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Friday, August 20, 2010

वो कौन थी-1

रघुनाथ त्रिपाठी महुआ न्यूज़ चैनल में नौकरी करते हैं....दुबले-पतले से दिखते हैं, मगर ज़िंदगी का भारी अनुभव है....बैठक पर उनका पहला लेख आया है.....एक अनुभव है, जो उन्होंने किसी बारीक लम्हे में महसूस किया था...थोड़ा लंबा लेख था, इसीलिए दो भाग में लगाने का फैसला किया है...बैठक पर इनका स्वागत करें....

उस दिन बारिश हुई थी, तपती धरती की पूरी प्यास तो बारिश की बूंदे भी ना मिटा पाई लेकिन कुछ राहत जरूर हुई थी..दिल्ली में बारिश का होना भी खबर है...ऐसी खबर जिसके मायने हैं...वो पिछले दो दिन से अपने ऑफिस में था... नोडया सेक्टर 13 बी के दूसरे फ्लोर पर उसका ऑफिस था काम ज्यादा था लोग कम ...सो दो दिन से घर गया ही नहीं था... एक ही कपड़े में,बिना शेव किए,जुटा था काम पर मन थोड़ा अजीब सा हो रहा था लेकिन काम निपटाना था ...दूसरे दिन प्रियंका ने टोका भी था आप घर क्यों नहीं जाते ...उसने कहा था ये लोग ऐसे ही हैं..प्रियंका उसके साथ ही काम करती थी...प्रोडक्शन हाउस में उसके सिवा कुल 11 लोग ही थे ...दूरदर्शन और और दूसरे क्लाइंट के लिए प्रोग्राम बनता था वहां...एक और भी जरूरी काम था इसलिए भी वो रूक गया था.... ..उसे पहली सैलरी मिलनी थी...मिली नहीं थी लेकिन व्यस्त होने पर पर भी वो जब इस बारे में सोंचता तो एक झुरझुरी सी पूरे बदन में होती.....आखिरकार वो वक्त भी आया और उसे उसकी पहली सैलरी मिली.. पूरे चार हजार..... कैश में मिला था पैसा...100-100 के 40 नोट ...उसे तब 'वर्षा वशिष्ठ' की याद आई थी..'मुझे चांद चाहिए' की नायिका वर्षा वशिष्ठ ...पैसे जेब में डालने के बाद उसने सीधा बाथरूम का रूख किया ...दरवाजा बंद करने के बाद उसने जेब से पैसे निकाले थे और फिर उसे अपनी हथेलियों में फैला लिया था...फिर उसके रूपयों के गंध को अपने जेहन में उतारने की कोशिश की..ठीक वैसे ही जैसे वर्षा ने की थी ...वो उस पल को याद रखना चाहता था हमेशा के लिए ...बाद में उसे याद आया कि घर मां को भी इस बारे में बताना है...फोन पर उसने कहा कि वो इन पैसों को किसी के हाथ भेज देगा...मां ने कहा कि इसकी जरूरत नहीं है समझ लो मैने ले लिए ...हां हिदायत देते हुए कहा कि जूते जरूर खरीद लेना.. दिल्ली में अपने भाई के साथ वो रहता था जूते पहनने की आदत उसे थी नहीं और इस बात पर बड़ा भाई उससे हमेशा नाराज़ रहा करता था...भाई ने मां से शिकायत की थी ..तब उसने टाला था...अपने पैसे से जूते खरीदूंगा...सो इस बार बचने का कोई रास्ता नहीं था...कॉलेज के दिनों में भी हवाई चप्पलों में हास्टल से क्लासेज के लिए चला जाता ...जिंस खादी के कुर्ते और हवाई चप्पल उसकी पहचान बन गई थी...लोग कई बार उसे नाम से नहीं उसके कुर्ते से पहचान जाते..लेकिन प्रोडक्शन हाउस में लिबास बदलना पड़ा था उसे ..पैंट शर्ट पहनना पड़ता था ....बारिश अब रूक गई थी.कल के एपिसोड का एंकर शूट का काम भी खत्म हो गया था...रात के आठ बजे थे...उसने अंदाजा लगाया तुरंत निकला जाए तो 10.30 तक घर मुखर्जी नगर किराए के अपने घर पहुंच सकता है...उसने बॉस से इजाजत मांगी..बॉस ने जाने को कह तो दिया लेकिन ऐसे जैसे बहुत बड़ा एहसान किया हो... बाहर निकला तो बारिश की वजह से उमस बढी हुई थी बारिश तेज नहीं हुई थी लिहाजा सड़क साफ होने की बजाए कीचड़ से भरी थी...अब उसे लगा जूता खरीद ही लेना चाहिए...सेक्टर 13 बी से मेन रोड तक जाने में दस मिनट पैदल लगते थे रिक्सा उन दिनों उधर चलते नहीं थे पैदल ही जाना पड़ता था...सो कीचड़ से सने पैरों को लथेड़े वो बस स्टैंड तक जा रहा था ...नोएडा उस बस स्टैंड पर उस वक्त कम ही लोग होते थे ....अकेला निर्जीव से खड़ा रहता है था वो बस स्टैंड ..याद नहीं क्या नाम था लेकिन अब वहां काफी चहल-पहल रहती है... चमचमाती बिल्डिग में मैकडॉल्नड का और दूसरी कंपनियों के वजह की वहज से काफी चहल पहल रहती है...खैर वो जा अकेला घर जल्दी पहुंचने के लिए तेजी से चला जा रहा था...अभी एक जद्दोजहद और भी करनी थी..आईएसबीटी तक जाने के लिए 347 नंबर के बस में उस वक्त काफी भीड़ होती थी...बस 20 मिनट की देरी से आई थी भारी भीड़ के साथ....किसी तरह वो चढ तो गया लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि उसे अपने हाथों के ना होने का एहसास होने लगा था..बारिश के बाद उमस काफी बढ़ गई थी लोगों के पसीने और खुद के पसीने से उसे उबकाई सी आने लगी...लेकिन ये रोजमर्रा की कवायद थी लिहाजा आदत तो नहीं समझौता कर ही लिया था.... समझौता भी कितना आसान सा शब्द है..जरा बोल कर देखिए एक अजीब का सकून का द्वंद उठता है...सपने टूटे तो कह दो समझौता कर लिया ...तरीके का काम ना मिले तो समझौता कर लो..समझौते की सीमा नहीं होती जब जी चाहे मन मुताबिक कर लो ...कम से कम किसी ग्रंथी से बचने के काम तो ये 'समझौता' आ ही जाता है...उसने भी सपने देखे थे...सपने अजीब से थे..ये सपना उसका अकेले का नहीं था चार दोस्तों ने एक साथ देखा था .......दोस्त थे इसलिए सपने भी साथ-साथ देखे थे... या यू समझ लीजिए दोस्त भी इसलिए बन गए क्योकि चारों के सपने एक जैसे थें.. रामजस हॉस्टल मे चारों जब शरूर में होते तो पूरी रात बहस करते...सुबह हो जाया करती ...बहस में कभी झगड़े जैसे बात नहीं हुई...दोस्त जो थे...किसी ने कभी किसी के पसंद को खराब नहीं कहा ...हॉस्टल में लोग डरते भी थे..लेकिन ये शायद ही किसी को पता था कि जब इलेक्सन होते तो चारों अपनी मर्जी से अपने लोगों के लिए काम करते....लोगों को लगता चारों किसी एक के लिए काम कर रहे हैं लेकिन ये हॉस्टल और कॉलेज इलेक्शन के तीन सालों में केवल एक बार हुआ था...जब चारों किसी एक का समर्थन किया था ..... चारों ने कभी किसी के लिए या फिर दोस्ती की खातिर भी समझौते नहीं किए.. लेकिन बाद मे सब ने समझौते किए...कुछ अलग करने का भूत उतर गया था एक ने ऑस्ट्रेलिया की राह पकड़ी आजकल वहीं किसी कॉलेज मे पढ़ा रहा है और बच्चों को समाज सुधार की प्रेरणा दे रहा है...गल्फ्रेंड से बनी नहीं.. इतना कायर नहीं था कि दुनिया छोड़ने की सोंचता लिहाजा देश छोड़ दिया......अब उससे तीनों का संपर्क भी नहीं है...एक ने इंश्योरेंस कंपनी ज्वाइन कर ली और लोगों का भला कर रहा है....एक आईपीएस है जम्मू कैडर पसंद ना आया तो गुजरात कैडर की लड़की पसंद कर ली, पत्नी आईएएस है दोनों मिलकर समाज सुधार रहे हैं...चौथा वो खुद था जिसने पत्रकारिता को पेशा चुना था और समाज सुधार का जरिया भी ...शुरू के दिनों में उसे लगा था तीनों से ज्यादा सही तो वहीं है लेकिन काम करते वक्त उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो आखिर कर क्या रहा है...उसने खीज़कर एक बार तीनों से कहा भी था..'ब्लडी होल सिस्टम इज फेक एंड फुल ऑफ हिप्पोक्रेशी' उसे दमघोटू भीड़ में कॉलेज के दिन याद आते रूम नंबर 77 में दो साल फिर रूम नंबर 88 के दो साल उसे याद आते ..इन चार सालों में उसमें बदलाव आया बड़ा बदलाव ..तब लोग उसे जानते थे लेकिन लोगों को वो पहचानता नहीं था...कॉलेज में जब निकलता तो कई अनजान चेहरे उससे हाथ मिलाते, गर्मजोशी से मिलते कई बार उसे अजीब भी लगता लेकिन कॉलेज में उसे लोग जानते थे....दो साल डिपार्टमेंट में अनअपोज्ड जेनरल सेकेट्री रहा ...हॉस्टल कमिटी में चारों साल उसके नाम को प्रोपोज किया गया..कभी किसी ने विरोध नहीं किया...तीसरे साल प्रेसिडेंट के लिए जोर देने पर भी वो नहीं माना...उसने ये समझ लिया था कि किंगमेकर किंग से ज्यादा मायने रखता हैं उसने प्रिसेडेंट बनवाया था जिसके नाम को उसने प्रोपोज किया किसी ने विरोध नहीं किया...कई बार पूरे पैनल को खुद डिसायड करता लोग मुहर लगाते...बीए ऑनर्स हिस्ट्री उसका सब्जेक्ट था उसे बखूबी पता था कि मध्यकाल में कभी राजा की नहीं चली थी हमेशा किंगमेकर का महत्व रहा ....कई बार वो गलती करता लेकिन पछतावा होने पर भी जाहिर नहीं करता ....इससे उसकी अकड़ जो कम होती...सैंकेण्ड इयर में जाते जाते उसने सिगरेट पीने शुरू कर दी थी...उसके एक सीनियर राम द्विवेदी ने इशारे में समझाने की कोशिश की थी वो हमेशा इशारे में बोलते ...उन्होनें कहा था कि हां भाई 'टफ लुक' के लिए ये जरूरी है...उसने उनकी बात तो समझ ली लेकिन मानी नहीं ...उसे अपने आप पर भरोसा था कि जब चाहेगा वो छोड़ देगा...लेकिन ये हो नहीं पाया उसकी आदत में ये शुमार हो गया...कई बार देर रात, गेट मैन रामबीर से बीड़ी मांगने की नौबत तक आ जाती...या फिर 'एमकेटी' यानि 'मजुना का टिला' जाने की पैदल नौबत आ जाती लेकिन फिकर किसी बात की थी नहीं,कोई रोकने वाला नहीं कोई टोकने वाला नहीं ...फर्स्ट इयर के लड़के 'फच्चे' यानि फ्रेशर हुए तो भेज दिया तलब पूरी करने का जोगाड़ लाने नहीं तो किसी को भी सोते जगाया और निकल पड़े .... एक बार मेस में थाली गंदी होने पर उसने थाली हॉल में नचाकर फेकी थी...जानबूझकर किया था उसने...अटेंडेट घबरा गया था उसने कहा गल्ति हो गई...बाद में उसका एक सीनियर जिसकी वो बहुत इज्जत करता था उठकर उसके पास आए थे..उन्होने कहा था चलो आज तुम्हे बाहर खिलाता हूं ,मेस का खाते खाते उब हो गई है...वो समझ गया था उसने गल्ति की है वो उनके साथ चला गया था वो राम द्विवेदी ही थे...फिजिक्स ऑनर्स के डियू टॉपर ,यूपी बोर्ड में उन्होने पहला स्थान हासिल किया था... बिडला मेमोरियल नैनीताल के बोर्डिंग में सालों बिताया था ... मेस के घटना की चर्चा उससे नहीं की ..ये बात उसे और भी खराब लगी थी...उसने हॉस्टल लौटते समय पूछा था सर (सीनियर को सर ही कहते थे)कुछ बोलेंगे नहीं ...उन्होने इतना कहा कि तुम समझदार हो ..चीजे बदलती हैं ..बाहर दुनिया आपको भी बर्दास्त नहीं करेगी...इतना गुस्सा ठीक नहीं है...गुस्से में भी इनर्जी होती हो उसे पॉजेटिव बनाओं...मुझे दिल्ली की बसों में तरह तरह के लोग मिलते लेकिन गुस्से पर काबू करना मैने तभी से सीखा था... बर्दाश्त करना उसके बाद से हीं उसने सीखा...आज भी लोगों को बर्दाश्त कर रहा है.कभी इसे समझौता करना उसने नहीं माना हमेशा यही माना की एवरी डाग्स हैव ए डे..समय बदलता है उसका भी समय बदलेगा...बस में जेबकतरे भी होते हैं अचानक उसके जेहन में ये बात आई...पसीना और तेजी से बहने लगा था...वो कर भी क्या सकता था...कोई उस वक्त उसकी जेब में हाथ डाल उसके पैसे निकाल भी लेता तो इसका एहसास होने के बावजूद वो कर भी क्या सकता था.......उसके बस में कुछ था भी नहीं यहां तक की उसका फिलहाल बस में खड़े होना भी ..तभी किसी औरत ने चीख कर कहा था ...वो उसके थोड़े ही आगे थी इसलिए उसकी आवाज़ सुनाई दे गई...लेकिन जिसके बारे में कहा था उसे देख नहीं पाया...औरत ने कहा था इतनी भीड़ में खड़े होने की जगह नहीं है और तूने उसे भी खड़ा कर रखा है....बस में जोरदार ठहाका लगा था...उसने सोंचा इतने लोगों की बीच कितनी परेशानी में उस महिला ने ये बात कही होगी...पहले उसने जरूर कुछ इशारा किया होगा लेकिन फिर भी लड़के के हरकतों से बाज ना आने पर अपनी और उसकी दोनों की फजीहत की होगी....

