौन हैं कि सब अच्छा कहें जिसे...

भारत की निन्दा स्तुति मेरे जेहन में उभर-उभर आती है कि भारतीय रेल और बस का कोई समय नहीं। देर से आना इनकी नियति है। लेकिन जब हमने न्यूयार्क से सेनफ्रांसिसको की हवाई उड़ान ली, तब पहले से ही एक घण्टे विलम्ब से चले. हवाईजहाज में बैठने के बाद अनाउन्स हुआ कि यात्रा में एक घण्टे का विलम्ब और होगा। क्योंकि हमारे आगे अभी चालीस विमान उड़ने की कतार में हैं। यहाँ कोई नहीं कहता कि अमेरिका में हवाई यात्राओं की ऐसी स्थिति क्यों हैं? प्रश्न करो भी तो कहेंगे कि ये तो हो जाता है, इसमें कोई क्या करे? अरे तो अपने देश में भी तो हो जाता है, फिर वहाँ को छोड़कर यहाँ क्यों भाग आया? भारत में दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है, यहाँ रेल के नाम पर नाम-मात्र का नेटवर्क है। बस-सर्विस तो नहीं के बराबर हैं, केवल हवाईजहाज ही इतने बड़े देश को जोड़ने में समर्थ हैं। जैसे हमारे यहाँ हर मिनट बस और रेल रवाना होती हैं, ऐसे ही यहाँ हवाईजहाज हैं। देर सभी जगह है, बस गालियां केवल भारत के लिए ही बनी हैं।
एक बार मुझे उदयपुर से मुम्बई जाना था, मैने एजेण्ट को फोन किया कि एक टिकट इण्डियन एयर लाइन्स की ले दो। वह बोला कि अरे आप भी कैसी फ्‍लाइट की बात करती हैं, यह तो रनवे पर आने के बाद भी रुक जाती है। यहाँ हम रनवे पर पूरा एक घण्टा धीरे-धीरे सरकते रहे, हम देखते रहे कि एक जहाज उड़ा, हम आगे खिसके, फिर दूसरा उड़ा, हम और खिसके। वास्तव में यह भौतिकता का एक हिस्सा है, हमें इसी प्रकार सारे ही देशों में स्वीकारना चाहिए। हम केवल भारत को ही गाली दें, यह ठीक नहीं है। हमारे यहाँ तो कभी-कभी ही रनवे पर जहाज रुकता है लेकिन वहाँ तो रोज़ ही ऐसा होता है।
धीरे काम करना वहाँ की आदत है, इसे हम सुस्ती का नाम भी दे सकते हैं। सबसे मजेदार बात तो यह है कि यहाँ बसे भारतीय भी इसी सुस्ती का हिस्सा हैं। उनकी फुर्ती केवल हिन्दुस्थान की निन्दा-स्तुति में दिखायी देती है। हिन्दुस्थान का नाम लेकर जिन्दा हैं, हिन्दू कहलाकर जिन्दा हैं, हिन्दी भाषा के साथ जिन्दा हैं फिर भी अपने देश को सम्मान दिलाने की बात नहीं है। उन्हें अमेरिका में भी अपना भारत दिखना चाहिए, जिसे वे छोड़ आए थे। उसको याद करके साहित्य लिखा जा रहा है, आँसू बहाए जा रहे हैं, लेकिन अपनी भारतमाता की दुर्दशा को ठीक करने के लिए आना कोई नहीं चाहता।
सम्मेलन में एक कविता सुनाई गयी, कि यहाँ बड़ी सारी कोठी बनाकर भी छोटे से मकान का भाई से बँटवारा कराकर, ताला ठोंककर आना हमारी मानसिकता है, और फिर आशा करना कि काश कोई अच्छा पड़ोसी मिल जाए, जो उस ताले की हिफाजत कर जाए। अरे तुमने भारत देश के करोड़ों घरों में ताले लगा दिए हैं, करोड़ो बूढ़े माँ-बापों की आशाओं को छीन लिया है, कम से कम उस छोटे से मकान का ताला तो अपने गरीब भाई के लिए खोल आओ। लेकिन अभी हम इतने विकसित नहीं हुए हैं, कि दूसरे के लिए कुछ त्याग कर दें!
तुम भारतीय केवल त्याग की ही बात करते हो और दुखी होते हो, इसलिए ही विकसित नहीं हो। जितना छीन सको छीन लो, जितना भोग सको भोग लो, विकसित हो तो त्याग की बात मत करो। यही है विकास का राज।
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की खोज जब कोलम्बस ने की थी तब यहाँ के निवासियों को नाम दिया था ‘रेड इंडियनस’। आज यहाँ रेड इन्डियन्स अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं और दुनिया जहान से आए व्यक्ति अमेरिकी नागरिक बनते जा रहे हैं। यहाँ बड़ी संख्या में यूरोप से लोग आए, उनका गोरा रंग यहाँ से मेल खाता था अतः वे सब स्वाभाविक अमेरिकी बन गए। यहाँ एशिया से भी लोग आए, लेकिन उनकी कद-काठी गोरे लोगों से नहीं मिलती थी तो वे आज भी एशिया मूल के ही कहलाते हैं। भारतीय भी यहाँ आकर बरसों से रह रहे हैं लेकिन अपने रंग के कारण कभी अमेरिकी नहीं कहला सकते, चाहे वे कितनी ही यहाँ की नागरिकता ले लें। लेकिन फिर भी एक होड़ मची है कि कौन यहाँ का नागरिक बन जाए। भारत से तीन गुणा जमीन और जनसंख्या केवल 30 करोड़, तो जमीन तो बहुत है न! फिर जो असली दावेदार है वे तो कुछ बोलते नहीं, बस जो यूरोप से आकर बसे हैं उनके चिल्लाने से क्या असर होगा? जब तुम यहाँ रह सकते हो तो हम क्यों नहीं? अभी यहाँ एशियायी 25 प्रतिशत हैं, भविष्य तो दिख ही रहा है। सारे ही बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय यहाँ है और उन सबमें एशियायी। भारत जिस प्रकार से तरक्की कर रहा है उससे लगता है कि या तो भारतीय सारे वापस चले जाएँगे या फिर वे सम्मान सहित अमेरिका में रहेंगे। उनकी आवश्यकता अमेरिका अनुभव करेगा।
अमेरिका एक पूर्ण विकसित देश कहलाता है, क्योंकि यहाँ व्यक्ति के लिए भौतिक संसाधनों की भरमार है। आम व्यक्ति के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की यहाँ कोई कमी नहीं है। पानी यहाँ भरपूर है। किसी भी देश के पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए तीस प्रतिशत जंगल होने अनिवार्य हैं और इस अनिवार्यता को यह महाद्वीप पूर्ण करता है। यहाँ इतने गहरे और बड़े जंगल सुरक्षित देखकर आश्चर्य होता है। यहाँ के सारे मकान लकड़ी से बनते हैं, लेकिन जंगल नहीं कटते। लकड़ी आती है अविकसित या विकासशील देशों से। प्रकृति यहाँ पूर्ण रूप से अटखेलियाँ करती है। एक तरफ विशाल पहाड़ों की दीवार से आरक्षित समुद्र, तो दूसरी तरफ सफेद बालू पर बल खाता, सफेद झाग उड़ाता, नीला समुद्र।
केलिफोर्निया में समुद्र के मुहाने पर एक गहरा जंगल है रेड-वुड फोरेस्ट। मीलों तक पसरा यह जंगल, दो हजार वर्ष पुराने पेड़ों का संरक्षक बना हुआ है। पेड़ के तने की चौड़ाई चार आदमियों के हाथ फैलाने से भी पकड़ में नहीं आए और लम्बाई तो 300 फीट से भी अधिक। कई पेड़ नीचे से खोल मात्र रह गये हैं लेकिन ऊपर से पुनः हरे हो गए हैं। भारत के जंगल और यहाँ के जंगलों में रात-दिन का अंतर है। भारत में जंगलों में कई प्रकार के पेड़ मिलते हैं, लेकिन यहाँ केवल रेडवुड। पशु और पक्षी भी आमतौर पर यहाँ नजर नहीं आते। शाम पड़ी तो सोचा की अपनी तरह ही पक्षियों का कलरव सुनने को मिलेगा, लेकिन नहीं, शाम को भी यहाँ शान्ति ही थी। फिर पेड़ों को देखा, देखा वहाँ फल नहीं थे, जब फल ही नहीं है तब पक्षी क्या करेंगे, यहाँ आकर?
शहर में भी ऐसे पेड़ नहीं हैं जहाँ पक्षी अपना बसेरा कर सके। बस कभी-कभी कबूतर दिखायी दे जाते हैं। दूसरे जानवरों का देखना तो दुर्लभ ही है। गाय और कुत्ते को रोटी देना तो यहाँ चाँद-सितारे तोड़ने के समान है। ताजा दूध के लिए मन मसोस कर रह गए और केन बन्द पुराने दूध को पीने के लिए मन को तैयार नहीं कर पाए। लेकिन फिर सेनफ्रांसिस्को के पास के समुद्री क्षेत्र जाते समय देखा कि दूर-दूर तक वीराना छाया हुआ है। दूर से देखा तो घास के इन वीरान पहाड़ों पर कुछ काले धब्बे चलते से दिखायी दिए। कार जैसे ही पास गयी और मुँह से खुशी की आह निकल गयी, अरे ये तो गायें हैं। फिर तो वहाँ बस गायें ही गायें थी। सोचा उनके फार्म हाउस में जाकर ताजे दूध की माँग कर ली जाए। मन ताजा दूध के स्वाद की कल्पना में खो गया, लगा कोई कहेगा कि बैठो और चाहे जितना दूध पीओ। लेकिन हमें निराशा ही हाथ लगी, ताजा दूध का रिवाज नहीं है तो नहीं है। एक बात और आश्चर्य में डालती है कि गाय शाकाहारी पशु है, लेकिन वे लोग पता नहीं क्यों गाय को मांसाहारी बनाने में जुट गए हैं? यूरोप में ‘मेड-काउ’ रोग हुआ था और हजारों गायों को मौत के घाट उतारा गया था। फिर भी क्यों नहीं समझ आ रहा है कि मनुष्य के अलावा शेष पशु-पक्षी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप ही जीवन जीते हैं। यदि वे मांसाहारी हैं तो मांसाहारी हैं और यदि वे शाकाहारी हैं तो शाकाहारी। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो सभी कुछ उदरस्थ कर लेता है।
पहली बार वहीं पहाड़ों में हिरण भी दिखायी दिए, लगा कि जंगल जीवन्त हो उठा है। अमेरिका में प्रकृति को न केवल सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है अपितु उसे दर्शनीय बनाने का भरपूर प्रयास भी किया है। समुद्र के हर कोने की सुन्दरता को विभिन्न कोणों से दिखाने का एक सफल प्रयोग है यहाँ।
रुको बाहर कोई आ गया है, अरे यह तो प्लम्बर है। कल से नल टपक रहा था। एक सवा छः फीट का आदमी अपना पूरा किट लिए आया और चुपचाप अपना काम करने लगा। हमारे यहाँ पाँच या सवा पाँच फीट का आदमी आता है और न जाने कितनी बाते करते हुए नल का टपकना बन्द करता है। घर की मालकिन चाय बना देती है। जब तक वह काम करता है, चाय तैयार हो जाती है। फिर वह सारे जगत की बातचीत के बीच चाय पीकर ही जाता है। लेकिन यहाँ सर्वत्र मौन है। कभी-कभी लगता है कि अमेरिका में सबकुछ है लेकिन सुख और दुख बाँटने वाला कोई नहीं। बतियाने वाला कोई नहीं। रास्ते चलते देखकर सब मुस्कान फेंक देंगे लेकिन बाते किससे करें, मन खोजता ही रहता है। जैसे आकाश में चिड़ियों का शोर नहीं, वैसे ही धरती पर मनुष्यों की आवाज नहीं। बस हैं तो कारों का काफिला, जो दौड़ रहा है बस दौड़ रहा है। अष्ट भुजाओं वाली काली-काली सड़कें, उनपर बने रावण के दस सिरों जैसे फ्‍लाई-ओवर और उन पर तेज रफ्‍तार से दौड़ती हुईं भांति-भांति की कारें। एक कार पास से निकली, अरे यह क्या? इसमें तो ड्राइवर ही नहीं! दिमाग ने झटका खाया, नहीं यहाँ लेट-हेण्ड ड्राइव है, ओह ड्राइवर तो दूसरी तरफ है।
लेकिन मैं बात समुद्र की कर रही थी। हमारी कार समुद्र किनारे घुमावदार सड़क पर सरपट दौड़ रही थी। जरा सा चूके नहीं कि कार पानी में। बार-बार डर के मारे पूछते ही रहे कि बेटा अब कितना रास्ता और है? वीराना क्षेत्र आने लगा, नंगे पहाड़, बस उनपर सूखी घास। केवल यहाँ गाय और घोड़ों के तबेले ही हैं। पूरा क्षेत्र सुरक्षित रख छोड़ा है। रास्ते में समुद्र की सुन्दरता निहारने का मन हो जाए तो रुकिए, रास्ते में विस्टा-पोइन्ट बने हुए हैं, यहाँ ही अपनी गाड़ी रोकिए और देखिए समुद्र को उफनते हुए, लहराते हुए, इठलाते हुए। हम अपनी मंजिल पर जल्दी से जल्दी पहुँचना चाहते थे, हवाएं तेज बहने लगी थीं और ठण्ड भी अपनी तासीर दिखाने को बेताब थी।
सेनफ्रांसिस्को में गोल्डन ब्रिज है। समुद्र के ऊपर बना हुआ। उसका नाम गोल्डन क्यूँ है, यह पता नहीं चला। क्योंकि न तो उसका रंग गोल्डन है और न ही वह गोल्ड से बना है। हो सकता है कि अमेरिका के गोल्ड युग की शुरुआत उसके निर्माण के साथ ही हुई हो। वैसे भी अमेरिका की प्रगति 1936 के बाद की ही वहाँ नजर आती है। जहाँ भी गए लगभग 1936 का निर्माण ही दिखायी दिया। खैर हम गोल्डन ब्रिज की बात कर रहे थे। वहाँ से समुद्र को निहारना ऐसा लगता है जैसे आप मसूरी की ठण्ड में बर्फीली पहाड़ियों के स्थान पर, ठहाका मारते हुए समुद्र को देखें। कभी कल्पना नहीं की थी कि समुद्र किनारे भी इतनी ठण्ड होगी? लेकिन यहाँ तो लग रहा था कि शीघ्रता नहीं की तो कुल्फी जम जाएगी। एक तरफ समुद्र था तो दूसरी तरफ पहाड़। आकाश से बादल आ-आकर पहाड़ों से टकरा रहे थे। कभी गोल्डन ब्रिज के दरवाजे की ऊँचाई एक मंजिला हो जाती और जैसे ही बादलों से लुका-छिपी खेलता हुआ सूरज हमें ‘....ता’ कह देता तो हमें दिखाई देता कि अरे यह ब्रिज तो बहुत ऊँचा है। सिर को पीछे करो, और करो, जितना कर सकते हो करो, तब आप उसकी ऊँचाई नाप सकेंगे। अरे मैं फिर कहाँ भटक रही हूँ, मैं तो समुद्र के उस दूसरे किनारे पर जाने के लिए निकली हूँ जहाँ से चालीस मील की दूरी पर चल रहे जहाज अपनी मंजिल को पा लेते हैं। समझ गए न, मैं लाइट हाउस की ही बात कर रही हूँ। मैं समुद्र किनारे, रास्ता दिखाते, आकाशदीपों को सर उठाकर खड़ा होते हुए देखती रही हूँ, लेकिन यह भी दर्शनीय महत्व का हो सकता है, इस पर कभी विचार नहीं किया था। लाइट हाउस की केयर टेकर ने जल्दी से कहा कि ‘गो सून, इट इज गोइंग टू बी क्लोज’। नीचे देखा, अरे बाप रे तीन सौ सीढ़ियों को पार करके नीचे जाना था, खैर उतर तो जाएँगे लेकिन क्या ये जंग खाए घुटने वापस चढ़ पाएँगे? चलो जो होगा देखा जाएगा। आकाशदीप हमें पुकार रहा था, हमेशा दूर से ही इसे देखा है, आज पास से देखने का मौका मिला है तो फिर घुटने को तो भूलना ही पड़ेगा। एक सुंदर सी गाइड दिखा रही थी पुराने लाइट-हाउस की नयी, साफ-सुथरी मशीन को। अब तो इलेक्ट्रोनिक का जमाना आ गया तो पास ही दूसरी लाइट लगा दी गयी थी और इसे पुराने वैज्ञानिकों को याद करने के लिए छोड़ दिया गया था। चालीस मील दूर से जहाज इन लाइटों को देख पाते हैं और शहर आ रहा है, इस बात की खुशी मना सकते हैं।
