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Tuesday, August 10, 2010

दिल्ली का बर्थडे और बिगड़ने की ख्वाहिश...

2005 था शायद....2005 ही था...5 अक्टूबर 2005...दिल्ली आए ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था....नए-नए दोस्तों में दो-चार ‘अच्छे’ दोस्त बन गए थे...उन्हीं में से एक का जन्मदिन था...वो दिल्ली का ही रहनेवाला है.....मेरे कम ही दोस्त ऐसे हैं जिनके पिताओं ने दिल्ली में अपना घर बना लिया और यहीं के हैं....उनमें से एक था..उसके घर पर बर्थडे की पार्टी थी...हम भी आमंत्रित थे...मेरे लिए दिल्ली भी नई थी और किसी बर्थडे की पार्टी भी....अच्छा लग रहा था कि ‘दिल्ली’ के किसी दोस्त का बर्थडे है और वहां बुलाया गया हूं....हम दो-तीन दोस्त इकट्ठे घर पहुंचे तो देखा पार्टी शुरू नहीं हुई है....कुछ और दोस्त पहुंचे हुए हैं....तीन-चार लड़कियां भी थीं...मैं उन्हें जानता था...ज़्यादा तो नहीं, मगर पहचान भर दोस्ती थी....ये नहीं जानता था कि उनसे किसी एक ही पार्टी में मुलाकात होगी....घर में और कोई था नहीं.....दोस्त के मां-पिताजी शायद पुणे गए हुए थे....बस हम सात-आठ दोस्त ही थे और एक नौकर....
पार्टी शुरु हुई....दोस्तों में आपसी परिचय हुआ, थोड़ा हंसी-मज़ाक और फिर शराब परोसी गई...मैं पीता नहीं हूं, तो बाक़ी मुझे चौंककर देखने लगे...एक और दोस्त और नहीं पीता था...हम दोनों ने कोल्ड ड्रिंक पी और संतुष्ट रहे...फिर दो लड़कियों ने अपना गिफ्ट निकाला और उसे दिया....सबके सामने गिफ्ट खोलने को कहा गया....दोस्त ने खोला तो कांडम का डिब्बा था.....दस का पैक...मैंने कांडम पहली बार तभी देखा था, इतना नज़दीक से...थोडा संकोच हो रहा था मगर अचानक सबके सामने ‘भोला’ बनता तो बेवकूफी होती.....ऐसे बैठा रहा जैसे बडी नॉर्मल-सी बात हो मेरे लिए....हालांकि, कांडम को लेकर बहुत ज़्यादा सोचा नहीं था इससे पहले और ये तो बिल्कुल ही नहीं सोचा था कि दो लड़कियां एक दोस्त को कांडम भी गिफ्ट कर सकती हैं...फिर आपसी मज़ाक शुरू हुआ....दोस्त से कहा गया कि वो कांडम खोले और लगाकर दिखाए....फिर किसी तरह से ये सब टाला गया और हंसी-मज़ाक की वजहें बदलती रहीं...मेरे लिए ये सब बिल्कुल नया था...मैं अब तक बहुत असहज महसूस कर चुका था....इन सबके बीच शराब का नशा परवान पर था और औपचारिक हंसी-मज़ाक अब गाली-गलौज तक पहुंच चुका था....किसी दोस्त ने मुझसे भी दो-चार बातें कहीं जो मुझे अच्छी नहीं लगीं....उस रात किसी को वापस नहीं जाना था....खा-पीकर वहीं सो जाना था और सुबह अपने-अपने घर जाना था....ये मेरे पिछले पार्टी अनुभवों से अलग था...मुझे ये बर्दाश्त नहीं हुआ.....जब सब पी लिए और नींद में जाने लगे तो मैं ढाई बजे रात को नौकर से दरवाज़ा खुलवाकर उसके घर से निकल गया...एक और दोस्त भी साथ में था जिसने पी नहीं थी....हम जैसे-तैसे वापस अपने कमरे तक पहुंच गए और उस रात को भूलने की कोशिश करने लगे..उस रात को मैं न चाहते हुए भी बिगड़ गया था...
वो रात भूल भी चुका था कि अचानक पांच साल बाद फिर याद आ गई....9 अगस्त मेरा जन्मदिन होता है...8 अगस्त की रात से इतने फोन कॉल्स आते हैं कि बैटरी चार्ज में लगाकर ही बात करनी पड़ती है...एकाध गिफ्ट भी मिलते हैं...डायरी, पेन, किताबें, शर्ट, डियोड्रेंट वगैरह....इस बार दो कांडम मिले...ऑफिस के एक साथी ने दिया....बाद में कहा गया कि मज़ाक है....शुक्र है, मुझे कांडम खोलकर दिखाने और पहनने के लिए नहीं कहा गया था...इस बार ये मज़ाक बुरा नहीं लगा.....अच्छा लगा...शायद उम्र का असर हो....शायद दिल्ली के तोहफों की आदत लग गई हो....लाख प्रचार देख लें बिंदास बोल, मगर कांडम से शर्म जुड़ी हुई है....हाथ में कांडम लेकर बहुत अच्छा नहीं लगता....जन्मदिन के दिन भी नहीं....मज़ाक के तौर पर तो बिल्कुल भी नहीं...कांडम कोई मज़ाक की चीज़ तो है नहीं...शायद ये अहसास दिलाने की चीज़ है कि जन्मदिन बड़ा होने के लिए होते हैं...
खैर, जन्मदिन से जुड़ी कई यादें हैं....कांडम दिल्ली से जुड़ी हुई याद है...सबसे अलग.....जब स्कूल में था तो एक दोस्त ने जन्मदिन पर एक कैसेट गिफ्ट किया था....कुमार सानू की आवाज़ में किशोर कुमार के हिट गाने....कई दिनों तक संभाल कर रखा....पहला गाना था ‘समझौता ग़मों से कर लो, समझौता....’..फिर एक दिन वो कैसेट टूट गई.....मुझे बुरा लगा था..वो बुरा लगना याद है अब तक....वो गाना भी कभी भूल नहीं पाया....न ही वो लड़की जिसने कैसेट दी थी....उस लड़की से पूछूंगा, इस जन्मदिन पर याद क्यों नहीं किया.... क्या मुझे गिफ्ट नहीं दोगी इस बार....कैसेट न सही, कांडम ही सही....मज़ाक में ही....प्लीज़...दिल्ली के बर्थडे में बिगड़ना ज़रूरी-है....इस रात को चाहकर भी बिगड़ नहीं पाया.....


