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Tuesday, February 08, 2011

शमशेर अहमद खान एक साधारण लेखक से कहीं अधिक थे



अभी थोड़ी देर पहले ही मित्र रामजी यादव ने बताया कि जनसत्ता में खबर छपी है कि शमशेर अहमद खान नहीं रहे। मेरे लिए यह विश्वास करने वाली सूचना नहीं थी। रामजी ने बताया कि आज के जनसत्ता में खबर छपी है कि लम्बी बीमारी के बाद 7 फरवरी 2011 को उनका निधन हो गया। मुझे यक़ीन इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि नवम्बर तक उनसे लगातार बात हुई थी। उन्होंने अंतिम बार यह ज़रूर कहा था कि आजकल छुट्टी पर हूँ। चेहरा और शरीर के कई अन्य भाग बुरी तरह से फूल गये हैं। इस स्थिति में कहीं आ-जा नहीं सकता। लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं बताया कि उन्हें ब्लड-कैंसर हैं। अभी कुछ देर पहले ज़ाकिर भाई को फोन किया तब पता चला कि दिसम्बर में उन्हें पता चला कि ब्लड-कैंसर है और वे उसी का इलाज करवा रहे थे।

अंतिम बार मैं उनसे तब मिला था जब पीपुल्स विजन्स के साथ मिलकर हिन्द-युग्म ने वरिष्ठ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह का कहानीपाठ आयोजित किया था। (दर्भाग्य से यह कार्यक्रम प्रस्तावित रूप में नहीं हो पाया था)। हमलोग जब कभी भी कोई कार्यक्रम करते थे, चाहे वो बड़ा हो या छोटा, शमशेर जी को फोन करके यह निवेदन करते थे कि वे अपना कैमरा वगैरह लेकर आ जायें। शमशेर जी को साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग का बेहद शौक था। हिन्द-युग्म को उन्होंने पिछले 2 सालों में कम से कम 100 रिपोर्ट बनाकर दिये होंगे। खुद का संसाधन और समय लगाकर किसी कार्यक्रम की वीडियोग्राफी करना, फोटोग्राफी करना, उसकी रिपोर्ट बनाना और बहुत से प्रिंट और इंटरनेटीय पत्र-पत्रिकाओं को भेजना, एक श्रमसाध्य कार्य है। लेकिन इसमें वे कभी थके नहीं। मुझे याद है कि जब वे दिल्ली के बाहर कहीं भी जाते, तो वहाँ की रिपोर्ट इंटरनेट के माध्यम से वहीं से भेज देतें। मैं उनकी रिपोर्टों को छापने में उतना तेज़ नहीं था, जितनी तीव्रता से वे उन्हें भेजते थे।

हिन्द-युग्म के स्थाई पाठक ज़रूर इस नाम से परिचित होंगे। लगभग 2 साल पहले ज़ाकिर अली रजनीश जब दिल्ली आये थे, तक उन्होंने शमशेर जी से मुझे मिलवाया था। उसके बाद महीने में कम से कम 15 दिन उनका फोन ज़रूर आता था। इंटरनेट पर हिन्दी की दुनिया की सजीव उपस्थिति देखकर वे बहुत उत्साहित थे। इंटरनेट विधा की त्वरितता और इसकी जन-पहुँचता उन्हें बहुत लुभाती थी। वे कम्प्यूटर के पक्षधर थे और बहुत जल्दी ही उन्होंने इसका इस्तेमाल सीख लिया था। वे इस बात के लिए हमेशा दुखी रहते थे कि उनके सहकर्मी कम्प्यूटर पर हिन्दी का इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाते। उन्होंने अपने प्रशिक्षण संस्थान में मुझे दो बार अपने सहकर्मियों को ब्लॉगिंग और यूनिकोड-प्रयोग का प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया था। लेकिन अभी तक वे अपने सहकर्मियों को यूनिकोड-फ्रेंडली नहीं बना पाये थे, इसका उन्हें बेहद अफसोस था।

उन्होंने मुझे सांसदों द्वारा राजभाषा हिन्दी के उत्थान के लिए किये जा रहे हास्यास्पद प्रयासों के बारे में बताया था और मुझे लगातार इस बार के लिए प्रोत्साहित करते थे कि जरा एक RTI डालकर देखिए कि कितनी चुटकुलेदार उक्तियाँ मिलेंगी। उन्होंने पिछले साल 'सूचना का अधिकार' कानून का इस्तेमाल कर यह जानकारी ली थी कि भारतीय नोटों पर सभी भारतीय भाषाओं में मुद्रा का मान क्यों नहीं लिखा जाता और यह भी कि इंडिया गेट पर शहीदों का नाम देवनागरी लिपि में क्यों नहीं है और क्या उन्हें कभी देवनागरी लिखे जाने की कोई योजना बनाई गई?

उन्हें पशु-पक्षियों से बेहद लगाव था। जब मैं पहली बार और इक मात्र बार उनके घर गया था तो उन्होंने अपने बागीचे के बहुत से छोटे-छोटे जीवों से मेरा परिचय करवाया था और अपने लैपटॉप पर उन्होंने उनके प्रेम करने की, प्रजनन, शिकार करने तथा खाने का वीडियो भी दिखाया, जिसको वे बहुत शांति से शूट कर लिया करते थे। पिछले ही साल उन्होंने एक सैकंड-हैंड वीडियो कैमरा लिया था, जिसकी मदद से वे लघुफिल्में बनाना चाहते थे। उन्होंने एक शॉर्ट फिल्म बनाई भी थी, जिसे वे अपने हर परिचित को दिखाते भी थे।

खाना बनाने का भी शौक रखते थे। नवम्बर 2011 में ही उन्होंने कई बार कहा कि अगर आप किसी शाम खाली हो तो आइए मछली बनाता हूँ। बाकी वे एक वरिष्ठ लेखक और बालसाहित्यकार थे, यह तो सभी जानते हैं। लेकिन मैं तो उन्हें एक रिपोर्टर, फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर के तौर पर अधिक जानता था। हमदोनों एक साथ बाल साहित्य के कई कार्यक्रमों में गये, लेकिन मेरी हमेशा उनसे बातचीत हिन्दी और इससे जुड़ी तकनीक पर ही होती थी। मेरे विचार से शमशेर अहमद खान का जाना हिन्दी भाषा की क्षति है।




शमशेर जी का ब्लॉग
शमशेर जी द्वारा हिन्द-युग्म को भेजी गईं रिपोर्टें

Tuesday, June 09, 2009

हिंदी मंचों के कविसूर्य थे ओम प्रकाश आदित्य

कल हिन्दी कविता की मंचीय परम्परा को समृद्ध करने वाले वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि ओमप्रकाश आदित्य की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। हिन्दी काव्य जगत इस कवि के चले जाने के बाद शोकाकुल है। हिन्द-युग्म के कवि अरुण मित्तल अद्‍भुत कवि आदित्य के प्रति अपनी यह श्रद्धाँजलि अर्पित की है-


हिंदी मंचो के कविसूर्य श्रद्धेय श्री ओम प्रकाश 'आदित्य'