पहाड़ों पर कहीं-कहीं केसरिया रंग बिखरा हुआ था, अरे यहाँ हनुमानजी कहाँ से आ गये? नजदीक गए, हाथ लगाकर देखा, अरे ये तो एल्गी है। हमारे यहाँ हरे रंग की होती है और यहाँ केसरिया है। यहाँ समुद्र के पानी को हाथ लगाने की मनाही है, लगाएँगे भी तो कैसे? एक तरफ तो पहाड़ है, वहाँ से आप उतर नहीं सकते, और दूसरी तरफ मीलों तक फैली छोटी लेकिन वीरान पहाड़ियां। समुद्री किनारा भी है और यह किनारा तकरीबन तेरह मील लम्बा है। ऊपर से समुद्र का और न ही उसके किनारे का कोई छोर दिखाई दे रहा था। बस दिख रहा था तो सफेद बालू रेत पर सुनसान तट पर आँचल लहलहाता समुद्र। आँचल भी कैसा? सम्पूर्ण विस्तार नीले रंग का और जब आँचल लहराए तो सफेदी जगमगा उठे। दूर-दूर तक कोई जानवर नहीं। हमारी आँखे तलाश रही थी, पहाड़ पर छिपे किसी जंगल के जानवर को। तभी आँखों ने जंगल की जीवन्तता को पा ही लिया, एक नहीं पूरे पाँच हिरण वहाँ बड़े ही धैर्य से घास खा रहे थे। इन हिरणों में चौकन्नापन नहीं था, यहाँ शेर नहीं थे।
पहाड़ के दूसरी तरफ समुद्र की खाड़ी थी। यहाँ समुद्री पक्षी आकाश से सीधे ही समुद्र में छलांग लगाते और अपनी चोंच को समुद्र में पूरा डुबोकर अपना नन्हा सा शिकार खोज ही लेते। अपनी काली मूछे निकाले उदबिलाव भी उचकते हुए दिखायी दे गए। गोल्डन ब्रिज के समुद्र किनारे हजारों की तादाद में समुद्री पक्षी थे। उनका शोर शाम को, खामोश समुद्र को भी मदमस्त करने पर मजबूर कर रहा था। वे सब उड़ रहे थे, एक साथ हजारों। समुद्र खुश हो रहा था, अपनी बाहें फैलाकर आगे बढ़ रहा था, चाँद पूर्ण यौवन के साथ उन्हें देख रहा था। पक्षी समुद्र के अँग-अँग को प्रफुल्लित कर रहे थे, उसके विशाल सीने पर अठखेलियाँ करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। कभी इस छोर पर और कभी उस छोर पर, पक्षियों का कलरव गूँज रहा था। समुद्र खुशी से उछलता और अपने साथ ले आता समुद्री वनस्पतियाँ। भारत के समुद्री किनारों पर शंख मिलेंगे, सीप मिलेंगी लेकिन यहाँ टूट कर आयीं कुछ बेले ही मिलेंगी। हो सकता है किसी दूसरे किनारे पर शंख भी हों, सीपियाँ भी हों?
ठण्डी हवाएँ तन को लग रही थीं और मन कहीं चाय और पकौड़े वाले को ढूँढ रहा था। यहाँ कहाँ पकौड़े? किनारे पर खूब लम्बी वुड-वाक है, यहाँ खाने-पीने को बहुत कुछ है, लेकिन अपने पकौड़े नहीं। रेत पर टहलिए, पाँवों में मिट्टी लेकर घर बनाइए लेकिन चना-जोर-गर्म की आवाज लगाकर कोई लड़का आपको कुछ खाने पर मजबूर नहीं करेगा। रेत पर खोमचे वाले भी नहीं हैं, तो गंदगी भी नहीं है। लेकिन फिर भी जिधर देखो उधर डस्टबीन ही डस्टबीन रखे हैं। आदमी फेंकना चाहे तो भी न फेंक सके। कभी यहाँ आकर मन होता है कि मूँगफली खायी जाए और उनको छीलकर, फूँक मार कर छिलको को उड़ाया जाए। लेकिन सारे सुख कहाँ परायी धरती पर? एक दिन ऐसी ही एक यात्रा पर निकले थे, देखा रास्ते में फल-सब्जी की दुकान सजी है। हम भी कार को उधर ही मोड़ ले गए। चेरी, स्ट्राबेरी से लेकर कितने ही जाने-अनजाने फल और सब्जियाँ यहाँ थे। यहाँ कुछ पसन्द आया हो या नहीं लेकिन यहाँ की चेरियाँ लाजवाब हैं। ढेर सारी खरीदी गयी और घूमते-घूमते वहीं खाना शुरू किया गया। खाने के बाद पहली बार गुठली को हवा में मुँह से फेंकते हुए जो मन को आनन्द आया वह अनूठा था। लगा जैसे आज जंजीरे टूट गयी हों। समुद्र किनारे पहाड़ पर चढ़कर केला खाओ और केले के छिलके को हवा में नहीं उछालो तो फिर केले खाने का मजा ही क्या? लेकिन यहाँ तो डर इतना हावी है कि सुख लेने ही नहीं देता।
घुमावदार पहाड़ी रास्ता, अपने यहाँ लिखा मिलेगा ‘हार्न बजाएं’ और यहाँ हार्न बजाना तो जैसे रात को मंदिर में घण्टी बजाना। सभी को अपनी लेन में चलना है, ओवर-टेंकिग नहीं। सड़क पर पीली लाइन खींच दी गयी है, यदि दो लाइने हैं तो आप ओवर-टेंकिग नहीं कर सकते। हाँ डोटेड पीली लाइन है तब आप ओवर-टेंकिग कर सकते हैं। सड़क किनारे साइनबोर्ड लगे हैं स्पीड के लिए, कहीं तीस, कहीं पचास तो कहीं पेसठ। ज्यादा बढ़ाई नहीं कि कैमरे ने आपको पकड़ लिया और चालान की टिकट मिल गयी। न मंत्री पुत्र और न ही अफसर पुत्र। चढ़ाई वाले रास्ते पर जा रहे थे, तीस की स्पीड निर्धारित थी। आगे गाड़ियां उसी रफ्‍तार से चल रही थीं, हमें थोड़ी जल्दी थी, वैसे भी भारतीयों को जल्दी ही रहती है, उन्हें पता नहीं कहाँ जल्दी जाना होता है? यहाँ किसी को कोई जल्दी नहीं होती। चुपचाप लाइन में खड़े रहते हैं और काउण्टर वाला धीरे-धीरे, खरामा-खरामा काम करता रहता है। खैर हम जल्दी में थे और शायद हमें गाड़ियों के पीछे चलना सुहा नहीं रहा था। अरे होर्न दो न, लेकिन होर्न बजाना तो यहाँ वार-त्यौहार ही होता है, फिर? देखा आगे वाली गाड़ी, जगह देखकर किनारे हो गयी और हम शान से आगे निकल गए। यही है यहाँ आगे निकलने का तरीका। लेकिन यह तरीका केवल गाड़ियों के लिए ही है, आप वैसे आगे निकल कर दिखाएँ तब जाने।
हम सोचते थे कि हमारे पुरातन भारत में ही टेटू या गोदने का रिवाज है। हम कैसे उन्हें गँवार कहकर मजाक उड़ाते रहे हैं। कभी भी कोई गाँव से आता और उसके हाथों में या शरीर में गोदने का चिह्न देखते, उसे हिकारत की नजर से हम देखते आए हैं। लेकिन यहाँ देखा कि एक मोटी सी औरत कुछ छोटा सा पहने हुए घूम रही है। यहाँ छोटे की तो परवाह भी किसे है? लेकिन उसकी पीठ रंग-बिरंगी हो रखी थी। देखा अरे यह तो गोदना है। पूरी पीठ पर चित्रकारी करायी हुई थी। अब उसे दिखाना है तो फिर ठण्ड में भी छोटे कपड़े तो पहनने ही पड़ेंगे न! महिलाएँ ही नहीं पुरुष भी पूरी पीठ पर या शरीर पर गोदना करवाते हैं। मैं सोच रही थी कि सारे शरीर पर गोदने के लिए तो एनस्थिसीया का प्रयोग करते होंगे, लेकिन नहीं जी, फैशन के लिए इंसान सब बर्दाश्त करता है।
अमेरिका में विभिन्न देशों के लोग रहते हैं और सभी एक ही रंग में रंगे दिखायी देते हैं। कपड़े खरीदने के लिए एक मॉल में गए, यहाँ अपने जैसे कपड़ों का बाजार नहीं है। बस सिले-सिलाए कपड़े मिलते हैं। एक बार राजस्थान में अकाल पड़ा, जनजाति क्षेत्र में न तो खाने को और न ही पहनने को। भारत के महानगरों के सेठों ने ट्रक भरकर कपड़े भेज दिए। कुछ कपड़े नये और कुछ पुराने। लेकिन सभी गांठों में बँधे थे, इस कारण मुसे हुए थे। जब हमने इन्हें बाँटने के लिए निकाला तो मन किया कि सभी को प्रेस कराकर देने चाहिए। लेकिन वह सम्भव नहीं था, प्रेस कराने के ही हजारों रूपये लग जाते। लेकिन यहाँ मॉल में देखा कि बदरंगे, मुसे-तुसे, फटे हुए कपड़े, बड़े ही मँहगे दामों में मिल रहे थे। बेटे से पूछा कि कबाड़ी की दुकान है क्या? लेकिन उसने हँसकर कहा कि यही फैशन है। फिर यही फैशन हो भी क्यों नहीं, सारे ही कपड़े मशीन में धुलते हैं और प्रेस का किसी के पास समय नहीं तो एक धुलाई के बाद तो ऐसे ही पहनने हैं फिर नये ऐसे ही क्यों न खरीदे जाएं? कहाँ भारत के चटक रंग और कहाँ यहाँ के फीके रंग? राजस्थान तो देश ही रंगों का है। कितने चटकीले रंग हैं हमारे यहाँ? सात रंगों की चूंदड़ तो हमारी शान है। शादी में दुल्हन को इसीलिए चूंदड़ उढ़ाई जाती है कि उसमें विभिन्न रंग हैं और उसका चटकीला लाल रंग तो आपसी आकर्षण का प्रतीक। बच्चों के कपड़े भी सारे ही बदरंग। लगता जैसे पुराने हों, लेकिन पास जाने पर पता लगता कि नहीं ये तो नए ही हैं। हमारे यहाँ इतने रंग होते हैं कि कपड़ा हमेशा नया सा ही दिखता है लेकिन वहाँ इतने फीके रंग होते हैं कि नया भी पुराना सा ही दिखता है। इसलिए ही रोज नया खरीदने का मन करता है। शायद यह भी बिक्री का एक और फण्डा हो?
जब कोलम्बस यहाँ आया था तब उसने अमेरिका को ही इण्डिया समझ लिया था और इसी कारण उसने यहाँ के लोगों का नाम दिया था, रेड-इण्डियन। अब यहाँ से रेड शब्द हटता जा रहा है और सब जगह इण्डियन ही लिखा मिलता है। हम पहले तो खुश हुए कि अरे इण्डियन फूड यहाँ है फिर पता लगा कि ये सब रेड-इण्डियन्स के लिए लिखा है। हम जैसे नए लोगों के लिए अन्तर समझना कठिन हो जाता है। लेकिन भारत से आए लोगों ने यहाँ भारतीयों के खाने का पूरा इंतजाम कर रखा है। सभी कुछ उपलब्ध है, बस स्वाद में अन्तर है। यहाँ संकर प्रजाति बनाने का बड़ा शौक है तो सेव कई प्रकार के, आडू कई प्रकार के और दोनों को मिलाकर अलग से कई प्रकार के फल। तुरई एक-एक हाथ से भी अधिक लम्बी, शिमला मिर्च इतनी बड़ी की भरवा बनाने का उत्साह ही समाप्त हो जाए। किसी को बैंगन के भुर्ते का शौक हो तो अकेला एक बैंगन का भुर्ता नहीं खा सकता। एक ही बैंगन आधे किलो से अधिक का। प्याज इतने बड़े और मीठे, लगता है प्याज खा रहे है या फिर ककड़ी। लहसुन भी इतना मोटा कि एक ही गुली पर्याप्त है सब्जी के लिए। लेकिन जहाँ कुछ फलों में स्वाद की विचित्रता है वहीं कुछ फल निहायत ही स्वादिष्ट हैं। चेरी और स्ट्राबेरी की साइज भी बड़ी और स्वाद भी लाजवाब। आम भी अब बड़ी तादाद में आने लगा है, लेकिन मेक्सिको में भी आम होता है तो वहाँ से भी आम और केरी दोनों ही आती हैं। एक केरी आधा किलो से अधिक।
हमें बड़े-बड़े बाजार देखने की आदत है, लेकिन यहाँ बड़े-बड़े मॉल मिलेंगे। भारत में शाम को लोग बाजारों में घूमते हैं और यहाँ मॉल में। बाजार में ठेले वाले मिलते हैं और यहाँ मॉल में रेस्ट्रा। यहाँ रात को दस बजे बाद जन-जीवन थम जाता है, जबकि भारत में दस बजे बाद शुरू होता है। अमेरिकन्स तो रात आठ बजे ही घर को बन्द कर लेते हैं। उनके रेस्ट्रा भी शाम का खाना रात आठ बजे तक ही परोसते हैं। रात आठ बजे बाद किसी को भी फोन करना तहजीब नहीं है, मिलने जाना तो बहुत दूर की बात है। हमारे यहाँ रात को ग्यारह बजे भी घर की घण्टी बज सकती है। आपका कोई मित्र बाहर खड़ा हँसी बिखेर रहा होगा।
अरे यार इतनी जल्दी सो गए क्या? मैं तो इधर से निकला था, सोचा तुम्हारे साथ कॉफी पीता चलूँ।
बेचारा मेजबान मित्र सोने की तैयारी में हैं, लेकिन हँसकर स्वागत करता है। बोलेगा कि यार आ ना, बड़े दिन बाद तो आया है। चल आ, बाते करेंगे। फिर पत्नी को आवाज लगती है - अरे भागवान सो गयी क्या? देखो तो कौन आया है?
पत्नी भी गाउन सम्भालते हुए सकुचाते हुए आती है। अरे भाईसाहब आप? चलिए आप बैठिए मैं आपके लिए कॉफी बनाकर लाती हूँ। बस फिर शुरू हो जाती है दो दोस्तों की गपशप।
भारतीय तो वहाँ भी ऐसा ही करते है। लेकिन बहुत ही कम। क्या पता आपकी तेज आवाज से पड़ौस में डिस्टर्ब हो जाए और वे पुलिस को फोन कर दे?
यहाँ बेचारी महिलाएं साड़ी पहने रात ग्यारह बजे तक भी अपने शरीर को कसा हुआ रखती हैं। क्या पता कौन कब टपक जाए? लेकिन वहाँ जिसे आना है पूर्व सूचना के साथ, वो भी रात आठ बजे तक। फिर आप स्वतंत्र हैं चाहे तो बरमूडा पहने या गाउन।