निखिल आनंद गिरि

Thursday, April 23, 2009

मुसलमान बेआवाज़ क्यों

यह देख कर अफसोस होता है कि केरल में तो मुसलमानों का राजनीतिक संगठन है, पर अन्य राज्यों में नहीं। चुनावों के दौरान हमेशा यह सवाल उठता है कि मुसलमान किधर जाएंगे। सबका अपना-अपना अनुमान होता है और अपने-अपने तर्क। खुद मुसलमान नहीं बोलते कि वे किस दल का साथ देंगे और क्यों। अपना संगठन होने का एक और फायदा यह है कि वे विभिन्न दलों से मुसलमानों के हित में मोलभाव भी कर सकते हैं। मोलभाव में कोई बुराई नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में तरह-तरह के दबाव समूह काम करते ही हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

केरल में मुस्लिम लीग है। वह आम तौर पर वाम मोर्चे के साथ होती है। केरल में मुस्लिम लीग के बने रहने तथा राजनीतिक सफलता प्राप्त करने के दो मुख्य कारण हैं। एक कारण यह है कि वहाँ कई चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ मुसलमान बहुमत में हैं या स्थनीय आबादी का बड़ा हिस्सा हैं। दूसरे, वाम मोर्चे का अंग होने के कारण वामपंथी दल यह खयाल रखते हैं कि मुस्लिम लीग कुछ सीटों पर विजय हासिल करे। एक तीसरा कारण यह भी है कि इस प्रगतिशील राज्य में मुस्लिम तबके के प्रति कोई असामान्य दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता। जैसे ईसाई समाज का सामान्य और स्वीकृत अंग हैं, वैसे ही मुसलमान भी। किसी भी अच्छे समाज में ऐसा ही होना चाहिए।

उत्तर भारत में ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि इसी क्षेत्र में मुसलमानों की सबसे ज्यादा सांसत है। वे न केवल अपेक्षया गरीब और कम पढ़े-लिखे हैं, बल्कि सामाजिक स्तर पर उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनका कोई राजनीतिक संगठन नहीं है। भाजपा को छोड़ कर सभी दल उन्हें अपनी ओर खींचने तथा उनका प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। लेकिन इससे उनकी किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। हाँ, यह जरूर होता है कुछ मुसलमान नेता मंत्री बन जाते हैं। जाहिर है, वे मंत्री पद अपने लिए ग्रहण करते हैं, न कि आम मुसलमानों के हित में।

राजनीतिक संगठन से कितना फर्क पड़ता है, यह बहुमत समाज पार्टी बनने के बाद दलितों में आए स्वाभिमान के उदाहरण से देखा जा सकता था। पहले उत्तर प्रदेश में दलितों की हालत बहुत खराब थी। अकसर उनके साथ सरकारी और गैरसरकारी हिंसा की जाती थी। समाज ही नहीं, प्रशासन भी उनका दमन और शोषण करता था। पर अब ऐसी स्थिति नहीं है। जाहिर है, अपना राजनीतिक संगठन हो, तो मुसलमानों की हालत में भी सुधार हो सकता है।

