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Saturday, January 03, 2009

एक और कार्टून राजेन्द्र यादव के नाम

हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2008 में राजन्द्र यादव द्वारा दिये गये वक्तव्यों पर प्रतिक्रियाओं के आने का दौर अभी थमा नहीं है। 30 दिसम्बर 2008 को बैठक पर ही मनु बे-तख्खल्लुस की प्रतिक्रिया कार्टून के माध्यम से लगाया था। आज प्रस्तुत है उनके दूसरे बयान पर एक और कार्टून॰॰॰

Thursday, January 01, 2009

राजेन्द्र यादव चुरुट जलायें तो बैल कौन?

28 दिसम्बर को 2008 को हिन्द-युग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया, जिसमें प्रख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव मुख्य-अतिथि के तौर पर उपस्थित थे। उन्होंने ब्लॉगिंग और हिन्दी साहित्य पर अपने विचार रखें। जिसपर बहुत से ब्लॉगों पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। आइए पढ़ते हैं कुछ चुनिंदा…….

मसिजीवी ने कहा॰॰॰॰


आधुनिकता केवल टपर टपर कीबोर्ड चलाने से आएगी नहीं, यूँ आप आनलाइन हैं लेकिन उवाचेंगे गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष, जाहिर है ये नहीं चलेगा। मध्‍यकालीन सोच व साहित्‍य, स्‍त्री व वंचितवर्गों के प्रति अवमाननात्‍मक है ये स्‍थापित तथ्‍य है, इन्‍हीं आधारों पर इसे अजायबघर में रखे जाने की सलाह दी गई थी। ये प्रतीकात्‍मक है तथा उपयुक्‍त है। दलित यदि तुलसी से तथा स्‍त्री बिहारी से तादात्‍मय महसूस नहीं करते तो उन्‍हें पूरा हक है ऐसा सोचने का। राजेंद्र इनके परिप्रेक्ष्‍य में ही कह रहे थे।

Anonymous ने कहा.....


मसिजीवी की भी रचना अब हंस में छाप जायेगी आख़िर स्तुति भी कुछ शय है -दिल जीवी

Atul Sharma ने कहा....


न तो मैं राजेन्‍द्र यादव जी के कैंप का हूं और न उनके विरोधी कैंप का . मैं तो सिर्फ इतना भर जानता हूं कि राजेन्‍द्र यादव जी की एक भी ऐसी रचना मुझे नहीं पता जो किसी एक आम आदमी की जबान पर हो . उनकी एक किताब हंस मैंने देखी है जो सभंवत: उसी जमाने की प्रतीत होती है जिस जमाने के वे विरोधी नजर आते हैं . एक बात और, मूंछ लगाने से कोई मर्द नहीं बन जाता, काले पीले चश्‍मे लगाने से कोई जवान नहीं हो जाता, किताबें छपवाने से कोई साहित्‍यकार नहीं बन जाता.

Anonymous ने कहा...


Well you want to hang Rajendra Yadav for smoking in a country where, hard core criminals and murders are siting in parliament and making laws.

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा...


अधिकांश टिप्पणियां यह ज़ाहिर करती हैं कि हम वही सुनना चाहते हैं जो हमारे मन में है. अगर हम दूसरों की वह बात सुनने को तैयार न हों जो हमारे सोच से अलग है, तो फिर हमारे विवेक खुले मन वाला होने का क्या प्रमाण हो सकता है?
राजेन्द्र यादव ने ऐसा भी बुरा क्या कह दिया? क्या समय के साथ चीज़ों को बदलना नहीं चाहिये? मैं लगभग चालीस बरस से हिन्दी पढा रहा हूं और जानता हूं कि हमारे पाठ्यक्रम कितने जड़ हैं. चन्द बरदाई, कबीर, तुलसी, सूर, बिहारी, केशव सब महान हैं, अपने युग में महत्वपूर्ण थे, लेकिन सामान्य हिन्दी के विद्यार्थी को उन्हें पढाने का क्या अर्थ है? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा आज आपकी ज़िन्दगी में कहां काम आएगी? मन्दाक्रांता, छन्द और किसम किसम के अलंकार आज कैसे प्रासंगिक हैं? अगर हम अपने विद्यार्थी को इन सब पारम्परिक चीज़ों के बोझ तले ही दबाये रखेंगे तो वह नई चीज़ें पढने का मौका कब और कैसे पाएगा?
मुझे इस बात की ज़रूरत लगती है कि चीज़ों पर खुले मन से विचार किया जाए, न कि रूढ चीज़ों की बेमतलब जुगाली की जाए.

