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Thursday, July 01, 2010

गर्व से कहो हम वर्जिन (नहीं) हैं...

हाल ही में किसी अंग्रेज़ी अखबार में एक ख़बर पढी कि पाकिस्तान की आधुनिक सड़कों पर कुछ अलग किस्म के बैनर और होर्डिंग्स इन दिनों खूब दिखने लगे हैं । इन होर्डिंग्स के ज़रिए महिलाओं को लुभाने की कोशिश की जा रही है। ये विज्ञापन हैं चिकित्सा विज्ञान द्वारा वर्जिनिटी बचाए रखने के तरीकों के !  हाइमन सर्जरी या हाइमनोप्लास्टी तकनीक के ज़रिए उन महिलाओं का कौमार्य यानी वर्जिनिटी बरकरार रखने में मदद मिलती है जो शादी के पहले सेक्स संबंध बनाती हैं और चाहती हैं कि उनके संबंधों का पता उसके पति को न चले ताकि वैवाहिक जीवन में कोई बाधा न आए । ऐसे में हाइमन सर्जरी तकनीक 40-50 हज़ार रुपये में ' कुंवारेपन' की गारंटी देती है। एक तरह से रुढ़िवादी देशों में ये तकनीक महिलाओं के लिए हथियार की तरह है जो सेक्स की आज़ादी भी ले सकती हैं और फिर सामान्य वैवाहिक जीवन भी गुज़ार सकती हैं। बाद में जब कुछ साथियों से पूछा तो पाया कि भारत में भी ये तकनीक ठीकठाक लोकप्रिय है। मुझे इसके बारे में पता नहीं था। (और न ही इसका कोई आंकड़ा कहीं से मिल पाया है)
इसीलिए जानकर हैरत भी हुई और उत्सुकता भी। हैरत इसीलिए कि क्या सचमुच कट्टर, तालिबानी (या फिर भारत जैसे रुढिवादी)देशों की महिलाएं सेक्स को लेकर इतनी सजग हो गई हैं कि वो अपनी पसंद से संबंध भी बनाएं और फिर बाद में दकियानूसी सोच वाले समाज से बचाकर इस सच पर पर्दा डाल दें?  उत्सुकता इसीलिए कि क्या सेक्स सचमुच इतना 'आसान' और  'हल्का' विषय हो गया है कि  जब चाहा किया और फिर भुला  दिया ।  पता नहीं।
कुछ महीने पहले मध्यप्रदेश के शहडोल में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने कन्यादान योजना के तहत एक सामूहिक विवाह का आयोजन किया था। शादी से ठीक पहले मंडप से दुल्हनों को उठाकर मेडिकल टेस्ट करा दिया गया । ये टेस्ट कौमार्य परीक्षण का था। मतलब, ये जांचने की कोशिश कि कौन-सी लड़की वर्जिन है और कौन नहीं ! मुझे नहीं मालूम उस टेस्ट के बाद उन जोड़ों का क्या हुआ। मुझे नहीं मालूम उनमें से कितनी लड़कियों ने इस कौमार्य परीक्षण को समझा भी होगा। और कितनों को हाइमनोप्लास्टी जैसी मेडिकल तकनीक के बारे में पता होगा जो इस परीक्षण से पहले वो करवा चुकी होंगी। मगर, इतना मालूम है कि उस परीक्षण के लिए सिर्फ दुल्हनें ही आई थीं, दूल्हे नहीं।

सवाल ये है कि वर्जिनिटी को लेकर सारी मुश्किलें लड़कियों से ही क्यों जुड़ी हैं। क्या लड़कों को वर्जिनिटी छिपाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। क्या उन्हें मालूम होता है कि वर्जिनिटी से जुड़ा सवाल भारत में अब भी लड़की (पत्नी) शायद ही लड़के (पति)  से पूछे। या फिर, उन्हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि लड़की उसके 'चरित्र' के बारे में क्या सोचती है। वैसे भी लड़कों की वर्जिनिटी मापने का कोई तरीका शायद है भी नहीं । तो उन्हें छिपाने की ज़रूरत भी क्या है।
दरअसल, भारत जैसे देश में समाज का दोहरापन शुरू से रहा है। लड़के और लड़की के लिए नैतिक मापदंड अलग-अलग हैं। देहरादून की एक दोस्त (महिला) से इस बारे में राय ली तो उसने कहा कि शहर में हर लड़का चाहता है कि एक लड़की का साथ उसे ज़रूर मिले। लड़की जो खुलकर बातें कर सके, सब कुछ शेयर कर सके, मतलब 'इज़ी-गोइंग गर्ल' (ये मेरी दोस्त का इजाद किया हुआ शब्द है)। मगर, जब शादी की बात आएगी तो कैसी भी लड़की चल जाएगी, सिवाय उस इज़ी-गोइंग  गर्ल के ! 
ये लड़कियों के लिए समाज का पैमाना है जो उसकी सब खूबियों को एक झटके में दरकिनार कर सकता है, अगर उसे ये पता चल जाए कि 'लड़की' ने शादी से पहले 'आज़ादी' का अपराध किया है।
फिर, ऐसे समाज में मेडिकल साइंस का सहारा बुरा विकल्प तो नहीं है। क्या आधुनिक समाज का रास्ता देह की आज़ादी से होकर नहीं जाता है?  आप क्या सोचते हैं?

निखिल आनंद गिरि