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Saturday, September 19, 2009

गुमराह- बी आर चोपड़ा की बेहतरीन फिल्मों से एक है

फिल्म चर्चा

गुमराह जो सन 1963 में आई थी, बी आर चोपड़ा की बेहतरीन फिल्मों में से एक है, और उनकी अन्य फिल्मों की तरह इसमें भी एक सामाजिक मुद्दे को उठाया गया था। फिल्म शुरू होती है रामायण के एक दृश्य से जिसमें रावण राम की कुटिया के सामने भिक्षा माँगने आता है। जब लक्ष्मन राम की पुकार सुन कर जंगल में गये हैं और सीता की सुरक्षा के लिये लक्षमण रेखा खींच कर गए हैं। सीता रावण की बातों में आकर उसे पार कर लेती हैं और रावण उनका अपहरण कर लेता है। बस यही फिल्म की थीम है। एक स्त्री के अपनी मर्यादा को लांघने का और उससे उपजी परिस्थितियों का।

मीना (माला सिन्हा) और कमला (निरुपा रॉय) नैनीताल के एक व्यापारी की दो बेटियाँ हैं। मीना राजेंद्र (सुनील दत्त) से प्रेम करती है जो कि एक चित्रकार और गायक है। कमला शादीशुदा है और उसके पति अशोक (अशोक कुमार) बंबई में एक वकील हैं। कमला के दो बच्चे हैं जो अपनी मौसी से बहुत प्रेम करते हैं। कमला अपने तीसरे बच्चे के प्रसव के लिये नैनीताल आती है जब उसे मीना के प्रेम प्रसंग के बारे में पता चलता है और वो उसकी और राजेंद्र की शादी की बात अपने पिता के सामने रखने की हामी भरती है लेकिन उससे पहले ही बच्चे को जन्म देते समय उसकी मौत हो जाती है। अशोक को गहरा सदमा लगता है। मीना के पिता कमला के बच्चों के लिये चिंतित हैं कि उन्हें माँ की ज़रूरत है और अगर उनकी सौतेली माँ आई तो पता नहीं उनके साथ कैसा व्यवहार करे। इसी सोच के चलते वे मीना को अशोक से शादी करने के लिये राजी कर लेते हैं क्योंकि बच्चे मीना को माँ की तरह मानते हैं। मीना अपने प्रेम की कुर्बानी देकर अशोक से शादी कर लेती है और बंबई चली जाती है। कुछ दिनों बाद अचानक उसे राजेंद्र वहाँ मिल जाता है जिसकी एक गायक के रूप में अशोक से भी जान-पहचान हो जाती है। राजेंद्र मीना के घर आने-जाने लगता है और इस तरह उनका छुप-छुप कर मिलना फिर शुरू हो जाता है। मीना का मन उसके काबू में नहीं रहता और मना करते-करते भी वो उससे नियमित रूप से मिलने लगती है। एक दिन अचानक मीना के राजेंद्र से मिलकर लौटते हुए एक औरत लीला (शशिकला) पकड़ लेती है जो खुद को राजेंद्र की पत्नी बताती है, लीला उसे ब्लैकमेल करने लगती है। मीना राजेंद्र के प्रेम और लीला के डर के बीच बुरी तरह फंस जाती है। इधर अशोक के सामने भी वो घबराई सी रहती है। अंत में भेद खुलता है, इसमें एक रहस्य है जो मैं उजागर नहीं करूँगा वरना आपका फिल्म देखने का मज़ा कम हो जायेगा। मीना को अंत में अपने कर्तव्य का अहसास होता है और वो राजेंद्र से संबंध तोड़ लेती है।

फिल्म एक संवेदनशील कहानी को बहुत प्रभावी तरीके से कहती है। फिल्म का प्रवाह औरर घटनाक्रम मानवीय भावनाओं पर निर्देशक की मजबूत पकड़ दर्शाता है। कैसे इंसान अपनी भावनाओं के प्रवाह में कमज़ोर बनकर अपने कर्तव्य की अनदेखी करता है। फिल्म एक शादीशुदा औरत के मन की उलझन को रेशा-रेशा दिखाती है जहां वह अपने प्रेमी के लिये अपनी भावनाओं और अपने प्रति के लिये अपने कर्तव्य के बीच फंसी हुई है। आज के युग में ये फिल्म और भी प्रासंगिक है जब मन ही सब कुछ है और मन के कहने पर इन्सान कुछ भी करने में संकोच नहीं करता है। अपने लिए कोई कठोर निर्णय लेना आज के समय में लोगों के लिए असंभव लगता है फिल्म का एक संवाद थोड़े से शब्दों मे बहुत बड़ा फलसफा बयान कर देता है जो अशोक मीना के बारे में पता चलने पर कहता है, मुझे पूरी तरह तो याद नहीं लेकिन उसका आशय कुछ यूँ था कि- “औरत ही घर बनाती है और घर से ही समाज बनता है, अगर औरत गलत रास्ते पर जाती है तो पूरा समाज भटक सकता है“। अशोक का पात्र बहुत ही समझदार दिखाया है जो अपनी पत्नी के बारे में पता चलने पर सीधे उससे झगड़ा नहीं करता बल्कि बहुत ही समझदारी से उसे सही रास्ते पर लाने की कोशिश करता है और अंत में भी उसे छूट देता है कि वो चाहे तो उसे छोड़कर जा सकती है।

