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Monday, February 02, 2009

वो "पब" याद आये, बहुत याद आये....


कोई भी लेख लिखना जाने क्यूं मुझे असुविधा जनक सा लगता है.....पर कभी-कभी ऐसा कुछ घट जाता है के ये बेहद मुश्किल काम भी किए बग़ैर चैन नहीं पड़ता...अभी एक ख़बर पढ़ी थी मंग्लुरु की...एक नयी- नवेली सेना द्बारा पब संस्कृति के विरोध की ......पब संस्कृति का मैं भी किसी भी तरह से पक्षधर नहीं हूँ.....ना यूँ खुले आम उन्मुक्तता ही मुझे पसंद है.....हाँ खुला होना एक अलग बात है...लिहाजा मुझे भी इस सेना का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि मेरे ख्यालात समझ कर उनहोंने इस का विरोध किया... मगर क्या विरोध किया.....? क्या किसी को ऐसा करने का हक है..? विरोध करने के क्या यही तरीके रह गए हैं...?
अगर लड़कियों के बयान पर भी गौर करें तो (और गौर क्यूं ना करें..? वो भी तो इसी मुल्क की नागरिक हैं... ना भी हों तो इंसान तो हैं ही..) तो उनके मुताबिक वहाँ पर विरोध प्रकट करने के नाम पर जो मार-पिटाई हुई...बाल पकड़ कर घसीटा गया...बदतमीज़ियां की गयीं......और तो और कपड़े तक उतरवाने की बात हो गयी.. तो अब इस विरोध का क्या अर्थ निकाला जाए...क्या वास्तव में ये लोग "नग्नता" का विरोध करने गए थे...साफ़-साफ़ नहीं लगता आपको कि कौन-सी कुंठाएं लेकर गए थे वहाँ पर...? इस से अधिक स्पष्ट तो मेरे ख्याल से और क्या होगा...?

हो सकता है सेना प्रमुख कहें कि इस में कुछ बाहरी लोग भी शामिल हो गए होंगे...... लेकिन एक आग के ख़िलाफ़ दूसरी आग भड़काना कहाँ तक ठीक है...और इस आयोजन से होने वाले नुक्सान का जिम्मेवार कौन है...."नुक़सान" से मेरा मतलब है कि उन लड़कियों के सारे नही तो कुछ बयानों में तो सच्चाई होगी ही .... यही कहा जायेगा कि सब राजनीति का खेल है.....चुनाव का चक्कर है ......पब्लिसिटी स्टंट है....और बात ख़त्म ..... हाँ मालूम है कि इन महान लोगों के बगैर तो ना राजनीति चल सकती है, ना चुनाव ही हो सकते हैं ...और देश का, कल्चर का, सभ्यता-संस्कृति का तो उद्धार कदापि नहीं हो सकता.....पर ज़रा उन चंद लड़कियों के दिल से तो कोई पूछ कर तो देखे कि उस वक्त उनके दिल पर क्या बीती होगी ...चाहे कैसी भी ग़लत राह पर कुछ युवा जा रहे हों ...पर ये अपमान किस तरह से शोभा देता है....इस से हमारी कौन सी सभ्यता का सिर ऊंचा हो जायेगा...कौन सी संस्कृति फले-फूलेगी.....और नैतिकता ...........????

इश्वर किसी को भी इतना नैतिक ना बनाए ..जिन्हें दंगे फसाद टाइप के ये आयोजन भी नैतिक कार्यवाई लगते हों, उनकी अक्ल पर हंसूं या रोऊँ ....अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का सबको हक है...हाँ ...जो संयम से, सही तरीके से जियेगा वो ख़ुद पर अहसान करेगा....और नहीं तो जल्द बर्बाद हो जायेगा ...इससे ज्यादा और क्या.......

(दोनों कार्टून लेखक ने ही बनाये हैं...)

मनु "बे-तक्ख्ल्लुस

Saturday, January 24, 2009

सोने का पिंजर (2)