डॉ. अजित गुप्ता

Saturday, February 28, 2009

सोने का पिंजर (6)

अमेरिका का नाश्ता और भारत की बूढी काकी

छठा अध्याय

हमने जब अमेरिका की धरती पर पैर रखा तो एक लम्बी लाईन इमीग्रेशन चेक की थी। यही लाईन भारत में होती तो हम उसे अव्यवस्था का नाम देते। काउण्टर बीस, लेकिन ओपेन दस भी नहीं। सभी मटरगश्ती कर रहे हैं, लेकिन किसी को भी यह चिन्ता नहीं कि बाइस घण्टे की यात्रा करने के बाद अविकसित देश का व्यक्ति विकसित देश में आया है तो उसे शीघ्र समाधान मिल जाए। ऊँचे पदों पर आसीन, बड़े-बूढ़े भी दो घण्टे विकसित देश की सुस्ती देखकर धन्य हुए जा रहे थे। बोलने की हिम्मत किसी में नहीं, कहीं ऐसा नहीं हो कि यहीं से वापस टिकट कटा दी जाए। विकसित देश इसी स्पीड से काम करते हैं। खैर दो घण्टे बाद हमारा भी नम्बर आया, अब घावों पर तहज़ीब का मरहम लगाया गया और यह बताया गया कि देखों हम कितने प्यार से बात करते हैं। ‘हाउ आर यू?’ एक मधुर सी मुस्कान उछाली गयी, हमने भी सोचा कि चलो दो घण्टे बाद ही सही खिड़की में कोई आकर बैठा तो सही और उसने शराफत से बात तो की। लेकिन फिर अधूरी कागज़ी कार्यवाही।
बाहर कस्टम वाले ने रोक लिया, अरे इसमें तारीख की छाप तो लगी ही नहीं! अब वापस वहीं, लेकिन जब तक तो वह अफसर जा चुके थे।
कहीं भला आधा घण्टे से अधिक विकसित देश वाले काम करते हैं क्या? अब कौन हमारी समस्या सुलझाए?
बस एक ही उत्तर ‘गो योर विन्डो’, अरे कहाँ से लाऊँ अपनी विन्डो?
आखिर एक काली अफसर दिखाई दी, सोचा कि एक काला आदमी दूसरे काले से ही मदद माँग सकता है, मैंने बड़ी आशा से उससे कहा कि ‘आई नीड योर हेल्प’।
उसने गोरे अधिकारी से कहा कि इनकी एंट्री देखो। मेरा और मेरे पति का नाम वहाँ था। अब स्टांप लगा दो, पर बन्दे ने नहीं माना। स्पष्ट मना कर दिया कि नो। आखिर वही महिला अधिकारी अपनी विन्डो पर गयी और उसने स्टांप लगाकर दी। कहते हैं कि काले बड़े खतरनाक हैं, इनसे बचकर रहो। साथ ही कहते हैं कि भारतीय भी खतरनाक हैं इनसे बचकर रहो। यह है बदनामी का प्रचार।
अभी हमें बहुत कुछ देखना था, होटल गए, पहले से ही सारा पैसा भेज दिया गया था, फिर भी लाइन में लगाकर वही घण्टों का इन्तजार। दो दिन हो गए थे सफर में, न्यूयार्क के एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही सोच रहे थे कि जाते ही होटल के अपने कमरे के बिस्तर पर पड़ जाएँगे। खाने की भी इच्छा नहीं थी, तो मन ने कहा कि अरे बेचारे आयोजकों ने हमारे लिए खाने का इंतजाम किया होगा, वे मनुहार करेंगे तब कैसे कमरे में बंद रहेंगे? न्यूयार्क की धरती पर पहुँचते ही बेटे को फोन करना था, हमें लेने आए आयोजक के पास फोन था। हमने उनसे लिया और बेटे को सूचना दे दी कि हम आ गए हैं, शेष बाते होटल पहुँचकर। लेकिन हमें क्या पता था कि पहले ग्रास में ही मक्षिकापात हो जाएगा? हमें कहा गया कि होटल के कमरे के लिए लाइन में लगें। हमारे साथी दूसरी उड़ान से हमसे पहले पहुँच गए थे और उनको कमरे मिल गए थे। हमने सोचा था कि उन्होंने हमारे कमरे की चाबी भी ले ली होगी। लेकिन यही हम गच्चा खा गए। हमारे यहाँ होटल में जाने का मतलब है साहब बनना। जाते ही कमरा मिलेगा और आपका सामान कमरे में पहुँच जाएगा। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। आपने पहले बुकिंग कराई है तो क्या, आप किसी कार्यक्रम में आएं हैं तो क्या, आप किसी के मेहमान हैं तो क्या? आपको लाइन में लगकर एक फार्म भरना पड़ेगा, तब कहीं जाकर चाबी मिलेगी।
यहाँ भी वही खरामा-खरामा काम करने की आदत, रात के बारह बज गए और लाइन न शुरू हो और न ही खत्म। किसी अपने से कहो कि भई यह क्या बात है? तो वह कहेगा कि यहाँ ऐसे ही काम होता है। मेरे मन में आया कि कहने वाले भारतीय को झिंझोड़कर पूछू कि यहाँ ऐसे ही काम होता है तो फिर भारत को गाली क्यों देता है? भारत में तो होटल के कमरे के लिए कभी लाइन नहीं लगानी पड़ी। सौ करोड़ की जनता को भी इतने घण्टों तक तो कोई इंतजार नहीं कराता। लेकिन फिर भी यह उनकी खुबसूरत अदा है। हम सम्मानित होने वाले साहित्यकारों में थे, फिर भी असम्मान के साथ लाइन में लगे थे। राजस्थान के प्रतिनिधि दल ने भी हमारा कमरा आरक्षित कराया था, लेकिन सब बेकार।
हम एक लाईन में लगे, लाईन थोड़ी लम्बी थी, दूसरा काउण्टर खाली था। हमारे साथ लगा एक गोरा व्यक्ति दूसरे काउण्टर पर चला गया, उसका काम हो गया। हम भी उसके पीछे-पीछे चले गए, बस त्यौरियां चढ़ गयी, ‘गो योर लेन’। हमारे साथियों ने कहा कि आप कब तक लाईन में खड़ी रहेंगी, हम ऐसा करते हैं कि एक कमरा आपके लिए खाली कर देते हैं, आप वहाँ आ जाएं। क्योंकि अभी रजिस्ट्रेशन का बिल्ला भी लेना था। हमारी लाईन में विदेश विभाग के अधिकारी भी खड़े थे, मैंने उनसे कहा कि बारह बज रहे हैं अब मैं और नहीं खड़ी रह सकती। पानी की प्यास के मारे गला सूख रहा है और मैं लाईन छोड़ कर चले गयी।
सामान अपने साथी के कमरे में पहुँचाया और आठवीं मंजिल पर रजिस्ट्रेशन के लिए जा पहुँचे। अभी तक हमने किसी भी आयोजक को नहीं देखा था, सिवाय एयरपोर्ट के। खाने की कल्पना तो उड़न-छू हो चुकी थी। भारत में हम कैसे मेहमानों के लिए बिछे जाते हैं? यदि मेहमान विदेशी हो तो फिर हम उसके स्वागत में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। लेकिन यहाँ तो कुछ भी नहीं! रजिस्ट्रेशन वाले कमरे में चार भारतीय प्रवासी अपनी सेवाएं दे रहे थे। रजिस्ट्रेशन का फार्म पहले ही भरा जा चुका था, पैसे भी दिए जा चुके थे, बस अब तो किट लेना था। लेकिन वह देसी बंदा हिलने को ही तैयार नहीं हो। वह निश्चल बैठा था, उससे एक ने कहा कि भाईसाहब किट दीजिए। वह उसकी तरफ पोज मारकर देखने लगा। पंद्रह मिनट का पोज! हम सबने निर्णय किया कि कुछ मत बोलो, बोलते ही यह पोज में चला जाता है। आखिर आधा घण्टा हो गया, एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अपना कुर्ता उठाया और बोला कि ‘भाईसाहब मेरी कमर का आपरेशन हुआ है, यह देखिए, ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता।’
मैंने कहा कि भाईसाहब कम से कम पानी ही पिला दीजिए।
वह अपनी टेबल के नीचे से एक आधा लीटर की बोतल निकालकर बोला कि देखिए सुबह से इस बोतल के सहारे यहाँ बैठा हूँ। मैंने सोचा कि अरे पानी तो इसके पास ही नहीं है, मुझे क्या पिलाएगा?
फिर वह बोला कि आपको पता है कि दो साल पहले मैं मरते-मरते बचा था, पूरा शरीर पेरेलाइज हो गया था। आप कहते हैं कि मेरे कमर का ऑपरेशन हुआ है।
भगवान ने उसे पुण्य का मौका दिया था और उसे वह पाप में बदल रहा था। लेकिन फिर वह कुछ हिल ही गया और उसने बुजुर्गवार को किट पकड़ा ही दिया। हम सबने कहा कि आपको कठिनाई हो रही है तो आप हमें बताए हम सब आपका हाथ बँटा देंगे।
वह अहंकार के साथ बोला कि हमारे पास यू.एन. हेडक्वार्टस से आर्डर हैं कि सारा काम व्यवस्थित हो। हमें स्वयं ही देखना है।
उसका काम इतना भर था कि हमें मिलने वाले बिल्ले पर हमारा नाम और देश का नाम लिखना था और तैयार किट पकड़ाना था। इसपर भी एक व्यक्ति के साथ आधा घण्टे का समय समझ से परे था। खैर अभी तो हमें बहुत कुछ देखना था। शायद भगवान ने हमें वहाँ भेजा ही इसलिए था कि भारतीयों का हीनबोध मैं कम कर सकूँ। मुझे ही सारे प्रकरणों से भगवान ने गुजारा था।
मैं अभी आधे घण्टे से लाईन में सबसे आगे लगी हुई ही थी कि एक महिला दौड़ती हुई आयी। उसकी नाक पर एक नली लगी थी। वह मुझसे बोली कि मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ। मैं बहुत खुश हुई, पहली बार यहाँ यह शब्द सुना था। लेकिन वह मुझसे क्यों क्षमा माँग रही थी? मन ने प्रश्न किया।
वह बोली कि मेरे ऑक्सीजन लगी है, अतः आप मुझे पहले आगे आने दें।
मैंने कहा कि शौक से, आप आगे आएं, यदि ये काम कर दें तो मुझे खुशी होगी। अब मैंने उन्हें कहा कि भई इनको तो दे दो।
खैर जैसे-तैसे एक घण्टे में काम हो ही गया। मैंने अपने साथ वालों के लिए भी कहा, वो बोला कि उन्हें स्वयं ही आना होगा। अब इस आपा-धापी में भला किसकी हिम्मत होगी जो अपने साथ आए पति का भी प्रवेश-पत्र ले ले। हम इतना टूट चुके थे कि अपने कमरे में जाकर बेसुध से पड़ गए। यह ध्यान भी नहीं रहा कि बेटे को फोन भी करना है। कमरे में न तो पानी था, और न ही दिन के बाद से पेट में कुछ पड़ा था। लेकिन थकान ने उन सबकी ओर ध्यान ही नहीं जाने दिया। बेटे ने पहले ही बता दिया था कि खबरदार जो होटल के कमरे में रखी पानी की बोतल को पीया। वह बोतल तीन डॉलर की है। होटल में जाने से पूर्व बाहर पूरा केरेट खरीद लेना तो वह तीन डॉलर का मिल जाएगा। हमने देखा हमारे कमरे को। 200 डॉलर प्रतिदिन का कमरा। फ्रिज नहीं था, तो पानी का तो सवाल ही कहाँ उठता है। बाथरूम में जाइए और उसी नल से पानी पी लीजिए। लेकिन हम इतने टूटे हुए थे कि न तो पानी दिखायी दे रहा था और न खाना। बस सामने पलंग था और हम उसके आगोश में जाने को बेताब।
रात के तीन बजे फोन की घण्टी बज उठी, एक बारगी तो समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है, फिर पतिदेव ने फोन उठाया। फोन पर बेटा था, बोल रहा था कि आप लोग कहाँ हैं? मैं कब से परेशान हो रहा हूँ, आपका फोन ही नहीं आया। मैंने होटल के काउण्टर पर पूछा तो बोले कि यहाँ तो लोग छः घण्टों से लाइन में लगे हैं। मैंने फिर दोबार फोन किया तो कहा कि नहीं कोई लाइन नहीं हैं। लेकिन अजित गुप्ता के नाम का कोई कमरा बुक नहीं है। उसने भारत फोन करके कैसे भी एक नाम हमारे साथी का ढूँढा और उसी के नाम से कमरे के बारे में जानकारी चाही। पहले तो उसी नाम के दूसरे कमरे में फोन लग गया फिर किस्मत से उन्हीं के नाम के कमरे में हम थे। हमने कहा कि हम ठीक हैं, नींद में हैं, सुबह बात करेंगे।
सुबह हो गयी, अब तो नाश्ते की बारी थी। हमने सोचा कि हो सकता है कि आयोजक आज मेहमान-नवाजी करें। लेकिन यह क्या होटल में ही नाश्ता लगा था और उस अमेरिकन नाश्ते को खाते कैसे हैं, बताने वाला कोई नहीं था। हिन्दी सम्मेलन का उदघाटन युनाइटेड नेशन के कार्यालय पर होना था तो बस भी नीचे लग चुकी थी। हमने चाय पीना ही ठीक समझा। हमने जैसे ही चाय के पानी में दूध डाला, चाय एकदम ठण्डी-टीप। वहाँ दूध एकदम ठण्डा फ्रीज का ही होता है। खैर नाश्ते की बात बाद में करेंगे। अभी तो बस जाने को तैयार थी। हम बस में बैठने के लिए तैयार थे। लेकिन अब समस्या खड़ी हो गयी, हमारे पतिदेव की। उनके पास तो बिल्ला नहीं। वहाँ समस्या समाधान के लिए भी कोई नहीं। फिर यही उचित समझा गया कि वे वहीं होटल पर रहें, नहीं तो वहाँ कहाँ जाएँगे? अब उनका तो मूड खराब, क्या इसी के लिए यहाँ आए थे? लेकिन समय नहीं था, बस एकदम से तैयार खड़ी थी।
एक घण्टा वहाँ पर भी लाइन में खड़े रहे। मुझे लगता है कि हम भारतीयों को लाइन में कैसे खड़ा रहना है, इसकी आदत वहाँ पड़ जाती है। खैर कैसे-तैसे हम हॉल तक जा ही पहुँचे। कार्यक्रम भी शुरू हुआ और खत्म भी। पेट के चूहे कुलबुला रहे थे। सोचा था कि यहाँ तो कुछ नाश्ता वगैरह होगा। लेकिन कुछ नहीं। पास ही दुकान थी, खरीदो और खाओ। हमने भी चाय से ही काम चलाया। कार्यक्रम खत्म हुआ और वापस बस की इंतजार प्रारम्भ। दो बजे तक सड़क पर खड़े रहे लेकिन बस का कहीं दूर-दूर तक पता नहीं। वहाँ जसदेव सिंह जी भी खड़े थे, थोड़ा गुस्से में थे। बोल रहे थे कि मुझे कमेण्ट्री के लिए बुलाया था और यहाँ किसी और से करा ली।
अरे भाई, तुम तो अपने देश में करते ही रहते हो, यहाँ बेचारों को कभी-कभी तो अवसर मिलता है, करने दो। क्यों नाराज होते हो।
जब सब्र का बाँध टूटने लगा तो आयोजकों को फोन खड़काया गया और तब कहीं आकर बस आयी। लेकिन बस वो ही समय था जब हम लोगों से मिल पाए। बाकि तो कोई किसी कार्यक्रम में और कोई किसी में। तीन बजते-बजते हम खाने की टेबल पर थे।
जब न्यूयार्क आने की बात चली थी, तब बेटे ने कहा था कि अरे कितना अच्छा खाना खिलाते हैं भारतीय, मैं भी तीन दिन आपके साथ ही रह लूँगा। अच्छे खाने का अवसर मिल जाएगा। मन में खाने की कल्पना का भण्डार था। मन बूढ़ी काकी की तरह ही सोच रहा था। एक टेबल पर ढेर सारा सलाद होगा, क्योंकि यहाँ के भोजन में सलाद ही मुख्य होता है। एक टेबल पर फल भी होंगे। गरम-गरम रोटी होगी, ढेर सारी सब्जियाँ होंगी। लेकिन हमारा हाल भी बूढ़ी काकी जैसा ही हो गया था। हमारे ख्वाब बेकार ही गए। बहुत ही गया गुजरा खाना था। जिसे हम भारतीय तो नहीं खा सकते थे।
एक रोटी जैसी थी, हमने वो ही खाने का मन बनाया। लेकिन वह हमसे खायी नहीं गयी।
जब बेटा आया और हमने अपना दुखड़ा रोया तो बोला कि अरे वो तो पीटा थी, उसे ऐसे नहीं खाया जाता। उसे रोटी की जगह कैसे परोस दिया?
अब हमें क्या पता कि कैसे परोस दिया? सोच रहे होंगे कि इन फूहड़ भारतीयों को क्या पता अमेरिकन रोटी क्या होती है?
हमारे साथ की साहित्यकार बोली कि दीदी मुझे तो उल्टी आ रही है। मैं तो इसे नहीं खा सकती। फिर अपने ही मिठाई के डिब्बे खुले। हम घर से पराठें बनाकर लाए थे। रास्ते में लंदन में डस्टबीन में डाल दिए। यह सोचकर कि अब तो पहुँच ही रहे हैं, गर्म खाना ही खाएँगे, भला ठण्डे परांठे क्यों खाएँ? लेकिन अब वे ही याद आ रहे थे। एक वहाँ साबूदाने के पापड़ की लाल-नीली कतरने थीं जो तीन दिन तक नहीं बदली गयी। सलाद का तो नाम ही नहीं था। बस एक अच्छी चीज थी, वह था पानी। पानी की हजारों बोतले वहाँ थीं। सारे ही भारतीय उन बोतलों पर टूट पड़े, क्योंकि किसी ने भी पानी कहाँ पीया था? सभी के हाथ में दो बोतले थी, होटल के लिए।
बस से उतरते ही हमें हमारे पतिदेव की चिन्ता सताने लगी। वे बाहर ही मिल गए, बोले कि मैंने तो बाहर भारतीय होटल में खाना खाया है। मुझे उनकी हिम्मत पर शक हुआ। मेरी आँखे आश्चर्य से फटी जा रही थीं। वे भारत में ही अकेले जाकर ऐसा कार्य सम्पादित नहीं कर सकते थे तो यहाँ परदेस में वे और अकेले जाकर?
फिर वे बोले कि बेटे का फोन आ गया था, उसे बहुत चिन्ता हो रही थी। उसने मेरी एक मित्र के बेटे को फोन किया जो न्यूयार्क में ही था। उसने बताया कि तू जाकर पापा को खाना खिला दे, नहीं तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी।
ओह तो ऐसे मेनेज हुआ आपका खाना। अब मैं निश्चिंत थी। कम से कम उन्होंने तो ढंग का खाना खा ही लिया था। मेरे लिए यही सबसे बड़ा संतोष था कि पतिदेव का पेट भर गया है। नहीं तो पता नहीं न्यूयार्क में क्या होता?
होटल से आयोजन स्थल का मार्ग पैदल मार्ग था। हम उसी पर चलते रहे थे, रास्ते में एक फलों की दुकान दिखायी दे गयी। बस मुझे तो समझ आ गया कि यदि कल भी यही खाना मिला तो बिना डॉलर गिने मैं फलों से ही पेट भरूँगी। आप आश्चर्य मत करिए, अभी तो नाश्ते का वर्णन भी बाकी है।
हम जब बेटे के साथ केलिफोर्निया के एक होटल में रुके थे तब समझ आया था कि यहाँ सुबह का नाश्ता होटल के किराए में शामिल होता है। ढेर सारा नाश्ता होता है, आपको कुछ तो पसन्द आ ही जाता है। गर्म दलिया भी, आमलेट भी, फल भी, सूखे मेवे भी, और भी बहुत कुछ। लेकिन हमारा प्रथम अनुभव तो बड़ा कटु था। हमारे न्यूयार्क के होटल में भी नाश्ता सजा था। हमे तब तक यह भी नहीं मालूम था कि यह होटल वालों की तरफ से ही है। हम तो सोच रहे थे कि गर्म-गर्म आलू बड़े, जलेबी, आलू के पराठें, सेण्डविच आदि होंगे। लेकिन वहाँ तो गोल-गोल रिंग सी पड़ी थी। सब लोग पूछ रहे थे कि इसे कैसे खाते हैं? कोई उसे काट रहा था, और फिर जैम भर रहा था, कोई वैसे ही चाय में डुबोकर खाने की कोशिश कर रहा था।
बाद में बेटे ने बताया कि यह ‘बेगल’ है इसे ऑवन में गर्म करके खाया जाता है, कच्चा तो कोई खा ही नहीं सकता। कच्चा मतलब आटा खाना।
लेकिन बेटा वहाँ तो ऑवन था ही नहीं। हम तो सभी ऐसे ही लगे थे, खाने में। फिर वही लड्डू और मठरी निकाले गए।
हमारे साथ वरिष्ठ साहित्यकार थे, वे एक गोल रिंग को उठा लाए। मैंने उनसे पूछा कि क्या करेंगे? वे बोले कि भारत लेकर जाऊँगा। दिखाऊँगा इस नायाब चीज को।
मैंने कहा कि बदबू आने लगेगी।
वे बोले कि जूते में डालकर ले जाऊँगा। लेकिन ले जरूर जाऊँगा।
दूसरे दिन का खाना भी पहले दिन जैसा ही था। एकसा मीनू, कोई बदलाव नहीं। हमने तो फलों की दुकान पकड़ ली। तीसरे दिन बेटा आ गया था। पद्मजा जी बोली कि अरे तेरे देश में भूखे मर गए। वह बेचारा दही लेकर आया, फल लाया, बोला कि पता नहीं इन्होंने कैसा खाना दिया है?
तीन दिन तक गुलजार भी वहीं थे, वे भी खाने की टेबल पर दिख ही जाते थे। पता नहीं कैसे खा रहे थे, या फिर घर जाकर खाते थे?
लेकिन समस्याएं अभी खत्म नहीं हुई थी। दूसरे दिन पतिदेव को बिल्ले के अभाव में बाहर ही रोक लिया गया। अब तो हमारी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गयी। अब क्या करें? अच्छा सम्मान कराने आए। हम अब कुछ आयोजकों से मिले। उन्हें अपनी समस्या बतायी, यह भी कहा कि हम सम्मानित होने वाले हैं तो साथ में पति भी हैं और बेटा भी आने वाला है। लेकिन फिर उन्होंने हमें दो कार्ड बनाकर दे दिए। अब कहीं हम जाकर शेर बने। मजेदार बात तो यह रहती है कि गेट पर आयोजक नहीं होते अपितु सिक्योरिटी वाले होते हैं। लम्बे-चैड़े, अधिकतर काले।
हम अपने साथ जोधपुर के दूध के लड्डू लेकर गए थे, हम क्या हमने पद्मजा जी को बोल दिया था कि वे जोधपुर से साथ लेकर आएं। हमने समापन वाले दिन एक डिब्बा लिया और सारे ही आयोजकों को लड्डू खिलाए। वे लड्डू देखकर एकदम खुश हो गये। हमने मन ही मन कहा कि तुमने तो हमें कुछ नहीं खिलाया, लेकिन तुम्हारे लिए तो हम देश से लड्डू लेकर आए हैं। सच वहाँ जाने के बाद ही समझ आता है भारत और भारत का लाजवाब खाना। हमारे यहाँ आतिथ्य करना सौभाग्य की बात समझी जाती है लेकिन वहाँ इसका अर्थ ही लोग भूल गए हैं। आज भी हमारे यहाँ विदेश से किसी के आने पर हम पलक-पाँवड़े बिछाते हैं लेकिन कैसा रूखा तो आतिथ्य था उनका?