रघुनाथ त्रिपाठी

Tuesday, July 06, 2010

धोनी संग साक्षी : DOGS & MEDIA NOT ALLOWED !

ज़रा सोचिए, अगर महेंद्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट में अपनी जगह नहीं बना पाते और झारखंड के ही मैदानों पर चौके-छक्के लगा रहे होते। फिर, उनकी उम्र 29 साल की होती और वो शादी कर रहे होते। तो एक कैमरामैन लड़केवालों की तरफ से और एक लड़कीवालों की तरफ से भाड़े पर मंगाया जाता। ये तो नहीं होता कि देश के सबसे अच्छे कैमरे और सबसे बुद्धिमान होने का भ्रम पाले मीडिया वाले मुफ्त में धोनी की शादी पर खर्च हो रहे होते। मगर, ऐसा हुआ और हमें ताज्जुब इसलिए नहीं हुआ कि मीडिया की ऐसी दीवानगी पहली बार नहीं थी....सानिया-शोएब की शादी भी मीडिया के लिए कूदने-फांदने का ऐतिहासिक दिन था...ऐसे जैसे भारत और पाकिस्तान दोस्ती के सात फेरे लेने जा रहे हों...इसी बीच दंतेवाड़ा में 76 जवान मारे गए, मगर सानिया-शोएब की खबर टीवी के पर्दों पर ज़्यादा ज़रूरी बनी रही....
खैर, धोनी की शादी पर लौटते हैं.... ज़ी न्यूज़(इसी के एक छोटे-से हिस्से में मैं भी नौकरी करता हूं...) भी बाक़ी चैनलों की तरह शादी के मंडप से कोसों दूर कैमरा टिकाए इंतज़ार में था कि कब क्या ब्रेकिंग न्यूज़ मिल जाए......देहरादून में हमारे रणबांकुरे साथी और नोएडा के न्यूज़रूम में हम....देहरादून से नोएडा सिग्नल पर मिल रहे वीडियो में कोई भी गाड़ी दिखती तो लगता ये साक्षी होगी, ये साक्षी की अम्मा होगी...और न जाने क्या-क्या....इतनी बारीकी से तो मैंने कभी किसी शादी में हिस्सा नहीं लिया....
खैर, हमारी एक रिपोर्टर ने तो उस घोड़ी का 'जायज़ा' ले लिया जिस पर धोनी सवार होने वाले थे....इतना उत्साह था रिपोर्टर में कि दर्शक अपने भोलेपन में ये तक समझ लें कि धोनी की शादी इसी घोड़ी से हो रही है! और तो और, हमारी एक एंकर ने शादी पर विशेष बुलेटिन के लिए खास तौर पर एक लाल रंग का लहंगा पहन लिया था ...ऐसा लग रहा था कि वहां देहरादून में बारात निकलेगी और यहां हम नाच उठेंगे...
सबसे मज़ेदार था पसीने से लथपथ घोड़ीवाले का 'एक्सक्लूज़िव' इंटरव्यू जो हर चैनल पर चल रहा था....घोड़ीवाला ही मीडियावालों के लिए सबसे विश्वस्त सूत्र था कि धोनी ने क्या पहना, भज्जी ने कितना नाचा और खाने में क्या-क्या था वगैरह-वगैरह....बेचारा घोड़ीवाला इतने सारे कैमरे एक साथ अपने मुंह पर देखकर राहत की सांस ज़रूर ले रहा होगा कि उसके सामने उससे भी 'बेचारे' कितने लोग हैं...
एनडीटीवी के रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग पर पहले ही लिख दिया है कि उन्हें आदर्शवादी होकर टीवी के गिरते स्तर पर मर्सिया पढ़ने वाला पत्रकार न समझा जाए....नहीं समझेंगे जी, बस कुछ सलाह और दे दें ताकि आने वाले समय में शादियों की कवरेज में पत्रकारों को टीवी पर मंडप बनाने में और आसानी हो जाए.... सलाह नंबर एक... हो सकता है कि मीडिया चैनल कुछ बड़ी हस्तियों के शादी के ऑर्डर अभी से ही बुक कर लें....जैसे, राहुल गांधी, युवराज सिंह, भज्जी और 'प्रिंस' (गड्ढे में गिरने वाला महान बालक)....फिर इन्हीं चैनलों के ज़िम्मे कैटरिंग का सारा ज़िम्मा हो...पत्तलें बांटने से लेकर पत्तले उठाने तक का...शॉट्स की दिक्कत ही नहीं आएगी साहब...बड़े-बड़े एंकर बड़े-बड़े लोगों की पत्तले उठाएं...वाह! देश की सबसे बड़ी शादी....सबसे बड़ी कवरेज.....सबसे बड़ा पंडाल....हम सबसे बड़े युग में जी रहे हैं....वाह!
सलाह नं दो... शादी के सारे छोटे-बड़े काम छोटे-बड़े चैनल्स आपस में बांट लें...मसलन, पंडित जी को लाने-ले जाने का ज़िम्मा किसी एक चैनल को.....जनवासे (जहां बारात ठहरती है) का इंतज़ाम किसी और चैनल को....न्योता (वो लिफाफा या तहफा जो शादी में आने वाले मेहमान लेकर आते हैं) लिखने का काम किसी और चैनल को...हां, मंगल गीत वगैरह गाने का काम किसी एफएम चैनल को भी सौंपा जा सकता है.....
मेरी बड़ी दीदी की शादी हुई थी तो दस-पंद्रह दिन बाद शादी की कैसेट बनकर आई थी...अलग-अलग फिल्मी गानों और पहाड़-समुंदर वाले लोकेशन्स पर उड़-उड़कर दीदी और जीजाजी की तस्वीरें आती थीं और हम रोमांचित होते थे....मैं दसवीं में पढ़ता था तब....अब एमए पास हूं...नौकरी भी करने लगा हूं...मगर, काम वही शादी के वीडियो बनाने का ही रहा...देहरादून से दूर जहां ये शादी हो रही थी, दूर-दूर तक मीडिया के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी....कैमरे पर भूख-प्यास से बेहाल रिपोर्टर ऐसे जंगल में खड़े लग रहे थे कि दंतेवाड़ा से कवरेज कर रहे हों...फिर भी कवरेज किए जा रहे थे...कोई चैनल बता रहा था कि धोनी ने गोल्डन शेरवानी पहनी थी, किसी ने कहा भूरी शेरवानी पहनी थी...सबको रतौंधी हो गई थी...जिसे जो दिखा, अपने-अपने चैनल को बता दिया...देश अलग-अलग शेरवानी में धोनी की शादी देख रहा था...जैसे धोनी धोनी न रहे हों, धोनी शिव का अवतार हो गए हों....देहरादून की पहाड़ियां कैलाश हों और साक्षी साक्षात पार्वती....मीडिया वाले भूत-बेताल बनकर नाच रहे थे और कोई खाने तक को नहीं पूछ रहा था....
खाने से एक और खबर याद आई जो इस दिन हल्के में कहीं-कहीं चल रही थी....हमारे प्रधानमंत्री 3 जुलाई को आईआईटी कानपुर गए थे तो उनके खाने में 26 व्यंजनों में मिलावट पाई गई थी ! ऐसे-ऐसे ज़हरीले केमिकल पाए गए कि मुझे नाम ही समझ नहीं आ रहे थे....मगर, प्रधानमंत्री की किसी को फिक्र नहीं थी.....अजी, इस देश में खाने में मिलावट कोई खबर है क्या....पीएम ने पहली बार खाया तो क्या हो गया...धोनी रोज़-रोज़ थोड़े ही शादी करेगा....मीडिया को नहीं बुलाया, न सही....जाना तो ज़रूरी है...बिन बुलाए पहुंचने का मजा ही कुछ और है...

