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Monday, March 16, 2009

अब जागे भूपेंद्र जी, खुले हमारे भाग....

दरअसल, हुआ यूं कि हिंदयुग्म के भूपेंद्र राघव होली के दिन से ही भांग खाकर ऐसे लोटे कि उनकी नींद अब जाकर खुली.....जब खुली तो उन्होंने बैठक पर भी नज़र दौड़ाई....फिर, जो कुछ बन पड़ा, होली का संदेश स्वरूप हमें लिख भेजा...बैठक पर फाग की खुमारी अब भी बची है....आप भी डोलिए हमारे साथ....

1. खबरों से ली खबर सभी की,लेकर होली आड़ ।
एक साँड ने शैलेश जी को कैसे दिया पछाड ?
कैसे दिया पछाड नहीं कोई धींगा मुस्ती ।
स्पेन जाकर जीत रहे हर बार वो कुश्ती ॥
गलत खबर है नीलम जी यह सोलह आने ।
हैप्पी होली, मैं भी आया गुजिया खाने ॥

2. तपन डुबोने चल दिये सकल उडीसा आज ।
कैसी कैसी हैं खबर , हे मेरे महाराज ॥
हे मेरे महाराज, हालात बडे बे-काबू ।
मुश्किल में आ गये आज पटनायक बाबू ॥
तपन श्री पर हाये कैसा आक्षेप लगाया ।
सच्ची झूठी जैसी भी बस खबर की माया ॥

3. आचार्य जी की बात पढ़ी लो माँथा ठिनका ।
एक एक दोहा शेर समान बलवान है जिनका ॥
आज मल्लिका शेरावत से क्यूँ कर मीटिंग..।
अगर हकीकत यही तो भैया सचमुच चीटिंग ॥
कैसे करूँ विश्वास, आचार्य जी आख मींचकर ।
आखिर कर दी लम्बी आचार्य जी की टांग खींचकर॥

5. खुद-खुशी से खुद-कुशी करन चले इसबार ।
टाँग अडाई पुलिस ने पाकर मौका यार ॥
पाकर मौका यार, यहाँ पर सब शैतानी ।
हमको दिया धकेल, जब भी जाने की ठानी ॥
कर ना लें हम कब्जा स्वर्ग पर पहले जाकर ।
दिया प्रलोभन नीलम जी ने हमको आकर ॥
इस होली में अपनी बल्ले बल्ले होली ।
हैप्पी गुजिया होली कि हैप्पी भल्ले होली ॥

6. टर्र टर्र करने लगे कितने सारे जीव ।
ये सुर है या ताल है सोचें खडें सजीव ॥
सोचे खडे सजीव अजीब स्चिवेशन भाई ।
कैसे कविता करें जान पर अब बन आई ॥
टर्र टर्र संगीत बने ऐसा प्राकृतिक ।
कर्णप्रिय हो जाये, शब्द कुछ ऐसे अब लिख ॥
बने समस्या एक समौसा खाये जाओ ।
हैप्पी होली हैप्ली होली गाये जाओ ॥

7. हों प्रवासी वो भले , दिल में बसते आज ।
होता बहुत लुभावना अपने घर का नाज ॥
अपने घर का नाज भूख प्रबल हो जाती ।
इसीलिये तो दूर देश से खुशबू आती ॥
आने दो , आ जाओ भैया बहुत स्वागत ।
नीलम,निखिल भुगतान करेंगे सारी लागत ॥
एक प्लेन से एक ही बन्दे को आना है ।
हैप्पी होली , हमको भी गुजिया खाना है ॥

8. तीन दिनों से भूपेन्द्र (राजा इन्द्र) का
हिल रहा था सिंहासन..
या छप रहा पंजाब केसरी, या नी. नि.(नीलम निखिल) प्रकाशन..
हालांकि अखबार हो गया आज 3 दिन बासी
लेकिन दिल गद-गद हो बैठा,खबरें अच्छी खासी

फ़्रंट पेज पर नाम देखकर मन में उठी उमंग
उपर से अठखेलिया संग होली के रंग

बाइक मेरी हो गयी , उडने को तैयार
पीछे बैठत डर रहे , सब कितने बेकार

मन बुझा तो क्या हुआ साईलेंसर में आग
वही बैठ सकता यहाँ जिसका अच्छा भाग

अपने दिल का कीजिये पॉल्यूशन कंट्रोल
ऐसे यूँ ना देखिये करके आखें गोल

-शेष अगले अंक में....

