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Thursday, July 08, 2010

बॉलीवुड में नायिकाओं का दौर कब लौटेगा?

डॉ अरुणा कपूर पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं! डॉक्टरी के पेशे से फुरसत निकालकर लिखने का शौक ज़िंदा रखा है...हिंदी के अलावा मराठी और गुजराती में भी लेख, कविताएं और कहानियाँ प्रकाशित हुई है! हिंदयुग्म के सहयोग से जल्द ही एक उपन्यास भी प्रकाशित होने को है। बैठक पर इनका पहला लेख कोई आयुर्वेदिक नुस्खा नहीं बॉलीवुड की नायिकाओं पर है...आपका स्वागत है

एक ज़माना था जब स्त्री प्रधान भूमिकाओं वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खूब धूम मचाती थी। मीना कुमारी, नर्गिस, नूतन और वैजयन्तीमाला जैसी अभिनेत्रियाँ अपने अभिनय से दर्शकों का मन मोह लेती थी! मीना कुमारी की लगभग सभी फिल्मों की कहानियाँ नायिका प्रधान ही हुआ करती थी। दिल अपना और प्रीत पराई, भाभी की चूड़ियां, शारदा, पाकीज़ा...जैसी फिल्मों को कौन भूल सकता है? पाकीज़ा फिल्म आज भी जिस जगह पर दिखाई जाती है, दर्शक उमड़ पडते हैं! पाकिस्तान में तो इस फिल्म ने अलग ही धूम मचाई थी!
धर्मेन्द्र के साथ की हुई फिल्म 'फूल और पत्थर ' में मीना कुमारी ने ही धर्मेन्द्र को लोकप्रियक नायक का दर्जा दिलवाया था! लेकिन मीना कुमारी किसी एक नायक के साथ कभी भी जोड़ी बना कर आई नहीं थी! हाल यह था कि मीना कुमारी को मध्य में रखकर ही फिल्मों की कहानियां लिखी जाती थी! मीना कुमारी की खासियत थी की वो गंभीर भूमिकाओं की एक्सपर्ट मानी जाती थी! लेकिन 'कोहिनूर' और 'आजाद' फिल्म में मीना कुमारी ने दिखा दिया कि वह एक कलाकार है और हर तरह की भूमिका निभाने में माहिर हैं! हल्की-फुल्की और हास्य मिश्रित भूमिका निभाने वाले राज कपूर के साथ मीना कुमारी ने 'शारदा' फिल्म में अभिनय किया था, दर्शकों के दिल को द्रवित कर गया था। यह फिल्म खूब चली थी ।
यही हाल नर्गिस का भी था ! 'मदर इण्डिया' फिल्म के नाम से कौन परिचित नहीं है? भारत और विदेशों भी 'मदर इण्डिया' ने सफलता के झंडे गाड़े थे। इसी फिल्म ने सुनील दत्त और राज कुमार जैसे नायकों को अपनी पहचान दिलवाई थी.. फिल्म की कहानी नर्गिस के मज़बूत (या नाजुक?) कंधों पर टिकी हुई थी। नर्गिस ने महान निर्माता, अभिनेता, और निर्देशक राज कपूर के साथ जोड़ी बनाई थी। वैसे अन्य नायकों के साथ भी कई फिल्में की थी । राज कपूर जैसे दिग्गज के साथ नायिका प्रधान फिल्मों में अभिनय करने जैसा कठिन काम नर्गिस ने किया। राज कपूर के साथ 'चोरी-चोरी 'जैसी मनोरंजन से भरपूर फिल्म...यह भी नायिका प्रधान थी...और ऐसी फिल्म करना मानो नर्गिस ही के बस की बात थी! अधेड़ उम्र में नर्गिस ने बलराज सहानी जैसे संजीदा कलाकार के साथ फिल्में की... 'घर संसार' ऐसी ही एक फिल्म थी जो नायिका प्रधान थी। नर्गिस ने सस्पेंस फिल्म भी की थी ...जिसका नाम था...आधा दिन आधी रात.. जो प्रदीप कुमार के साथ की हुई नायिका प्रधान फिल्म थी!
नूतन भी नायिका प्रधान फिल्मों की नामचीन हस्ती थी! महानायक अमिताभ बच्चन के साथ की हुई फिल्म 'सौदागर' मुझे याद आ रही है... इस फिल्म में नूतन ही छाई हुई थी! अमिताभ बच्चन तो जैसे सह-नायक की भूमिका में थे... उन्हें इस फिल्म में नायक नहीं बल्कि खलनायक की भूमिका ही करनी पड़ी थी! नूतन की अशोक कुमार और धर्मेन्द्र के साथ की हुई फिल्म 'बंदिनी' भी नायिका प्रधान थी! नूतन की फिल्म 'सुजाता' खूब चली थी...यह भी नायिका प्रधान फिल्म थी...इसमें नायक सुनील दत्त थे!
वैजयंतीमाला अपने समय की बहुत अच्छी डांसर हुआ करती थी...इन्होंने भी साधना, कठपुतली और मधुमती जैसी नायिका प्रधान फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाई है! बाद में शर्मिला टैगोर, शबाना आजमी और स्मिता पाटील ने नायिका प्रधान फिल्मों की परिपाटी को बनाए रखा...इन नायिकाओं ने भी अपनी भूमिकाओं में नायिका के अस्तित्व को बनाए रखा!.. लेकिन अब आज नायिका प्रधान फिल्में कहाँ छिप गई है?
हां! इक्का दुक्का फिल्में सामने आ रही हैं.. काजोल और करिश्मा कपूर ने भरसक कोशिश इस दिशा में की है..लेकिन अब काजोल और करिश्मा की जगह लेने कौन-सी नायिका आगे आई है?.. शायद प्रियंका चोपड़ा का नाम लिया जा सकता है जो...'सात खून माफ़ ' में प्रधान नायिका के किरदार में है... फिल्म की कहानी ही बता सकती है की यह फिल्म नायिका प्रधान है या नहीं! मुझे लग रहा है कि अब दर्शक फिर से इस तरह की फिल्में पसंद करेंगे जिसमें कहानी नायिका के इर्दगिर्द घूमती हो! फिर वह फिल्म चाहे रोमांटिक हो, सस्पेंस हो, हॉरर हो, धार्मिक हो या हास्य-प्रधान हो!.. बदलाव की आवश्यकता तो हमेशा होती ही है।

डॉ अरुणा कपूर

Friday, June 11, 2010

प्रकाश झा को अब फिल्म नहीं, 'राजनीति' करनी चाहिए...


अगर एक साथ बी आर चोपड़ा की महाभारत, रामानंद सागर की रामायण, मनमोहन देसाई का मसाला और गॉडफादर की झलक देखनी हो तो ‘राजनीति’ देखनी चाहिए...बस यही है कि निर्देशक प्रकाश झा से तीन घंटे के दौरान कम ही भेंट हो पाएगी...बॉलीवुड के एक दर्जन फॉर्मूले को एक साथ पेश करने में ही प्रकाश झा का टाइम पास हो जाता है और फिल्म खत्म हो जाती है....फिल्म में इतनी गुत्थियां हैं कि आप आंखे फाड़े ‘आगे क्या होगा’ के लिए फिल्म देखते जाते हैं और आखिर में होता कुछ नहीं है, बरसों पुरानी परंपरा के तहत सब हीरो-विलेन इत्यादि गोलियां खा-खाकर अपना रोल खत्म करते जाते हैं....बचपन में मां कभी किसी पुराने स्वेटर को उघाड़ने के लिए कहती थी, तो हम बड़े मज़े से ऊन खींचते जाते थे और स्वेटर उघड़ता रहता था...लेकिन, एक जगह ऊन के धागे उलझते तो खीझ कर उलझन भरा गोला मां के हाथों में थमाकर भाग जाते थे खेलने...यही काम प्रकाश झा ने किया...बड़े मज़े से पूरी फिल्म में परतें उघाड़ते रहे और कहानियां उलझाते रहे, लेकिन आखिरी आधे घंटे में दर्शकों से ज़बरदस्ती सीट खाल करवा दी कि जाईए अब क्या बचा है फिल्म में, सब मर जाएंगे, कुछ नया थोड़े ही होना है...आप हिंदुस्तान में हैं और भारत के महाकाव्य महाभारत का एक हज़ारवां रीमेक देख रहे हैं...हम इससे छेड़छाड़ नहीं कर सकते....

दरअसल, मानने को तो ये फिल्म किसी एक सिरे से पकड़ कर समझी जा सकती है....एक मुख्य कहानी है और कई कहानियां (सब-प्लॉट्स) साथ-साथ चलते रहते हैं...पर, ये निर्भर दर्शक पर करता है कि वो मुख्य कहानी किसे मानता है....मान लें कि मुख्य कहानी एक भाई का दूसरे भाई से अटूट प्यार है और लक्ष्मण अपनी (लोग कहते रहे कि ये महाभारत है, मगर हमने रामायण ढूंढ लिया) भक्ति में सब कुछ कुर्बान कर देता है...इस बीच उसे अपने पिता के हत्यारों से बदला भी लेना है और अमेरिका लौट जाना है...इसके इर्द-गिर्द सारी कहानियां रची गई हैं...जैसे, भाई कोई साधारण लोग नहीं हैं, देश के सबसे प्रभावी राजनैतिक खानदान के चिराग हैं...उनके पास गाड़ी है, बंगला है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है और मां भी है....बस नहीं है तो कुर्सी....तो इस कुर्सी को पाने के लिए उन्हें अपने ही भाईयों से मुकाबला करना है और फिर भाई-भाई-चचेरा भाई-नाजायज़ भाई एक दूसरे से उलझते रहते हैं और स्टार न्यूज़ पर खबर देख-देखकर दांत पीसते रहते हैं...

