Thursday, January 22, 2009

कृपया ये अश्लील कविताएं न पढ़ी जाएं....

आकाशवाणी से मोह लगभग 10 साल पुराना है....जमशेदपुर में था जब पहली दफा युववाणी कार्यक्रम के ज़रिये अपनी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी....देश के हर शहर में युववाणी ही है, जिसकी कृपा से युवा लोग अपनी आवाज़ पर खुश हुआ करते हैं...माने, युववाणी मुझ जैसे हज़ारों मुंगेरीलालों के हसीन सपने की तरह हुआ करता है...
बहरहाल, युववाणी से आगे आवाज़ का सफ़र बहुत आगे बढ़ चुका है मगर दिल्ली में जब भी मौका मिलता है, युववाणी के कार्यक्रमों में शिरकत ज़रूर करता हूं.....आज भी जब युववाणी से गणतंत्र दिवस पर आयोजित काव्य गोष्ठी में अपनी कविता पढने का निमंत्रण मिला तो खुशी-खुशी गया....
स्टूडियो में बैठना बहुत पुराना अनुभव है, मगर बतौर कवि कम ही मौके मिले हैं.....रिकॉर्डिंग रूम के सामने हमारा ऑडियो लेवल वगैरह सेट करने बैठी थीं युवववाणी की प्रोग्राम अधिकारी रंगोली श्रीवास्तव.....दिल्ली में युववाणी से परिचित हर कोई इस नाम से परिचित ज़रूर होगा....रिकॉर्डिंग रूम में तीन युवा कवि बैठे थे...पंडित प्रेम बरेलवी, जितेंद्र प्रीतम और मैं...संचालक प्रेम ने जितेंद्र को अपनी कविता पढ़ने को कहा तो जितेंद्र मंचीय कवि की तरह आलाप भरकर कुछ गाने लगे....कविता में एक आशावादी पंक्ति ऐसी थी जिसमें कोई हिंदू नाम कुरान पढे और मुसलमान पात्र गीता तो अमन फैले....बस, इतना पढ़ते ही रिकॉर्डिंग रोक दी गयी...रंगोली जी को लगा कि यहां जो भी पढ़ा जा रहा है, वो भावनाओं को भड़का देगा....उनके चेहरे पर चिंताएं तो थीं, मगर वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी....उन्होंने कहा कि मुझसे ग़लती हो गयी कि मैंने सभी कवियों की कविताएं पहले से पढ़ी नहीं....
फिर, जो कविताएं मुझे पढनी थीं, वो भी उन्हें पेश की गयीं...उस कागज़ पर भी रंगोली जी ने कलम चला दी थी....कुछ पंक्तियों को उनकी कलम ने काट खाया था....

एक देश जहां शौचालयों से वाचनालयों तक,
व्यर्थ ही होती दिखी है ऊर्जा....

(पूरी कविता यहां है- ....एक ख़ास पल)
मतलब, मुझे कविताएं पढनी थीं, मगर उन पंक्तियों के बग़ैर....मैंने हंसते हुए कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि ये पंक्तियां अच्छी हैं, मगर "अश्लील" हैं...शौचालय जैसा शब्द कविता में आना ही नहीं चाहिए....इसे ग़लत संदेश जायेगा...उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर कविता पढने आये हैं तो कुछ देशभक्ति की रचनाएं पढिए, क्यूं ये सब पढ रहे हैं....
मेरे पास दो और कविताएं थीं जिनपर रंगोली जी ने अपनी कलम चलायी थी...ये हैं वो पंक्तियां..आप भी ये अश्लील पंक्तियां पढें....(पूरी कविता यहां पढ सकते हैं..."हम ख़बर हैं,बाक़ी सारा भ्रम है")

मुझको तो हर एक क़दम पर डर लगता है,
कहां-कहां तक तुमको मैं बतलाऊं पापा...
चार दवाओं की पुर्जी भर लिख देने के,
डॉक्टर पूरे दिन की कमाई ले लेता है,
धरती के भगवान अगर ऐसे होते हैं,
वो भगवान नहीं दिखता है, मुझे सुकूं है....