बुरा ना मानो होली है...:)

सभी को होली की बहुत बहुत बधाई... (ये अगले साल की नहीं,इसी साल की बधाई है....)

Wednesday, March 11, 2009

आज की ताज़ा खबर

1) हमारे शैलेश जी एक फिल्म (चला मुरारी हीरो बनने ) देखकर वापस आ रहे थे,चूँकि उनकी शर्ट सुर्ख लाल रंग की थी अतः एक सांड़ ने उन्हें उठा कर पटक दिया और उनकी हड्डियों का चुरमा बन गया है। और इसलिए वो हिन्द-युग्म का कोई भी काम कर पाने मे आजकल असमर्थ हैं।

2)"ओरिसा में बाढ़ का कहर"- प्रशासन अत्यंत परेशान है, कारण है की तपन शर्मा हमारे हिन्द-युगम के कर्मठ सहयोगी आजकल ओरिसा में हैं, घर की याद में इतना रो रहे हैं कि समस्त ओरिसा बाढ़ की चपेट में है, हालत बेकाबू देखकर, वहाँ के मुख्यमंत्री ने उनकी फर्म से अपील की है कि उन्हें तत्काल वापस बुलाया जाए, जिससे ओरिसा के हालत को कुछ काबू किया जा सके।

3) आचार्य जी की मल्लिका शेरावत के साथ एक संक्षिप्त मुलाकात- आचार्य जी ने उन्हें जीवन दर्शन के बारे में समझाया किंतु जब मल्लिका जी ने अपने जीवन दर्शन के बारे में बताना चाहा तो, संजीव जी सर पर पैर रखते भागते हुए नज़र आए।

4) राघव जी अपनी मोटर साइकल से अंतरिक्ष की सफल उड़ान के लिए एक प्रयोग कर रहे हैं इन दिनों, पिछली सीट के लिए कोई अंतरिक्ष यात्री की तलाश में हैं। रंजना जी, रूपम जी, शोभा जी, पूजा जी, शन्नो जी, सीमा जी व नीलम जी ने उनकी अपील को ठुकरा दी है, अब वो बुझे मान से अपनी पत्नी को मनाने में लगे हुए हैं। ईश्वर उनकी यात्रा शुभ करे!

5) अरूण जी और मनु जी ने खुदकुशी करने की कोशिश की, मोके पर पुलिस ने पहुँच कर पड़ताल की और नीलम जी को सख़्त हिदायत दी की चाहे वो प्रतियोगिता में भाग लें या न लें, उन्हें सर्वश्रेष्ट प्रतिभागी ही घोषित करेंगी, इसका नीलम जी ने पूरा-पूरा आस्वसान दिया है।

6) सजीव जी, आजकल बेहद परेशान हैं, उनके आवाज़ के साथियों के गालो मे मेंढक घुस गये हैं और वो सब सिर्फ़ टर्र-टर्र कर रहे हैं। इस कारण से मार्च की कविता पाठ में विलंब हो रहा है क्योंकि कविता पाठ करने वाले सभी लोग सिर्फ़ टर्र-टर्र कर रहे हैं। उम्मीद है कि सजीव जल्दी ही इस समस्या से अपने आप को उबार लेंगे।

7) समस्त प्रवासी हिंद-युग्मी नाराज़ हो गये हैं, क्योंकि हिंद-युग्म ने उन्हें गुलाल और गुझिया का पार्सल अभी तक नहीं पहुँचाया है। इसलिए सभी लोग हिन्दुस्तान आकर होली मनाने का मन बना चुके हैं, अभी अभी खबर मिली है कि कुछ लोग वहाँ से चल भी चुके हैं।





बुरा न मानो होली है, होली का हुड़दंग आप सभी को उल्लासित करे इसी ख्वाहिश के साथ-

नीलम मिश्रा व निखिल आनंद गिरि

रस ही जीवन, जीवन रस है.....