हिंदी काव्य मंचो पर यदि तीन शब्दों को जोड़ा जाए - कविता, हास्य और छंद, तो मात्र एक ही नाम जहन में आएगा और वो होगा श्री ओम प्रकाश 'आदित्य', सुकोमल चेहरा, अल्हड भाषा, उच्चारण में मिठास, शब्दों में सम्मोहन की शक्ति, क्या नहीं था उस महान साहित्य मनीषी के पास, आज गजल और गीत में संस्कार है, जीवन दर्शन है, छंद है परन्तु वो इस पीढी के एकमात्र ऐसे रचनाकार दिखे जिन्होंने इन सभी जरूरी भावों को हास्य की सहजता के साथ प्रस्तुत किया. सचमुच आदित्य दादा ने मंचो पर हास्य का एक ऐसा युग जिया, और एक ऐसा स्तर स्थापित किया जिसे आने वाले युग में किसी कवि द्बारा छू पाना सरल नहीं होगा. उनका कोई सानी नहीं था. मंच पर आते ही मधुर सी भूमिका, सरल और अल्हड शब्दों में कवियों का अभिवादन, छोटे बड़े सभी कवियों को प्यार और सम्मान उनका नियम था.

सादगी आदित्य दा की पोशाक थी. उन्होंने काव्य पाठ के लिए कभी चुटकुलों का सहारा नहीं लिया, कभी किसी पर फब्तियां नहीं कसी, कभी किसी का भूल से भी मजाक नहीं बनाया, मंचों के स्तरहीन टोटकों से हमेशा परे रहकर अपनी बात कहने का अद्भुत हुनर हर किसी को उनका दीवाना बना देता था.
आदित्य जी घनाक्षरी छंदों से काव्यपाठ की शुरुआत करते थे दो चार छंद और एक दो प्रतिनिधि कवितायेँ और बीच बीच में उनके संस्मरण जो वास्तव में प्रेरणा दायक होते थे, मैं हरदम कहता हूँ की "हास्य में कविता" और वो भी 'छंद' के साथ, मुझे बहुत ज्यादा नाम नहीं सूझते 'गोपाल प्रसाद व्यास, काका हाथरसी और फिर घूम फिरकर आदित्य दा. उनके छंद पढने का अंदाज़ निराला था. हर शब्द को चबा चबा कर बोलना और साहित्यिक शैली में हास्य की बात घनाक्षरी छंदों में लिखना एक छोटा सा उदहारण है


"अबके चुनाव की लहर ने कहर ढाया, नदियों के साथ कैसे कैसे नाले बह गए
उल्लुओं को अम्बुआ की डाल पर देख कर, हौसले बसंत के अनंत तक ढह गए
भारत में कभी गंगू तेलियों का राज होगा, जाते जाते राजा भोज मंत्रियों से कह गए
चाँद से चरित्र वाले नेता सब चले गए, नेताओं के नाम पर ये कलंक रह गए


उनकी उपमाएं और उपमान अद्वितीय थे. उन्होंने हर प्रकार का हास्य लिखा, छोटी बहर के छन्दों में भी, घनाक्षरी तो उनका प्रिय छंद रहा ही, आल्हा छंद में पूरी राजनीति का चरित्र बांधकर जब वो सुनाते थे तो श्रोता झूम उठते थे, एक उदहारण है

सुमरण कर के मंत्रिपद का, भ्रष्टाचार का ध्यान लगाय
करुँ वंदना उस कुर्सी की, जिस पे सबका मन ललचाय
बिन बिजली के कैसा बादल, बिन पूँजी क्या साहूकार

बिन बन्दूक करे क्या गोली, बिना मूठ कैसी तलवार

बिना डंक बिच्छु क्या मारे, फन बिन सांप डसे क्या जाय,
रूप बिना वेश्या क्या पावै, घूस बिना अफसर क्या खाय

बिन जल के मछली ना जीवे, बिन जंगल न जिए सियार
बिन कुर्सी मंत्री न जीवे, जो जीवे उसको धिक्कार


इसी आल्हा में हर्षद मेहता काण्ड के कारण हुए विवाद पर लिखा-

"कुर्सी छोडो, कुर्सी छोडो गूँज उठा संसद में नाद,
दिल्ली में नरसिम्हा रोये, आँसू गिरे हैदराबाद


उन्होंने हास्य के हर पहलू को जिया, एक छंद की अंतिम पंक्ति है :

पिछले चुनावों से वो मेरा गधा लापता है,
ढूँढने आया हूँ उसे संसद भवन में


एक और कविता में उन्होंने बहुत अच्छा हास्य और व्यंग पिरोया है, जो पिछले दिनों काफी चर्चित रही :

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ गधे ही गधे हैं
......
घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्वयनप्राश देखो


आदित्य जी के साहित्य के बारे में जितना लिखो कम है उन्होंने एक ऐसा प्रयोग भी किया जो सचमुच उनके साहित्य के प्रति समर्पण और अपने साथी और अग्रज कवियों के प्रति सम्मान को दिखता है. इतना ही नहीं उस प्रयोग से उनकी साहित्यिक प्रतिभा के विस्तार का भी सहज ही अनुमान हो जाता है. उन्होंने एक ऐसी कविता लिखी कि एक विशेष स्थिति पर यदि १०-१२ हिंदी के प्रसिद्द कवियों को लिखने के लिए कहा जाता तो वो कैसा लिखते. स्थिति थी की एक लड़की अपने घर वालों से लड़कर छत पर बैठी है और कूदकर मरना चाहती है, हालांकि इस कविता में काफी कवियों की शैली में उन्होंने लिखा है परन्तु मैं दो उदाहरण जो सचमुच विचित्र ही नहीं बल्कि विधा में भी विपरीत से ही लगते हैं प्रस्तुत कर रहा हूँ

सुमित्रा नंदन पन्त जी की शैली में :


स्वर्ण शोध के रजत शिखर पर
चिर नूतन चिर सुन्दर प्रतिपल
उन्मन उन्मन अपलक नीरव
शशि मुख पर कोमल कुंतल पट
कसमस कसमस चिर यौवन घट
पल पल प्रतिपल, छल छल करती निर्मल दृगजल
ज्यों निर्झर के दो नील कवँल
ये रूप चपल ज्यों धुप धवल
अति मौन कौन, रूपसी बोलो
प्रिय बोलो न


काका हाथरसी जी की शैली में

गौरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है, भली करै करतार
भली करै करतां, न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार के नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय, अरी मत आगे बढ़ना
उधर कूदना, मेरे ऊपर मत गिर पड़ना



और न जाने कितनी ही कवितायेँ मेरे मन में रम, रच बस गयी हैं, विद्यार्थी की प्रार्थना, दुल्हे की घोडी, संपादक पर कविता, बूढा, आधुनिक शादी, नोट की आरती आदि आदि ..... आदित्य जी ने देश के स्वाभिमान की बात जहाँ भी आई वहाँ वहाँ खुलकर बोला, अंग्रेजी के प्रसिद्द लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह द्बारा हिंदी भाषा पर की गयी अपमानजनक टिप्पणी पर उन्होंने "ओ खुशवन्ता" नाम से कविता लिखी जिसे मंचो पर काफी स्नेह मिला...

कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ थी


ओ खुशवन्ता
भारत में चरता विचरंता
अंग्रेजी की बात करंता
हिंदी दिए दरिद्र दिखंता
क्यों लन्दन जा नहीं बसंता


केवल हास्य ही नहीं जहाँ कही भी उन्हें लगा की रस परिवर्तन की जरूरत है, उन्होंने वो भी किया उनकी कविता "सैनिक की पत्नी का पत्र" इस बात का प्रमाण है जिसमे एक छंद में उन्होंने लिखा:

"आप सीमा पर गए चिंता इसकी नहीं है
दुःख यही है की प्राण मैं भी कुछ धारती
मुझे एक बन्दूक थमा के चले जाते
चुन चुन कर यहाँ देश द्रोहियों को मारती
आप क्रुद्ध होके वहां सीमा पर युद्ध करें
पूजा पाठ में समय मैं यहाँ गुजारती
मात्रि भूमि मंदिर में वन्दे मातरम गाके
विजयी तिरंगे की उतारती हूँ आरती


मैंने उनको बचपन से सुना है, पढ़ा है और मनन भी किया है, मेरे पापा श्री महावीर प्रसाद मित्तल न केवल कविताओं के शौकीन रहे बल्कि उन्होंने मुझे आदित्य जी की कई कवितायेँ सुनाई भी और याद भी करवा दी, आदित्य जी की पहली कविता जो मुझे याद हुई वो चुनावी परिप्रेक्ष्य में थी जिसमे प्रधानमंत्री की कुर्सी की पीडा का वर्णन था.

देखो पी एम् की कुर्सी बिचारी बताओ मैं किसको वरूं
न मैं ब्याही रही न कुवांरी बताओ मैं किसको वरूं


और अनेक कवितायेँ और अनेक रूप हैं आदित्य जी के साहित्य सृजन के, जीवन की सरलता के सम्बन्ध में उनका एक सार्थक छंद, भाई चिराग जैन जी के ब्लॉग से उठाकर परोस रहा हूँ,

दाल-रोटी दी तो दाल-रोटी खा के सो गया मैं
आँसू दिये तूने आँसू पिए जा रहा हूँ मैं
दुख दिए तूने मैंने कभी न शिक़ायत की
जब सुख दिए सुख लिए जा रहा हूँ मैं
पतित हूँ मैं तो तू भी तो पतित पावन है
जो तू करा ता है वही किए जा रहा हूँ मैं
मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाउंगा
तूने कहा जिए जा तो जिए जा रहा हूँ मैं


सचमुच "दुल्हे की घोडी", एक विशुध्ध हास्य कविता में "जीवन दर्शन" की इतनी सार गर्भित पंक्तियाँ सुनकर उन्हें नमन करने पर विवश हो गया: (घोडी भाग रही है और दूल्हा पीठ से चिपका हुआ है, घोडी के भागने की गति पर)

घोडी चलचित्र सी
युग के चरित्र सी
कुल के कुपात्र सी
आवारा छात्र से
पथ भ्रष्ट योगी सी
कामातुर भोगी सी
उच्छल तरंग सी
अतुकांत कविता सी
और छंद भंग सी

दौडी चली जा रही थी ...........


१५ नवम्बर, २००७ को दस्तक नयी पीढी नाम से एक काव्य संध्या का आयोजन हुआ जिसमे १५ युवा कवियों ने काव्य पाठ किया, जिनमे एक मैं भी था, सञ्चालन भाई चिराग जैन ने किया, आदित्य दादा, अल्हड बीकानेरी जी और डॉ कुंवर बेचैन जी उसमे विशेष रूप से युवा कवियों में संभावनाएं तलाशने के लिए उपस्थित थे, पूरे कवि सम्मलेन में न केवल उन्होंने हर कवि को मन से सुना बल्कि अंत में आदित्य जी ने सबकी प्रतिभा की सराहना भी की और लगभग हर कवि से सम्बंधित बात करते हुए आशीर्वचन भी कहे.... ये प्रमाण था उनके साहित्य के प्रति समर्पण का, वो चाहते थे की मंच पर अच्छे स्तर की कविता हो और उसी की तलाश में उन्होंने हर नौसीखिए कवि के एक एक शब्द को सुना.

यह तय है की आदित्य जी की रचना धर्मिता को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता, वो एक ऐसा व्यक्तित्व था जो हमेशा हमेशा के लिए अपनी कविताओं से हमारे दिल में बस गया. उनका कवि परवार से अकस्मात चले जाना एक अपूर्णीय क्षति है, आदित्य जी आज भी कहीं आँखों में तस्वीर बनकर बसे हैं सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम दिल्ली में, काव्य पाठ करते कवि ओमप्रकाश आदित्य, हिंदी भवन में "दस्तक नयी पीढी की' कार्यक्रम में श्री जगदीश मित्तल जी के जन्मदिवस पर युवा कवियों को आर्शीवाद देते पितामह कवि आदित्य जी. हर समय उतने ही सरल, सौम्य, और सचमुच के बड़े कवि. कौन कहता है की वो चले गए ......... साहित्यकार कभी नहीं मरते, अमर होते हैं .... आदित्य दादा आज भी हम सब के दिलों में हैं, हर मंच पर आज भी उनकी अमिट छाप है, हमारी जुबान पर आज भी उनकी कवितायेँ हैं, वो हम सब में बसे हैं ........ समस्त हिंदी साहित्य उनके ईमानदार साहित्य सृजन का ऋणि रहेगा

Saturday, May 02, 2009

सोने का पिंजर (अंतिम अध्याय)