(अथ रंगोली उवाच- आप डॉक्टर जैसे महान पेशे के बारे में ऐसा कैसे लिख सकते हैं...लोग सुनेंगे तो बुरा असर पड़ेगा...आप अपने अनुभव के बल पर सबको बुरा नहीं कह सकते...)....

डर लगता है दूध के पैकेट में ना जाने,
बनिए ने कोई जादू-वादू घोल रखा है,
ताकि अगली बार उसी दुकान पे आऊं,
ना आया तो “पेट बिगड़ जाए ससुरे का”

(अथ रंगोली उवाच- बनिया एक जातिसूचक शब्द है, इसका प्रयोग अश्लील लग रहा है..... इसके बदले दूधिये वगैरह जैसा शब्द इस्तेमाल किया सकता है....वैसे पंक्ति ही हटी दी जाये, तो बेहतर)

एक और कविता थी, मॉल पर....उसकी अश्लील पंक्तियां ये रहीं-
(पूरी कविता यहां है- "मॉल है या कि अजायबघर है")

रोज़ परफ्यूम छिड़ककर किसी अजीज़ के साथ,
लोग पहुचते हैं उस बियाबां तक...


ख़ैर, जैसे-तैसे वहां से लौटा और मुझे लगा कि गणतंत्र दिवस पर ये ज़रूरी है कि हम बैठक में इस पर गहनता से सोचें कि आखिर देश के अनगिनत लोगों तक पहुंचने वाला सरकारी भोंपू आकाशवाणी कब अपनी परिभाषाएं बदलेगा....हो सकता है, आकाशवाणी में ऐसी दायित्व भरी कुर्सी पर बैठने वाला हर अधिकारी रंगोली जी जैसा आलोचक व काव्य प्रेमी न हो, मगर सरकारी महकमे में ऐसे किस्से आज से 60 साल बाद भी मिलेंगे, ये मुझे पूरा विश्वास हो गया....आदरणीय रंगोली जी, ठीक है कि बेहद ऊंची कुर्सी पर आसीन हैं, मगर विनम्र निवेदन है कि हम स्लमडॉगनुमा कवियों को अश्लील रचनाएं पढने दी जाएं, कैंची चलाने का काम उन्हीं को करने दीजिए, जो इसकी काबिलियत रखता हो....जय हो....

ग़ालिब का एक शेर भी याद आ रहा है, कहता चलूं-
न सताइश की तमन्ना, न सिले की परवाह,
ग़र नहीं हैं मेरे अशआर में मानी, न सही....


निखिल आनंद गिरि

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33 बैठकबाजों का कहना है :

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

बहुत ज्यादा तो नहीं पर दो मुलाकातों में जितना जाना जा सकता है उतना ही मैं रंगोली जी को जानता हूँ,उनसे इससे अधिक की उम्मीद करना अपने आप में बड़ी गुस्ताखी है.... वैसे भी बात सिर्फ़ एक रंगोली या हिंडोली की नहीं ,वो तो महज प्रतीक ही हैं सरकारी कुर्सी की.
खैर,आपने बिल्कुल सही कहा कि आने वाले ६० सालों बाद भी वे ऐसे ही रहेंगे,कारन के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वो सरकारी हैं...
रही बात श्लील और अश्लील की तो सच तो यह है कि हम अश्लील वाली ही चुनेंगे... इसे मेरा ओछापन समझा जाए या फ़िर बचपना...
आलोक सिंह "साहिल"

SWAPN का कहना है कि -

mere vichaar men is desh ke logon ki mansikta ko dekhte hue rangoli ji theek hain. bura na maane ye meri apni soch hai. swapn

ajay का कहना है कि -

सरकारी तंत्र की क्या हकीकत है शायद इसे बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. १०० साल पुरानी परम्परा के वाहक का कार्य वो ही कर रहे है. इसमे रंगोली जी का कोई दोष नहीं, क्योंकि ऊपर बैठे लोग ही इस तरह की संकीर्ण मानसिकता से नहीं निकलकर आना चाहते. वैसे मुझे नहीं लगता है की आपकी कविता में ऐसी किसी भाषा का प्रयोग किया गया था जो आपत्तिजनक हो...हाँ “शौचालय” अगर उन्हें अश्लील लगता है, तो भारत सरकार स्वस्थ्य मंत्रालय द्बारा “कंडोम” के विज्ञापन पर रंगोली जी क्या कहेंगी?