Arvind Mishraने कहा...


मैं शुरू से ही इस वाद में आने से कतरा रहा था -क्योंकि कथित /तथाकथित मठाधीशों से जुडी चर्चाओं से मुझे अलर्जी रही है -मैं तो एक बात ही शिद्दत के साथ महसूसता हूँ कि श्रेष्ठ साहित्य कालजयी होता है .अब आप नयी पीढी को क्या पढाएं क्या न पढाएं यह अलग मुआमला है मगर कबीर /तुलसी का साहित्य अप्रासंगिक नही हो जाता .और ये टिप्पणी कार महोदय तो धन्य ही है जो अपने जीवन के चालीस वर्ष बकौल उनके ही बरबाद कर चुके हैं और अब अपने फरमानों से आगामी पीढियों को बरबाद करने में लग जायेंगे .
भाषा ,ज्ञान को करियर के काले चश्मे से देखने पर हम कहीं अपने जमीर से ही गद्दारी करते हैं सरोकारों से हटते हैं .
बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर मैं हठात रोक रहा हूँ -अब राजेन्द्र यादव का खेमा दादुर धुन छेड़ रहा है !

Rajesh Ranjan ने कहा...


आलोचना से राजेन्द्र यादव को कतई परहेज नहीं होगा जैसा कि मैं उन्हें जानता रहा हूँ लेकिन हम दो-चार ब्लॉग लिखकर अपने को हिन्दी का सबसे बड़ा सेवक समझने वालों को जरूर कुछ लिखने के पहले समझना चाहिए हमारी बात किसे संदर्भ में लेकर कही जा रही है...वह व्यक्ति पिछले साठ वर्षों से सिर्फ हिन्दी में लिख -सोच रहा है...मुझे तो लगता है कि हिंदी को अधिक विचारशील बनाने में जितना यादवजी का योगदान है उतना किसी का नहीं...नहीं तो हिन्दी के ज्यादातर गोष्ठियाँ वाह रे मैं वाह रे आप के प्रतिमानों पर चला करती थी.

Anonymous ने कहा...


वो क्या है कि लेखक को अपना व्यक्तित्व दिखाने के लिये कुछ चटाक पटाक करना पड़ता रहता है, बेचारे राजेन्द्र यादव के साथ में भी कुछ एसा ही है. इन्हें बिना पाइप के लोग पहचानते ही नहीं सो क्या करें... अब भले ही पियें या न पियें, मुंह में दबाये तो रखगे ही हैं.
कहीं पढ़ा था कि ये शायद रात को सोते समय भी पाइप दबा कर सोते हैं

अविनाश ने कहा...


संसार की सर्व श्रेष्‍ट भाषा की ऐसी प्रशंसा? हिंदी कब संसार की सर्वश्रेष्‍ठ भाषा हो गयी... और राजेंद्र यादव ने गलत क्‍या कहा... पुराने साहित्‍य और नये समय के अंतर्विरोध को समझाने की कोशिश की। आपलोगों को मजे और वाहवाही के लिए नहीं, बल्कि समाज का दर्पण बनने के लिए साहित्‍य रचना चाहिए। शुभकामनाएं।

blog pathak ने कहा...


बिल्कुल ठीक ऐसे ही है जैसे आप चुतियापा कहकर पोस्ट लिखते है फ़िर किसी ब्लॉग पर गाली देने को ग़लत कहते है ,आप जैसे लोग दोगले लोग है जो ख़ुद कही सिगरेट फूंकते है ओर यहाँ कानून का रोना रोते है

Amit Gupta ने कहा....


हिन्दी या किसी अन्य भाषा का मान कोई बेसन का लड्डू नहीं है कि कोई आया और आराम से गप्प कर गया।
अमां यार, उनका सिगार है, सभा का कोई ऐसा नियम न होगा कि धूर्मपान करना निषेध है, तो आपको क्यों तकलीफ है कि वे सिगार पी रहे थे? वे ५०२ पताका बीड़ी फूँक रहे होते तो ठीक रहता?
सिगरेट चाहे जितनी भी महंगी क्यों न हो, सभा आदि में प्रतिष्ठित व्यक्ति उसको फूँकना इसलिए नहीं पसंद करते क्योंकि वह चीप (Cheap) लगती है, जो चार्म (Charp) सिगार में है वह सिगरेट में नहीं है।

Arvind Mishra ने कहा...