डॉ. अजित गुप्ता

Saturday, February 21, 2009

सोने का पिंजर (5)

नौ गज साड़ी लपेटने में क्यूँ करें वक्त बरबाद....

पाँचवा अध्याय

मैं भारत की धरती से हजारों मील दूर अमेरिका की उन्नत धरा पर आयी हुई हूँ। यहाँ लाखों भारतीय बसे हुए हैं, उनकी आँखों में कहीं न कहीं भारत का पानी छलकता दिखाई देता है। पूर्ण विकसित देश, मनुष्य के लिए सारे साधनों की भरमार, किसी भी गरीब देश के बाशिंदे को यहाँ आकर्षित कर खींच ही लाएगी। चारों तरफ मकानों की कतारें और धरती पर बिछी दूब, धूल और गुबार के लिए कहीं जगह नहीं। भारत में झाडू और फटका मारते हाथ यहाँ आकर महिने में एकाध बार वेक्यूम क्लीनर तक पहुँचते हैं। वहाँ हाथों की मेंहदी और चूड़ी, कपड़ों में साबुन लगाने में ही अपनी रंगत भूल जाती हैं, ऐसे में यहाँ तीन-चार दिन में एक बार, कपड़े धो-सुखाकर मशीन आपको दे देती है। खाने में भी इतनी खट-पट नहीं, सभी कुछ तो शोपिंग मॉल में उपलब्ध है। सारी बाते करते समय कपड़ों की बात भला कैसे भूल सकती हूँ, भारत में नौ गज साड़ी लपेटते-लपेटते और अपना तन ढकते हुए न जाने कितना समय बर्बाद हो जाता है, लेकिन यहाँ तन की इतनी चिन्ता नहीं है। ऐसा कुछ पहनो, जो आसान हो, कुछ भी ढकने का प्रयास मत करो, सभी का शरीर एक है। यदि आप की वसा जगह-जगह से लटक रही है तो क्या? दिखने दो, क्यों साड़ी की परतों में छिपाते हो? ऐसा जीवन, खुला जीवन, स्वच्छन्द जीवन, भला कौन नहीं चाहेगा? तो लाखों युवा अपनी टिकट कटाकर चले आते हैं, इस स्वर्ग जैसे देश में।
हमारा तन कुछ माँगता है और हमारा मन कुछ और। सारे साधनों को, सारे ऐश्वर्य को, हमारा मन दिखाना चाहता है, अपनों को, अपने देश में बसे अपने छूटे हुओं को। पराये देश में सबकुछ है लेकिन इतनी आजादी तो नहीं मिल सकती कि अपनों को भी यहाँ बसा लिया जाए। इस देश का ऐश्वर्य दिखाने की छूट है, यहाँ बसने की छूट नहीं। सारी चाहतों को समेटे, इस स्वर्ग जैसी धरती पर अपना आशियाना बसाने निकले लाखों युवा, मन की एक परत भारत में छोड़ आते हैं। हमारा तन भौतिक सुखों की ओर भागता है और मन अपनों के पास। हर भारतीय, धरती की सुगंध को यहाँ बसाने में जुट जाता है, लेकिन मिट्टी की खुशबू तो अपनी-अपनी ही होती है। जैसे ही बादलों का फेरा लगता है, कोई न कोई झोंका आ ही जाता है और बरसा जाता है अपना देश का पानी। सूखे हुए उपवन में कोई न कोई अंकुर फूट ही जाता है। तब फोन पर अँगुलियां मचल उठती है और दूर देश से दो बूढ़ी आवाजें सारे सुख को एकबारगी में ही नेस्नाबूत कर जाती है। बस यहीं तन और मन में संघर्ष होने लगता है। एक मन के अंदर का सच है जो रह-रहकर पीछे धकेलता है और एक तन का निर्मम सत्य, जो सुख के सारे साधनों के बीच सबकुछ भुला देने में लगा रहता है।
बड़ी-बड़ी कोठी बनाकर भी अपने देश के मकान का एक छोटा सा दरवाजा अपने ताले से देखने का मन करता है। अपना हिस्सा अपने देश में होना चाहिए। डोर नहीं टूटती, यही तो आस है। दुनिया बचपन में अपने आपको तलाशती है, यहाँ बसे भारतीय भी उस छोटे से ताले लगे दरवाजे पर अपनी मन की खट-खट सुनते रहते हैं। सपनों में ही सही, लेकिन हर रोज ही अपनी धरती होती है।
विश्व हिन्दी सम्मेलन में ढेरों अप्रवासी भारतीय भी थे, एक शाम अपना लिखा पद्यमय मन सुनाने का दिन था। उन सभी के स्वर में भारत बसा हुआ था, कोई नहीं कह रहा था कि देखो हम जीते जी स्वर्ग चले आए हैं, हम कितने भाग्यशाली हैं! देखो हमारा सुख तुम भी देखो। मैं तो अपना दुख वहाँ छोड़ आयी थी लेकिन यह क्या यहाँ तो प्रवासियों के मन का दुख मेरे दुख को खटखटाने लगा। क्यों हो गयी मन की ऐसी हालत? क्यों नहीं मन की तलाश स्वर्ग में भी पूरी होती? क्या तलाशना चाहता है आखिर मन? मुझे अनायास ही एक तोता याद आ गया। राजमहलों के सोने के पिंजर में बन्द। खाने को भरपूर। लेकिन तोता कैसे कहे कि यह पिंजरा मेरा है। उसे तो अपना जंगल ही याद आता है, वह तो उसे ही कह सकेगा कि वह जंगल मेरा था, और आज भी वहीं मेरा जीवन है। यदि इस पिंजर से उड़ गया तो जंगल मेरा स्वागत करेगा, मैं अधिकार पूर्वक वहाँ रहूँगा लेकिन दोबारा इस पिंजरे में अधिकार पूर्वक नहीं आ पाऊँगा। यहाँ तो फिर कोई और होगा।
जब देश से चला था, तब सारे त्यौहार, सारी रश्में, सारे धर्म वहीं तो छोड़ आया था, लेकिन फिर यहाँ आकर खालीपन क्यों लगने लगा?
क्यों चिन डाले अपने हाथों से बड़े-बड़े मंदिर? क्यों वहाँ जाकर रोज पूजा करने का मन करता है?
जो मन वहाँ दीवाली पर केवल पटाखे, मिठाई और आतिशबाजी तक ही सिमट गया था, अब क्यों लक्ष्मी और गणेश का पाना लाकर पूजा करने लगता है? लेकिन पूजा तो आती नहीं, फिर क्या हो?
तब फिर देश की याद आ गयी, अरे वहाँ भी तो पण्डितजी आते थे, पूजा करने। फिर यहाँ क्यों नहीं?
नौकरी का विज्ञापन निकाला गया और एक पढ़े-लिखे पण्डित को वीजा और पासपोर्ट बनवा ही दिया। बस अब तो जब चाहो यज्ञ कराओ और जब चाहो पूजा।
मन मायूस नहीं है, मन बचपन में लौट आया है। दादी तुलसी की पूजा कर रही है, दादाजी मन्दिर में घण्टी बजा रहे हैं, तो यहाँ भी तुलसी का पेड़ लगा लिया है और घण्टी के लिए तो मंदिर है ही न!
हम भी घूमते-घूमते जा पहुँचे केलिफोर्निया के एक मंदिर में। भक्तों की भीड़ लगी थी, एक तरफ प्रसाद वितरण की तैयारी थी तो दूसरी तरफ यज्ञ हो रहा था। दो पण्डित लगे हुए थे यज्ञ कराने में। मंदिर दक्षिण भारतीयों ने बनवाया था, मुख्य संरक्षकों के नाम दीवार पर जड़े थे। मंदिर में कार्तिकेय, गणेश, शिव, पार्वती सभी विराजे थे। साफ सुथरा मंदिर, पूर्णतया वातानुकूलित, सारे ही संसाधनों से युक्त। एक दूसरे मंदिर में जाने का और अवसर मिला, वह जैन मंदिर था। दोनों ही पद्धतियों की पूजा और मूर्तियां वहाँ थी, श्वेताम्बर और दिगम्बर। देश से बाहर निकल कर आने पर सम्प्रदायवाद कम होने लगता है। मंदिर अर्थात हिन्दू मंदिर और सभी अपने मतों का भूलकर भगवान के दर्शन और अपनी आस्था की जड़े तलाशने चले आते हैं।
भारत से आकर दो प्रकार के लोग यहाँ बसे हैं, एक नौकरीपेशा और दूसरे व्यापारी। व्यापारी अपनी आस्थाओं के साथ रहते हैं लेकिन नौकरीपेशा लोग अपनी आस्थाओं को मन के किसी कोने में दफनाने की कोशिश करते रहते हैं। जब भी उन्हें मंदिर दिखायी दे जाते हैं, उनकी आस्था सर निकाल ही लेती है। लाखों भारतीय यहाँ बसे हैं और यहाँ अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन एक प्रश्न मन में उभर आता है, क्या उनकी सेवाओं की यहाँ किसी को कद्र है? क्या कोई अमेरिकी यह कहता है कि भारतीयों के कारण यहाँ उन्नति हुई है?
उनके लिए तो आज भी भारत अविकसित देश ही है और जहाँ शोषण ही शोषण है। जब विवेकानन्द यहाँ आए थे, तब एक ही प्रश्न उनसे किया गया था, कि भारत में महिलाओं की स्थिति क्या है? मुझे लगता है कि आज भी यह प्रश्न वहीं उपस्थित है। मेरा भांजा वहीं है, वह वहाँ मेडिकल की उच्च शिक्षा के लिए गया है। तब एडमिशन की दौड़ में दर-दर भटक रहा था। ऐसे ही भटकते हुए एक बार बस से यात्रा कर रहा था। वहाँ बस में सवारियाँ नाम मात्र की होती हैं। दो-चार होने पर तो बस फुल कहलाती है।
ड्राईवर ने उससे पूछा कि क्या करते हो?
उसने बताया कि डॉक्टर हूँ।
उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि एक डॉक्टर और बस में? वहाँ सबसे अधिक डॉक्टर ही कमाते हैं। फिर उसका दूसरा प्रश्न था कि कहाँ से हो?
भारत से, उत्तर था।
बस-ड्राईवर ने कहा कि वही भारत जहाँ शादी में दहेज लिया जाता है?
भानजा अभी-अभी शादी करके ही गया था, बोला कि अरे नहीं वह तो बहुत पुरानी बात हो गयी। कैसे बताए कि अभी भी उसका सूटकेस ससुराल के कपड़ों से भरा है। ऐसे कितने ही प्रश्न हमारे युवापीढ़ी के पास आते हैं और वे अक्सर झूठ का सहारा लेते हैं। भारत ने कितनी ही उन्नति की हो लेकिन यहाँ आकर एक बात समझ आती है कि हमने आत्मसम्मान नहीं कमाया। हम हीन-भावना से आज भी ग्रसित हैं। इसी कारण प्रतिपल अपने देश को हम दुत्कारते हैं, उसपर शर्मिंदा होते हैं। अपनी पहचान छिपाते हैं। हमें अपने आपको गाली देने में आत्मिक सुख मिलता है। लाखों भारतीय यहाँ रहते हैं लेकिन वे सब अपने आपको अमेरिकी कहलाने में ही सुख खोज रहे हैं, वे कभी भी गर्व से नहीं कहते कि हम भारतीय हैं। भारत का गौरव या तो उन्हें पता नहीं या फिर वे बताने में संकोच करते हैं कि कहीं ऐसे प्रश्नों का सामना नहीं करना पड़े जिनके उत्तर उनके पास नहीं हैं।
हम किसी भी देश का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन पीढ़ियां गुजर जाने के बाद भी हम उस देश के मूल नागरिक नहीं कहलाते। जब अंग्रेज भारत में आए थे तब यहाँ के मजदूरों को उन्होंने गिरमिटियां बनाकर कई देशों को बसाया था। उन देशों को बसाने के लिए वहाँ के बाशिंदों के पास न तो तन की शक्ति थी और न ही मन की, इसलिए भारतीय मजदूरों ने ही उन देशों को बसाया। लेकिन आज भी वे सब भारतीय मूल के नागरिक ही कहलाते हैं। जिस देश में विकास की असीम सम्भावनाएँ हो और वहाँ का युवा दूसरे देश को अपना कहने के लिए लालायित रहे, तब कैसे उस देश का विकास सम्भव है? दूसरे देशों में हमने अपनी जरूरत पैदा नहीं की, अपितु हम उनके लिए बोझ बन गए हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय कार्य कर रहा है लेकिन वे अमेरिका का निर्माण कर रहे हैं, ऐसा सम्मान दिखायी नहीं देता।
दूसरे देश में खुशहाली अधिक है, इसलिए हम चले आए, अपने देश को अकेला छोड़कर?
यहाँ आने पर एक प्रश्न हवा में तैरता रहता है, यहाँ कैसा लग रहा है?
अरे भई पराये देश में आए हैं, सुंदर देश है, तो अच्छा ही लगेगा। लेकिन इसमें प्रश्न की बात क्या है? प्रश्न तो यह होना चाहिए कि अपने देश को क्या हम ऐसा बनाने में अपना योगदान करेंगे? क्या यहाँ से कुछ सीख कर जाएँगे? परायी चूपड़ी पर क्यों मन ललचाता है?
यहाँ आकर एक बात समझ आ रही है कि भारत क्या है? हमने इसे दुनिया के सामने किस प्रकार से प्रस्तुत किया है? हम अपने आस-पास भारत बनाकर रहना चाहते हैं, मंदिर भी चाहिए, वैसा खाना भी चाहिए लेकिन भारत में कुछ अच्छा भी है इसकी चर्चा करना नहीं चाहते। दुनिया कहती है कि भारत पुरातनपंथी है, वहाँ शोषण है, तो हम भी स्वीकार करते हैं। स्वीकार नहीं करें तो चारा भी नहीं, क्योंकि यदि कहेंगे कि नहीं भारत बहुत अच्छा है, तो फिर प्रश्न आएगा कि यदि तुम्हारा देश इतना ही अच्छा है तो फिर सब कुछ छोड़-छाड़कर यहाँ क्यों चले आए हो?