ऐसा क्यों नहीं हो पाता? इसका प्रमुख कारण यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में कोई चुनाव क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ से कोई उम्मीदवार सिर्फ मुसलमान मतदाताओं के भरोसे जीत सके। कुछ चुनाव क्षेत्रों में मुसलमान मतदाताओं का असर जरूर है, पर यह असर किसी मुसलमान उम्मीदवार को तभी जीता सकता है जब उसे अन्य समुदायों का भी समर्थन मिले। यह कोई कठिन बात नहीं है, बशर्ते मुसलमानों का जो राजनीतिक संगठन बने, वह अन्य समुदायों को अपना दुश्मन मान कर न चले। जब अन्य अनेक राजनीतिक संगठन मुसलमान को अपना दुश्मन या विरोधी मान कर नहीं चलते, तो मुस्लिम संगठन ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

कायदे से तो जाति और धर्म के आधार पर कोई राजनीतिक संगठन नहीं बनना चाहिए। राजनीति का आदर्श रूप सर्व जनता की सेवा है। कोई भी सच्चा राजनीतिक संगठन यह दावा नहीं कर सकता कि वह किसी खास समुदाय के लोगों की सेवा करेगा, किसी अन्य समुदाय का नहीं। संत की तरह राजनेता का दरवाजा भी सभी समाजों और समूहों के लिए खुला रहना चाहिए। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता। जाति और धर्म राजनीतिक संरचना में बुरी तरह हावी हो गए हैं। इसी को वोट बैंक की राजनीति कहा जाता है। प्रत्येक दल को किसी खास समुदाय या समुदायों का समुच्चय माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी राजनीतिक दल पूरे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता, न करना चाहता है। इस स्थिति की मांग है कि मुस्लिम समाज के हितों की रक्षा के लिए एक या दो ऐसे राजनीतिक संगठन होने चाहिए जो मुसलमानों का सच्चा प्रतिनिधित्व कर सकें। जब पंजाब में अकाली दल हो सकता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का अपना दल क्यों नहीं हो सकता? यह प्रवृत्ति तभी समाप्त होगी जब राजनीति में जाति और धर्म का स्वर कम होता जाए और सभी राजनीतिक दल समाज के सामान्य हितों का संवर्धन करने के लिए प्रतिबद्ध हों। लेकिन हमारे भाग्य ऐसे कहां? अभी तो राजनीतिक और सामाजिक विखंडन का समय है।

चूंकि मुसलमानों का कोई दल अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकता, क्या इसलिए उनका राजनीतिक संगठन नहीं बनाया जा सकता? यह एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। ऐसा संगठन अन्य दलों से तालमेल कर अपने लिए कुछ सीटों की व्यवस्था कर सकता है। इस तरह विधान सभा और लोक सभा में मु्स्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। लेकिन किसी भी मुस्लिम दल की सामाजिक भूमिका ज्यादा विस्तृत होगी। वैसे जरूरत तो यह भी है कि अन्य दल भी समाज सुधार की भूमिका निभाएं, पर मुस्लिम संगठनों के लिए यह और भी आवश्यक है। दुर्भाग्य से मुस्लिम समाज का मार्गदर्शन करने के लिए सिर्फ उनके धार्मिक संगठन ही हैं और उनमें से किसी की भी भूमिका आधुनिक या प्रगतिशील नहीं है।

मुस्लिम समाज का हित इसी में है कि वह अपने अहितकर रीति-रिवाजों से बाहर निकले। यह काम उनके राजनीतिक संगठन बखूबी कर सकते हैं। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी यह काम किया करती थी। मुस्लिम लीग ने इस तरह के कामों की ओर ध्यान नहीं दिया। मिस्टर जिन्ना खुद आधुनिक थे, पर उन्होंने अपने अनुयायियों को आधुनिक बनाने की कोशिश नहीं की। उसका नतीजा आज का पाकिस्तान है। वहां कट्टरवाद ने लोगों का जीना हराम कर रखा है। आतंकवाद का जन्म भी उसी के पेट से हुआ है। हिन्दुस्तान का मुसलमान अपेक्षया ज्यादा लोकतांत्रिक है। पर उसका पारिवारिक और सामाजिक जीवन कई दृष्टियों से बाधित बना हुआ है। मुंबई के बम कांड के बाद मुस्लिम बुद्धिजीवियों में चेतना और उत्साह की लहर आई थी। पर वह जल्दी ही ठंडी पड़ गई। इसी के साथ भारत का मुसलमान बेआवाज भी हुआ है। यह जड़ता जल्द से जल्द टूटनी चाहिए। इसमें मुस्लिम समाज के साथ-साथ भारतीय समाज का भी हित है।

---राजकिशोर