फिल्म की शुरूआत में ही इतने सारे रिश्तों से दर्शकों का पाला पड़ता है कि आधा घंटा ये समझने में निकल जाता है कि कौन किसका क्या लगता है....फिर, जब तक ये थोड़ा-बहुत समझ आता है, कहानी का रस मिलना शुरू हो जाता है...फिल्म का बीच का हिस्सा बेहद कसा हुआ है और यही वो हिस्सा है जिसकी वजह से राजनीति देखने वालों की तादाद घटी नहीं है...प्रकाश झा कहानी का शिल्प गढ़ने में कितने उस्ताद हैं, यही हिस्सा साबित करता है...एक के बाद एक कहानी इतनी पलटी मारती है कि देखने वाले की आंखें पर्दे से हटती ही नहीं....एक मंच पर मनोज वाजपेयी मुख्यमंत्री की दावेदारी करने के लिए भीड़ जुटा चुके हैं और अचानक अर्जुन रामपाल और उसका मास्टरमाइंड भाई रणबीर कपूर उसी मंच पर प्रकट होकर सारा खेल उलट देते हैं....ये ग़ज़ब का सीन था, जिसमें रणबीर कपूर की अभिनय क्षमता निखर कर सामने आई है...इस फिल्म की सबसे बड़ी खोज रणबीर ही हैं, जिन्हें प्रकाश झा ने तराश कर हीरा कर दिया है । इस फिल्म के बाद से रणबीर कपूर किसी फिल्म में अकेले हीरो हुए तो भी पैसा लगाने की आप सोच सकते हैं। ये गलती कैटरीना कैफ पर मत कीजिएगा..कतई नहीं। प्रकाश झा जैसे ठेठ बिहारी भी कैटरीना से हिंदी नहीं बोलवा सके तो उसका कुछ नहीं हो सकता...प्रकाश झा ने उन्हें क्यों अपनी फिल्म में लिया, समझ में नहीं आता। अगर खानदान की बहू का राजनीति मे मज़बूती से उभरना सोनिया गांधी से मिलता हुआ दिखाने के लिए किया गया तो उतनी देर के लिए ठीक था। लेकिन, बाक़ी फिल्म सिर्फ इसी एक वजह से उन्हें दी गई, ये तो गलत है। कोई गधी भी उनसे बेहतर एक्टिंग कर सकती थी। इतने बढ़िया डायलॉग रट-रट कर जब कैटरीना बोल रही थीं तो रणबीर तो इंकार हीं करेंगे ना। हमें तो कैटरीना के सीरियस सीन देखकर भयंकर हंसी आ रही थी। यही गलती अर्जुन रामपाल को लेकर भी हुई है....उनकी जगह कोई और होता तो भी फिल्म चलनी ही थी। एक झबरीले बाल वाला फैशनेबल-सा, छिछोरा-सा नेता किस राज्य का मुख्यमंत्री बन सकता है, प्रकाश झा ही जानते होंगे । अच्छे सीन्स भी मार दिये हैं अर्जुन रामपाल ने। जब पार्टी कार्यकर्ता टिकट के लिए अर्जुन रामपाल से संबंध बनाती है तो संबंध बनाने के बाद अर्जुन एक सीरियस डायलॉग बोलते हैं, राजनीति कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बस नहीं, जो हर कोई सवार हो जाए….साफ दिखता है कि रट्टा मारकर बोल रहे हैं, मज़ा ही नहीं आता। कुछ ब्लॉग्स पर अर्जुन रामपाल को युधिष्ठिर बताया गया है। भाईयों के क्रम की वजह से ऐसा मानना गुनाह नहीं है, मगर अर्जुन अय्याश भी है और क़ातिल भी, फिर युधिष्ठिर कैसे हो सकते हैं, समझ नहीं आता।
अगर महाभारत से प्रेरणा की बात है, तो सिर्फ कुंती और कर्ण ही मुझे ढूंढने से मिलते हैं। कुंती और कर्ण का एक बोरिंग सीन भी है आखिर में, बिल्कुल ज़बरदस्ती का । सदियों से फिल्मी मां जो करती आई है, वही कुंती भी करती है। अपने बेटे को इमोशनली ब्लैकमेल करने की कोशिश करती है, मगर नाजायज़ बेटा मां..मां...मां....कहने के बजाय पलटकर चला जाता है। ये कर्ण अजय देवगन बने हैं, जो पूरी फिल्म में एंग्री यंग मैन बने फिरे हैं..एक कबड्डी चैंपियन अचानक दलित नेता बन जाता है और फिर बस्ती का भला करने के बजाय अपने ‘पॉलिटिकल गॉडब्रदर’ यानी मनोज वाजपेयी यानी दुर्योधन के तलवे चाटता रहता है। अजय देवगन का गुस्सा फिज़ूल का दिखता है। दलित नेता शोषित है, तो चेहरा हमेशा तना ही रहेगा, ये कोई ज़रूरी थोड़े ही है।

यहीं पर आकर प्रकाश झा फिल्म को क्लासिक होने से बचा लेते हैं। एक मसाला फिल्म की तरह गोलियों से सब एक-दूसरे को निढाल करते रहते हैं और हीरो को कुछ नहीं होता। नाना पाटेकर मामाजी के रोल में एकदम फिट हैं...उन्हें शकुनी छोड़कर कृष्ण मानने का मन तब तक नहीं होता जब आखिर में वो रणबीर यानी महाभारत के हिसाब से अर्जुन को अंग्रेज़ी में गीता का उपदेश देते हैं कि ‘कम ऑन, शूट दुर्योधन’....

इस फिल्म में द्रौपदी भी है, जिसके दो पुरुष हैं...एक रणबीर कपूर जो उसका हो नहीं पाता और दूसरा अर्जुन रामपाल जो रणबीर का बड़ा भाई है। सिंदूर लगाकर कैटरीना भारतीय बनने की पूरी कोशिश करती हैं, मगर मुंह खुलते ही दर्शक गला फाड़कर हंसता है। अचानक अपना पहला प्यार छोड़कर पति परमेश्वर से इमोशनली जुड़ने में कैटरीना को पंद्रह मिनट भी नहीं लगते और बिस्तर पर अर्जुन रामपाल और कैटरीना होते हैं तो दर्शक आवाज़ लगाते हैं- इसे भी मिल गया टिकट...

फिल्म की कहानी में विदेशी लड़की सारा क्यों आती है, मैं अब तक सोच रहा हूं। मुझे लगा कि वो आखिर में विदेशी बहू का मुद्दा बनकर राजनीति को सार्थक करेगी, मगर वो तो पहले ही ढेर हो जाती है। इस फिल्म में भारत का राजनैतिक इतिहास कई बार झांकी दिखाता है, जब बम धमाके में या गोली खाकर देश के बड़े लीडर जान गंवाते हैं। लेकिन, इससे आगे राजनीति में कुछ भी राजनैतिक नहीं है। सब कुछ एकता कपूर के सीरियल की तरह मसालेदार है, जो देखने में तो अच्छा लगता है, मगर प्रकाश झा के निर्देशन में देखना पचता नहीं है। कहीं-कहीं भारी-भरकम शब्दों को डायलॉग का हिस्सा बनाना भी नहीं जंचा, वो भी तब जब कैटरीना जैसी हीरोइन को मुंह खोलना हो। 21वीं सदी की कुंती कर्ण से कहेगी कि तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो कर्ण तो कौन कर्ण इस संवाद को सच मानेगा....एकाध मिनट का आइटम सांग प्रकाश झा ने फिल्म में क्यों डाला, पता नहीं। उसका न तो फिल्म की कहानी से कोई लेना-देना था, न गाने के बोल से।

सबसे मज़ेदार है कर्ण यानी अजय देवगन का राज़ खुलना कि वो किसी और की औलाद है। पालने वाली मां ने 30 सालों तक वो लाल कपड़ा साफ-सुथरा, नया—नवेला ही रखा जिसमें उसे बच्चा नदी में मिला था। ये सबूत तो मनमोहन देसाई से भी आगे की सोच निकला।

मनोज वाजपेई का अभिनय ज़बरदस्त है। वो पक्के दुर्योधन लगते हैं, लेकिन उनके सामने पांडव कहीं नहीं हैं। वो सब छोटे दुर्योधन हैं...कोई विधानसभा टिकट देने के नाम पर लड़की को सुला रहा है तो कोई रिमोट से कार उड़ा रहा है। मज़े की बात है कि दर्शक कहीं बोर नहीं होता। उसे वो सब कुछ मिलता है, जो एक फिल्म में वो ढूढता है। तीन-चार बेडसीन, पचास ग्राम आइटम सांग, भयंकर मारपीट और कैटरीना कैफ। ये फिल्म बिना किसी सोच के साथ देखने जाएं तो भरपूर मनोरंजन होगा। नसीरुद्दीन शाह एक सीन के लिए आते हैं और वो निशानी छोड़कर जाते हैं कि पूरी फिल्म बन जाती है। एक खूबसूरत डायलॉग भी उनके हिस्से आया है, जो पूरी फिल्म का सबसे साार्थक डायलॉग है 'भीड़ की तरफ जो भी दो रोटियां फेंकेगा, वो उसी का झंडा उठा लेगी'
प्रकाश झा खुद भी चुनाव लड़ चुके है और हार भी चुके हैं. ज़ाहिर है, राजनीति को रसीला बनाने में उनके खट्टे अनुभव भी काम आए होंगे। मगर, क्या भारतीय राजनीति सचमुच हिंसा और पारिवारिक दुश्मनी के आगे कुछ भी नहीं है। अगर ऐसा है भी तो प्रकाश झा को फिल्मकार की हैसियत से एक ज़िम्मेदारी भरा अंत ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए थी, जैसा अंकुर में श्याम बेनेगल करते हैं। इतने उम्दा निर्देशक से इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है। उनसे तो ये भी अपेक्षा है कि जिस भोपाल में इस फिल्म की शूटिंग हुई है,(पर्दे पर सबसे पहले भोपाल और एमपी की जनता को शुक्रिया करता हुआ संदेश आता है) उसी भोपाल के गैस हादसे पर भी एक फिल्म बनाएं और दर्शकों को बताएं कि कैसे हम गुलामी के बेहद करीब हैं..प्रकाश झा ऐसा कर सकते हैं।

निखिल आनंद गिरि

Wednesday, March 24, 2010

स्टिंग कैमरा, मीडिया और धोखा..