तेरहवां अध्याय

अमेरिका का उत्तरी छोर, बर्फीली ठण्डी हवाएं चलना प्रारम्भ हो गयी हैं, कुछ ही दिनों में यहाँ बर्फ ही बर्फ होगी। तब किसी भी पक्षी का यहाँ रहना सम्भव नहीं होगा। पक्षियों के एक दल का नेता आकाश को निहार रहा है, बर्फ का गिरना महसूस कर रहा है। अब मुझे दक्षिण छोर की ओर चले जाना चाहिए, मन में चिन्तन चल रहा है। कहीं तो नवीन आशियाना तलाशना ही होगा! क्या हम इस बार सुदूर देश की यात्रा कर लें? मन में अचानक प्रश्न कौंध गया। भारत का नाम सुना था, क्या हम सात समुद्र पार कर भारत जा सकेंगे, मन में संशय बना हुआ था। बुजुर्ग और युवा पक्षियों से सलाह-मशविरा किया गया।
युवाओं ने कहा कि जब हमारा सैनिक, ईराक पर युद्ध कर सकता है तो क्या हम भारत में आश्रय की तलाश नहीं कर सकते? हम में भी हवाईजहाज जितनी ताकत है, उड़ने की।
अचानक सिकन्दर याद आ गया, उसने कैसे भारत पर चढ़ाई की थी? वह भी तो आज से दो हजार वर्ष से भी पूर्व समुद्र और रेगिस्तान को पार करता हुआ भारत पहुँचा था, तो फिर हम क्यों नही? हमारे यहाँ भी 500 वर्ष पूर्व यूरोप से कोलम्बस आया था।
प्रश्न पूर्ण हुए, उत्तर केवल एक ही था कि पक्षियों में असीमित शक्ति होती है और वे पूर्ण आकाश को नापने की क्षमता रखते हैं। बस फिर क्या था, दल को संकेत मिल गए, उड़ने को तैयार हो जाओ। संकेत मिलते ही सारा दल पंक्तिबद्ध खड़ा हो गया। उन्हें कहाँ मनुष्यों की तरह सामान लादना था, बस उन्हें तो अपने दल के नेता के एक इशारे पर उड़ जाना था। वे सब उड़ चले, अपना लक्ष्य निर्धारित कर, अपनी मंजिल की ओर। युवा पक्षियों के मन में कौतुहल था, भारत को जानने की इच्छा थी, प्रश्न मन में कुलबुला रहे थे। आखिर पूछ ही लिया एक युवा पक्षी ने, कैसा है भारत?
प्रौढ़ पक्षियों के संक्षिप्त ज्ञान ने बाहर झाँकने की इच्छा जागृत की। वे बता रहे थे कि भारत एक प्राचीन देश हैं, वहाँ की जलवायु सभी प्रकृतिजन्य जीवों के अनुकूल हैं। वहाँ के पक्षियों को दूसरे देश की तलाश नहीं करनी होती। वहाँ के जंगल हरे-भरे हैं। बहुत प्रकार की वनस्पतियां वहाँ होती हैं। जंगलों में इतने फल होते हैं कि अधिकतर पक्षी वहाँ शाकाहारी हैं।
एक पक्षी ने प्रश्न कर लिया कि ये सब तुमको कैसे मालूम?
उसने कहा कि यहाँ चिड़ियाघर में भारत से पक्षी लाए जाते हैं। मुझे उनसे एकाध बार बात करने का अवसर मिला है।
फिर आपकी जानकारी ठीक ही होगी, वे सब खुश होकर बोले। यदि ऐसा अद्भुत देश हमारी धरती पर है तब तो उसे अवश्य देखना चाहिए।
सुना है कि वहाँ साइबेरिया आदि देशों से तो नियमित पक्षी जाते हैं। वो भारत से पास अवश्य हैं लेकिन हमारे हौंसले भी बुलन्द हैं। हम भी भारत की धरती को देखकर ही आएंगे। हमारे बच्चे भी हम पर गर्व करेंगे कि हमारे पूर्वज कभी भारत जाकर आए थे।
अब वे सब खुश होकर उड़ रहे थे और सम्वेत स्वरों में गा रहे थे।

एक पक्षी- जाना है उस देश जहाँ पंछी चहचाते
दूसरा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल मदमाते
तीसरा पक्षी- पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
चौथा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल बौराते।

एक पक्षी- हमने सुना है भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
दूसरा पक्षी- हमने सुना है भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
तीसरा पक्षी- जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
चौथा पक्षी- जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना है उस देश जहाँ जंगल इठलाते।

कई समुद्र पार करते हुए, आखिर एक दिन उनकी निगाहें मंदिर के गुम्बज पर पड़ी, जहाँ कतारबद्ध पक्षी बैठे थे।
शहर आ गया, भारत भूमि आ गयी, खुशी की लहर छा गयी।
एक सुंदर सी झील में, छोटा सा एक टापू, उसमें अनेक पेड़ लगे थे, उन्होंने वहीं अपना डेरा डाल दिया। झील में मछलियां भी खूब थी, तो भोजन की समस्या भी हल हो गयी। कई महिने यहाँ गुजारने थे, घौंसले बनाने शुरू हुए, कई अन्य भारतीय पक्षी भी उनके स्वागत में आ जुटे। भूरे और कृष्ण वर्ण के भारतीय पक्षी, उनके धवल स्वच्छ रंग को देख-देखकर आर्किर्षत होते, उनके साथ रहने का अवसर तलाशते। यहाँ के युवा पक्षियों ने उनकी आवाभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहाँ के स्वादिष्ट फलों को चखाया, जंगल की गंध से परिचित कराया। वे कभी बड़ के पेड़ से, कभी गूलर से, कभी आम से, कभी अमरूद से, कभी जामुन के पेड़ से फल तोड़कर लाते और उन फलों से उनको परिचित कराते। वे सब मछलियों पर निर्भर थे, उन्होंने कभी भी ये फल नहीं देखे थे। मीठे, खट्टे, तीखे फल उन्हें अच्छे लगने लगे थे। वे सारे ही इतने भांत-भांत के पेड़ों को देखकर आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कभी भी अपने जंगल में फलदार पेड़ देखे ही नहीं थे।
आखिर, एक दिन उनके वापस जाने का समय आ गया। भारत के कुछ पक्षियों ने उनसे निवेदन किया कि हम भी तुम्हारा देश देखना चाहते हैं, क्या हम तुम्हारे साथ चल सकते हैं? उन्होंने सहजता से स्वीकृति दे दी।
अमेरिकी पक्षियों के दल के पीछे-पीछे भारतीय दल मुक्त गगन में उड़ान भर रहा था। उनका मन बल्लियों उछल रहा था, वे बड़े खुश थे कि हम एक बेहद खूबसूरत देश को देखने जा रहे हैं। कुछ पक्षी कल्पना करते और सोचते कि क्यों न हम वहीं रह जाएं? हमारे यहाँ की गर्मी, पानी की समस्या से हमें निजात भी मिल जाएगी। सुना है कि वहाँ के जंगल बहुत विशाल हैं! वहाँ रेत के अंधड़ भी नहीं हैं।
लेकिन वहाँ बर्फिली आँधियां हैं।
अरे कौन सा हमें हमेशा के लिए वहाँ रहना है। फिर किसी का रहने को मन भी करेगा तो क्या हम वहाँ नहीं रह पाएंगे? वहाँ भी तो इतने पक्षी रहते हैं।
पक्षियों का दल उड़ रहा था, समुद्र की सीमा प्रारम्भ हुई। रात में विश्राम लेने के लिए एक पहाड़ी का सहारा लिया गया। अमेरिकी पक्षी समुद्र में गोता मारकर मछलियां पकड़ लाए। अब भारतीय पक्षियों के होश उड़ गए। वे मछली नहीं खाते, उनका भोजन तो फल होता था। पहाड़ के पेड़ों पर भी फल नहीं, आखिर समुद्री बेलों के फलों से ही जैसे-तैसे करके काम चलाया। लम्बी यात्रा और भोजन की समस्या उनके सामने मुँह-बाए खड़ी थी। रास्ते में शहर आने लगे और अब वे बगीचों से फल चुराने लगे, क्योंकि जंगल में ही उनका हक था और जंगल में फल नहीं थे। लम्बी थका देने वाली यात्रा, भूखे-प्यासे रहकर जैसे-तैसे कटी। सोचा अमेरिका पहुँचकर सब कुछ ठीक हो जाएगा।
आखिर एक दिन उनके सपनों का शहर अमेरिका आ ही गया। वहाँ बर्फ विदा ले चुकी थी, पेड़ों पर पीत पत्तियां, सुनहरी आभा का निर्माण कर रही थी। कहीं-कहीं कोपलें भी फूटने लगी थीं। आभास हो रहा था कि बसन्त शीघ्र ही हरितिमा को जन्म देगा। लम्बे रास्ते की थकान उनके चेहरों पर थी, भूख-प्यास से उनकी ताकत क्षीण हो गयी थी। लेकिन फिर यहाँ घने जंगलों को देखकर उनकी थकान फुर्र हो गयी और अपने छितराए जंगलों पर शर्म आने लगी। अमेरिकी पक्षी ने बताया कि बहुत जल्दी ही यहाँ हरीतिमा छा जाएगी, तब चारों तरफ केवल हरियाली होगी। तुम देखना हमारे यहाँ का जंगल, कितना विशाल है!
सभी ने पेड़ पर अपना ठिकाना बना लिया। अब भोजन की तलाश शुरू हुई। पेड़ों पर कहीं भी फल नहीं थे, एक पेड़ से दूसरे पेड़, एक जंगल से दूसरे जंगल जाते रहे, लेकिन खाने को कुछ नसीब नहीं हुआ। पत्तियां खाकर भला कितने दिन जिन्दा रहा जा सकता है? कभी चोरी-छिपे बगीचों में पहुँच जाते और वहाँ के फलों से अपना गुजारा चलाते। लेकिन वहाँ हमेशा खुद के ही शिकार होने का खतरा मंडराता रहता। एक दो बार मछली खाने का भी प्रयास किया, लेकिन भारतीय शरीर उन्हें पचा नहीं पाया। एक दिन जंगल में फलों की तलाश करते-करते उनकी आशा ने दम तोड़ दिया। आखिर समय से पहले ही उन्होंने वापस जाने का मन बना लिया।
वे आपस में बतिया रहे थे कि इतने घने जंगल, फिर भी एक भी फल नहीं! ऐसे जंगलों से तो हमारे जंगल ही अच्छे, जहाँ सारे पेड़ों पर ही फल लगा करते हैं। पंछी भी कितने कम है यहाँ, हमें भी अपने अस्तित्व का खतरा पैदा होता जा रहा है। बहेलिया यहाँ नहीं हैं, लेकिन शिकारी तो हैं, चिड़ियाघर तो हैं!
आज वे सब बहुत खुश थे, वापस जाने को कतारबद्ध खड़े थे। अपने दल के नेता के इशारे का इंतजार कर रहे थे। इशारा हुआ और वे उड़ चले भारत के आकाश की ओर। वे सब गा रहे थे, वही गीत, जो विदेशी पक्षियों ने बनाया था। एक-एक पक्षी अपने स्वर में गीत गा रहा था और एक लम्बी यात्रा पर इस उत्साह से उड़ा जा रहा था कि मैं अपने देश में वापस लौट रहा हूँ।