Dr. Amar Jyoti का कहना है कि -

नौकरशाहों से और क्या उम्मीद करते हैं आप?
बिहारी ने बहुत पहले इसी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी थी:-
'कर लै सूंघ सराहि के सबै रहे गहि मौन।
गंवई गांव गुलाब को गन्धी गाहक कौन?'

manu का कहना है कि -

निखिल जी,
बहुत ही अचम्भा हुआ वो लाइने पढ़कर जिन पे कैची चली..अगर ये अश्लील है तो फ़िर श्लील क्या है....और वो बेचारा आपसे पहले वाला कवि जो अपनी कविता में सौहार्द पैदा कर रहा था वो "भावनाएं भड़काने वाला" हो गया ..इन रंगोली बिन्गोली को बोलीवुड भेजो यार ...काहे यहाँ आकाशवाणी पर झख मार रही है....

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

सबसे अजीब बात यह है कि १५ अगस्त और २६ जनवरी के बहाने हम जिस स्वतंत्रता और गणतंत्रता की वर्षगाँठ मनाते हैं, वह तो इन दो खास मौकों पर भी नहीं दीखतीं। ज़रा सोचिए कि हम अपने अनुभव भी स्वतंत्र रूप से नहीं बाँट सकते।

वह जामाना अलग था, जब लोग स्वतंत्रता के लिए जान की परवाह नहीं करते थे। अब तो हम कुछ कहने से पहले भी इस बात से भयभीत रहते हैं कि इसपर कहीं पॉलिटिक्स न हो। रंगोली जी ने जो किया वैसा हर एक आकाशवाणी केंद्र में होता है। मुझे याद है कि आज से ठीक एक साल पहले मैं रंजना भाटिया, मनीष वंदेमातरम्, भूपेन्द्र राघव, राशी जमुआर, अवनीश गौतम, निखिल आनंद गिरि और अजय यादव के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो 'डीयू-एफ एम' के कार्यक्रम 'कवि डॉट कॉम' की रिकॉर्डिंग के लिए लोधी गार्डन, दिल्ली में उपस्थित था। यह कवि गोष्ठी भी गणतंत्र दिवस के लिए थी।

निखिल जी,

शायद आपको याद हो, कार्यक्रम के संचालक आप ही थे। आपने सबसे पहले मुझे ही कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया था। मैं अपनी पहली कविता पढ़ी 'कितना मुश्किल होता है' । उसमें आखिरी पंक्तियाँ थी-

तू मजबूर का अवतार
फिर तू रावण क्या
लालू से भी नहीं मिल पायेगा।

डीयू-एफएम प्रमुख और इस कार्यक्रम के सूत्रधार प्रदीप शर्मा ने मुझे टोका और कहा कि आपको कविता की अंतिम पंक्तियाभ बदलनी होगी। 'लालू' हटाना होगा। बदलकर कविता क्या हुई, पूरी गोष्ठी सुनकर ही जान लें।

मेरे हिसाब से मुझे भी उस समय इस बात का विरोध करना चाहिए और निखिल जी आपको भी आज आकाशवाणी में करना चाहिए था। लेकिन शायद खुद की आवाज़ को रेडियो पर बजवाने का मोह हमको ऐसा करने से रोकता है।

तपन शर्मा का कहना है कि -

वाह रे हमारा २१वीं सदी का देश...
पूरा लेख पड़ा..और टिप्पणियाँ भी.. अब हँसी आ रही है...वैसे ये रंगोली जी के ऊपर बैठे सफेद कपड़े के लोगों का असर है..
अगर शैलेश भाई आप "लालू" बोल देते तो प्रदीप जी और आप, दोनों कभी ट्रेन में नहीं बैठ पाते.. :-)
अजय जी की बात से सहमत.."शौचालय” अगर उन्हें अश्लील लगता है, तो भारत सरकार स्वस्थ्य मंत्रालय द्बारा “कंडोम” के विज्ञापन पर रंगोली जी क्या कहेंगी?"