निखिल आनंद गिरि
(फोटो : बीबीसी से साभार)

Wednesday, June 30, 2010

एक प्यार भरी चिट्ठी, गुम हुई चिट्ठियों के नाम...

अमृत उपाध्याय बिहार के आरा से ताल्लुक रखते हैं....2005 से दैनिक प्रभात खबर में रिपोर्टिंग शुरू की, फिर एनडीटीवी में हाथ आज़माने के बाद निजी खबरिया चैनल महुआ न्यूज में बतौर एंकर/रिपोर्टर नौकरी निभा रहे हैं...बैठक पर आने का मन बहुत पहले बना चुके थे, फुरसत अब मिली है...बतौर पहला लेख एक मीठी-सी याद हमें भेजा है...आइए, उनकी चिट्ठी पढें

मेरे एक सहयोगी राकेश पाठक के पास स्याही वाली कलम है, जिससे वो सिग्नेचर किया करते हैं...मुझे बड़ा अच्छा लगता है, जब वो अपनी कमीज की जेब से कलम निकालते हैं और बड़ा सहेजकर उसे रखते हैं फिर, ये कलम उनके पिता जी ने दी थी। मुझे भी याद है पापा जो कलम देते थे मुझे, मैं भी सहेजकर रखा करता था और अक्सर उसी से अखबारों पर अपने शौक को पूरा किया करता था सिग्नेचर करके...कोई वजह तो नहीं थी हस्ताक्षर करने की, लेकिन किसी रद्दी जगह कई हस्ताक्षर करके भविष्य के सपने गढ़ा करता था मैं भी। और कलम का इस्तेमाल होता ही क्या था बचपन में.....बचपन से ज्यादा पाला तो नहीं पड़ा, फिर भी बचपन मतलब, जब छठी या सातवीं में पढ़ रहा था, तब चिट्ठियां लिखा करता था मैं....चिट्ठियों का सिलसिला चलता था तब...और फॉरमेट बिल्कुल तय था, 'पूज्य' से कहानी शुरू होती थी और 'पत्र के इंतजार में आपका फलां’ पर जाकर खत्म हो जाती थी...और हां दूसरी लाइन में होता था 'मैं यहां ठीक हूं आप सब कैसे हैं.... इसके बाद फिर शुरू हो जाता था हर शख्स की अलग-अलग खैरियत पूछने का सिलसिला...'फलां दीदी कैसी है..फलां चाचा कैसे हैं' वगैरह वगैरह...फिर पैरा चेंज के बाद 'यहां फलां ठीक हैं, भैया की पढ़ाई ठीक चल रही है...और सब लोग आप सब को याद करते हैं',....फिर अंतिम में 'जल्दी आइएगा' के बाद 'पत्र के इंतजार में' के साथ आपका के आगे रिश्ते का संबोधन..अब सोचने पर हंसी तो आती है लेकिन अफसोस भी होता है चिट्ठी नहीं लिख पाने का अब...कभी-कभार सोचता हूं, लिखूं चिट्ठी फिर से, लेकिन फिर सोचता हूं किसे...चिट्ठी लिखने को मैं मिस करता हूं आजकल....और स्याही वाली कलम को भी....पहली दफा जब टेलीफोन का दर्शन हुआ था तो घंटो लग जाते थे एसटीडी कॉल लगाने के लिए....उस समय कोई सूचना नहीं मिल पाती थी, जैसे आज मिल जाती है तुरंत, नॉट रीचेबल या फिर स्विच्ड ऑफ टाइप से। एसटीडी कॉल रेट महंगा होने और नेटवर्क की परेशानियों की वजह से चिट्ठियों का दौर बदस्तूर जारी रहा था...खूब चिट्ठी लिखा करते हम सब..और चिट्ठियों में अतिक्रमण भी खूब हुआ करता था, दीदी और भैया की चिट्ठी में सेंध मार कर कुछ अपनी तरफ से लिखने की फिराक होती थी तो अपनी चिट्ठी में किसी को लिखने देने में खीझ होती...मसलन एक ही चिट्ठी में पता चला कि भैया-दीदी ने भी लिख दिया और फिर मम्मी ने भी लिख दिया...और हां, डाकिए की आवाज़ बचपन में भावुकता के स्तर तक जेहन में समा जाती है...हमारी अगली पीढ़ी को तो शायद नसीब ही ना हो अब...लेकिन डाकिये का हांक लगाना और उसके पीछे हमारा इंतजार, चिट्ठी किसकी है ये जानने की और उसे जल्दी से खोल कर पढ़ लेने की उत्सुकता...कम्यूनिकेशन के नए जरिए आते गए और हमारे जेहन में चिट्ठियां बस यादें भर बन के रह गईं...और अब कलम की भी जरूरत कहां पड़ती है ज्यादा...कंप्यूटर पर उंगुलियां ठकठकाते रहने की आदत जो पड़ गई....लेकिन सचमुच बहुत याद आता है जब किसी की जेब में नई कलम देखकर ललचा जाता था मन, जब स्याही वाली कलम से सुंदर और मोती जैसे अक्षर उतारते थे मास्टर साहब, और जब उन्हीं अक्षरों से सजाकर खूबसूरत चिट्ठियां लिखने के दौरान कई दफे कागज फाड़ देते हम..सिर्फ इसलिए कि राइटिंग ठीक नहीं बैठी थी उन चार पंक्तियों में....स्याही वाली कलम की चर्चा आज ही हो रही थी सुबह, मेरे सहयोगी आलोक के साथ...तो यादें ताजा हो गईं जेहन में दबी हुईं थी जो...बचपन,कलम और चिट्ठियों की...और पापा की यादें जिनकी हैंडराइटिंग की नकल करके मैं स्याही वाली कलम से पोस्टकार्ड लिखने की कोशिश करता रहा था उन दिनों....

अमृत उपाध्याय

Sunday, June 27, 2010

दोहरी मानसिकता के शिकार हिंदी फिल्म समीक्षक और दर्शक

मैं कोई लेखक नहीं, कोई आलेखक भी नहीं, लेकिन हाँ अपनी बातों को यथासंभव (एक हद तक) रखने में यकीन रखता हूँ। मेरे पास सोचने-समझने की जो थोड़ी-सी शक्ति है, उसी की चहारदीवारी में विचारों की गुत्थम-गुत्थी, उठापटक चलती रहती है। दिन भर हर तरह के विचार दिमाग के कारखाने में कच्चे माल की तरह आते रहते हैं, लेकिन अमूमन यह कारखाना खराब हीं रहता है और इसलिए कभी-कभार हीं मैं किसी खास निष्कर्ष पर पहुँच पाता हूँ। फिर भी यह क्रम चलता रहता है क्योंकि मेरे हिसाब से अगर कोई कोशिश हीं न की जाए तो सफ़लता कहाँ से मिलेगी! सफलता हासिल करनी हो तो कारखाने के कल-पुर्जों को घिसना तो पड़ेगा हीं। घिसते-घिसते कोई एक पुर्जा तो होगा हीं जो हमारा काम कर जाएगा। वैसे भी कहते हैं कि दस बटेरों पर पत्थर चलाया जाए तो एक बटेर को तो हाथ आना हीं है। और जब कोई एक बटेर या कोई एक बात खुलकर सामने आ जाती है यानि कि जब मैं किसी मुद्दे पर पक्का हो जाता हूँ तो लगता है कि मैंने मैदान मार लिया हो, लगता है कि इसे औरों से भी बाँटा जाए। औरों को भी खबर की जाए कि आज मेरे पास क्या है। (मेरे पास माँ है...... के अंदाज में हीं) । सभी जानते हैं कि आज की दुनिया कितनी गतिशील, कितनी तेज-तर्रार है। इस आज की दुनिया में, अपने विचार रखने, अपनी सोच औरों से बाँटने के हज़ार तरीके हैं और इन हज़ार तरीकों में एक तरीका है आलेख लिखना। अब आप सोच रहे होंगे कि जहाँ मैंने शुरू में कहा कि "मैं कोई आलेखक नहीं", वहीं अभी "आलेख लिखने" की बात कर रहा हूँ। "आलेखक नहीं"- यह सच है, और इसलिए हो सकता है कि मैं इस आलेख के माध्यम से जो भी कुछ कहने जा रहा हूँ, उसमें सफल ना होऊँ (जिस तरह हज़ार चीजों पर माथा-पच्ची करने के बाद एकाध चीज हीं मेरे पल्ले पड़ती है, उसी तरह हज़ार शब्द उगल देने के बाद हो सकता है कि मेरा एकाध शब्द हीं मतलब का हो या फिर एक शब्द भी पल्ले पड़ने लायक न हो) , लेकिन यह तो मानना हीं पड़ेगा कि किसी से बिना मिले अपनी बात सब के बीच रखने का इससे अच्छा कोई तरीका नहीं। इसलिए दूसरा उपाय न पाकर डरते-डरते मैं "हिन्द-युग्म" के इस मंच "बैठक" पर आया हूँ।