जिस आदमी को देश के क़ानून का जरा भी ख्याल न हो और पूरी उद्धतता के साथ पब्लिक प्लेस पर धूमपान निषेध क़ानून की धज्जियाँ उडा रहा वह काहे का साहित्यकार ! आश्चर्य यह भी कि किसी ने उन्हें टोका तक नहीं !! मैं होता तो उन्हें टोकता और क़ानून का संज्ञान करा कर राजपत्रित अधिकारी की हैसियत से सिगार जब्त कर लेता !

खुली किताब ने कहा...


मुझे लगता है ब्लॉगिंग अपने आप में साहसिक कदम है। इसके लिए नामवर और राजेंद्र यादव जैसे लोगों की वाहवाही की जरूरत नहीं है। अगर साहित्य के मठाधीश इसे खारिज भी करते हैं तो किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैंने सुना ही कि नामवर जी ब्लॉगिंग को दो कौड़ी से ज्यादा अहमियत नहीं देते। अगर वाकई ऐसा है तो इसके पीछे वजह एक ही है--सांचे के टूटने का भय। जमी जमाई दुकान के गिरने का भय। वाकई ब्लॉगिंग बड़ा दीगर का काम है। जिसमें आपको हर तरह की प्रतिक्रिया के लिए तैयार रहना है। यहां चेहरे देखकर प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है। अगर राजेंद्र यादव ब्लॉगिंग के पक्षधर हैं तो ये उनका समझदारी है।

Pramod Singh ने कहा...


बीन बजाने की तर्ज़ पर युह नया मुहावरा गढ़ सकते हैं- बैल के आगे चुरुट जलाना?

Tuesday, December 30, 2008

दिल्ली की दोपहर में चार घंटे हिंदी के नाम....

हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८ के अतिथिगण


डर की सुबह
नोएडा से जब हम अपने कंधे पर हिंद-युग्म का झोला लादे रूममेट नसीम के साथ 11 बजे बस में आईटीओ के लिए बैठे तो मन में कुलबुलाहट शुरू हो गयी थी…कई सारे डर थे...एक तो दिल्ली की सर्दी, साल का आखिरी इतवार और वो भी हिंदी का कोई कार्यक्रम....कितने लोग आ पायेंगे....क्या पता मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव ही नहीं आयें...नसीम भाई ने हौसला दिया....कहा, कम लोग ही सही, जो लोग भी आयेंगे, वो असल में हिंद-युग्म के प्रति इमानदार होंगे...आनन-फानन में आटीओ चौक पर पराठे खाकर बढ़ चले हिंदी भवन की ओर...

डेढ बजे से पहले नहीं घुसने देंगे....
भारत की सबसे मज़ेदार बात ये है कि जब तक आप “बड़े” आदमी जैसे दिखते नहीं, आपको कोई भाव नहीं देता...जब हम हिंदी भवन के गेट पर पहुंचे तो दरबान ने हमें देखते ही रोक दिया...कहा, प्रोग्राम दो बजे से है, बारह बजे क्यूं आ गये....जब हमने बताया कि प्रोग्राम के आयोजक हम ही हैं तो उसे भरोसा ही नहीं हुआ...हमें शैलेश जी के आने तक का इंतज़ार करना पड़ा....चूंकि, शैलेश भी मुझे “बड़े” आदमी जैसे दिखते नहीं, तो मेरा डर कम नहीं हुआ कि कहीं गार्ड उन्हें भी कोई नसीहत न दे दे... ख़ैर, शैलेश आये रुपम चोपड़ा की कार में और मुझे तसल्ली मिली की कोई तो “बड़ा” आदमी पहुंचा...तब तक हम हिंदी-भवन की बाहरी दीवार पर कूद-फांद कर हिंद-युग्म का बड़ा सा बैनर टांग चुके थे... बैनर पर दूर से हिंद-युग्म-“हिंदी को खून चाहिए” देखकर मन रोमांच से भर गया था....बैनर टांगने में हमें मदद मिली पंकज से जो वहां प्रोजेक्टर लगाने के लिए नियत समय पर पहुंच गया था... बहरहाल, शैलेश जी ने भी थोड़ी मशक्कत के बाद एक बजे ही अंदर जाने की इजाज़त ले ही ली....