रंजना का कहना है कि -

koi uchh pad par aaseen ho jane se sankeern maansikta se to nahi ubar jata...
in longon se isse adhik apeksha karna vyarth hai.

पंगेबाज का कहना है कि -

हमने कतई नही पढी जी समझ लिया कंडोम का विज्ञापन है , आपतो ये समझो हम यहा आये ही नही :)

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

अमर ज्योति जी,
नौकरशाहों से बहुत उम्मीदें हैं मुझे....लेकिन, वो हर बार उम्मीद तोड़ जाते हैं...क्या करें...
शैलेश जी,
आवाज़ का मोह तो है मगर ऐसा भी नहीं कि विरोध न कर सकूं...ख़ैर,ब्लॉग के माध्यम से विरोध तो जता ही रहा हूं.....

निखिल

रौशन का कहना है कि -

बेमतलब की काट छाँट से कविताओं का मर्म ख़त्म हो जाता है ये ऐसे लोगों को समझ में नही आ पाता

pooja का कहना है कि -

क्या सिर्फ़ रंगोली जी, आकाशवाणी या नौकरशाही को दोष देकर हमारा उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है?

निखिल जी,
आज आपने ब्लॉग के माध्यम से विरोध किया है, अगली बार आप ऐसी गोष्ठी का बहिष्कार कर सकते हैं.......और यकीन जानिए ऐसा करके आप सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं औरों के लिए भी रास्ता बनायेंगे. टिप्पणियों से यह तो ज़ाहिर हो ही गया है कि बहुलता आपके साथ है. हमारी शुभकामनाएं भी आपके साथ हैं.

पूजा अनिल

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

शुक्रिया पूजा..
निखिल

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आकाशवाणी से ऐसा अनुभव आज से पचास साल पहले दिग्गज कवि-व्यंगकार स्व. रामानुजलाल ऊँट बिलहरीवी को हुआ था उन्होंने फ़िर हजारों माफियों और अनुरोधों के बाद भी कभी आकाशवाणी को नहीं अपनाया. गत दो दशकों से मैंने भी आकाशवाणी का बहिष्कार किया है पर वहाँ अवसर की तलाश में सैंकडों खड़े हैं जिन्हें किसी भी कीमत पर पढ़ना है. रचना में हस्तक्षेप के साथ-साथ पारिश्रमिक में दलाली भी खुले आम हो रही है. रंगोली तो तंत्र का अदना सा पुर्जा हैं जो उचित-अनुचित का विचार करने के लिए नहीं, दिए गए निर्देशों का आँख मूंदकर पालन करने-कराने के लिए तनखा पाते हैं. स्वतंत्रता चाहनेवालों को सरकारी तंत्र का खुल्लमखुल्ला विरोध करने के साथ अपनी आवाज को सशक्त भी बनाना होगा. हिंद युग्म इस पूरी चर्चा को महत्त्व देकर पाठको-रचनाकारों की राय को मंत्री, सचिव, स्टेशन डायरेक्टर तक भेजे तो सरकारी कुम्भ्करनी तन्त्र में हलचल होगी

Karuna का कहना है कि -

संजीव जी,
आप तो जानकार दिखते हैं, आप ही इस मुहिम को आगे तक ले जाएं...
करुणा

puja का कहना है कि -

निखिल जी...ये बिडंबना ही है...कि
हमारे देश को स्वतंत्र हुए आधी सदी से भी ज्यादा का वक्त गुजर गया..लेकिन आज भी हम तुच्छ मानसिकता के गुलाम है...आप इस बात को क्यूं भूल जाते हैं..कि आज आबादी के हिसाब से भले हम दूसरे नंबर पर हैं..लेकिन शर्म और हया की बातें भी सबसे ज्यादा हम हीं करते हैं।

vandana का कहना है कि -

aapne kafi sahi kaha aur kiya.vaise hamare desh mein ye halat na kabhi badle hain aur na badlenge,na logon ki soch badli hai unhein jahan jaise lejao chalte jate hain apne aap kam aur jo doosra kahta hai us par jyada sochte hain aur yah sabse badi galti hai.