कहने को मेरे पास बहुत सारी बातें हैं। औरों की तरह फिल्मों से गहरा लगाव हैं, इसलिए पहली बार तो यही सोचा कि क्यों ना फिल्मों पर हीं कुछ लिख लूँ। वैसे भी लोगों की समीक्षाएँ (मेरे एक मित्र के अनुसार फिल्मों के समीक्षक अब समीक्षक नहीं रहे, ये आलोचक हो गए हैं..... और आलोचक भी ऐसे आलोचक नहीं जो गुणों और अवगुणों पर बराबर की नज़र रखते हों, बल्कि ऐसे आलोचक जो बस आलोचना करना हीं जानते हैं यानि कि मौका मिला नहीं कि बुराईयों का पुलिंदा लेकर बैठ गए) पढ-पढकर मेरे मन में भी यह इच्छा घर कर गई थी कि मैं क्या किसी से कम हूँ... मैं भी फिल्मों पर अपना ज्ञान झाड़ सकता हूँ। जब लोग बिलावज़ह किसी फिल्म (पढें: रावण) की अंतड़ियाँ तक निकालने पर तुले हैं तो किसी भले मानुष की तरह क्या यह मेरा फ़र्ज़ नहीं बनता कि मैं इन कसाईयों के "हक़" पर प्रश्न-चिह्न खड़ा करूँ। खुद तो आज तक एक सीन (दृश्य) तक सही से उकेर नहीं पाए (सपने में भी) और दूसरों की मेहनत पर भर-भर के कीचड़ उछालते हैं। नाम न लूँगा लेकिन आप इस वाक्ये से समझ जाएँगे.... हमारे यहाँ के एक बहुत बड़े फिल्म-आलोचक हैं जिनकी मक़बूलियत बस इसी कारण से है कि उन्होंने "फ़िज़ा" बनाई थी। अब "फ़िज़ा" का क्या हश्र हुआ था और उन्हीं के भाई-बंधुऒं (दूसरे फिल्म-आलोचकों) ने इसे कितने "स्टार" दिए थे, ये तो जग-जाहिर है.... फिर उन्हीं महोदय ने जब "काईट्स" की समीक्षा की तो "ऋत्विक" की खूब टाँग खींची और "राजनीति" को तो "राज-नट्टी" हीं कह दिया... यहाँ तक कि उन्होंने "मनोज वाजपेयी" को भी नहीं छोड़ा... कहा कि काठ-जैसी सूरत बनाए घूम रहे थे वे पूरी फिल्म में। अब कोई उनसे पूछे कि उनकी "फिज़ा" में भी तो यही दो कलाकार थे। उस समय उन्होंने इन दोनों से क्या अलग, क्या जुदा करवाया था। और अगर कुछ अलग नहीं करवा पाए थे तो "अनुराग बसु" और "प्रकाश झा" को वो क्या दूसरी दुनिया के निर्देशक समझते हैं जो वो कोई "जादू" कर देंगे। ऐसे "दोहरी सोच" वाले लोग जब तक "समीक्षा" करते रहेंगे, तब तक हमारी फिल्मों का भला नहीं हो सकता।

माफ़ कीजिएगा .... मैं भावनाओं में बह गया और ना-ना कहते-कहते बहुत कुछ कह गया। हाँ, तो इसी तरह करने को कई सारी बातें हैं। अभी-अभी मैंने "दोहरी सोच" के बारे में कुछ कहा..... तो यह "दोहरी सोच" "दोहरी मानसिकता" बस फिल्म-समीक्षकों तक हीं सीमित नहीं है, हम दर्शकों के बीच भी इसने अपना मकाम हासिल किया हुआ है। इसका सबसे बढिया उदाहरण है "हिन्दी फिल्मों" में किसी दृश्य या किसी खास तरह की अदायगी (या अदाकारों) को नकारने वाले लोगों में "अंग्रेजी फिल्मों" के उन्हीं दृश्यों या अदायगी को पूजने की प्रथा। यह बीमारी तो आजकल हर "सुसभ्य" शहरी इंसान में देखी जा सकती है। हिन्दी फिल्म में अगर किसी ने कहा कि "मैं मैं हूँ" तो लगे नाक-भौं सिकोड़ने, लगे उसकी बघ्घियाँ उधेड़ने लेकिन अगर किसी अंग्रेजी फिल्म में (जो कि उन "सुसभ्य" लोगों को भी पहली मर्तबा समझ में नहीं आती .... मसलन मैट्रिक्स, प्राईमर) किसी बड़े-से "सुसभ्य" कलाकार (मान लीजिए "अल पचीनो") ने चिघ्घार कर कहा "दिस ईज द वे आई ऐम" तो वही नाक-भौं सिकोड़ने वाले लोग सारे शर्मो-हया भूलकर तालियों की गड़गड़ाहट में डूब जाते हैं.... उस समय किसी को भी यह ध्यान नहीं आता कि भाई "इसमें नया क्या है"....क्या यह इंसान तीस-मार खान है कि इसने उसी "बेकार"-से संवाद को "बेजोर" बना दिया है... मुझे तो नहीं लगता..... फिर ऐसा क्यों है कि "हिन्दी-फिल्म" मे जो चीज उन "सुसभ्य" लोगों को "ओवर-एक्टिंग" लगती है, जो सिचुएशन्स, जो प्रस्तुतिकरण उन्हें "ढपोल-शंख" लगते हैं, वही सारी चीजें "अंग्रेजी फिल्मो" में जाकर "ग्रेट एक्टिंग" और "मारवेलस थिंकिंग" बन जाती हैं। भला कितने लोग हैं यहाँ जिन्होंने "नो स्मोकिंग" देखी है... मेरे हिसाब से बहुत कम हीं लग होंगे। "नो स्मोकिंग" कैसी फिल्म थी... अच्छी या बुरी.... यहाँ यह सवाल नहीं है, सवाल यह है कि अगर आपने इसी तरह कि प्रयोगधर्मी कोई अंग्रेजी फिल्म (मसलन "टेरेन्टिनो" की "पल्प फिक्शन") पसंद की है तो आपको "नो स्मोकिंग" भी पसंद आनी चाहिए थी। पसंद आना तो बाद की बात है.... आपको इस फिल्म को एक "ट्राई" तो जरूर हीं देना था। अगर आपने ऐसा नहीं किया है तो आप मेरी बातों को "प्रूव" कर रहे हैं कि "दोहरी मानसिकता" हम सब के अंदर है...... है ना? इतना कुछ पढकर आप सोचने लगे होंगे कि मैं अंग्रेजी फिल्मों से खुन्नस खाए बैठा हूँ, इसलिए मौका मिलते हीं मैंने सारा भंड़ास निकाल दिया... तो मैं बताए देता हूँ कि "अंग्रेजी फिल्मों" से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है...... ना हीं कोई खुन्नस है, हाँ "भंड़ास" जरूर है, लेकिन वो फिल्मों के लिए नहीं है, बल्कि हमारी "तथाकथित" "प्रगति" और "शहरीपन" के लिए है....... फिल्में तो बस एक बहाना है (मुझे समाज का सच दिखाना है....... हा हा)