दूसरा अध्याय

क्या धरा है ऐसी ममता में जहाँ की धरती पर मच्छर हैं, मक्खी हैं।

चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा है, अल्मारी से शक्कर का डिब्बा जैसे ही उतारा तो पता लगा कि अरे शक्कर तो है ही नहीं। अब चाय कैसे बने? बैठकखाने में मेहमान बैठे हैं। माँ धीरे से बेटी को पुकारती है, और फुसफुसाहट करती हुई बेटी को समझाती है कि ‘पीछे के दरवाजे से जा और पड़ौस की काकी से एक कटोरी शक्कर माँग ला।’ शक्कर पीछे के दरवाजे से आ जाती है। लेकिन तुम्हारे यहाँ, बहुत कठिन है, रीत गये डिब्बे में शक्कर की आवक, वह भी पीछे के दरवाजे से। बेटा-बहू नौकरी पर गए, माँ अकेली है। घर का सारा काम निपट गया है, अब घर की डोली पर बैठकर पास वाली से बातें करेंगे। कितना सकून भरा है यह क्षण। एक पल भी एकान्त नहीं, अकेले होने का डर नहीं।
तुम्हारे पास एकान्त-साधना का बहुत समय है। बेटा-बहू या बेटी-दामाद नौकरी पर गए और अकेले हो गए बूढ़ा-बूढ़ी।
बूढ़ा बोलने लगा कि "अरी भागवान कैसे सुंदर दिन आए हैं, सारा जीवन बीत गया लेकिन तुझ से एकान्त में बात करने का अवसर ही नहीं मिला। अब देख यहाँ केवल तू है और मैं हूँ। सारा दिन अपना है।"
बुढ़िया भी खुश हो गयी, बोली कि "हाँ तुम सच कहते हो। और देखो कैसा आराम भी है! नल में गर्म और ठण्डा पानी दोनों ही आते हैं, फटाफट बर्तन साफ हो जाते हैं। अपने देस में तो मरी महरी के सौ नखरे थे, कभी आती और कभी नहीं। सर्दी में उसे गर्म पानी चाहिए था तो पहले मरी सिगड़ी पर गर्म करके देती थी पानी और बाद में जब गैस आ गयी तब उस पर पानी गर्म करके देती थी, तभी उसके हाथ चलते थे। यहाँ सारे नखरों से ही दूर हैं, देखों तो हम कैसे सब मिलजुल कर काम कर लेते हैं।" फिर हँसकर बोली कि "वहाँ तो तुम भी खटिया तोड़ते थे, लेकिन यहाँ तो मेरे साथ हाथ बँटा ही लेते हो।"
बूढ़ा बोला कि "मेरे मन में विचार आता है कि हम गाँव में बेचारी बड़ी बहू को बेकार में ही डाँटते रहते थे। सारा काम वो ही करती थी, तू भी खटिया पर पड़ी चाय पीती थी और बेचारी बहू खाना भी वहीं खिला देती थी। तब भी तू उसे गाली दिए बिना रहती नहीं थी। आज क्या हुआ तेरी जुबान को? अब तो तू एकदम चुपचाप है, कभी तूने अपने हाथ से पानी भी नहीं पीया और यहाँ तो तू बर्तन भी माँज रही है।"
सब समय-समय का खेल है। क्या करें, अब दोनों ही नौकरी करे हैं तो हमें भी तो कुछ करना ही पड़ेगा न! फिर ठाले बैठे यहाँ करे भी तो क्या? मरा टी.वी. पर भी तो अंग्रेजी में ही गिट-पिट आती रहे है। फिर अचानक ही मायूस हो जाती है और बोलती है कि "जी, अपने देस कब चलोगे?"
"क्यों यहाँ आने को तू ही तो बड़ी तड़प रही थी।"
"वो तो सही है, लेकिन अपने घर-बार की याद आने लगी है। पड़ौसन की बहु के बाल-बच्चा होने वाला था, अब तक हो गया होगा। घर में गीत गँवे होंगे। सारी ही मुहल्ले की औरते आयी होंगी।"
"लेकिन तेरे बिना तो गीतों में मजा ही नहीं आया होगा। तेरा गला ही तो सबसे अच्छा था।"
"अजी ऐसा नहीं करें कि अपन भी यहाँ गीत गवा लें।"
"कहाँ गवाएँगी? आस-पड़ौस से गौरी-काली औरतों को बुलाएँगी कि मेरे साथ गीत गाओ।"
"नहीं जी, तुम तो मजाक करो हो, मैं कह रही थी कि एक दिन मंदिर ही चलें, वहाँ भजन ही गाएँगे।"
"चल अच्छा है, बेटे को आने दे, बात करेंगे।"
"अरे अपन ही चल चलें, नीचे मोटर-गाड़ी कुछ तो मिल ही जाएगी, पूछते-पूछते चले जाएँगे।"
"नीचे मोटर-गाड़ी? यहाँ तेरा शहर है जो घर के बाहर ही टेम्पों मिल जाएगा? तूने देखा नहीं कैसी बड़ी-बड़ी सड़कें हैं। सड़कों पर बस गाड़ियाँ ही दौड़ती रहे हैं, आदमी तो दिखे ही ना है। किससे पूछेगी रास्ता? अब बेटे को आने ही दे।"
"अरे बेटा तो नौकरी से थका-हारा आएगा, रात को। तब कौन सा मन्दिर और कौन से भजन?"
"अब के शनिवार को कह देखेंगे।" बूढ़े ने आश्वासन दिया।
"कल ही तो शनिवार है। आज शाम को ही बात चलाएँगे।"
शुक्रवार की शाम है, बेटा-बहू दोनों ही काम से जल्दी आ गए हैं। आते ही बेटा बोला कि "माँ, कल हम सब घूमने जाएँगे। बहुत दिनों से कहीं गए नहीं हैं तो इस वीकेंड पर समुद्र किनारे घूमेंगे। वहाँ के होटल की बुकिंग बहुत मुश्किल से मिली है।"
"बेटा हम वहाँ जाकर क्या करेंगे? हमें कहीं किसी मंदिर में ही छोड़ आ। सारा दिन भजन गाने में ही निकल जाएगा।"
"अरे यहाँ इतना आसान नहीं है, जितना अपने गाँव में था। वहाँ छोड़ भी दूँगा तो सारा दिन क्या करोगे? फिर आप मेरा मूड मत बिगाड़ो। बस मैं जैसा कहता हूँ वैसा करो।
समुद्र किनारे देखना कैसी-कैसी मछलियाँ हैं? ऐसा सी-वर्ल्‍ड तुम्हारे गाँव में नहीं है।"
"बेटा, गाँव तो वह तेरा भी है।"
"हाँ, वही।" बेटे ने बड़ी अनिच्छा से कहा।