गिने-चुने लोग
धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष में जब मैं पहुंचा तो हिंद-युग्म के भी गिने-चुने लोग ही साथ थे...कार्यक्रम शुरू होने में अब भी 45 मिनट थे....शैलेश प्रो़जेक्टर पर स्लाइड शो की तैयारी में लग गये और हम एक-एक कर आने वाले आगंतुकों के अभिवादन में जुटे थे...सुमित भारद्वाज, तपन शर्मा अपनी छोटी-सी टोली लेकर आ गये थे और अपने अभियान में लग गये थे...लोगों की संख्या अब बढ़ने लगी थी और हमारी धड़कनें भी...दो बजे तक स्थिति ये थी कि आधे से ज़्यादा कुर्सियां भर गयी थीं..बस, एक भी मुख्य अतिथि नहीं पहुंचे थे...हम रेडियो के कार्यक्रमों की तरह श्रोताओं को हिंद-युग्म के स्वरबद्ध गीत सुनवाए जा रहे थे और आये हुए लोगों को बहला रहे थे...


वो घड़ी आ गई…
शैलेश जी से गहन विमर्श के बाद तय हुआ कि कोई आए न आए, पौने तीन बजे कार्यक्रम शुरू कर देंगे...ठीक पौने तीन बजे जब मैं मंच पर पहली लाइन बोलने के लिए सांसें भर रहा था, कक्ष के दरवाज़े पर बैसाखी के सहारे एक शख्स हमारी ओर बढ़ रहा था..मैंने माइक छोड़ा और उनकी अगवानी में दौड़ पड़ा....वो राजेंद्र यादव थे...लगा, कि सारा आकाश हिंद-युग्म के आंगन में उतर आया हो....


कलम आज उनकी जय बोल
मेरे कार्यक्रम के शुरू करने और श्याम सखा “श्याम” जी को आगे की कमान सौंपने के अंतराल में लगभग सभी कुर्सियां भर चुकी थीं...आये हुए लोगों में कुछ तो जानने वाले थे, ज़्यादातर, पहली बार हिंद-युग्म से मिले थे...उनका आना इस बात पर मुहर लगा रहा था कि अगले चार घंटों तक वो हमें बस सुनने ही आये हैं, कोई रस्म निभाने के लिए नहीं....नाज़िम नक़वी, जो हमसे हाल ही में जुड़े हैं, राजेंद्र यादव के बाद आये....फोन पर हमने उन्हें ढाई बजे याद दिलाया कि प्रोग्राम बोरिंग भी हो तो भी घर का है, सो आना ही पड़ेगा..

हिंद-युग्म ने पिछली बार कोई बड़ा कार्यक्रम पिछली फरवरी में कराया था...प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में “पहला सुर का विमोचन”...तब के हिंद-युग्म के कई नामी चेहरे ग़ायब थे...कई नए चेहरे दुगने जोश के साथ जुटे थे...शिवानी सिंह, प्रेमचंद सहजवाला चुपचाप हमारी रवानी देखकर संतुष्ट थे...सुनीता चोटिया शालीन श्रोता की तरह पूरे कार्यक्रम में बैठी रहीं और मन ही मन वाहवाही भी देती रहीं....नीलम मिश्रा व शोभा जी न सिर्फ बाल उद्यान संभाल रही हैं, बल्कि हिंद-युग्म की हालिया ऊर्जा का केंद्र भी हैं....गौरव, अभिषेक, मनुज अलग ही मोरचा संभाले हुए थे.... किस-किस का नाम लें...क्या बताएं कि कार्यक्रम का सबसे सम्मानित पाठक आलोक “साहिल” आखिरी समय तक गुलदस्ते लाने में लगा हुआ था....सबको सलाम करने का जी करता है...सजीव सारथी, सुनीता यादव आदि की कमी बेहद खल रही थी...

वाह ! शैलेश.....
शैलेश एक अलग ही मूड में दिख रहे थे..उनके चेहरे पर आम तौर से ज़्यादा गंभीरता थी...उन्होंने जब ब्लॉगिंग की क्लास लेनी शुरू की तो राजेंद्र यादव भी सीखने के मूड में आ गये....हालांकि, मैं चाहता था कि शैलेश कम देर तक ही बोलें मगर लोगों की रुचि देखकर शैलेश बोलते गये और समय का पता ही नहीं चला...बाद में मैं भी पूरे ध्यान से उन्हें सुनने लगा और काफी कुछ सीखने को मिला...