जब फिल्मों की हीं बात चल निकली है तो ज्यादा दूर क्या जाना....... अंग्रेजी फिल्में तो "हिन्दुस्तान" में आयात (इम्पोर्ट) होकर आती हैं..... लेकिन जो फिल्में हिन्दुस्तान में हीं बनती हैं, उनसे भी तो बिना कारण भेदभाव बरता जाता है। जी हाँ मैं "क्षेत्रीय" फिल्मों की बात कर रहा हूँ। "क्षेत्रीय" फिल्मों में भी दो तरह की "क्षेत्रीय" फिल्में आती हैं। एक "उत्तर भारतीय" ("राज ठाकरे" साहब.... मैंने आपका कोई "कॉपी राईट" तो भंग नहीं किया? यह शब्द कहने का हक़ सबसे ज्यादा आपको हीं है, लेकिन "एकमात्र" आपको नहीं) और दूसरा "दक्षिण भारतीय"। "दक्षिण भारतीय" फिल्मों के बारे में हमारे "दक्षिण भारतीय़" दोस्त एक-राय होते हैं और वे खुले-दिल से इन फिल्मों को स्वीकार करते हैं लेकिन हम "उत्तर भारतीय" उन फिल्मों को खिल्ली में उड़ा देते हैं। मेरे हिसाब से यह गलत है और यह नहीं होना चाहिए, लेकिन इससे भी ज्यादा गलत है "उत्तर भारतीय" फिल्मों का पूरे हिन्दुस्तान के लोगों द्वारा मजाक उड़ाया जाना। पहले दक्षिण भारतीय फिल्मों (तमिल, तेलगु, मलयालम, कन्नड़) की बात करते हैं.... मैं मानता हूँ कि इन भाषाओं में बनी कई सारी फिल्में हिंसा के इर्द-गिर्द बुनी होती हैं और कुछ दृश्य कल्पनातीत होते हैं, लेकिन ऐसा क्या इन्हीं फिल्मों में होता है... "हिन्दी" या फिर "अंग्रेजी" फिल्मों में नहीं। अगर सही से देखा जाए तो कौन-सा दृश्य कैसे फिल्माया जाना है, इस मामले में "दक्षिण भारतीय" फिल्में "हिदी" फिल्मों से कई कोस आगे हैं । "हिंदी" फिल्मों में जो आज दिखाया जा रहा है या जो प्रयोग आज किये जा रहे हैं, वैसे प्रयोग तमिल या तेलगु फिल्मों में दसियों साल पहले किए जा चुके हैं। "मार-धाड़" में अतिशय करने की प्रवृत्ति "अंग्रेजी" फिल्मों में भी तो खुलेआम नज़र आती है (मसलन : डाई हार्ड), लेकिन वहाँ तो कोई आश्चर्य नहीं जताता, फिर यहाँ क्यों? मैं इस बात को सराहता हूँ और सच कहिए तो बेहद पसंद करता हूँ कि "तमिल" या "तेलगु" जनता अपने फिल्मों से काफी हद तक जुड़ी रहती है, बस हम "उत्तर भारतीयों" को इन फिल्मों के बारे में अपना नजरिया बदलना है।

अब बात करते हैं अपने "उत्तर भारतीय" फिल्मों की। चूँकि मैं सोनपुर से हूँ जो "छपरा" जिला में आता है, तो इस लिहाज से "भोजपुरी" फिल्मों से इत्तेफ़ाक न रखना असंभव-सा है। मैं आजकल की "भोजपुरी" फिल्मों का उतना बड़ा प्रशंसक नहीं, जितन पिछले दशक की फिल्मों का हूँ, लेकिन हाँ....... मैं इन फिल्मों से (आज-कल की फिल्मों से) नफ़रत नहीं करता। मैं मानता हूँ कि इन फिल्मों का स्तर नीचे गया है, लेकिन इतना भी नीचे नहीं गया कि इनकी बात करना भी "पाप" हो। लोगों ने इन फिल्मों का ऐसा हव्वा बनाया हुआ है कि अगर कोई कहीं "भोजपुरी" बोलता भी दिख जाए तो उससे कोई अश्लील भोजपुरी गाना गाने को कहेंगे (हाँ कुछ अश्लील गाने बने जरूर हैं, लेकिन ऐसे गाने हर भाषा में बनते हैं) या फिर उससे कन्नी काटकर निकल जाएँगे। शायद इसीलिए हमारी यूपी-बिहार की भोजपुरी जनता अपने-आप को शहरी दिखाने के लिए "भोजपुरी" न जानने या फिर "भोजपुरी फिल्में" न देखने का स्वांग रचती हैं, ताकि लोग उन्हें "दूसरी / निकृष्ट" बिरादरी का न समझें। "भोजपुरी" की आज जो हालत है, उसमें इन "भोजपुर के नालायक संतानों" का सबसे बड़ा हाथ है। अगर बाहर के लोग हमें नीचा समझते हैं या नीचा दिखाते हैं तो हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उन्हें "सच्चाई" से अवगत कराकर "सही" रास्ते पर ले आएँ, उन्हें "भोजपुरी" की विशाल संस्कृति के दर्शन करवाएँ। लेकिन तब क्या किया जाए , जब अपने हीं बीच के लोग अपनी माँ (भोजपुरी) को गाली देने लगें या फिर पहचानने से इनकार कर दें, तब तो हम असहाय हीं हो जाएँगे ना और तब दूसरों को हमारी अवहेलना करने से कौन रोकेगा? हममें से जितनों को भी यह लगता है कि "भोजपुरी" अब "पवित्र" नहीं रही (शायद यही सोचकर "घर" के लोग इससे दूर भागते हैं और "बाहर" के लोग इसके मज़े लते हैं) उनसे यह पूछा जाए (हाँ, मुझसे भी यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए) कि इस हालत का जिम्मेदार कौन है?

मेरे हिसाब से तो "भोजपुरी" जैसी मीठी और "दिल को छूने वाली" जबान कोई और नहीं (उर्दू इसके आस-पास आती है) । "पारिवारिक फिल्मों" के मामले में इस भाषा का कोई सानी नहीं। मैं आज एक पुरानी फिल्म "माई" देख रहा था। इस फिल्म के एक दृश्य में जब लड़की की शादी होती है तो "शारदा सिन्हा" ("पद्म-श्री" से सम्मानित भोजपुरी की प्रख्यात लोक-गायिका) ब्याह के गीत गाती हैं (हमारे यहाँ ऐसे गीतों से हीं शादी में रौनक आती है)। मैं झूठ नहीं बोल रहा - इस गीत को सुनकर और इस दृश्य का मनन करके मुझे पिछले नवंबर में हुई अपनी बहन की शादी याद आ गई और बरबस हीं आँखों से आँसू आ गए। ऐसा इससे पहले मेरे साथ कभी नहीं हुआ था। तो आप हीं कहिए कि जो फिल्म, जो दृश्य, जो भाषा आपके अंतस को छू जाए वो "अश्लील" या "मज़ाक का पात्र" कैसे हो सकती है? यह बस कुछ लोगों के मन का भ्रम है या फिर कुछ लोगों की अधूरी जानकारी , जिसने इस भाषा की "मधुरता" को अर्श से उठाकर "फर्श" पे डाल दिया है। यही बात मैं "बांग्ला भाषा" और "बांग्ला फिल्मों" के बारे में भी कहना चाहूँगा। न जाने क्यों ज्यादातर लोगों को "बांग्ला भाषा" की बुराई करने से क्या हासिल होता है। ये लोग "बांग्ला फिल्मों" का "क ख ग घ" भी नहीं जानते, लेकिन "फिल्मों" की दुर्गति करने में रैन-दिवस लगे रहते हैं। और यहाँ भी इस दुर्गति में सबसे बड़ा हाथ हमारे कुछ "बंगाली बंधुओं" का हीं हैं। मैंने कई सारी "बांग्ला" फिल्में देखी है (हाल-फिलहाल में "अंतहीन") और मुझे लगता है कि संबंधों को दर्शाने में "बांग्ला" फिल्मों के सामने दूसरी भाषा की फिल्में कहीं नहीं ठहरतीं।

कुल मिलाकर.... मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि आप किसी भी भाषा या किसी भी भाषा की फिल्म को अपने "पूर्वाग्रह" या फिर "दुराग्रह" के कारण न नकारें। "नकारने" की इस मनोवृत्ति को आप चाहें जो भी कहें, लेकिन मैं इसे "दोहरी मानसिकता" हीं कहूँगा।
बाकी बातें... अगली मुलाकात में! तब तक के लिए खुदा हाफ़िज़!!

विश्व दीपक
(लेखक हिंदयुग्म के बुनियादी सदस्यों में से एक हैं...कविता और आवाज पन्ने पर खूब कलम चला चुके हैं...बैठक पर पहली दफा आए हैं, संपादक की लाख मिन्नतों के बाद...)

Wednesday, September 02, 2009

गरीब जनता के सब दुख हरती है जी बी रानी !


बच्चों को नौजवान बना दे, और बूढ़ों मे कूट-कूट कर भर दे जवानी! जी हॉं , अदभुत चमत्कारी हैं ये जी.बी. रानी। ये न कोई अंग्रजी दवा हैं न फ्रेंच , न स्पैनिश , न चीनी दवा। न ही किसी पहाड़ की जड़ी-बूटी हैं न ही कोई आयुर्वेदिक या हकीमी नुस्खा ! बाबा रामदेव के योग का भी नहीं है इनमें सूत-कपास-चरखा ! ये देश के गरीबों पर हैं बेहद मेहरबान, अमीरों को बिलकुल ही घास नहीं डालती हैं, ये अद्भुत कद्रदान ! माना कि वेदों-पुराणों , कुरान, बाईबिल , गुरुग्रन्थ साहिब , अजावेस्ता इत्यादि में नहीं है इनके वर्णन की बहार , फिर भी जो पा जाये इनका प्यार , उसे तार-तार करके देती हैं उसे तार ! चुस्ती , फुर्ती , चैतन्यता , चपलता का देती हैं ये उसे उपहार ! ये तुम्हारी ही महान कृपा है जो मैं घटती उम्र के बावजूद , लोगों को दिखता हूं स्मार्ट ,यंग , फुर्तीला और दमदार !!