देखा तुमने, कैसे बेटा अपने ही गाँव को अपना कहने में शर्म कर रहा है। वह तुम्हें अपना बता रहा है। भला तुम उसके कैसे हो सकते हो? तुम क्या नहीं जानते कि मनुष्य की तन की और मन की जरूरते अलग-अलग होती हैं। तन कुछ और चाहता है और मन कुछ और। तन तो सारे ही सुख चाहता है लेकिन मन अपने अतीत में ही लौट जाना चाहता है। मुझे लगता है कि तुमने दुनिया को कितना दिया है इसका हिसाब तो मेरे पास नहीं है, लेकिन लोगों के मन के संतोष को तुमने जरूर छीन लिया है। सारे ही सुखों के बीच भारतीय व्यक्ति तुम्हारी धरती पर रहता है, लेकिन उसका मन उसे अपनी धरती की ओर खींचता है। मैं अपने मन की बात बताऊँ, मेरी उम्र 57 वर्ष होने को है, मैंने अपना बचपन जिस धरती पर बिताया उसे छूटे तैतीस वर्ष से भी अधिक हो गए। लेकिन आज भी सपने चाहे किसी के आएँ, सपने में घर तो वहीं बचपन का होता है। यह क्या रहस्य है, मुझे अभी तक समझ नहीं आया! मैं तुम्हें बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि मन का ऐसा ही रहस्य है। बचपन का स्वाद ही उसकी जुबान पर होता है। बचपन में जब माँ गुड़ का हलुवा बनाती थी, तो उसकी महक आज भी नथुनों में बसी है। तुम्हारे यहाँ कहाँ है वह महक? बस जब मन उस बचपन की महक के लिए तड़पता है तब तुम्हारे गुदगुदे बिस्तर पर उसे नींद नहीं आती। यौवन में तो मन के ऊपर तन हावी रहता है लेकिन जैसे ही यौवन ढलने लगता है, मन अपना करतब दिखाना शुरू कर देता है।
यौवन में तुम्हारी चकाचौंध सभी को तो अपनी ओर आकर्षित करती है। भारत के घर से बाहर कदम रखते ही नाक पर रूमाल रखना पड़ता है। टूटी सड़क पर, पानी का जमाव आम बात है। घर से धुले-साफ कपड़े पहनकर बाहर निकले, सड़क पर आए और तेज गति से आती मोटर-साइकिल ने छपाक से पानी को उछाल दिया। सफेद कलफ लगे कपड़े कीचड़ से सन गए। कहीं कच्ची बस्तियाँ बसी हैं, नीले प्लास्टिक के कपड़ों से तने है छोटे-छोटे घर। वहीं सूअर भी हैं और कुत्ते भी। मनुष्य के बच्चे और जानवरों के बच्चों में अंतर नहीं दिखायी देता इन बस्तियों में। एक तरफ ऐसी बस्तियाँ हैं तो दूसरी तरफ आलीशान कोठियाँ खड़ी हैं। यही अन्तर लोगों को तुम्हारी ओर आकर्षित करता है। सपने सत्य करने के लिए तुम्हारी धरती उन्हें पुकारती है। वे अपने चारों तरफ पसरी गन्दगी को मिटाने का संकल्प नहीं लेते, अपितु स्वयं ही भागने का मार्ग ढूँढ लेते हैं। जरा सा पढ़ने में तेज क्या हुआ, वह सपने में तुम्हें ही देखता है। पंजाब का लड़का तो तुम्हारे यहाँ ही ढाबा खोलना चाहता है। उसे पता है कि भारत की जीभ बहुत चटोरी होती है, उसे यहीं के मसालों की आदत होती है। वह तुम्हारे यहाँ आ जाता है अपना तंदूर लेकर। नान बनने लगती है, भटूरे बनने लगते हैं।
तुम भी जानते हो कि भारत के खाने का जवाब नहीं, अतः आने दो पंजाबियों को। भारत से इतने इंजीनियर, डाक्टर यहाँ आएँ हैं, उन्हें भारत का खाना नहीं मिलेगा तब कहीं वे भाग नहीं जाएँ? तुमने उन्हें आने दिया। तुमने हर उसको आने दिया जो तुम्हारे काम का था। लेकिन तुमने उसे नहीं आने दिया जो तुम्हारे काम का नहीं था। इसी आवाजाही में हमारी अँगुली से भी हाथ छूट गया। तुम्हारे यहाँ की शिक्षा का एक स्तर है, ऐसा विश्वप्रसिद्ध हो चला है। हमारे जैसे लाखों माँ-बापों ने सोचा कि बेहतर शिक्षा जरूरी है। हम भी गाँव की देहरी से निकलकर बेहतर शिक्षा के लिए शहर आए थे तो आज हमारे बच्चों का भी अधिकार बनता है कि वे भी बेहतर शिक्षा पाएँ। हम गौरव से भरे हुए थे, कि हमने हमारे बच्चों को बेहतर शिक्षा का विकल्प दे दिया। हम भी फूले नहीं समा रहे थे, हम भी अपने आपको विशेष अनुभव करने लगे थे। लेकिन हमारी विशेषता तो हीनता में बदल गयी। तुम्हारी धरती का सम्मोहन ऐसा ही था। वे कहने लगे कि ऐसी स्वर्ग सी धरती पर बसने का सौभाग्य यदि हमें मिला है तब हम आपकी नरक सी धरती पर क्यों आएँ? हम रातों-रात हीन हो गए। हमारा प्रेम, हमारी ममता, इस धरती का जुड़ाव सभी कुछ जाया गया।
क्या धरा है ऐसी ममता में जहाँ की धरती पर मच्छर हैं, मक्खी हैं। अकेले स्वाद के लिए तो उस नरक में आकर नहीं रहा जा सकता। एक प्रश्न भारतीयों से तुम्हारे पास से आया कि तुम भी छोड़ दो इस धरती को।
कैसे छोड़ दें हम हमारी धरती को, हमारे सुख-दुख को? लेकिन बच्चों को लगने लगा कि एक बार यदि माँ-बाप इस धरती को देख लेंगे तब फिर भारत का नाम ही नहीं लेंगे। वे भी जुट जाएँगे, तुम्हारी धरती पर आने के लिए। यह बात तुम भी जानते हो, तभी तो तुमने इतने कड़े नियम बना रखे हैं। भारत में बसे माता-पिता बेचारे अपनी संतानों के मोह में तुम्हारे यहाँ का सुख देखने को लालायित हो उठते हैं। वे सोचते हैं कि एक बार तो जा ही आएँ। जैसे-तैसे पैसा एकत्र करते हैं, कभी बेटा भेजता है, कभी बेटी भेजती है और मन सपने देखने लगता है तुम्हारी धरती के। क्योंकि भारत में स्वर्ग के बाद दूसरे नम्बर पर तुम्हीं आते हो, बस एक बार तुम्हारे यहाँ जा आएँ, यही एकमात्र इच्छा रहती है। व्यक्ति बात-बात में तुम्हारा उदाहरण देता है कि जब मैं अमेरिका में था उन दिनों यह हुआ था, आदि, आदि। वह कैसे न कैसे बता ही देता है कि वह अमेरिका जा आया है। एक बार मैं एक मीटिंग में थी। मेरे पास एक घरेलू सी महिला बैठी थी। उसने अपनी कोई बात रखी लेकिन जो महिलाएँ स्वयं को बहुत ही पढ़ा-लिखा समझ रही थीं वे उनकी किसी भी बात पर ध्यान नहीं दे रही थीं। आखिर उन्होंने भी तुम्हारी ही तुरूप काम में ली। वे बोली कि -वेन आई वाज इन अमेरिका..........। इतना बोलना था कि वे अचानक विशेष हो गयीं। यह है तुम्हारा प्रभाव।
क्रमश:

डॉ अजित गुप्ता

Thursday, January 22, 2009

कृपया ये अश्लील कविताएं न पढ़ी जाएं....

आकाशवाणी से मोह लगभग 10 साल पुराना है....जमशेदपुर में था जब पहली दफा युववाणी कार्यक्रम के ज़रिये अपनी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी....देश के हर शहर में युववाणी ही है, जिसकी कृपा से युवा लोग अपनी आवाज़ पर खुश हुआ करते हैं...माने, युववाणी मुझ जैसे हज़ारों मुंगेरीलालों के हसीन सपने की तरह हुआ करता है...
बहरहाल, युववाणी से आगे आवाज़ का सफ़र बहुत आगे बढ़ चुका है मगर दिल्ली में जब भी मौका मिलता है, युववाणी के कार्यक्रमों में शिरकत ज़रूर करता हूं.....आज भी जब युववाणी से गणतंत्र दिवस पर आयोजित काव्य गोष्ठी में अपनी कविता पढने का निमंत्रण मिला तो खुशी-खुशी गया....
स्टूडियो में बैठना बहुत पुराना अनुभव है, मगर बतौर कवि कम ही मौके मिले हैं.....रिकॉर्डिंग रूम के सामने हमारा ऑडियो लेवल वगैरह सेट करने बैठी थीं युवववाणी की प्रोग्राम अधिकारी रंगोली श्रीवास्तव.....दिल्ली में युववाणी से परिचित हर कोई इस नाम से परिचित ज़रूर होगा....रिकॉर्डिंग रूम में तीन युवा कवि बैठे थे...पंडित प्रेम बरेलवी, जितेंद्र प्रीतम और मैं...संचालक प्रेम ने जितेंद्र को अपनी कविता पढ़ने को कहा तो जितेंद्र मंचीय कवि की तरह आलाप भरकर कुछ गाने लगे....कविता में एक आशावादी पंक्ति ऐसी थी जिसमें कोई हिंदू नाम कुरान पढे और मुसलमान पात्र गीता तो अमन फैले....बस, इतना पढ़ते ही रिकॉर्डिंग रोक दी गयी...रंगोली जी को लगा कि यहां जो भी पढ़ा जा रहा है, वो भावनाओं को भड़का देगा....उनके चेहरे पर चिंताएं तो थीं, मगर वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी....उन्होंने कहा कि मुझसे ग़लती हो गयी कि मैंने सभी कवियों की कविताएं पहले से पढ़ी नहीं....
फिर, जो कविताएं मुझे पढनी थीं, वो भी उन्हें पेश की गयीं...उस कागज़ पर भी रंगोली जी ने कलम चला दी थी....कुछ पंक्तियों को उनकी कलम ने काट खाया था....

एक देश जहां शौचालयों से वाचनालयों तक,
व्यर्थ ही होती दिखी है ऊर्जा....