लव, सेक्स और धोखा....नाम बेहद अजीब है...उस दौर में जब हर हिंदी फिल्म के साथ अंग्रेजी टैग का रिवाज़ हो....हालांकि, फिल्म देखने के बाद साफ़ हो गया कि लव सेक्स और धोखा आजकल के फ़टाफ़ट संबंधों का कच्चा चिटठा है....फ़टाफ़ट संबंधों में पहले फ़टाफ़ट लव होता है, फिर सेक्स होता है और फिर एक तयशुदा धोखा....(जैसा कर्म करोगे, वैसा फल मिलेगा टाइप)....लव आजकल और कमीने से एक कदम आगे की फिल्म....अब सीधे-सीधे फिल्म की कहानी कहने का दौर रहा नहीं.....कि कैमरा ऑन किया, एक्शन बोला और एक लम्बा सा सीन चालू
है....फिर, वक़्त-बेवक्त बढ़िया बोल वाले गाने....दर्शक को सब कुछ मालूम होता था कि वो हॉल से क्या लेकर लौटेगा....एक साफ़-सुथरा सन्देश (जैसे सत्य हमेशा जीतता है या फिर माँ-बाप भगवन होते हैं टाइप) और मिश्री जैसे गाने.....इस फिल्म का गाना है 'तू नंगी अच्छी लगती है....तू गन्दी अच्छी लगती है.....' याद कीजिये 'देव डी'....मॉडर्न पारो अपने देव को नंगी तस्वीर भेजती है....और खेत में आमंत्रण भी देती है....ये मल्टीप्लेक्स दौर का सिनेमा है...आप परदे से सिर्फ दूरी के मामले में नजदीक नहीं होते, परदे पर चल रही फिल्म आपके आसपास की लग रही होती है....लव सेक्स और धोखा (टिकट काउंटर पर जल्दबाजी में एक लड़की इसे एल एस डी कह रही थी ) देखकर डर लगा मुझे....जैसे पूरी फिल्म कह रही हो "आप कैमरे की निगाह में हैं, २४ घंटे, स्टिंग कैमरे आपकी सेवा में सदैव तत्पर..."
देश की बड़ी आबादी शहरी हो रही है...जो खेत थे, वहाँ मॉल उग रहे हैं....मॉल्स में प्यार होता नहीं, किया जाता है.... गुप्त कैमरे को साक्षी मानकर......और फ़टाफ़ट किया जाता है....शिफ्ट में नौकरी करनी है, शिफ्ट के बाद प्यार-व्यार भी करना है....प्यार में कटौती करनी है....भूमिका बांधे बिना सीधा 'मुद्दे' पे आना है.... लड़की के साथ भी यही सब समस्याएं है....शिफ्ट वाली, कटौती वाली...मगर वो कहेगी नहीं, लड़की जो है.....फिल्म सब कुछ कहती है....स्टिंग कैमरा पूरी फिल्म का सूत्रधार जैसा है....फिल्म आगे बढती है और कैमरा गुस्ताखियाँ करता जाता है....किरदार कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं करते....कैमरा सब कुछ करवा देता है.....कैमरे के आगे कहीं फिल्म तो कहीं पैसा बनाने की सनक में ज़िन्दगी धोखा खा जाती है (लव और सेक्स के बाद ) तो कहीं किसी को बर्बाद करने की सनक....मीडिया सबको बर्बाद कर रहा है....चालाक बना रहा है.....होशियार बना रहा है....ये फिल्म हमें बार-बार बताती है...इसके लिए निर्देशक दिबाकर का लाख-लाख धन्यवाद....मीडिया रेड लाइट इलाके के दलाल जैसा हो गया है की जहां जिस्म की बू आती है, वहाँ पान चबाता नज़र आ जाता है....अपना कैमरा घुसेड़ देता है....लड़की का इस्तेमाल होता है, चैनल को सुपरहिट बनाने के लिए....हिंदी चैनलों के न्यूज़ रूम में आधे घंटे के प्रोग्राम का नाम रखने के लिए जैसे 'कैची' नाम सोचे जाते हैं, फिल्म में उसकी एक झलक भर है....'फलां नंगा अच्छा लगता है....' आह, क्या नाम है....क्या तमाचा है दिबाकर जी.....
ये फिल्म नौसिखियों की कहानी है....जो फिल्म बनाना सीख रहे हैं, उनके लिए एक सन्देश कि फिल्म बनाना बेहद आसन है, अगर आप अपने समाज को पढ़ पाते हैं तो हर गली के आखिरी मकान में एक कहानी है जो कही जानी है....इसके लिए किसी बड़े सेट, बड़े स्टार की ज़रूरत नहीं है....एक हैंडी कैम भर चाहिए, जो बच्चों के बायें हाथ का खेल है आजकल....ये फिल्म बॉलीवुड के आने वाले दशक के लिए क्रांति है....फिल्म इतनी ओरिजिनल है कि अगर आप दो-चार साल किसी भी महानगर में रह चुके हैं, तो लगेगा ही नहीं कि आपने कोई फिल्म देखी है....सीधे-सीधे कहानी कहने-समझने का ज़माना अब रहा नहीं, इसीलिए भारतीय दर्शकों, हॉल जाएँ तो थोड़ी-बहुत बुद्धि भी साथ लेकर जाएँ, फिल्म का भरपूर आनंद ले पायेंगे....हॉल में फिल्म देखते वक़्त हर सीन पर युवा दर्शकों की विशेष टिप्पणियाँ फिल्म का जायका और बढ़ा देगी....
ये फिल्म उन तमाम मृगनयनियों की कहानी है, जिन्हें इंडियन आईडल बनने की जल्दी में बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है..... और जो चुकाने को तैयार भी हैं...ये आदर्शों को ढोती फिल्म नहीं है....ये आदर्शों को धोती फिल्म है....इस फिल्म को देखना इसीलिए ज़रूरी है क्योंकि देखने में ये फिल्म जैसी बिलकुल भी नहीं...ये हमारे आपके समय का सच है जहां सेक्स एक सीढ़ी की तरह है जिसे इस्तेमाल करना मर्द पहले से जानते थे, औरत अब सीख रही है.

--निखिल आनंद गिरि

Thursday, March 18, 2010

मैंने अपने लिये सबसे सेफेस्ट खान को चुना हैः करीना कपूर

आज कल करीना कपूर फिल्मों की व्यस्तता को छोड कर अपने परिवार के साथ व्यस्त हैं। और हो भी क्यों नहीं , क्योंकि हाल ही में उन्हें दूसरी बार मासी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हमने उन्हें इस दूसरी बार मासी बनने की खुशी में बधाई देते हुए उनके व्यक्तिगत जीवन व फिल्मों के बारे में लंबी बातचीत कर ली।

कैसा लग रहा है जब आपको दूसरी बार मासी बनने का सौभाग्य मिला है?
- यह तो अच्छा ही लग रहा है। नया बच्चा ‘कियान’ वाकई बहुत ही ख़ूबसूरत है। सामरिया बहुत कुछ संजय कपूर पर लगती है परन्तु यह नया बच्चा बहुत कुछ करिश्मा पर गया है। यह हमारे परिवार के लिए एक उत्सव मनाने का समय आया है क्योंकि बहुत दिनों बाद इस परिवार में लड़‌के का आगमन हुआ है।

आपकी फिल्म 3 ईडियट ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं और आपने आमिर के साथ अपनी फिल्मी ज़मीन मजबूत कर ली है, कैसा लग रहा है आपको?
-मैं समझती हूँ कि यह सब इसलिए भी हुआ है क्योंकि यह राजू हिरानी की फिल्म थी तथा मैं और आमिर पहली बार साथ में आ रहे थे इसलिए लोगों को फिल्म से बहुत उम्मीद भी थी। मैं समझती हूँ कि हमारी जोड़ी को लोगों ने पसंद भी किया।

क्या आपने इस फिल्म को राजू और आमिर के होने के कारण किया?
-मेरी हर फिल्म में चाहे वो अच्छी हो या बुरी हो, मैंने दूसरे कलाकारों के सामने अपनी मौजूदगी को बनाए रखी है। मेरा ‘ एजन्ट विनोद ’ व ‘ गोलमाल 3 ’ में भी जबरदस्त रोल है। मैं अपनी हर फिल्म में बहुत मेहनत करती हूँ क्योंकि मैं अपने आपको एक स्टार के पहले एक अच्छे कलाकार के रूप में पेश करना चाहती हूँ। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि कोई मुझसे कहे कि मैं अपनी फिल्म में अच्छी लग रही थी क्योंकि मैं जानती हूं कि कोई भी मुझे अपनी खूबसूरती के लिए नहीं अपने टेलेंट के लिए अपनी फिल्म में लेता है। मैं यहां अपना टेलेंट दिखाने के लिए हूं न की अपनी खूबसूरती और इसी कारण से मुझे लडकों की प्रमुखता वाली फिल्म 3 ईडियट में भी लिया गया। मुझे लगता है कि मेरा दर्शक वर्ग मुझे ‘ कम्बक्त इश्क ’ जैसी फिल्मों में देखना पसंद नहीं करता है और यह गलती मैं दोबारा दोहराना नहीं चाहती।

फिल्म ‘कुर्बान’ का रिव्यू अच्छा है फिर आपने उसमें काम क्यों नहीं किया?
- जरूरी नहीं कि मैं हर फिल्म करूँ। जो वक्त के अनुसार सही लगे वही करना चाहिए। एक एक्टर को एक एक्टर की तरह रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि दो सुपरहिट देने के बाद कलाकार सुपर स्टार बन जाता है उसे अपनी फ्लाप फिल्मों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि दर्शकों कह निगाह में वह महत्वपूर्ण होता है।

आपकी फिल्म साइन करने के लिए एक लंबे प्रोसेस से गुजरना पड़ता है?
- कई बार ऐसा होता है और कई बार नहीं भी। हम एक्टर एक वैज्ञानिक की तरह होते है जो अलग-अलग प्रयोग करता रहता है। लोग जानते है कि करीना रिस्क ले सकती है और मैंने ‘चमेली’ जैसी फिल्म करना स्वीकार किया। मैं इस बात की परवाह नहीं करती कि लोग टशन के बारे में क्या कहते है। मैंने फिल्म में अपना किरदार को जीवंत करने के लिए अपनी बॉडी लेंगवेज को हर तरह से चेंज किया। कितनी एक्ट्रेसेस हैं जो इस प्रकार की चुनौती को स्वीकार कर पाती है वो भी इस पुरूष प्रधान इंडस्ट्री में। टशन मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि उसी दौरान मैं सैफ से मिली थी। कभी-कभी फ्लाप फिल्म भी एक्टर के लिए एक बडी न्यूज बन जाती है।

आप सभी खान कलाकारों में चुनने में क्या ध्यान करती हैं?
- मैंने अपने निजी जीवन के लिए सबसे सेफेस्ट खान का चुनाव कर लिया है। बाकी सभी खानों में सभी एक दूसरे से अलग लगते हैं। सैफ और मैं एक दूसरे के करीबी दोस्त हैं और आमिर और शाहरूख हमारे परिवार जैसे हैं। मेरी बहन सलमान को पसंद करती है।

पर सबमें हो रही प्रतिस्पर्धा जग जाहिर है?
- यहां केवल बीकाऊ 3 या 4 है तो यह प्रतिस्पर्धा तो होनी ही है लोगों के पास कोई चाइस भी तो नहीं है।

आज कल फिल्म इंडस्ट्री में आपको सबसे महंगी एक्ट्रेस के रूप में आंका जा रहा है?
- मैं नहीं जानती । पर आप बताइये हर दिन यह रिपोर्ट आती है कि फलानी एक्ट्रेस इतना लेती है, फलानी इतना। यदि सबसे ज्यादा प्राइज लेने वाली एक्टेªसों की लिस्ट बने तो शायद मेरा उसमें आखरी दस में नाम आयेगा।

आपके और सैफ के संबंधों को लेकर बहुत सारी चर्चाए होती रहती हैं आप उनको किस प्रकार से लेती हैं?
- मेरे व सैफ के संबंध स्पष्ट हैं। हमारे बारे में बहुत कुछ छपता रहता है कि आज हमनें शादी करली, कल तलाक हो गया इन सब गौसिफ का हम मजा भी लेते है। पर हां , जब हम शादी करेंगे तब सारा जमाना जान जाएगा। ये सब कुछ जल्द होने वाला भी है।