आइए शुरु करता हूं इनकी राम कहानी। जी.बी. का अर्थ है भारतीय रेल की जनरल बोगी, जिसमें पन्द्रह-बीस बार सफर कर लेने के बाद कोई नहीं रहता है रोगी। या तो रोग चला जाता है, या फिर रोगी ही चला जाता है हमेशा-हमेशा के लिए, या तो ए.सी. कम्पार्टमेण्ट जैसे, देवताओं के स्वर्ग में , अथवा अपेक्षाकृत जनरल बोगी से कम असुविधाजनक , तथाकथित नर्क में। ठसाठस भरी हुई , चांपा-चांपी से भरपूर जनरल बोगी, अपने आप में दुनिया की किसी भी जेल से बढ़के है, किसी भी पुलिस लॉकप में , धुनाई के बाद कोई मुजरिम , इतना चूर-चूर नहीं होता , जितना जनरल बोगी के दमघोंट माहौल में लोगों की दुलतियां-पंचललियां झेलने वाला- इसमें लगातार चालीस घंटे तक सफर करने वाला।
पहले एक पैर पर खड़े होके तपस्या करने वाले लोगों का लोग महान ऋषि-मुनि मानकर उनका सम्मान करते थे, मगर कैसा घोर कलयुग आ गया है कि पूरा या आधा सफर एक पैर खड़े होकर, करने वालों की आजकल कोई नोटिस ही नहीं लेता। महान तपस्वियों से महान, भयानक भीड़ में दबा-सहमा सा इनसान किसी भी तरह न पानी पीने का इन्तजाम कर सकता है, न खाने-पीने का, न ही ट्रेन के शौचालय में जाने का ! वास्तविक, जनरल बोगी में ! जिस बोगी में, यह सब दुष्कर कार्य आसान हो, उसे मैं किसी भी कीमत पर , वास्तविक जनरल बोगी मानने को तैयार नहीं। वो निश्चित रुप से ´´मुकद्दर का सिकन्दर´´ है जो कुली को उसका फिक्स्ड रेट देकर जी.बी. में बैठने की जगह पा जाता है, और वो साक्षात् ´शहंशाह´ है जो जी.आर.पी. वालों की मुट्ठी गरम करके , ऊपर सोने का जुगाड़ फिट कर लेता है! वो एक नम्बर का ´चालबाज´ व ´दस नम्बरी´ का बाप है , जो बगैर टिकट के उक्त दोनों में से किसी सुविधा का जुगाड़ कर लेता है। वास्तविक जी.बी. में , शातिर से शातिर चोर आपका सामान नहीं उड़ा सकता-चुरा भी ले तो पांच कदम भी लेके नहीं जा सकता , कोई आपको जहर खुरानी का शिकार नहीं बना सकता , जिसके पास एक पुड़िया ज़हर होगा वो खुद खाके जानलेवा यंत्रणा से मुक्ति चाहेगा या आपको खिलायेगा....कोई भी टी.टी. टिकट चेक करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता, और न ही कोई चाय वाला, खीरे वाला, आप तक पहुंचने की गुस्ताखी कर सकता है।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसी तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद जी.बी. रानी आपको कैसे बूढ़े से जवान बनाती हैं.. आपको पूरी तरह स्वस्थ, निरोग, चुस्ती-फुर्ती से भरपूर इन्सान बनाती हैं...अगर भगवान ने आपको मेरे जैसा दिमाग दिया होता, तो मुझे बताने की जरुरत नहीं पड़ती, मगर बताने की महती कृपा कर दे रहा हूं ताकि नासमझां तक की समझ में आ जाये, सौ टके की सच्ची बात ! पुलिस में भर्ती पाने वाले रंगरुटों को रोज सुबह मीलों दौड़ा के क्यों सताया जाता है, सेना में भर्ती होने वाले जवानों को, सौ तरह की बेहद कठिन कसरतों व उछल-कूद से क्यों गुजरना पड़ता है..क्रिकेट खेलने वालों को फिटनेस के नाम पर घंटों ´नेट´ पर पसीना बहाके चूर-चूर होने को क्यों विवश किया जाता है, कभी सोचा है आपने.. यह सब होता है इन्सान की मांसपेशियों, हडि्डयों, धमनियों-शिराओं से हर तरह की जकड़न, सुस्ती व शिथिलताएं बाहर भगाने के लिए !
जनरल बोगी। इस मामले में पूरी दूनिया में इसका कोई जवाब नहीं। चूंकि आजकल रामदेव बाबा ने आसनों एवं योग की महिमा को पुनर्जीवित व स्थापित किया है लिहाजा आसनों के माध्यम से आप सबको बात समझाने की कोशिश करता हूं।

गधासन- जब आप जी.बी. में खड़े रहते हैं किन्तु मजबूरन आपको अपना सामान अपने कंधों या सिर पर ही रखने की मजबूरी रहती है। इससे आपके कंधों की मांसपेशियां, गर्दन एवं सिर की हडि्डयां बेहद मजबूत होती हैं।

पंजासन- जब आपके पंजों पर दर्जनों लोगों के पांवों का बारी-बारी इतना दबाव पड़े कि आप कराह उठें-चीत्कार उठें। इससे पांवों के पंजे, बिल्ली या शेर के पंजों से ज्यादा मजबूत हो जाते हैं, धीरे-धीरे।

कम्प्रेशन आसन- जब आप जी.बी. के गलियारे में चारों और से इतना चंप जाये कि आपको अपना पोर-पोर टूटता महसूस हो तो सच मानिये कि आप ही वो भाग्यशाली हैं जो हजारों रुपये बचाते हुए बहुमूल्य मसाज-सेंक पा रहे हैं एक दम मुफ्त में। पोर-पोर को एवं फेफड़ों को चुस्त-दुरुस्त करने वाला आसन!

''वासन- जब आप कुछ मिनटों के लिए एकदम से “वास लेना ही भूल जायें। इस आसन से आप पानी में कभी भी नहीं डूब सकते, आंसू गैस आप पर असर नहीं करती और युद्ध छिड़ने पर बमों के धुएं आप का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं क्योंकि “वास रोकने की कला में आपको प्रवीण कर देती हैं जी.बी.

कपिआसन- लोगों के सिर पर जबरन, बेहयाई से पांव रखते हुए यदि आप वास्तव में उछल-कूद के, शौचालय तक पहुंच जायें तो कपि-आसन में दक्ष हो जाते हैं , इससे आप बानर की तरह फुर्तीले हो जाते हैं।

पायदान आसन- लाख प्रयास करके भी जब भयानक भीड़ के चलते बोगी में घुस सकें और पूरा सफर टेन के पायदान पर ही, भारी सांसत सहते-करना पड़े तो समझिए आपके पांव, हाथ एवं हाथ के पंजे बेहद मजबूत हो रहे हैं ,ऊंगलियों में असीम ऊर्जा का समावेश हो रहा है।

स्थानाभाव के कारण, ´एक पदासन´ संड़स्यासन, ´शीश झंकृति आसन, ´मिल्खासन´ आदि अनेक आसनों की व्याख्या नहीं कर पा रहा हूं , किन्तु अब तो आपको पक्का यकीन हो ही गया होगा कि कैसे जी.बी. रानी भरती हैं बूढों में जवानी- ´कूट-कूट कर। यदि आप अमीर हो, मोटापे या गठिया इत्यादि के शिकार हो तो कम से कम पच्चीस बार, वास्तविक, जी.बी. में कम से कम तीन सौ किलोमीटर की यात्रा करें और आशातीत लाभ होने पर मुझे धन्यवाद अवश्य दें। खैर, मैने तो कसम खा रखी है, जब तक जिऊंगा, जी.बी0.और सिर्फ जी.बी. में सफर करुंगा और चिर युवा बना रहूंगा। यदि आप ऐसा न कर रहे हों तो अपने मस्तिष्क की किसी डाक्टर से जांच अवश्य ही करा लें।

संदीप कुमार श्रीवास्तव
लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। फिलहाल इलाहाबाद के एक पत्रकारिता संस्थान में पढ़ाते हैं। बैठक पर ये इनका पहला लेख है.. )

Friday, August 28, 2009

बीजेपी : कॉट संघ बोल्ड जिन्ना

जसवंत सिंह से लेकर तमाम भाजपा नेताओं ने खुद या पार्टी के लिए ही नहीं तमाम न्यूज़ चैनल्स के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है...रोज़ बीजेपी का एक विकेट गिरता है और बीजेपी पर नया और पिछले बुलेटिन से ज़्यादा असरदार शीर्षक ढूंढने की मगजमारी शुरू हो जाती है....जसवंत सिंह की किताब कितने 'मीडियाकरों' ने पढ़ी होगी, इसमें संदेह है मगर ऐसा लगता है कि आधे घंटे के लिए टीवी में हर कोई विद्वान हो जाता है...हल्के में मत लीजिए टीवी के भद्रजनों को...सबको सब पता है...जिन्ना का नज़रिया, जसवंत का नज़रिया, (कौन जाने श्रीरामजी का नज़रिया भी)...बहरहाल, नाज़िम नक़वी क्या राय रखते है, गौर करने लायक हैं...
संपादक

ऐसा नहीं हो सकता कि जसवंत सिंह को इसका अंदाज़ा ही न हो कि उनकी किताब “जिन्ना-इंडिया-पार्टीशन-इंडिपेन्डेंस” जब बाज़ार में आयेगी तो क्या प्रतिक्रियाएं होंगी। आख़िर वो शख़्स इस बात को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता है जो देख चुका हो कि जिन्ना के इस जिन ने 2005 में लौह-पुरुष अडवाणी जी की कैसी फ़ज़ीहत की थी। सवाल है कि क्या उन्हें इस बात का अंदेशा था...? जी हां था। उन्होंने किताब के विमोचन समारोह में पहुंचे एक पत्रकार से अंग्रेज़ी में कहा भी था कि “आई हैव रिटेन द बुक एंड नाउ आई एम रेडी फार द नूज़” यानी अब मैं फांसी के फंदे के लिये तैयार हूं। साफ़ है कि ख़ुद जसवंत सिंह भी नकारात्मक प्रतिक्रियाओं के लिये दिमाग़ी तौर पर तैयार थे।

हां ये ज़रूर हो सकता है कि शायद उन्होंने ये नहीं सोचा होगा कि जिस पार्टी की उन्होंने तीस साल तक सेवा की वो इतनी बेरुखी से, बगैर उनका पक्ष जाने, महज़ एक फोन काल पर रिश्तों के सारे तार काट देगी। किताब के विमोचन (जिसमें भाजपा का कोई नेता शामिल नहीं था) के बाद से ही भाजपा और कांग्रेस की नाराज़गी किसी से छुपी नहीं है। उत्तर प्रदेश के एक कांग्रेसी नेता ने तो जल्दी से एक किताब खरीद कर टीवी कैमरे के सामने उसे जला कर अपनी पार्टी के आग-बबूला होने का मंचन कर दिया था।