(पूरी कविता यहां है- ....एक ख़ास पल)
मतलब, मुझे कविताएं पढनी थीं, मगर उन पंक्तियों के बग़ैर....मैंने हंसते हुए कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि ये पंक्तियां अच्छी हैं, मगर "अश्लील" हैं...शौचालय जैसा शब्द कविता में आना ही नहीं चाहिए....इसे ग़लत संदेश जायेगा...उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर कविता पढने आये हैं तो कुछ देशभक्ति की रचनाएं पढिए, क्यूं ये सब पढ रहे हैं....
मेरे पास दो और कविताएं थीं जिनपर रंगोली जी ने अपनी कलम चलायी थी...ये हैं वो पंक्तियां..आप भी ये अश्लील पंक्तियां पढें....(पूरी कविता यहां पढ सकते हैं..."हम ख़बर हैं,बाक़ी सारा भ्रम है")

मुझको तो हर एक क़दम पर डर लगता है,
कहां-कहां तक तुमको मैं बतलाऊं पापा...
चार दवाओं की पुर्जी भर लिख देने के,
डॉक्टर पूरे दिन की कमाई ले लेता है,
धरती के भगवान अगर ऐसे होते हैं,
वो भगवान नहीं दिखता है, मुझे सुकूं है....

(अथ रंगोली उवाच- आप डॉक्टर जैसे महान पेशे के बारे में ऐसा कैसे लिख सकते हैं...लोग सुनेंगे तो बुरा असर पड़ेगा...आप अपने अनुभव के बल पर सबको बुरा नहीं कह सकते...)....

डर लगता है दूध के पैकेट में ना जाने,
बनिए ने कोई जादू-वादू घोल रखा है,
ताकि अगली बार उसी दुकान पे आऊं,
ना आया तो “पेट बिगड़ जाए ससुरे का”

(अथ रंगोली उवाच- बनिया एक जातिसूचक शब्द है, इसका प्रयोग अश्लील लग रहा है..... इसके बदले दूधिये वगैरह जैसा शब्द इस्तेमाल किया सकता है....वैसे पंक्ति ही हटी दी जाये, तो बेहतर)

एक और कविता थी, मॉल पर....उसकी अश्लील पंक्तियां ये रहीं-
(पूरी कविता यहां है- "मॉल है या कि अजायबघर है")

रोज़ परफ्यूम छिड़ककर किसी अजीज़ के साथ,
लोग पहुचते हैं उस बियाबां तक...


ख़ैर, जैसे-तैसे वहां से लौटा और मुझे लगा कि गणतंत्र दिवस पर ये ज़रूरी है कि हम बैठक में इस पर गहनता से सोचें कि आखिर देश के अनगिनत लोगों तक पहुंचने वाला सरकारी भोंपू आकाशवाणी कब अपनी परिभाषाएं बदलेगा....हो सकता है, आकाशवाणी में ऐसी दायित्व भरी कुर्सी पर बैठने वाला हर अधिकारी रंगोली जी जैसा आलोचक व काव्य प्रेमी न हो, मगर सरकारी महकमे में ऐसे किस्से आज से 60 साल बाद भी मिलेंगे, ये मुझे पूरा विश्वास हो गया....आदरणीय रंगोली जी, ठीक है कि बेहद ऊंची कुर्सी पर आसीन हैं, मगर विनम्र निवेदन है कि हम स्लमडॉगनुमा कवियों को अश्लील रचनाएं पढने दी जाएं, कैंची चलाने का काम उन्हीं को करने दीजिए, जो इसकी काबिलियत रखता हो....जय हो....

ग़ालिब का एक शेर भी याद आ रहा है, कहता चलूं-
न सताइश की तमन्ना, न सिले की परवाह,
ग़र नहीं हैं मेरे अशआर में मानी, न सही....


निखिल आनंद गिरि

Wednesday, January 21, 2009

हिन्द-युग्म की बैठक में ओबामा...

दुनिया नये दौर में प्रवेश कर रही है तो हम भी इस आयोजन में शिरकत करते हैं...पेश है अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का वाशिंगटन डीसी के लिंकन मेमोरियल हॉल में शपथ ग्रहण के दौरान 20 लाख लोगों की मौजूदगी में दिया गया भाषण...आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा....