पक्षी गा रहे थे -
जाना अपने देश जहाँ हम मिलजुल गाते
जाना अपने देश जहाँ जंगल चहचाते
पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
जाना अपने देश जहाँ जंगल मदमाते।

भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना अपने देश जहाँ जंगल इठलाते।

भारत में तो जंगल में भी भँवर उड़ा करते हैं
भारत में तो पेड़ों से भी गंध बहा करती है
मद झरते, गदराए, बौराए पेड़ों से
उड़ते प्रतिपल, कण पराग के रहते हैं
देखो मधुमक्खी भी शहद बनाया करती
जाना अपने देश जहाँ जंगल बौराते।



नोट- हमें यह बताते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि डॉ॰ अजित गुप्ता की इस यात्रा-संस्मरण की यह शृंखला जल्द ही मुद्रित संस्करण के रूप में उपलब्ध होगी, जिसे हिन्द-युग्म अपने आने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम में लोकार्पित करेगा।

Saturday, April 25, 2009

सोने का पिंजर (12)

बारहवां अध्याय

मैंने पचास दिन तक अमेरिका तुझे देखा है, तेरे यहाँ की मानसिकता को अनुभव किया है। लेकिन केवल पचास दिनों की ही मैं बात नहीं कर रही है। मैंने तो तुम्हें तभी से जानना शुरू कर दिया था तब बेटा तुम्हारे आकर्षण से बँधा तुम्हारे यहाँ पढ़ने गया था। सितम्बर 2001 से तुम्हें मैंने जाना और धीरे-धीरे पहचाना। तभी से अपने आसपास, घर-बार में देखती रही हूँ तुम्हारे विभिन्न रूप और साथ ही भारतीय युवा-पीढ़ी का एक नवीन रूप। जो तुम पर आसक्त है। तुम पर मोहित है। भारत के बंधनों से दूर वे खुली हवा में सांस ले रहे हैं। हमारे यहाँ तो ठेठ गाँव से निकल कर आप कितनी ही दूर किसी भी महानगर में जाकर बस जाओ, आपके घरवाले और रिश्तेदार घूमते हुए आ ही जाएँगे। यदि आप दर्शनीय स्थानों पर रह रहे हैं तब फिर तो एक बहाना ही रहता है कि अरे अब तो अपना बेटा, भाई, भतीजा वहाँ रहता है, चलो उससे मिल भी आएँगे और जगह देख भी आएँगो। लेकिन अमेरिका जाना इतना आसान नहीं!
लेकिन अब अमेरिका भी तो कहाँ दूर रह गया है? अब तो माता-पिता और रिश्तेदार वहाँ भी पहुँचने लगे हैं। मुझे एक कहानी याद आ रही है। राजस्थान के एक राजा, युद्ध में हार जाते हैं। मरने के भय से वापस अपने शहर लौट आते हैं। लेकिन रानी इस कायरता को बर्दास्त नहीं कर पाती। वे शहर के दरवाजे बन्द करवा देती है। राजा सहित सारी फौज कई दिनों तक शहर के बाहर ही पड़ी रहती है।
आखिर एक दिन राजा की माँ आदेश देती है कि नगर के दरवाजे खोल दिए जाएं और मेरे बेटे को सम्मान सहित राजमहल में प्रवेश दिया जाए।
दरवाजे खुल गए और राजा रनिवास में आ गए।
माँ ने बहु से कहा कि बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद युद्ध से लौटा है, जाओ इसके लिए हलुवा बनाकर लाओ।
रानी हलुवा बनाने लगी। वह गुस्से में तो थी ही। कढ़ाई में हलुवे को जोर-जोर से पलटे से हिला रही थी।
माँ वहीं से चिल्लाई, बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद घर लौटा है। वहाँ लोहे से लोहे के टकराने की आवाज सुनकर माँ के आँचल में छिपने चला आया था, यहाँ भी तू लोहे से लोहा टकरायेगी तो फिर बेचारा अब छिपने के लिए कहाँ जाएँगा?
राजा तत्काल अपनी फौज लेकर रण के लिए चला गया।
हमारी नवीन पीढ़ी भी गृह-युद्ध से बचने के लिए तुम्हारे आँचल में शरण ली है, यदि अब पुनः उनके परिवारजन वहाँ भी जा पहुँचे तो फिर बेचारे किसकी शरण में जाएँगे? मेरा तो तुम से यही कहना है कि तुम हमारी राजमाता की तरह मन बनना। उन्हें कभी अपना कर्तव्य याद मत दिलाना। नहीं तो बेचारे वे कहाँ जाएँगे? उन्होंने यहाँ एक धारणा बना रखी है कि वे बहुत खुश है, खुशहाल भी हैं बस इसे बनाए रखना। भारत तो वैसे भी बूढ़ा हो चुका है। हजारों वर्षों से जी रहा है। आखिर कब तक और जीएगा? कभी तो इसका भी अन्त होना ही चाहिए न! तुम अभी जवान हो, अतः दुनिया के जवानों को अपने यहाँ एकत्र करो। अपना उत्थान करो। भारत के बूढ़ों का क्या है, उन्हें तो वैसे भी एक दिन मरना ही है।
भारत में राजस्थान ऐसा प्रदेश है जहाँ रेत के गुबार थे। पानी का नामोनिशान नहीं। फिर भी सेठाना था, लोग बड़ी-बड़ी हवेलियाँ बनाते थे। 10-20 कमरे तो आम बात थी, बड़े लोगों की हवेली में 100-100 कमरे हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे युवा-पीढ़ी को लगा कि यदि हम इन रेत के धोरों से बाहर निकलेंगे तो ज्यादा रईस हो जाएँगे और वे निकल गए, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास आदि बड़े महानगरों में। घर में बड़ी-बड़ी हवेली और मुम्बई में एक छोटी सी चाल! लेकिन जब गाँव लौटकर आते तो उनके लिए बग्गी लगती, ड्रेस वाला कोचवान सजता। धीरे-धीरे आकर्षण बढ़ा और राजस्थान के ये रेतीले धोरे रिक्त हो गए युवा-पीढ़ी से। रह गयी सुनसान, बाट जोहती हवेलियाँ। हवेलियों में उनके बूढ़े। शुरू-शुरू में तो बेचारा अकेले ही जाता था, अपनी नई नवेली दुल्हन को भी हवेली में ही छोड़कर जाता था। लेकिन फिर दुल्हन भी साथ ही जाने लगी। हवेली छोड़कर वो भी एक या दो कमरे के फ्‍लेट में रहने लगी।