कुल मिलाकर एक पक्ष रह गया है और वो है देश का मुसलमान। पता नहीं आम मुसलमान इसे कैसे देख रहा है लेकिन बरेली के एक पढ़े लिखे निवासी महमूद भाई ने विचारों को कहीं दूसरी तरफ़ ही मोड़ दिया। कहने लगे “जसवंत सिंह के साथ वही हुआ जो जिन्ना के साथ हुआ था... भई जिन्ना को भी उस वक्त पार्टी से तकरीबन बेदख़ल कर दिया गया था... जिन्ना लिबरल आदमी थे और नाराज होकर कम्यूनल पार्टी में चले गये। ये कम्यूनल पार्टी के आदमी हैं... ये सेक्यूलरिज्म में आ जायेंगे...।”

हालांकि आदमी विचारों से कभी बूढ़ा नहीं होता शायद इसीलिये जसवंत सिंह भी कह रहे हैं कि उनका राजनैतिक जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन सत्तर पार कर लेने के बाद उनमें कितनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा बची है ये अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है, और इसी बुनियाद पर कहा जा सकता है कि उनका पार्टी से निष्कासन कोई ख़ास मायने नहीं रखता। जो चीज़ मायने रखती है वो ये कि क्या पार्टी से जुड़ने के बाद व्यक्ति की सोच भी गुलाम हो जाती है? पार्टी अनुशासन और सेना अनुशासन में क्या कोई फ़र्क़ नहीं है? जसवंत जी के अफ़ीम प्रदर्शन को क़ानून की आंखों से बचा लिया जाता है लेकिन तथ्य प्रदर्शन की ये सज़ा दी जाती है।
बहरहाल जो भी हो इस किताब के आ जाने से सबसे ज्यादा हालत खराब है उन मौलवी हज़रात की जो कांग्रेस की चाटुकारिता में भाजपा को खरी खोटी सुनाते हैं और भाजपा के निवाले तोड़ते हुए कांग्रेस को मुसलमानों का दुश्मन बताते हैं, और इस बीच अपनी दुकान चलाते हैं। आज़ाद भारत में मुसलमानों की राजनैतिक समझ की शुरूआत ही विभाजन की सियासत से शुरू होती है और अब इस किताब के बाद उन्हें दिखाई दे रहा है कि दोनों पार्टियां तो इस विषय पर एक हो गई हैं, अब क्या किया जाए? रमजान के महीने में सियासी इफ़्तार पार्टियों में बातचीत का रुख क्या होगा इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

सच पूछिये तो जिन्ना किसी के हीरो नहीं हो सकते, न जमाते-इस्लामी के, न संघ के, न कांग्रेस के। पाकिस्तान के अंदर एक बहुत बड़ा तबक़ा उन्हें विलेन के रूप में देखता है। विदेशी सूट पहनने वाले जिन्ना, अंग्रेजी औरतों के साथ सैर-सपाटे करते जिन्ना, सिगार के कश लगाते जिन्ना, व्हिसकी से परहेज़ न करने वाले जिन्ना, सिर्फ ख़ुद को और अपने टाइप राइटर को “पाकिस्तान” बनाने का श्रेय देने वाले जिन्ना पाकिस्तान बनने के बाद पाकिस्तानियों से ये कहते हैं कि - अब पाकिस्तान बन गया अब आप गाइये बजाइये, खाइये पकाइये, मस्जिद जाइये, मंदिर जाइये, गिरजा जाइये तो कई दाढ़ियां नाराज होकर उनसे कहती हैं कि वाह! ये अच्छी कही आपने... इस्लाम के नाम पर मुल्क बनाया और अब ये कह रहे हैं कि मंदिर जाइये गिरजा जाइये...। असल बात तो ये है कि जिन्ना के सेक्यूलर बनते ही कई चेहरों का मुखौटा खुद-ब-खुद पिघलने लगता है।

लेकिन सवाल न जिन्ना का है, न जसवंत सिंह का है, सवाल है किताब लिखने की आज़ादी का। 1989 में सेनेटिक वर्सेस ने जो आग लगाई थी उसकी आंच में तपते हुए एक मौलाना साहब के पास मैं बेठा था। मौलाना अपने अनुयाइयों के बीच रश्दी पर लगे मौत के फ़रमान पर अपनी सहमति दर्ज कर रहे थे। मैं जानता था कि मौलाना ने किताब नहीं पढ़ी है, उनकी अंग्रेजी कमज़ोर है और अनुवाद बाजार में अभी आया नहीं है। मैंने सबके बीच उनसे सीधा सवाल कर डाला- मौलाना आपने किताब पढ़ी…? वो सकपकाये फिर संभलते हुए बोले ऐसी गंदी किताब मैं पढ़ भी कैसे सकता हूं...। मौलाना का दर्द मैं समझ सकता था, ईमान की रस्सी पर आस्था का बैलेंस रॉड लिये दूसरे किनारे तक पहुंचने को मजबूर लोग इधर-उधर देखने का ख़तरा मोल नहीं लेते क्योंकि हल्की सी डगमगाहट आसमान से जमीन पर ले आती है, चोट अलग लगती है। हां जो विचारों की स्वत्रंता की अहमियत को समझते हैं वो खिलाफ विचारधाराओं का स्वागत भी तहे दिल से करते हैं।
1990 में पाकिस्तान में एक फिल्म बनी “इंटरनैशनल गुरिल्ले” जान मुहम्मद निर्देशित इस फिल्म में रूसी फौजों के खिलाफ, इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए कुछ तालिबानी किरदार लड़ाई के लिये निकल पड़ते हैं। लेकिन तब तक रश्दी इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में उभारे जा चुके थे, इसलिये फ़िल्म की कहानी का विलेन उन्हें बना दिया गया। फिल्म में ये रोल अफजाल अहमद ने निभाया। फिल्म पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में जबरदस्त हिट रही लेकिन इत्तेफाक़ से यही पहली पाकिस्तानी फिल्म थी जिसके वीडियो ब्रिटेन में बैन कर दिये गये थे। और हुस्ने-इत्तेफ़ाक़ देखिये कि खुद सलमान रश्दी ने ब्रिटिश सेंसर बोर्ड से अनुरोध करके उसपर लगी रोक को हटवाया था।
सलमान रश्दी अपने खिलाफ उपजे रोष का स्वागत करने के लिये ज़िंदा थे सो ऐसा हो गया। मगर सरदार पटेल और नेहरू अब हमारे बीच नहीं हैं तो कौन है जो कहे कि सहमति और असहमति से परे, जसवंत जी ने जो लिखा वो स्वागत योग्य है। इतिहास के विद्यार्थी जब किसी काल-खंड में पीछे जाकर वापिस लौटते हैं तो हर बार हर कोई उनसे एक अनुरोध ज़रूर करता है कि “पुन: आगमन प्रार्थनीय है...।”

नाज़िम नक़वी

Monday, August 17, 2009

किंग खान पर हंगामा है क्यूं बरपा ?

फौजिया रियाज़ दिल्ली के एफएम रेनबो में रेडियो जॉकी हैं.......बैठक पर इनका ये पहला लेख है....आप पढ़कर बताएं कि बैठक की ये नई सदस्य कैसा लिखती हैं....



हाल ही में अमेरिका के एक एयरपोर्ट पर शाहरुख़ खान "द सुपर स्टार" के साथ दो घंटों तक पूछताछ चली। इस पर इस कदर हंगामा बरपा कि भारतियों की इज्ज़त से खिलवाड़ हो रहा है और भी न जाने क्या क्या...कई लोगों का कहना है कि ये भारतीयों के साथ ज़्यादा होता है, मुसलमान के साथ ज़्यादा होता है,अमेरिका एक रेसिस्ट देश है, वहां नाम देख कर पूछताछ की जाती है, साथ ही कि ये हमारे मान की बात है, हमे भी अमेरिकियों से इसी तरह पेश आना चाहिए...या रब! हद हो गई!! हम ख़ुद कितने रेसिस्ट हैं, दोगले हैं, इसका एहसास ही नही है, ख़ुद हमारे यहाँ हर दाढ़ी वाले को शक की नज़र से देखा जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ नॉर्थ ईस्टर्न लोगों को अपना नही समझा जाता, ख़ुद हमारे यहाँ विदेशी पर्यटकों को तंग किया जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ लोगों को नीचा दिखाने के लिए बिहारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है...इतना हल्ला किसलिए क्यूँकि वो शाहरुख़ खान है? न जाने कितने कश्मीरी नौजवानों के सर पर आतंकवादी का लेबल लगा कर मार दिया जाता है, न जाने कितने मुसलमान नौजवानों को कॉलेज में एडमिशन के दौरान तिरछी नज़रों से देखा जाता है, न जाने कितने गरीब मासूम लोगों को माओवादी बताकर एनकाउंटर किया जाता है...तब कोई उफ़ भी नही करता, अपने देश में होता है तो सब चुप्पी साध लेते हैं और गैर मुल्क में हुआ तो हाय तौबा...क्यूँ? माना जो हुआ वो ग़लत हुआ लेकिन उससे ज़्यादा ग़लत तो पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के साथ हुआ...लेकिन तब न्यूज़ चैनल वाले ही चिल्लाये थे, अभी आम इंसान को भी चिल्लाता देख रही हूँ...अरे ज़्यादा जोश में आने की ज़रूरत नही है..इनका कोई भरोसा नही कल को इमरान हाश्मी की तरह कह देंगे "मेरे साथ कोई बदसलूकी नही हुई,मेरे बयां को तोड़-मरोड़ के पेश किया गया था"

फौजिया रियाज़

Friday, May 22, 2009

शाम तक क्या बेचें....

हिंदुस्तान के बाक़ी इलाकों के बारे में नहीं जानता, मगर बिहार में बीबीसी आज भी सबसे ज़्यादा सुना जाना वाला रेडियो है.....हालांकि, प्राइवेट एफएम वहां भी दस्तक दे चुका है, मगर वहां का श्रोता अब भी रेडियो के फटाफट संस्करण से ज़्यादा रेडियो के समझदार संस्करण को तरजीह देता है.....ब्लॉगिंग पर बीबीसी भी सजग है और वहां अक्सर नज़र जाती है.....एक बढिया लेख वुसतुल्लाह ख़ान साहब का पढ़ा तो जी हुआ बैठक पर सबको पढ़ाया जाए....मीडिया के हाल के चरित्र और चेहरे पर ऐसी छींटाकशी कम ही पढ़ने को मिलती है.....
संपादक


जो फटीचर लतीफ़ा मैं आपको सुना रहा हूँ. ये लतीफ़ा पाकिस्तान में पठानों पर और भारत में सरदारों पर रखकर सुनाया जाता है.