"मैं बराक हुसैन ओबामा बोल रहा हूं"
मैं उन सभी वक्ताओं और प्रदर्शकों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिन्होंने हमें अपने गीतों और शब्दों के जरिए याद दिलाया कि अमेरिका की वह कौन सी बात है जिसे हम इतना प्यार करते हैं। मैं इस भयानक ठंड और भीड़ का सामना करने के लिए आप सबका शुक्रिया अदा करता हूं और कुछ लोग तो आज यहां इस कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए हज़ारों मील का सफर तय करके आए हैं। उन सभी का शुक्रिया। वॉशिगंटन में और नए अमेरिका के निर्माण के इस उत्सव में आपका स्वागत है।
हमारे देश के इतिहास में कुछ मुट्ठी भर पीढ़ियों को ही ऐसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिनका सामना आज हम कर रहे हैं। हमारे देश में जंग छिड़ी है। हमारी अर्थव्यवस्था संकट में है। लाखों अमेरिकी अपनी नौकरियां और आशियाने गंवा रहे हैं। वे चिंतित हैं कि अपने बच्चों के कॉलेज की फीस कैसे चुकाएंगे और उनकी रसोई की मेज पर जो बिलों का अंबार लगा है, उसके पैसे कैसे भरेंगे और सबसे ज़्यादा वे अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता और चिंताओं से घिरे हैं। उन्हें इस बात की फ़िक्र है कि क्या अमेरिकियों की यह पीढ़ी हमारे बच्चों और उनके बच्चों तक यह बात पहुंचा सकेगी कि इस देश को लेकर सबसे अच्छी बात क्या है?
मैं यह दावा तो नहीं करूंगा कि इनमें से किसी भी चुनौती से निपटना आसान होगा। इसके लिए एक महीने या एक साल से ज़्यादा या हो सकता है और भी ज़्यादा लग जाएं। इस दौरान कुछ गतिरोध आएंगे, कई बार शुरुआत ग़लत होगी और ऐसे भी दिन आएंगे जब एक राष्ट्र के बतौर हमारे बुनियादी संकल्प की परीक्षा होगी। लेकिन इस सब के बावजूद हमारे सामने जो लक्ष्य है, उसकी विशालता के बावजूद मैं यहां हमेशा की तरह उसी उम्मीद के साथ खड़ा हूं कि संयुक्त राज्य अमेरिका इसे दृढता के साथ सहेगा और इस देश की नींव रखने वालों के स्वप्न हमारे समय में और मजबूत होंगे।
वह क्या है,जो मुझे यह उम्मीद बंधाता है। ये लिंकन मेमोरियल हॉल, जब मैं चारों ओर इन पर नज़र डालता हूं, इन स्मारकों में वह असंभव कहानियां खुदी हुई हैं जो हमारे हठी विश्वास को और भी दृढ करती हैं। यह विश्वास कि अमेरिका में कुछ भी संभव है। हमारे सामने एक ऐसे व्यक्ति का स्मारक है, जिसने थोड़े-से किसानों और दुकानदारों को साथ लेकर एक समूचे साम्राज्य की सेना के विरुद्ध क्रांति की और यह सब एक विचारधारा के लिए किया गया था। इसकी सतह में ऐसी पीढ़ी के लिए श्रद्धांजलि है, जो युद्ध और अवसाद के खिलाफ डटकर खड़ी हुई, मेरे दादा-दादी की तरह जिन लोगों ने बांबर एसेंबली लाइन पर पसीना बहाया और निरंकुशता के चंगुल से दुनिया को मुक्त करने के लिए पूरे यूरोप में अभियान चलाया। हमारे ठीक सामने एक जलाशय है, जो आज भी एक राजा के स्वप्न और एक व्यक्ति की महिमा का बखान करता है, जिसने अभियान छेड़ा और अपनी रक्त बहाया ताकि उसके बच्चों को चारित्रिक खूबियों के कारण जाना जाए और मेरे पीछे उस संघ को निहारता वह व्यक्ति बैठा है, जिसने इसे बचाया और कई मायनों में इस दिन को संभव बनाया।
आज जो मैं आप सबके सामने यहां खड़ा हूं, कौन मुझे इतनी गहरी उम्मीद देता है। चारों ओर से घेरे हुए ये पत्थर और संगमरमर नहीं, बल्कि इनके बीच जो मौजूद है, वहां से मुझे ये उम्मीद मिलती है। वो आप हैं-हर नस्ल, क्षेत्र और शहरों के अमेरिकी, जो यहां आये क्योंकि आपको भरोसा है कि यह देश क्या हो सकता है और क्यूंकि आप वहां तक पहुंचने में हमारी मदद करना चाहते हैं। यही वह चीज़ है, जिसने मुझे उसी दिन से उम्मीद दी, जब तक़रीबन दो साल पहले इस राष्ट्रपति पद की मुहिम शुरू की थी; एक भरोसा कि यदि हम ख़ुद को एक-दूसरे के रूप में पहचान लें और डेमोक्रेट्स, रिपब्लिकन्स व इंडिपेंडेंट्स; लातिनी, एशियाई और मूल अमेरिकी, श्वेत व अश्वेत, समलैंगिक व विपरित लैंगिक, अपंग व आम सभी को एक साथ ले आयें तो न सिर्फ उम्मीदों और अवसरों को फिर से बहाल कर पायेंगे, जो हम सभी की इच्छा है, बल्कि संभव है कि इस प्रक्रिया में हम अपने संघ को और भी मजबूत करें।
यहीं है मेरा विश्वास, लेकिन आपने इस विश्वास को सच कर दिखाया है। आपने एक बार फिर यह साबित कर दिया है जो लोग इस देश से प्यार करते हैं, वे इसे बदल सकते हैं। अब जबकि मैं राष्ट्रपति पद संभालने जा रहा हूं, आप लोग ही वह आवाज़ है, जिसे में हर दिन उस ओवल ऑफिस में प्रवेश करते हुए अपने साथ ले जाउंगा। उन स्त्रियों और पुरूषों की आवाज, जिनकी कहानीयां अलग-्लग हैं, लेकिन जिनके स्वपन एक हैं। जो सिर्फ यह सवाल करेंगी कि एक अमेरिकी के बतौर हमारा वादा क्या था, कि हम अपने जीवन को वौसा बना सकें, जैसा हम चाहते हैं. और अपने बच्चों को खुद से भी ज्यादा बुलंदियों तक पहुंचते हुए देखें।
यही वह धागा है, जो इस साझा कोशिश में हमें एक साथ बांधता है, जो इस इमारत की प्रत्येक स्मृति के साथ चलता है, जो महें उन सबसे जोड़ता है, जिन्होंने संघर्ष किया, बलिदान दिया और यहां पहले खड़े हुए।
इस तरह इस राष्ट्र ने महान मतभेदों और लंबे समय की असमानताओं पर विजय प्राप्त की, क्योंकि ऐसा कोई अवरोध नहीं है, जो बदलाव की मांग कर रहे लाखों लोगों की आवाज़ की राह में टिक सकें।
यही वह भरोसा है, जिसके साथ हमने इस मुहिम की शुरूआत की। उसी की ताकत से हम उस सब पर विजय प्राप्त करेंगे, जो हमें तकलीफ पहुंचा रहा है। इसमें कोइ संदेह नहीं कि हमारी राह लंबी होगी. हमारी चढ़ाई सीधी होगी। लेकिन यह कभी न भूलें कि हमारे देश का असली चरित्र सरल और आसान समय में उजागर नहीं हुआ, बल्कि तब सामने आया ,जब हम मुश्किलों मे थे। मैं आप सबसे अपील करता हूं कि एक बार फिर उसी चरित्र को उभारने में मेरी मदद करें और इस तरह हम एक साथ मिलकर बतौर एक राष्ट्र अपने पूर्वजों की उसी विरासत को आगे ले जाएं, जिसका आज हम जश्न मना रहे हैं।
साभार : दैनिक भास्कर

Tuesday, January 20, 2009

मदरसों को सी.बी.एस.ई. जैसा सर्टिफिकेट??

तपन शर्मा हिंदयुग्म के उन कार्यकर्ताओं में से हैं जिन्हें पर्दे के पीछे रहकर काम करने में मज़ा आता है...हिंदयुग्म के हर आयोजन में वो चुपचाप अपने जिम्मे का काम करते हैं और प्रेरणा देते हैं....इंडियन एक्सप्रेस में हाल ही में छपी एक ख़बर पर उन्होंने हमें ये लेख भेजा है...मदरसों की पढाई को सीबीएसई के बराबर मान्यता मिलने की संभावनाओं के बीच बैठक पर ये विमर्श दूर तक जाए, ऐसी हसरत है...

कांग्रेस सरकार में कुछ मंत्री हमेशा चर्चा में रहे। शिवराज पाटिल नामक शख्स जो अब चले गये हैं, रामादौस जिन्होंने एम्स को बीमार कर रखा है और तीसरे हैं अपने अर्जुन सिंह। समझ में नहीं आता कि चाहते क्या हैं। आरक्षण नाम की बैसाखी तो इन्होंने पहले ही हाथों में दे रखी है। जो सीटें आरक्षित होती हैं वे दाखिले की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी नहीं भरती। फिर भी उन्हें बढ़ा दिया गया वो भी जाति के नाम पर। आर्थिक आधार होता तो समझ भी आता। आंध्र में सीटें बाँटी जाती हैं धर्म के नाम पर। फिर भी सरकार अपने को सेक्युलर कहती है। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि बची सीटें जनरल छात्रों को दी जायें तो उस पर अमल नहीं होता, उलटा कोर्ट को अपनी हद में रहने की सलाह दी जाती है। खैर अभी मामला आरक्षण का नहीं। मानव संसाधन मंत्रालय कुछ और ही करने की तैयारी में जुटा है। देश भर में जितने मदरसे हैं उनसे पढ़े गये छात्र वही दर्जा पायेंगे जो सी.बी.एस.ई. से उत्तीर्ण छात्र पाते हैं। कहने का मतलब ये कि मेहनत करने की, रात भर जागने की जरूरत नहीं है। कारण बताया गया है कि मुस्लिम छात्र भी आम छात्रों की तरह आगे आ पायेंगे। आपको मदरसों से भी वही सर्टिफिकेट मिलेगा जो आम स्कूल से पास करने पर मिलता है।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि इस देश में मुसलमानों का फायदा उठाया गया है। यदि ऐसा न होता तो आजादी के ६० बरस बाद भी शिक्षा के मामले में पिछड़े न कहलाते। वे शिक्षा के मामले में पिछड़े हैं इसमें भी किसी को कोई शक नहीं होना चाहिये। लेकिन सर्टिफिकेट बाँटे जाने का तरीका ठीक नहीं। सरकार चाहे तो मुस्लिम बहुल इलाकों में स्कूलों की तादाद बढ़ा सकती है। उन्हें जागरूक कर सकती है। मुझे नहीं पता और न ही लगता है कि मदरसों में वही पढ़ाई होती है जो कि बोर्ड करवाता है। इस तरह से हम उन्हें और भी कमजोर कर देंगे। वे बोर्ड से पास हुए छात्र के बराबर दर्जा तो पा लेंगे पर पढ़ाई में फिर भी पिछड़ जायेंगे। गलत तरीके से फायदा उठा कर पहले से ही त्रस्त समुदाय के वोट माँगने में ये सरकार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।