मैं एक बार ऐसे ही एक सेठाने में गयी। मेरी एक सहेली वहाँ ब्याह करके गयी थी। देखा बड़ी सी हवेली है, बड़े-बड़े कमरे हैं। एक बैठक खाने में मोटे-मोटे गद्दे बिछे हैं, उनपर सफेद दूधिया चादरे बिछी हैं। दूसरे बैठक खाने में सोफे लगे हैं, गलीचे बिछे हैं। हमारे लिए बड़े से थाल में नाश्ता आया। जिसमें नाना प्रकार के व्यंजन थे। हवेली के पीछे धोबीखाना था, बड़ी सी गाड़ी का गेराज था। नौकरों के रहने की जगह थी। दिन में बहु-बेटियाँ बाजार में नहीं निकलती, रात होगी तब गाड़ी में पर्दे लगेंगे और फिर बहु-बेटियाँ शहर देखेंगी। हम अभिभूत थे, वो सेठाना देखकर। फिर महानगरों में भी इन्हीं सेठों का जीवन देखने का अवसर मिला। कोई चाल में रह रहा था और कोई दो कमरों के लेट में। ऐसी कोठियाँ तो शायद वहाँ टाटा-बिरला के पास भी न हो!
लेकिन अब वे हवेलियाँ उजड़ गयी हैं। रह गए हैं चैकीदार या किराएदार। मालिक कभी-कभार आते हैं। घर में जब विवाह का प्रसंग उपस्थित होता है तब ही गाँव की हवेली याद आती है। महानगर में तो शादी करें तो कहाँ करें? फिर दादा लोग अपना टेक्स वसूलने भी आ जाते हैं। इसलिए ये हवेलियाँ तभी सजती हैं और तभी इनमें चहल-पहल होती है। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो सेठों के बच्चे नहीं गए, वे तो हमारे जैसे आम आदमी के बच्चे हैं। लेकिन अब वे आम घर भी सूने हो गए हैं। पहले राजस्थान में ही हवेलियाँ सूनी पड़ी थी लेकिन अब तो पूरे भारत के ही घर सूने हो रहे हैं।
बूढ़ों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। वे बेचारे नौकरों के भरोसे रह रहे हैं और नौकर भी मौका देखकर उनका गला काट लेते हैं। रोज ही की खबर है, बूढ़ों की हत्या। सरकार भी क्या तो करे? कोई भी नहीं समझ पा रहा कि जिस देश ने दुनिया को ही एक परिवार के रूप में माना आज वहीं परिवार संस्था टूटती जा रही है। अब भारत की सरकारें भी कानून बना रही है, उनके पालन-पोषण का। कैसा जमाना आ गया है, पहले मेरे घर में भी ताले नहीं हुआ करते थे। अब तो मुझे रोज ही नए ताले खरीदने पड़ते हैं। वे हवेलियां कम से कम वार-त्यौहार, शादी-ब्याह के अवसर पर तो गूँजती हैं, लेकिन यहाँ तो सारे घर ही सूने हो गए। किसी के भी घर चले जाओ, एकेले बूढ़े माता-पिता बाहर बराण्डे में बैठे मिलेंगे। वे खोज रहे हैं उस आवाज को जो उन्हें पुकार ले। उनसे बतिया ले।
अमेरिका तुम वो अप्सरा हो, जिसके पीछे हमारी नौजवान पीढ़ी भाग रही है। वे तुम्हें पाना चाहती है, तुम में रमना चाहती है। हमारे यहाँ से श्रवण कुमार, राम, भीष्म जैसे पुत्रों की परम्परा समाप्त हो गयी है। अब उन्हें वे भी मिथक मानने लगे हैं। उन्हें तो बस याद है केवल तुम्हारा भौतिक स्वरूप। वे उसे पाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन फिर भी मेरा तुझको सलाम! कम से कम तुमने हमारी पीढ़ी को अहंकार से तो निजात दिला दी। पुरुष और महिला के अन्तर को तुमने इक सीमा तक समाप्त भी कर दिया। मुझे तो गर्व है कि अब हमारी महिलाएं भी वहाँ पति की तरह रहती हैं।
अमेरिका तुझे मेरा नमन! तेरे भौतिक स्वरूप को नमन! तेरे यहाँ बसी हमारी भारतीय पीढ़ी को नमन! नमन! किसलिए?
नमन इसलिए कि भारत अब भारत नहीं रहा। लेकिन वहाँ बसे भारतीयों के मन में भारत जन्म ले रहा है। हमारे त्यौहार बस एक परम्परा बनकर रह गये हैं जबकि तुम्हारे यहाँ वे उत्सव बने हुए हैं। युवा-पीढ़ी के आकर्षण के कारण बड़े लोगों का आकर्षण भी तुम्हारे प्रति बढ़ा है। अतः वे भी अब तुम्हें देखने जाने लगे हैं और तुम्हारा सच बाहर आने लगा है। जो कल तक तुमने हमारे अन्दर हीन भावना भरी थी अब वो मिटने लगी है। तुम्हारे यहाँ से आए माता-पिता अब कहने लगे हैं कि नहीं सुख तो भारत में ही है। जुबान का स्वाद तो भारत में ही है। तब मैं अपनी नवी पीढ़ी से कहती हूँ कि जब तुम्हें वहाँ अपनी खुशबू, अपने स्वाद की याद आए तब तुम भारत में आना। हमारे लिए नहीं आना। जब भी आओ स्वयं के लिए ही आना, तभी तुम भारत की कद्र कर सकोंगे। मेरी ये चंद पंक्तियां उन सभी को समर्पित हैं -