निर्देशक के तौर पर बी आर चोपड़ा साहब को सलाम करना चाहिये। मैं उनका जबर्दस्त प्रसंशक बन गया हूँ। अशोक कुमार के बारे में तो मैं पहले भी कुछ नहीं कह पाया था, उनका अभिनय टिप्पणियों के परे है। वे महानतम हैं। माला सिन्हा उस ज़माने की ओवरएक्टिंग क्वीन थीं लेकिन इस फिल्म में शादी के बाद का हिस्सा उन्होंने बखूबी निभाया है। शादी के पहले बच्चों के साथ उनकी मस्ती कोफ्त पैदा करती है। इस रोल के लिये चोपड़ा साहब की पहली पसंद मीना कुमारी थी लेकिन किसी वजह से बात नहीं बनी। सुनील दत्त का मै बचपन से प्रसंशक हूँ लेकिन इस फिल्म में वे असहज लगे। शायद उनका व्यक्तित्व ऐसे कमज़ोर चरित्र के लिये उपयुक्त नहीं है, वे एक दबंग व्यक्तित्व के स्वामी थे। फिल्म का एक और मजबूत पक्ष संगीतकार रवि का मधुर संगीत है। चलो इक बार फिर से, आजा आजा जैसे मीठे गीत फिल्म देखने का मज़ा दोगुना कर देते हैं। बी आर चोपड़ा ने अपनी का संगीत हमेशा रवि से तैयार करवाया है और रवि ने हमेशा उन्हें अपना बेहतरीन दिया है।

फिल्म 5 में से 5 अंक पाने की हक़दार है।

--अनिरुद्ध शर्मा

Wednesday, August 19, 2009

बिना गानों वाली पहली फिल्म थी 'कानून'