तीन विश्वविद्यालयों- जामिया हमदर्द, जामिया मिलिया और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में स्नातकोत्तर में दाखिले के लिये मदरसों के सर्टिफिकेट मान्य हैं। मानव संसाधन ने यूजीसी को कहा है कि बाकि विश्ववैद्यालयों में भी इसे लागू किया जाये। परन्तु इसका विरोध होने के कारण यूजीसी ने एक कमेटी बैठाने का निर्णय लिया है।

आई.आई.टी और आई.आई.एम जैसे संस्थानों में आरक्षण दे कर भारत में शिक्षा के स्तर को मंत्रालय पहले ही गिरा चुका है। कहीं ये कदम भी गलत राह पर न पहुँचा दे।

तपन शर्मा

Saturday, January 17, 2009

हमारे सपने तुम्हारे क्यों नहीं हो सके?? (1)

डॉ अजित गुप्ता की यादों का सफ़र फिर प्रस्तुत है....धनवान होते अमेरिका में ग़रीब होती संवेदना और बिछोह का दुख झेलते दूर देश के मां-बाप इनके लेख में कई-कई बार हैं.. पिछली बार आपने इस लंबी कड़ी का पहला भाग पढा...अब पढिए इसी कड़ी में आगे....


सोने का पिंजर
अध्याय 1


तू मेरे ख्वाबों में भी कभी नहीं आया, मेरे मन में तेरे लिए कभी किसी चाहत ने जन्म भी नहीं लिया। बस तेरा एक अस्तित्व है, इतना भर ही तो जानती रही हूँ मैं। लेकिन मुझे नहीं पता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब तू मेरे जीवन का अंग बन जाएगा। तेरी विशालता के आगे मेरा व्यक्तित्व एकदम बौना बन जाएगा। बेटा जब बड़ा होने लगता है तो माँ के मन में एक धुकधुकी सी होने लगती है। कभी उसका घर बसाने के सपने आते हैं तो कभी उसके भविष्य के। एक कोना आशंका से ग्रस्त भी रहता है। एक अनजान भय मुंडेर पर चिड़िया के बोलने के साथ ही चला आता है। परायेपन का डर नींदे भी उड़ा देता है। लेकिन डर इस रूप में आएगा यह तो चिंतन में ही नहीं था। सभी कुछ तो ठीक चल रहा था। एक ठहरी हुई जिन्दगी की तरह साफ-सुथरा।
लेकिन तुम्हारे नाम का कंकड़ जब कलकल बहती नदी में फेंका गया तब भी मन में उद्वेग नहीं आया था। एक प्रसन्नता का भाव ही मन में था। एक ऐसा स्थान जहाँ सुरक्षा है, भविष्य की सम्भावनाएँ हैं, तब तुम्हारा नाम अच्छा ही लगा था। सपने ताजिन्दगी देखे नहीं तो तब भी नहीं देखे। अच्छा या बुरा कुछ भी तो नहीं सोच पाया था मन। बस एक विश्वास था, एक अटूट प्यार था। पल-पल, क्षण-क्षण अपने मन के कण-कण से निर्माण किया था अपनी ही एक प्रतिकृति को। प्यार सागर सा दिखाई पड़ता था, जिसका न कोई ओर था और न कोई छोर। लेकिन तभी तुम आ गए थे, हमारे मध्य। उस विशाल सागर में पहली बार लगा कि यहाँ नमक भी है जिस कारण यहाँ का पानी आँसुओं की तरह खारा भी है। अब कई समुद्र उग आए थे मेरे और मेरी प्रतिकृति के मध्य। मन उसे छूने का करता लेकिन यही समुद्र दूरी बनकर बीच में खड़ा हो जाता। लेकिन सुरक्षा बोध उस पार से निकल-निकलकर आता रहा। चिन्ता का सैलाब आता और चले जाता। हर शब्द में बसी थी केवल सुरक्षा। अपने आस-पास खून की होली दिखाई देती। अनाचार, अत्याचार सामने ही तो खड़े थे। भविष्य की चिन्ता रातों को सोने नहीं देती थी। अब मन आश्वस्त हो चला था। छू नहीं सकती तो क्या, सुरक्षा तो है। लेकिन सुरक्षा का भाव भी कितने दिन टिक पाया? जो कभी स्थाई लगता था वह चन्द दिनों में ही कपूर की तरह उड़ गया। अभी एक माह भी तो नहीं हुआ था, मन तड़पता और सुरक्षा का आश्वासन, मरहम लगा देता। हमारा क्या है, बच्चों का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए।
वो कैसी तो शाम थी? लेकिन तुम्हारे यहाँ तो सुबह थी।
शाम का भी क्या फितूर होता है? अपने साथ एक घुटन लेकर आती है। एकान्त के पल धुएँ से घिरे दिखाई देते हैं। कभी यह धुआँ आँखों में समा जाता है, जलन के साथ पानी बनकर बहने लगता है। कभी इस धुएँ में भविष्य धुँधला हो जाता है। भला हो टी.वी. का, एकान्त में भी साथी बना डटा रहता है। रिमोट पकड़ो और आपका साथी बोलने लगता है, आपको गुदगुदाने लगता है। लेकिन वह शाम गुदगुदाने नहीं आयी थी, एक मिथक को तोड़ने आयी थी। एक डर का विस्तार करने आयी थी। सुरक्षा-चक्र के घेरे को तोड़ने आयी थी। तुम्हारे तन पर भी खून की होली खेलने आयी थी। मेरी वो शाम, रात बन गयी थी, तुम्हारी वो सुबह कभी न खत्म होने वाले डर में बदल गयी थी।
मेरे देखते ही देखते एक हवाई-जहाज जा टकराया था विशाल 110 मंजिला इमारत से। ताश के महल की तरह ढह गयी थी वो इमारत, जिसमें करोड़ों टन लोहा लगा था, करोड़ों टन सीमेंट लगा था। कितने पल लगे उसे भरभराकर ढहने में? वह 11 सितम्बर 2001 तुम्हारे लिए प्रारम्भ था एक डर का, हमारे लिए अन्त था सुरक्षा-बोध का। सारा जीवन ही बदल गया। आसान रास्ते, कंटकों से भर गए। दूरियाँ अब अन्तहीन हो चली। लेकिन समय कब रुकता है? समय तो चलता ही रहता है। घाव बनते हैं, समय भर भी देता है। लेकिन चिह्न तो वहीं रह जाते हैं। डर का चिह्न भी सदा के लिए रह गया।
दिन सरकते रहे, एक दिन इच्छा जागृत हुई, खून ने खून को पुकार लिया। तब न तो सात समुन्दर पार जाने में भय दिखाई दिया और न ही कोई व्यवधान मन में आया। सभी कुछ सरल लग रहा था। लेकिन 26 अप्रेल 2002 हमारे लिए बहुत बड़ा सबक लेकर आया। तुम तक पहुँचना इतना आसान नहीं है। तुम्हारी धरती पर पाँव रखने के लिए न तो करोड़ों की जायदाद थी, न ही तुम्हारे काम आने वाली शिक्षा। एक साधारण सी बात ने समाप्त कर दिया बरसों के सिंचित स्वाभिमान को। वीजा के रूप में तुमने नकार दिया हमारे व्यक्तित्व को। मेरी धरती पर तुम्हारा उपयोग नहीं है, अतः तुम्हें वीजा नहीं मिल सकता। ऐसे साधारण लोग मेरी धरती को भी साधारण नहीं बना दें, शायद यही डर तुम्हारे मन में रहा हो। तुम एक विशेष देश हो, दुनिया के सारे ही देशों में अग्रणी। अब तो तुम्हारी ही चौधराहट पूरी दुनिया में चलती है। लेकिन तुमने एक मिनट भी नहीं सोचा कि पुत्र तुम्हारे पास, तुम्हारे वैभव से चकाचौंध और माँ सात समन्दर पार! तुमने न टूटने वाले ताले लगा दिए? कैसी मानवता है तुम्हारी? तुम तो सारी दुनिया को श्रेष्ठता का संदेश देते हो, मानवता की बात करते हो, फिर होनहार पुत्रों के माँ-बापों को तरसाते क्यों हों? क्यों नहीं पूछते उनसे कि तुम्हारे माँ-बाप का भविष्य क्या होगा? लेकिन मैं भी तुमसे कैसे प्रश्न पूछने लगी? तुमने कब परिवार को महत्त्व दिया है? तुम तो एक व्यापारी हो। जो भी दुनिया का श्रेष्ठ हो उसे तुम ले लेते हो। बाकि भावनाओं से तुम्हें क्या मतलब? भारत का व्यक्ति हजारों में कमाता है लेकिन जैसा तुम्हारा आकार बड़ा है वैसे ही तुम्हारे डॉलर का आकार भी बहुत बड़ा है। भला भारत के माँ-बापों के पास इतना धन कहाँ जो तुम्हारे डॉलर का मुकाबला कर सकें? हाँ हमारा दिल जरूर बहुत बड़ा है। हम संतानों को अपनी छाती से लगाकर रखते हैं। हमारे सुख-दुख साँझी होते हैं। तुम बात-बात में उपहार देते हो, हम पल-पल अपना कर्तव्य पूरा करते हैं। हमारी संताने बैंक-लोन पर आश्रित नहीं रहती, वे हम पर ही आश्रित रहती हैं।