आप अपने व्यस्त समय में से परिवार के लिए समय किस प्रकार निकाल पाती हैं?
-मैं बहुत सा समय निकाल लेती हूँ। एक एक्टर के लिए जो लगातार काम कर रहा हो समय निकालना जरूरी है। मैं साल में चार फिल्मों से ज्यादा नहीं करती । मैंने अपने सेक्रेट्री से भी कह रखा है कि हर तीन महीनों के बाद मुझे ब्रेक चाहिए। मैं सारा साल एक साथ काम नहीं कर सकती।

सुना गया था कि आप भी आई पी एल टीम खरीदने वाली थीं?
- हम इसके लिए गये भी थे व पेपर वर्क भी पूरा किया था पर ये सब केंसल हो गया। यदि दोबारा मौका मिला तो यह सब सैफ के समझ का काम है मैं तो केवल फिल्मों के बारे में जानती हूं।

तो क्या आप प्रोडक्शन हाउस खोलने में रूचि रखती है?
- मैं अपने लिए तो फिल्म बनाने से रही। अभी तो बाहर की फिल्मों से ही समय नहीं मिल पा रहा हैं। अभी एक फिल्म मधुर भंडारकर के साथ करने का प्लान चल रहा है। पटकथा लिखी जा रही है पर अभी सब कुछ तय नहीं हुआ है।

‘मिलेंगे-मिलेंगे’ के बारे में रोज सुना जा रहा है पर पता नहीं कब मिलेंगे?
- यह तय हो चुका है कि फिल्म जल्द रिलीज होने जा रही है । मैंनें अपनी ओर से निर्माता बोनी कपूर को कह दिया है कि मैं फिल्म के प्रमोशन के लिए तैयार हूं । बाकी जो कुछ मीडिया में छप रहा है मेरे व ‘ााहिद के बारे में उसके लिए हम आदि हो चुके है।

प्रस्तुतिः अशोक भाटिया

Sunday, March 14, 2010

शापित से बहुत कुछ सीखने को मिलाः श्वेता अग्रवाल

श्वेता अग्रवाल फिल्म ‘शापित’ से पहले टर्की की एक फिल्म ‘मिरार’ में और ओलिवर पॉलिस की स्विस जर्मन फिल्म ‘तंदूरी लव’ में भी अभिनय कर चुकी हैं। ‘स्टार प्लस’ पर प्रसारित धारावाहिक ‘देखो मगर प्यार से’ में मोटी-सी लडकी के किरदार में नज़र आ चुकीं श्वेता अग्रवाल इन दिनों फिल्म सर्जक विक्रम भट्ट की खोज के रूप में उनकी आगामी फिल्म ‘शॉपित’ में अभिनय करके चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इस फिल्म में उनके हीरो है मे मशहूर संगीतकार उदित नारायण के बेटे आदित्य नारायण हैं। देखा जाए तो यह फिल्म श्वेता के लिए डेब्यू होगी व अपनी बॉलीवुड की पहली ही फिल्म विक्रम भट्ट की हॉरर फिल्म 'शापित’ से कर रही है।

प्रश्न- कैसा लग रहा है अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म को करके ?
- पहले मैं बहुत ही डरी हुई थी कि बॉलीवुड में मेरी पहली फिल्म ही विक्रम भट्ट जैसे महान निर्देशक के साथ करने को मिल रही है । फिल्म 'शापित’ एक हॉरर फिल्म होने के साथ साथ प्रेम कहानी वाली भी फिल्म हैं। विक्रम भट्ट उन निर्देशकों में से हैं, जो अपने दर्शकों को अपनी फिल्म के द्वारा एक जगह पर बैठे रहने के लिए मजबूर कर देते हैं। मुझे पूरा यकीन हैं कि उनकी फिल्म ‘शापित’ दर्शकों निराश नहीं करेगी। इन्ही सब कारणों से मुझे इस फिल्म को करने में मजा आ रहा हैं।

प्रश्न- इस फिल्म में अपने किरदार के बारे में बताइए?
- इस फिल्म में मैंने काया का किरदार निभाया है जो कि एक रायल परिवार की कॉलेज में पढने वाली लडकी है । काया को इस बात की जानकारी नहीं है कि उसके परिवार को 300 साल पहले एक श्रॉप मिला था जिसकी वजह से इस परिवार की कोई लडकी जब भी शादी करना चाहेगी तो बुरी ताकत उसे खत्म कर देगी ।प्यार के सागर में डूबी काया अपने प्रेमी अमन से सगाई करके जैसे ही सगाई की अंगूठी पहनती हैं वैसे ही वह बुरी आत्मा उसके पीछे पड जाती हैं । तब काया के माता पिता काया को उसके शापित होने की बात बताते हैं। इसके बाद भी काया का प्रेमी अमन उससे रिश्ता नहीं तोडता क्योंकि काया और अमन ने तो पूरी जिन्दगी एक साथ रहने का इरादा पक्का किया हुआ हैं । फिर यह दोनों उस बुरी आत्मा से बचने के लिए क्या क्या नहीं करते हैं यह डरावना मंजर इस फिल्म में दिखाया गया है ।

प्रश्न- आपको नहीं लगता कि आपको अपना कैरियर हॉरर फिल्म से शुरू करना महंगा पड़ सकता हैं?
- मैं मानती हूं कि बॉलीवुड में हॉरर फिल्म के साथ कैरियर शुरू करना काफी रिस्की है। लेकिन मुझे इसमें कोई रिस्क नहीं लगता और न ही किसी से मेरी इस बारे में शिकायत है। मुझे विक्रम भट्ट की फिल्म होने से इस फिल्म पर पूरा भरोसा है। वैसे ‘शापित’ में पागलपन वाला हॉरर नहीं हैं। इसमें एक प्रेम कहानी है। काया और अमन एक दूसरे से बहुत ज्यादा प्यार करते हैं। वे एक दूसरे पर जान न्यौछावर करने वाला प्यार करते है। बुरी आत्मा से बचने के लिए वे क्या क्या नहीं करते हैं और बुरी आत्मा किस तरह उनका पीछा करता है और कई तरह के घटनाक्रम होते है। इस फिल्म की कहानी में रोचकता के साथ डरावनापन भी है।

प्रश्न- फिल्म की शूटिंग के दौरान क्या अनुभव रहा ?
- इस फिल्म में काम करना मेरे लिए बहुत बडी चुनौती के रूप में था क्योंकि मैं भी एक जगह बैठकर हॉरर को नहीं देख सकती थी। इसी वजह से इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं खुद डरी हुई रहती थी। एक बार एक ऐसा दृश्य फिल्माया जा रहा था, जिसके लिए मुझे एक जगह बंद कर दिया जाता हैं। वहां मिट्टी थी, गंदगी थी और जगह इतनी सकरी थी कि मैं हिल डुल भी नहीं सकती थी। दीवार से चेहरा सटा हुआ था। मैं न बाहर वालों की आवाज सुन सकती थी, न बाहर वाले मेरी। कैमरा अपना काम कर रहा था। तभी अचानक एक मकड़ी वहां आ गयी। मकड़ी से तो मैं बहुत डरती हूं। मुझे लगा कि मेरी जिन्दगी खत्म हो गयी। मैं बुरी तरह डर व सहम गई थी। जैसे ही सीन ओ.के. हुआ व दरवाजा खुला, मैं जोर-जोर से रोने लगी। डरी सहमी मैं आधे घंटे तक रोती रही। विक्रम भट्ट वगैरह ने मुझे काफी समझाया। बडी मुश्किल से दो घंटे बाद मेरे अंदर का डर खत्म हुआ और मैं नॉर्मल हो सकी।

प्रश्न- निर्देशक विक्रम भट्ट के साथ काम करने का क्या अनुभव रहा?
-बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। हर फिल्मकार की काम करने की अपनी अलग स्टाइल होती है। विक्रम भट्ट की तो स्टाइल ही अलग हैं। वह तो हमारे गुरू की तरह हमें काम के बारे में बता रहे थे। उन्होंने हमारी बहुत मदद की । वह खुद सीन करके बताते थे कि हमें किस प्रकार करना है। इसके बावजूद जब समस्या हल नहीं होती थी तो वह दृश्य में कुछ बदलाव भी करते थे। विक्रम भट्ट जी खुल विचारों के है। उनके साथ काम करके बहुत ही मजा आया। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा।

प्रश्न- क्या कारण है कि ‘शापित’ बन कर तैयार है और आपने अभी तक कोई दूसरी फिल्म साइन नहीं की है?
-मैं पिछले डेढ साल से ‘शापित’ के साथ इस तरह जुडी हुई हूँ कि कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिला। मेरे दिमाग में ही नहीं आया कि मुझे किसी नये प्रोजक्ट से भी जुडना चाहिए। अब जब आप लोग सवाल कर रहें हैं तो मुझे लगता हैं कि अब मुझे दूसरी तरफ भी ध्यान देना पडेगा। मुझे हर निर्माता-निर्देशक व कलाकार के साथ काम करना हैं बशर्ते अच्छी पटकथा व उसमें मेरा किरदार दमदार हो। मैं यहां तब तक रहूंगी जब तक मुझे काम मिलेगा और लोग मुझे परदे पर देखना पसंद करेंगे। मैं अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ परफार्मेंस देने का पूरा प्रयास करूंगी।

प्रश्न- आप अंतरराष्ट्रीय फिल्मों से पहले अपने कॉलेज के दिनों में ‘देखो मगर प्यार से’ एक धारावाहिक भी कर चुकी हैं तो क्या अब टी वी सीरियल भी करेंगी?
-फिलहाल तो मैं फिल्में ही करना चाहूँगी जो मेरी प्राथमिकता है पर भविष्य में कुछ अच्छा ऑफर मिला तो टी वी भी कर सकती हूँ।

प्रस्तुतिः अशोक भाटिया

Tuesday, March 09, 2010

मैं एकता कपूर से नहीं डरती - ज्योति गाबा


फिल्म 'इडियट बॉक्स' का एक दृश्य'

ज्योति गाबा का नाम लेने पर लोगों के जहन में उनका चेहरा नहीं आयेगा पर यह निश्चित हैं कि फिल्म ‘इडियट बाक्स’ के रिलीज होते ही यह नाम घर-घर में चर्चा का विषय होगा। इस फिल्म की कहानी इस बात पर आधारित है कि टी वी ने लोगों की जिन्दगी में कितना अहम दखल देना शुरू कर दिया है। इस फिल्म में ज्योति टी वी की चर्चित सुपर स्टार क्वीन एकता कपूर से प्रभावित किरदार अनेकता कपूर निभा रही हैं। हाल ही में फिल्म के प्रचारक आई एम पन्नू ने फिल्म पत्रकार अशोक भाटिया की बातचीत ज्योति से करवाई। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंशः-

प्रश्न- जब आपको इस फिल्म में इस महत्वपूर्ण किरदार के लिए चुना गया तब आपको कैसा महसूस हुआ?
ज्योति- यह एक अलग ही प्रकार का अनुभव है। जब मुझे पहली बार इस फिल्म में मुझे मेरा किरदार सुनाया गया तो मुझे लगा कि यह मेरे लिए बहुत ही चुनौतिपूर्ण किरदार है। आज एकता कपूर बहुत बड़ा नाम है और यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं ऐसी भूमिका कर रही हूँ जो एकता कपूर से प्रभावित है।