क्या एक ही जुर्म के लिए किसी इंसान को २ बार सजा हो सकती है? इसी सवाल के साथ शुरू होती है बी आर चोपडा की फिल्म 'कानून' |
घटनाक्रम कुछ यूँ होता है कि कालिया (जीवन) किसी आदमी का क़त्ल कर देता है और पकडा जाता है | अदालत में पेश होने पर पता चलता है कि कालिया इसी आदमी के क़त्ल के जुर्म में २० साल की सजा काट चुका है | बस, आपका दिल यहीं दहल जाता है ये सोचकर कि कैसा अहसास होगा वो जब आदमी भगवान की दी हुई ज़िन्दगी पूरी की पूरी बिना वजह जेल में काट दे |
कालिया जज से सवाल करता है कि कानून को किसी इंसान से वो चीज़ छीन लेने का क्या हक है जिसे वो वापस नहीं कर सकता ? अद्भुत फिल्म और अद्भुत अभिनय दादा मुनि का |
बी आर चोपडा सदा से सामाजिक सन्देश देने वाली फिल्में बनाते रहे हैं | इस फिल्म में एक बेहद संवेदनशील और अहम् मुद्दा उठाया गया था जो इतने साल गुज़र जाने के बाद, आज भी मौजूं है | सवाल यह है कि क्या कानून को उन गवाहों की गवाही के आधार पर एक इंसान की कीमती ज़िन्दगी छीन लेने का हक है, जो थोड़े से लालच से बहक सकते हैं या जिनसे देखने सुनने में गलती होने की पूरी संभावना है | मनुष्य गलतियों का पुतला है, फिर उसी की बात को पूरी
तरह सच मानकर किसी की ज़िन्दगी का फैसला कैसे किया जा सकता है?
फिल्म में अशोक कुमार ने एक जज बद्री प्रसाद की भूमिका की है जो एक संवेदनशील और विचारवान व्यक्ति है | इस जज ने कभी किसी को फांसी की सजा नहीं दी | जज की एक बेटी मीना(नंदा) है जो एक वकील कैलाश(राजेंद्र कुमार) से प्रेम करती है और एक बेटा विजय(महमूद) है जो अपनी अय्याशियों के चलते एक साहूकार(ओमप्रकाश)के जाल में फंस जाता है | विजय कुछ पैसों के बदले साहूकार को एक कोरे काग़ज़ पर दस्तखत करके दे देता है | काफी समय तक पैसा नहीं चुकाने पर साहूकार उसे उसके पिता की जायदाद अपने नाम कर लेने की धमकी देता है | विजय अपनी बहन मीना से मदद मांगता है और मीना कैलाश से | कैलाश अपने काम से फुर्सत पाकर रात को साहूकार के घर जाता है और उसे कानून का डर दिखाकर वो काग़ज़ वापस ले लेता है | बातें करते हुए कैलाश को जज बद्री प्रसाद वहां पर आते हुए दिखाई देते हैं, वो पास वाले कमरे में छुप जाता है | बद्री प्रसाद अन्दर आते ही साहूकार को जान से मार कर वापस चले जाते हैं | कैलाश वहां से भागकर अपने घर चला जाता है | थोडी ही देर के बाद एक चोर खिड़की खुली देख साहूकार के घर में घुस जाता है, वहां अँधेरे में वो लाश के ऊपर गिरता है और छुरे पर उसकी उँगलियों के निशान बन जाते हैं | चोर डर कर खिड़की से वापस भागता है लेकिन गश्त मारती पुलिस के हाथ लग जाता है | उस पर मुक़दमा चलता है| कैलाश जानता है कि वो बेगुनाह है, उसकी अंतरात्मा उसे चैन से नहीं रहने देती और वो उस चोर का वकील हो जाता है | दिलचस्प बात ये है कि फैसला खुद बद्री प्रसाद को करना है क्योंकि वही इस मुक़दमे की सुनवाई कर रहे हैं | कैलाश एक बेगुनाह को सजा से बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है और आखिर बद्री प्रसाद पर उंगली उठा देता है | अब जज खुद कठघरे में खडा होता है | लेकिन इस पूरी कहानी में एक पेंच है जो अंत में खुलता है और एक ज्वलंत प्रश्न खडा कर देता है कि अगर सच्चाई का संयोग से पता नहीं लगता तो एक बेगुनाह को सजा होना तय थी क्योंकि परिस्थितिवश गवाह से भी चूक हो जाती है |
फिल्म की गति उस ज़माने को देखते हुए तेज़ है और फिल्म कहीं भी अपनी पकड़ ढीली नहीं करती | आज के ज़माने में भी जब दर्शक को घटनाओं के हाई डोज़ की आदत हो चुकी है, फिल्म अपना असर छोड़ने में कामयाब है | ये कमाल निर्देशन का है | अभिनय का श्रेष्ठतम उदाहरण देखना हो तो दादा मुनि को देखना चाहिए | नंदा की भूमिका में कुछ विशेष नहीं है | महमूद अपने चिर परिचित अंदाज़ में है | कमी है तो बस एक, राजेन्द्र कुमार...वो ऐसे अभिनेताओं में से एक हैं जिन्हें सिर्फ किस्मत के दम पर सफलता मिली है वरना इस फिल्म में चेहरे पर एक-एक भाव लाने के लिए उन्हें कितनी जद्दोजहद करनी पड़ी है वो साफ़ दिखाई देता है | चेहरे बनाने की उनकी मेहनत देखकर हमें थकान होने लगती है |
फिल्म एक और मायने में विशेष है, ये भारत की पहली बिना गीतों वाली फिल्म थी | इसके पीछे भी एक कहानी है - बी आर चोपडा साहब एक विदेशी फिल्म फेस्टिवल में शिरकत कर रहे थे तब किसी ने कहा कि भारतीय फिल्मे सिर्फ नाच-गानों का प्रदर्शन होती हैं | भारतीय नाच-गानों के बिना फिल्म नहीं बना सकते | बी आर चोपडा ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और बिना गीतों वाली कुछ बेहतरीन फिल्में बनाई |
इस फिल्म ने जो सवाल उठाया वो आज तक अपनी जगह कायम है, उस पर अब भी बहस की ज़रुरत है लेकिन एक और सवाल साथ खडा हो गया है कि ये बहस करेगा कौन और उस बहस के नतीजों को अमल में कौन लाएगा क्योंकि अब तो बौद्धिकता भी ग्लैमर की चकाचौंध की शिकार हो गई है |

फिल्म ५ में से ४.५ अंक पाने की हक़दार है |

अनिरुद्ध शर्मा