डॉ. अजित गुप्ता

Saturday, February 07, 2009

सोने का पिंजर (4)

चौथा अध्याय

"बेटा कमाता है डॉलर और मां-बाप रुपैया..."

ख़ैर, हम भी लाखों माँ-बापों की तरह दौबारा भी असफल हो गए। कहते हैं भारत में व्यक्ति के पास पैसा हो या न हो लेकिन स्वाभिमान पूरा होता है। ग़रीब आदमी के पास तो कुछ ज्यादा ही होता है। धनवान तो स्वाभिमान बेचकर ही धनवान बना है तब उसके पास तो यह नहीं होता लेकिन बेचारा ग़रीब तो ग़रीब ही इसलिए है कि उसने कभी अपने लिए किसी से नहीं माँगा। जो भी मिला उसे भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार किया। अतः हमारे स्वाभिमान ने भी हमें प्रताड़ित किया और कहा कि बस अब बहुत हो गया, अमेरिका जाने का चाव। बार-बार जाकर अपना अपमान कराने से तो अच्छा है कि अपनी ममता का ही गला घोंट लो। बच्चों से कह दो कि यदि तुम्हें भारत की और वहाँ बसे माता-पिता की याद आ जाए तब तुम्हीं आ जाना। लेकिन परिस्थितियां कब किसके रोके रुकी हैं? वे तो कभी भी एक-दूसरे की आवश्यकता अनुभव करा ही देती है। किसका मन नहीं होता कि बेटे की गृहस्थी जाकर देखें या बेटी का सुख। लेकिन जब रिश्तों पर पहरे बिठा दिए गए हों तब तो आदमी मन मसोसकर ही रहेगा न? बेचारा इंसान कर भी क्या सकता है।
मुझे बचपन में माँ के द्वारा सुनी कहानी याद आती है। जब बहन की शादी दूर-दराज के गाँव में हो जाती थी और भाई उससे मिलने जाता था तब कितने पापड़ बेलने पड़ते थे? लेकिन वो दूरी तो दस-बीस कोस की ही थी अतः सारे संघर्षों के बाद भी मिलना सम्भव हो ही जाता था। लेकिन सात समुन्दर पार ऐसे ही तो नहीं पहुँचा जा सकता? फिर कोलम्बस वाला जमाना भी गया कि स्वयं का जहाज लेकर निकल पड़े दुनिया नापने, या खोजने। अब तो सारी व्यवस्था ही चाक-चौबंद हैं।
हमारे एक मित्र ने एक ताना मारा, बोले कि अरे अमेरिका नहीं गए? फिर स्वतः ही बोले कि अरे अभी तुम्हारा वहाँ क्या काम? जब बाल-बच्चा होता है तब जाते हैं भारतीय माता-पिता तो। हम जानते हैं कि तुम्हारे यहाँ तब भी जरूरत नहीं होती हमारी। हमारे जैसे नहीं कि घर में जापा होने वाला है तो कम से कम दो-तीन औरते तो चाहिए हीं। एक अस्पताल जाएगी, एक घर देखेगी और एक बारी-बारी से उनका सहयोग करेगी। हमारे यहाँ कितनी निकटता आ जाती है, सास-बहू के रिश्तों में। जब बहू दर्द से छटपटा रही होती है तब सास उसके सर पर हाथ फिराती है, भगवान से प्रार्थना करती है। जापे में कैसे तो खुशी-खुशी सारे ही काम करती है। तभी तो प्यार बढ़ता है। लेकिन तुमने इन सारे सुखों को भी छीन लिया है। हमारे यहाँ से बहुत सी सास और बहुत सी माँ वहाँ जाती हैं लेकिन फिर कहती हैं कि अरे मेरा तो यहाँ कोई काम ही नहीं है। लेबर रूम तक में पति ही जाता है, बेचारी महिला तो बाहर ही बैठी रहती है। पोतड़े धोने और सुखाने का सुख भी नहीं। सब कुछ डिस्पोज़ेबल है, पति ही सबकुछ कर देता है। लेकिन फिर भी लगता है कि कोई न कोई तो पास रहना ही चाहिए। भारतीय मन मानता ही नहीं। कैसे अकेला छोड़ दे? हमारे यहाँ तो कहा जाता है कि औरत का दूसरा जन्म होता है। सचमुच में होता भी है, उस एक मिनट में एक नवीन जीव जन्म लेता है तो दूसरा अपना अस्तित्व बचाता है। ऐसे में कैसे छोड़ दें अकेला?
तुमने परिवार की जरूरतों को समाप्त किया है, लेकिन हमने नहीं किया। हमें तो आज भी लगता है कि हमारी जरूरत है। मेरे साथ तो कैसा संयोग था कि जब पोता आने वाला था तब वह स्वयं ही आकर मुझे न्यौता दे गया था कि दादी मैं आ रहा हूँ। बहू भारत आयी थी, जैसे ही उसने भारत की धरती पर कदम रखा, पोते के आने के संकेत मिलने लगे। मेरा खून सबसे पहले मुझे बताने चला आया कि मैं आ रहा हूँ। अब हमारी चिन्ताएं बढ़ गयी। तुम्हारे पहरे को कैसे तोड़ेंगे? मैंने पहले गुस्से में भगवान से कह दिया था कि अब मैं मेरे स्वाभिमान को नहीं गिरवी रखूँगी। अब तू ही मुझे ससम्मान अमेरिका भेजेगा तभी वहाँ जाऊँगी। अब मेरा धर्म-संकट पैदा हो गया। एक तरफ पोता खुद न्यौत गया था तो दूसरी तरफ मेरी प्रतिज्ञा। क्या करूँ और क्या न करूँ? लोग कहते हैं कि भगवान नहीं होता, मैं कहती हूँ कि होता है। मैंने प्रतिज्ञा की, भगवान ने सुनी और मुझे मौका दे दिया। तभी मेरे पास सूचना आयी कि विश्व हिन्दी सम्मेलन इस बार अमेरिका में हो रहा है। मेरे लिए भगवान ने पुल बना दिया था, जैसे राम ने रामसेतु बनाया था। लेकिन फिर कठिनाई वीज़ा की ही थी। भगवान ने फिर मदद की। एक दिन संदेशा आया कि भारत सरकार तुम्हें सम्मानित कर रही है। मुझे वीज़ा की कार्यवाही नहीं करनी पड़ी। बस भारत सरकार का कागज़ लिया और चले गये तुम्हारे चित्रगुप्त के कार्यालय। साथ में पति भी थे, जिनकी डॉक्टरी के कारण हमारे पर प्रतिबंध लगा हुआ था। अब वे बोले कि मुझे तुम्हारे साथ जाने देंगे? मैंने कहा कि जब भगवान ने इतना किया है तो यह भी करेंगे। जीत गया हमारा भगवान और हार गए तुम। जीत गया हमारे खून का प्यार और धरे रह गए तुम्हारे पहरे। कृष्ण ने जब जन्म लिया था तब सारे पहरे तोड़कर वह यशोदा मैया की गोद में चले ही गए थे। कंस देखता ही रह गया था। ऐसे ही आखिर में ससम्मान तुम्हें हमें बुलाना ही पड़ा।
हम तुम्हारी धरती पर आ रहे थे, इसलिए नहीं कि तुम्हारी धरती को छूने में कोई गर्व था। बस हमारा रक्त हमें पुकार रहा था, सारा प्रयोजन बस यही था। मेरे स्वाभिमान की जीत हुई थी, मेरे प्रेम की जीत हुई थी। मैं जान गयी थी कि प्रेम में कितनी ताकत होती है? तुम हमारे रक्त को कितना ही हमसे दूर कर दो लेकिन संसार की कोई ताकत नहीं जो तुम्हारे मंसूबों को पूरा कर दे। हम भारतीय प्रेम को सबसे बड़ा मानते हैं, हम परिवार को अपने दिल में बसाकर चलते हैं, हम से परिवार छूट नहीं सकता। तुम एक पीढ़ी को हमसे दूर ले जा सकते हो, लेकिन दूसरी पीढ़ी स्वतः ही हमारी ओर खिंची चले आती है। मेरे इस उदाहरण से तो तुम भी मानने पर मजबूर हो जाओगे। तुम्हारा भौतिक सुख केवल चार दिनों की चाँदनी हैं, बस तुम देखते रहो, कुछ दिनों में ही हमारे भारतीय प्रेम की जीत होगी।
लेकिन जो कुछ भगवान ने किया, इसलिए नहीं कि मुझे साहित्यकारों के मध्य सम्मानित करवाना था अपितु इसलिए कि इस माध्यम से मुझे ससम्मान अमेरिका भेजना था। मेरे साथ राजस्थान का दल भी था। मैं उस दल की नेत्री भी थी, लेकिन भगवान चाहता था कि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो, मैं सम्मान सहित वहाँ जाऊँ। तुमने मेरे अंदर जो हीनता लाने का सकंल्प किया था उसे मेरे भगवान ने समाप्त कर दिया।
तुमने सिद्ध करने का प्रयास किया था कि तुम मेरे वैभव के समक्ष कुछ भी नहीं हो। मैं तुम जैसे नाचीज़ों को अपनी धरती पर पैर भी नहीं रखने दूँगा। तुमने हमारी संतानों में भी यही भाव भरने का प्रयास किया कि तुम्हारे माँ-बाप तुच्छ हैं, तुम डॉलर में कमाते हो और तुम्हारे माँ-बाप रूपयों में?
कहाँ तुम्हारा वैभव और कहाँ उनका?
तुम्हारे यहाँ बसे भारतीय हमें कहते हैं कि तुम डर्टी फैलो हो, तुम्हारे यहाँ क्या है? आओ हमारा वैभव देखो। हमारे घरों में गलीचे बिछे हैं, और तुम्हारे घरों में?
हमारी सड़कें काँच-सी चमकती हैं और तुम्हारी?
हम कहते कि वो तुम्हारा कैसे हो गया और यह केवल हमारा कैसे हो गया? चलो अच्छा है कि तुम्हारा वैभव बड़ा है तो थोड़ा हमें भी सुख दे दो।
वहाँ से गुर्राहट आती है कि यह सुख हमने अर्जित किया है, भला तुम्हें कैसे दे दें? तुम्हारा और हमारा स्टेटस बराबर कैसे हो सकता है? भले ही तुम हमारे माँ-बाप हो लेकिन अन्तर दिखायी देना चाहिए दो पीढ़ियों में।
बेचारा भारतीय पूछता है कि तुम जब छोटे थे तब हमने तो अन्तर नहीं रखा था, हमने सारे ही अपने सुख त्याग दिए थे जिससे तुम्हारा भविष्य सुखी हो सके। फिर आज क्या हुआ? हम भारतीय मानते हैं कि पच्चीस वर्ष हम संतान के लिए सुख तलाशते हैं और आने वाले पच्चीस वर्ष संतान तलाशे सुख माँ-बापों के लिए।
लेकिन तुमने ऐसी पट्टी आँखों पर बाँधी है कि उन्हें अब माता-पिता दिखायी ही नहीं देते। बेचारे वे भी क्या करें, यहाँ भारतीयों को लगता है कि डॉलर में बहुत ताकत है, लेकिन जब वहाँ देखते हैं कि अरे इनकी स्थिति तो हम से बहुत ही खराब है। भला दो-तीन हजार डॉलर में होता ही क्या है? हमारे यहाँ जिसे पाँच हजार रूपया मिलता है, वह भी पेट ही भरता है और वार-त्योहार मिठाई खा लेता है, मेले में जा आता है। तुम्हारे यहाँ भी पाँच हजार डॉलर वाला इंसान यही कर पाता है। कैसे बताए वह अपने माँ-बापों को कि केवल मुँह पर चिकनाई लगाकर घी खाना दिखा रहा हूँ।
खैर हमें भी अब अपने आप पर गर्व होने लगा। हमें भी लगा कि हम भी इंसानों की बिरादरी में शामिल हो गए हैं। शायद अब हमें भी हमारी संतानें इज्ज़त के साथ देख लें? मैंने देखे हैं भारत में ऐसे-ऐसे बागबां कि अमिताभ बच्चन जो अपने आप में सेलेब्रिटी थे, उनकी संताने तुम्हारे यहाँ चली गयीं और वे बेचारे रातो-रात बौने हो गए। उनका अस्तित्व नगण्य हो गया। सारी दुनिया उन्हें सम्मान से बात करती है लेकिन उनकी संताने उन्हें दो कौड़ी का समझती हैं। यह है तुम्हारा प्रभाव। क्या कोई सुंदर पिंजरे में रहने से श्रेष्ठ हो जाता है? हम भारत में पढ़ाते हैं कि जो दूसरों को श्रेष्ठ समझे वो श्रेष्ठ होता है। हमारे यहाँ माता-पिता भगवान सदृश्य होते हैं। उनकी सेवा करना ही सबसे बड़ा पुण्य होता है। लेकिन तुमने सभी कुछ तो छीन लिया है। जो कभी भगवान थे आज वे तुम्हारे दर पर भिखारियों की तरह तुम्हारे रहमो-करम पर पड़े हैं। हमारे गाँव का व्यक्ति पूरे गाँव का चाचा, ताऊ बनकर राज करता है लेकिन तुम्हारे यहाँ ममता के लिए, दो रोटी खाकर वक्त बिताता है।
कितने हैं जो ममता को परास्त कर पाते हैं? कितने हैं जो दूसरों में अपनी ममता तलाशते हैं? शायद मुट्ठीभर होंगे हम जैसे स्वाभिमानी लोग जो दुनिया को अपना परिवार मानते हैं और भारत के प्रत्येक बच्चे को अपना बच्चा। हम ममता का विस्तार करते हैं इसलिए तुम्हारे द्वारा दिए हीनबोध को स्वीकार नहीं करते। हमारा भगवान भी नहीं करता, हमें वह भी कहता है कि मत स्वीकार करो हीनबोध, अपने स्वाभिमान से रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।
आखिर 12 जुलाई 2007 को मेरे हाथ में टिकट था। मैं तुम्हारी धरती पर आ रही थी। मेरा खून मुझे पुकार रहा था। उसे तुम्हारा नागरिक बने पाँच माह हो चुके थे और मैंने उसे अभी तक केवल कम्प्यूटर के सहारे ही देखा था। मेरे सामने केवल उसकी सूरत थी, और था एक काँच का पर्दा। मैं उसे देख सकती थी, बात कर सकती थी लेकिन उसे छू नहीं सकती थी। मेरी ममता कसमसा रही थी। मैंने उसे संसार में आते हुए नहीं देखा था, उस पारिवारिक अनुभव से मैं दूर रह गयी थी लेकिन अब मुझे उसके पास जाने से कोई नहीं रोक सकता था, तुम भी नहीं। मेरा मन कह रहा था कि मैं ज़ोर से चिल्लाऊँ और कहूँ कि ‘मैं आ रही हूँ अमेरिका’। तेरा सुख देखने, तेरा वजूद देखने, तेरा अभिमान देखने। मैं भी तो देखूँ कि तू कितना बड़ा है? ऐसा तेरा वैभव कितना बड़ा है? जो तू ममता को ही विस्मृत करा देता है? ऐसा क्या है तुझमें, जो मेरे भारत में नहीं है? मैंने तुझ पर विश्वास किया और अपने सारे दुखों को, अभावों को भारत में ही छोड़ दिया, केवल अब तो मुझे सुख ही सुख जो देखना था। मेरा तन और मन यहाँ तक की आत्मा भी आप्लावित होने वाली थी तेरे सुख से। देखूँ कितना सुख है तेरी धरती पर?