भारत में होली सबसे सरस पर्व है। दशहरा और दीपावली से भी ज्यादा। दूसरे त्योहारों में कोई न कोई वांछा है या वांछा की पूर्ति का सुख। होली दोनों से परे है। यह बस है, जैसे प्रकृति है। अस्तित्व के आनंद का उत्सव। वांछा और वांछा की पूर्ति, दोनों में द्वंद्व है। यह जय-पराजय से जुड़ा हुआ है। दोनों ही एक अधूरी दास्तान हैं। सच यह है कि दूसरा हारे, तब भी हमारी पराजय है। कोई भी सज्जन किसी और को दुखी देखना नहीं चाहता। किसी का वध करके उसे खुशी नहीं होती। करुणानिधान राम ने जब रावण पर अंतिम प्राणहंता तीर चलाया होगा, तो उनका हृदय विषाद से भर गया होगा। उनके दिल में हूक उठी होगी कि काश, रावण ने ऐसा कुछ न किया होता जो उसके लिए मृत्यु का आह्वान बन जाए; काश, उसने अंगद के माध्यम से भेजे गए संधि प्रस्ताव को मंजूर कर लिया होता; काश, उसने विभीषण की सत सलाह का तिरस्कार नहीं किया होता। अर्जुन का विषाद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। युद्ध छिड़ने के ऐन पहले उसे अपने तीर-तूरीण भारी लगने लगे। उसके मन में उचित ही यह भाव पैदा हुआ कि अपने संगे-संबंधियों को मार कर सुख पाना एकदम अनैतिक है। यह भावना जितनी ज्यादा फैले, दुनिया के लिए उतना ही अच्छा है। श्मशान में सभ्यता का विकास नहीं होता। फिर भी महाभारत इसीलिए हो पाया, क्योंकि कृष्ण अपने सखा को यह समझा सके कि अन्याय का प्रतिरोध करना अगर जीवन-मरण का प्रश्न बन जाए, तब भी संघर्ष से भागना नहीं चाहिए। नतीजा यह हुआ कि दिन में कुरुवंश के लोग दिन में एक-दूसरे की जान लेते थे और रात को उनकी याद कर आंसू बहाते थे। इस तरह, द्वंद्व और उनका शमन जीवन प्रक्रिया को आगे बढ़ाता था। होली की विशेषता यह है कि यहां किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है; सामाजिक नैतिकता के नाम पर लादी हुई अनैतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप द्वंद्व है भी, तो उसका शमन नहीं, समाहार है। हृदय की मुक्तावस्था को क्या कहते हैं, मुझे नहीं मालूम, पर यह अनुभव जरूर है कि होली को मन से मनाया जाए, तो कुछ ऐसी ही अवस्था पैदा होती है।