प्रश्न- आपने इस भूमिका को करने के लिए किस तरह की तैयारी की और फिल्म के पर्दे पर उसे उतारने में किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
ज्योति- सच बताऊँ तो मुझे इस तरह की भूमिका कैमरे के सामने करने में जरा भी कठिनाई नहीं आई क्योंकि मुझे पहले से ही इस भूमिका के बारे में बहुत कुछ बता दिया गया था। इस फिल्म के निर्देशक सुनन्दा मित्रा ने पहले ही से इस भूमिका के बारे में विस्तार से समझा दिया था और स्पष्ट था कि मुझे कैमरे के सामने किस प्रकार प्रस्तुत होना है। इसके अलावा मुझे इसके लिए कुछ खास होमवर्क नहीं करना पडा था।

प्रश्न- इस समय आप इस फिल्म को लेकर कितना उत्साहित हैं?
ज्योति- मैंने इसके पहले फिल्म ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’, ‘सुनो ना’ वगैरह की है तथा बहुत से धारावाहिक किये हैं पर पहली बार कुछ अलग करने को मिला है। यह मेरे पिछले काम से बिल्कुल ही अलग है। मैंनें अब तक 300 विज्ञापन फिल्में की है उसमें से बहुत-सी जवान गृहिणी अथवा जवान प्यारी माँ की भूमिकाए वाली थीं। इस फिल्म में मेरे लिए एक मौका था कि मैं अनेकता कपूर के रूप में अपने को एक अच्छे कलाकार के रुप में स्थापित कर सकूँ। इसलिए इस फिल्म को लेकर उत्साहित होना स्वाभाविक है।

प्रश्न- नाम व आपके मेकअप के अलावा आपकी कौन-सी बात एकता कपूर से मिलती है?
ज्योति- एकता कपूर बालाजी टेलिफिल्म की मुखिया हैं और इस फिल्म में मेरी कंपनी का नाम लालाजी टेलिफिल्म है। एकता हाथ में अंगुठियाँ पहनना पसंद करती हैं और फिल्म में मैं भी बहुत सी रिंगस् पहनती हूँ। मेरी चाल-ढाल, पहनावे को भी बिल्कुल एकता के समान दिखाया गया है।

प्रश्न- आप असल जिन्दगी में एकता से मिल चुकी हैं?
ज्योति- दुर्भाग्यवश नहीं, पर एक अवार्ड फंक्शन में मैंने उनको बहुत ही करीब से देखा था, बस। परन्तु मैंने उनके बारे में बहुत कुछ अखबारों में पढ़ा है। कुछ बातें मुझे उसके करीबी दोस्तों से भी जानने को मिली और उन सब बातों की जानकरी होने के कारण मुझे अपनी भूमिका निभाने में सहायता भी मिली। मैंने जो जानकारी प्राप्त की थी उसके अनुसार एकता बहुत ही कड़क व मेहनती महिला है।

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि एकता इस फिल्म को देख कर कुछ नाराज़ होंगी?
ज्योति- नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। हमारा ऐसा कुछ विचार नहीं था कि उनको इस फिल्म के माध्यम से थोड़ा भी अपसेट किया जाए। वह स्वयं एक समझदार फिल्म निर्माता हैं। उन्हें पता है कि फिल्म को फिल्म की दृष्टी से ही देखा जाता है, व्यक्तिगत तौर पर नहीं। हमने फिल्म में उनको सकारात्मक रुप में पेश किया है और फिल्म देख कर उन्हें फिल्म पर गर्व होगा।


प्रश्न- फिल्म के रिलीज के समय यदि आपका सामना एकता कपूर से हो गया तो आप क्या करेंगी?
ज्योति- मैं उनसे डरूँगी नहीं बल्कि उनके पास जाकर नम्रता से अपना परिचय दूँगी कि ....हाय मैं अनेकता कपूर हूँ।

प्रश्न- भविष्य में और कोई जिन्दा आदमी का किरदार जिसे आप अपने अभिनय द्वारा पर्दे पर साकार करना चाहें?
ज्योति- हाँ, ऐसा मौका मिला तो मैं सोनिया गांधी की भूमिका करना चाहूँगी।

प्रश्न- अंत में आप ‘इडियट बाक्स’ के बारे में चंद शब्दों में क्या कहना चाहेंगी?
ज्योति- यह कोई हकीकत नहीं है। एक हास्य फिल्म है। जब भी दर्शक इस फिल्म को देखे तो महसूस करें कि यही आज घर-घर की कहानी है और उसे अपने ही घर की कहानी समझे। मुझे आशा है कि दर्शक इस फिल्म को अवश्य स्वीकार करेंगे।

प्रस्तुति: अशोक भाटिया

Saturday, September 12, 2009

फूहड़ चुटकलों से कितनी देर हंस पाएगा आम दर्शक?


कई दिन से इक अजीब-सी उधेड़बुन में हूँ, कि ये किस तरह कि फिल्में बन रही हैं, ना कहानी, ना पटकथा, ना ही कोई ढंग का संगीत, गीत के तो क्या कहने, फिर भी लोग देख रहे हैं, पसंद कर रहे हैं, और इक तरफ जो अच्छी फिल्में बन रही हैं उन्हें कोई घास भी नहीं डालता.. बल्कि अब तो इक नया चलन चला है, फिल्में सीधा डीवीडी से बाज़ार में उतरने का. चलो ये भी ठीक ही है, कम से कम फालतू के खर्चे से तो बचे, और जो कमाया, कुछ जरुरी खर्चों के बाद, सीधा जेब में, लेकिन इक बात जो इन सब की आपाधापी में समझ नहीं आती वो ये है कि आज दर्शक देखना क्या चाहता हैं.
चटपटी फिल्में, डेली सो़प, कॉमेडी या कुछ और.. और जैसे रियलिटी शो...
कमाल की बात है, लोग कहते हैं व्यस्तता बढ़ गई है, इस लिए डेली सो़प देखने का मन नहीं करता, कौन कहानी के चक्कर में पड़े, कॉमेडी भली है, इक बार में ख़त्म तो हो जाती है, पर कोई ये पूछे कि अगर इक बार में ख़त्म हो जाती है तो फिनाले के इन्तेज़ार में काहे को रहते हो भैया, और कॉमेडी भी किस तरह की, कॉमेडी के नाम पर बेहूदा मज़ाक हो रहा है, आज इक कॉमेडी शो चल रहा था, जिसमें मज़ाक हो रहा था की जनाब का पेट खराब है और वो अपनी प्रेमिका का दरवाजा खटका रहे हैं की प्रिय दरवाज़ा खोल दो वरना मेरी पतलून खराब हो जायेगी. अब कहिये ये किस तरह का बेहूदा मज़ाक है.
फिल्में भी तीन घंटे में ख़त्म हो जाती हैं, पर ऐसे कितने प्रतिशत लोग हैं, जो कि फिल्म को सच में देखने जाते हैं, इक सर्वे में बताया गया कि लगभग ४० प्रतिशत लोग तो यूँ ही घूमने के मकसद से पैसा बर्बाद करते हैं, २५ प्रतिशत पॉप कॉर्न का मज़ा लेने या दोस्तों के साथ चले जाते हैं, और जो बचे बाकी तीस प्रतिशत लोग, उनकी सुनता कौन है, बस धूम धड़ाका संगीत और हो गई पिक्चर हिट. कितने ही दिन हुए कोई गीत दिमाग पर नहीं छाया, वरना जब तक कोई फिल्म देखें और उसके गीत ज़हन में ना घूमें तो बात नहीं बनती, कोई बात, कोई सीन, कुछ भी तो याद नहीं रहता और फिल्म को मिलते हैं पांच स्टार, लोगो कि भीड़ को देख कर या जाने किस बात पर.
डेली सो़प लोग देखना पसंद नहीं करते पर फिर भी देखते उसी को हैं, कहने को सभी कहते हैं कि वही सास-बहू का ड्रामा, वाही रोज़ की चिकचिक. फिर भी 75 फीसदी घरों में सात बजते ही अगर कुछ चलता है तो वो हैं डेली सो़प और रात ग्यारह बजे से पहले तो ख़त्म होने वाले नहीं, अब श्रीमती जी का बहाना करें या और कुछ देखते तो सब वही हैं, वरना अगर ना देखें तो डेली सो़प का बाज़ार इतना गर्म कैसे हो.
रियलिटी शो की तो बात मत पूछिये. कोई पूछे कि क्या ये ड्रामा नहीं है. किसी को सोने नहीं दिया जाता तो किसी को अपशब्द सुनाये जा रहे हैं, खुलेआम, कहीं कोई स्वयंवर हुआ तो सभी को स्वयंवर का चस्का लग गया, फिर चाहे वो किसी का भी हो, चाहे लोग उसे पसंद ना करें पर बातें फिर भी उसी की करते हैं, देखा जाये तो रियलिटी शो भी किसी सास-बहू के ड्रामे से कहीं कम नहीं हैं, फर्क इतना है कि किरदार अलग हैं, और अब तो सास-बहू भी रियलिटी शो करेंगी, तो कहीं सासबहू ढूँढने निकली हैं रियलिटी शो के जरिये.
और इन सबसे बढ़कर सबसे बुरा हाल है, न्यूज़ चैनलों का, न्यूज़ यानि के समाचार.. देश-विदेश की खबरें.. देश में क्या चल रहा है इस बारे में जानकारी, लेकिन क्या ये सब हो रहा है चैनलों पर, नहीं.. बल्कि उनपर तो चल रहा है, कि एक-दूसरे कि टांग कैसे खीची जाए, किसी शो को पकड़ लिया तो उसे बंद करा के ही छोडेंगे, बस तीन तीन घंटे तक वही चलता रहता है, शो ने दर्शकों के घर बर्बाद कर दिए, कोई इनसे पूछे क्या दर्शक बेवकूफ हैं, कि इक शो से अपना घर बर्बाद कर लेंगे, और अगर ऐसा है तो मत देखो ना, किसी ने जबरदस्ती तो नहीं की आपके साथ, अजीब है हमारा दर्शक वर्ग भी, देखेगा और फिर बुरा भी कहेगा.
इक न्यूज़ चैनल पर इक कार्यक्रम देखा जिसमें इक घंटे की इक ख़ास कहानी दिखाई जाती है, कि हीरो अपनी प्रेमिका के कहीं और ब्याहे जाने पर सबका खून कर देता है, कहिये, क्या सीखेगा फिर हमारा समाज इस तरह के कार्यक्रमों से, और क्या ये खबर है, या चटपटा मसाला, सिर्फ अपने चैनल चलाने के लिए, यूँ ही तो इनकी टीआरपी बढती है !
कुल मिलकर, लोगो को कहानी, खबर, देश से कोई ख़ास सरोकार नहीं है, ना ही फर्क पड़ता है कि चल क्या रहा है, बस मसालेदार कुछ हो जाये.
मेरी नानी कहा करती थी अपनी ख़ास हरयाणवी शैली में "बस रोला रुक्का चाहिए" यही कुछ दीखता है आज के दर्शक वर्ग के साथ भी.
सबको मसाला चाहिए और वो भी शॉर्टकट में...