डॉ अजित गुप्ता

Saturday, January 31, 2009

सोने का पिंजर (3)

तीसरा अध्याय

गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम....!

एक नाम सबको याद हो जाता है, वीजा। लेकिन यह होता क्या है? कैसे बनता है? अधिकांश नहीं जानते। तुम्हारे यहाँ से संदेशा आता है कि वीजा बनवाना है, तो पासपोर्ट चाहिए।
अरे आप लोगों ने अपना पासपोर्ट भी नहीं बनवाया? कैसे लोग हैं आप?
लेकिन बेटा हम पासपोर्ट का क्या करते? यहाँ तो एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए केवल टिकट चाहिए।
नहीं, नहीं, सब फालतू की बाते हैं, आधुनिकता का यही तकाज़ा है कि आपके पास पासपोर्ट हो, क्रेडिट कार्ड हो, एटीएम कार्ड हो। चलिए अब बना लीजिए फटाफट।
तीन महीने पासपोर्ट में लग गए, अब वीज़ा की तैयारी शुरू करो। आपकी इनकम का स्टेटमेंट चाहिए। बेंक में कम से कम दो-चार लाख रूपए पड़े होने चाहिए। वह भी सेविंग अकाउण्ट में। दो-चार एफ.डी. भी होनी चाहिए। लगना चाहिए कि आप के पास धन-दौलत है, आप वापस आएँगे। घर का मकान होना तो निहायत ज़रूरी है। स्वयं का व्यापार है तो वीज़ा मिलना आसान है, क्योंकि अपना व्यापार करने तो वापस आना ही पड़ेगा। आपके बैंक में इतना रूपया होना चाहिए कि आपको अमेरिका में अकेले भी रहना पड़े तो रह सकें। क्या पता आपका बेटा आपको धक्का मारकर निकाल दे या फिर आपको ही वहाँ उसके साथ रहना नहीं भाए। फिर क्या करेंगे आप? सरकार क्यों आपका बोझा उठाए? इसलिए मकान के कागज़ भी चाहिए, इनकम टेक्स के कागज़ भी। जितने सबूत ले जा सको, ले लो। पता नहीं कब किसकी जरूरत पड़ जाए। यहीं से शुरू होता है हमारा हीनता-बोध। बात-बात पर झुँझलाहट सुनायी पड़ती है कि अरे, आपके पास यह नहीं है, यह नहीं है। अरे आपका वेतन इतना कम है? यहाँ तो चपरासी को भी इससे ज़्यादा मिलता है। हमे लगने लगता है कि हम वाकई बहुत ग़रीब हैं। हमारे पास दिखाने को तो कुछ भी नहीं है। क्या हुआ जो हम यहाँ स्वाभिमान से रहते हों, लेकिन तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं है।
अब कैसे बताएँ कि हमने तो पूरे परिवार का पेट पाला है। भारत में वेतन हज़ारों में ही मिलता है। एक डॉक्टर हो या फिर इंजीनियर, वेतन तो कुछ हज़ार बस। अब उसमें से कहाँ से लाएं लाखों की जमा रकम? भारत में तो बुद्धि-सम्पन्न संतानों की प्राप्ति के लिए संस्कार किए जाते हैं। बस एक ही बात का ध्यान रखा जाता है कि संतान बुद्धिशाली हो, जिससे वह पढ़-लिखकर माँ-बाप का सहारा बन सके। घर में बेईमानी का पैसा नहीं आना चाहिए, नहीं तो संतान बिगड़ जाएगी, पैसे का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए, नहीं तो संतान के संस्कार बिगड़ जाएँगे। बस एक ही बात रहती है कि कैसे भी हों, संतान को संस्कारवान बना दें। बस एक बार संतान कुछ बन जाए तो हम गंगा नहायें। हमारा धर्म तो संतान में ही सीमित रहता है। संतान कुछ बन गयी तो पुण्य, नहीं बनी तो पाप। हम तो बुद्धि के भरोसे ही संतानों को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं। पैसे के भरोसे तो विद्या नहीं खरीदी जाती है। कोई भी नहीं चाहता कि हम हमारे बच्चों के लिए विद्या खरीदें। लेकिन अब तो चलन ही दूसरा हो गया। बच्चे पूछते हैं कि तुमने हम पर कितना रूपया खर्च किया? रूपया खर्च किया हो तो ठीक, नहीं तो तुमने कुछ नहीं किया।
सारा खेल ही पैसे का हो गया। हमने तो बुद्धि को महत्त्व दिया और तुमने कहा कि नहीं पैसा होना चाहिए। अब कहाँ से लाएं पैसा, जिसके सहारे वीजा मिले? खैर, जैसे-तैसे करके दिखा ही दिए कि कुछ लाख रूपये तो हमारे पास भी हैं। मकान भी है, गाड़ी भी है आदि, आदि। थैला भरकर सबूत एकत्र कर लिए और चल दिए खुशी-खुशी तुम्हारे दरबार में। हमने सोचा था कि भला तुम्हें क्या तकलीफ होगी हमारे वहाँ जाने में? हम कौन सा बसने जा रहे हैं, हम तो बस देखने ही तो जा रहे हैं तुम्हारा स्वर्ग। लेकिन तुमने कहा कि नहीं। तुम सब लालची देश के हो, जब तुम्हारी युवा-पीढ़ी हमारे लालच में आ जाती है, तब तुम क्यों नहीं? क्या गारंटी है कि तुम वहाँ बसना नहीं चाहोगे? फिर तुम्हारे पास तो ममता का कारण भी है।
वीजा साक्षात्कार के समय एक प्रश्न उछाला गया- “क्या करते हो?”
मेरे पति ने कहा- “डॉक्टर हूँ। “
“तुम्हारे पेशेंट को बाद में कौन देखेगा? नहीं, तुम्हें नहीं मिल सकता वीजा।“
एक मिनट के कुछ हिस्सों में ही फरमान जारी हो गया कि, स्वर्ग के दरवाजे तुम्हारे लिए नहीं खुल सकते। बहस की गुंजाइश नहीं, धक्के मारकर बाहर कर दिए जाओगे।
लोग कहने लगे कि डाक्टर से उन्हें डर लगता है कि कहीं वहीं बस नहीं जाए।
लेकिन वहाँ तो दो साल और पढ़ना पड़ता है, तब ही नौकरी सम्भव है? और इस उम्र में कौन पढ़ेगा? क्या कोई भी डॉक्टर अपनी कमाई छोड़कर वहाँ बसेगा, इस उम्र में?
लेकिन तुम्हारा स्टैम्प मौत का फरमान जैसा होता है। सारे सपने एक बार में ही बिखर जाते हैं। बरसों का सिंचित स्वाभिमान चूर-चूर हो जाता है।
लोग पूछते हैं- “अरे तुम्हें नहीं मिला वीजा? उसे तो मिल गया था। “
“क्या पूछा था तुमसे?”
“तुम्हें बताना ही नहीं था कि हम डॉक्टर हैं।“ जितने मुँह उतनी सलाह। आप क्षण-क्षण टूटते रहते हो। तुम्हारे वीजा-ऑफिस में लोग घण्टों बैठे रहते हैं, अब आस जगे? कुछ हँसते हुए बाहर निकलते हैं और कुछ रोते हुए। बाहर घूम रहे भिखारियों को कोई सौ रूपया दान देता है तो कोई दस रूपया। भिखारी भी जानते हैं कि किसे वीजा मिला है और किसे नहीं। तुम्हारे लिए तो रोज़ की ही बात है लेकिन हमारे लिए तो जीवन में पहली बार होती है। ‘बे मुरव्वत से तेरे कूँचे से हम निकले’ कहते हुए हमारे जैसे जाने कितने ही लोग तुम्हारे यहाँ से धकियाए जाते हैं। क्या पैसे वाले और क्या बिना पैसे वाले।
आदमी को कहा जाता है कि एक बार और प्रयास कर लो, पहले तो तुमसे चूक हो गयी अब सावधानी बरतना। कितने ही ऐसे लोग हैं जो दूसरी बार में भी धकियाए जाते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें किस बात के लिए उम्र-कैद की सजा सुनायी गयी है। क्यों नहीं वह अपने बच्चों से मिलने जा सकता? एक असुरक्षा-बोध मन में समाने लगता है। कहीं ऐसा नहीं हो कि हम कभी जा ही नहीं पाएँ? जरा सा बुखार भी मन को चिन्तित कर देता है कि हम बेटे के पास नहीं हैं, उसके सर पर हाथ फेरने को मन तरस जाता है। हर तरफ बेचारगी छा जाती है। बार-बार तुम्हारे यहाँ आकर बेइज्जत होने का मन भी नहीं करता। भारत में हर आदमी अपनी इज्जत को ही रोता है, उसे चाहे रोटी नहीं मिले लेकिन वह जिल्लत की रोटी कभी नहीं चाहता।
कितने चक्कर काटे आखिर तुम्हारे यहाँ? फिर कौन सी तुम्हारी फीस कम है? एक बार मैं पूरे दस हजार से भी ज्यादा खर्च हो जाते हैं, एक आदमी के। हजारों रूपयों में कमाने वाला भारतीय भला इतना पैसा तो अपने ऊपर कभी एक-बारगी में भी खर्च नहीं करता है और वह एक मिनट में ही तुम्हें दे आता है! केवल तुम्हारी ना सुनने के लिए! लोग तो कहते हैं कि यह भी तुम्हारे लिए एक धंधा है, पैसे कमाने का। रोज ही लोगों को धकियाते हो और उनकी फीस डकार जाते हो। बेचारे कुछ करना चाहें तो फिर डरा देते हो। बच्चे कहते हैं कि ऐसा भूल कर भी नहीं करना, नहीं तो जिन्दगी भर कम्प्यूटर में फीड हो जाएगा आपका नाम-ब्लैक लिस्ट में। फिर क्या पता बेटे-बेटियों को भी कठिनाई का सामना करना पड़े? ना बाबा ना, ऐसा काम नहीं करना। अपमान का घूँट पीकर रह जाओ।
मुझे तो लगता है कि तुम शरीफों के साथ ही ऐसा व्यवहार करते हो, बदमाशों को तो तुम रोक नहीं पाते। सारे ही आतंककारियों के पास तुम्हारा ग्रीन कार्ड है। सभी को तो तुमने सुरक्षा प्रदान की है। हाँ शायद तुम्हें ऐसे आतंककारियों की भी तो जरूरत पड़ती होगी न? तुम्हें तो कभी अफगानिस्तान को, कभी ईराक को नेस्तनाबूत करना जो पड़ता है। सारी दुनिया पर बादशाहत करने के लिए हिंसक लोग भी चाहिए ही न?। कैसी है तुम्हारी दुनिया, सारी दुनिया ही तुमने समेट रखी है। तुम भी क्या करो? यूरोपियन्स ने तुम पर आकर अधिकार जो कर लिया है। तुम्हारे वाशिंदे तो बेचारे बहुत सीधे-सादे लोग हैं। वे इतने आराम-तलब हैं कि उन्हें केवल आराम से मतलब है, काम से नहीं। उनके इतने बड़े देश को न जाने कितने यूरोपीय देशों के वासियों ने अपने कब्जे में कर रखा है?
जब तुम्हारी भूमि वीरान पड़ी थी, कुछ लाख लोग ही तो थे तुम्हारे पास। उस समय अंग्रेज वहाँ घुस आए थे। उन्होंने कितनी मार-काट की थी तुम्हारे यहाँ, तुम्हें कुछ याद है? तुम्हारा इतिहास कहता है कि अंग्रेज यहाँ आए और उन्होंने लाखों अमेरिकन्स को मारा। जो जितने अमेरिकन्स को मारता था उसे उतना ही बड़ा पुरस्कार मिलता था। उन्हें लगा कि अरे यह स्थान तो सुरक्षित है। यूरोप तो एशिया से लगा हुआ है, यहाँ तो सुरक्षा पर खतरा मँडरा सकता है। उन्होंने तुम्हारी धरती पर ही अपना आशियाना बनाने का प्रण कर लिया। सौलहवीं शताब्दी में तुम्हारे यहाँ जंगल और समुद्र के अलावा और क्या था? इंसानों की बस्ती कैसे बसे यही प्रश्न था अंग्रेजों के पास। तब वे अफ्रीका से गुलामों के रूप में ले आए थे वहाँ के वाशिंदों को। कुदरत भी कैसा खेल खेलती है, गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम! तुम्हें तब जरूरत थी ऐसे मेहनतकश इंसानों की जो तुम्हारी धरती को निखार सके, उसे रूप दे सके। तब तुमने किसी को भी वीजा से नहीं बाँधा। बस बेचारे काले लोग बँधे तुम्हारे एग्रीमेंट से। आज जो तुम देख रहे हो, वह सब उन काले लोगों की मेहनत का ही परिणाम है। कल क्या आज भी तो तुम्हारे यहाँ काले लोग ही तुम्हारे शहरों को साफ-सुथरा रख रहे हैं। तुम्हारे यहाँ के गोरे तो आज भी आराम-तलब ही बने हुए हैं।
मैं तुम्हारे वीजा-नियमों की बात कर रही थी। मैंने लाइन में खड़े लोगों के मन में एक भय देखा है जो उनकी आँखों में उतर आता है।
तुम कहते हो कि हमारे यहाँ हर कोई आकर बसना चाहता है। हम क्या करें? हमें नियम कड़े रखने पड़ते हैं।
लेकिन क्या तुम्हारे ये कड़े नियम सुपरिणाम देते हैं? कितने पंजाबी, कितनी बार शादी कर-कर के तुम्हारे यहाँ अपने पूरे परिवार को ले गए हैं? तुमने कितनों को रोक लिया? एक बार रोका, दो बार रोका, लेकिन उन्होंने कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया। लेकिन बेचारे वो माँ-बाप जिनके लाड़ले वहाँ पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं, तुमने उन्हें भी रोक लिया। एक तरफ तो तुम अपने नियमों की दुहाई देते हो, दूसरी तरफ तुम लाचार दिखायी देते हो।
तुम्हारे शहरों के नियम इतने कड़े हैं कि आदमी वीजा समाप्त होने के बाद एक दिन भी नहीं रह सकता तो फिर तुम्हें वीजा देने में डर क्यों है? लेकिन यह बात नहीं है, तुम केवल माँ-बाप को ही रोकते हो। पंजाबी व्यक्ति जो वहाँ बसे भारतीयों को भोजन खिलाते हैं भला उन्हें तुम क्यों रोकोगे? यदि तुमने उन्हें रोक लिया तो भारतीय भूखा नहीं मर जाएगा? आज सारे ही अमेरिका में पंजाबी लोग अपने खाने से भारतीयों को वहाँ टिकने में सहयोग कर रहे हैं। यदि उन्हें भारतीय खाना नहीं मिलेगा तब फिर वे कैसे आजीवन तुम्हारी सेवा कर सकेंगे? इसलिए तुम्हारा वीजा-कार्यालय केवल डर पैदा करता है, वह भी केवल सीधे लोगों के मन में। तुम जिसे चाहते हो उसे बुला लेते हो और जिसे नहीं, उसे भगा देते हो।
फिर तुम बूढ़े माँ-बापों को अपने यहाँ आने भी क्यों दो? यदि भारत के सारे ही माता-पिता वहाँ जाकर बस गए तब तो तुम्हारा बहुत नुक्सान हो जाएगा। तुम तो सामाजिक-सुरक्षा के नाम पर बहुत बड़ा टैक्स वसूल करते हो। बूढ़े माता-पिता की सुरक्षा करना तुम्हारी सरकारों का कार्य है। अतः वे बुढ़ापे में इस टैक्स की सहायता से उन्हें आर्थिक सहयोग देते हैं। भारतीय भी टैक्स देते हैं लेकिन उनका टैक्स तो पुनः उनके माता-पिता के लिए काम नहीं आता। वह तो तुम्हारे पास ही रह जाता है। न ही इस अतुल धनराशि को तुम भारत भेजते हो। कभी देखी है तुमने भारत में आकर उन माता-पिता की स्थिति को? हमारे भारत में हमारा एक ही सपना होता है कि हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाएं जिससे हमारा बुढ़ापा सुधर जाए। इसलिए बेचारे माता-पिता खुद रूखी खाते हैं लेकिन अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेजते हैं। अपने जीवन की सारी जमा-पूँजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं। जब बच्चों के मन में आता है कि वे भी अमेरिका जाएं तब भी वे उन्हें भेजते हैं। यहाँ ऐसे बहुत से माता-पिता मिल जाएँगे जिन्होंने लाखों रूपया कर्ज लिया है अपने बच्चों को तुम्हारे पास भेजने के लिए। आज वे बेचारे कर्ज में डूबे हैं और तुम उनके बच्चों से अपना देश उन्नत कर रहे हो।
हमने हिम्मत करके एक बार और तुम्हारे वीजा-कार्यालय में दस्तक दी। इस बार हमारी बेटी कि जिद थी कि नहीं भैया से मिलकर आएँगे। हम इस बार भी बड़ी आशा से तुम्हारे दरबार में चले आए कि शायद इस बार तुम्हारे यहाँ हमारी सुनाई हो जाए। लेकिन इस बार भी तुमने हमें टका सा जवाब दे दिया। कारण भी बड़ा अजीब था, हमारे आगे एक वृद्ध दम्पत्ति थे, उनका साक्षात्कार पूरा हुआ और हम आगे बढ़े।
मेरी बेटी ने उनसे पूछ लिया कि अंकल क्या हुआ?
तुम्हारी ऑफीसर ने देख लिया। बस फिर क्या था, वह एकदम चिढ़ गयी। गुस्से में बोली कि उनसे क्या पूछ रही थीं?
मैंने बात को सम्भालने की कोशिश भी की लेकिन बात तो बिगड़ गयी थी। उनका डर कायम रहना चाहिए, यदि यह डर ही मिट गया तब फिर कैसे काम चलेगा?
बस हमसे पूछा कि वेतन कितना है? बेचारे भारतीयों का वेतन तो हजारों में ही होता है, बता दिया। अरे यह तो बहुत कम है, और धड़ाक से लगाया स्टेम्प और हो गया हजारों रूपयों का नास। बेटी कुछ बोलने को हुई तो जवाब मिला कि तुम चुप रहो, तुम्हारे कारण ही नहीं दे रही हूँ, इन्हें तो मैं एक बार कन्सीडर कर भी लेती लेकिन तुम्हें तो कदापि नहीं।
कैसा मानसिक अवसाद दे जाते हैं तुम्हारे ये अफसर? कभी तुमने सोचा है? लेकिन तुम क्यों सोचोंगे? तुम्हारे लिए तो हम केवल कीड़े-मकोड़े हैं। तुम्हारे यहाँ आकर भीड़ बढ़ाने वाले और तुम्हारे संचित धन को हड़पने वाले। तुम जानते हो कि हमारी संताने कभी प्रतिक्रिया स्वरूप तुम्हें नहीं छोड़कर आएँगी। तुम्हें तो उनसे मतलब है। वे तुम्हारे देश की उन्नति में सहायक जो हैं। फिर तुम चालीस प्रतिशत के करीब उनसे टेक्स भी तो वसूलते हो। तुम उन्हें क्या देते हो? वे तो वहाँ जाकर अपना शाही जीवन ही भूल जाते हैं। बेचारे किस मानसिक तनाव में रहते हैं। आधे के करीब तो तुम पैसा वापस ले लेते हो, फिर वे क्या तो खाए और क्या बचाए? वे कैसे अपने माता-पिता को पैसे भेजे? वे तो स्वयं पाई-पाई बचाकर वीकेण्ड मनाते हैं। उनसे ज्यादा सुख से तो उनके माता-पिता भारत में रहते हैं जो हजारों रूपया ही कमाते हैं।
हमारे यहाँ टैक्स बचाने के कितने साधन हैं, लेकिन तुम्हारे यहाँ नहीं। चालीस प्रतिशत मतलब चालीस प्रतिशत। कहीं कमी नहीं। तुम्हारे यहाँ एक साधारण भारतीय को पाँच या छः हजार डॉलर मिलते हैं, तुम उसमें से दो हजार डॉलर से अधिक तो काट ही लेते हो। एक-डेढ़ हजार मकान किराए में चला जाता है। बाकी बचते हैं दो या तीन हजार। अब उसमें क्या खाए और क्या बचाए? हमने जिन बच्चों को फूल जैसा पाला था, पानी भी जिन्होंने कभी हाथ से नहीं पीया था आज वे ही हाथ बर्तन माँज रहे हैं। हमारे यहाँ लड़के तो कभी हिलते भी नहीं, लड़कियों को तो हम कह भी देते हैं कि हमारा रसोई में हाथ बँटा दो। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो बेचारे लड़के ही बर्तन माँजते रहते हैं।
यहाँ हर आदमी पूछता है कि अरे नौकर नहीं है क्या? कितना ही समझा दो लेकिन यहाँ के आदमी के सर से नौकर का भूत निकलता ही नहीं। वे समझ ही नहीं पाते कि वहाँ नौकर रखना आसान नहीं है? एक घण्टे के दस डॉलर देने पड़ते हैं। नौकर को इतना पैसा दे दें तो फिर खाएँगे क्या? हमारे जैसे नहीं कि हजार-पाँच सौ में बाई मिल जाती है जो सारा दिन काम कर देती है। गरीब से गरीब आदमी भी बर्तन-वाली तो रख ही लेता है। हमारे यहाँ घर की बहू को अगर बर्तन माँजने पड़े तो हमें शर्मिंदगी होती है। लोग कहते हैं कि कैसा घर है जहाँ बेचारी बहु को बर्तन माँजने पड़ रहे हैं? लोग बहु के आते ही बर्तनवाली तो लगा ही लेते हैं। अब तुम्हारे यहाँ क्या बहु और क्या दामाद, सभी तो गू-मूत साफ करते हैं।
फिर भी होड़ लगी है तुम्हारे यहाँ आने की। जैसे स्वर्ग किसी ने नहीं देखा लेकिन सभी स्वर्ग ही जाना चाहते हैं। वैसे ही तुम्हारा जाप करते हैं लोग यहाँ। अमेरिका जाने का अर्थ है जीवनभर के पापों का धुलना। जब कुछ लोगों को वीजा नहीं मिलता तो वे भी गलत तरीके अपनाते हैं। दलालों के झाँसे में आते हैं और कभी तो उन्हें दलाल अमेरिका के जहाज में बैठा पाता है और कभी नहीं। न जाने कितने ही युवा और बुजुर्ग इस झाँसे में आकर अपना सब कुछ खो बैठते हैं। एक तरफ तुम्हारा ऐलान है कि हमारे यहाँ नियम इतने कड़े हैं कि हमारी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। और दूसरी तरफ तुम इतने डरते हो वीजा देने से? क्या तुम्हारी पुलिस उन्हें पकड़ने में नाकारा है जो बिना वीजा के वहाँ रहते हैं? यह दोष तो हमारी पुलिस पर ही तुम लगाते हो। फिर तुम्हें डर कैसा?