फागुन में ससुर जी देवर लागे....
होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, तो इसके ठोस कारण हैं। इन कारणों से हर कोई अवगत है। ये कारण मुख्यत: बाहर से आते हैं। लेकिन वे प्रभावी तभी होते हैं जब भीतर संचित कोई अद्भुत चीज अंगड़ाई ले कर जाग उठती है। कामना, विचार, हर्ष. विषाद सब कुछ हमारे भीतर ही है। लेकिन जागते वे तब हैं जब बाहर से उन्हें उद्दीपन और आलंबन मिलता है। बाहर और भीतर का विभाजन वास्तविक से ज्यादा कृत्रिम है। तभी तो यह विभाजन अकसर चिटख जाता है। श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?
बताते हैं, प्रकृति हर्ष और विषाद से परे हैं। उसे न दुख होता है न सुख होता है। लेकिन क्या पता। प्रकृति के बारे में हमारी जानकारी इतनी संक्षिप्त है कि उसके आधार पर कोई बड़ा फैसला नहीं किया जा सकता। हम यह तो जान गए हैं कि कीट-पतंगों को, पेड़-पौधों को भी दुख-सुख होता है, वे हर परिवर्तन से संवेदित होते हैं। लेकिन सभी प्राणी, जिनमें उद्भिज भी शामिल हैं, अगर प्रकृति की कोख से ही जन्म लेते हैं, तो यह कोख किसी भी स्तर पर इतनी बांझ नहीं हो सकती कि वह बिलकुल संवेदनहीन हो जाए। मार्क्स ने ठीक पहचाना था कि पदार्थ से ही चेतना पैदा होती है। तो फिर पदार्थ खुद अचेतन कैसे हो सकता है?
प्रकृति की यह सचेतनता वसंत ऋतु में पूरे शबाब में होती है। अन्य सभी ऋतुओं में कुछ न कुछ द्वंद्व होता है। गरमी, बारिश, जाड़ा -- सभी आवश्यक हैं और इस नाते प्रिय भी, पर अतिरेक में वे कष्ट भी देते हैं। वसंत ही एकमात्र ऋतु है जिसका कोई अतिरेक नहीं हो सकता। सभी चीजों का उत्कर्ष होता है, पर उत्कर्ष का उत्कर्ष क्या होगा? सागरमाथा (एवरेस्ट) अपनी ऊंचाई को कैसे लांघ सकता है? वसंत ऋतु परिवर्तन के पूरे चक्र का उत्कर्ष है। इसी के लिए प्रकृति साल भर तैयारी करती है, जैसे मानवी का शरीर सोलह साल तक साधना करता है ताकि उस पर यौवन का फूल खिल सके या जैसे जननी नौ महीने तक हर रंग से गुजरती है तब कोई शिशु धरती पर प्रगट होता है और सभी के दिलों पर छा जाता है। वसंत प्रकृति का यौवन भी है और उसकी रचनात्मकता का चरम उभार बिंदु भी। उसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आनंद ही आनंद है। रस ही रस है। जीवन ही जीवन है। इसीलिए मनुष्य ही नहीं, संपूर्ण जीव जगत के साथ उसकी अनुकूलता है। वसंत में जैसे प्रकृति खुलती है, उसकी कंचुकियां छोटी पड़ जाती हैं, वैसे ही हम भी खुलते हैं, हमारे लिए हमारा परिवेश छोटा लगने लगता है। यह वह सर्वश्रेष्ठ उपहार है जो सृष्टि अपने आपको देती है। वरना तो बाकी सृष्टि में आंखों को जला देनेवाली रोशनी है -- जहां-जहां तारे हैं, या फिर उनके बीच का ठोस सघन अंधेरा, जिसमें कोई अपने आपको भी देख नहीं सकता। हम धरतीवालों को अपनी किस्मत पर इतराना चाहिए।
धरती इसलिए अनोखी है, क्योंकि सृष्टि भर में यहीं जीवन है। यहीं रस है। यह रस सबसे ज्यादा नर-नारी के बीच पैदा होता है, क्योंकि प्रकृति की अभी तक की योजना यही है। उसने पशु-पक्षियों में भी, पेड़-पौधों में भी युग्म बनाए हैं, पर इन युग्मों में वह आकर्षण, वह ताकत, वह निरंतरता नहीं है, जो मानव युग्म में दिखाई देता है। हो सकता है, लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वज स्त्री-पुरुष भी जब-तब ही एक-दूसरे की ओर प्यार और लालसा की निगाहों से देखते रहे हों, पर वह संस्कृति के ककहरे का युग था। संस्कृति के निरंतर विकास ने न केवल शरीर को कोमल और सुंदर बनाया है, बल्कि दो शरीरों के बीच कला का इतना बड़ा सागर पैदा किया है जिसमें हम निरंतर ऊभ-चूभ होते रहते हैं। इसीलिए हमारे एक पूर्वज ने आह भरते हुए कहा था कि जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह सींग-पूंछ रहित जानवर की तरह है। होली इसी सांस्कृतिकता का उत्सव है। जो होली के दिन सूखे पेड़ की तरह अपना और दूसरों का मूड खराब किए रहता है, उसे नरक का अनुभव करने के लिए जीवनोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी होती। वह आंखवाला हो कर भी अंधा है, कानवाला हो कर भी बहरा है और हृदय होते हुए भी पत्थर है। वह समाज में होते हुए भी समाज से बाहर है, अपने भीतर होते हुए भी अपने को नहीं पहचानता। खु़दा ऐसे लोगों को माफ करे -- ये नहीं जानते कि ये क्या खो रहे हैं।

तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं....
नर-नारी का आकर्षण एक विशिष्ट प्रकार का आकर्षण है, जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। इसीलिए सभी भक्त ईश्वर को अपना माशूक मान कर उसकी मादक अनुभूति से घिरे रहते हैं। कबीर को लगता था कि राम उनके प्रियतम हैं और वे राम की बहुरिया हैं। कृष्ण को तो पति मान कर ही भजने की प्रथा है। ईसाई संतों को ईश्वर की वधू होने का अनुभव होता था। ये सभी अभिव्यक्तियां प्रगाढ़तम संबंध की जानी-पहचानी अनुभूति हैं। लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते हैं। जब स्वकीयता के साथ परकीयता होगी और परकीयता के साथ स्वकीयता, तब हमें होली जैसे अद्भुत त्यौहार की महत्ता समझ में आएगी, जो स्वकीय और परकीय के विभाजन की दीवार को अपने रंग-गीले हाथों से गिरा देता है। फागुन के नशे में कौन स्वकीय रह जाता है या रह जाती है और कौन इस बोध से घिरा रहता है या घिरी रहती है कि वह परकीय है? जैसे प्रकृति की व्यवस्था अभिन्न है, हर जर्रा हर जर्रे का मायका या ससुराल है, वैसे ही सभी स्त्री-पुरुष एक नैसर्गिक व्याकरण की संज्ञाएं, विशेषण और क्रियापद बन जाते हैं। अब इससे आगे क्या कहूं, तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं। अगर यह प्रेम है, तो अध्यात्म भी यही है।
रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है। इंद्रियों के सभी विषयों में रंग ही दूर से चमकता है। सूर्य की लालिमा हमें कितनी दूर से दिखाई पड़ती है। चंद्रमा का प्रकाश निकटतर है, लेकिन वह भी कम दूर नहीं है। यह गुण किसी और तत्व में नहीं है। शायद इसीलिए रंग को होली का मुख्य दूत माना गया। प्रकृति भी इस मौसम में अपने रंगों का पूरा खजाना खोल देती है। एक-दूसरे के शरीर और उसके जरिए आत्मा पर गीला रंग फेंक कर हम मानो इस रंगीनियत का ही इजहार करते हैं। यही वह रस है जो हमारे तन-मन को आह्लादित कर देता है और हमारी भौगोलिक तथा मानसिक दूरियों को पाट देता है। हर कोई फूल और हर कोई भौंरा बन जाता है।
मेरी उलझन यह है कि जो रस स्त्री-पुरुष के बीच पैदा होता है, उसका कुछ हिस्सा पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच क्यों नहीं पैदा होता? स्त्रियां भी स्त्रियों के साथ होली खेलती हैं और पुरुष भी पुरुषों के साथ होली खेलते हैं। पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों की अपनी होली ज्यादा मजेदार, ज्यादा चुहल भरी होती है, क्योंकि उनमें प्राकृतिक लालित्य होता है और उनकी आपस की प्रतिस्पर्धा उतनी तीव्र और बहुआयामी नहीं होती जितनी पुरुषों के आपसी संबंधों में। इसीलिए युवाओं की होली ज्यादा खुली हुई होती है : वे इतने परिपक्व नहीं हुए होते हैं कि जिंदगी के द्वंद्वों को कुछ घड़ी के लिए भुला न सकें और अपने को रंगीनी के हाथों निश्शर्त सुपुर्द न कर सकें। शोक की बात यह है कि होली का यह सहज उल्लास साल भर हमारा साथ नहीं देता। स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है। होली हर साल हमें यह याद दिलाने आती है कि यारो, यह जीना भी कोई जीना है जिसमें जीवन का रस द्वंद्वों की आंच में भाप बन कर उड़ता रहता है और हम जितना दूसरों से, उतना ही अपने आपसे बेगाना होते जाते हैं।
इस विसंगति में ही हम पहचान सकते हैं कि होली का दिन मजाक और हास-परिहास का दिन क्यों बन जाता है। जब हिरण्यकश्यप की बहन उसके संतनुमा बेटे प्रह्लाद को ले कर आग के कुंड में बैठ गई थी और बालक प्रह्लाद जल कर भस्म हो जाने के बजाय उससे पूरी तरह अक्षत और साबुत निकल आए, तो उसके तुतलाते होंठों पर एक ऐसी मुसकान जरूर होगी जिसने उस क्रूर-कपटी राजा का दिल तार-तार कर दिया होगा। यह मुसकान अन्याय और जुल्म के विरुद्ध विजय की शाश्वत मुसकान है। बाद की पीढ़ियां इतनी किस्मतवाली नहीं रहीं कि वे इस विध्वंसक आग से अपने को भस्म न होने दें। पर ऐसी हर आग के खिलाफ गाने तो गाए ही जा सकते हैं, प्रहसन तो किया ही जा सकता है, उसका मजाक तो उड़ाया ही जा सकता है। यह भी एक प्रकार की विमुक्ति है : साल भर हमारे कोमल मनों में जो तनाव जमा होते रहते हैं, उनसे उल्लासपूर्ण विमुक्ति का दुर्लभ मौका, जब आप कोयले को कोयला और कीचड़ को कीचड़ कह सकते हैं। होली के दिन कोई किसी का गुसैयां नहीं रह जाता। किसी से भी प्यार किया जा सकता है और किसी पर भी छींटाकशी की जा सकती है। लेकिन यह छींटाकशी भी विनोद भाव के परिणामस्वरूप मृदु और सहनीय हो जाती है। बल्कि जिसका परिहास किया जाता है, वह भी बुरा न मानने का अभिनय करते हुए बरबस हंस पड़ता है। शायद यही 'बुरा न मानो होली है' के हर्ष-विनोद घोष का उद्गम स्थल है।