एक सरदार जी/ख़ान साहब, तेज़ गर्मी में ठेले पर फ़ालसे बेच रहे थे. एक ग्राहक आया, पूछा भाई साहब फ़ालसे क्या हिसाब बेच रहे हो. ठेले वाले ने कहा 70 रुपये किलो. ग्राहक ने कहा सब तौल दो. रेहड़ी वाले ने कहा कि सब फ़ालसे तुम ले गए तो शाम तक क्या बेचूंगा!!!

अब आप पूछेंगे यह वर्षों पुराना लतीफ़ा सुनाने का क्या मतलब है??? मतलब यह है कि मुझ जैसे सैंकड़ों पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों को सोलह मई के नतीजों की वजह से भारतीय जनता से मायूसी हुई है.

हम तो पिछले दो महीने से यह सोच कर अपने क़लम के भाले और ज़ुबानों की छुरियाँ तेज़ किए बैठे थे कि हिसाब-किताब, आँकड़े और सितारों की चाल बता रही है कि किसी भी पार्टी को चुनावों में बहुमत नहीं मिलेगा.

ऐसे में सरकार बनाने के लिए राजनेताओं में ख़ूब जूता चलेगा. धौंस और घूस से काम लिया जाएगा. तब कहीं जा कर 15-20 दिन बाद एक ऐसी सरकार की शकल उभरेगी जो शायद दो ढाई साल भी न निकाल पाए. फिर मध्यावधि चुनाव होंगे और फिर हम मीडिया वालों का धँधा चमकेगा.

मगर भोले वोटरों को शायद अंदाज़ा ही नहीं कि उसने हमारे अंदाज़ों पर बर्फ़ीला पानी उंडेल कर मीडिया को कितना नुक़सान पहुँचाया है.

वोटरों की इस हरकत से अगले 15-20 दिन तक की योजना बनाने वाले चैनलों, और समाचार पत्रों से जुड़े सैंकड़ो राजनीतिक टीकाकारों, विश्लेषकों, लेखकों, ग्राफ़िक डिज़ाइनरों, हाई प्रोफ़ाइल ऐंकरों, कैमरामैनों, कैमरे के आगे खड़े होकर नए राज़ खोलने की आदत में लगे रिपोर्टरों और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू की दौड़ में हिस्सा लेने वाले संपादकों के करोड़ों रुपये डूब गए जो उन्हें फ़ीस और आने-जाने के ख़र्चे के रुप में मिल सकते थे.
हम सबके दिल में अरमान था कि आने वाले कई दिनों तक हाथी का चीटियों के साथ, शेर का बकरी के साथ और बिल्ली का चूहे के साथ राजनीतिक तोड़-जोड़ बैठाएं. रंगीन ग्राफ़िक्स और टिप्पणियों की मदद से अपनी-अपनी मनपसंद सरकार बनाएंगे, मिटाएंगे और फिर बनाएंगे. ख़ुद भी मज़े लेंगे और देखने, सुनने और पढ़ने वालों को भी मज़ा करवाएंगे.

लेकिन 15-20 दिन तक जो सर्कस लगना था वो 16 मई की शाम तक शामियाने के बाँस के साथ गढ़ने से पहले ही लद गया.

और अब हम सब मीडियाकर्मी विश्लेषक 46 डिग्री सेल्सियस में सच्चाई के तपते सूरज तले वोट के फ़ैसले की गर्म ज़मीन पर बैठे ये सोच रहे हैं कि सारे फ़ालसे वोटर ले गया, अब शाम तक क्या बेचें!

लेकिन मायूसी की कोई बात नहीं. गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में. 2004 में भी यही हुआ था. आने दें 2014 के चुनाव. हमने भी फ़ालसे की जगह तरबूज़ और कटहल का ठेला न लगाया तो नाम बदल देना. यह वोटर ख़ुद को आख़िर समझता क्या है!!!

Monday, April 06, 2009

सबसे बड़ा आतंकी है मीडिया...



चार महीने हुए मुम्बई में आतंकी हमला हुए। उतना या उसके आसपास ही समय था जब पाकिस्तान के स्वात में तालिबान ने कब्ज़ा करना शुरु किया था। कम से कम टीवी पर तो उन्हीं दिनों खबरें आनी शुरू हुई थीं। वो दिन है और आज का दिन कोई "प्राइम टाइम" ऐसा नहीं जाता जब तालिबान-पाकिस्तान की चीखें न सुनाई दे रही हों। न्यूज़रूम में बैठे न्यूज़रीडर गला फाड़-फाड़ कर तालिबान की कहानी सुनाते आ रहे हैं। तालिबान क्या करता है, कहाँ रहता है, कब किस से मिलता है, क्या खाता है, पीता है..ऐसे कितने ही अनगिनत बातें हैं जो खुद तालिबान को नहीं पता होंगी।

लगता है आजकल की खबरें मीडियारूम में बैठ कर ही बन जाती हैं। कुछ वीडियो तो इन चैनलों के "होनहार दर्शक" भेज देते हैं तो कुछ यूट्यूब की मेहरबानी से मिल जाते हैं। ऐसी-ऐसी भयानक खबरें दिखाई जाती हैं जिसे कमजोर दिल वाले न ही देखें तो अच्छा। और ऐसी चेतावनी लिखी भी होती है। एक बार दिखा रहे थे कि तालिबानी कैसे किसी की हत्या कर देते हैं, तो एक वीडियो में लाश के साथ खेलते हुए दिखाया गया। ऐसे दृश्य होते हैं जिससे घिन्न आने को भी होती है। तालिबान ने स्वात पर कब्ज़ा कर लिया है, यहाँ बमबारी हो रही है, फाटा की ओर बढ़ रहे हैं, अब कराची पर हमला करेंगे, लाहौर के हमले में उनका हाथ था, भारत से कितनी दूर है तालिबान और ऐसी ही बहुत सी बातें हैं, किस्से हैं, कहानियाँ हैं जो आये दिन टीवी पर देखे जा सकते हैं। फलां आतंकवादी तालिबानी था... ये उनका कमांडर है... और कईं बार तो गौर से देखने को कहते हैं। मुझे लग रहा था कि अब तो चुनाव आ गये हैं, तो ये खबरें कुछ कम हो जायेंगी। पर मेरा सोचना गलत था। आज भी ये बदस्तूर जारी हैं।

कभी कभी सोचता हूँ कि क्या ११० करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में खबरें खत्म हो गई हैं? क्या संवाददाताओं ने बाहर निकलना बंद कर दिया है? भारत में लोग भूखे मर रहे हों तो कोई बात नहीं, तालिबान के पास खाने को कुछ न हो तो ख़बर बनती है। पूर्वोत्तर के राज्यों में बम ब्लास्ट की खबर स्क्रीन के नीचे लिखी जाती हैं (कईं बार तो पता भी नहीं चलता)पर लाहौर, कराची के हमले ब्रेकिंग न्यूज़ में जगह बनाते हैं। उड़ीसा में तूफान आये तो कोई बात नहीं, इस्लामाबाद में एक गोली भी चले तो ब्रेकिंग न्यूज़ बनती है। भारत में मंत्री चाहें रहे या न रहें, लेकिन पाकिस्तान में प्रधानमंत्री कौन बनेगा इस पर चर्चा जरुर होती है। आखिर क्यों?

पाकिस्तान और तालिबान ने हमारे चैनलों पर कब्जा कर लिया है। अब हमें भारत के बारे में जानने की जरूरत नहीं है। हमें चिंता होनी चाहिये तालिबान की, पाकिस्तान की। अमरीका ड्रोन हमला करता है तो सबसे पहले आप तक मीडिया पहुँचाता है, कभी रोबोटी कुत्ता भेजता है तो आधे घंटे का एपिसोड तो बनेगा ही। तालिबान के वीडियो दिखाये जाते हैं। उनका इलाका दिखाया जाता है। आतंकवादी दिखाये जाते हैं।

आखिर ये सब दिखा कर मीडिया चाहता क्या है? यदि हम ये मान लें कि इससे हम सचेत होते हैं, तो मुझे लगता है कि यह कहना गलत होगा। बल्कि इससे हमारे मन में ख़ौफ़ पैदा हो रहा है। ख़ौफ़ तालिबान के हमले का..खौफ ओसामा बिन लादेन का। खौफ दिल्ली में बम ब्लास्ट का, खौफ पाकिस्तान के खत्म होने का.... और न जाने ऐसे कितने ही खौफ हैं जिन्हें हम अपने मन में लिये चलते हैं। हाँ, ये बात सही है कि हमें पाकिस्तानी और तालिबानी गतिविधियों पर निगरानी रखनी चाहिये ताकि भविष्य में किसी भी हमले के लिये हम तैयार हो पायें। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि आप टी.आर.पी की होड़ में दर्शकों और जनता के दिलों में डर पैदा करें। मीडिया में पाकिस्तानी-तालिबानी प्रेम इतना फ़ैला हुआ है कि एक बार इसके विरोध में रहने वाला एक चैनल भी यही प्रोग्राम दिखाने पर मजबूर हो गया। आम दर्शक सहमा हुआ रहता है। पूरे दिन लोगों में आपस में भी यही चर्चा गरम रहती है। पाकिस्तान-तालिबान, तालिबान-पाकिस्तान...पर इन दोनों को बीच में पिस गया है हिन्दुस्तान...कहते हुए मुझे कोई संशय नहीं है कि पड़ोसी देश इतना आतंक नहीं फैला रहा है जितना हमारे देश का ये गैरजिम्मेदार मीडिया...

तपन शर्मा