पीर गंध की जगने पर
हूक उठे तब तुम आना
मन के डगमग होने पर
अपने देश में तुम आना।

सन्नाटा पसरे मन में
दस्तक कोई दे न सके
चींचीं चिड़िया की सुनने
अपने देश में तुम आना।

घर के गलियारे सूने
ना ही गाड़ी की पींपीं
याद जगे कोलाहल की
अपने देश में तुम आना।

शोख रंगों की चाहत हो
फीके रंग से मन धापे
रंगबिरंगी चूंदड़ पाने
अपने देश में तुम आना।

सौंधी मिट्टी, मीठी रोटी
अपना गन्ना, खट्टी इमली
मांगे जीभ तुम्हारी जब
अपने देश में तुम आना।

बेगानापन खल जाए
याद सताए अपनों की
सबकुछ छोड़ छाड़कर तब
अपने देश में तुम आना।

कोई सैनिक दिख जाए
मौल पूछना धरती का
मिट्टी का कर्ज चुकाने तब
अपने देश में तुम आना।

वीराना पसरे घर में
दिख जाए बूढ़ी आँखें
अपनी ठोर ढूंढने तब
अपने देश में तुम आना।

तेरे वैभव से लौटने के बाद मेरी निगाहें पक्षियों पर चले गयी। यहाँ की गुलाबी सर्दियों में हजारों पक्षी विदेश से भारत चले आते हैं। उन्हें किसने बताया कि भारत स्वर्ग है? लेकिन उन्होंने खोज लिया। मुझे लगा कि हमारे पक्षी भी तो कभी चाहते होंगे, तेरे जैसे देशों का वैभव देखना। तो मैंने एक कल्पना की। तू देख कितना सच है और कितनी कल्पना है?

Tuesday, December 30, 2008

दिल्ली की दोपहर में चार घंटे हिंदी के नाम....

हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८ के अतिथिगण


डर की सुबह
नोएडा से जब हम अपने कंधे पर हिंद-युग्म का झोला लादे रूममेट नसीम के साथ 11 बजे बस में आईटीओ के लिए बैठे तो मन में कुलबुलाहट शुरू हो गयी थी…कई सारे डर थे...एक तो दिल्ली की सर्दी, साल का आखिरी इतवार और वो भी हिंदी का कोई कार्यक्रम....कितने लोग आ पायेंगे....क्या पता मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव ही नहीं आयें...नसीम भाई ने हौसला दिया....कहा, कम लोग ही सही, जो लोग भी आयेंगे, वो असल में हिंद-युग्म के प्रति इमानदार होंगे...आनन-फानन में आटीओ चौक पर पराठे खाकर बढ़ चले हिंदी भवन की ओर...

डेढ बजे से पहले नहीं घुसने देंगे....
भारत की सबसे मज़ेदार बात ये है कि जब तक आप “बड़े” आदमी जैसे दिखते नहीं, आपको कोई भाव नहीं देता...जब हम हिंदी भवन के गेट पर पहुंचे तो दरबान ने हमें देखते ही रोक दिया...कहा, प्रोग्राम दो बजे से है, बारह बजे क्यूं आ गये....जब हमने बताया कि प्रोग्राम के आयोजक हम ही हैं तो उसे भरोसा ही नहीं हुआ...हमें शैलेश जी के आने तक का इंतज़ार करना पड़ा....चूंकि, शैलेश भी मुझे “बड़े” आदमी जैसे दिखते नहीं, तो मेरा डर कम नहीं हुआ कि कहीं गार्ड उन्हें भी कोई नसीहत न दे दे... ख़ैर, शैलेश आये रुपम चोपड़ा की कार में और मुझे तसल्ली मिली की कोई तो “बड़ा” आदमी पहुंचा...तब तक हम हिंदी-भवन की बाहरी दीवार पर कूद-फांद कर हिंद-युग्म का बड़ा सा बैनर टांग चुके थे... बैनर पर दूर से हिंद-युग्म-“हिंदी को खून चाहिए” देखकर मन रोमांच से भर गया था....बैनर टांगने में हमें मदद मिली पंकज से जो वहां प्रोजेक्टर लगाने के लिए नियत समय पर पहुंच गया था... बहरहाल, शैलेश जी ने भी थोड़ी मशक्कत के बाद एक बजे ही अंदर जाने की इजाज़त ले ही ली....


गिने-चुने लोग
धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष में जब मैं पहुंचा तो हिंद-युग्म के भी गिने-चुने लोग ही साथ थे...कार्यक्रम शुरू होने में अब भी 45 मिनट थे....शैलेश प्रो़जेक्टर पर स्लाइड शो की तैयारी में लग गये और हम एक-एक कर आने वाले आगंतुकों के अभिवादन में जुटे थे...सुमित भारद्वाज, तपन शर्मा अपनी छोटी-सी टोली लेकर आ गये थे और अपने अभियान में लग गये थे...लोगों की संख्या अब बढ़ने लगी थी और हमारी धड़कनें भी...दो बजे तक स्थिति ये थी कि आधे से ज़्यादा कुर्सियां भर गयी थीं..बस, एक भी मुख्य अतिथि नहीं पहुंचे थे...हम रेडियो के कार्यक्रमों की तरह श्रोताओं को हिंद-युग्म के स्वरबद्ध गीत सुनवाए जा रहे थे और आये हुए लोगों को बहला रहे थे...


वो घड़ी आ गई…
शैलेश जी से गहन विमर्श के बाद तय हुआ कि कोई आए न आए, पौने तीन बजे कार्यक्रम शुरू कर देंगे...ठीक पौने तीन बजे जब मैं मंच पर पहली लाइन बोलने के लिए सांसें भर रहा था, कक्ष के दरवाज़े पर बैसाखी के सहारे एक शख्स हमारी ओर बढ़ रहा था..मैंने माइक छोड़ा और उनकी अगवानी में दौड़ पड़ा....वो राजेंद्र यादव थे...लगा, कि सारा आकाश हिंद-युग्म के आंगन में उतर आया हो....