तुम्हारा वीजा-ऑफिस, स्वर्ग में जाने वाले चित्रगुप्त के दरबार जैसा ही है। सारे ही जीवन का लेखा-जोखा देखा जाता है। जरा सी चूक हुई कि दरवाजे बन्द। बेचारे लोग लम्बी-लम्बी कतारों में घण्टों खड़े रहते हैं। उनके हाथ में लदे होते हैं बही-खाते। जिसे स्वीकृति मिल जाती है, उसके घर में दीवाली मनती है और जिसे नहीं, वह अमावस में रहने को ही मजबूर होता है।
तुम अकस्मात् ही मेरे जीवन में आ गए। मेरे बरसों के सिंचित स्वाभिमान पर तुमने एकदम से प्रहार कर दिया। मैं, मेरा समाज और मेरा देश, तुमने गौण कर दिया, हमारी संतानों के समक्ष। मैं तो समझती थी कि शिक्षा का अर्थ स्वाभिमान जागृत करना होता है, लेकिन तुम्हारे यहाँ कि शिक्षा ने तो सम्पूर्ण भारत के स्वाभिमान को ही पददलित कर दिया। हमारे यहाँ जब गाँव का नौजवान पहली बार महानगरों में जाता है तब वह एकदम से बौरा जाता है। वह स्वयं को गँवार समझ बैठता है और महानगर में बसने के ख्वाब पाल बैठता है। कभी कच्ची बस्ती में, कभी चाल में, कभी सोसायटी में। वह सारे दुख उठाकर भी गर्व से तना रहता है कि मैं महानगर में रह रहा हूँ। छूट जाते हैं पीछे कहीं, शुद्ध हवा, प्रकृति के साथ जीने का तरीका, घर, चौबारे। तुम्हारे यहाँ भी ऐसा ही है, एक बार तुम्हारी धरती पर पैर रखा नहीं कि तुम्हारे सौंदर्य की चकाचौंध से हमारे पुत्रों की आँखें चुँधिया जाती हैं। साफ-सुथरा शहर, चौड़ी-चौड़ी सड़के, चारों तरफ रोशनी से नहाया शहर। रात को मद्धिम रोशनी, एक खुमारी सा जगा देती है। इसी खुमारी में वह विस्मृत कर देता है अपना अतीत। भूल जाता है उस माँ को जो उसके लिए सिगड़ी जलाए बैठी होती है, गर्म रोटी खिलाने को। भूल जाता है उस बाप को जिसके मजबूत कंधों पर खेलते हुए उसका बचपन बीता था, भूल जाता है उस बहन हो, जिसकी चोटी खींचते हुए वह बड़ा हुआ था। बस वर्तमान की सुंदरता में खो जाता है उसका तन और मन।
मुझे एक वाकया स्मरण में आता है। मैं एक बार एक कार्यक्रम के निमित्त सुदूर पहाड़ों और जंगलों के मध्य बसे एक छोटे से गाँव में गयी थी। शहर का व्यक्ति भला क्यूँ गाँव में जाता है? वह सोचता है कि मैं विकसित हूँ और ये लोग अभी अविकसित हैं, अतः उन्हें विकसित करने का भ्रम लेकर हम भी वहाँ गए थे। गर्मी अपने पूर्ण यौवन पर थी, शायद 45 डिग्री सेल्शीयस तापमान रहा होगा। हमारे यहाँ गर्मी में इतना ही तापक्रम रहता है। साथ में लाया थर्मस का पानी भी गर्म हो गया था। पास में ही चरस चल रहा था। कुएं से बैल की शक्ति के द्वारा पानी निकाला जाता है। बैल घूमता रहता है और छोटी-छोटी बाल्टियों में पानी भर-भरकर निकलता रहता है। वह जल इतना निर्मल और शीतल था कि हमारा अन्दर तक तृप्त हो गया। वहाँ छोटी-छोटी मगरियों पर झोपड़े बने थे। कुछ दूरी पर ही नदी बह रही थी। नदी के सहारे-सहारे सड़क चले जा रही थी और सड़क का अवलम्ब बने थे पहाड़। पहाड़ों पर कहीं गूलर था तो कहीं नीम। कहीं पलाश था तो कहीं महुवा। छोटे-छोटे खेतों में कहीं तुअर खड़ी थी तो कहीं अदरक और कहीं हल्दी के ढेर लगे थे। शाम को सारा क्षेत्र चिड़ियाओं के चहकने से गुंजायमान हो गया। बच्चे उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगे।
आम भी पेड़ों पर लदा था, हमें पेड़ों को निहारते देख, एक बच्चा झट से पेड़ पर चढ़ गया और कच्ची अमिया तोड़ लाया। घर से चुटकी भर नमक ले आया, हम कुएं की मेढ़ पर बैठकर चटखारे लेकर अमिया खाने लगे। जैसे ही सूरज ने पश्चिम की ओर प्रस्थान किया आकाश पर चाँद और तारे निकल आए। पूरा ही आकाश भर गया, ऐसा लगा कि यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं छोड़ी है तारों ने। झोपड़ियों के बाहर ढोल और मांदल की आवाजें आने लगी हैं। सारे ही पुरुष और महिलाएं एक साथ झूम रहे हैं, नाच रहे हैं। कोई अभाव नहीं, कोई शिकायत नहीं।
मन में प्रश्न उठने लगा कि हम शहरवाले इन्हें क्या देने आए हैं? या इनसे छीनने आए हैं इनका चैन-सुकून? यहाँ के नौजवान को क्षणिक भर का तो सुख देते हैं ये महानगर, लेकिन एक कालावधि के बाद टूटने लगता है इनका भ्रम। उन्हें याद आने लगता है वही अपना छोटा सा गाँव जो उससे कभी का पीछे छूट गया है। अब उसके पास होली पर टेसू के फूलों का रंग नहीं है, अब उसके पास तारों भरी रात नहीं है, अब उसके पास अमिया से लदा पेड़ नहीं है। बस अब उसके पास है अकेलापन, बस अकेलापन। ऐसा ही तो तुम भी करते हो। तुम्हारे यहाँ की सुन्दरता से बौराए हमारे पुत्र जब भारत को याद करते हैं तब बहुत देर हो जाती है वापस लौटने को।
मेरे देश की लाखों बूढ़ी आँखों को तुमसे शिकायत नहीं है, बस वे तो अपने भाग्य को ही दोष देते हैं। वे यह नहीं जान पाते कि गरीब को धनवान ने सपने दिखाएँ हैं, और उन सपनों में खो गये हैं उनके लाड़ले पुत्र। मैं समझ नहीं पाती थी कि तुम क्यों नहीं आने देते हो, बूढ़े माँ-बापों को तुम्हारे देश में? लेकिन तुम्हारी धरती पर पैर रखने के बाद जाना कि तुम सही थे। क्या करेंगे वे वहाँ जाकर? एक ऐसे पिंजरे में कैद हो जाएँगे जिसके दरवाजे खोलने के बाद भी उनके लिए उड़ने को आकाश नहीं हैं। अपने देश में, अकेले घर में कम से कम अपनी सी साँस तो ले सकेंगे। कोई तो भूले-भटके उनका हाल पूछने चला ही आएगा। लेकिन तुम्हारे यहाँ आकर तो कैसे कटेंगे उनके दिन? तुम ठीक करते हो, उन्हें अपनी धरती पर नहीं आने देने में ही समझदारी है। कम से कम वे यहाँ जी तो रहे हैं, वहाँ तो जीते जी मर ही जाएँगे।