डॉ प्रेम जनमेजय का कहना है कि -

प्रिय भाई..
आपका संस्मरणात्मक,आक्रोशपूर्ण आलेख पढ़ा....ये चुनौती पेश करता है उन लोगों को जो साहित्य के क्षेत्र में पुरातनपंथी हैं....
बधाई...

Hardik Mehta का कहना है कि -

ek khas pal

abhi padhi....
kaafi achchi thi - yeh tum 26 ko padhnewaale ho na?

and somehow i thought ur criticism in the poetry was more than the satire - because i think satire is your powerful armour - crticism is for writers - you are a poet here - when u are desrcibing - also although mujhe tumhari har kavita padhne ki mazaa aati hai - lekin sabse zyada mazaa jo satire mei hai...

i hope u uunderstand...
by the way mera bhi ek article chapaa hai - time mile tab padhna...


♫ http://passionforcinema.com/lessons-on-filmmaking-from-the-office-peon/

neelam का कहना है कि -

aalekh padha , dukh bhi hua, par itna jaroor kahenge ki nar ho n niraash karo man ko ,pahley sarkaari mahkame ke khilaaf aawaj uthaai jaay ,aur kuch bhi n ho kahi to shailesh ji ek online radio ki vyavastha ki jaay ,abhivyakti ka adhikaar to
samvidhaan se mila hai ,hum apna
kaam to karenge hi ,
nikhil ji haar nahi maanni hai
kisi bhi keemat par online radio par rangoli ji ko bulwa kar unse hi kuch kavitaayen bhi suni jaa sakti hain ,hahaahahhhahaahahaha

Anonymous का कहना है कि -

निखिल आपका अनुभव पढ़कर उतना ही बुरा लगा जितना किसी भी साहित्य प्रेमी को लगना चाहिये। लेकिन क्या कीजियेगा... इस आक्रोश की ज्वाला में अक और कविता पका लीजिये... बड़ी मुश्किल से मिलती है ये आग... कभी कभी लगता है कि ये रुकावटें और सरहदें अगर न होतीं तो प्रवाह को नई ज़मीनें कहां से मिलतीं...
नाज़िम नक़वी

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

नीलम जी,
ऑनलाइन रेडियो का प्रस्ताव बुरा नहीं है...इस पर गहनता से सोचा जाने चाहिए...हिंदी को नेट पर लाने का ये भी एक प्रयास होगा....
निखिल

sunita yadav का कहना है कि -

विस्मित हूँ ! भावनाओं पर कैंची चलना कुछ हजम नहीं होता ...
सुनीता

SUNIL DOGRA जालि‍म का कहना है कि -

कमाल है...... ऐसा ही एक वाकया हुआ था कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश मैं जब एक विधायक को सांस्कृतिक प्रकोष्ठ का प्रमुख बनाया गया तो उन्होंने अपने दफ्तर से पेंटिंग उतरवा दी और कहा की यह अश्लील है

... यही सच्चाई है...

Nirmla Kapila का कहना है कि -

aapka aalekh aur coments pade kuch soch nahi paa rahi kya theek hai kya galat abhivyakti ki savtantarta ka ye matlav nahi ki ashleelta ko sahitaye me bhara jaaye

neelam का कहना है कि -

nirmala ji kya nikhil ji jo kahana chaahte hain ,wo saara ashleel hai
katai nahi .
kuch to tarksangat ho.

manu का कहना है कि -

shaayad nirmalaa ji ne lekh theek se naheen padhaaa hai....
ek baar dobaraa padh kar vichaar kar ke bataayein ke aakhir in kavitaaon mein kyaa galat hai........
agar hai to SABHI KAAVY UPANYAAS PAINTINGS sab ashleel hai....
hamein apni rachnatmaktaa kaa galaa hi ghont denaa chaahiye..
translate kaam naheen kar rahaa hai....SORRY

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

निर्मला जी,
ज़रा विस्तार से टिप्पणी करें....कुछ साफ समझ नहीं आया, क्या कहना चाहा है अपना..