कलम आज उनकी जय बोल
मेरे कार्यक्रम के शुरू करने और श्याम सखा “श्याम” जी को आगे की कमान सौंपने के अंतराल में लगभग सभी कुर्सियां भर चुकी थीं...आये हुए लोगों में कुछ तो जानने वाले थे, ज़्यादातर, पहली बार हिंद-युग्म से मिले थे...उनका आना इस बात पर मुहर लगा रहा था कि अगले चार घंटों तक वो हमें बस सुनने ही आये हैं, कोई रस्म निभाने के लिए नहीं....नाज़िम नक़वी, जो हमसे हाल ही में जुड़े हैं, राजेंद्र यादव के बाद आये....फोन पर हमने उन्हें ढाई बजे याद दिलाया कि प्रोग्राम बोरिंग भी हो तो भी घर का है, सो आना ही पड़ेगा..

हिंद-युग्म ने पिछली बार कोई बड़ा कार्यक्रम पिछली फरवरी में कराया था...प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में “पहला सुर का विमोचन”...तब के हिंद-युग्म के कई नामी चेहरे ग़ायब थे...कई नए चेहरे दुगने जोश के साथ जुटे थे...शिवानी सिंह, प्रेमचंद सहजवाला चुपचाप हमारी रवानी देखकर संतुष्ट थे...सुनीता चोटिया शालीन श्रोता की तरह पूरे कार्यक्रम में बैठी रहीं और मन ही मन वाहवाही भी देती रहीं....नीलम मिश्रा व शोभा जी न सिर्फ बाल उद्यान संभाल रही हैं, बल्कि हिंद-युग्म की हालिया ऊर्जा का केंद्र भी हैं....गौरव, अभिषेक, मनुज अलग ही मोरचा संभाले हुए थे.... किस-किस का नाम लें...क्या बताएं कि कार्यक्रम का सबसे सम्मानित पाठक आलोक “साहिल” आखिरी समय तक गुलदस्ते लाने में लगा हुआ था....सबको सलाम करने का जी करता है...सजीव सारथी, सुनीता यादव आदि की कमी बेहद खल रही थी...

वाह ! शैलेश.....
शैलेश एक अलग ही मूड में दिख रहे थे..उनके चेहरे पर आम तौर से ज़्यादा गंभीरता थी...उन्होंने जब ब्लॉगिंग की क्लास लेनी शुरू की तो राजेंद्र यादव भी सीखने के मूड में आ गये....हालांकि, मैं चाहता था कि शैलेश कम देर तक ही बोलें मगर लोगों की रुचि देखकर शैलेश बोलते गये और समय का पता ही नहीं चला...बाद में मैं भी पूरे ध्यान से उन्हें सुनने लगा और काफी कुछ सीखने को मिला...

उम्दा कवि, उम्दा श्रोता, उम्दा संचालक
हिंद-युग्म मंच के अधिकांश कवि किसी भी बड़े काव्य मंच के नियमित चेहरे नहीं है...फिर भी जब वो कविताएं पढ़ते हैं तो कहीं से नहीं लगता कि वो साल में इक्का-दुक्का बार ही पढ़ने के लिए मंच पर उतरे हैं....गौरव, पावस, रूपम, मनुज आदि जब कविताएं पढ़ रहे थे, तो मैं दर्शक दीर्घा को निहार रहा था...सब लोग डूब कर सुन रहे थे...नाज़िम जी आखिर में आए तो सब तालियां बटोर कर ले गये....”अंकल जैसे लोग थे सब....” मेरे दिल में अब तक चुभ रहा है...मज़े की बात ये रही कि पूरे कार्यक्रम के दौरान राजेंद्र यादव भी कवियों को देखते रहे, सुनते रहे और डूबते-उतरते रहे... श्याम जी का संचालन भी सबका दिल जीत रहा था...लग ही नहीं रहा था कि वो कार्यक्रम के ठीक पहले दिल्ली पहुंचे हैं …पूरे कार्यक्रम में मैं उनसे संचालन के गुर सीखता रहा और जहां ज़रूरत पड़ी, उन्हें आवश्यक निर्देश भी देता रहा...

गूंज उठा "सारा आकाश"
ठीक छह बजे राजेंद्र जी के आगे माइक पहुंचा और उन्होंने बोलना शुरू किया...उनको कभी पहले सामने सुनने का मौका नहीं मिला था...उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें एक बात साफ थी..उन्होंने तीन घंटे तक हमें बड़े ध्यान से सुना था....उन्होंने बड़ी इमानदारी से अपनी तकनीकी अक्षमता को स्वीकारा और हिंद-युग्म को ये जिम्मा भी दिया कि उन्हें हम तकनीक से जोड़ सकें...फिर बड़ी महीन बातें भी की...हमें ये निर्देश भी दिया कि तकनीक में आधुनिकता के साथ-साथ विचारों में भी आधुनिकता समय की मांग है....कई और बातें भी कहीं जो वहां कई लोगों को नाराज़ करने के लिए काफ़ी था....पर, ये तो उनका परिचित अंदाज़ है....दस गालियां और ढेर सारी तालियां बटोरे बग़ैर तो वो किसी भी कार्यक्रम से रुखसत नहीं होते...
बहरहाल, हिंद-युग्म के लिए राजेंद्र यादव का आना एक सुखद संयोग था....किताबी साहित्य का पुरोधा तकनीक के कर्णधारों की सभा में आया था...एक सेतु बनकर, जो कई और साहित्यकारों को भी ब्लॉगों की तरफ़ मुड़ने को बाध्य करेगा....


इंतिहां और भी हैं...
कार्यक्रम के बीच में कई बार हमें कुर्सियां बढ़ानी पड़ी...कार्यक्रम के आखिर में नाश्ते के पैकेट भी कम पड़ गये...ये सब हमारे लिए खुशी की बात है...इतने शुभचिंतक आये कि वो हमसे किसी भी विशेष सम्मान की अपेक्षा लेकर नहीं आये थे...जाते-जाते वो बस मुझे, शैलेश या हिंद-युग्म के किसी और सदस्य को मिलकर पीठ थपथपाकर ही गये...गज़ल की किताबें बांट रहे दरवेश भारती हों या अपनी पैनी नज़र रखे हिंद-युग्म के कार्टूनिस्ट मनु बेतख्खल्लुस, सबके सब हिंद-युग्म के कार्यक्रम में पहली बार आये थे मगर आये तो हमारे होकर रह गये....

मुझे लगता है कि अगला साल हिंदयुग्म के लिए मील का पत्थर साबित होगा...हम अपने साथ कई लोगों को जोड़ चुके हैं....अब बारी है हिंदी की मशाल सबके हाथों में थमाने का....ताकि, तकनीक और साहित्य की हर विधा से हिंदी जुड़ सके.....सबको महसूस हो कि हिंदी की बात करने वाले लोग झोलाछाप नहीं हैं..उनके पास विज़न है और हिंदी को सर्वप्रिय बनाने का माद्दा भी....

निखिल आनंद गिरि


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