(सिनेमा हॉल की जगह मल्टीप्लेक्स लेते जा रहे हैं और आगे की सीट का दर्शक गायब होता जा रहा है....दीपाली की टीस के साथ इस वीडियो को देखना भी आपको शायद अच्छा लगे....)

दीपाली 'आब'
(दीपाली कविताएं भी लिखती हैं। हिंदयुग्म पर कविताएं भी भेजती रही हैं। बैठक पर ये इनका पहला लेख है)

Friday, September 11, 2009

उम्र की उल्टी गिनती पर बनी एक सीधी-सादी फिल्म


हॉलीवुड और बॉलीवुड की बहस बहुत पुरानी है और अक्सर लोग हॉलीवुड को हर तरह से बेहतर बताते हुए लम्बी-चौडी बहस करते हैं लेकिन यही लोग यहां पर बनी अच्छी फिल्म को सिरे से नकार देते हैं, ये कहकर कि यार फिल्म हल्की-फुल्की होनी चाहिये. दरअसल ये फर्क फिल्मों का नहीं, सोच का है और सोच से ही बनती है फिल्में. सिर्फ फिल्में ही नहीं ये फर्क जीवन के हर क्षेत्र में नज़र आता है चाहे वो खेल हों, विज्ञान हो या रोज़मर्रा के काम ही हों, हमारी जनता और उन्की जनता की सोच में बहुत अन्तर है. वहां लोग नये प्रयोगों के लिये हमेशा खुले होते है, और उसे प्रोत्साहित करते हैं जबकि हमारे यहां अधिकतर मानसिकता एक बंधी हुई लीक पर चलने की है, सदियों से जो निजाम चलता आया है वही चलेगा. उससे अलग जाने वाले को खामियाज़ा भुगतना पडता है. जीवन यापन के लिये अपना पेशा चुनने के वक्त भी आदमी इस लीक को छोड नहीं पाता है. यहां हर बच्चा डॉक्टर या इन्जीनियर बनने के लिये ही जन्म लेता है. यही कारण है कि हमारे यहां फैन्टेसी नही बनती हैं और वहां 'लॉर्ड ओफ द रिन्ग्स' के तीन सफल भाग बन जाते हैं.

खैर हम इस बहस में ज्यादा गहरे न उतरते हुए मुद्दे की बात पर आते हैं. मुद्दा है आज की फिल्म 'द क्यूरियस केस ऑफ बेन्जामिन बटन' जिसका विषय बिल्कुल नया है और साहसिक है. फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो बूढा ही पैदा होता है और समय के साथ उसकी उम्र घटती जाती है... फिल्म की शुरुआत होती है द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने के दिन से. उस रात एक बच्चा पैदा होता है जिसके पैदा होने के बाद उसकी मां की मौत हो जाती है. उसका पिता एक अमीर व्यवसायी है. वो जब उस बच्चे को देखता है तो उसे बेइन्तहां घृणा होती है, बच्चे के पूरे शरीर पर झुर्रियां हैं जैसे किसी 80 साल के बूढे के शरीर पर होती हैं. पिता उसे रात में एक वृद्धाश्रम में छोड देता है. वृद्धाश्रम की मालकिन एक बहुत ही सहृदय स्त्री है जो पहले ब्च्चे को देख कर घबराती है लेकिन फिर सहानुभूतिवश उसे अपने पास रख लेती है. सबको लगता है कि बच्चा मरने वाला है लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे वो बडा होता है उसकी झुर्रियां कम होती हैं और शरीर की सारी समस्याएं खत्म होती जाती हैं. वो आंख खोलने के बाद ही से वृद्धों के बीच ही रहता है और उनसे ही उसकी मित्रता होती है. अजीब अहसास से गुज़रता है वो जब एक-एक करके उसके दोस्त दुनिया से विदा होते जाते हैं और उसकी उम्र कम होने लगती है.

ऐसी ही एक वृद्ध दोस्त की 5 साल की पोती कुछ दिनों के लिये वहां रहने आती है. उसकी दोस्ती बेन्जामिन से होती है, पहले ये दोस्ती एक बुजुर्ग व्यक्ति की दोस्ती होती है लेकिन यही दोस्ती आगे चलकर प्रेम बन जाती है. प्रेम कहानी को बहुत ही सुंदर ढंग से कहानी में गूंथा गया है. लडकी की उम्र बढती है और बेन्जामिन की उम्र घटती है. इस दौरान बेन्जामिन एक बोट पर नौकरी कर लेता है और कईं बरस बोट पर ही बिताता है जीवन के बहुत से उतार-चढावों से गुज़र कर वापस अपने घर, उसी वृद्धाश्रम में जाता है. ये वो वक्त है जब उसका बुढापा पूरी तरह से जा चुका है और वो एक खूबसूरत नौजवान है. यहां वो फिर से उसी लडकी से मिलता है जिसे वो हमेशा याद करता रहा है. दोनों शादी कर लेते हैं और उन्हें एक बच्ची भी होती है लेकिन बेन्जामिन अपनी घटती हुई उम्र से चिन्तित है, उसे लगता है कि जब उसकी बच्ची को एक पिता की छाया की ज़रूरत होगी, वो खुद इस हालत में होगा कि उसकी देखभाल के लिये किसी की ज़रूरत हो और उसकी पत्नी को 2 बच्चे पालने पडेंगे. वो अपनी पत्नी को बच्ची की सही परवरिश के लिये दूसरी शादी करने की सलाह देता है और एक दिन अपना सब कुछ बच्ची के नाम करके कहीं चला जाता है. कई साल इधर-उधर भटकने के बाद अन्त में वो फिर अपने घर पहुंचता है और अपनी पत्नी की गोद में दम तोडता है.

फिल्म फैन्टेसी ना होते हुए एक भावनात्मक कहानी है. निर्देशक ने बडी ही खूबी से एक असामान्य आदमी और उससे जुडे लोगों की भावनाओं को प्रदर्शित किया है. फिल्म दिल को छूती है. बेन्जामिन के रूप में ब्राड पिट ने दिल जीत लिया. उनकी पहचान एक स्टाइलिश हीरो की है लेकिन उन्होने बेन्जामिन के गहरे मनोभावों को जिया है. दाद दी जानी चाहिये मेक-अप मैन को जिसने बेन्जामिन की हर उम्र को इतनी स्वाभाविकता से दिखाया है. फिल्म का विषय बहुत बडा था जिसकी वजह से ऐसा लगता है, अन्त में इसे बहुत जल्दी समेट लिया गया. फिल्म एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिये.