एक घंटा रोज़ होली के मूड में....
होली वह अनोखा दिन है जब जिसे बहुमत से बुरा समझा जाता है, वह भी बुरा नहीं रह जाता। जिसे बहुमत से अच्छा माना जाता है, उसकी सार्वजनिक ऐसी-तैसी की जाती है। कह सकते हैं कि होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं और जो मृत्यु का एक लघु संस्करण है, ताकि अगली सुबह के बाल सूर्य की तरह हम भी ताजादम हो कर जीवन में वापसी का सुख अनुभव करते हुए अपने दिन भर के कामकाज में लग सकें।
राजकिशोर

Tuesday, March 10, 2009

बुरा न मानो होली है.....

प्रकाश गौड़ा हमारे उन साथियों में से हैं जिनसे कभी मुलाकात नहीं हुई.....हां, उनके मेल, कविताएं वगैरह हमसे लगातार मिलते रहते हैं....हिंदयुग्म को ये एक महाअभियान मानते हैं और गुजरात में हमारे प्रचारक हैं....कम उम्र में ही नौकरी करने से ऊब हुई तो बड़ौदा में एक विज्ञापन एजेंसी खोल ली....होली के मौके पर इनकी एजेंसी का संदेशनुमा मेल आया तो जी में आया कि बैठक पर सबके साथ पढा जाये.....हैप्पी होली....

होली पर युग्मियों के कार्टून

हर जगह रंगों भरी पिचकारी डाली जा रही है। कार्टूनिस्ट मनु बेतख्लुस ने इस बार अपनी कूची का रंग कुछ हिन्द-युग्म से जुड़े हिन्दी कर्मियों पर लगाया है। देखें और सराहें--