निखिल

Nirmla Kapila का कहना है कि -

nikhil ji mere comment kaa matlav aapki kavita se nahi balki kaant chhaant ko le kar tha is pavitr parv par kam se kam desh ke baare me kuchh achhi baaton ka ullekh hona chahiye agar ham sara saal desh ki har cheej ko koste hain to kam se kam ye din to kuch skaaratmak baton ke liye chhod lena chahiye ye mere man ke bhav hai bas aur koi matlav nahi tha agar aapko bura laga ho to kshma chaahti hoon

Nirmla Kapila का कहना है कि -

nikhil ji mere comment kaa matlav aapki kavita se nahi balki kaant chhaant ko le kar tha is pavitr parv par kam se kam desh ke baare me kuchh achhi baaton ka ullekh hona chahiye agar ham sara saal desh ki har cheej ko koste hain to kam se kam ye din to kuch skaaratmak baton ke liye chhod lena chahiye ye mere man ke bhav hai bas aur koi matlav nahi tha agar aapko bura laga ho to kshma chaahti hoon

rituraj का कहना है कि -

एक घटना बताता हूं. पिछले साल भारतीय विद्या भवन के फ़िल्म टी.वी. दिपार्तमेंट में प्रदीप शर्मा जी आये थे. कुछ कविता रिकार्ड करना था उन्हें स्वतंत्रता दिवस के लिये.

दो तिन कवि के बाद मेरी बारी आई.
जब मैंने शुरु किय
" हम आवाज़ उठाएंगे अपने देश में
स्वतंत्रता सेनानी के वेश में"
रिकार्डिंग शुरु हो गई थी.
जब मैं यहां पहूंचा

" खादी की टोपी लगाये इन नेताओं को
कारण बताना होगा इतने बडे फ़र्क के लिये
१० प्रतिशत ही क्यों उठाते है सुविधा का भोग
और ९० प्रतिशत के बेडा गर्क के लिये"
शर्मा जी को लगा जैसे कोई पहाड गिर पडा.
तुरन्त बोले "नहीं नहीं..ये कविता नहीं चलेगी.
कोई दूसरी हैं."
मैंने पूछा "क्या हुआ सर?"
वो बोले "नहीं कोई दूसरी कविता सुनाओ."

मैंने शुरु किया.
" एक बताओ मेरे प्यारे मज़हब का रंग चढाते क्यों हो?"

"नहीं नहीं ये भी नहीं चलेगा" बीच में ही रोकते हुए वो बोले.
मैंने कहा "सर अभी आगे तो सुनिये."
वो बोले नहीं इसमे मज़हब नहीं आना चाहिये.
मेरी जो हालत हुई, आप समझ सकते है.
फिर मैंने स्वतंत्रता दिवस के लिये एक प्रेम गीत गाया.
" कभी दिल में मिलो कभी गुल सी खिलो
करवट करवट मेरे साथ रहो
मेरे साथ साथ हर बाट बाट हे प्रियसी
मेर संग चलो "
मुझे तो बडा अजीब लगा था. अब ये निर्धारित करेंगे कि क्या आना चाहिये और क्या नहीं?
खैर मैंने सोच लिया कि अपने शब्दों को जैसी मर्जी वैसी आवाज़ देनी चाहिये.
आप भी वही करे. मेरा साथ रहेगा और भी लोग होंगे. जरूर.

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

हा हा हा...बढिया अनुभव...ये समझिए कि जो आपके साथ हुआ, वो हमने अपने शब्दों में बयां कर दिया....इतने कमेंट्स देख कर लगता है कि ये बहस और भी बड़े पैमाने पर होनी चाहिए....ये सरकारी ढांचा सचमुच बदलने का समय आ गया है अब....बैठक पर आते रहें और टिप्पणी भी करते रहें.....
निखिल

Anonymous का कहना है कि -

Pedro, I don't think so :D

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