मैं इसे 5 में से 4 दूंगा

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, August 21, 2009

ढेन टणन....हॉलीवुड की अच्छी नकल है कमीने



बहुत हल्ला है साहब - 'कमीने...कमीने...कमीने'. आखिर हम देख ही आये. दरअसल मुझे इंतज़ार भी था इसके प्रदर्शन का. विशाल भारद्वाज का नाम उम्मीदें जगाने के लिए काफी है लेकिन...लेकिन...मुझे बहुत दुःख हुआ कि उम्मीदें पूरी नहीं हुई.....नहीं, मैं ये नहीं कह रहा कि फिल्म बुरी है. अपने तल पर फिल्म बहुत अच्छी बनी है और मुझे मज़ा आया देखने में लेकिन खुद विशाल से ही तुलना करें तो ये उनके स्तर की फिल्म नहीं है. मकबूल, मकड़ी, ब्लू अम्ब्रेला और ओमकारा बनाने वाले फिल्मकार को मैं फिल्म के उस कलात्मक स्वरुप का झंडाबरदार मानता हूँ जो सीधे दिल की रगों को छू लेती है. याद कीजिये ब्लू अम्ब्रेला में पंकज कपूर के किरदार का बारीक मनोवैज्ञानिक चित्रण, ओमकारा का अंत जहाँ अपनी निर्दोष पत्नी को सुहागरात पर नायक मार देता है और फिर उसका पश्चाताप जो आपको हिला देता है. उनकी अब तक की फिल्में किसी न किसी रूप में आपकी संवेदनाओं को हिलाती-डुलाती है लेकिन कमीने शुद्ध व्यावसायिक विषय पर बनी विशुद्ध व्यावसायिक फिल्म है. हालांकि फिल्म का प्रस्तुतीकरण काबिले-तारीफ़ है. फिल्म पर निश्चित रूप से हॉलीवुड फिल्मकार Quentin Tarantino का प्रभाव है.
फिल्म की कहानी चिर-परिचित फार्मूले पर आधारित है(विशाल के लिए घिसे-पिटे कहना बुरा लगेगा..) . दो जुड़वाँ भाई हैं गुड्डू(शाहिद कपूर), जो हकलाता है और चार्ली(फिर शाहिद कपूर) जो तोतला है और स को फ बोलता है. गुड्डू सीधा-सादा है और चार्ली जुआरी है. एक लोकल मराठी गैंगस्टर भोपे(अमोल गुप्ते) है जो उत्तर भारतीयों से नफरत करता है और चुनाव लड़ने वाला है. गुड्डू से गलती ये होती है कि वो भोपे की बहन स्वीटी(प्रियंका चोपडा) से प्रेम करता है और शादी से पहले ही उनकी सुहागरात हो जाती है, उस पर गुड्डू उत्तरप्रदेश का मूल निवासी है. भोपे को जब पता चलता है तो वो अपने आदमियों को गुड्डू को मारने के लिए भेजता है.
दूसरी तरफ अपने पैसों की वसूली करके भागता चार्ली एक पुलिस अफसर की कार लेकर भाग जाता है. पुलिस अफसर एक गैंगस्टर ताशी के लिए काम करता है. कार में रखे गिटार केस में १० करोड़ की कोकीन है जो पुलिस अफसर ताशी के लिए ले जा रहा था. गुड्डू भोपे के आदमियों से बचकर भागता है और चार्ली गिटार लेकर...गुड्डू उस पुलिस अफसर के हाथ लग जाता है जो चार्ली को ढूंढ रहा है और चार्ली भोपे के हाथ लग जाता है. बस यहीं से आप घटनाओं का झूला झूलने लगते हैं. सब लोग गिटार के पीछे लग जाते हैं और आपस में गुत्थम-गुत्था होते हैं. घटनाओं को निर्देशक ने विश्वसनीय तरीके से एक सूत्र में पिरोया है. फिल्म दर्शक की उत्तेजना को अंत तक बरकरार रखती है बशर्ते कि दर्शक पूरी तरह एलर्ट है. किरदार फिल्मी होते हुए भी विश्वसनीय हैं. कुल मिलाकर कमीने एक रोमांचक फिल्म है. फिल्म की शुरुआत में आपको लग सकता है कि मज़ा नहीं आ रहा है लेकिन फिल्म धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत बना लेती है.
सब कुछ होते हुए भी मैं ये कहूँगा कि विशाल भारद्वाज व्यावसायिकता के लालच में पड़ गए हैं लेकिन कभी-कभी स्वाद बदलने के लिए फिल्मकार को इतनी छूट मिलनी चाहिए. फिल्म के अंत में एक संवाद है गुड्डू और स्वीटी के बीच जहाँ गुड्डू कहता है- 'मेरे पास तो ढंग के कपडे भी नहीं हैं' जिसके जवाब में स्वीटी कहती है- 'आइ लाइक यू विदाउट क्लोद्स'. इस संवाद के लिए वहां कोई सिचुएशन नहीं थी. बस बिना किसी बात के गुड्डू यूँ कहता है और स्वीटी यूँ जवाब देती है जो ये बताता है कि फिल्मकार ने ये संवाद सिर्फ इसलिए डाला है कि सड़कों पर बाद में इसके बारे में बातें हों.
अभिनय के मैदान में मुझे उम्मीद थी कि जैसे सैफ अली खान ने ओमकारा में चकित कर दिया था वैसा ही कुछ शाहिद के साथ होगा लेकिन अफ़सोस शाहिद औसत ही रहे, इतनी तरक्की उन्होंने ज़रूर की है कि शाहरुख खान की नक़ल बंद कर दी है फिर भी कहीं-कहीं अन्दर का शाहरुख बाहर आ जाता है. मुल्क के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक अभिनेता के पुत्र होने के बाद भी शाहरुख़ की नक़ल उन्हें शोभा नहीं देती जो खुद अपने किरदार में कभी उतर नहीं पाए. फिर भी शाहिद दो अलग-अलग चरित्रों को प्रर्दशित करने में सफल रहे हैं. प्रियंका चोपडा के अभिनय में पिछले कुछ समय में बहुत सुधार आया है. अमोल गुप्ते ने कमाल का अभिनय किया है. 'तारे ज़मीन पर' जैसी स्तरीय फिल्म का लेखक उतना ही स्तरीय अभिनेता भी है. सभी कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया है जिसमे कई नए चेहरे शामिल हैं. निर्देशन और संवाद उम्दा हैं. संगीत का तो कहना ही क्या, उस क्षेत्र में विशाल ने अब तक कोई समझौता नहीं किया है. बहुत दिनों के बाद वाकई अच्छे गीत किसी फिल्म में आये हैं. गुलज़ार साहब को सलाम कर-करके मेरी कमर दुःख गई है, वे किसी भी शब्द को हाथ लगाकर जादुई बना देते हैं फिर चाहे वो 'कमीने' हो या धेला, टका, पाई हो जो यूँ तो चलना बंद हो गए हैं लेकिन गुलज़ार साहब ने ऐसा चलाया कि बेशकीमती हो गए. स्क्रीनप्ले बहुत दिलचस्प और कसा हुआ है.
अंगरेजी अखबारों में समीक्षक इस बात से बेहद खुश हैं कि विशाल ने टोरेंतिनो की तरह की फिल्म बनाई है और इसकी तुलना वे बहुत सी अंगरेजी फिल्मों से कर रहे हैं लेकिन शायद वे ये भूल जाते हैं कि एक अंगरेजी अखबार में समीक्षक होने पर भी वे भारतीय ही हैं. टोरेंतिनो की फिल्में मनोरंजक होती हैं लेकिन उन्हें महान नहीं कहा जा सकता और मेरे हिसाब से विशाल उनसे ज्यादा प्रतिभाशाली हैं. वे लोग इसलिए भी खुश है कि फिल्म की नायिका जो मध्यमवर्गीय प्रष्ठभूमि से है, सेक्स के बारे में खुल कर बातें करती है और वे इसे नारी स्वतंत्रता मानते हैं. अफ़सोस ये है कि नारी स्वतंत्रता सिर्फ शराब, सिगरेट और सेक्स के इर्द-गिर्द ही घूमकर रह गई है. पुरुष तो ठीक है खुद नारी भी अपनी स्वतंत्रता इन्ही चीज़ों में खोज रही है. उन्हें ये समझना ज़रूरी है कि स्वतंत्रता पुरुष की बुरी आदतों की नक़ल में नहीं है बल्कि अपने स्वभाव की गरिमा को स्थापित करने में है.
फिल्म में एक अच्छा मुद्दा उठाया गया है लेकिन वो उठा ही रह गया. मुद्दा आजकल की नफरत की राजनीति का जहाँ महाराष्ट्र के कुछ नेता दूसरे प्रांत के लोगों के लिए नफरत फैलाकर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं. वास्तव में इन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं है, इन्हें चुनाव जीतना है बस यही इनका एकमात्र धर्म है. मेरे हिसाब से इन्हें भी आतंकवादियों में शुमार किया जाना चाहिए पर करेगा कौन? नेता खुद ऐसा करेंगे नहीं और अवाम तो कब का सो गया.
ये अलग से एक लम्बी बहस का विषय है, हम फिर से फिल्म पर आते हैं. कुछ कमियां होते हुए भी फिल्म बहुत अच्छी है. मेरा आशय इतना ही है कि पिछली फिल्मों के मुकाबले इस बार विशाल भारद्वाज थोड़े से कमज़ोर रहे.
एक बात और साबित होती है कि फिल्म की कहानी लीक से हटकर न होते हुए पुराने ढर्रे की ही हो लेकिन निर्देशक में अगर कूवत है तो वो उस पर एक बेहतरीन फिल्म बना सकता है.

मेरी तरफ से ५ में से ३.८ और आप मोल-भाव करेंगे तो ४ तक दे दूंगा लेकिन उससे ज्यादा नहीं :)

अनिरुद्ध शर्मा

Wednesday, August 19, 2009

बिना गानों वाली पहली फिल्म थी 'कानून'


क्या एक ही जुर्म के लिए किसी इंसान को २ बार सजा हो सकती है? इसी सवाल के साथ शुरू होती है बी आर चोपडा की फिल्म 'कानून' |
घटनाक्रम कुछ यूँ होता है कि कालिया (जीवन) किसी आदमी का क़त्ल कर देता है और पकडा जाता है | अदालत में पेश होने पर पता चलता है कि कालिया इसी आदमी के क़त्ल के जुर्म में २० साल की सजा काट चुका है | बस, आपका दिल यहीं दहल जाता है ये सोचकर कि कैसा अहसास होगा वो जब आदमी भगवान की दी हुई ज़िन्दगी पूरी की पूरी बिना वजह जेल में काट दे |
कालिया जज से सवाल करता है कि कानून को किसी इंसान से वो चीज़ छीन लेने का क्या हक है जिसे वो वापस नहीं कर सकता ? अद्भुत फिल्म और अद्भुत अभिनय दादा मुनि का |
बी आर चोपडा सदा से सामाजिक सन्देश देने वाली फिल्में बनाते रहे हैं | इस फिल्म में एक बेहद संवेदनशील और अहम् मुद्दा उठाया गया था जो इतने साल गुज़र जाने के बाद, आज भी मौजूं है | सवाल यह है कि क्या कानून को उन गवाहों की गवाही के आधार पर एक इंसान की कीमती ज़िन्दगी छीन लेने का हक है, जो थोड़े से लालच से बहक सकते हैं या जिनसे देखने सुनने में गलती होने की पूरी संभावना है | मनुष्य गलतियों का पुतला है, फिर उसी की बात को पूरी
तरह सच मानकर किसी की ज़िन्दगी का फैसला कैसे किया जा सकता है?
फिल्म में अशोक कुमार ने एक जज बद्री प्रसाद की भूमिका की है जो एक संवेदनशील और विचारवान व्यक्ति है | इस जज ने कभी किसी को फांसी की सजा नहीं दी | जज की एक बेटी मीना(नंदा) है जो एक वकील कैलाश(राजेंद्र कुमार) से प्रेम करती है और एक बेटा विजय(महमूद) है जो अपनी अय्याशियों के चलते एक साहूकार(ओमप्रकाश)के जाल में फंस जाता है | विजय कुछ पैसों के बदले साहूकार को एक कोरे काग़ज़ पर दस्तखत करके दे देता है | काफी समय तक पैसा नहीं चुकाने पर साहूकार उसे उसके पिता की जायदाद अपने नाम कर लेने की धमकी देता है | विजय अपनी बहन मीना से मदद मांगता है और मीना कैलाश से | कैलाश अपने काम से फुर्सत पाकर रात को साहूकार के घर जाता है और उसे कानून का डर दिखाकर वो काग़ज़ वापस ले लेता है | बातें करते हुए कैलाश को जज बद्री प्रसाद वहां पर आते हुए दिखाई देते हैं, वो पास वाले कमरे में छुप जाता है | बद्री प्रसाद अन्दर आते ही साहूकार को जान से मार कर वापस चले जाते हैं | कैलाश वहां से भागकर अपने घर चला जाता है | थोडी ही देर के बाद एक चोर खिड़की खुली देख साहूकार के घर में घुस जाता है, वहां अँधेरे में वो लाश के ऊपर गिरता है और छुरे पर उसकी उँगलियों के निशान बन जाते हैं | चोर डर कर खिड़की से वापस भागता है लेकिन गश्त मारती पुलिस के हाथ लग जाता है | उस पर मुक़दमा चलता है| कैलाश जानता है कि वो बेगुनाह है, उसकी अंतरात्मा उसे चैन से नहीं रहने देती और वो उस चोर का वकील हो जाता है | दिलचस्प बात ये है कि फैसला खुद बद्री प्रसाद को करना है क्योंकि वही इस मुक़दमे की सुनवाई कर रहे हैं | कैलाश एक बेगुनाह को सजा से बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है और आखिर बद्री प्रसाद पर उंगली उठा देता है | अब जज खुद कठघरे में खडा होता है | लेकिन इस पूरी कहानी में एक पेंच है जो अंत में खुलता है और एक ज्वलंत प्रश्न खडा कर देता है कि अगर सच्चाई का संयोग से पता नहीं लगता तो एक बेगुनाह को सजा होना तय थी क्योंकि परिस्थितिवश गवाह से भी चूक हो जाती है |
फिल्म की गति उस ज़माने को देखते हुए तेज़ है और फिल्म कहीं भी अपनी पकड़ ढीली नहीं करती | आज के ज़माने में भी जब दर्शक को घटनाओं के हाई डोज़ की आदत हो चुकी है, फिल्म अपना असर छोड़ने में कामयाब है | ये कमाल निर्देशन का है | अभिनय का श्रेष्ठतम उदाहरण देखना हो तो दादा मुनि को देखना चाहिए | नंदा की भूमिका में कुछ विशेष नहीं है | महमूद अपने चिर परिचित अंदाज़ में है | कमी है तो बस एक, राजेन्द्र कुमार...वो ऐसे अभिनेताओं में से एक हैं जिन्हें सिर्फ किस्मत के दम पर सफलता मिली है वरना इस फिल्म में चेहरे पर एक-एक भाव लाने के लिए उन्हें कितनी जद्दोजहद करनी पड़ी है वो साफ़ दिखाई देता है | चेहरे बनाने की उनकी मेहनत देखकर हमें थकान होने लगती है |
फिल्म एक और मायने में विशेष है, ये भारत की पहली बिना गीतों वाली फिल्म थी | इसके पीछे भी एक कहानी है - बी आर चोपडा साहब एक विदेशी फिल्म फेस्टिवल में शिरकत कर रहे थे तब किसी ने कहा कि भारतीय फिल्मे सिर्फ नाच-गानों का प्रदर्शन होती हैं | भारतीय नाच-गानों के बिना फिल्म नहीं बना सकते | बी आर चोपडा ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और बिना गीतों वाली कुछ बेहतरीन फिल्में बनाई |
इस फिल्म ने जो सवाल उठाया वो आज तक अपनी जगह कायम है, उस पर अब भी बहस की ज़रुरत है लेकिन एक और सवाल साथ खडा हो गया है कि ये बहस करेगा कौन और उस बहस के नतीजों को अमल में कौन लाएगा क्योंकि अब तो बौद्धिकता भी ग्लैमर की चकाचौंध की शिकार हो गई है |

फिल्म ५ में से ४.५ अंक पाने की हक़दार है |

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, July 31, 2009

मुट्ठियां भींचो कि कहीं पंजे निकल आएं....