डॉ अजित गुप्ता
क्रमश:

Saturday, January 24, 2009

सोने का पिंजर (2)

दूसरा अध्याय

क्या धरा है ऐसी ममता में जहाँ की धरती पर मच्छर हैं, मक्खी हैं।

चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा है, अल्मारी से शक्कर का डिब्बा जैसे ही उतारा तो पता लगा कि अरे शक्कर तो है ही नहीं। अब चाय कैसे बने? बैठकखाने में मेहमान बैठे हैं। माँ धीरे से बेटी को पुकारती है, और फुसफुसाहट करती हुई बेटी को समझाती है कि ‘पीछे के दरवाजे से जा और पड़ौस की काकी से एक कटोरी शक्कर माँग ला।’ शक्कर पीछे के दरवाजे से आ जाती है। लेकिन तुम्हारे यहाँ, बहुत कठिन है, रीत गये डिब्बे में शक्कर की आवक, वह भी पीछे के दरवाजे से। बेटा-बहू नौकरी पर गए, माँ अकेली है। घर का सारा काम निपट गया है, अब घर की डोली पर बैठकर पास वाली से बातें करेंगे। कितना सकून भरा है यह क्षण। एक पल भी एकान्त नहीं, अकेले होने का डर नहीं।
तुम्हारे पास एकान्त-साधना का बहुत समय है। बेटा-बहू या बेटी-दामाद नौकरी पर गए और अकेले हो गए बूढ़ा-बूढ़ी।
बूढ़ा बोलने लगा कि "अरी भागवान कैसे सुंदर दिन आए हैं, सारा जीवन बीत गया लेकिन तुझ से एकान्त में बात करने का अवसर ही नहीं मिला। अब देख यहाँ केवल तू है और मैं हूँ। सारा दिन अपना है।"
बुढ़िया भी खुश हो गयी, बोली कि "हाँ तुम सच कहते हो। और देखो कैसा आराम भी है! नल में गर्म और ठण्डा पानी दोनों ही आते हैं, फटाफट बर्तन साफ हो जाते हैं। अपने देस में तो मरी महरी के सौ नखरे थे, कभी आती और कभी नहीं। सर्दी में उसे गर्म पानी चाहिए था तो पहले मरी सिगड़ी पर गर्म करके देती थी पानी और बाद में जब गैस आ गयी तब उस पर पानी गर्म करके देती थी, तभी उसके हाथ चलते थे। यहाँ सारे नखरों से ही दूर हैं, देखों तो हम कैसे सब मिलजुल कर काम कर लेते हैं।" फिर हँसकर बोली कि "वहाँ तो तुम भी खटिया तोड़ते थे, लेकिन यहाँ तो मेरे साथ हाथ बँटा ही लेते हो।"
बूढ़ा बोला कि "मेरे मन में विचार आता है कि हम गाँव में बेचारी बड़ी बहू को बेकार में ही डाँटते रहते थे। सारा काम वो ही करती थी, तू भी खटिया पर पड़ी चाय पीती थी और बेचारी बहू खाना भी वहीं खिला देती थी। तब भी तू उसे गाली दिए बिना रहती नहीं थी। आज क्या हुआ तेरी जुबान को? अब तो तू एकदम चुपचाप है, कभी तूने अपने हाथ से पानी भी नहीं पीया और यहाँ तो तू बर्तन भी माँज रही है।"
सब समय-समय का खेल है। क्या करें, अब दोनों ही नौकरी करे हैं तो हमें भी तो कुछ करना ही पड़ेगा न! फिर ठाले बैठे यहाँ करे भी तो क्या? मरा टी.वी. पर भी तो अंग्रेजी में ही गिट-पिट आती रहे है। फिर अचानक ही मायूस हो जाती है और बोलती है कि "जी, अपने देस कब चलोगे?"
"क्यों यहाँ आने को तू ही तो बड़ी तड़प रही थी।"
"वो तो सही है, लेकिन अपने घर-बार की याद आने लगी है। पड़ौसन की बहु के बाल-बच्चा होने वाला था, अब तक हो गया होगा। घर में गीत गँवे होंगे। सारी ही मुहल्ले की औरते आयी होंगी।"
"लेकिन तेरे बिना तो गीतों में मजा ही नहीं आया होगा। तेरा गला ही तो सबसे अच्छा था।"
"अजी ऐसा नहीं करें कि अपन भी यहाँ गीत गवा लें।"
"कहाँ गवाएँगी? आस-पड़ौस से गौरी-काली औरतों को बुलाएँगी कि मेरे साथ गीत गाओ।"
"नहीं जी, तुम तो मजाक करो हो, मैं कह रही थी कि एक दिन मंदिर ही चलें, वहाँ भजन ही गाएँगे।"
"चल अच्छा है, बेटे को आने दे, बात करेंगे।"
"अरे अपन ही चल चलें, नीचे मोटर-गाड़ी कुछ तो मिल ही जाएगी, पूछते-पूछते चले जाएँगे।"
"नीचे मोटर-गाड़ी? यहाँ तेरा शहर है जो घर के बाहर ही टेम्पों मिल जाएगा? तूने देखा नहीं कैसी बड़ी-बड़ी सड़कें हैं। सड़कों पर बस गाड़ियाँ ही दौड़ती रहे हैं, आदमी तो दिखे ही ना है। किससे पूछेगी रास्ता? अब बेटे को आने ही दे।"
"अरे बेटा तो नौकरी से थका-हारा आएगा, रात को। तब कौन सा मन्दिर और कौन से भजन?"
"अब के शनिवार को कह देखेंगे।" बूढ़े ने आश्वासन दिया।
"कल ही तो शनिवार है। आज शाम को ही बात चलाएँगे।"
शुक्रवार की शाम है, बेटा-बहू दोनों ही काम से जल्दी आ गए हैं। आते ही बेटा बोला कि "माँ, कल हम सब घूमने जाएँगे। बहुत दिनों से कहीं गए नहीं हैं तो इस वीकेंड पर समुद्र किनारे घूमेंगे। वहाँ के होटल की बुकिंग बहुत मुश्किल से मिली है।"
"बेटा हम वहाँ जाकर क्या करेंगे? हमें कहीं किसी मंदिर में ही छोड़ आ। सारा दिन भजन गाने में ही निकल जाएगा।"
"अरे यहाँ इतना आसान नहीं है, जितना अपने गाँव में था। वहाँ छोड़ भी दूँगा तो सारा दिन क्या करोगे? फिर आप मेरा मूड मत बिगाड़ो। बस मैं जैसा कहता हूँ वैसा करो।
समुद्र किनारे देखना कैसी-कैसी मछलियाँ हैं? ऐसा सी-वर्ल्‍ड तुम्हारे गाँव में नहीं है।"
"बेटा, गाँव तो वह तेरा भी है।"
"हाँ, वही।" बेटे ने बड़ी अनिच्छा से कहा।