उम्दा कवि, उम्दा श्रोता, उम्दा संचालक
हिंद-युग्म मंच के अधिकांश कवि किसी भी बड़े काव्य मंच के नियमित चेहरे नहीं है...फिर भी जब वो कविताएं पढ़ते हैं तो कहीं से नहीं लगता कि वो साल में इक्का-दुक्का बार ही पढ़ने के लिए मंच पर उतरे हैं....गौरव, पावस, रूपम, मनुज आदि जब कविताएं पढ़ रहे थे, तो मैं दर्शक दीर्घा को निहार रहा था...सब लोग डूब कर सुन रहे थे...नाज़िम जी आखिर में आए तो सब तालियां बटोर कर ले गये....”अंकल जैसे लोग थे सब....” मेरे दिल में अब तक चुभ रहा है...मज़े की बात ये रही कि पूरे कार्यक्रम के दौरान राजेंद्र यादव भी कवियों को देखते रहे, सुनते रहे और डूबते-उतरते रहे... श्याम जी का संचालन भी सबका दिल जीत रहा था...लग ही नहीं रहा था कि वो कार्यक्रम के ठीक पहले दिल्ली पहुंचे हैं …पूरे कार्यक्रम में मैं उनसे संचालन के गुर सीखता रहा और जहां ज़रूरत पड़ी, उन्हें आवश्यक निर्देश भी देता रहा...

गूंज उठा "सारा आकाश"
ठीक छह बजे राजेंद्र जी के आगे माइक पहुंचा और उन्होंने बोलना शुरू किया...उनको कभी पहले सामने सुनने का मौका नहीं मिला था...उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें एक बात साफ थी..उन्होंने तीन घंटे तक हमें बड़े ध्यान से सुना था....उन्होंने बड़ी इमानदारी से अपनी तकनीकी अक्षमता को स्वीकारा और हिंद-युग्म को ये जिम्मा भी दिया कि उन्हें हम तकनीक से जोड़ सकें...फिर बड़ी महीन बातें भी की...हमें ये निर्देश भी दिया कि तकनीक में आधुनिकता के साथ-साथ विचारों में भी आधुनिकता समय की मांग है....कई और बातें भी कहीं जो वहां कई लोगों को नाराज़ करने के लिए काफ़ी था....पर, ये तो उनका परिचित अंदाज़ है....दस गालियां और ढेर सारी तालियां बटोरे बग़ैर तो वो किसी भी कार्यक्रम से रुखसत नहीं होते...
बहरहाल, हिंद-युग्म के लिए राजेंद्र यादव का आना एक सुखद संयोग था....किताबी साहित्य का पुरोधा तकनीक के कर्णधारों की सभा में आया था...एक सेतु बनकर, जो कई और साहित्यकारों को भी ब्लॉगों की तरफ़ मुड़ने को बाध्य करेगा....


इंतिहां और भी हैं...
कार्यक्रम के बीच में कई बार हमें कुर्सियां बढ़ानी पड़ी...कार्यक्रम के आखिर में नाश्ते के पैकेट भी कम पड़ गये...ये सब हमारे लिए खुशी की बात है...इतने शुभचिंतक आये कि वो हमसे किसी भी विशेष सम्मान की अपेक्षा लेकर नहीं आये थे...जाते-जाते वो बस मुझे, शैलेश या हिंद-युग्म के किसी और सदस्य को मिलकर पीठ थपथपाकर ही गये...गज़ल की किताबें बांट रहे दरवेश भारती हों या अपनी पैनी नज़र रखे हिंद-युग्म के कार्टूनिस्ट मनु बेतख्खल्लुस, सबके सब हिंद-युग्म के कार्यक्रम में पहली बार आये थे मगर आये तो हमारे होकर रह गये....

मुझे लगता है कि अगला साल हिंदयुग्म के लिए मील का पत्थर साबित होगा...हम अपने साथ कई लोगों को जोड़ चुके हैं....अब बारी है हिंदी की मशाल सबके हाथों में थमाने का....ताकि, तकनीक और साहित्य की हर विधा से हिंदी जुड़ सके.....सबको महसूस हो कि हिंदी की बात करने वाले लोग झोलाछाप नहीं हैं..उनके पास विज़न है और हिंदी को सर्वप्रिय बनाने का माद्दा भी....

निखिल आनंद गिरि


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जय हिन्द, जय हिन्दी, जय हिन्दयुग्म!!!