क्रमशः

Saturday, January 03, 2009

....उठता है धुंआ

ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी खासियत यही है कि आपकी नाराज़गी या खुशी जगजाहिर होने में चंद मिनट लगते हैं...हिंदयुग्म का वार्षिकोत्सव खत्म होते ही मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव की कार्यक्रम में कही बातों पर तरह-तरह के मूड बनने लगे थे.... हिंदयुग्म की शोभा महेंद्रू ने सबसे पहले अपने ब्लॉग पर "शर्मिंदा हुई हिंदी" शीर्षक से नाराजगी ज़ाहिर की....फिर, हिंदयुग्म के कुछ और साथी भी अलग-अलग राय लेकर आये....
शोभा जी का गुस्सा आप यहां पढ सकते हैं....
http://ritbansal.blogspot.com/2008/12/blog-post.html
इस लेख को पढकर हिंदयुग्म की नीलम मिश्रा ने भी अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजी..आप भी पढें.....
संपादक


"राजेंद्र यादव जी के बारे में बहुत सारे पूर्वाग्रह तो पहले से ही घुले हुए थे... उन्हें खतरनाक और शर्मनाक में अन्तर नही पता है...उन्होंने कहा कि अब वो खतरनाक बातें कहने जा रहे हैं, वो सारी शर्मनाक बातें थी....
आप तो अतिथि के तौर पर शैलेश जी द्वारा बुलाए गए थे... हम भी मजबूर थे.."अतिथि देवो भव" भाव को मन में लिए बर्दाश्त करते गए...माननीय यादव जी, हमारा हिन्दयुग्म आपकी राजनीति का मंच नही था, यह काफ़ी आगे निकल गया है, हम विश्व बंधुत्व की बात करते हैं, मानवता की बात करते है, पर आप ............दो पंक्तियाँ कहनी है जो शायद आप जैसे लोगों के लिए ही कही गई हैं-बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर.. पंथी को छाया नही, फल लागे अति दूर मनु जी, आपकी टिप्पणी भी पढी...सही में कुछ बड़े नामों को हम भागदौड़ के चक्कर में मंच से आदर सहित पुकार नहीं पाये...मगर, बड़े आयोजन की छोटी गलतियां अगली बार न हों, इसका पूरा ध्यान रखेंगे...."
साभार
नीलम मिश्रा,
हिंदयुग्म

Thursday, January 01, 2009

एक जनवरी ऐसी भी....

नाज़िम नक़वी ने बैठक पर एक मेल किया...लगा, नये साल का संदेश होगा....मगर मेल में एक तसवीर थी...मोबाईल से ली गयी है....थोड़ी धुंधली है..मगर,नये साल को अलग ढंग से मनाने के लिए बैठक पर हमें ये तसवीर छापना मुनासिब लगा....आप भी देखें
संपादक




पूरी दुनिया नये साल की तैयारियों में मस्त
कंपकंपा देने वाली ठंड में
कोट, स्वेटर और मफलरों में समाये हुए लोग
उसी शाम राजधानी का एक सड़क पर
धूल भरी ज़िंदगी को खिलौना बनाने में व्यस्त
ये भी हमारा ही भविष्य है...
नाज़िम

अगर आप भी तसवीरों के ज़रिये बैठक से जुड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है.....अपने कैमरे से कोई भी तसवीर कैद करें और भेज दें baithak.hindyugm@gmail.com पर....ध्यान रखें, तसवीरें समाज के किसी भी पहलू पर कुछ बोलती भी हों....
संपादक