मैं आज बार-बार अपने हाथों की मुट्ठियाँ बना-बना कर देख रहा हूँ कि शायद वोल्वरीन जैसे पंजे निकल आयें हा हा.. ऐसा जादू होता है फिल्मों में कि इंसान उसे हकीकत में देखने की ख्वाहिश करने लगता है जी हाँ, आज ही 'X Men Origins - Wolverine' फिल्म देखी है मेरे एक मित्र की धर्मपत्नी एक्स मेन श्रंखला से इतनी प्रभावित है मेरे मित्र को कहती है- "तुम अपने हाथों में वोल्वरीन की तरह पंजे लगवा लो न"
बहरहाल बात करते हैं फिल्म के बारे में... फिल्म की कहानी बदले पर आधारित है और जैसा कि बदले के लिए ज़रूरी है कि हीरो के परिवार या फिर प्रेमिका के साथ कोई हादसा होना चाहिए और फिर उसे करने वाले को गायब हो जाना चाहिए जिससे हीरो फिल्म में उसे ढूंढता रहे... इस दौरान उसे कुछ साथी भी मिलते हैं जो इस राह में शहीद हो जाते हैं...यही सब कुछ इस फिल्म में भी है....वैसे इस थीम पर आधारित फिल्मों की स्टोरीलाइन लगभग एक जैसी ही होती है लेकिन जो चीज़ मायने रखती है वो है प्रस्तुतिकरण, और इस क्षेत्र में एक्स मेन ओरिजिंस को पूरे-पूरे अंक मिलेंगे.. बेहद दिलचस्प प्रस्तुतीकरण, रोमांचक घटनाक्रम, कुल मिलाकर फिल्म दर्शक को अपने सामने बैठाए रहती है....
ये फिल्म इस श्रृंख्ला की पहली ३ फिल्मों के आगे की कहानी ना होकर उसके पहले की कहानी है....पहली 3 फिल्मों में हीरो पूरी कहानी अकेले आगे नहीं बढाता लेकिन इस फिल्म में वोल्वरीन अकेला हीरो है....ह्यू जैकमैन ने वोल्वरीन को इस तरह जिया है कि मुझे शक है कहीं उनके सच में पंजे ना निकलने लगे हों... कहानी १८४५ से शुरू होती है जब वोल्वरीन जेम्स लोगन नाम का बच्चा है जो अनजाने में अपने पिता को क़त्ल करके घर से भागता है और उसका भाई विक्टर उसके साथ जाता है.....दोनों आर्मी में भर्ती हो जाते हैं और बहुत साड़ी लड़ाईयां लड़ते हैं... दोनों ही भाई म्यूटेंट हैं... विक्टर स्वभाव से खूंखार है और उसके विपरीत लोगन एक इंसाफपसंद और नरमदिल इंसान है....सेना का एक कर्नल विलियम स्ट्राइकर एक म्यूटेंट सेना बना रहा है और इन दोनों को अपने साथ ले जाता है लेकिन वो अपने स्वार्थ के लिए इनसे बेगुनाह लोगों की ह्त्या करवाता है जो लोगन को पसंद नहीं आता और वो इन्हें छोड़कर चला जाता है.... 6 साल गुज़र जाते हैं, लोगन शाति से अपनी प्रेमिका के साथ अपनी जिन्दगी जी रहा है, तभी स्ट्राइकर एक षड्यंत्र रचता है जिसके तहत विक्टर लोगन की प्रेमिका को मार देता है...बस यहीं से बदले की कहानी शुरू होती है जिसमें धोखे से लोगन की हड्डियों में admantiam नामक धातु भर दी जाती है, लोगन विक्टर को ढूंढता है, स्ट्राइकर से टकराता है और उसके गुप्त ठिकाने को तहस-नहस कर देता है लेकिन आखिर में अपनी याददाश्त खो देता है....फिल्म एक रोमांचक यात्रा है जिसमें कई क्षण ऐसे आते हैं जब आप अपने शरीर की नसों में तनाव महसूस करते हैं.... फाइट सीक्वेंस बहुत अच्छे हैं, फिल्म की गति तेज़ है... अभिनय सभी कलाकारों ने अच्छा किया है जिसमे सबसे ऊपर है ह्यू जैकमैन उर्फ़ लोगन... फिर लीव स्क्रैबर, जिन्होंने विक्टर का किरदार स्वाभाविक तरीके से निभाया है.....ग्राफिक्स पिछली तीनों फिल्मों की तरह ही अच्छे हैं...
अब कुछ कमियों की बात करें....सबसे बड़ी कमी अगर देखें तो कहानी ही है, जिसमे नया कुछ नहीं है जबकि पिछली तीनों फिल्मों में बहुत कुछ था...कहानी हजारों बार दोहराई जा चुकी है, हॉलीवुड में भी और बॉलीवुड में भी बहुत से दृश्य यूँ लगे जैसे कोई हिंदी मसाला फिल्म देख रहें हैं जैसे भाई-भाई का अंत में दुश्मन से एक साथ लड़ना, नायक-नायिका का लड़ाई के मैदान में प्यार भरी बातें करना आदि कुछ बातें हजम नहीं होती... जैसे विक्टर कहाँ चला जाता है? अंत में चार्ल्स कहाँ से आ जाता है? लेकिन कुल मिलाकर फिल्म अच्छी है और एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए
मैं अपनी तरफ से इसे ५ में से ३.५ अंक दूंगा

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, February 13, 2009

विदेशी फिल्म "स्लमडॉग..." पर काहे झूमे इंडिया??

एक साल पहले मैंने "तारे ज़मीन पर" देखी। सिनेमा हॉल में शायद ही कोई हो जो फिल्म देखकर रोया न हो। जिसने खड़े होकर आखिर में दिखाया जाने वाला गाना देखा हो, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों का मासूम बचपन खोता हुआ दिखाया जाता है। कोई ऐसा नहीं है जिसने "माँ" वाला गाना न सुना हो। शायद ही कोई होगा जिसकी आँखें न भर आई हों। एक ऐसी कहानी जिसने सच्चाई से परिचय कराया। एक बच्चे की कहानी जो बीमार है। माँ-बाप की बढ़ती उम्मीदों के बीच अपने बचपन की मासूम शरारतों से दूर है। डिस्लेक्सिया बीमारी के शिकार बच्चे की कहानी। भारत के लगभग हर एक घर की कहानी। जहाँ बच्चे पर बोझ डाल दिया जाता है किताबों का, उम्मीदों का।

जब ये फिल्म आई तो लगा कि यही वो फिल्म है जिसका हमें इंतज़ार था। ये वो फिल्म है जो हमें ऑस्कर दिलवायेगी। क्या निर्देशन किया है आमिर ने? क्या एक्टिंग की छोटे-से बच्चे दर्शिल सफारी ने। इतनी बढ़िया अदाकारी कि आमिर खान आधी फिल्म होने के बाद कहानी में आते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा सिर्फ दर्शिल के बूते चलता है। शंकर-एहसान-लॉय का जबर्दस्त संगीत। प्रसून जोशी के गीत। शंकर की आवाज़, कहानी। सब कुछ बढ़िया।
फिर, खबर आई कि फिल्म ऑस्कर से बाहर हो गई.... पैरों तले ज़मीन खिसक गई। अगर ये फिल्म नहीं, तो और कैसी फिल्म बनायें कि ऑस्कर में जा सके। 'लगान' से किसी मामले में कम नहीं। "रंग दे बसंती" के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

अब "स्ल्मडॉग मिलेनियर" को १० श्रेणियों में नामांकित किया गया है। इससे ज्यादा सिर्फ एक और फिल्म को ही नामांकन मिले। पर इस फिल्म में ऐसा क्या जो "तारे ज़मीन पर' में नहीं। "स्लमडॉग.." की भारत में हर ओर आलोचना भी हो रही है। इस बात पर भी बहस हुई कि भारत को केवल झुग्गी बस्ती का देश दिखाने और भारतीयों को ठग और विदेशियों को उदार दिखाने के बाद क्या ये फिल्म भारत में रिलीज़ होनी चाहिये? किस बात में आमिर की फिल्म पीछे हो गई? कहानी, संगीत, गीत, निर्देशन, अदाकारी या कुछ और। किन मापदंडो पर ऐसा किया जाता है। पहले मैं समझता था कि हिन्दी फिल्मों में नाच-गाने अधिक होते हैं और कहानी न के बराबर-शायद इसलिये पीछे रह जाते हैं। पर "स्ल्मडॉग.." भी तो भारतीय पृष्टभूमि पर आधारित है। इसमें भी ढेरो गाने हैं। जो बात दोनों फिल्मों को अलग करती है वो है फिल्म में अधिकतर विदेशी टीम का होना। कहीं ऐसा तो नहीं कि "स्लमडॉग.." केवल इसलिये आगे निकल गई क्योंकि ये एक विदेशी ने बनाई है। इसमें उन्हें उदार दिखाया गया है। ये केवल मेरी सोच हो सकती है, लेकिन जो घटा है मैं उसको झुठला नहीं सकता। और कोई दूसरा कारण मुझे नजर नहीं आता। आप बता सकें तो मुझे खुशी होगी। हम खुश हो रहे हैं कि ये फिल्म ऑस्कर के लिये नामांकित हुई। हमें खुशी केवल तभी होनी चाहिये जब संगीतकार ए.आर.रहमान को अवार्ड मिले। क्योंकि सिर्फ तभी ये अवार्ड भारतीय कहलायेगा।

तपन शर्मा