देखा तुमने, कैसे बेटा अपने ही गाँव को अपना कहने में शर्म कर रहा है। वह तुम्हें अपना बता रहा है। भला तुम उसके कैसे हो सकते हो? तुम क्या नहीं जानते कि मनुष्य की तन की और मन की जरूरते अलग-अलग होती हैं। तन कुछ और चाहता है और मन कुछ और। तन तो सारे ही सुख चाहता है लेकिन मन अपने अतीत में ही लौट जाना चाहता है। मुझे लगता है कि तुमने दुनिया को कितना दिया है इसका हिसाब तो मेरे पास नहीं है, लेकिन लोगों के मन के संतोष को तुमने जरूर छीन लिया है। सारे ही सुखों के बीच भारतीय व्यक्ति तुम्हारी धरती पर रहता है, लेकिन उसका मन उसे अपनी धरती की ओर खींचता है। मैं अपने मन की बात बताऊँ, मेरी उम्र 57 वर्ष होने को है, मैंने अपना बचपन जिस धरती पर बिताया उसे छूटे तैतीस वर्ष से भी अधिक हो गए। लेकिन आज भी सपने चाहे किसी के आएँ, सपने में घर तो वहीं बचपन का होता है। यह क्या रहस्य है, मुझे अभी तक समझ नहीं आया! मैं तुम्हें बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि मन का ऐसा ही रहस्य है। बचपन का स्वाद ही उसकी जुबान पर होता है। बचपन में जब माँ गुड़ का हलुवा बनाती थी, तो उसकी महक आज भी नथुनों में बसी है। तुम्हारे यहाँ कहाँ है वह महक? बस जब मन उस बचपन की महक के लिए तड़पता है तब तुम्हारे गुदगुदे बिस्तर पर उसे नींद नहीं आती। यौवन में तो मन के ऊपर तन हावी रहता है लेकिन जैसे ही यौवन ढलने लगता है, मन अपना करतब दिखाना शुरू कर देता है।
यौवन में तुम्हारी चकाचौंध सभी को तो अपनी ओर आकर्षित करती है। भारत के घर से बाहर कदम रखते ही नाक पर रूमाल रखना पड़ता है। टूटी सड़क पर, पानी का जमाव आम बात है। घर से धुले-साफ कपड़े पहनकर बाहर निकले, सड़क पर आए और तेज गति से आती मोटर-साइकिल ने छपाक से पानी को उछाल दिया। सफेद कलफ लगे कपड़े कीचड़ से सन गए। कहीं कच्ची बस्तियाँ बसी हैं, नीले प्लास्टिक के कपड़ों से तने है छोटे-छोटे घर। वहीं सूअर भी हैं और कुत्ते भी। मनुष्य के बच्चे और जानवरों के बच्चों में अंतर नहीं दिखायी देता इन बस्तियों में। एक तरफ ऐसी बस्तियाँ हैं तो दूसरी तरफ आलीशान कोठियाँ खड़ी हैं। यही अन्तर लोगों को तुम्हारी ओर आकर्षित करता है। सपने सत्य करने के लिए तुम्हारी धरती उन्हें पुकारती है। वे अपने चारों तरफ पसरी गन्दगी को मिटाने का संकल्प नहीं लेते, अपितु स्वयं ही भागने का मार्ग ढूँढ लेते हैं। जरा सा पढ़ने में तेज क्या हुआ, वह सपने में तुम्हें ही देखता है। पंजाब का लड़का तो तुम्हारे यहाँ ही ढाबा खोलना चाहता है। उसे पता है कि भारत की जीभ बहुत चटोरी होती है, उसे यहीं के मसालों की आदत होती है। वह तुम्हारे यहाँ आ जाता है अपना तंदूर लेकर। नान बनने लगती है, भटूरे बनने लगते हैं।
तुम भी जानते हो कि भारत के खाने का जवाब नहीं, अतः आने दो पंजाबियों को। भारत से इतने इंजीनियर, डाक्टर यहाँ आएँ हैं, उन्हें भारत का खाना नहीं मिलेगा तब कहीं वे भाग नहीं जाएँ? तुमने उन्हें आने दिया। तुमने हर उसको आने दिया जो तुम्हारे काम का था। लेकिन तुमने उसे नहीं आने दिया जो तुम्हारे काम का नहीं था। इसी आवाजाही में हमारी अँगुली से भी हाथ छूट गया। तुम्हारे यहाँ की शिक्षा का एक स्तर है, ऐसा विश्वप्रसिद्ध हो चला है। हमारे जैसे लाखों माँ-बापों ने सोचा कि बेहतर शिक्षा जरूरी है। हम भी गाँव की देहरी से निकलकर बेहतर शिक्षा के लिए शहर आए थे तो आज हमारे बच्चों का भी अधिकार बनता है कि वे भी बेहतर शिक्षा पाएँ। हम गौरव से भरे हुए थे, कि हमने हमारे बच्चों को बेहतर शिक्षा का विकल्प दे दिया। हम भी फूले नहीं समा रहे थे, हम भी अपने आपको विशेष अनुभव करने लगे थे। लेकिन हमारी विशेषता तो हीनता में बदल गयी। तुम्हारी धरती का सम्मोहन ऐसा ही था। वे कहने लगे कि ऐसी स्वर्ग सी धरती पर बसने का सौभाग्य यदि हमें मिला है तब हम आपकी नरक सी धरती पर क्यों आएँ? हम रातों-रात हीन हो गए। हमारा प्रेम, हमारी ममता, इस धरती का जुड़ाव सभी कुछ जाया गया।
क्या धरा है ऐसी ममता में जहाँ की धरती पर मच्छर हैं, मक्खी हैं। अकेले स्वाद के लिए तो उस नरक में आकर नहीं रहा जा सकता। एक प्रश्न भारतीयों से तुम्हारे पास से आया कि तुम भी छोड़ दो इस धरती को।
कैसे छोड़ दें हम हमारी धरती को, हमारे सुख-दुख को? लेकिन बच्चों को लगने लगा कि एक बार यदि माँ-बाप इस धरती को देख लेंगे तब फिर भारत का नाम ही नहीं लेंगे। वे भी जुट जाएँगे, तुम्हारी धरती पर आने के लिए। यह बात तुम भी जानते हो, तभी तो तुमने इतने कड़े नियम बना रखे हैं। भारत में बसे माता-पिता बेचारे अपनी संतानों के मोह में तुम्हारे यहाँ का सुख देखने को लालायित हो उठते हैं। वे सोचते हैं कि एक बार तो जा ही आएँ। जैसे-तैसे पैसा एकत्र करते हैं, कभी बेटा भेजता है, कभी बेटी भेजती है और मन सपने देखने लगता है तुम्हारी धरती के। क्योंकि भारत में स्वर्ग के बाद दूसरे नम्बर पर तुम्हीं आते हो, बस एक बार तुम्हारे यहाँ जा आएँ, यही एकमात्र इच्छा रहती है। व्यक्ति बात-बात में तुम्हारा उदाहरण देता है कि जब मैं अमेरिका में था उन दिनों यह हुआ था, आदि, आदि। वह कैसे न कैसे बता ही देता है कि वह अमेरिका जा आया है। एक बार मैं एक मीटिंग में थी। मेरे पास एक घरेलू सी महिला बैठी थी। उसने अपनी कोई बात रखी लेकिन जो महिलाएँ स्वयं को बहुत ही पढ़ा-लिखा समझ रही थीं वे उनकी किसी भी बात पर ध्यान नहीं दे रही थीं। आखिर उन्होंने भी तुम्हारी ही तुरूप काम में ली। वे बोली कि -वेन आई वाज इन अमेरिका..........। इतना बोलना था कि वे अचानक विशेष हो गयीं। यह है तुम्हारा प्रभाव।
क्रमश:

डॉ अजित गुप्ता

Wednesday, January 21, 2009

हिन्द-युग्म की बैठक में ओबामा...

दुनिया नये दौर में प्रवेश कर रही है तो हम भी इस आयोजन में शिरकत करते हैं...पेश है अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का वाशिंगटन डीसी के लिंकन मेमोरियल हॉल में शपथ ग्रहण के दौरान 20 लाख लोगों की मौजूदगी में दिया गया भाषण...आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा....

"मैं बराक हुसैन ओबामा बोल रहा हूं"
मैं उन सभी वक्ताओं और प्रदर्शकों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिन्होंने हमें अपने गीतों और शब्दों के जरिए याद दिलाया कि अमेरिका की वह कौन सी बात है जिसे हम इतना प्यार करते हैं। मैं इस भयानक ठंड और भीड़ का सामना करने के लिए आप सबका शुक्रिया अदा करता हूं और कुछ लोग तो आज यहां इस कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए हज़ारों मील का सफर तय करके आए हैं। उन सभी का शुक्रिया। वॉशिगंटन में और नए अमेरिका के निर्माण के इस उत्सव में आपका स्वागत है।
हमारे देश के इतिहास में कुछ मुट्ठी भर पीढ़ियों को ही ऐसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिनका सामना आज हम कर रहे हैं। हमारे देश में जंग छिड़ी है। हमारी अर्थव्यवस्था संकट में है। लाखों अमेरिकी अपनी नौकरियां और आशियाने गंवा रहे हैं। वे चिंतित हैं कि अपने बच्चों के कॉलेज की फीस कैसे चुकाएंगे और उनकी रसोई की मेज पर जो बिलों का अंबार लगा है, उसके पैसे कैसे भरेंगे और सबसे ज़्यादा वे अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता और चिंताओं से घिरे हैं। उन्हें इस बात की फ़िक्र है कि क्या अमेरिकियों की यह पीढ़ी हमारे बच्चों और उनके बच्चों तक यह बात पहुंचा सकेगी कि इस देश को लेकर सबसे अच्छी बात क्या है?
मैं यह दावा तो नहीं करूंगा कि इनमें से किसी भी चुनौती से निपटना आसान होगा। इसके लिए एक महीने या एक साल से ज़्यादा या हो सकता है और भी ज़्यादा लग जाएं। इस दौरान कुछ गतिरोध आएंगे, कई बार शुरुआत ग़लत होगी और ऐसे भी दिन आएंगे जब एक राष्ट्र के बतौर हमारे बुनियादी संकल्प की परीक्षा होगी। लेकिन इस सब के बावजूद हमारे सामने जो लक्ष्य है, उसकी विशालता के बावजूद मैं यहां हमेशा की तरह उसी उम्मीद के साथ खड़ा हूं कि संयुक्त राज्य अमेरिका इसे दृढता के साथ सहेगा और इस देश की नींव रखने वालों के स्वप्न हमारे समय में और मजबूत होंगे।
वह क्या है,जो मुझे यह उम्मीद बंधाता है। ये लिंकन मेमोरियल हॉल, जब मैं चारों ओर इन पर नज़र डालता हूं, इन स्मारकों में वह असंभव कहानियां खुदी हुई हैं जो हमारे हठी विश्वास को और भी दृढ करती हैं। यह विश्वास कि अमेरिका में कुछ भी संभव है। हमारे सामने एक ऐसे व्यक्ति का स्मारक है, जिसने थोड़े-से किसानों और दुकानदारों को साथ लेकर एक समूचे साम्राज्य की सेना के विरुद्ध क्रांति की और यह सब एक विचारधारा के लिए किया गया था। इसकी सतह में ऐसी पीढ़ी के लिए श्रद्धांजलि है, जो युद्ध और अवसाद के खिलाफ डटकर खड़ी हुई, मेरे दादा-दादी की तरह जिन लोगों ने बांबर एसेंबली लाइन पर पसीना बहाया और निरंकुशता के चंगुल से दुनिया को मुक्त करने के लिए पूरे यूरोप में अभियान चलाया। हमारे ठीक सामने एक जलाशय है, जो आज भी एक राजा के स्वप्न और एक व्यक्ति की महिमा का बखान करता है, जिसने अभियान छेड़ा और अपनी रक्त बहाया ताकि उसके बच्चों को चारित्रिक खूबियों के कारण जाना जाए और मेरे पीछे उस संघ को निहारता वह व्यक्ति बैठा है, जिसने इसे बचाया और कई मायनों में इस दिन को संभव बनाया।
आज जो मैं आप सबके सामने यहां खड़ा हूं, कौन मुझे इतनी गहरी उम्मीद देता है। चारों ओर से घेरे हुए ये पत्थर और संगमरमर नहीं, बल्कि इनके बीच जो मौजूद है, वहां से मुझे ये उम्मीद मिलती है। वो आप हैं-हर नस्ल, क्षेत्र और शहरों के अमेरिकी, जो यहां आये क्योंकि आपको भरोसा है कि यह देश क्या हो सकता है और क्यूंकि आप वहां तक पहुंचने में हमारी मदद करना चाहते हैं। यही वह चीज़ है, जिसने मुझे उसी दिन से उम्मीद दी, जब तक़रीबन दो साल पहले इस राष्ट्रपति पद की मुहिम शुरू की थी; एक भरोसा कि यदि हम ख़ुद को एक-दूसरे के रूप में पहचान लें और डेमोक्रेट्स, रिपब्लिकन्स व इंडिपेंडेंट्स; लातिनी, एशियाई और मूल अमेरिकी, श्वेत व अश्वेत, समलैंगिक व विपरित लैंगिक, अपंग व आम सभी को एक साथ ले आयें तो न सिर्फ उम्मीदों और अवसरों को फिर से बहाल कर पायेंगे, जो हम सभी की इच्छा है, बल्कि संभव है कि इस प्रक्रिया में हम अपने संघ को और भी मजबूत करें।
यहीं है मेरा विश्वास, लेकिन आपने इस विश्वास को सच कर दिखाया है। आपने एक बार फिर यह साबित कर दिया है जो लोग इस देश से प्यार करते हैं, वे इसे बदल सकते हैं। अब जबकि मैं राष्ट्रपति पद संभालने जा रहा हूं, आप लोग ही वह आवाज़ है, जिसे में हर दिन उस ओवल ऑफिस में प्रवेश करते हुए अपने साथ ले जाउंगा। उन स्त्रियों और पुरूषों की आवाज, जिनकी कहानीयां अलग-्लग हैं, लेकिन जिनके स्वपन एक हैं। जो सिर्फ यह सवाल करेंगी कि एक अमेरिकी के बतौर हमारा वादा क्या था, कि हम अपने जीवन को वौसा बना सकें, जैसा हम चाहते हैं. और अपने बच्चों को खुद से भी ज्यादा बुलंदियों तक पहुंचते हुए देखें।
यही वह धागा है, जो इस साझा कोशिश में हमें एक साथ बांधता है, जो इस इमारत की प्रत्येक स्मृति के साथ चलता है, जो महें उन सबसे जोड़ता है, जिन्होंने संघर्ष किया, बलिदान दिया और यहां पहले खड़े हुए।
इस तरह इस राष्ट्र ने महान मतभेदों और लंबे समय की असमानताओं पर विजय प्राप्त की, क्योंकि ऐसा कोई अवरोध नहीं है, जो बदलाव की मांग कर रहे लाखों लोगों की आवाज़ की राह में टिक सकें।
यही वह भरोसा है, जिसके साथ हमने इस मुहिम की शुरूआत की। उसी की ताकत से हम उस सब पर विजय प्राप्त करेंगे, जो हमें तकलीफ पहुंचा रहा है। इसमें कोइ संदेह नहीं कि हमारी राह लंबी होगी. हमारी चढ़ाई सीधी होगी। लेकिन यह कभी न भूलें कि हमारे देश का असली चरित्र सरल और आसान समय में उजागर नहीं हुआ, बल्कि तब सामने आया ,जब हम मुश्किलों मे थे। मैं आप सबसे अपील करता हूं कि एक बार फिर उसी चरित्र को उभारने में मेरी मदद करें और इस तरह हम एक साथ मिलकर बतौर एक राष्ट्र अपने पूर्वजों की उसी विरासत को आगे ले जाएं, जिसका आज हम जश्न मना रहे हैं।
साभार : दैनिक भास्कर